अकाल उसतत (पातिसाही 10), Akal Ustat (Patshahi 10) Path in Hindi Gurbani online


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ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अकाल उसतत ॥
स्री भगउती जी सहाइ ॥
उतार खासे दसखत का ॥ पातिसाही १० ॥

अकाल पुरख की रछा हमनै ॥ सरब लोह दी रछिआ हमनै ॥ सरब काल जी दी रछिआ हमनै ॥ सरब लोह जी दी सदा रछिआ हमनै ॥

आगै लिखारी के दसतखत ॥ त्व प्रसादि चउपई ॥

प्रणवो आदि एकंकारा ॥ जल थल महीअल कीओ पसारा ॥ आदि पुरख अबिगत अबिनासी ॥ लोक चत्तु्र दस जोति प्रकासी ॥१॥

हसत कीट के बीच समाना ॥ राव रंक जिह इक सर जाना ॥ अद्वै अलख पुरख अबिगामी ॥ सभ घट घट के अंतरजामी ॥२॥

अलख रूप अछै अनभेखा ॥ राग रंग जिह रूप न रेखा ॥ बरन चिहन सभहूँ ते निआरा ॥ आद पुरख अद्वै अबिकारा ॥३॥

बरन चिहन जिह जात न पाता ॥ सत्त्र मित्त्र जिह तात न माता ॥ सभ ते दूरि सभन ते नेरा ॥ जल थल महीअल जाहि बसेरा ॥४॥

अनहद रूप अनाहद बानी ॥ चरन सरन जिह बसत भवानी ॥ ब्रहमा बिसन अंतु नही पाइओ ॥ नेत नेत मुखचार बताइओ ॥५॥

कोटि इंद्र उपइंद्र बनाए ॥ ब्रहमा रुद्र उपाइ खपाए ॥ लोक चत्त्र दस खेल रचाइओ ॥ बहुर आप ही बीच मिलाइओ ॥६॥

दानव देव फनिंद अपारा ॥ गंध्रब जच्छ रचै सुभ चारा ॥ भूत भविक्ख भवान कहानी ॥ घट घट के पट पट की जानी ॥७॥

तात मात जिह जात न पाता ॥ एक रंग काहू नही राता ॥ सरब जोत के बीच समाना ॥ सभहूँ सरब ठौर पहिचाना ॥८॥

काल रहत अन काल सरूपा ॥ अलख पुरख अबगत अवधूता ॥ जात पात जिह चिहन न बरना ॥ अबगत देव अछै अन भरमा ॥९॥

सभ को काल सभन को करता ॥ रोग सोग दोखन को हरता ॥ एक चित्त जिह इक छिन धिआइओ ॥ काल फास के बीच न आइओ ॥१०॥

त्व प्रसादि ॥ कबित्त ॥

कतहूँ सुचेत हुइ कै चेतना को चार कीओ कतहूँ अचिंत हुइ कै सोवत अचेत हो ॥ कतहूँ भिखारी हुइ कै माँगत फिरत भीख कहूँ महा दान हुइ कै माँगिओ धन देत हो ॥ कहूँ महाँ राजन को दीजत अनंत दान कहूँ महाँ राजन ते छीन छित लेत हो ॥ कहूँ बेद रीत कहूँ ता सिउ बिप्रीत कहूँ तृगुन अतीत कहूँ सुरगुन समेत हो ॥१॥११॥

कहूँ जच्छ गंध्रब उरग कहूँ बिदिआधर कहूँ भए किंनर पिसाच कहूँ प्रेत हो ॥ कहूँ हुइ कै हिंदूआ गाइत्री को गुपत जपिओ कहूँ हुइ कै तुरका पुकारे बाँग देत हो ॥ कहूँ कोक काब हुइ कै पुरान को पड़त मत कतहूँ कुरान को निदान जान लेत हो ॥ कहूँ बेद रीत कहूँ ता सिउ बिप्रीत कहूँ तृगुन अतीत कहूँ सुरगुन समेत हो ॥२॥१२॥

कहूँ देवतान के दिवान मै बिराजमान कहूँ दानवान को गुमान मत देत हो ॥ कहूँ इंद्र राजा को मिलत इंद्र पदवी सी कहूँ इंद्र पदवी छिपाइ छीन लेत हो ॥ कतहूँ बिचार अबिचार को बिचारत हो कहूँ निज नार पर नार के निकेत हो ॥ कहूँ बेद रीत कहूँ ता सिउ बिप्रीत कहूँ तृगुन अतीत कहूँ सुरगुन समेत हो ॥३॥१३॥

कहूँ ससत्रधारी कहूँ बिदिआ के बिचारी कहूँ मारत अहारी कहूँ नार के निकेत हो ॥ कहूँ देवबानी कहूँ सारदा भवानी कहूँ मंगला मृड़ानी कहूँ सिआम कहूँ सेत हो ॥ कहूँ धरम धामी कहूँ सरब ठउर गामी कहूँ जती कहूँ कामी कहूँ देत कहूँ लेत हो ॥ कहूँ बेद रीत कहूँ ता सिउ बिप्रीत कहूँ तृगुन अतीत कहूँ सुरगुन समेत हो ॥४॥१४॥

