Pt 2 - राग सोरठि - बाणी शब्द, Part 2 - Raag Sorath - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू रामदास जी -- SGGS 607) सोरठि महला ४ पंचपदा ॥
अचरु चरै ता सिधि होई सिधी ते बुधि पाई ॥ प्रेम के सर लागे तन भीतरि ता भ्रमु काटिआ जाई ॥१॥

मेरे गोबिद अपुने जन कउ देहि वडिआई ॥ गुरमति राम नामु परगासहु सदा रहहु सरणाई ॥ रहाउ ॥

इहु संसारु सभु आवण जाणा मन मूरख चेति अजाणा ॥ हरि जीउ क्रिपा करहु गुरु मेलहु ता हरि नामि समाणा ॥२॥

जिस की वथु सोई प्रभु जाणै जिस नो देइ सु पाए ॥ वसतु अनूप अति अगम अगोचर गुरु पूरा अलखु लखाए ॥३॥

जिनि इह चाखी सोई जाणै गूंगे की मिठिआई ॥ रतनु लुकाइआ लूकै नाही जे को रखै लुकाई ॥४॥

सभु किछु तेरा तू अंतरजामी तू सभना का प्रभु सोई ॥ जिस नो दाति करहि सो पाए जन नानक अवरु न कोई ॥५॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 608) सोरठि महला ५ घरु १ तितुके
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किसु हउ जाची किस आराधी जा सभु को कीता होसी ॥ जो जो दीसै वडा वडेरा सो सो खाकू रलसी ॥ निरभउ निरंकारु भव खंडनु सभि सुख नव निधि देसी ॥१॥

हरि जीउ तेरी दाती राजा ॥ माणसु बपुड़ा किआ सालाही किआ तिस का मुहताजा ॥ रहाउ ॥

जिनि हरि धिआइआ सभु किछु तिस का तिस की भूख गवाई ॥ ऐसा धनु दीआ सुखदातै निखुटि न कब ही जाई ॥ अनदु भइआ सुख सहजि समाणे सतिगुरि मेलि मिलाई ॥२॥

मन नामु जपि नामु आराधि अनदिनु नामु वखाणी ॥ उपदेसु सुणि साध संतन का सभ चूकी काणि जमाणी ॥ जिन कउ क्रिपालु होआ प्रभु मेरा से लागे गुर की बाणी ॥३॥

कीमति कउणु करै प्रभ तेरी तू सरब जीआ दइआला ॥ सभु किछु कीता तेरा वरतै किआ हम बाल गुपाला ॥ राखि लेहु नानकु जनु तुमरा जिउ पिता पूत किरपाला ॥४॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 608) सोरठि महला ५ घरु १ चौतुके ॥
गुरु गोविंदु सलाहीऐ भाई मनि तनि हिरदै धार ॥ साचा साहिबु मनि वसै भाई एहा करणी सार ॥ जितु तनि नामु न ऊपजै भाई से तन होए छार ॥ साधसंगति कउ वारिआ भाई जिन एकंकार अधार ॥१॥

सोई सचु अराधणा भाई जिस ते सभु किछु होइ ॥ गुरि पूरै जाणाइआ भाई तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ रहाउ ॥

नाम विहूणे पचि मुए भाई गणत न जाइ गणी ॥ विणु सच सोच न पाईऐ भाई साचा अगम धणी ॥ आवण जाणु न चुकई भाई झूठी दुनी मणी ॥ गुरमुखि कोटि उधारदा भाई दे नावै एक कणी ॥२॥

सिम्रिति सासत सोधिआ भाई विणु सतिगुर भरमु न जाइ ॥ अनिक करम करि थाकिआ भाई फिरि फिरि बंधन पाइ ॥ चारे कुंडा सोधीआ भाई विणु सतिगुर नाही जाइ ॥ वडभागी गुरु पाइआ भाई हरि हरि नामु धिआइ ॥३॥

सचु सदा है निरमला भाई निरमल साचे सोइ ॥ नदरि करे जिसु आपणी भाई तिसु परापति होइ ॥ कोटि मधे जनु पाईऐ भाई विरला कोई कोइ ॥ नानक रता सचि नामि भाई सुणि मनु तनु निरमलु होइ ॥४॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 609) सोरठि महला ५ दुतुके ॥
जउ लउ भाउ अभाउ इहु मानै तउ लउ मिलणु दूराई ॥ आन आपना करत बीचारा तउ लउ बीचु बिखाई ॥१॥

माधवे ऐसी देहु बुझाई ॥ सेवउ साध गहउ ओट चरना नह बिसरै मुहतु चसाई ॥ रहाउ ॥

रे मन मुगध अचेत चंचल चित तुम ऐसी रिदै न आई ॥ प्रानपति तिआगि आन तू रचिआ उरझिओ संगि बैराई ॥२॥

