सोलहे, Solhe (Mahalla 1 3 4 5) Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


मारू सोलहे महला १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

साचा सचु सोई अवरु न कोई ॥ जिनि सिरजी तिन ही फुनि गोई ॥ जिउ भावै तिउ राखहु रहणा तुम सिउ किआ मुकराई हे ॥१॥ आपि उपाए आपि खपाए ॥ आपे सिरि सिरि धंधै लाए ॥ आपे वीचारी गुणकारी आपे मारगि लाई हे ॥२॥ आपे दाना आपे बीना ॥ आपे आपु उपाइ पतीना ॥ आपे पउणु पाणी बैसंतरु आपे मेलि मिलाई हे ॥३॥ आपे ससि सूरा पूरो पूरा ॥ आपे गिआनि धिआनि गुरु सूरा ॥ कालु जालु जमु जोहि न साकै साचे सिउ लिव लाई हे ॥४॥ आपे पुरखु आपे ही नारी ॥ आपे पासा आपे सारी ॥ आपे पिड़ बाधी जगु खेलै आपे कीमति पाई हे ॥५॥ आपे भवरु फुलु फलु तरवरु ॥ आपे जलु थलु सागरु सरवरु ॥ आपे मछु कछु करणीकरु तेरा रूपु न लखणा जाई हे ॥६॥ आपे दिनसु आपे ही रैणी ॥ आपि पतीजै गुर की बैणी ॥ आदि जुगादि अनाहदि अनदिनु घटि घटि सबदु रजाई हे ॥७॥ आपे रतनु अनूपु अमोलो ॥ आपे परखे पूरा तोलो ॥ आपे किस ही कसि बखसे आपे दे लै भाई हे ॥८॥ आपे धनखु आपे सरबाणा ॥ आपे सुघड़ु सरूपु सिआणा ॥ कहता बकता सुणता सोई आपे बणत बणाई हे ॥९॥ पउणु गुरू पाणी पित जाता ॥ उदर संजोगी धरती माता ॥ रैणि दिनसु दुइ दाई दाइआ जगु खेलै खेलाई हे ॥१०॥ आपे मछुली आपे जाला ॥ आपे गऊ आपे रखवाला ॥ सरब जीआ जगि जोति तुमारी जैसी प्रभि फुरमाई हे ॥११॥ आपे जोगी आपे भोगी ॥ आपे रसीआ परम संजोगी ॥ आपे वेबाणी निरंकारी निरभउ ताड़ी लाई हे ॥१२॥ खाणी बाणी तुझहि समाणी ॥ जो दीसै सभ आवण जाणी ॥ सेई साह सचे वापारी सतिगुरि बूझ बुझाई हे ॥१३॥ सबदु बुझाए सतिगुरु पूरा ॥ सरब कला साचे भरपूरा ॥ अफरिओ वेपरवाहु सदा तू ना तिसु तिलु न तमाई हे ॥१४॥ कालु बिकालु भए देवाने ॥ सबदु सहज रसु अंतरि माने ॥ आपे मुकति त्रिपति वरदाता भगति भाइ मनि भाई हे ॥१५॥ आपि निरालमु गुर गम गिआना ॥ जो दीसै तुझ माहि समाना ॥ नानकु नीचु भिखिआ दरि जाचै मै दीजै नामु वडाई हे ॥१६॥१॥

मारू महला १ ॥
आपे धरती धउलु अकासं ॥ आपे साचे गुण परगासं ॥ जती सती संतोखी आपे आपे कार कमाई हे ॥१॥ जिसु करणा सो करि करि वेखै ॥ कोइ न मेटै साचे लेखै ॥ आपे करे कराए आपे आपे दे वडिआई हे ॥२॥ पंच चोर चंचल चितु चालहि ॥ पर घर जोहहि घरु नही भालहि ॥ काइआ नगरु ढहै ढहि ढेरी बिनु सबदै पति जाई हे ॥३॥ गुर ते बूझै त्रिभवणु सूझै ॥ मनसा मारि मनै सिउ लूझै ॥ जो तुधु सेवहि से तुध ही जेहे निरभउ बाल सखाई हे ॥४॥ आपे सुरगु मछु पइआला ॥ आपे जोति सरूपी बाला ॥ जटा बिकट बिकराल सरूपी रूपु न रेखिआ काई हे ॥५॥ बेद कतेबी भेदु न जाता ॥ ना तिसु मात पिता सुत भ्राता ॥ सगले सैल उपाइ समाए अलखु न लखणा जाई हे ॥६॥ करि करि थाकी मीत घनेरे ॥ कोइ न काटै अवगुण मेरे ॥ सुरि नर नाथु साहिबु सभना सिरि भाइ मिलै भउ जाई हे ॥७॥ भूले चूके मारगि पावहि ॥ आपि भुलाइ तूहै समझावहि ॥ बिनु नावै मै अवरु न दीसै नावहु गति मिति पाई हे ॥८॥ गंगा जमुना केल केदारा ॥ कासी कांती पुरी दुआरा ॥ गंगा सागरु बेणी संगमु अठसठि अंकि समाई हे ॥९॥ आपे सिध साधिकु वीचारी ॥ आपे राजनु पंचा कारी ॥ तखति बहै अदली प्रभु आपे भरमु भेदु भउ जाई हे ॥१०॥ आपे काजी आपे मुला ॥ आपि अभुलु न कबहू भुला ॥ आपे मिहर दइआपति दाता ना किसै को बैराई हे ॥११॥ जिसु बखसे तिसु दे वडिआई ॥ सभसै दाता तिलु न तमाई ॥ भरपुरि धारि रहिआ निहकेवलु गुपतु प्रगटु सभ ठाई हे ॥१२॥ किआ सालाही अगम अपारै ॥ साचे सिरजणहार मुरारै ॥ जिस नो नदरि करे तिसु मेले मेलि मिलै मेलाई हे ॥१३॥ ब्रहमा बिसनु महेसु दुआरै ॥ ऊभे सेवहि अलख अपारै ॥ होर केती दरि दीसै बिललादी मै गणत न आवै काई हे ॥१४॥ साची कीरति साची बाणी ॥ होर न दीसै बेद पुराणी ॥ पूंजी साचु सचे गुण गावा मै धर होर न काई हे ॥१५॥ जुगु जुगु साचा है भी होसी ॥ कउणु न मूआ कउणु न मरसी ॥ नानकु नीचु कहै बेनंती दरि देखहु लिव लाई हे ॥१६॥२॥

