Pt 9 - संकट मोचन शब्द, Part 9 - Sankat mochan / Gurshabad sidhi / Shradha puran Path in Hindi Gurbani online


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** अच्छा जीवनसाथी मिले **
(गुरू नानक देव जी) (अंग 764)
रागु सूही महला १ छंतु घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हम घरि साजन आए ॥ साचै मेलि मिलाए ॥ सहजि मिलाए हरि मनि भाए पंच मिले सुखु पाइआ ॥ साई वसतु परापति होई जिसु सेती मनु लाइआ ॥ अनदिनु मेलु भइआ मनु मानिआ घर मंदर सोहाए ॥ पंच सबद धुनि अनहद वाजे हम घरि साजन आए ॥१॥

** सज्जनों के मिलन के लिए **
(गुरू रामदास जी) (अंग 757)
रागु सूही असटपदीआ महला ४ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कोई आणि मिलावै मेरा प्रीतमु पिआरा हउ तिसु पहि आपु वेचाई ॥१॥ दरसनु हरि देखण कै ताई ॥ क्रिपा करहि ता सतिगुरु मेलहि हरि हरि नामु धिआई ॥१॥ रहाउ ॥ जे सुखु देहि त तुझहि अराधी दुखि भी तुझै धिआई ॥२॥ जे भुख देहि त इत ही राजा दुख विचि सूख मनाई ॥३॥ तनु मनु काटि काटि सभु अरपी विचि अगनी आपु जलाई ॥४॥ पखा फेरी पाणी ढोवा जो देवहि सो खाई ॥५॥ नानकु गरीबु ढहि पइआ दुआरै हरि मेलि लैहु वडिआई ॥६॥

** अच्छे रिश्तेदार मिलें **
(गुरू नानक देव जी) (अंग 764)
रागु सूही महला १ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आवहु सजणा हउ देखा दरसनु तेरा राम ॥ घरि आपनड़ै खड़ी तका मै मनि चाउ घनेरा राम ॥ मनि चाउ घनेरा सुणि प्रभ मेरा मै तेरा भरवासा ॥ दरसनु देखि भई निहकेवल जनम मरण दुखु नासा ॥ सगली जोति जाता तू सोई मिलिआ भाइ सुभाए ॥ नानक साजन कउ बलि जाईऐ साचि मिले घरि आए ॥१॥

** पुनर्मिलन **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 384)
आसा महला ५ ॥
दूखु घनो जब होते दूरि ॥ अब मसलति मोहि मिली हदूरि ॥१॥ चुका निहोरा सखी सहेरी ॥ भरमु गइआ गुरि पिर संगि मेरी ॥१॥ रहाउ ॥ निकटि आनि प्रिअ सेज धरी ॥ काणि कढन ते छूटि परी ॥२॥ मंदरि मेरै सबदि उजारा ॥ अनद बिनोदी खसमु हमारा ॥३॥ मसतकि भागु मै पिरु घरि आइआ ॥ थिरु सोहागु नानक जन पाइआ ॥४॥२॥५३॥

** विदेशी मित्रों का पुनर्मिलन **
(गुरू नानक देव जी) (अंग 17)
सिरीरागु महला १ ॥
आवहु भैणे गलि मिलह अंकि सहेलड़ीआह ॥ मिलि कै करह कहाणीआ सम्रथ कंत कीआह ॥ साचे साहिब सभि गुण अउगण सभि असाह ॥१॥ करता सभु को तेरै जोरि ॥ एकु सबदु बीचारीऐ जा तू ता किआ होरि ॥१॥ रहाउ ॥ जाइ पुछहु सोहागणी तुसी राविआ किनी गुणीं ॥ सहजि संतोखि सीगारीआ मिठा बोलणी ॥ पिरु रीसालू ता मिलै जा गुर का सबदु सुणी ॥२॥ केतीआ तेरीआ कुदरती केवड तेरी दाति ॥ केते तेरे जीअ जंत सिफति करहि दिनु राति ॥ केते तेरे रूप रंग केते जाति अजाति ॥३॥ सचु मिलै सचु ऊपजै सच महि साचि समाइ ॥ सुरति होवै पति ऊगवै गुरबचनी भउ खाइ ॥ नानक सचा पातिसाहु आपे लए मिलाइ ॥४॥१०॥

** प्रियतम का मिलन हो **
(गुरू नानक देव जी) (अंग 21)
सिरीरागु महला १ ॥
इकु तिलु पिआरा वीसरै रोगु वडा मन माहि ॥ किउ दरगह पति पाईऐ जा हरि न वसै मन माहि ॥ गुरि मिलिऐ सुखु पाईऐ अगनि मरै गुण माहि ॥१॥ मन रे अहिनिसि हरि गुण सारि ॥ जिन खिनु पलु नामु न वीसरै ते जन विरले संसारि ॥१॥ रहाउ ॥ जोती जोति मिलाईऐ सुरती सुरति संजोगु ॥ हिंसा हउमै गतु गए नाही सहसा सोगु ॥ गुरमुखि जिसु हरि मनि वसै तिसु मेले गुरु संजोगु ॥२॥ काइआ कामणि जे करी भोगे भोगणहारु ॥ तिसु सिउ नेहु न कीजई जो दीसै चलणहारु ॥ गुरमुखि रवहि सोहागणी सो प्रभु सेज भतारु ॥३॥ चारे अगनि निवारि मरु गुरमुखि हरि जलु पाइ ॥ अंतरि कमलु प्रगासिआ अम्रितु भरिआ अघाइ ॥ नानक सतगुरु मीतु करि सचु पावहि दरगह जाइ ॥४॥२०॥

** प्यार बढे **
(गुरू नानक देव जी) (अंग 357)
आसा महला १ ॥
पेवकड़ै धन खरी इआणी ॥ तिसु सह की मै सार न जाणी ॥१॥ सहु मेरा एकु दूजा नही कोई ॥ नदरि करे मेलावा होई ॥१॥ रहाउ ॥ साहुरड़ै धन साचु पछाणिआ ॥ सहजि सुभाइ अपणा पिरु जाणिआ ॥२॥ गुर परसादी ऐसी मति आवै ॥ तां कामणि कंतै मनि भावै ॥३॥ कहतु नानकु भै भाव का करे सीगारु ॥ सद ही सेजै रवै भतारु ॥४॥२७॥


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