सोगु न बिआपै आपु न थापै साधसंगति बुधि पाई ॥ साकत का बकना इउ जानउ जैसे पवनु झुलाई ॥३॥

कोटि पराध अछादिओ इहु मनु कहणा कछू न जाई ॥ जन नानक दीन सरनि आइओ प्रभ सभु लेखा रखहु उठाई ॥४॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 609) सोरठि महला ५ ॥
पुत्र कलत्र लोक ग्रिह बनिता माइआ सनबंधेही ॥ अंत की बार को खरा न होसी सभ मिथिआ असनेही ॥१॥

रे नर काहे पपोरहु देही ॥ ऊडि जाइगो धूमु बादरो इकु भाजहु रामु सनेही ॥ रहाउ ॥

तीनि संङिआ करि देही कीनी जल कूकर भसमेही ॥ होइ आमरो ग्रिह महि बैठा करण कारण बिसरोही ॥२॥

अनिक भाति करि मणीए साजे काचै तागि परोही ॥ तूटि जाइगो सूतु बापुरे फिरि पाछै पछुतोही ॥३॥

जिनि तुम सिरजे सिरजि सवारे तिसु धिआवहु दिनु रैनेही ॥ जन नानक प्रभ किरपा धारी मै सतिगुर ओट गहेही ॥४॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 609) सोरठि महला ५ ॥
गुरु पूरा भेटिओ वडभागी मनहि भइआ परगासा ॥ कोइ न पहुचनहारा दूजा अपुने साहिब का भरवासा ॥१॥

अपुने सतिगुर कै बलिहारै ॥ आगै सुखु पाछै सुख सहजा घरि आनंदु हमारै ॥ रहाउ ॥

अंतरजामी करणैहारा सोई खसमु हमारा ॥ निरभउ भए गुर चरणी लागे इक राम नाम आधारा ॥२॥

सफल दरसनु अकाल मूरति प्रभु है भी होवनहारा ॥ कंठि लगाइ अपुने जन राखे अपुनी प्रीति पिआरा ॥३॥

वडी वडिआई अचरज सोभा कारजु आइआ रासे ॥ नानक कउ गुरु पूरा भेटिओ सगले दूख बिनासे ॥४॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 610) सोरठि महला ५ ॥
सुखीए कउ पेखै सभ सुखीआ रोगी कै भाणै सभ रोगी ॥ करण करावनहार सुआमी आपन हाथि संजोगी ॥१॥

मन मेरे जिनि अपुना भरमु गवाता ॥ तिस कै भाणै कोइ न भूला जिनि सगलो ब्रहमु पछाता ॥ रहाउ ॥

संत संगि जा का मनु सीतलु ओहु जाणै सगली ठांढी ॥ हउमै रोगि जा का मनु बिआपित ओहु जनमि मरै बिललाती ॥२॥

गिआन अंजनु जा की नेत्री पड़िआ ता कउ सरब प्रगासा ॥ अगिआनि अंधेरै सूझसि नाही बहुड़ि बहुड़ि भरमाता ॥३॥

सुणि बेनंती सुआमी अपुने नानकु इहु सुखु मागै ॥ जह कीरतनु तेरा साधू गावहि तह मेरा मनु लागै ॥४॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 610) सोरठि महला ५ ॥
तनु संतन का धनु संतन का मनु संतन का कीआ ॥ संत प्रसादि हरि नामु धिआइआ सरब कुसल तब थीआ ॥१॥

संतन बिनु अवरु न दाता बीआ ॥ जो जो सरणि परै साधू की सो पारगरामी कीआ ॥ रहाउ ॥

कोटि पराध मिटहि जन सेवा हरि कीरतनु रसि गाईऐ ॥ ईहा सुखु आगै मुख ऊजल जन का संगु वडभागी पाईऐ ॥२॥

रसना एक अनेक गुण पूरन जन की केतक उपमा कहीऐ ॥ अगम अगोचर सद अबिनासी सरणि संतन की लहीऐ ॥३॥

निरगुन नीच अनाथ अपराधी ओट संतन की आही ॥ बूडत मोह ग्रिह अंध कूप महि नानक लेहु निबाही ॥४॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 610) सोरठि महला ५ घरु १ ॥
जा कै हिरदै वसिआ तू करते ता की तैं आस पुजाई ॥ दास अपुने कउ तू विसरहि नाही चरण धूरि मनि भाई ॥१॥

तेरी अकथ कथा कथनु न जाई ॥ गुण निधान सुखदाते सुआमी सभ ते ऊच बडाई ॥ रहाउ ॥

सो सो करम करत है प्राणी जैसी तुम लिखि पाई ॥ सेवक कउ तुम सेवा दीनी दरसनु देखि अघाई ॥२॥

