सवये स्री मुखबाक्य महला 5, Savaiye Sri Mukhbak (Mahalla 5) Path in Hindi Gurbani online


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ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
सवये स्री मुखबाक्य महला ५ ॥

आदि पुरख करतार करण कारण सभ आपे ॥ सरब रहिओ भरपूरि सगल घट रहिओ बिआपे ॥ ब्यापतु देखीऐ जगति जानै कउनु तेरी गति सरब की रख्या करै आपे हरि पति ॥ अबिनासी अबिगत आपे आपि उतपति ॥ एकै तूही एकै अन नाही तुम भति ॥ हरि अंतु नाही पारावारु कउनु है करै बीचारु जगत पिता है स्रब प्रान को अधारु ॥ जनु नानकु भगतु दरि तुलि ब्रहम समसरि एक जीह किआ बखानै ॥ हां कि बलि बलि बलि बलि सद बलिहारि ॥१॥

अम्रित प्रवाह सरि अतुल भंडार भरि परै ही ते परै अपर अपार परि ॥ आपुनो भावनु करि मंत्रि न दूसरो धरि ओपति परलौ एकै निमख तु घरि ॥ आन नाही समसरि उजीआरो निरमरि कोटि पराछत जाहि नाम लीए हरि हरि ॥ जनु नानकु भगतु दरि तुलि ब्रहम समसरि एक जीह किआ बखानै ॥ हां कि बलि बलि बलि बलि सद बलिहारि ॥२॥

सगल भवन धारे एक थें कीए बिसथारे पूरि रहिओ स्रब महि आपि है निरारे ॥ हरि गुन नाही अंत पारे जीअ जंत सभि थारे सगल को दाता एकै अलख मुरारे ॥ आप ही धारन धारे कुदरति है देखारे बरनु चिहनु नाही मुख न मसारे ॥ जनु नानकु भगतु दरि तुलि ब्रहम समसरि एक जीह किआ बखानै ॥ हां कि बलि बलि बलि बलि सद बलिहारि ॥३॥

सरब गुण निधानं कीमति न ग्यानं ध्यानं ऊचे ते ऊचौ जानीजै प्रभ तेरो थानं ॥ मनु धनु तेरो प्रानं एकै सूति है जहानं कवन उपमा देउ बडे ते बडानं ॥ जानै कउनु तेरो भेउ अलख अपार देउ अकल कला है प्रभ सरब को धानं ॥ जनु नानकु भगतु दरि तुलि ब्रहम समसरि एक जीह किआ बखानै ॥ हां कि बलि बलि बलि बलि सद बलिहारि ॥४॥

निरंकारु आकार अछल पूरन अबिनासी ॥ हरखवंत आनंत रूप निरमल बिगासी ॥ गुण गावहि बेअंत अंतु इकु तिलु नही पासी ॥ जा कउ होंहि क्रिपाल सु जनु प्रभ तुमहि मिलासी ॥ धंनि धंनि ते धंनि जन जिह क्रिपालु हरि हरि भयउ ॥ हरि गुरु नानकु जिन परसिअउ सि जनम मरण दुह थे रहिओ ॥५॥

सति सति हरि सति सति सते सति भणीऐ ॥ दूसर आन न अवरु पुरखु पऊरातनु सुणीऐ ॥ अम्रितु हरि को नामु लैत मनि सभ सुख पाए ॥ जेह रसन चाखिओ तेह जन त्रिपति अघाए ॥ जिह ठाकुरु सुप्रसंनु भयो सतसंगति तिह पिआरु ॥ हरि गुरु नानकु जिन्ह परसिओ तिन्ह सभ कुल कीओ उधारु ॥६॥

सचु सभा दीबाणु सचु सचे पहि धरिओ ॥ सचै तखति निवासु सचु तपावसु करिओ ॥ सचि सिरज्यिउ संसारु आपि आभुलु न भुलउ ॥ रतन नामु अपारु कीम नहु पवै अमुलउ ॥ जिह क्रिपालु होयउ गोबिंदु सरब सुख तिनहू पाए ॥ हरि गुरु नानकु जिन्ह परसिओ ते बहुड़ि फिरि जोनि न आए ॥७॥

