Pt 3 - अकाल उसतत (पातिसाही 10), Part 3 - Akal Ustat (Patshahi 10) Path in Hindi Gurbani online


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बंग के बंगाली फिरहंग के फिरंगावाली दिली के दिलवाली तेरी आगिआ मै चलत हैं ॥ रोह के रुहेले माघ देस के मघेले बीर बंगसी बुँदेले पाप पुँज को मलत हैं ॥ गोखा गुन गावै चीन मचीन के सीस न्यावै तिब्बती धिआइ दोख देह को दलत हैं ॥ जिनै तोहि धिआइओ तिनै पूरन प्रताप पाइओ सरब धन धाम फल फूल सों फलत हैं ॥३॥२५५॥

देव देवतान कौ सुरेस दानवान कौ महेस गंग धान कौ अभेस कहीअतु हैं ॥ रंग मै रंगीन राग रूप मैं प्रबीन और काहू पै न दीन साध अधीन कहीअतु हैं ॥ पाईऐ न पार तेज पुँज मैं अपार सरब बिदिआ के उदार हैं अपार कहीअतु हैं ॥ हाथी की पुकार पल पाछै पहुचत ताहि चीटी की चिंघार पहिले ही सुनीअतु हैं ॥४॥२५६॥

केते इंद्र दुआर केते ब्रहमा मुख चार केते कृसन अवतार केते राम कहीअतु हैं ॥ केते ससि रासी केते सूरज प्रकासी केते मुँडीआ उदासी जोग दुआर कहीअतु हैं ॥ केते महादीन केते बिआस से प्रबीन केते कुमेर कुलीन केते जछ कहीअतु हैं ॥ करत हैं बिचार पै न पूरन को पावै पार ताही ते अपार निराधार लहीअतु हैं ॥५॥२५७॥

पूरन अवतार निराधार है न पारावार पाईऐ न पार पै अपार कै बखानीऐ ॥ अद्वै अबिनासी परम पूरन प्रकासी महा रूप हूँ के रासी हैं अनासी कै कै मानीऐ ॥ जंत्र हूँ न जात जा की बाप हूँ न माइ ता की पूरन प्रभा की सु छटा कै अनुमानीऐ ॥ तेज हूँ को तंत्र हैं कि राजसी को जंत्र हैं कि मोहनी को मंत्र हैं निजंत्र कै कै जानीऐ ॥६॥२५८॥

तेज हूँ को तरु हैं कि राजसी को सरु हैं कि सु्ुधता को घरु हैं कि सिद्धता की सारु हैं ॥ कामना की खान हैं कि साधना की सान हैं बिरकतता की बान हैं कि बुद्धि को उदार हैं ॥ सुँदर सरूप हैं कि भूपन को भूप हैं कि रूप हूँ को रूप हैं कुमति को प्रहारु हैं ॥ दीनन को दाता हैं गनीमन को गारक हैं साधन को रच्छक है गुनन को पहारु हैं ॥७॥२५९॥

सिद्ध को सरूप हैं कि बुधि को बिभूति हैं कि क्रुध को अभूत हैं कि अच्छै अबिनासी हैं ॥ काम को कुनिंदा हैं कि खूबी को दिहंदा हैं गनीम गरिंदा हैं कि तेज को प्रकासी हैं ॥ काल हूँ को काल हैं कि सत्रन को साल हैं कि मित्रन को पोखत हैं कि बृधता को बासी हैं ॥ जोग हूँ को जंत्र हैं कि तेज हूँ को तंत्र हैं कि मोहनी को मंत्र हैं कि पूरन प्रकासी हैं ॥८॥२६०॥

रूप को निवास हैं कि बुद्धि को प्रकास हैं कि सिद्धता को बास हैं कि बुद्धि हूँ को घरु हैं ॥ देवन को देव हैं निरंजन अभेव हैं अदेवन को देव हैं कि सुद्धता को सरु हैं ॥ जान को बचय्या हैं इमान को दिवय्या हैं जम जाल को कट्टया हैं कि कामना को करु हैं ॥ तेज को प्रचंड हैं अखंडण को खंड हैं महीपन को मंड हैं कि इसत्री हैं न नरु हैं ॥९॥२६१॥