मारू महला १ ॥
दूजी दुरमति अंनी बोली ॥ काम क्रोध की कची चोली ॥ घरि वरु सहजु न जाणै छोहरि बिनु पिर नीद न पाई हे ॥१॥ अंतरि अगनि जलै भड़कारे ॥ मनमुखु तके कुंडा चारे ॥ बिनु सतिगुर सेवे किउ सुखु पाईऐ साचे हाथि वडाई हे ॥२॥ कामु क्रोधु अहंकारु निवारे ॥ तसकर पंच सबदि संघारे ॥ गिआन खड़गु लै मन सिउ लूझै मनसा मनहि समाई हे ॥३॥ मा की रकतु पिता बिदु धारा ॥ मूरति सूरति करि आपारा ॥ जोति दाति जेती सभ तेरी तू करता सभ ठाई हे ॥४॥ तुझ ही कीआ जमण मरणा ॥ गुर ते समझ पड़ी किआ डरणा ॥ तू दइआलु दइआ करि देखहि दुखु दरदु सरीरहु जाई हे ॥५॥ निज घरि बैसि रहे भउ खाइआ ॥ धावत राखे ठाकि रहाइआ ॥ कमल बिगास हरे सर सुभर आतम रामु सखाई हे ॥६॥ मरणु लिखाइ मंडल महि आए ॥ किउ रहीऐ चलणा परथाए ॥ सचा अमरु सचे अमरा पुरि सो सचु मिलै वडाई हे ॥७॥ आपि उपाइआ जगतु सबाइआ ॥ जिनि सिरिआ तिनि धंधै लाइआ ॥ सचै ऊपरि अवर न दीसै साचे कीमति पाई हे ॥८॥ ऐथै गोइलड़ा दिन चारे ॥ खेलु तमासा धुंधूकारे ॥ बाजी खेलि गए बाजीगर जिउ निसि सुपनै भखलाई हे ॥९॥ तिन कउ तखति मिली वडिआई ॥ निरभउ मनि वसिआ लिव लाई ॥ खंडी ब्रहमंडी पाताली पुरीई त्रिभवण ताड़ी लाई हे ॥१०॥ साची नगरी तखतु सचावा ॥ गुरमुखि साचु मिलै सुखु पावा ॥ साचे साचै तखति वडाई हउमै गणत गवाई हे ॥११॥ गणत गणीऐ सहसा जीऐ ॥ किउ सुखु पावै दूऐ तीऐ ॥ निरमलु एकु निरंजनु दाता गुर पूरे ते पति पाई हे ॥१२॥ जुगि जुगि विरली गुरमुखि जाता ॥ साचा रवि रहिआ मनु राता ॥ तिस की ओट गही सुखु पाइआ मनि तनि मैलु न काई हे ॥१३॥ जीभ रसाइणि साचै राती ॥ हरि प्रभु संगी भउ न भराती ॥ स्रवण स्रोत रजे गुरबाणी जोती जोति मिलाई हे ॥१४॥ रखि रखि पैर धरे पउ धरणा ॥ जत कत देखउ तेरी सरणा ॥ दुखु सुखु देहि तूहै मनि भावहि तुझ ही सिउ बणि आई हे ॥१५॥ अंत कालि को बेली नाही ॥ गुरमुखि जाता तुधु सालाही ॥ नानक नामि रते बैरागी निज घरि ताड़ी लाई हे ॥१६॥३॥

मारू महला १ ॥
आदि जुगादी अपर अपारे ॥ आदि निरंजन खसम हमारे ॥ साचे जोग जुगति वीचारी साचे ताड़ी लाई हे ॥१॥ केतड़िआ जुग धुंधूकारै ॥ ताड़ी लाई सिरजणहारै ॥ सचु नामु सची वडिआई साचै तखति वडाई हे ॥२॥ सतजुगि सतु संतोखु सरीरा ॥ सति सति वरतै गहिर ग्मभीरा ॥ सचा साहिबु सचु परखै साचै हुकमि चलाई हे ॥३॥ सत संतोखी सतिगुरु पूरा ॥ गुर का सबदु मने सो सूरा ॥ साची दरगह साचु निवासा मानै हुकमु रजाई हे ॥४॥ सतजुगि साचु कहै सभु कोई ॥ सचि वरतै साचा सोई ॥ मनि मुखि साचु भरम भउ भंजनु गुरमुखि साचु सखाई हे ॥५॥ त्रेतै धरम कला इक चूकी ॥ तीनि चरण इक दुबिधा सूकी ॥ गुरमुखि होवै सु साचु वखाणै मनमुखि पचै अवाई हे ॥६॥ मनमुखि कदे न दरगह सीझै ॥ बिनु सबदै किउ अंतरु रीझै ॥ बाधे आवहि बाधे जावहि सोझी बूझ न काई हे ॥७॥ दइआ दुआपुरि अधी होई ॥ गुरमुखि विरला चीनै कोई ॥ दुइ पग धरमु धरे धरणीधर गुरमुखि साचु तिथाई हे ॥८॥ राजे धरमु करहि परथाए ॥ आसा बंधे दानु कराए ॥ राम नाम बिनु मुकति न होई थाके करम कमाई हे ॥९॥ करम धरम करि मुकति मंगाही ॥ मुकति पदारथु सबदि सलाही ॥ बिनु गुर सबदै मुकति न होई परपंचु करि भरमाई हे ॥१०॥ माइआ ममता छोडी न जाई ॥ से छूटे सचु कार कमाई ॥ अहिनिसि भगति रते वीचारी ठाकुर सिउ बणि आई हे ॥११॥ इकि जप तप करि करि तीरथ नावहि ॥ जिउ तुधु भावै तिवै चलावहि ॥ हठि निग्रहि अपतीजु न भीजै बिनु हरि गुर किनि पति पाई हे ॥१२॥ कली काल महि इक कल राखी ॥ बिनु गुर पूरे किनै न भाखी ॥ मनमुखि कूड़ु वरतै वरतारा बिनु सतिगुर भरमु न जाई हे ॥१३॥ सतिगुरु वेपरवाहु सिरंदा ॥ ना जम काणि न छंदा बंदा ॥ जो तिसु सेवे सो अबिनासी ना तिसु कालु संताई हे ॥१४॥ गुर महि आपु रखिआ करतारे ॥ गुरमुखि कोटि असंख उधारे ॥ सरब जीआ जगजीवनु दाता निरभउ मैलु न काई हे ॥१५॥ सगले जाचहि गुर भंडारी ॥ आपि निरंजनु अलख अपारी ॥ नानकु साचु कहै प्रभ जाचै मै दीजै साचु रजाई हे ॥१६॥४॥

