गाथा (महला 5), Gatha (Mahalla 5) Path in Hindi Gurbani online


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महला ५ गाथा
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

करपूर पुहप सुगंधा परस मानुख्य देहं मलीणं ॥ मजा रुधिर द्रुगंधा नानक अथि गरबेण अग्यानणो ॥१॥

परमाणो परजंत आकासह दीप लोअ सिखंडणह ॥ गछेण नैण भारेण नानक बिना साधू न सिध्यते ॥२॥

जाणो सति होवंतो मरणो द्रिसटेण मिथिआ ॥ कीरति साथि चलंथो भणंति नानक साध संगेण ॥३॥

माया चित भरमेण इसट मित्रेखु बांधवह ॥ लबध्यं साध संगेण नानक सुख असथानं गोपाल भजणं ॥४॥

मैलागर संगेण निमु बिरख सि चंदनह ॥ निकटि बसंतो बांसो नानक अहं बुधि न बोहते ॥५॥

गाथा गु्मफ गोपाल कथं मथं मान मरदनह ॥ हतं पंच सत्रेण नानक हरि बाणे प्रहारणह ॥६॥

बचन साध सुख पंथा लहंथा बड करमणह ॥ रहंता जनम मरणेन रमणं नानक हरि कीरतनह ॥७॥

पत्र भुरिजेण झड़ीयं नह जड़ीअं पेड स्मपता ॥ नाम बिहूण बिखमता नानक बहंति जोनि बासरो रैणी ॥८॥

भावनी साध संगेण लभंतं बड भागणह ॥ हरि नाम गुण रमणं नानक संसार सागर नह बिआपणह ॥९॥

गाथा गूड़ अपारं समझणं बिरला जनह ॥ संसार काम तजणं नानक गोबिंद रमणं साध संगमह ॥१०॥

सुमंत्र साध बचना कोटि दोख बिनासनह ॥ हरि चरण कमल ध्यानं नानक कुल समूह उधारणह ॥११॥

सुंदर मंदर सैणह जेण मध्य हरि कीरतनह ॥ मुकते रमण गोबिंदह नानक लबध्यं बड भागणह ॥१२॥

हरि लबधो मित्र सुमितो ॥ बिदारण कदे न चितो ॥ जा का असथलु तोलु अमितो ॥ सोई नानक सखा जीअ संगि कितो ॥१३॥

अपजसं मिटंत सत पुत्रह ॥ सिमरतब्य रिदै गुर मंत्रणह ॥ प्रीतम भगवान अचुत ॥ नानक संसार सागर तारणह ॥१४॥

मरणं बिसरणं गोबिंदह ॥ जीवणं हरि नाम ध्यावणह ॥ लभणं साध संगेण ॥ नानक हरि पूरबि लिखणह ॥१५॥

दसन बिहून भुयंगं मंत्रं गारुड़ी निवारं ॥ ब्याधि उपाड़ण संतं ॥ नानक लबध करमणह ॥१६॥

जथ कथ रमणं सरणं सरबत्र जीअणह ॥ तथ लगणं प्रेम नानक ॥ परसादं गुर दरसनह ॥१७॥

चरणारबिंद मन बिध्यं ॥ सिध्यं सरब कुसलणह ॥ गाथा गावंति नानक भब्यं परा पूरबणह ॥१८॥

सुभ बचन रमणं गवणं साध संगेण उधरणह ॥ संसार सागरं नानक पुनरपि जनम न लभ्यते ॥१९॥

बेद पुराण सासत्र बीचारं ॥ एकंकार नाम उर धारं ॥ कुलह समूह सगल उधारं ॥ बडभागी नानक को तारं ॥२०॥

सिमरणं गोबिंद नामं उधरणं कुल समूहणह ॥ लबधिअं साध संगेण नानक वडभागी भेटंति दरसनह ॥२१॥

सरब दोख परंतिआगी सरब धरम द्रिड़ंतणः ॥ लबधेणि साध संगेणि नानक मसतकि लिख्यणः ॥२२॥

होयो है होवंतो हरण भरण स्मपूरणः ॥ साधू सतम जाणो नानक प्रीति कारणं ॥२३॥

सुखेण बैण रतनं रचनं कसु्मभ रंगणः ॥ रोग सोग बिओगं नानक सुखु न सुपनह ॥२४॥


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