सरब निरंतरि तुमहि समाने जा कउ तुधु आपि बुझाई ॥ गुर परसादि मिटिओ अगिआना प्रगट भए सभ ठाई ॥३॥

सोई गिआनी सोई धिआनी सोई पुरखु सुभाई ॥ कहु नानक जिसु भए दइआला ता कउ मन ते बिसरि न जाई ॥४॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 610) सोरठि महला ५ ॥
सगल समग्री मोहि विआपी कब ऊचे कब नीचे ॥ सुधु न होईऐ काहू जतना ओड़कि को न पहूचे ॥१॥

मेरे मन साध सरणि छुटकारा ॥ बिनु गुर पूरे जनम मरणु न रहई फिरि आवत बारो बारा ॥ रहाउ ॥

ओहु जु भरमु भुलावा कहीअत तिन महि उरझिओ सगल संसारा ॥ पूरन भगतु पुरख सुआमी का सरब थोक ते निआरा ॥२॥

निंदउ नाही काहू बातै एहु खसम का कीआ ॥ जा कउ क्रिपा करी प्रभि मेरै मिलि साधसंगति नाउ लीआ ॥३॥

पारब्रहम परमेसुर सतिगुर सभना करत उधारा ॥ कहु नानक गुर बिनु नही तरीऐ इहु पूरन ततु बीचारा ॥४॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 611) सोरठि महला ५ ॥
खोजत खोजत खोजि बीचारिओ राम नामु ततु सारा ॥ किलबिख काटे निमख अराधिआ गुरमुखि पारि उतारा ॥१॥

हरि रसु पीवहु पुरख गिआनी ॥ सुणि सुणि महा त्रिपति मनु पावै साधू अम्रित बानी ॥ रहाउ ॥

मुकति भुगति जुगति सचु पाईऐ सरब सुखा का दाता ॥ अपुने दास कउ भगति दानु देवै पूरन पुरखु बिधाता ॥२॥

स्रवणी सुणीऐ रसना गाईऐ हिरदै धिआईऐ सोई ॥ करण कारण समरथ सुआमी जा ते ब्रिथा न कोई ॥३॥

वडै भागि रतन जनमु पाइआ करहु क्रिपा किरपाला ॥ साधसंगि नानकु गुण गावै सिमरै सदा गोपाला ॥४॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 611) सोरठि महला ५ ॥
करि इसनानु सिमरि प्रभु अपना मन तन भए अरोगा ॥ कोटि बिघन लाथे प्रभ सरणा प्रगटे भले संजोगा ॥१॥

प्रभ बाणी सबदु सुभाखिआ ॥ गावहु सुणहु पड़हु नित भाई गुर पूरै तू राखिआ ॥ रहाउ ॥

साचा साहिबु अमिति वडाई भगति वछल दइआला ॥ संता की पैज रखदा आइआ आदि बिरदु प्रतिपाला ॥२॥

हरि अम्रित नामु भोजनु नित भुंचहु सरब वेला मुखि पावहु ॥ जरा मरा तापु सभु नाठा गुण गोबिंद नित गावहु ॥३॥

सुणी अरदासि सुआमी मेरै सरब कला बणि आई ॥ प्रगट भई सगले जुग अंतरि गुर नानक की वडिआई ॥४॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 611) सोरठि महला ५ घरु २ चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
एकु पिता एकस के हम बारिक तू मेरा गुर हाई ॥ सुणि मीता जीउ हमारा बलि बलि जासी हरि दरसनु देहु दिखाई ॥१॥

सुणि मीता धूरी कउ बलि जाई ॥ इहु मनु तेरा भाई ॥ रहाउ ॥

पाव मलोवा मलि मलि धोवा इहु मनु तै कू देसा ॥ सुणि मीता हउ तेरी सरणाई आइआ प्रभ मिलउ देहु उपदेसा ॥२॥

मानु न कीजै सरणि परीजै करै सु भला मनाईऐ ॥ सुणि मीता जीउ पिंडु सभु तनु अरपीजै इउ दरसनु हरि जीउ पाईऐ ॥३॥

भइओ अनुग्रहु प्रसादि संतन कै हरि नामा है मीठा ॥ जन नानक कउ गुरि किरपा धारी सभु अकुल निरंजनु डीठा ॥४॥१॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 612) सोरठि महला ५ ॥
कोटि ब्रहमंड को ठाकुरु सुआमी सरब जीआ का दाता रे ॥ प्रतिपालै नित सारि समालै इकु गुनु नही मूरखि जाता रे ॥१॥