मारू महला १ ॥
साचै मेले सबदि मिलाए ॥ जा तिसु भाणा सहजि समाए ॥ त्रिभवण जोति धरी परमेसरि अवरु न दूजा भाई हे ॥१॥ जिस के चाकर तिस की सेवा ॥ सबदि पतीजै अलख अभेवा ॥ भगता का गुणकारी करता बखसि लए वडिआई हे ॥२॥ देदे तोटि न आवै साचे ॥ लै लै मुकरि पउदे काचे ॥ मूलु न बूझहि साचि न रीझहि दूजै भरमि भुलाई हे ॥३॥ गुरमुखि जागि रहे दिन राती ॥ साचे की लिव गुरमति जाती ॥ मनमुख सोइ रहे से लूटे गुरमुखि साबतु भाई हे ॥४॥ कूड़े आवै कूड़े जावै ॥ कूड़े राती कूड़ु कमावै ॥ सबदि मिले से दरगह पैधे गुरमुखि सुरति समाई हे ॥५॥ कूड़ि मुठी ठगी ठगवाड़ी ॥ जिउ वाड़ी ओजाड़ि उजाड़ी ॥ नाम बिना किछु सादि न लागै हरि बिसरिऐ दुखु पाई हे ॥६॥ भोजनु साचु मिलै आघाई ॥ नाम रतनु साची वडिआई ॥ चीनै आपु पछाणै सोई जोती जोति मिलाई हे ॥७॥ नावहु भुली चोटा खाए ॥ बहुतु सिआणप भरमु न जाए ॥ पचि पचि मुए अचेत न चेतहि अजगरि भारि लदाई हे ॥८॥ बिनु बाद बिरोधहि कोई नाही ॥ मै देखालिहु तिसु सालाही ॥ मनु तनु अरपि मिलै जगजीवनु हरि सिउ बणत बणाई हे ॥९॥ प्रभ की गति मिति कोइ न पावै ॥ जे को वडा कहाइ वडाई खावै ॥ साचे साहिब तोटि न दाती सगली तिनहि उपाई हे ॥१०॥ वडी वडिआई वेपरवाहे ॥ आपि उपाए दानु समाहे ॥ आपि दइआलु दूरि नही दाता मिलिआ सहजि रजाई हे ॥११॥ इकि सोगी इकि रोगि विआपे ॥ जो किछु करे सु आपे आपे ॥ भगति भाउ गुर की मति पूरी अनहदि सबदि लखाई हे ॥१२॥ इकि नागे भूखे भवहि भवाए ॥ इकि हठु करि मरहि न कीमति पाए ॥ गति अविगत की सार न जाणै बूझै सबदु कमाई हे ॥१३॥ इकि तीरथि नावहि अंनु न खावहि ॥ इकि अगनि जलावहि देह खपावहि ॥ राम नाम बिनु मुकति न होई कितु बिधि पारि लंघाई हे ॥१४॥ गुरमति छोडहि उझड़ि जाई ॥ मनमुखि रामु न जपै अवाई ॥ पचि पचि बूडहि कूड़ु कमावहि कूड़ि कालु बैराई हे ॥१५॥ हुकमे आवै हुकमे जावै ॥ बूझै हुकमु सो साचि समावै ॥ नानक साचु मिलै मनि भावै गुरमुखि कार कमाई हे ॥१६॥५॥

मारू महला १ ॥
आपे करता पुरखु बिधाता ॥ जिनि आपे आपि उपाइ पछाता ॥ आपे सतिगुरु आपे सेवकु आपे स्रिसटि उपाई हे ॥१॥ आपे नेड़ै नाही दूरे ॥ बूझहि गुरमुखि से जन पूरे ॥ तिन की संगति अहिनिसि लाहा गुर संगति एह वडाई हे ॥२॥ जुगि जुगि संत भले प्रभ तेरे ॥ हरि गुण गावहि रसन रसेरे ॥ उसतति करहि परहरि दुखु दालदु जिन नाही चिंत पराई हे ॥३॥ ओइ जागत रहहि न सूते दीसहि ॥ संगति कुल तारे साचु परीसहि ॥ कलिमल मैलु नाही ते निरमल ओइ रहहि भगति लिव लाई हे ॥४॥ बूझहु हरि जन सतिगुर बाणी ॥ एहु जोबनु सासु है देह पुराणी ॥ आजु कालि मरि जाईऐ प्राणी हरि जपु जपि रिदै धिआई हे ॥५॥ छोडहु प्राणी कूड़ कबाड़ा ॥ कूड़ु मारे कालु उछाहाड़ा ॥ साकत कूड़ि पचहि मनि हउमै दुहु मारगि पचै पचाई हे ॥६॥ छोडिहु निंदा ताति पराई ॥ पड़ि पड़ि दझहि साति न आई ॥ मिलि सतसंगति नामु सलाहहु आतम रामु सखाई हे ॥७॥ छोडहु काम क्रोधु बुरिआई ॥ हउमै धंधु छोडहु ल्मपटाई ॥ सतिगुर सरणि परहु ता उबरहु इउ तरीऐ भवजलु भाई हे ॥८॥ आगै बिमल नदी अगनि बिखु झेला ॥ तिथै अवरु न कोई जीउ इकेला ॥ भड़ भड़ अगनि सागरु दे लहरी पड़ि दझहि मनमुख ताई हे ॥९॥ गुर पहि मुकति दानु दे भाणै ॥ जिनि पाइआ सोई बिधि जाणै ॥ जिन पाइआ तिन पूछहु भाई सुखु सतिगुर सेव कमाई हे ॥१०॥ गुर बिनु उरझि मरहि बेकारा ॥ जमु सिरि मारे करे खुआरा ॥ बाधे मुकति नाही नर निंदक डूबहि निंद पराई हे ॥११॥ बोलहु साचु पछाणहु अंदरि ॥ दूरि नाही देखहु करि नंदरि ॥ बिघनु नाही गुरमुखि तरु तारी इउ भवजलु पारि लंघाई हे ॥१२॥ देही अंदरि नामु निवासी ॥ आपे करता है अबिनासी ॥ ना जीउ मरै न मारिआ जाई करि देखै सबदि रजाई हे ॥१३॥ ओहु निरमलु है नाही अंधिआरा ॥ ओहु आपे तखति बहै सचिआरा ॥ साकत कूड़े बंधि भवाईअहि मरि जनमहि आई जाई हे ॥१४॥ गुर के सेवक सतिगुर पिआरे ॥ ओइ बैसहि तखति सु सबदु वीचारे ॥ ततु लहहि अंतरगति जाणहि सतसंगति साचु वडाई हे ॥१५॥ आपि तरै जनु पितरा तारे ॥ संगति मुकति सु पारि उतारे ॥ नानकु तिस का लाला गोला जिनि गुरमुखि हरि लिव लाई हे ॥१६॥६॥

