थिती (महला 1), Thiti (Mahalla 1) Path in Hindi Gurbani online


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बिलावलु महला १ थिती घरु १० जति
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

एकम एकंकारु निराला ॥ अमरु अजोनी जाति न जाला ॥ अगम अगोचरु रूपु न रेखिआ ॥ खोजत खोजत घटि घटि देखिआ ॥ जो देखि दिखावै तिस कउ बलि जाई ॥ गुर परसादि परम पदु पाई ॥१॥

किआ जपु जापउ बिनु जगदीसै ॥ गुर कै सबदि महलु घरु दीसै ॥१॥ रहाउ ॥

दूजै भाइ लगे पछुताणे ॥ जम दरि बाधे आवण जाणे ॥ किआ लै आवहि किआ ले जाहि ॥ सिरि जमकालु सि चोटा खाहि ॥ बिनु गुर सबद न छूटसि कोइ ॥ पाखंडि कीन्है मुकति न होइ ॥२॥

आपे सचु कीआ कर जोड़ि ॥ अंडज फोड़ि जोड़ि विछोड़ि ॥ धरति अकासु कीए बैसण कउ थाउ ॥ राति दिनंतु कीए भउ भाउ ॥ जिनि कीए करि वेखणहारा ॥ अवरु न दूजा सिरजणहारा ॥३॥

त्रितीआ ब्रहमा बिसनु महेसा ॥ देवी देव उपाए वेसा ॥ जोती जाती गणत न आवै ॥ जिनि साजी सो कीमति पावै ॥ कीमति पाइ रहिआ भरपूरि ॥ किसु नेड़ै किसु आखा दूरि ॥४॥

चउथि उपाए चारे बेदा ॥ खाणी चारे बाणी भेदा ॥ असट दसा खटु तीनि उपाए ॥ सो बूझै जिसु आपि बुझाए ॥ तीनि समावै चउथै वासा ॥ प्रणवति नानक हम ता के दासा ॥५॥

पंचमी पंच भूत बेताला ॥ आपि अगोचरु पुरखु निराला ॥ इकि भ्रमि भूखे मोह पिआसे ॥ इकि रसु चाखि सबदि त्रिपतासे ॥ इकि रंगि राते इकि मरि धूरि ॥ इकि दरि घरि साचै देखि हदूरि ॥६॥

झूठे कउ नाही पति नाउ ॥ कबहु न सूचा काला काउ ॥ पिंजरि पंखी बंधिआ कोइ ॥ छेरीं भरमै मुकति न होइ ॥ तउ छूटै जा खसमु छडाए ॥ गुरमति मेले भगति द्रिड़ाए ॥७॥

खसटी खटु दरसन प्रभ साजे ॥ अनहद सबदु निराला वाजे ॥ जे प्रभ भावै ता महलि बुलावै ॥ सबदे भेदे तउ पति पावै ॥ करि करि वेस खपहि जलि जावहि ॥ साचै साचे साचि समावहि ॥८॥

सपतमी सतु संतोखु सरीरि ॥ सात समुंद भरे निरमल नीरि ॥ मजनु सीलु सचु रिदै वीचारि ॥ गुर कै सबदि पावै सभि पारि ॥ मनि साचा मुखि साचउ भाइ ॥ सचु नीसाणै ठाक न पाइ ॥९॥

असटमी असट सिधि बुधि साधै ॥ सचु निहकेवलु करमि अराधै ॥ पउण पाणी अगनी बिसराउ ॥ तही निरंजनु साचो नाउ ॥ तिसु महि मनूआ रहिआ लिव लाइ ॥ प्रणवति नानकु कालु न खाइ ॥१०॥

नाउ नउमी नवे नाथ नव खंडा ॥ घटि घटि नाथु महा बलवंडा ॥ आई पूता इहु जगु सारा ॥ प्रभ आदेसु आदि रखवारा ॥ आदि जुगादी है भी होगु ॥ ओहु अपर्मपरु करणै जोगु ॥११॥

दसमी नामु दानु इसनानु ॥ अनदिनु मजनु सचा गुण गिआनु ॥ सचि मैलु न लागै भ्रमु भउ भागै ॥ बिलमु न तूटसि काचै तागै ॥ जिउ तागा जगु एवै जाणहु ॥ असथिरु चीतु साचि रंगु माणहु ॥१२॥

एकादसी इकु रिदै वसावै ॥ हिंसा ममता मोहु चुकावै ॥ फलु पावै ब्रतु आतम चीनै ॥ पाखंडि राचि ततु नही बीनै ॥ निरमलु निराहारु निहकेवलु ॥ सूचै साचे ना लागै मलु ॥१३॥

जह देखउ तह एको एका ॥ होरि जीअ उपाए वेको वेका ॥ फलोहार कीए फलु जाइ ॥ रस कस खाए सादु गवाइ ॥ कूड़ै लालचि लपटै लपटाइ ॥ छूटै गुरमुखि साचु कमाइ ॥१४॥

दुआदसि मुद्रा मनु अउधूता ॥ अहिनिसि जागहि कबहि न सूता ॥ जागतु जागि रहै लिव लाइ ॥ गुर परचै तिसु कालु न खाइ ॥ अतीत भए मारे बैराई ॥ प्रणवति नानक तह लिव लाई ॥१५॥

दुआदसी दइआ दानु करि जाणै ॥ बाहरि जातो भीतरि आणै ॥ बरती बरत रहै निहकाम ॥ अजपा जापु जपै मुखि नाम ॥ तीनि भवण महि एको जाणै ॥ सभि सुचि संजम साचु पछाणै ॥१६॥

तेरसि तरवर समुद कनारै ॥ अम्रितु मूलु सिखरि लिव तारै ॥ डर डरि मरै न बूडै कोइ ॥ निडरु बूडि मरै पति खोइ ॥ डर महि घरु घर महि डरु जाणै ॥ तखति निवासु सचु मनि भाणै ॥१७॥

चउदसि चउथे थावहि लहि पावै ॥ राजस तामस सत काल समावै ॥ ससीअर कै घरि सूरु समावै ॥ जोग जुगति की कीमति पावै ॥ चउदसि भवन पाताल समाए ॥ खंड ब्रहमंड रहिआ लिव लाए ॥१८॥

अमावसिआ चंदु गुपतु गैणारि ॥ बूझहु गिआनी सबदु बीचारि ॥ ससीअरु गगनि जोति तिहु लोई ॥ करि करि वेखै करता सोई ॥ गुर ते दीसै सो तिस ही माहि ॥ मनमुखि भूले आवहि जाहि ॥१९॥

घरु दरु थापि थिरु थानि सुहावै ॥ आपु पछाणै जा सतिगुरु पावै ॥ जह आसा तह बिनसि बिनासा ॥ फूटै खपरु दुबिधा मनसा ॥ ममता जाल ते रहै उदासा ॥ प्रणवति नानक हम ता के दासा ॥२०॥१॥


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