कवनु जोगु कउनु ग्यानु ध्यानु कवन बिधि उस्तति करीऐ ॥ सिध साधिक तेतीस कोरि तिरु कीम न परीऐ ॥ ब्रहमादिक सनकादि सेख गुण अंतु न पाए ॥ अगहु गहिओ नही जाइ पूरि स्रब रहिओ समाए ॥ जिह काटी सिलक दयाल प्रभि सेइ जन लगे भगते ॥ हरि गुरु नानकु जिन्ह परसिओ ते इत उत सदा मुकते ॥८॥

प्रभ दातउ दातार परि्यउ जाचकु इकु सरना ॥ मिलै दानु संत रेन जेह लगि भउजलु तरना ॥ बिनति करउ अरदासि सुनहु जे ठाकुर भावै ॥ देहु दरसु मनि चाउ भगति इहु मनु ठहरावै ॥ बलिओ चरागु अंध्यार महि सभ कलि उधरी इक नाम धरम ॥ प्रगटु सगल हरि भवन महि जनु नानकु गुरु पारब्रहम ॥९॥

सवये स्री मुखबाक्य महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

काची देह मोह फुनि बांधी सठ कठोर कुचील कुगिआनी ॥ धावत भ्रमत रहनु नही पावत पारब्रहम की गति नही जानी ॥ जोबन रूप माइआ मद माता बिचरत बिकल बडौ अभिमानी ॥ पर धन पर अपवाद नारि निंदा यह मीठी जीअ माहि हितानी ॥ बलबंच छपि करत उपावा पेखत सुनत प्रभ अंतरजामी ॥ सील धरम दया सुच नास्ति आइओ सरनि जीअ के दानी ॥ कारण करण समरथ सिरीधर राखि लेहु नानक के सुआमी ॥१॥

कीरति करन सरन मनमोहन जोहन पाप बिदारन कउ ॥ हरि तारन तरन समरथ सभै बिधि कुलह समूह उधारन सउ ॥ चित चेति अचेत जानि सतसंगति भरम अंधेर मोहिओ कत धंउ ॥ मूरत घरी चसा पलु सिमरन राम नामु रसना संगि लउ ॥ होछउ काजु अलप सुख बंधन कोटि जनम कहा दुख भंउ ॥ सिख्या संत नामु भजु नानक राम रंगि आतम सिउ रंउ ॥२॥

रंचक रेत खेत तनि निरमित दुरलभ देह सवारि धरी ॥ खान पान सोधे सुख भुंचत संकट काटि बिपति हरी ॥ मात पिता भाई अरु बंधप बूझन की सभ सूझ परी ॥ बरधमान होवत दिन प्रति नित आवत निकटि बिखम जरी ॥ रे गुन हीन दीन माइआ क्रिम सिमरि सुआमी एक घरी ॥ करु गहि लेहु क्रिपाल क्रिपा निधि नानक काटि भरम भरी ॥३॥

रे मन मूस बिला महि गरबत करतब करत महां मुघनां ॥ स्मपत दोल झोल संगि झूलत माइआ मगन भ्रमत घुघना ॥ सुत बनिता साजन सुख बंधप ता सिउ मोहु बढिओ सु घना ॥ बोइओ बीजु अहं मम अंकुरु बीतत अउध करत अघनां ॥ मिरतु मंजार पसारि मुखु निरखत भुंचत भुगति भूख भुखना ॥ सिमरि गुपाल दइआल सतसंगति नानक जगु जानत सुपना ॥४॥