मारू महला १ ॥
केते जुग वरते गुबारै ॥ ताड़ी लाई अपर अपारै ॥ धुंधूकारि निरालमु बैठा ना तदि धंधु पसारा हे ॥१॥ जुग छतीह तिनै वरताए ॥ जिउ तिसु भाणा तिवै चलाए ॥ तिसहि सरीकु न दीसै कोई आपे अपर अपारा हे ॥२॥ गुपते बूझहु जुग चतुआरे ॥ घटि घटि वरतै उदर मझारे ॥ जुगु जुगु एका एकी वरतै कोई बूझै गुर वीचारा हे ॥३॥ बिंदु रकतु मिलि पिंडु सरीआ ॥ पउणु पाणी अगनी मिलि जीआ ॥ आपे चोज करे रंग महली होर माइआ मोह पसारा हे ॥४॥ गरभ कुंडल महि उरध धिआनी ॥ आपे जाणै अंतरजामी ॥ सासि सासि सचु नामु समाले अंतरि उदर मझारा हे ॥५॥ चारि पदारथ लै जगि आइआ ॥ सिव सकती घरि वासा पाइआ ॥ एकु विसारे ता पिड़ हारे अंधुलै नामु विसारा हे ॥६॥ बालकु मरै बालक की लीला ॥ कहि कहि रोवहि बालु रंगीला ॥ जिस का सा सो तिन ही लीआ भूला रोवणहारा हे ॥७॥ भरि जोबनि मरि जाहि कि कीजै ॥ मेरा मेरा करि रोवीजै ॥ माइआ कारणि रोइ विगूचहि ध्रिगु जीवणु संसारा हे ॥८॥ काली हू फुनि धउले आए ॥ विणु नावै गथु गइआ गवाए ॥ दुरमति अंधुला बिनसि बिनासै मूठे रोइ पूकारा हे ॥९॥ आपु वीचारि न रोवै कोई ॥ सतिगुरु मिलै त सोझी होई ॥ बिनु गुर बजर कपाट न खूलहि सबदि मिलै निसतारा हे ॥१०॥ बिरधि भइआ तनु छीजै देही ॥ रामु न जपई अंति सनेही ॥ नामु विसारि चलै मुहि कालै दरगह झूठु खुआरा हे ॥११॥ नामु विसारि चलै कूड़िआरो ॥ आवत जात पड़ै सिरि छारो ॥ साहुरड़ै घरि वासु न पाए पेईअड़ै सिरि मारा हे ॥१२॥ खाजै पैझै रली करीजै ॥ बिनु अभ भगती बादि मरीजै ॥ सर अपसर की सार न जाणै जमु मारे किआ चारा हे ॥१३॥ परविरती नरविरति पछाणै ॥ गुर कै संगि सबदि घरु जाणै ॥ किस ही मंदा आखि न चलै सचि खरा सचिआरा हे ॥१४॥ साच बिना दरि सिझै न कोई ॥ साच सबदि पैझै पति होई ॥ आपे बखसि लए तिसु भावै हउमै गरबु निवारा हे ॥१५॥ गुर किरपा ते हुकमु पछाणै ॥ जुगह जुगंतर की बिधि जाणै ॥ नानक नामु जपहु तरु तारी सचु तारे तारणहारा हे ॥१६॥१॥७॥

मारू महला १ ॥
हरि सा मीतु नाही मै कोई ॥ जिनि तनु मनु दीआ सुरति समोई ॥ सरब जीआ प्रतिपालि समाले सो अंतरि दाना बीना हे ॥१॥ गुरु सरवरु हम हंस पिआरे ॥ सागर महि रतन लाल बहु सारे ॥ मोती माणक हीरा हरि जसु गावत मनु तनु भीना हे ॥२॥ हरि अगम अगाहु अगाधि निराला ॥ हरि अंतु न पाईऐ गुर गोपाला ॥ सतिगुर मति तारे तारणहारा मेलि लए रंगि लीना हे ॥३॥ सतिगुर बाझहु मुकति किनेही ॥ ओहु आदि जुगादी राम सनेही ॥ दरगह मुकति करे करि किरपा बखसे अवगुण कीना हे ॥४॥ सतिगुरु दाता मुकति कराए ॥ सभि रोग गवाए अम्रित रसु पाए ॥ जमु जागाति नाही करु लागै जिसु अगनि बुझी ठरु सीना हे ॥५॥ काइआ हंस प्रीति बहु धारी ॥ ओहु जोगी पुरखु ओह सुंदरि नारी ॥ अहिनिसि भोगै चोज बिनोदी उठि चलतै मता न कीना हे ॥६॥ स्रिसटि उपाइ रहे प्रभ छाजै ॥ पउण पाणी बैसंतरु गाजै ॥ मनूआ डोलै दूत संगति मिलि सो पाए जो किछु कीना हे ॥७॥ नामु विसारि दोख दुख सहीऐ ॥ हुकमु भइआ चलणा किउ रहीऐ ॥ नरक कूप महि गोते खावै जिउ जल ते बाहरि मीना हे ॥८॥ चउरासीह नरक साकतु भोगाईऐ ॥ जैसा कीचै तैसो पाईऐ ॥ सतिगुर बाझहु मुकति न होई किरति बाधा ग्रसि दीना हे ॥९॥ खंडे धार गली अति भीड़ी ॥ लेखा लीजै तिल जिउ पीड़ी ॥ मात पिता कलत्र सुत बेली नाही बिनु हरि रस मुकति न कीना हे ॥१०॥ मीत सखे केते जग माही ॥ बिनु गुर परमेसर कोई नाही ॥ गुर की सेवा मुकति पराइणि अनदिनु कीरतनु कीना हे ॥११॥ कूड़ु छोडि साचे कउ धावहु ॥ जो इछहु सोई फलु पावहु ॥ साच वखर के वापारी विरले लै लाहा सउदा कीना हे ॥१२॥ हरि हरि नामु वखरु लै चलहु ॥ दरसनु पावहु सहजि महलहु ॥ गुरमुखि खोजि लहहि जन पूरे इउ समदरसी चीना हे ॥१३॥ प्रभ बेअंत गुरमति को पावहि ॥ गुर कै सबदि मन कउ समझावहि ॥ सतिगुर की बाणी सति सति करि मानहु इउ आतम रामै लीना हे ॥१४॥ नारद सारद सेवक तेरे ॥ त्रिभवणि सेवक वडहु वडेरे ॥ सभ तेरी कुदरति तू सिरि सिरि दाता सभु तेरो कारणु कीना हे ॥१५॥ इकि दरि सेवहि दरदु वञाए ॥ ओइ दरगह पैधे सतिगुरू छडाए ॥ हउमै बंधन सतिगुरि तोड़े चितु चंचलु चलणि न दीना हे ॥१६॥ सतिगुर मिलहु चीनहु बिधि साई ॥ जितु प्रभु पावहु गणत न काई ॥ हउमै मारि करहु गुर सेवा जन नानक हरि रंगि भीना हे ॥१७॥२॥८॥