बिस्व को भरन हैं कि अपदा को हरन हैं कि सुख को करन हैं कि तेज को प्रकाश हैं ॥ पाईऐ न पार पारावार हूँ को पार जाँ को कीजत बिचार सुबिचार को निवास हैं ॥ हिंगुला हिमालै गावै हबसी हल्लबी धिआवै पूरबी न पार पावै आसा ते अनास हैं ॥ देवन को देव महादेव हूँ के देव हैं निरंजन अभेव नाथ अद्वै अबिनास हैं ॥१०॥२६२॥

अंजन बिहीन हैं निरंजन प्रबीन हैं कि सेवक अधीन है कटय्या जम जाल के ॥ देवन के देव महादेव हूँ के देवनाथ भूम के भुजय्या है मुहय्या महा बाल के ॥ राजन के राजा महा साज हूँ के साजा महा जोग हूँ के जोग हैं धरय्या द्रुम छाल के ॥ कामना के करु हैं कुबिद्धिता को हरु हैं कि सिद्धता के साथी हैं कि काल हैं कुचाल के ॥११॥२६३॥

छीर कैसी छीरावध छाछ कैसी छत्त्रानेर छपाकर कैसी छबि कालइंद्री के कूल कै ॥ हंसनी सी सीहारूम हीरा सी हुसैनाबाद गंगा कैसी धार चली सातो सिंध रूल कै ॥ पारा सी पलाऊगढ रूपा कैसी रामपुर सोरा सी सुरंगाबाद नीकै रही झूल कै ॥ चंपा सी चंदेरी कोट चाँदनी सी चाँदागड़्ह कीरति तिहारी रही मालती सी फूल कै ॥१२॥२६४॥

फटक सी कैलास कमाँऊगड़्ह काँसीपुर सीसा सी सुरंगाबादि नीकै सोहीअतु है ॥ हिमा सी हिमालैहर हार सी हल्लबा नेर हंस कैसी हाजीपुर देखे मोहीअतु है ॥ चंदन सी चंपावती चंद्रमा सी चंद्रागिर चाँदनी सी चाँदगड़्ह जौन जोहीअतु है ॥ गंगा सम गंगधार बकान सी बलिंदावाद कीरति तिहारी की उजीआरी सोहीअतु है ॥१३॥२६५॥

फरा सी फिरंगी फरासीस के दुरंगी मकरान के मृदंगी तेरे गीत गाईअतु है ॥ भखरी कंधारी गोर गखरी गरदेजा चारी पउन के अहारी तेरो नामु धिआईअतु है ॥ पूरब पलाऊं काम रूप औ कमाऊं सरब ठउर मै बिराजै जहाँ जहाँ जाईअतु है ॥ पूरन प्रतापी जंत्र मंत्र ते अतापी नाथ कीरति तिहारी को न पार पाईअतु है ॥१४॥२६६॥

त्व प्रसादि ॥ पाधड़ी छंद ॥

अद्वै अनास आसन अडोल ॥ अद्वै अनंत उपमा अतोल ॥ अछै सरूप अब्यकत नाथ ॥ आजान बाहु सरबा प्रमाथ ॥१॥२६७॥

जह तह महीप बन तिन प्रफुल ॥ सोभा बसंत जह तह प्््रडुल ॥ बन तन दुरंत खग मृग महान ॥ जह तह प्रफु्ुल सुँदर सुजान ॥२॥२६८॥

फुलतं प्रफुल्ल लहि लहित मौर ॥ सिर ढुरहि जान मन मथहि चौर ॥ कुदरत कमाल राज़क रहीम ॥ करुणा निधान कामल करीम ॥३॥२६९॥

जंह तंह बिलोक तंह तंह प्रसोह ॥ आजानु बाहु अमितोज मोह ॥ रोसं बिरहत करणा निधान ॥ जंह तंह प्रफुल्ल सुँदर सुजान ॥४॥२७०॥

बन तिन महीप जल थल महान ॥ जंह तंह प्रसोह करुणा निधान ॥ जगमगत तेज पूरन प्रताप ॥ अंबर जिमीन जिह जपत जाप ॥५॥२७१॥

सातो अकास सातो पतार ॥ बिथरिओ अदिसट जिह करम जारि ॥ उसतत संपूरणं ॥


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