देह न गेह न नेह न नीता माइआ मत कहा लउ गारहु ॥ छत्र न पत्र न चउर न चावर बहती जात रिदै न बिचारहु ॥ रथ न अस्व न गज सिंघासन छिन महि तिआगत नांग सिधारहु ॥ सूर न बीर न मीर न खानम संगि न कोऊ द्रिसटि निहारहु ॥ कोट न ओट न कोस न छोटा करत बिकार दोऊ कर झारहु ॥ मित्र न पुत्र कलत्र साजन सख उलटत जात बिरख की छांरहु ॥ दीन दयाल पुरख प्रभ पूरन छिन छिन सिमरहु अगम अपारहु ॥ स्रीपति नाथ सरणि नानक जन हे भगवंत क्रिपा करि तारहु ॥५॥

प्रान मान दान मग जोहन हीतु चीतु दे ले ले पारी ॥ साजन सैन मीत सुत भाई ताहू ते ले रखी निरारी ॥ धावन पावन कूर कमावन इह बिधि करत अउध तन जारी ॥ करम धरम संजम सुच नेमा चंचल संगि सगल बिधि हारी ॥ पसु पंखी बिरख असथावर बहु बिधि जोनि भ्रमिओ अति भारी ॥ खिनु पलु चसा नामु नही सिमरिओ दीना नाथ प्रानपति सारी ॥ खान पान मीठ रस भोजन अंत की बार होत कत खारी ॥ नानक संत चरन संगि उधरे होरि माइआ मगन चले सभि डारी ॥६॥

ब्रहमादिक सिव छंद मुनीसुर रसकि रसकि ठाकुर गुन गावत ॥ इंद्र मुनिंद्र खोजते गोरख धरणि गगन आवत फुनि धावत ॥ सिध मनुख्य देव अरु दानव इकु तिलु ता को मरमु न पावत ॥ प्रिअ प्रभ प्रीति प्रेम रस भगती हरि जन ता कै दरसि समावत ॥ तिसहि तिआगि आन कउ जाचहि मुख दंत रसन सगल घसि जावत ॥ रे मन मूड़ सिमरि सुखदाता नानक दास तुझहि समझावत ॥७॥

माइआ रंग बिरंग करत भ्रम मोह कै कूपि गुबारि परिओ है ॥ एता गबु अकासि न मावत बिसटा अस्त क्रिमि उदरु भरिओ है ॥ दह दिस धाइ महा बिखिआ कउ पर धन छीनि अगिआन हरिओ है ॥ जोबन बीति जरा रोगि ग्रसिओ जमदूतन डंनु मिरतु मरिओ है ॥ अनिक जोनि संकट नरक भुंचत सासन दूख गरति गरिओ है ॥ प्रेम भगति उधरहि से नानक करि किरपा संतु आपि करिओ है ॥८॥

गुण समूह फल सगल मनोरथ पूरन होई आस हमारी ॥ अउखध मंत्र तंत्र पर दुख हर सरब रोग खंडण गुणकारी ॥ काम क्रोध मद मतसर त्रिसना बिनसि जाहि हरि नामु उचारी ॥ इसनान दान तापन सुचि किरिआ चरण कमल हिरदै प्रभ धारी ॥ साजन मीत सखा हरि बंधप जीअ धान प्रभ प्रान अधारी ॥ ओट गही सुआमी समरथह नानक दास सदा बलिहारी ॥९॥

आवध कटिओ न जात प्रेम रस चरन कमल संगि ॥ दावनि बंधिओ न जात बिधे मन दरस मगि ॥ पावक जरिओ न जात रहिओ जन धूरि लगि ॥ नीरु न साकसि बोरि चलहि हरि पंथि पगि ॥ नानक रोग दोख अघ मोह छिदे हरि नाम खगि ॥१॥१०॥

उदमु करि लागे बहु भाती बिचरहि अनिक सासत्र बहु खटूआ ॥ भसम लगाइ तीरथ बहु भ्रमते सूखम देह बंधहि बहु जटूआ ॥ बिनु हरि भजन सगल दुख पावत जिउ प्रेम बढाइ सूत के हटूआ ॥ पूजा चक्र करत सोमपाका अनिक भांति थाटहि करि थटूआ ॥२॥११॥२०॥


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