मारू महला १ ॥
असुर सघारण रामु हमारा ॥ घटि घटि रमईआ रामु पिआरा ॥ नाले अलखु न लखीऐ मूले गुरमुखि लिखु वीचारा हे ॥१॥ गुरमुखि साधू सरणि तुमारी ॥ करि किरपा प्रभि पारि उतारी ॥ अगनि पाणी सागरु अति गहरा गुरु सतिगुरु पारि उतारा हे ॥२॥ मनमुख अंधुले सोझी नाही ॥ आवहि जाहि मरहि मरि जाही ॥ पूरबि लिखिआ लेखु न मिटई जम दरि अंधु खुआरा हे ॥३॥ इकि आवहि जावहि घरि वासु न पावहि ॥ किरत के बाधे पाप कमावहि ॥ अंधुले सोझी बूझ न काई लोभु बुरा अहंकारा हे ॥४॥ पिर बिनु किआ तिसु धन सीगारा ॥ पर पिर राती खसमु विसारा ॥ जिउ बेसुआ पूत बापु को कहीऐ तिउ फोकट कार विकारा हे ॥५॥ प्रेत पिंजर महि दूख घनेरे ॥ नरकि पचहि अगिआन अंधेरे ॥ धरम राइ की बाकी लीजै जिनि हरि का नामु विसारा हे ॥६॥ सूरजु तपै अगनि बिखु झाला ॥ अपतु पसू मनमुखु बेताला ॥ आसा मनसा कूड़ु कमावहि रोगु बुरा बुरिआरा हे ॥७॥ मसतकि भारु कलर सिरि भारा ॥ किउ करि भवजलु लंघसि पारा ॥ सतिगुरु बोहिथु आदि जुगादी राम नामि निसतारा हे ॥८॥ पुत्र कलत्र जगि हेतु पिआरा ॥ माइआ मोहु पसरिआ पासारा ॥ जम के फाहे सतिगुरि तोड़े गुरमुखि ततु बीचारा हे ॥९॥ कूड़ि मुठी चालै बहु राही ॥ मनमुखु दाझै पड़ि पड़ि भाही ॥ अम्रित नामु गुरू वड दाणा नामु जपहु सुख सारा हे ॥१०॥ सतिगुरु तुठा सचु द्रिड़ाए ॥ सभि दुख मेटे मारगि पाए ॥ कंडा पाइ न गडई मूले जिसु सतिगुरु राखणहारा हे ॥११॥ खेहू खेह रलै तनु छीजै ॥ मनमुखु पाथरु सैलु न भीजै ॥ करण पलाव करे बहुतेरे नरकि सुरगि अवतारा हे ॥१२॥ माइआ बिखु भुइअंगम नाले ॥ इनि दुबिधा घर बहुते गाले ॥ सतिगुर बाझहु प्रीति न उपजै भगति रते पतीआरा हे ॥१३॥ साकत माइआ कउ बहु धावहि ॥ नामु विसारि कहा सुखु पावहि ॥ त्रिहु गुण अंतरि खपहि खपावहि नाही पारि उतारा हे ॥१४॥ कूकर सूकर कहीअहि कूड़िआरा ॥ भउकि मरहि भउ भउ भउ हारा ॥ मनि तनि झूठे कूड़ु कमावहि दुरमति दरगह हारा हे ॥१५॥ सतिगुरु मिलै त मनूआ टेकै ॥ राम नामु दे सरणि परेकै ॥ हरि धनु नामु अमोलकु देवै हरि जसु दरगह पिआरा हे ॥१६॥ राम नामु साधू सरणाई ॥ सतिगुर बचनी गति मिति पाई ॥ नानक हरि जपि हरि मन मेरे हरि मेले मेलणहारा हे ॥१७॥३॥९॥

मारू महला १ ॥
घरि रहु रे मन मुगध इआने ॥ रामु जपहु अंतरगति धिआने ॥ लालच छोडि रचहु अपर्मपरि इउ पावहु मुकति दुआरा हे ॥१॥ जिसु बिसरिऐ जमु जोहणि लागै ॥ सभि सुख जाहि दुखा फुनि आगै ॥ राम नामु जपि गुरमुखि जीअड़े एहु परम ततु वीचारा हे ॥२॥ हरि हरि नामु जपहु रसु मीठा ॥ गुरमुखि हरि रसु अंतरि डीठा ॥ अहिनिसि राम रहहु रंगि राते एहु जपु तपु संजमु सारा हे ॥३॥ राम नामु गुर बचनी बोलहु ॥ संत सभा महि इहु रसु टोलहु ॥ गुरमति खोजि लहहु घरु अपना बहुड़ि न गरभ मझारा हे ॥४॥ सचु तीरथि नावहु हरि गुण गावहु ॥ ततु वीचारहु हरि लिव लावहु ॥ अंत कालि जमु जोहि न साकै हरि बोलहु रामु पिआरा हे ॥५॥ सतिगुरु पुरखु दाता वड दाणा ॥ जिसु अंतरि साचु सु सबदि समाणा ॥ जिस कउ सतिगुरु मेलि मिलाए तिसु चूका जम भै भारा हे ॥६॥ पंच ततु मिलि काइआ कीनी ॥ तिस महि राम रतनु लै चीनी ॥ आतम रामु रामु है आतम हरि पाईऐ सबदि वीचारा हे ॥७॥ सत संतोखि रहहु जन भाई ॥ खिमा गहहु सतिगुर सरणाई ॥ आतमु चीनि परातमु चीनहु गुर संगति इहु निसतारा हे ॥८॥ साकत कूड़ कपट महि टेका ॥ अहिनिसि निंदा करहि अनेका ॥ बिनु सिमरन आवहि फुनि जावहि ग्रभ जोनी नरक मझारा हे ॥९॥ साकत जम की काणि न चूकै ॥ जम का डंडु न कबहू मूकै ॥ बाकी धरम राइ की लीजै सिरि अफरिओ भारु अफारा हे ॥१०॥ बिनु गुर साकतु कहहु को तरिआ ॥ हउमै करता भवजलि परिआ ॥ बिनु गुर पारु न पावै कोई हरि जपीऐ पारि उतारा हे ॥११॥ गुर की दाति न मेटै कोई ॥ जिसु बखसे तिसु तारे सोई ॥ जनम मरण दुखु नेड़ि न आवै मनि सो प्रभु अपर अपारा हे ॥१२॥ गुर ते भूले आवहु जावहु ॥ जनमि मरहु फुनि पाप कमावहु ॥ साकत मूड़ अचेत न चेतहि दुखु लागै ता रामु पुकारा हे ॥१३॥ सुखु दुखु पुरब जनम के कीए ॥ सो जाणै जिनि दातै दीए ॥ किस कउ दोसु देहि तू प्राणी सहु अपणा कीआ करारा हे ॥१४॥ हउमै ममता करदा आइआ ॥ आसा मनसा बंधि चलाइआ ॥ मेरी मेरी करत किआ ले चाले बिखु लादे छार बिकारा हे ॥१५॥ हरि की भगति करहु जन भाई ॥ अकथु कथहु मनु मनहि समाई ॥ उठि चलता ठाकि रखहु घरि अपुनै दुखु काटे काटणहारा हे ॥१६॥ हरि गुर पूरे की ओट पराती ॥ गुरमुखि हरि लिव गुरमुखि जाती ॥ नानक राम नामि मति ऊतम हरि बखसे पारि उतारा हे ॥१७॥४॥१०॥