हरि आराधि न जाना रे ॥ हरि हरि गुरु गुरु करता रे ॥ हरि जीउ नामु परिओ रामदासु ॥ रहाउ ॥

दीन दइआल क्रिपाल सुख सागर सरब घटा भरपूरी रे ॥ पेखत सुनत सदा है संगे मै मूरख जानिआ दूरी रे ॥२॥

हरि बिअंतु हउ मिति करि वरनउ किआ जाना होइ कैसो रे ॥ करउ बेनती सतिगुर अपुने मै मूरख देहु उपदेसो रे ॥३॥

मै मूरख की केतक बात है कोटि पराधी तरिआ रे ॥ गुरु नानकु जिन सुणिआ पेखिआ से फिरि गरभासि न परिआ रे ॥४॥२॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 612) सोरठि महला ५ ॥
जिना बात को बहुतु अंदेसरो ते मिटे सभि गइआ ॥ सहज सैन अरु सुखमन नारी ऊध कमल बिगसइआ ॥१॥

देखहु अचरजु भइआ ॥ जिह ठाकुर कउ सुनत अगाधि बोधि सो रिदै गुरि दइआ ॥ रहाउ ॥

जोइ दूत मोहि बहुतु संतावत ते भइआनक भइआ ॥ करहि बेनती राखु ठाकुर ते हम तेरी सरनइआ ॥२॥

जह भंडारु गोबिंद का खुलिआ जिह प्रापति तिह लइआ ॥ एकु रतनु मो कउ गुरि दीना मेरा मनु तनु सीतलु थिआ ॥३॥

एक बूंद गुरि अम्रितु दीनो ता अटलु अमरु न मुआ ॥ भगति भंडार गुरि नानक कउ सउपे फिरि लेखा मूलि न लइआ ॥४॥३॥१४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 612) सोरठि महला ५ ॥
चरन कमल सिउ जा का मनु लीना से जन त्रिपति अघाई ॥ गुण अमोल जिसु रिदै न वसिआ ते नर त्रिसन त्रिखाई ॥१॥

हरि आराधे अरोग अनदाई ॥ जिस नो विसरै मेरा राम सनेही तिसु लाख बेदन जणु आई ॥ रहाउ ॥

जिह जन ओट गही प्रभ तेरी से सुखीए प्रभ सरणे ॥ जिह नर बिसरिआ पुरखु बिधाता ते दुखीआ महि गनणे ॥२॥

जिह गुर मानि प्रभू लिव लाई तिह महा अनंद रसु करिआ ॥ जिह प्रभू बिसारि गुर ते बेमुखाई ते नरक घोर महि परिआ ॥३॥

जितु को लाइआ तित ही लागा तैसो ही वरतारा ॥ नानक सह पकरी संतन की रिदै भए मगन चरनारा ॥४॥४॥१५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 613) सोरठि महला ५ ॥
राजन महि राजा उरझाइओ मानन महि अभिमानी ॥ लोभन महि लोभी लोभाइओ तिउ हरि रंगि रचे गिआनी ॥१॥

हरि जन कउ इही सुहावै ॥ पेखि निकटि करि सेवा सतिगुर हरि कीरतनि ही त्रिपतावै ॥ रहाउ ॥

अमलन सिउ अमली लपटाइओ भूमन भूमि पिआरी ॥ खीर संगि बारिकु है लीना प्रभ संत ऐसे हितकारी ॥२॥

बिदिआ महि बिदुअंसी रचिआ नैन देखि सुखु पावहि ॥ जैसे रसना सादि लुभानी तिउ हरि जन हरि गुण गावहि ॥३॥

जैसी भूख तैसी का पूरकु सगल घटा का सुआमी ॥ नानक पिआस लगी दरसन की प्रभु मिलिआ अंतरजामी ॥४॥५॥१६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 613) सोरठि महला ५ ॥
हम मैले तुम ऊजल करते हम निरगुन तू दाता ॥ हम मूरख तुम चतुर सिआणे तू सरब कला का गिआता ॥१॥

माधो हम ऐसे तू ऐसा ॥ हम पापी तुम पाप खंडन नीको ठाकुर देसा ॥ रहाउ ॥

तुम सभ साजे साजि निवाजे जीउ पिंडु दे प्राना ॥ निरगुनीआरे गुनु नही कोई तुम दानु देहु मिहरवाना ॥२॥

तुम करहु भला हम भलो न जानह तुम सदा सदा दइआला ॥ तुम सुखदाई पुरख बिधाते तुम राखहु अपुने बाला ॥३॥

तुम निधान अटल सुलितान जीअ जंत सभि जाचै ॥ कहु नानक हम इहै हवाला राखु संतन कै पाछै ॥४॥६॥१७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 613) सोरठि महला ५ घरु २ ॥
मात गरभ महि आपन सिमरनु दे तह तुम राखनहारे ॥ पावक सागर अथाह लहरि महि तारहु तारनहारे ॥१॥