कहूँ जटाधारी कहूँ कंठी धरे ब्रहमचारी कहूँ जोग साधी कहूँ साधना करत हो ॥ कहूँ कान फारे कहूँ डंडी हुइ पधारे कहूँ फूक फूक पावन कउ पृथी पै धरत हो ॥ कतहूँ सिपाही हुइ कै साधत सिलाहन कौ कहूँ छत्री हुइ कै अर मारत मरत हो ॥ कहूँ भूम भार कौ उतारत हो महाराज कहूँ भव भूतन की भावना भरत हो ॥५॥१५॥

कहूँ गीत नाद के निदान कौ बतावत हो कहूँ नृतकारी चित्रकारी के निधान हो ॥ कतहूँ पयूख हुइ कै पीवत पिवावत हो कतहूँ मयूख ऊख कहूँ मद पान हो ॥ कहूँ महा सूर हुइ कै मारत मवासन कौ कहूँ महादेव देवतान के समान हो ॥ कहूँ महादीन कहूँ द्रब के अधीन कहूँ बिदिआ मै प्रबीन कहूँ भूम कहूँ भान हो ॥६॥१६॥

कहूँ अकलंक कहूँ मारत मयंक कहूँ पूरन प्रजंक कहूँ सु्ुधता की सार हो ॥ कहूँ देव धरम कहूँ साधना के हरम कहूँ कुतसत कुकरम कहूँ धरम के प्रकार हो ॥ कहूँ पउन अहारी कहूँ बिदिआ के बीचारी कहूँ जोगी जती ब्रहमचारी नर कहूँ नार हो ॥ कहूँ छत्रधारी कहूँ छाला धरे छैल भारी कहूँ छकवारी कहूँ छल के प्रकार हो ॥७॥१७॥

कहूँ गीत के गवय्या कहूँ बेन के बजय्या कहूँ नृत के नचय्या कहूँ नर को अकार हो ॥ कहूँ बेद बानी कहूँ कोक की कहानी कहूँ राजा कहूँ रानी कहूँ नार के प्रकार हो ॥ कहूँ बेन के बजय्या कहूँ धेन के चरय्या कहूँ लाखन लवय्या कहूँ सुँदर कुमार हो ॥ सुधता की सान हो कि संतन के प्रान हो कि दाता महा दान हो कि नृदोखी निरंकार हो ॥८॥१८॥

निरजुर निरूप हो कि सुँदर सरूप हो कि भूपन के भूप हो कि दाता महा दान हो ॥ प्रान के बचय्या दूध पूत के दिवय्या रोग सोग के मिटय्या किधौ मानी महा मान हो ॥ बिदिआ के बिचार हो कि अद्वै अवतार हो कि सिद्धता की सूरति हो कि सुधता की सान हो ॥ जोबन के जाल हो कि काल हूँ के काल हो कि सत्रन के सूल हो कि मित्रन के प्रान हो ॥९॥१९॥

कहूँ ब्रहम बाद कहूँ बिदिआ को बिखाद कहूँ नाद को ननाद कहूँ पूरन भगत हो ॥ कहूँ बेद रीत कहूँ बिदिआ की प्रतीत कहूँ नीत अउ अनीत कहूँ जुआला सी जगत हो ॥ पूरन प्रताप कहूँ इकाती को जाप कहूँ ताप को अताप कहूँ जोग ते डिगत हो ॥ कहूँ बर देत कहूँ छल सिउ छिनाइ लेत सरब काल सरब ठउर एक से लगत हो ॥१०॥२०॥

त्व प्रसादि ॥ सवय्ये ॥

स्रावग सुद्ध समूह सिधान के देखि फिरिओ घर जोग जती के ॥ सूर सुरारदन सुद्ध सुधादिक संत समूह अनेक मती के ॥ सारे ही देस को देखि रहिओ मत कोऊ न देखीअत प्रानपती के ॥ स्री भगवान की भाइ कृपा हू ते एक रती बिनु एक रती के ॥१॥२१॥

माते मतंग जरे जर संग अनूप उतंग सुरंग सवारे ॥ कोट तुरंग कुरंग से कूदत पउन के गउन को जात निवारे ॥ भारी भुजान के भूप भली बिधि निआवत सीस न जात बिचारे ॥ एते भए तु कहा भए भूपति अंत को नाँगे ही पाँइ पधारे ॥२॥२२॥

जीत फिरै सभ देस दिसान को बाजत ढोल मृदंग नगारे ॥ गुँजत गूड़ गजान के सुँदर हिंसत हैं हयराज हजारे ॥ भूत भविक्ख भवान के भूपत कउनु गनै नहीं जात बिचारे ॥ स्री पति स्री भगवान भजे बिनु अंत कउ अंत के धाम सिधारे ॥३॥२३॥