मारू महला १ ॥
सरणि परे गुरदेव तुमारी ॥ तू समरथु दइआलु मुरारी ॥ तेरे चोज न जाणै कोई तू पूरा पुरखु बिधाता हे ॥१॥ तू आदि जुगादि करहि प्रतिपाला ॥ घटि घटि रूपु अनूपु दइआला ॥ जिउ तुधु भावै तिवै चलावहि सभु तेरो कीआ कमाता हे ॥२॥ अंतरि जोति भली जगजीवन ॥ सभि घट भोगै हरि रसु पीवन ॥ आपे लेवै आपे देवै तिहु लोई जगत पित दाता हे ॥३॥ जगतु उपाइ खेलु रचाइआ ॥ पवणै पाणी अगनी जीउ पाइआ ॥ देही नगरी नउ दरवाजे सो दसवा गुपतु रहाता हे ॥४॥ चारि नदी अगनी असराला ॥ कोई गुरमुखि बूझै सबदि निराला ॥ साकत दुरमति डूबहि दाझहि गुरि राखे हरि लिव राता हे ॥५॥ अपु तेजु वाइ प्रिथमी आकासा ॥ तिन महि पंच ततु घरि वासा ॥ सतिगुर सबदि रहहि रंगि राता तजि माइआ हउमै भ्राता हे ॥६॥ इहु मनु भीजै सबदि पतीजै ॥ बिनु नावै किआ टेक टिकीजै ॥ अंतरि चोरु मुहै घरु मंदरु इनि साकति दूतु न जाता हे ॥७॥ दुंदर दूत भूत भीहाले ॥ खिंचोताणि करहि बेताले ॥ सबद सुरति बिनु आवै जावै पति खोई आवत जाता हे ॥८॥ कूड़ु कलरु तनु भसमै ढेरी ॥ बिनु नावै कैसी पति तेरी ॥ बाधे मुकति नाही जुग चारे जमकंकरि कालि पराता हे ॥९॥ जम दरि बाधे मिलहि सजाई ॥ तिसु अपराधी गति नही काई ॥ करण पलाव करे बिललावै जिउ कुंडी मीनु पराता हे ॥१०॥ साकतु फासी पड़ै इकेला ॥ जम वसि कीआ अंधु दुहेला ॥ राम नाम बिनु मुकति न सूझै आजु कालि पचि जाता हे ॥११॥ सतिगुर बाझु न बेली कोई ॥ ऐथै ओथै राखा प्रभु सोई ॥ राम नामु देवै करि किरपा इउ सललै सलल मिलाता हे ॥१२॥ भूले सिख गुरू समझाए ॥ उझड़ि जादे मारगि पाए ॥ तिसु गुर सेवि सदा दिनु राती दुख भंजन संगि सखाता हे ॥१३॥ गुर की भगति करहि किआ प्राणी ॥ ब्रहमै इंद्रि महेसि न जाणी ॥ सतिगुरु अलखु कहहु किउ लखीऐ जिसु बखसे तिसहि पछाता हे ॥१४॥ अंतरि प्रेमु परापति दरसनु ॥ गुरबाणी सिउ प्रीति सु परसनु ॥ अहिनिसि निरमल जोति सबाई घटि दीपकु गुरमुखि जाता हे ॥१५॥ भोजन गिआनु महा रसु मीठा ॥ जिनि चाखिआ तिनि दरसनु डीठा ॥ दरसनु देखि मिले बैरागी मनु मनसा मारि समाता हे ॥१६॥ सतिगुरु सेवहि से परधाना ॥ तिन घट घट अंतरि ब्रहमु पछाना ॥ नानक हरि जसु हरि जन की संगति दीजै जिन सतिगुरु हरि प्रभु जाता हे ॥१७॥५॥११॥

मारू महला १ ॥
साचे साहिब सिरजणहारे ॥ जिनि धर चक्र धरे वीचारे ॥ आपे करता करि करि वेखै साचा वेपरवाहा हे ॥१॥ वेकी वेकी जंत उपाए ॥ दुइ पंदी दुइ राह चलाए ॥ गुर पूरे विणु मुकति न होई सचु नामु जपि लाहा हे ॥२॥ पड़हि मनमुख परु बिधि नही जाना ॥ नामु न बूझहि भरमि भुलाना ॥ लै कै वढी देनि उगाही दुरमति का गलि फाहा हे ॥३॥ सिम्रिति सासत्र पड़हि पुराणा ॥ वादु वखाणहि ततु न जाणा ॥ विणु गुर पूरे ततु न पाईऐ सच सूचे सचु राहा हे ॥४॥ सभ सालाहे सुणि सुणि आखै ॥ आपे दाना सचु पराखै ॥ जिन कउ नदरि करे प्रभु अपनी गुरमुखि सबदु सलाहा हे ॥५॥ सुणि सुणि आखै केती बाणी ॥ सुणि कहीऐ को अंतु न जाणी ॥ जा कउ अलखु लखाए आपे अकथ कथा बुधि ताहा हे ॥६॥ जनमे कउ वाजहि वाधाए ॥ सोहिलड़े अगिआनी गाए ॥ जो जनमै तिसु सरपर मरणा किरतु पइआ सिरि साहा हे ॥७॥ संजोगु विजोगु मेरै प्रभि कीए ॥ स्रिसटि उपाइ दुखा सुख दीए ॥ दुख सुख ही ते भए निराले गुरमुखि सीलु सनाहा हे ॥८॥ नीके साचे के वापारी ॥ सचु सउदा लै गुर वीचारी ॥ सचा वखरु जिसु धनु पलै सबदि सचै ओमाहा हे ॥९॥ काची सउदी तोटा आवै ॥ गुरमुखि वणजु करे प्रभ भावै ॥ पूंजी साबतु रासि सलामति चूका जम का फाहा हे ॥१०॥ सभु को बोलै आपण भाणै ॥ मनमुखु दूजै बोलि न जाणै ॥ अंधुले की मति अंधली बोली आइ गइआ दुखु ताहा हे ॥११॥ दुख महि जनमै दुख महि मरणा ॥ दूखु न मिटै बिनु गुर की सरणा ॥ दूखी उपजै दूखी बिनसै किआ लै आइआ किआ लै जाहा हे ॥१२॥ सची करणी गुर की सिरकारा ॥ आवणु जाणु नही जम धारा ॥ डाल छोडि ततु मूलु पराता मनि साचा ओमाहा हे ॥१३॥ हरि के लोग नही जमु मारै ॥ ना दुखु देखहि पंथि करारै ॥ राम नामु घट अंतरि पूजा अवरु न दूजा काहा हे ॥१४॥ ओड़ु न कथनै सिफति सजाई ॥ जिउ तुधु भावहि रहहि रजाई ॥ दरगह पैधे जानि सुहेले हुकमि सचे पातिसाहा हे ॥१५॥ किआ कहीऐ गुण कथहि घनेरे ॥ अंतु न पावहि वडे वडेरे ॥ नानक साचु मिलै पति राखहु तू सिरि साहा पातिसाहा हे ॥१६॥६॥१२॥

