अलाहणीआ, Alahniyan (Mahalla 1 3) Path in Hindi Gurbani online


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रागु वडहंसु महला १ घरु ५ अलाहणीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

धंनु सिरंदा सचा पातिसाहु जिनि जगु धंधै लाइआ ॥ मुहलति पुनी पाई भरी जानीअड़ा घति चलाइआ ॥ जानी घति चलाइआ लिखिआ आइआ रुंने वीर सबाए ॥ कांइआ हंस थीआ वेछोड़ा जां दिन पुंने मेरी माए ॥ जेहा लिखिआ तेहा पाइआ जेहा पुरबि कमाइआ ॥ धंनु सिरंदा सचा पातिसाहु जिनि जगु धंधै लाइआ ॥१॥

साहिबु सिमरहु मेरे भाईहो सभना एहु पइआणा ॥ एथै धंधा कूड़ा चारि दिहा आगै सरपर जाणा ॥ आगै सरपर जाणा जिउ मिहमाणा काहे गारबु कीजै ॥ जितु सेविऐ दरगह सुखु पाईऐ नामु तिसै का लीजै ॥ आगै हुकमु न चलै मूले सिरि सिरि किआ विहाणा ॥ साहिबु सिमरिहु मेरे भाईहो सभना एहु पइआणा ॥२॥

जो तिसु भावै सम्रथ सो थीऐ हीलड़ा एहु संसारो ॥ जलि थलि महीअलि रवि रहिआ साचड़ा सिरजणहारो ॥ साचा सिरजणहारो अलख अपारो ता का अंतु न पाइआ ॥ आइआ तिन का सफलु भइआ है इक मनि जिनी धिआइआ ॥ ढाहे ढाहि उसारे आपे हुकमि सवारणहारो ॥ जो तिसु भावै सम्रथ सो थीऐ हीलड़ा एहु संसारो ॥३॥

नानक रुंना बाबा जाणीऐ जे रोवै लाइ पिआरो ॥ वालेवे कारणि बाबा रोईऐ रोवणु सगल बिकारो ॥ रोवणु सगल बिकारो गाफलु संसारो माइआ कारणि रोवै ॥ चंगा मंदा किछु सूझै नाही इहु तनु एवै खोवै ॥ ऐथै आइआ सभु को जासी कूड़ि करहु अहंकारो ॥ नानक रुंना बाबा जाणीऐ जे रोवै लाइ पिआरो ॥४॥१॥

वडहंसु महला १ ॥

आवहु मिलहु सहेलीहो सचड़ा नामु लएहां ॥ रोवह बिरहा तन का आपणा साहिबु सम्हालेहां ॥ साहिबु सम्हालिह पंथु निहालिह असा भि ओथै जाणा ॥ जिस का कीआ तिन ही लीआ होआ तिसै का भाणा ॥ जो तिनि करि पाइआ सु आगै आइआ असी कि हुकमु करेहा ॥ आवहु मिलहु सहेलीहो सचड़ा नामु लएहा ॥१॥

मरणु न मंदा लोका आखीऐ जे मरि जाणै ऐसा कोइ ॥ सेविहु साहिबु सम्रथु आपणा पंथु सुहेला आगै होइ ॥ पंथि सुहेलै जावहु तां फलु पावहु आगै मिलै वडाई ॥ भेटै सिउ जावहु सचि समावहु तां पति लेखै पाई ॥ महली जाइ पावहु खसमै भावहु रंग सिउ रलीआ माणै ॥ मरणु न मंदा लोका आखीऐ जे कोई मरि जाणै ॥२॥

मरणु मुणसा सूरिआ हकु है जो होइ मरनि परवाणो ॥ सूरे सेई आगै आखीअहि दरगह पावहि साची माणो ॥ दरगह माणु पावहि पति सिउ जावहि आगै दूखु न लागै ॥ करि एकु धिआवहि तां फलु पावहि जितु सेविऐ भउ भागै ॥ ऊचा नही कहणा मन महि रहणा आपे जाणै जाणो ॥ मरणु मुणसां सूरिआ हकु है जो होइ मरहि परवाणो ॥३॥

नानक किस नो बाबा रोईऐ बाजी है इहु संसारो ॥ कीता वेखै साहिबु आपणा कुदरति करे बीचारो ॥ कुदरति बीचारे धारण धारे जिनि कीआ सो जाणै ॥ आपे वेखै आपे बूझै आपे हुकमु पछाणै ॥ जिनि किछु कीआ सोई जाणै ता का रूपु अपारो ॥ नानक किस नो बाबा रोईऐ बाजी है इहु संसारो ॥४॥२॥

वडहंसु महला १ दखणी ॥

सचु सिरंदा सचा जाणीऐ सचड़ा परवदगारो ॥ जिनि आपीनै आपु साजिआ सचड़ा अलख अपारो ॥ दुइ पुड़ जोड़ि विछोड़िअनु गुर बिनु घोरु अंधारो ॥ सूरजु चंदु सिरजिअनु अहिनिसि चलतु वीचारो ॥१॥ सचड़ा साहिबु सचु तू सचड़ा देहि पिआरो ॥ रहाउ ॥

तुधु सिरजी मेदनी दुखु सुखु देवणहारो ॥ नारी पुरख सिरजिऐ बिखु माइआ मोहु पिआरो ॥ खाणी बाणी तेरीआ देहि जीआ आधारो ॥ कुदरति तखतु रचाइआ सचि निबेड़णहारो ॥२॥

आवा गवणु सिरजिआ तू थिरु करणैहारो ॥ जमणु मरणा आइ गइआ बधिकु जीउ बिकारो ॥ भूडड़ै नामु विसारिआ बूडड़ै किआ तिसु चारो ॥ गुण छोडि बिखु लदिआ अवगुण का वणजारो ॥३॥

सदड़े आए तिना जानीआ हुकमि सचे करतारो ॥ नारी पुरख विछुंनिआ विछुड़िआ मेलणहारो ॥ रूपु न जाणै सोहणीऐ हुकमि बधी सिरि कारो ॥ बालक बिरधि न जाणनी तोड़नि हेतु पिआरो ॥४॥

नउ दर ठाके हुकमि सचै हंसु गइआ गैणारे ॥ सा धन छुटी मुठी झूठि विधणीआ मिरतकड़ा अंङनड़े बारे ॥ सुरति मुई मरु माईए महल रुंनी दर बारे ॥ रोवहु कंत महेलीहो सचे के गुण सारे ॥५॥

जलि मलि जानी नावालिआ कपड़ि पटि अ्मबारे ॥ वाजे वजे सची बाणीआ पंच मुए मनु मारे ॥ जानी विछुंनड़े मेरा मरणु भइआ ध्रिगु जीवणु संसारे ॥ जीवतु मरै सु जाणीऐ पिर सचड़ै हेति पिआरे ॥६॥

तुसी रोवहु रोवण आईहो झूठि मुठी संसारे ॥ हउ मुठड़ी धंधै धावणीआ पिरि छोडिअड़ी विधणकारे ॥ घरि घरि कंतु महेलीआ रूड़ै हेति पिआरे ॥ मै पिरु सचु सालाहणा हउ रहसिअड़ी नामि भतारे ॥७॥

गुरि मिलिऐ वेसु पलटिआ सा धन सचु सीगारो ॥ आवहु मिलहु सहेलीहो सिमरहु सिरजणहारो ॥ बईअरि नामि सोहागणी सचु सवारणहारो ॥ गावहु गीतु न बिरहड़ा नानक ब्रहम बीचारो ॥८॥३॥

वडहंसु महला १ ॥

जिनि जगु सिरजि समाइआ सो साहिबु कुदरति जाणोवा ॥ सचड़ा दूरि न भालीऐ घटि घटि सबदु पछाणोवा ॥ सचु सबदु पछाणहु दूरि न जाणहु जिनि एह रचना राची ॥ नामु धिआए ता सुखु पाए बिनु नावै पिड़ काची ॥ जिनि थापी बिधि जाणै सोई किआ को कहै वखाणो ॥ जिनि जगु थापि वताइआ जालो सो साहिबु परवाणो ॥१॥

बाबा आइआ है उठि चलणा अध पंधै है संसारोवा ॥ सिरि सिरि सचड़ै लिखिआ दुखु सुखु पुरबि वीचारोवा ॥ दुखु सुखु दीआ जेहा कीआ सो निबहै जीअ नाले ॥ जेहे करम कराए करता दूजी कार न भाले ॥ आपि निरालमु धंधै बाधी करि हुकमु छडावणहारो ॥ अजु कलि करदिआ कालु बिआपै दूजै भाइ विकारो ॥२॥