तीरथ नान दइआ दम दान सु संजम नेम अनेक बिसेखै ॥ बेद पुरान कतेब कुरान जमीन जमान सबान के पेखै ॥ पउन अहार जती जत धार सबै सु बिचार हजार क देखै ॥ स्री भगवान भजे बिनु भूपति एक रती बिनु एक न लेखै ॥४॥२४॥

सु्ुध सिपाह दुरंत दुबाह सु साज सनाह दुरजान दलैंगे ॥ भारी गुमान भरे मन मैं कर परबत पंख हले न हलैंगे ॥ तोरि अरीन मरोरि मवासन माते मतंगन मान मलैंगे ॥ स्री पति स्री भगवान कृपा बिनु तिआगि जहान निदान चलैंगे ॥५॥२५॥

बीर अपार बडे बरिआर अबिचारहि सार की धार भछय्या ॥ तोरत देस मलिंद मवासन माते गजान के मान मलय्या ॥ गाड़्हे गड़्हान को तोड़नहार सु बातन हीं चक चार लवय्या ॥ साहिबु स्री सभ को सिरनाइक जाचक अनेक सु एक दिवय्या ॥६॥२६॥

दानव देव फनिंद निसाचर भूत भविख भवान जपैंगे ॥ जीव जिते जल मै थल मै पल ही पल मै सभ थाप थपैंगे ॥ पुँन प्रतापन बाढ जैत धुन पापन के बहु पुँज खपैंगे ॥ साध समूह प्रसंन फिरैं जग सत्र सभै अविलोक चपैंगे ॥७॥२७॥

मानव इंद्र गजिंद्र नराधप जौन तृलोक को राज करैंगे ॥ कोटि इसनान गजादिक दान अनेक सुअंबर साज बरैंगे ॥ ब्रहम महेसर बिसन सचीपति अंत फसे जम फास परैंगे ॥ जे नर स्री पति के प्रस हैं पग ते नर फेर न देह धरैंगे ॥८॥२८॥

कहा भयो जो दोऊ लोचन मूँद कै बैठि रहिओ बक धिआन लगाइओ ॥ न्हात फिरिओ लीए सात समुद्रनि लोक गयो परलोक गवाइओ ॥ बास कीओ बिखिआन सों बैठ कै ऐसे ही ऐसे सु बैस बिताइओ ॥ साचु कहों सुन लेहु सभै जिन प्रेम कीओ तिन ही प्रभु पाइओ ॥९॥२९॥

काहू लै पाहन पूज धरयो सिर काहू लै लिंगु गरे लटकाइओ ॥ काहू लखिओ हरि अवाची दिसा महि काहू पछाह को सीसु निवाइओ ॥ कोऊ बुतान को पूजत है पसु कोऊ मृतान को पूजन धाइओ ॥ कूर कृआ उरझिओ सभ ही जग स्री भगवान को भेदु न पाइओ ॥१०॥३०॥

त्व प्रसादि ॥ तोमर छंद ॥

हरि जनम मरन बिहीन ॥ दस चार चार प्रबीन ॥ अकलंक रूप अपार ॥ अनछिज्ज तेज उदार ॥१॥३१॥

अनभिज्ज रूप दुरंत ॥ सभ जगत भगत महंत ॥ जस तिलक भूभृत भानु ॥ दस चार चार निधान ॥२॥३२॥

अकलंक रूप अपार ॥ सभ लोक सोक बिदार ॥ कल काल करम बिहीन ॥ सभ करम धरम प्रबीन ॥३॥३३॥

अनखंड अतुल प्रताप ॥ सभ थापिओ जिह थाप ॥ अनखेद भेद अछेद ॥ मुखचार गावत बेद ॥४॥३४॥

जिह नेत निगम कहंत ॥ मुखचार बकत बिअंत ॥ अनभिज्ज अतुल प्रताप ॥ अनखंड अमित अथाप ॥५॥३५॥

जिह कीन जगत पसार ॥ रचिओ बिचार बिचार ॥ अनंत रूप अखंड ॥ अतुल प्रताप प्रचंड ॥६॥३६॥

जिह अंड ते ब्रहमंड ॥ कीने सु चौदह खंड ॥ सभ कीन जगत पसार ॥ अबियकत रूप उदार ॥७॥३७॥

जिह कोटि इंद्र नृपार ॥ कई ब्रहम बिसन बिचार ॥ कई राम कृसन रसूल ॥ बिनु भगत को न कबूल ॥८॥३८॥

कई सिंध बिंध नगिंद्र ॥ कई मच्छ कच्छ फनिंद्र ॥ कई देव आदि कुमार ॥ कई कृसन बिसन अवतार ॥९॥३९॥

कई इंद्र बार बुहार ॥ कई बेद अउ मुखचार ॥ कई रुद्र छुद्द्र सरूप ॥ कई राम कृसन अनूप ॥१०॥४०॥

कई कोक काबि भणंत ॥ कई बेद भेद कहंत ॥ कई सासत्र सिंमृति बखान ॥ कहूँ कथत ही सु पुरान ॥११॥४१॥

कई अगन होत्र करंत ॥ कई उरध ताप दुरंत ॥ कई उरध बाहु संनिआस ॥ कहूँ जोग भेस उदास ॥१२॥४२॥

कहूँ निवली करम करंत ॥ कहूँ पउन अहार दुरंत ॥ कहूँ तीरथ दान अपार ॥ कहूँ जग्ग करम उदार ॥१३॥४३॥

कहूँ अगन होत्र अनूप ॥ कहूँ निआइ राज बिभूत ॥ कहूँ सासत्र सिंमृति रीत ॥ कहूँ बेद सिउ बिप्रीत ॥१४॥४४॥

कई देस देस फिरंत ॥ कई एक ठौर इसथंत ॥ कहूँ करत जल महि जाप ॥ कहूँ सहत तन पर ताप ॥१५॥४५॥

कहूँ बास बनहि करंत ॥ कहूँ ताप तनहि सहंत ॥ कहूँ गृहसत धरम अपार ॥ कहूँ राज रीत उदार ॥१६॥४६॥

कहूँ रोग रहत अभरम ॥ कहूँ करम करत अकरम ॥ कहूँ सेख ब्रहम सरूप ॥ कहूँ नीत राज अनूप ॥१७॥४७॥

कहूँ रोग सोग बिहीन ॥ कहूँ एक भगत अधीन ॥ कहूँ रंक राज कुमार ॥ कहूँ बेद बिआस अवतार ॥१८॥४८॥

कई ब्रहम बेद रटंत ॥ कई सेख नाम उचरंत ॥ बैराग कहूँ सनिआस ॥ कहूँ फिरत रूप उदास ॥१९॥४९॥

सभ करम फोकट जान ॥ सभ धरम निहफल मान ॥ बिन एक नाम अधार ॥ सभ करम भरम बिचार ॥२०॥५०॥

त्व प्रसादि ॥ लघु निराज छंद ॥

जले हरी ॥ थले हरी ॥ उरे हरी ॥ बने हरी ॥१॥५१॥

गिरे हरी ॥ गुफे हरी ॥ छिते हरी ॥ नभे हरी ॥२॥५२॥

ईहाँ हरी ॥ ऊहाँ हरी ॥ जिमी हरी ॥ जमा हरी ॥३॥५३॥

अलेख हरी ॥ अभेख हरी ॥ अदोख हरी ॥ अद्वैख हरी ॥४॥५४॥

अकाल हरी ॥ अपाल हरी ॥ अछेद हरी ॥ अभेद हरी ॥५॥५५॥

अजंत्र हरी ॥ अमंत्र हरी ॥ सु तेज हरी ॥ अतंत्र हरी ॥६॥५६॥

अजात हरी ॥ अपात हरी ॥ अमित्र हरी ॥ अमात हरी ॥७॥५७॥

अरोग हरी ॥ असोग हरी ॥ अभरम हरी ॥ अकरम हरी ॥८॥५८॥

अजै हरी ॥ अभै हरी ॥ अभेद हरी ॥ अछेद हरी ॥९॥५९॥

अखंड हरी ॥ अभंड हरी ॥ अडंड हरी ॥ प्रचंड हरी ॥१०॥६०॥

अतेव हरी ॥ अभेव हरी ॥ अजेव हरी ॥ अछेव हरी ॥११॥६१॥

भजो हरी ॥ थपो हरी ॥ तपो हरी ॥ जपो हरी ॥१२॥६२॥

जलस तुहीं ॥ थलस तुहीं ॥ नदिस तुहीं ॥ नदस तुहीं ॥१३॥६३॥

बृछस तुहीं ॥ पतस तुहीं ॥ छितस तुहीं ॥ उरधस तुहीं ॥१४॥६४॥

भजस तुअं ॥ भजस तुअं ॥ रटस तुअं ॥ ठटस तुअं ॥१५॥६५॥

जिमी तुहीं ॥ जमा तुहीं ॥ मकी तुहीं ॥ मका तुहीं ॥१६॥६६॥

अभू तुहीं ॥ अभै तुहीं ॥ अछू तुहीं ॥ अछै तुहीं ॥१७॥६७॥

जतस तुहीं ॥ ब्रतस तुहीं ॥ गतस तुहीं ॥ मतस तुहीं ॥१८॥६८॥

तुहीं तुहीं ॥ तुहीं तुहीं ॥ तुहीं तुहीं ॥ तुहीं तुहीं ॥१९॥६९॥

तुहीं तुहीं ॥ तुहीं तुहीं ॥ तुहीं तुहीं ॥ तुहीं तुहीं ॥२०॥७०॥

त्व प्रसादि ॥ कबित्तु ॥

खूक मलहारी गज गदाहा बिभूतधारी गिदूआ मसान बास करिओ ई करत हैं ॥ घुघू मटबासी लगे डोलत उदासी मृग तरवर सदीव मोन साधे ई मरत हैं ॥ बिंद के सधय्या ताहि हीज की बडय्या देत बंदरा सदीव पाइ नागे ई फिरत हैं ॥ अंगना अधीन काम क्रोध मै प्रबीन एक गिआन के बिहीन छीन कैसे कै तरत हैं ॥१॥७१॥

भूत बनचारी छित छउना सभै दूधाधारी पउन के अहारी सु भुजंग जानीअतु हैं ॥ तृण के भछय्या धन लोभ के तजय्या ते तो गऊअन के जय्या बृखभय्या मानीअतु हैं ॥ नभ के उडय्या ताहि पंछी की बडय्या देत बगुला बिड़ाल बृक धिआनी ठानीअतु हैं ॥ जेतो बडे गिआनी तिनो जानी पै बखानी नाहि ऐसे न प्रपंच मनि भूलि आनीअतु हैं ॥२॥७२॥

भूम के बसय्या ताहि भूचरी कै जय्या कहै नभ के उडय्या सो चिरय्या कै बखानीऐ ॥ फल के भछय्या ताहि बाँदरी के जय्या कहै आदिस फिरय्या ते तो भूत कै पछानीऐ ॥ जल के तरय्या को गंगेरी सी कहत जग आग के भछय्या सो चकोर सम मानीऐ ॥ सूरज सिवय्या ताहि कौल की बडाई देत चंद्रमा सिवय्या कौ कवी कै पहिचानीऐ ॥३॥७३॥

नाराइण कच्छ मच्छ तिंदूआ कहत सभ कउल नाभ कउल जिह ताल मैं रहतु हैं ॥ गोपी नाथ गूजर गुपाल सभै धेनचारी रिखीकेस नाम कै महंत लहीअतु हैं ॥ माधव भवर औ अटेरू को कन्हया नाम कंस के बधय्या जमदूत कहीअतु हैं ॥ मूड़्ह रूड़्ह पीटत न गूड़्हता को भेद पावै पूजत न ताहि जा के राखे रहीअतु हैं ॥४॥७४॥

बिस्वपाल जगत काल दीन दिआल बैरी साल सदा प्रतपाल जम जाल ते रहत हैं ॥ जोगी जटाधारी सती साचे बडे ब्रहमचारी धिआन काज भूख पिआस देह पै सहत हैं ॥ निउली करम जल होम पावक पवन होम अधो मुख एक पाइ ठाढे न बहत हैं ॥ मानव फनिंद देव दानव न पावै भेद बेद औ कतेब नेत नेत कै कहत हैं ॥५॥७५॥

नाचत फिरत मोर बादर करत घोर दामनी अनेक भाउ करिओ ई करत है ॥ चंद्रमा ते सीतल न सूरज के तपत तेज इंद्र सो न राजा भव भूम को भरत है ॥ सिव से तपसी आदि ब्रहमा से न बेदचारी सनत कुमार सी तपस्सिआ न अनत है ॥ गिआन के बिहीन काल फास के अधीन सदा जुग्गन की चउकरी फिराए ई फिरत है ॥६॥७६॥

एक सिव भए एक गए एक फेर भए रामचंद्र कृसन के अवतार भी अनेक हैं ॥ ब्रहमा अरु बिसन केते बेद औ पुरान केते सिंमृति समूहन कै हुइ हुइ बितए हैं ॥ मोनदी मदार केते असुनी कुमार केते अंसा अवतार केते काल बस भए हैं ॥ पीर औ पिकाँबर केते गने न परत एते भूम ही ते हुइ कै फेरि भूमि ही मिलए हैं ॥७॥७७॥

जोगी जती ब्रहमचारी बडे बडे छत्रधारी छत्र ही की छाइआ कई कोस लौ चलत हैं ॥ बडे बडे राजन के दाबति फिरति देस बडे बडे राजन के द्रप को दलतु हैं ॥ मान से महीप औ दिलीप कैसे छत्रधारी बडो अभिमान भुज दंड को करत हैं ॥ दारा से दिलीसर द्रुजोधन से मानधारी भोग भोग भूमि अंत भूमि मै मिलत हैं ॥८॥७८॥

सिजदे करे अनेक तोपची कपट भेस पोसती अनेक दा निवावत है सीस कौ ॥ कहा भइओ मल्ल जौ पै काढत अनेक डंड सो तौ न डंडौत असटाँग अथतीस कौ ॥ कहा भइओ रोगी जौ पै डारिओ रहिओ उरध मुख मन ते न मूँड निहराइओ आदि ईस कौ ॥ कामना अधीन सदा दामना प्रबीन एक भावना बिहीन कैसे पावै जगदीस कौ ॥९॥७९॥

सीस पटकत जा के कान मै खजूरा धसै मूँड छटकत मित्र पुत्र हूँ के सोक सौ ॥ आक को चरय्या फल फूल को भछय्या सदा बन कौ भ्रमय्या और दूसरो न बोक सौ ॥ कहा भयो भेड जउ घसत्त सीस बृछन्न सों माटी को भछय्या बोल पूछ लीजै जोक सौ ॥ कामना अधीन काम क्रोध मैं प्रबीन एक भावना बिहीन कैसे भेटै परलोक सौ ॥१०॥८०॥

नाचिओ ई करत मोर दादर करत सोर सदा घनघोर घन करिओ ई करत हैं ॥ एक पाइ ठाढे सदा बन मै रहत बृछ फूक फूक पाव भूम स्रावग धरत हैं ॥ पाहन अनेक जुग एक ठउर बासु करै काग अउर चील देस देस बिचरत हैं ॥ गिआन के बिहीन महा दान मै न हूजै लीन भावना यकीन दीन कैसे कै तरत हैं ॥११॥८१॥

जैसे एक स्वाँगी कहूँ जोगीआ बैरागी बनै कबहूँ सनिआस भेस बन कै दिखावई ॥ कहूँ पउनहारी कहूँ बैठे लाइ तारी कहूँ लोभ की खुमारी सौं अनेक गुन गावई ॥ कहूँ ब्रहमचारी कहूँ हाथ पै लगावै बारी कहूँ डंड धारी हुइ कै लोगन भ्रमावई ॥ कामना अधीन परिओ नाचत है नाचन सों गिआन के बिहीन कैसे ब्रहम लोक पावई ॥१२॥८२॥

पंच बार गीदर पुकारे परे सीतकाल कुँचर औ गदहा अनेकदा प्रकार हीं ॥ कहा भयो जो पै कलवत्र लीओ काँसी बीच चीर चीर चोरटा कुठारन सों मार ही ॥ कहा भयो फाँसी डारि बूडिओ जड़ गंग धारि डारि डारि फाँस ठग मारि मारि डार हीं ॥ डूबे नरक धार मूड़्ह गिआन के बिना बिचार भावना बिहीन कैसे गिआन को बिचार हीं ॥१३॥८३॥

ताप के सहे ते जो पै पाईऐ अताप नाथ तापना अनेक तन घाइल सहत हैं ॥ जाप के कीए ते जो पै पायत अजाप देव पूदना सदीव तुहीं तुहीं उचरत हैं ॥ नभ के उडे ते जो पै नाराइण पाईयत अनल अकास पंछी डोलबो करत हैं ॥ आग मै जरे ते गति राँड की परत कर पताल के बासी किउ भुजंग न तरत हैं ॥१४॥८४॥

कोऊ भइओ मुँडीआ संनिआसी कोऊ जोगी भइओ कोऊ ब्रहमचारी कोऊ जती अनुमानबो ॥ हिंदू तुरक कोऊ राफजी इमाम साफी मानस की जाति सबै एकै पहिचानबो ॥ करता करीम सोई राजक रहीम ओई दूसरो न भेद कोई भूल भ्रम मानबो ॥ एक ही की सेव सभ ही को गुरदेव एक एक ही सरूप सबै एकै जोत जानबो ॥१५॥८५॥

देहरा मसीत सोई पूजा औ निवाज ओई मानस सबै एक पै अनेक को भ्रमाउ है ॥ देवता अदेव जच्छ गंध्रब तुरक हिंदू निआरे निआरे देसन के भेस को प्रभाउ है ॥ एकै नैन एकै कान एकै देह एकै बान खाक बाद आतस औ आब को रलाउ है ॥ अलह अभेख सोई पुरान औ कुरान ओई एक ही सरूप सभै एक ही बनाउ है ॥१६॥८६॥

जैसे एक आग ते कनूका कोट आग उठे निआरे निआरे हुइ कै फेरि आग मै मिलाहिंगे ॥ जैसे एक धूर ते अनेक धूर पूरत है धूर के कनूका फेर धूर ही समाहिंगे ॥ जैसे एक नद ते तरंग कोट उपजत हैं पान के तरंग सबै पान ही कहाहिंगे ॥ तैसे बिस्व रूप ते अभूत भूत प्रगट हुइ ताही ते उपज सबै ताही मै समाहिंगे ॥१७॥८७॥

केते कच्छ मच्छ केते उन कउ करत भच्छ केते अच्छ वच्छ हुइ सपच्छ उड जाहिंगे ॥ केते नभ बीच अच्छ पच्छ कउ करैंगे भच्छ केतक प्रत्तछ हुइ पचाइ खाइ जाहिंगे ॥ जल कहा थल कहा गगन के गउन कहा काल के बनाइ सबै काल ही चबाहिंगे ॥ तेज जिउ अतेज मै अतेज जैसे तेज लीन ताही ते उपज सबै ताही मै समाहिंगे ॥१८॥८८॥

कूकत फिरत केते रोवत मरत केते जल मैं डुबत केते आग मैं जरत हैं ॥ केते गंग बासी केते मदीना मका निवासी केतक उदासी के भ्रमाए ई फिरत हैं ॥ करवत सहत केते भूमि मै गडत केते सूआ पै चड़्हत केते दुख कउ भरत हैं ॥ गैन मैं उडत केते जल मैं रहत केते गिआन के बिहीन जक जारे ई मरत हैं ॥१९॥८९॥

सोध हारे देवता बिरोध हारे दानो बडे बोध हारे बोधक प्रबोध हारे जापसी ॥ घस हारे चंदन लगाइ हारे चोआ चारु पूज हारे पाहन चढाइ हारे लापसी ॥ गाह हारे गोरन मनाइ हारे मड़्ही मट्ट लीप हारे भीतन लगाइ हारे छापसी ॥ गाइ हारे गंध्रब बजाए हारे किंनर सभ पच हारे पंडत तपंत हारे तापसी ॥२०॥९०॥

त्व प्रसादि ॥ भुजंग प्रयात छंद ॥

न रागं न रंगं न रूपं न रेखं ॥ न मोहं न क्रोहं न द्रोहं न द्वैखं ॥ न करमं न भरमं न जनमं न जातं ॥ न मित्त्रं न सत्त्रं न पित्तं्र न मातं ॥१॥९१॥

न नेहं न गेहं न कामं न धामं ॥ न पु्ुत्रं न मित्त्रं न सत्त्रं न भामं ॥ अलेखं अभेखं अजोनी सरूपं ॥ सदा सिद्ध दा बु्ुध दा बृद्ध रूपं ॥२॥९२॥

नहीं जान जाई कछू रूप रेखं ॥ कहा बासु ता को फिरै कउन भेखं ॥ कहा नाम ता कै कहा कै कहावै ॥ कहा कै बखानो कहे मो न आवै ॥३॥९३॥

न रोगं न सोगं न मोहं न मातं ॥ न करमं न भरमं न जनमं न जातं ॥ अद्वैखं अभेखं अजोनी सरूपे ॥ नमो एक रूपे नमो एक रूपे ॥४॥९४॥

परेअं परा परम प्रगिआ प्रकासी ॥ अछेदं अछै आदि अद्वै अबिनासी ॥ न जातं न पातं न रूपं न रंगे ॥ नमो आदि अभंगे नमो आदि अभंगे ॥५॥९५॥

किते कृसन से कीट कोटै उपाए ॥ उसारे गड़्हे फेर मेटे बनाए ॥ अगाधे अभै आदि अद्वै अबिनासी ॥ परेअं परा परम पूरन प्रकासी ॥६॥९६॥

न आधं न बिआधं अगाधं सरूपे ॥ अखंडित प्रताप आदि अछै बिभूते ॥ न जनमं न मरनं न बरनं न बिआधे ॥ अखंडे प्रचंडे अदंडे असाधे ॥७॥९७॥

न नेहं न गेहं सनेहं सनाथे ॥ उदंडे अमंडे प्रचंडे प्रमाथे ॥ न जाते न पाते न सत्त्रे न मित्त्रे ॥ सु भूते भविक्खे भवाने अचित्रे ॥८॥९८॥

न रायं न रंकं न रूपं न रेखं ॥ न लोभं न चोभं अभूतं अभेखं ॥ न सत्रं न मित्रं न नेहं न गेहं ॥ सदैवं सदा सरब सरबत्र सनेहं ॥९॥९९॥

न कामं न क्रोधं न लोभं न मोहं ॥ अजोनी अछै आदि अद्वै अजोहं ॥ न जनमं न मरनं न बरनं न बिआधं ॥ न रोगं न सोगं अभै निरबिखाधं ॥१०॥१००॥

अछेदं अभेदं अकरमं अकालं ॥ अखंडं अभंडं प्रचंडं अपालं ॥ न तातं न मातं न जातं न भाइअं ॥ न नेहं न गेहं न करमं न काइअं ॥११॥१०१॥

न रूपं न भूपं न कायं न करमं ॥ न त्रासं न प्रासं न भेदं न भरमं ॥ सदैवं सदा सिद्ध बृद्धं सरूपे ॥ नमो एक रूपे नमो एक रूपे ॥१२॥१०२॥

निरुकतं प्रभा आदि अनुकतं प्रतापे ॥ अजुगतं अछै आदि अविकतं अथापे ॥ बिभुगतं अछै आदि अच्छै सरूपे ॥ नमो एक रूपे नमो एक रूपे ॥१३॥१०३॥

न नेहं न गेहं न सोकं न साकं ॥ परेअं पवित्रं पुनीतं अताकं ॥ न जातं न पातं न मित्रं न मंत्रे ॥ नमो एक तंत्रे नमो एक तंत्रे ॥१४॥१०४॥

न धरमं न भरमं न सरमं न साके ॥ न बरमं न चरमं न करमं न बाके ॥ न सत्रं न मित्रं न पुत्रं सरूपे ॥ नमो आदि रूपे नमो आदि रूपे ॥१५॥१०५॥

कहूँ कंज के मंज के भरम भूले ॥ कहूँ रंक के राज के धरम अलूले ॥ कहूँ देस के भेस के धरम धामे ॥ कहूँ राज के साज के बाज तामे ॥१६॥१०६॥

कहूँ अछ्र के पछ्र के सिद्ध साधे ॥ कहूँ सिद्ध के बुद्धि के बि्््रध लाधे ॥ कहूँ अंग के रंग के संगि देखे ॥ कहूँ जंग के रंग के रंग पेखे ॥१७॥१०७॥

कहूँ धरम के करम के हरम जाने ॥ कहूँ धरम के करम के भरम माने ॥ कहूँ चार चेसटा कहूँ चित्र रूपं ॥ कहूँ परम प्रगया कहूँ सरब भूपं ॥१८॥१०८॥

कहूँ नेह ग्रेहं कहूँ देह दोखं ॥ कहूँ औखदी रोग के सोक सोखं ॥ कहूँ देव बिद्या कहूँ दैत बानी ॥ कहूँ जच्छ गंधरब किंनर कहानी ॥१९॥१०९॥

कहूँ राजसी सातकी तामसी हो ॥ कहूँ जोग बिद्या धरे तापसी हो ॥ कहूँ रोग रहिता कहूँ जोग जुगतं ॥ कहूँ भूमि की भुगत मै भरम भुगतं ॥२०॥११०॥

कहूँ देव कंनिआ कहूँ दानवी हो ॥ कहूँ जच्छ बिद्या धरे मानवी हो ॥ कहूँ राजसी हो कहूँ राज कंनिआ ॥ कहूँ सृसटि की पृसट की रिसट पंनिआ ॥२१॥१११॥

कहूँ बेद बिद्दिआ कहूँ बिओम बानी ॥ कहूँ कोक की काबि कत्थै कहानी ॥ कहूँ अद्र सारं कहूँ भद्र रूपं ॥ कहूँ मद्द्र बानी कहूँ छिद्र सरूपं ॥२२॥११२॥

कहूँ बेद बिदिआ कहूँ काब रूपं ॥ कहूँ चेसटा चारि चित्रं सरूपं ॥ कहूँ परम पुरान को पार पावै ॥ कहूँ बैठ कुरान के गीत गावै ॥२३॥११३॥

कहूँ सुद्ध सेखं कहूँ ब्रहम धरमं ॥ कहूँ बृध अवसथा कहूँ बाल करमं ॥ कहूँ जुआ सरूपं जरा रहत देहं ॥ कहूँ नेह देहं कहूँ तिआग ग्रेहं ॥२४॥११४॥

कहूँ जोग भोगं कहूँ रोग रागं ॥ कहूँ रोग रहिता कहूँ भोग तिआगं ॥ कहूँ राज साजं कहूँ राज रीतं ॥ कहूँ पूरन प्रगिआ कहूँ परम प्रीतं ॥२५॥११५॥

कहूँ आरबी तोरकी पारसी हो ॥ कहूँ पहिलवी पशतवी संसकृती हो ॥ कहूँ देस भाख्या कहूँ देव बानी ॥ कहूँ राज बिदिआ कहूँ राजधानी ॥२६॥११६॥

कहूँ मंत्र बिदिआ कहूँ तंत्र सारं ॥ कहूँ जंत्र रीतं कहूँ ससत्र धारं ॥ कहूँ होम पूजा कहूँ देव अरचा ॥ कहूँ पिंगुला चारणी गीत चरचा ॥२७॥११७॥

कहूँ बीन बिदिआ कहूँ गान गीतं ॥ कहूँ मलेछ भाखिआ कहूँ बेद रीतं ॥ कहूँ नृत बिदिआ कहूँ नाग बानी ॥ कहूँ गारड़ू गूड़्ह कत्थैं कहानी ॥२८॥११८॥

कहूँ अच्छरा पच्छरा मच्छरा हो ॥ कहूँ बीर बिदिआ अभूतं प्रभा हो ॥ कहूँ छैल छाला धरे छत्रधारी ॥ कहूँ राज साजं धिराजाधिकारी ॥२९॥११९॥

नमो नाथ पूरे सदा सिद्ध दाता ॥ अछेदी अछै आदि अद्वै बिधाता ॥ न त्रसतं न ग्रसतं समसतं सरूपे ॥ नमसतं नमसतं तुअसतं अभूते ॥३०॥१२०॥

त्व प्रसादि ॥ पाधड़ी छंद ॥

अब्यकत तेज अनभउ प्रकास ॥ अच्छै सरूप अद्वै अनास ॥ अनतुट तेज अनखुट भंडार ॥ दाता दुरंत सरबं प्रकार ॥१॥१२१॥

अनभूत तेज अनछिज्ज गात ॥ करता सदीव हरता सनात ॥ आसन अडोल अनभूत करम ॥ दाता दइआल अनभूत धरम ॥२॥१२२॥

जिह सत्त्र मित्त्र नहि जनम जात ॥ जिह पुत्र भ्रात नहीं मित्त्र मात ॥ जिह करम भरम नहीं धरम धिआन ॥ जिह नेह गेह नहीं बिओत बान ॥३॥१२३॥

जिह जाति पाति नहीं सत्त्र मित्त्र ॥ जिह नेह गेह नहीं चिहन चित्त्र ॥ जिह रंग रूप नहीं राग रेख ॥ जिह जनम जाति नहीं भरम भेख ॥४॥१२४॥

जिह करम भरम नही जात पात ॥ नही नेह गेह नही पित्त्र मात ॥ जिह नाम थाम नही बरग बिआध ॥ जिह रोग सोग नही सत्र साध ॥५॥१२५॥


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