मारू महला १ दखणी ॥
काइआ नगरु नगर गड़ अंदरि ॥ साचा वासा पुरि गगनंदरि ॥ असथिरु थानु सदा निरमाइलु आपे आपु उपाइदा ॥१॥ अंदरि कोट छजे हटनाले ॥ आपे लेवै वसतु समाले ॥ बजर कपाट जड़े जड़ि जाणै गुर सबदी खोलाइदा ॥२॥ भीतरि कोट गुफा घर जाई ॥ नउ घर थापे हुकमि रजाई ॥ दसवै पुरखु अलेखु अपारी आपे अलखु लखाइदा ॥३॥ पउण पाणी अगनी इक वासा ॥ आपे कीतो खेलु तमासा ॥ बलदी जलि निवरै किरपा ते आपे जल निधि पाइदा ॥४॥ धरति उपाइ धरी धरम साला ॥ उतपति परलउ आपि निराला ॥ पवणै खेलु कीआ सभ थाई कला खिंचि ढाहाइदा ॥५॥ भार अठारह मालणि तेरी ॥ चउरु ढुलै पवणै लै फेरी ॥ चंदु सूरजु दुइ दीपक राखे ससि घरि सूरु समाइदा ॥६॥ पंखी पंच उडरि नही धावहि ॥ सफलिओ बिरखु अम्रित फलु पावहि ॥ गुरमुखि सहजि रवै गुण गावै हरि रसु चोग चुगाइदा ॥७॥ झिलमिलि झिलकै चंदु न तारा ॥ सूरज किरणि न बिजुलि गैणारा ॥ अकथी कथउ चिहनु नही कोई पूरि रहिआ मनि भाइदा ॥८॥ पसरी किरणि जोति उजिआला ॥ करि करि देखै आपि दइआला ॥ अनहद रुण झुणकारु सदा धुनि निरभउ कै घरि वाइदा ॥९॥ अनहदु वाजै भ्रमु भउ भाजै ॥ सगल बिआपि रहिआ प्रभु छाजै ॥ सभ तेरी तू गुरमुखि जाता दरि सोहै गुण गाइदा ॥१०॥ आदि निरंजनु निरमलु सोई ॥ अवरु न जाणा दूजा कोई ॥ एकंकारु वसै मनि भावै हउमै गरबु गवाइदा ॥११॥ अम्रितु पीआ सतिगुरि दीआ ॥ अवरु न जाणा दूआ तीआ ॥ एको एकु सु अपर पर्मपरु परखि खजानै पाइदा ॥१२॥ गिआनु धिआनु सचु गहिर ग्मभीरा ॥ कोइ न जाणै तेरा चीरा ॥ जेती है तेती तुधु जाचै करमि मिलै सो पाइदा ॥१३॥ करमु धरमु सचु हाथि तुमारै ॥ वेपरवाह अखुट भंडारै ॥ तू दइआलु किरपालु सदा प्रभु आपे मेलि मिलाइदा ॥१४॥ आपे देखि दिखावै आपे ॥ आपे थापि उथापे आपे ॥ आपे जोड़ि विछोड़े करता आपे मारि जीवाइदा ॥१५॥ जेती है तेती तुधु अंदरि ॥ देखहि आपि बैसि बिज मंदरि ॥ नानकु साचु कहै बेनंती हरि दरसनि सुखु पाइदा ॥१६॥१॥१३॥

मारू महला १ ॥
दरसनु पावा जे तुधु भावा ॥ भाइ भगति साचे गुण गावा ॥ तुधु भाणे तू भावहि करते आपे रसन रसाइदा ॥१॥ सोहनि भगत प्रभू दरबारे ॥ मुकतु भए हरि दास तुमारे ॥ आपु गवाइ तेरै रंगि राते अनदिनु नामु धिआइदा ॥२॥ ईसरु ब्रहमा देवी देवा ॥ इंद्र तपे मुनि तेरी सेवा ॥ जती सती केते बनवासी अंतु न कोई पाइदा ॥३॥ विणु जाणाए कोइ न जाणै ॥ जो किछु करे सु आपण भाणै ॥ लख चउरासीह जीअ उपाए भाणै साह लवाइदा ॥४॥ जो तिसु भावै सो निहचउ होवै ॥ मनमुखु आपु गणाए रोवै ॥ नावहु भुला ठउर न पाए आइ जाइ दुखु पाइदा ॥५॥ निरमल काइआ ऊजल हंसा ॥ तिसु विचि नामु निरंजन अंसा ॥ सगले दूख अम्रितु करि पीवै बाहुड़ि दूखु न पाइदा ॥६॥ बहु सादहु दूखु परापति होवै ॥ भोगहु रोग सु अंति विगोवै ॥ हरखहु सोगु न मिटई कबहू विणु भाणे भरमाइदा ॥७॥ गिआन विहूणी भवै सबाई ॥ साचा रवि रहिआ लिव लाई ॥ निरभउ सबदु गुरू सचु जाता जोती जोति मिलाइदा ॥८॥ अटलु अडोलु अतोलु मुरारे ॥ खिन महि ढाहे फेरि उसारे ॥ रूपु न रेखिआ मिति नही कीमति सबदि भेदि पतीआइदा ॥९॥ हम दासन के दास पिआरे ॥ साधिक साच भले वीचारे ॥ मंने नाउ सोई जिणि जासी आपे साचु द्रिड़ाइदा ॥१०॥ पलै साचु सचे सचिआरा ॥ साचे भावै सबदु पिआरा ॥ त्रिभवणि साचु कला धरि थापी साचे ही पतीआइदा ॥११॥ वडा वडा आखै सभु कोई ॥ गुर बिनु सोझी किनै न होई ॥ साचि मिलै सो साचे भाए ना वीछुड़ि दुखु पाइदा ॥१२॥ धुरहु विछुंने धाही रुंने ॥ मरि मरि जनमहि मुहलति पुंने ॥ जिसु बखसे तिसु दे वडिआई मेलि न पछोताइदा ॥१३॥ आपे करता आपे भुगता ॥ आपे त्रिपता आपे मुकता ॥ आपे मुकति दानु मुकतीसरु ममता मोहु चुकाइदा ॥१४॥ दाना कै सिरि दानु वीचारा ॥ करण कारण समरथु अपारा ॥ करि करि वेखै कीता अपणा करणी कार कराइदा ॥१५॥ से गुण गावहि साचे भावहि ॥ तुझ ते उपजहि तुझ माहि समावहि ॥ नानकु साचु कहै बेनंती मिलि साचे सुखु पाइदा ॥१६॥२॥१४॥