जम मारग पंथु न सुझई उझड़ु अंध गुबारोवा ॥ ना जलु लेफ तुलाईआ ना भोजन परकारोवा ॥ भोजन भाउ न ठंढा पाणी ना कापड़ु सीगारो ॥ गलि संगलु सिरि मारे ऊभौ ना दीसै घर बारो ॥ इब के राहे जमनि नाही पछुताणे सिरि भारो ॥ बिनु साचे को बेली नाही साचा एहु बीचारो ॥३॥

बाबा रोवहि रवहि सु जाणीअहि मिलि रोवै गुण सारेवा ॥ रोवै माइआ मुठड़ी धंधड़ा रोवणहारेवा ॥ धंधा रोवै मैलु न धोवै सुपनंतरु संसारो ॥ जिउ बाजीगरु भरमै भूलै झूठि मुठी अहंकारो ॥ आपे मारगि पावणहारा आपे करम कमाए ॥ नामि रते गुरि पूरै राखे नानक सहजि सुभाए ॥४॥४॥

वडहंसु महला १ ॥

बाबा आइआ है उठि चलणा इहु जगु झूठु पसारोवा ॥ सचा घरु सचड़ै सेवीऐ सचु खरा सचिआरोवा ॥ कूड़ि लबि जां थाइ न पासी अगै लहै न ठाओ ॥ अंतरि आउ न बैसहु कहीऐ जिउ सुंञै घरि काओ ॥ जमणु मरणु वडा वेछोड़ा बिनसै जगु सबाए ॥ लबि धंधै माइआ जगतु भुलाइआ कालु खड़ा रूआए ॥१॥

बाबा आवहु भाईहो गलि मिलह मिलि मिलि देह आसीसा हे ॥ बाबा सचड़ा मेलु न चुकई प्रीतम कीआ देह असीसा हे ॥ आसीसा देवहो भगति करेवहो मिलिआ का किआ मेलो ॥ इकि भूले नावहु थेहहु थावहु गुर सबदी सचु खेलो ॥ जम मारगि नही जाणा सबदि समाणा जुगि जुगि साचै वेसे ॥ साजन सैण मिलहु संजोगी गुर मिलि खोले फासे ॥२॥

बाबा नांगड़ा आइआ जग महि दुखु सुखु लेखु लिखाइआ ॥ लिखिअड़ा साहा ना टलै जेहड़ा पुरबि कमाइआ ॥ बहि साचै लिखिआ अम्रितु बिखिआ जितु लाइआ तितु लागा ॥ कामणिआरी कामण पाए बहु रंगी गलि तागा ॥ होछी मति भइआ मनु होछा गुड़ु सा मखी खाइआ ॥ ना मरजादु आइआ कलि भीतरि नांगो बंधि चलाइआ ॥३॥

बाबा रोवहु जे किसै रोवणा जानीअड़ा बंधि पठाइआ है ॥ लिखिअड़ा लेखु न मेटीऐ दरि हाकारड़ा आइआ है ॥ हाकारा आइआ जा तिसु भाइआ रुंने रोवणहारे ॥ पुत भाई भातीजे रोवहि प्रीतम अति पिआरे ॥ भै रोवै गुण सारि समाले को मरै न मुइआ नाले ॥ नानक जुगि जुगि जाण सिजाणा रोवहि सचु समाले ॥४॥५॥

वडहंसु महला ३ महला तीजा
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

प्रभु सचड़ा हरि सालाहीऐ कारजु सभु किछु करणै जोगु ॥ सा धन रंड न कबहू बैसई ना कदे होवै सोगु ॥ ना कदे होवै सोगु अनदिनु रस भोग सा धन महलि समाणी ॥ जिनि प्रिउ जाता करम बिधाता बोले अम्रित बाणी ॥ गुणवंतीआ गुण सारहि अपणे कंत समालहि ना कदे लगै विजोगो ॥ सचड़ा पिरु सालाहीऐ सभु किछु करणै जोगो ॥१॥

सचड़ा साहिबु सबदि पछाणीऐ आपे लए मिलाए ॥ सा धन प्रिअ कै रंगि रती विचहु आपु गवाए ॥ विचहु आपु गवाए फिरि कालु न खाए गुरमुखि एको जाता ॥ कामणि इछ पुंनी अंतरि भिंनी मिलिआ जगजीवनु दाता ॥ सबद रंगि राती जोबनि माती पिर कै अंकि समाए ॥ सचड़ा साहिबु सबदि पछाणीऐ आपे लए मिलाए ॥२॥

जिनी आपणा कंतु पछाणिआ हउ तिन पूछउ संता जाए ॥ आपु छोडि सेवा करी पिरु सचड़ा मिलै सहजि सुभाए ॥ पिरु सचा मिलै आए साचु कमाए साचि सबदि धन राती ॥ कदे न रांड सदा सोहागणि अंतरि सहज समाधी ॥ पिरु रहिआ भरपूरे वेखु हदूरे रंगु माणे सहजि सुभाए ॥ जिनी आपणा कंतु पछाणिआ हउ तिन पूछउ संता जाए ॥३॥

पिरहु विछुंनीआ भी मिलह जे सतिगुर लागह साचे पाए ॥ सतिगुरु सदा दइआलु है अवगुण सबदि जलाए ॥ अउगुण सबदि जलाए दूजा भाउ गवाए सचे ही सचि राती ॥ सचै सबदि सदा सुखु पाइआ हउमै गई भराती ॥ पिरु निरमाइलु सदा सुखदाता नानक सबदि मिलाए ॥ पिरहु विछुंनीआ भी मिलह जे सतिगुर लागह साचे पाए ॥४॥१॥

वडहंसु महला ३ ॥

सुणिअहु कंत महेलीहो पिरु सेविहु सबदि वीचारि ॥ अवगणवंती पिरु न जाणई मुठी रोवै कंत विसारि ॥ रोवै कंत समालि सदा गुण सारि ना पिरु मरै न जाए ॥ गुरमुखि जाता सबदि पछाता साचै प्रेमि समाए ॥ जिनि अपणा पिरु नही जाता करम बिधाता कूड़ि मुठी कूड़िआरे ॥ सुणिअहु कंत महेलीहो पिरु सेविहु सबदि वीचारे ॥१॥

सभु जगु आपि उपाइओनु आवणु जाणु संसारा ॥ माइआ मोहु खुआइअनु मरि जमै वारो वारा ॥ मरि जमै वारो वारा वधहि बिकारा गिआन विहूणी मूठी ॥ बिनु सबदै पिरु न पाइओ जनमु गवाइओ रोवै अवगुणिआरी झूठी ॥ पिरु जगजीवनु किस नो रोईऐ रोवै कंतु विसारे ॥ सभु जगु आपि उपाइओनु आवणु जाणु संसारे ॥२॥

सो पिरु सचा सद ही साचा है ना ओहु मरै न जाए ॥ भूली फिरै धन इआणीआ रंड बैठी दूजै भाए ॥ रंड बैठी दूजै भाए माइआ मोहि दुखु पाए आव घटै तनु छीजै ॥ जो किछु आइआ सभु किछु जासी दुखु लागा भाइ दूजै ॥ जमकालु न सूझै माइआ जगु लूझै लबि लोभि चितु लाए ॥ सो पिरु साचा सद ही साचा ना ओहु मरै न जाए ॥३॥

इकि रोवहि पिरहि विछुंनीआ अंधी ना जाणै पिरु नाले ॥ गुर परसादी साचा पिरु मिलै अंतरि सदा समाले ॥ पिरु अंतरि समाले सदा है नाले मनमुखि जाता दूरे ॥ इहु तनु रुलै रुलाइआ कामि न आइआ जिनि खसमु न जाता हदूरे ॥ नानक सा धन मिलै मिलाई पिरु अंतरि सदा समाले ॥ इकि रोवहि पिरहि विछुंनीआ अंधी न जाणै पिरु है नाले ॥४॥२॥

वडहंसु मः ३ ॥

रोवहि पिरहि विछुंनीआ मै पिरु सचड़ा है सदा नाले ॥ जिनी चलणु सही जाणिआ सतिगुरु सेवहि नामु समाले ॥ सदा नामु समाले सतिगुरु है नाले सतिगुरु सेवि सुखु पाइआ ॥ सबदे कालु मारि सचु उरि धारि फिरि आवण जाणु न होइआ ॥ सचा साहिबु सची नाई वेखै नदरि निहाले ॥ रोवहि पिरहु विछुंनीआ मै पिरु सचड़ा है सदा नाले ॥१॥

प्रभु मेरा साहिबु सभ दू ऊचा है किव मिलां प्रीतम पिआरे ॥ सतिगुरि मेली तां सहजि मिली पिरु राखिआ उर धारे ॥ सदा उर धारे नेहु नालि पिआरे सतिगुर ते पिरु दिसै ॥ माइआ मोह का कचा चोला तितु पैधै पगु खिसै ॥ पिर रंगि राता सो सचा चोला तितु पैधै तिखा निवारे ॥ प्रभु मेरा साहिबु सभ दू ऊचा है किउ मिला प्रीतम पिआरे ॥२॥

मै प्रभु सचु पछाणिआ होर भूली अवगणिआरे ॥ मै सदा रावे पिरु आपणा सचड़ै सबदि वीचारे ॥ सचै सबदि वीचारे रंगि राती नारे मिलि सतिगुर प्रीतमु पाइआ ॥ अंतरि रंगि राती सहजे माती गइआ दुसमनु दूखु सबाइआ ॥ अपने गुर कंउ तनु मनु दीजै तां मनु भीजै त्रिसना दूख निवारे ॥ मै पिरु सचु पछाणिआ होर भूली अवगणिआरे ॥३॥

सचड़ै आपि जगतु उपाइआ गुर बिनु घोर अंधारो ॥ आपि मिलाए आपि मिलै आपे देइ पिआरो ॥ आपे देइ पिआरो सहजि वापारो गुरमुखि जनमु सवारे ॥ धनु जग महि आइआ आपु गवाइआ दरि साचै सचिआरो ॥ गिआनि रतनि घटि चानणु होआ नानक नाम पिआरो ॥ सचड़ै आपि जगतु उपाइआ गुर बिनु घोर अंधारो ॥४॥३॥

वडहंसु महला ३ ॥

इहु सरीरु जजरी है इस नो जरु पहुचै आए ॥ गुरि राखे से उबरे होरु मरि जमै आवै जाए ॥ होरि मरि जमहि आवहि जावहि अंति गए पछुतावहि बिनु नावै सुखु न होई ॥ ऐथै कमावै सो फलु पावै मनमुखि है पति खोई ॥ जम पुरि घोर अंधारु महा गुबारु ना तिथै भैण न भाई ॥ इहु सरीरु जजरी है इस नो जरु पहुचै आई ॥१॥

काइआ कंचनु तां थीऐ जां सतिगुरु लए मिलाए ॥ भ्रमु माइआ विचहु कटीऐ सचड़ै नामि समाए ॥ सचै नामि समाए हरि गुण गाए मिलि प्रीतम सुखु पाए ॥ सदा अनंदि रहै दिनु राती विचहु हंउमै जाए ॥ जिनी पुरखी हरि नामि चितु लाइआ तिन कै हंउ लागउ पाए ॥ कांइआ कंचनु तां थीऐ जा सतिगुरु लए मिलाए ॥२॥

सो सचा सचु सलाहीऐ जे सतिगुरु देइ बुझाए ॥ बिनु सतिगुर भरमि भुलाणीआ किआ मुहु देसनि आगै जाए ॥ किआ देनि मुहु जाए अवगुणि पछुताए दुखो दुखु कमाए ॥ नामि रतीआ से रंगि चलूला पिर कै अंकि समाए ॥ तिसु जेवडु अवरु न सूझई किसु आगै कहीऐ जाए ॥ सो सचा सचु सलाहीऐ जे सतिगुरु देइ बुझाए ॥३॥

जिनी सचड़ा सचु सलाहिआ हंउ तिन लागउ पाए ॥ से जन सचे निरमले तिन मिलिआ मलु सभ जाए ॥ तिन मिलिआ मलु सभ जाए सचै सरि नाए सचै सहजि सुभाए ॥ नामु निरंजनु अगमु अगोचरु सतिगुरि दीआ बुझाए ॥ अनदिनु भगति करहि रंगि राते नानक सचि समाए ॥ जिनी सचड़ा सचु धिआइआ हंउ तिन कै लागउ पाए ॥४॥४॥


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