माधौ तू ठाकुरु सिरि मोरा ॥ ईहा ऊहा तुहारो धोरा ॥ रहाउ ॥

कीते कउ मेरै समानै करणहारु त्रिणु जानै ॥ तू दाता मागन कउ सगली दानु देहि प्रभ भानै ॥२॥

खिन महि अवरु खिनै महि अवरा अचरज चलत तुमारे ॥ रूड़ो गूड़ो गहिर ग्मभीरो ऊचौ अगम अपारे ॥३॥

साधसंगि जउ तुमहि मिलाइओ तउ सुनी तुमारी बाणी ॥ अनदु भइआ पेखत ही नानक प्रताप पुरख निरबाणी ॥४॥७॥१८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 614) सोरठि महला ५ ॥
हम संतन की रेनु पिआरे हम संतन की सरणा ॥ संत हमारी ओट सताणी संत हमारा गहणा ॥१॥

हम संतन सिउ बणि आई ॥ पूरबि लिखिआ पाई ॥ इहु मनु तेरा भाई ॥ रहाउ ॥

संतन सिउ मेरी लेवा देवी संतन सिउ बिउहारा ॥ संतन सिउ हम लाहा खाटिआ हरि भगति भरे भंडारा ॥२॥

संतन मो कउ पूंजी सउपी तउ उतरिआ मन का धोखा ॥ धरम राइ अब कहा करैगो जउ फाटिओ सगलो लेखा ॥३॥

महा अनंद भए सुखु पाइआ संतन कै परसादे ॥ कहु नानक हरि सिउ मनु मानिआ रंगि रते बिसमादे ॥४॥८॥१९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 614) सोरठि मः ५ ॥
जेती समग्री देखहु रे नर तेती ही छडि जानी ॥ राम नाम संगि करि बिउहारा पावहि पदु निरबानी ॥१॥

पिआरे तू मेरो सुखदाता ॥ गुरि पूरै दीआ उपदेसा तुम ही संगि पराता ॥ रहाउ ॥

काम क्रोध लोभ मोह अभिमाना ता महि सुखु नही पाईऐ ॥ होहु रेन तू सगल की मेरे मन तउ अनद मंगल सुखु पाईऐ ॥२॥

घाल न भानै अंतर बिधि जानै ता की करि मन सेवा ॥ करि पूजा होमि इहु मनूआ अकाल मूरति गुरदेवा ॥३॥

गोबिद दामोदर दइआल माधवे पारब्रहम निरंकारा ॥ नामु वरतणि नामो वालेवा नामु नानक प्रान अधारा ॥४॥९॥२०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 614) सोरठि महला ५ ॥
मिरतक कउ पाइओ तनि सासा बिछुरत आनि मिलाइआ ॥ पसू परेत मुगध भए स्रोते हरि नामा मुखि गाइआ ॥१॥

पूरे गुर की देखु वडाई ॥ ता की कीमति कहणु न जाई ॥ रहाउ ॥

दूख सोग का ढाहिओ डेरा अनद मंगल बिसरामा ॥ मन बांछत फल मिले अचिंता पूरन होए कामा ॥२॥

ईहा सुखु आगै मुख ऊजल मिटि गए आवण जाणे ॥ निरभउ भए हिरदै नामु वसिआ अपुने सतिगुर कै मनि भाणे ॥३॥

ऊठत बैठत हरि गुण गावै दूखु दरदु भ्रमु भागा ॥ कहु नानक ता के पूर करमा जा का गुर चरनी मनु लागा ॥४॥१०॥२१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 614) सोरठि महला ५ ॥
रतनु छाडि कउडी संगि लागे जा ते कछू न पाईऐ ॥ पूरन पारब्रहम परमेसुर मेरे मन सदा धिआईऐ ॥१॥

सिमरहु हरि हरि नामु परानी ॥ बिनसै काची देह अगिआनी ॥ रहाउ ॥

म्रिग त्रिसना अरु सुपन मनोरथ ता की कछु न वडाई ॥ राम भजन बिनु कामि न आवसि संगि न काहू जाई ॥२॥

हउ हउ करत बिहाइ अवरदा जीअ को कामु न कीना ॥ धावत धावत नह त्रिपतासिआ राम नामु नही चीना ॥३॥

साद बिकार बिखै रस मातो असंख खते करि फेरे ॥ नानक की प्रभ पाहि बिनंती काटहु अवगुण मेरे ॥४॥११॥२२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 615) सोरठि महला ५ ॥
गुण गावहु पूरन अबिनासी काम क्रोध बिखु जारे ॥ महा बिखमु अगनि को सागरु साधू संगि उधारे ॥१॥

पूरै गुरि मेटिओ भरमु अंधेरा ॥ भजु प्रेम भगति प्रभु नेरा ॥ रहाउ ॥

हरि हरि नामु निधान रसु पीआ मन तन रहे अघाई ॥ जत कत पूरि रहिओ परमेसरु कत आवै कत जाई ॥२॥

जप तप संजम गिआन तत बेता जिसु मनि वसै गोपाला ॥ नामु रतनु जिनि गुरमुखि पाइआ ता की पूरन घाला ॥३॥

कलि कलेस मिटे दुख सगले काटी जम की फासा ॥ कहु नानक प्रभि किरपा धारी मन तन भए बिगासा ॥४॥१२॥२३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 615) सोरठि महला ५ ॥
करण करावणहार प्रभु दाता पारब्रहम प्रभु सुआमी ॥ सगले जीअ कीए दइआला सो प्रभु अंतरजामी ॥१॥

मेरा गुरु होआ आपि सहाई ॥ सूख सहज आनंद मंगल रस अचरज भई बडाई ॥ रहाउ ॥

गुर की सरणि पए भै नासे साची दरगह माने ॥ गुण गावत आराधि नामु हरि आए अपुनै थाने ॥२॥

जै जै कारु करै सभ उसतति संगति साध पिआरी ॥ सद बलिहारि जाउ प्रभ अपुने जिनि पूरन पैज सवारी ॥३॥

गोसटि गिआनु नामु सुणि उधरे जिनि जिनि दरसनु पाइआ ॥ भइओ क्रिपालु नानक प्रभु अपुना अनद सेती घरि आइआ ॥४॥१३॥२४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 615) सोरठि महला ५ ॥
प्रभ की सरणि सगल भै लाथे दुख बिनसे सुखु पाइआ ॥ दइआलु होआ पारब्रहमु सुआमी पूरा सतिगुरु धिआइआ ॥१॥

प्रभ जीउ तू मेरो साहिबु दाता ॥ करि किरपा प्रभ दीन दइआला गुण गावउ रंगि राता ॥ रहाउ ॥

सतिगुरि नामु निधानु द्रिड़ाइआ चिंता सगल बिनासी ॥ करि किरपा अपुनो करि लीना मनि वसिआ अबिनासी ॥२॥

ता कउ बिघनु न कोऊ लागै जो सतिगुरि अपुनै राखे ॥ चरन कमल बसे रिद अंतरि अम्रित हरि रसु चाखे ॥३॥

करि सेवा सेवक प्रभ अपुने जिनि मन की इछ पुजाई ॥ नानक दास ता कै बलिहारै जिनि पूरन पैज रखाई ॥४॥१४॥२५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 616) सोरठि महला ५ ॥
माइआ मोह मगनु अंधिआरै देवनहारु न जानै ॥ जीउ पिंडु साजि जिनि रचिआ बलु अपुनो करि मानै ॥१॥

मन मूड़े देखि रहिओ प्रभ सुआमी ॥ जो किछु करहि सोई सोई जाणै रहै न कछूऐ छानी ॥ रहाउ ॥

जिहवा सुआद लोभ मदि मातो उपजे अनिक बिकारा ॥ बहुतु जोनि भरमत दुखु पाइआ हउमै बंधन के भारा ॥२॥

देइ किवाड़ अनिक पड़दे महि पर दारा संगि फाकै ॥ चित्र गुपतु जब लेखा मागहि तब कउणु पड़दा तेरा ढाकै ॥३॥

दीन दइआल पूरन दुख भंजन तुम बिनु ओट न काई ॥ काढि लेहु संसार सागर महि नानक प्रभ सरणाई ॥४॥१५॥२६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 616) सोरठि महला ५ ॥
पारब्रहमु होआ सहाई कथा कीरतनु सुखदाई ॥ गुर पूरे की बाणी जपि अनदु करहु नित प्राणी ॥१॥

हरि साचा सिमरहु भाई ॥ साधसंगि सदा सुखु पाईऐ हरि बिसरि न कबहू जाई ॥ रहाउ ॥

अम्रित नामु परमेसरु तेरा जो सिमरै सो जीवै ॥ जिस नो करमि परापति होवै सो जनु निरमलु थीवै ॥२॥

बिघन बिनासन सभि दुख नासन गुर चरणी मनु लागा ॥ गुण गावत अचुत अबिनासी अनदिनु हरि रंगि जागा ॥३॥

मन इछे सेई फल पाए हरि की कथा सुहेली ॥ आदि अंति मधि नानक कउ सो प्रभु होआ बेली ॥४॥१६॥२७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 616) सोरठि महला ५ पंचपदा ॥
बिनसै मोहु मेरा अरु तेरा बिनसै अपनी धारी ॥१॥

संतहु इहा बतावहु कारी ॥ जितु हउमै गरबु निवारी ॥१॥ रहाउ ॥

सरब भूत पारब्रहमु करि मानिआ होवां सगल रेनारी ॥२॥

पेखिओ प्रभ जीउ अपुनै संगे चूकै भीति भ्रमारी ॥३॥

अउखधु नामु निरमल जलु अम्रितु पाईऐ गुरू दुआरी ॥४॥

कहु नानक जिसु मसतकि लिखिआ तिसु गुर मिलि रोग बिदारी ॥५॥१७॥२८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 617) सोरठि महला ५ घरु २ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सगल बनसपति महि बैसंतरु सगल दूध महि घीआ ॥ ऊच नीच महि जोति समाणी घटि घटि माधउ जीआ ॥१॥

संतहु घटि घटि रहिआ समाहिओ ॥ पूरन पूरि रहिओ सरब महि जलि थलि रमईआ आहिओ ॥१॥ रहाउ ॥

गुण निधान नानकु जसु गावै सतिगुरि भरमु चुकाइओ ॥ सरब निवासी सदा अलेपा सभ महि रहिआ समाइओ ॥२॥१॥२९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 617) सोरठि महला ५ ॥
जा कै सिमरणि होइ अनंदा बिनसै जनम मरण भै दुखी ॥ चारि पदारथ नव निधि पावहि बहुरि न त्रिसना भुखी ॥१॥

जा को नामु लैत तू सुखी ॥ सासि सासि धिआवहु ठाकुर कउ मन तन जीअरे मुखी ॥१॥ रहाउ ॥

सांति पावहि होवहि मन सीतल अगनि न अंतरि धुखी ॥ गुर नानक कउ प्रभू दिखाइआ जलि थलि त्रिभवणि रुखी ॥२॥२॥३०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 617) सोरठि महला ५ ॥
काम क्रोध लोभ झूठ निंदा इन ते आपि छडावहु ॥ इह भीतर ते इन कउ डारहु आपन निकटि बुलावहु ॥१॥

अपुनी बिधि आपि जनावहु ॥ हरि जन मंगल गावहु ॥१॥ रहाउ ॥

बिसरु नाही कबहू हीए ते इह बिधि मन महि पावहु ॥ गुरु पूरा भेटिओ वडभागी जन नानक कतहि न धावहु ॥२॥३॥३१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 617) सोरठि महला ५ ॥
जा कै सिमरणि सभु कछु पाईऐ बिरथी घाल न जाई ॥ तिसु प्रभ तिआगि अवर कत राचहु जो सभ महि रहिआ समाई ॥१॥

हरि हरि सिमरहु संत गोपाला ॥ साधसंगि मिलि नामु धिआवहु पूरन होवै घाला ॥१॥ रहाउ ॥

सारि समालै निति प्रतिपालै प्रेम सहित गलि लावै ॥ कहु नानक प्रभ तुमरे बिसरत जगत जीवनु कैसे पावै ॥२॥४॥३२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 617) सोरठि महला ५ ॥
अबिनासी जीअन को दाता सिमरत सभ मलु खोई ॥ गुण निधान भगतन कउ बरतनि बिरला पावै कोई ॥१॥

मेरे मन जपि गुर गोपाल प्रभु सोई ॥ जा की सरणि पइआं सुखु पाईऐ बाहुड़ि दूखु न होई ॥१॥ रहाउ ॥

वडभागी साधसंगु परापति तिन भेटत दुरमति खोई ॥ तिन की धूरि नानकु दासु बाछै जिन हरि नामु रिदै परोई ॥२॥५॥३३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 618) सोरठि महला ५ ॥
जनम जनम के दूख निवारै सूका मनु साधारै ॥ दरसनु भेटत होत निहाला हरि का नामु बीचारै ॥१॥

मेरा बैदु गुरू गोविंदा ॥ हरि हरि नामु अउखधु मुखि देवै काटै जम की फंधा ॥१॥ रहाउ ॥

समरथ पुरख पूरन बिधाते आपे करणैहारा ॥ अपुना दासु हरि आपि उबारिआ नानक नाम अधारा ॥२॥६॥३४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 618) सोरठि महला ५ ॥
अंतर की गति तुम ही जानी तुझ ही पाहि निबेरो ॥ बखसि लैहु साहिब प्रभ अपने लाख खते करि फेरो ॥१॥

प्रभ जी तू मेरो ठाकुरु नेरो ॥ हरि चरण सरण मोहि चेरो ॥१॥ रहाउ ॥

बेसुमार बेअंत सुआमी ऊचो गुनी गहेरो ॥ काटि सिलक कीनो अपुनो दासरो तउ नानक कहा निहोरो ॥२॥७॥३५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 618) सोरठि मः ५ ॥
भए क्रिपाल गुरू गोविंदा सगल मनोरथ पाए ॥ असथिर भए लागि हरि चरणी गोविंद के गुण गाए ॥१॥

भलो समूरतु पूरा ॥ सांति सहज आनंद नामु जपि वाजे अनहद तूरा ॥१॥ रहाउ ॥

मिले सुआमी प्रीतम अपुने घर मंदर सुखदाई ॥ हरि नामु निधानु नानक जन पाइआ सगली इछ पुजाई ॥२॥८॥३६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 618) सोरठि महला ५ ॥
गुर के चरन बसे रिद भीतरि सुभ लखण प्रभि कीने ॥ भए क्रिपाल पूरन परमेसर नाम निधान मनि चीने ॥१॥

मेरो गुरु रखवारो मीत ॥ दूण चऊणी दे वडिआई सोभा नीता नीत ॥१॥ रहाउ ॥

जीअ जंत प्रभि सगल उधारे दरसनु देखणहारे ॥ गुर पूरे की अचरज वडिआई नानक सद बलिहारे ॥२॥९॥३७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 618) सोरठि महला ५ ॥
संचनि करउ नाम धनु निरमल थाती अगम अपार ॥ बिलछि बिनोद आनंद सुख माणहु खाइ जीवहु सिख परवार ॥१॥

हरि के चरन कमल आधार ॥ संत प्रसादि पाइओ सच बोहिथु चड़ि लंघउ बिखु संसार ॥१॥ रहाउ ॥

भए क्रिपाल पूरन अबिनासी आपहि कीनी सार ॥ पेखि पेखि नानक बिगसानो नानक नाही सुमार ॥२॥१०॥३८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 618) सोरठि महला ५ ॥
गुरि पूरै अपनी कल धारी सभ घट उपजी दइआ ॥ आपे मेलि वडाई कीनी कुसल खेम सभ भइआ ॥१॥

सतिगुरु पूरा मेरै नालि ॥ पारब्रहमु जपि सदा निहाल ॥ रहाउ ॥

अंतरि बाहरि थान थनंतरि जत कत पेखउ सोई ॥ नानक गुरु पाइओ वडभागी तिसु जेवडु अवरु न कोई ॥२॥११॥३९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 619) सोरठि महला ५ ॥
सूख मंगल कलिआण सहज धुनि प्रभ के चरण निहारिआ ॥ राखनहारै राखिओ बारिकु सतिगुरि तापु उतारिआ ॥१॥

उबरे सतिगुर की सरणाई ॥ जा की सेव न बिरथी जाई ॥ रहाउ ॥

घर महि सूख बाहरि फुनि सूखा प्रभ अपुने भए दइआला ॥ नानक बिघनु न लागै कोऊ मेरा प्रभु होआ किरपाला ॥२॥१२॥४०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 619) सोरठि महला ५ ॥
साधू संगि भइआ मनि उदमु नामु रतनु जसु गाई ॥ मिटि गई चिंता सिमरि अनंता सागरु तरिआ भाई ॥१॥

हिरदै हरि के चरण वसाई ॥ सुखु पाइआ सहज धुनि उपजी रोगा घाणि मिटाई ॥ रहाउ ॥

किआ गुण तेरे आखि वखाणा कीमति कहणु न जाई ॥ नानक भगत भए अबिनासी अपुना प्रभु भइआ सहाई ॥२॥१३॥४१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 619) सोरठि मः ५ ॥
गए कलेस रोग सभि नासे प्रभि अपुनै किरपा धारी ॥ आठ पहर आराधहु सुआमी पूरन घाल हमारी ॥१॥

हरि जीउ तू सुख स्मपति रासि ॥ राखि लैहु भाई मेरे कउ प्रभ आगै अरदासि ॥ रहाउ ॥

जो मागउ सोई सोई पावउ अपने खसम भरोसा ॥ कहु नानक गुरु पूरा भेटिओ मिटिओ सगल अंदेसा ॥२॥१४॥४२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 619) सोरठि महला ५ ॥
सिमरि सिमरि गुरु सतिगुरु अपना सगला दूखु मिटाइआ ॥ ताप रोग गए गुर बचनी मन इछे फल पाइआ ॥१॥

मेरा गुरु पूरा सुखदाता ॥ करण कारण समरथ सुआमी पूरन पुरखु बिधाता ॥ रहाउ ॥

अनंद बिनोद मंगल गुण गावहु गुर नानक भए दइआला ॥ जै जै कार भए जग भीतरि होआ पारब्रहमु रखवाला ॥२॥१५॥४३॥


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