मारू महला १ ॥
अरबद नरबद धुंधूकारा ॥ धरणि न गगना हुकमु अपारा ॥ ना दिनु रैनि न चंदु न सूरजु सुंन समाधि लगाइदा ॥१॥ खाणी न बाणी पउण न पाणी ॥ ओपति खपति न आवण जाणी ॥ खंड पताल सपत नही सागर नदी न नीरु वहाइदा ॥२॥ ना तदि सुरगु मछु पइआला ॥ दोजकु भिसतु नही खै काला ॥ नरकु सुरगु नही जमणु मरणा ना को आइ न जाइदा ॥३॥ ब्रहमा बिसनु महेसु न कोई ॥ अवरु न दीसै एको सोई ॥ नारि पुरखु नही जाति न जनमा ना को दुखु सुखु पाइदा ॥४॥ ना तदि जती सती बनवासी ॥ ना तदि सिध साधिक सुखवासी ॥ जोगी जंगम भेखु न कोई ना को नाथु कहाइदा ॥५॥ जप तप संजम ना ब्रत पूजा ॥ ना को आखि वखाणै दूजा ॥ आपे आपि उपाइ विगसै आपे कीमति पाइदा ॥६॥ ना सुचि संजमु तुलसी माला ॥ गोपी कानु न गऊ गोआला ॥ तंतु मंतु पाखंडु न कोई ना को वंसु वजाइदा ॥७॥ करम धरम नही माइआ माखी ॥ जाति जनमु नही दीसै आखी ॥ ममता जालु कालु नही माथै ना को किसै धिआइदा ॥८॥ निंदु बिंदु नही जीउ न जिंदो ॥ ना तदि गोरखु ना माछिंदो ॥ ना तदि गिआनु धिआनु कुल ओपति ना को गणत गणाइदा ॥९॥ वरन भेख नही ब्रहमण खत्री ॥ देउ न देहुरा गऊ गाइत्री ॥ होम जग नही तीरथि नावणु ना को पूजा लाइदा ॥१०॥ ना को मुला ना को काजी ॥ ना को सेखु मसाइकु हाजी ॥ रईअति राउ न हउमै दुनीआ ना को कहणु कहाइदा ॥११॥ भाउ न भगती ना सिव सकती ॥ साजनु मीतु बिंदु नही रकती ॥ आपे साहु आपे वणजारा साचे एहो भाइदा ॥१२॥ बेद कतेब न सिम्रिति सासत ॥ पाठ पुराण उदै नही आसत ॥ कहता बकता आपि अगोचरु आपे अलखु लखाइदा ॥१३॥ जा तिसु भाणा ता जगतु उपाइआ ॥ बाझु कला आडाणु रहाइआ ॥ ब्रहमा बिसनु महेसु उपाए माइआ मोहु वधाइदा ॥१४॥ विरले कउ गुरि सबदु सुणाइआ ॥ करि करि देखै हुकमु सबाइआ ॥ खंड ब्रहमंड पाताल अर्मभे गुपतहु परगटी आइदा ॥१५॥ ता का अंतु न जाणै कोई ॥ पूरे गुर ते सोझी होई ॥ नानक साचि रते बिसमादी बिसम भए गुण गाइदा ॥१६॥३॥१५॥

मारू महला १ ॥
आपे आपु उपाइ निराला ॥ साचा थानु कीओ दइआला ॥ पउण पाणी अगनी का बंधनु काइआ कोटु रचाइदा ॥१॥ नउ घर थापे थापणहारै ॥ दसवै वासा अलख अपारै ॥ साइर सपत भरे जलि निरमलि गुरमुखि मैलु न लाइदा ॥२॥ रवि ससि दीपक जोति सबाई ॥ आपे करि वेखै वडिआई ॥ जोति सरूप सदा सुखदाता सचे सोभा पाइदा ॥३॥ गड़ महि हाट पटण वापारा ॥ पूरै तोलि तोलै वणजारा ॥ आपे रतनु विसाहे लेवै आपे कीमति पाइदा ॥४॥ कीमति पाई पावणहारै ॥ वेपरवाह पूरे भंडारै ॥ सरब कला ले आपे रहिआ गुरमुखि किसै बुझाइदा ॥५॥ नदरि करे पूरा गुरु भेटै ॥ जम जंदारु न मारै फेटै ॥ जिउ जल अंतरि कमलु बिगासी आपे बिगसि धिआइदा ॥६॥ आपे वरखै अम्रित धारा ॥ रतन जवेहर लाल अपारा ॥ सतिगुरु मिलै त पूरा पाईऐ प्रेम पदारथु पाइदा ॥७॥ प्रेम पदारथु लहै अमोलो ॥ कब ही न घाटसि पूरा तोलो ॥ सचे का वापारी होवै सचो सउदा पाइदा ॥८॥ सचा सउदा विरला को पाए ॥ पूरा सतिगुरु मिलै मिलाए ॥ गुरमुखि होइ सु हुकमु पछाणै मानै हुकमु समाइदा ॥९॥ हुकमे आइआ हुकमि समाइआ ॥ हुकमे दीसै जगतु उपाइआ ॥ हुकमे सुरगु मछु पइआला हुकमे कला रहाइदा ॥१०॥ हुकमे धरती धउल सिरि भारं ॥ हुकमे पउण पाणी गैणारं ॥ हुकमे सिव सकती घरि वासा हुकमे खेल खेलाइदा ॥११॥ हुकमे आडाणे आगासी ॥ हुकमे जल थल त्रिभवण वासी ॥ हुकमे सास गिरास सदा फुनि हुकमे देखि दिखाइदा ॥१२॥ हुकमि उपाए दस अउतारा ॥ देव दानव अगणत अपारा ॥ मानै हुकमु सु दरगह पैझै साचि मिलाइ समाइदा ॥१३॥ हुकमे जुग छतीह गुदारे ॥ हुकमे सिध साधिक वीचारे ॥ आपि नाथु नथीं सभ जा की बखसे मुकति कराइदा ॥१४॥ काइआ कोटु गड़ै महि राजा ॥ नेब खवास भला दरवाजा ॥ मिथिआ लोभु नाही घरि वासा लबि पापि पछुताइदा ॥१५॥ सतु संतोखु नगर महि कारी ॥ जतु सतु संजमु सरणि मुरारी ॥ नानक सहजि मिलै जगजीवनु गुर सबदी पति पाइदा ॥१६॥४॥१६॥


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates