Pt 3 - राग सारंग - बाणी शब्द, Part 3 - Raag Sarang - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1221) सारग महला ५ ॥
गुर के चरन बसे मन मेरै ॥ पूरि रहिओ ठाकुरु सभ थाई निकटि बसै सभ नेरै ॥१॥ रहाउ ॥

बंधन तोरि राम लिव लाई संतसंगि बनि आई ॥ जनमु पदारथु भइओ पुनीता इछा सगल पुजाई ॥१॥

जा कउ क्रिपा करहु प्रभ मेरे सो हरि का जसु गावै ॥ आठ पहर गोबिंद गुन गावै जनु नानकु सद बलि जावै ॥२॥६४॥८७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1221) सारग महला ५ ॥
जीवनु तउ गनीऐ हरि पेखा ॥ करहु क्रिपा प्रीतम मनमोहन फोरि भरम की रेखा ॥१॥ रहाउ ॥

कहत सुनत किछु सांति न उपजत बिनु बिसास किआ सेखां ॥ प्रभू तिआगि आन जो चाहत ता कै मुखि लागै कालेखा ॥१॥

जा कै रासि सरब सुख सुआमी आन न मानत भेखा ॥ नानक दरस मगन मनु मोहिओ पूरन अरथ बिसेखा ॥२॥६५॥८८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1221) सारग महला ५ ॥
सिमरन राम को इकु नाम ॥ कलमल दगध होहि खिन अंतरि कोटि दान इसनान ॥१॥ रहाउ ॥

आन जंजार ब्रिथा स्रमु घालत बिनु हरि फोकट गिआन ॥ जनम मरन संकट ते छूटै जगदीस भजन सुख धिआन ॥१॥

तेरी सरनि पूरन सुख सागर करि किरपा देवहु दान ॥ सिमरि सिमरि नानक प्रभ जीवै बिनसि जाइ अभिमान ॥२॥६६॥८९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1221) सारग महला ५ ॥
धूरतु सोई जि धुर कउ लागै ॥ सोई धुरंधरु सोई बसुंधरु हरि एक प्रेम रस पागै ॥१॥ रहाउ ॥

बलबंच करै न जानै लाभै सो धूरतु नही मूड़्हा ॥ सुआरथु तिआगि असारथि रचिओ नह सिमरै प्रभु रूड़ा ॥१॥

सोई चतुरु सिआणा पंडितु सो सूरा सो दानां ॥ साधसंगि जिनि हरि हरि जपिओ नानक सो परवाना ॥२॥६७॥९०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1222) सारग महला ५ ॥
हरि हरि संत जना की जीवनि ॥ बिखै रस भोग अम्रित सुख सागर राम नाम रसु पीवनि ॥१॥ रहाउ ॥

संचनि राम नाम धनु रतना मन तन भीतरि सीवनि ॥ हरि रंग रांग भए मन लाला राम नाम रस खीवनि ॥१॥

जिउ मीना जल सिउ उरझानो राम नाम संगि लीवनि ॥ नानक संत चात्रिक की निआई हरि बूंद पान सुख थीवनि ॥२॥६८॥९१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1222) सारग महला ५ ॥
हरि के नामहीन बेताल ॥ जेता करन करावन तेता सभि बंधन जंजाल ॥१॥ रहाउ ॥

बिनु प्रभ सेव करत अन सेवा बिरथा काटै काल ॥ जब जमु आइ संघारै प्रानी तब तुमरो कउनु हवाल ॥१॥

राखि लेहु दास अपुने कउ सदा सदा किरपाल ॥ सुख निधान नानक प्रभु मेरा साधसंगि धन माल ॥२॥६९॥९२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1222) सारग महला ५ ॥
मनि तनि राम को बिउहारु ॥ प्रेम भगति गुन गावन गीधे पोहत नह संसारु ॥१॥ रहाउ ॥

स्रवणी कीरतनु सिमरनु सुआमी इहु साध को आचारु ॥ चरन कमल असथिति रिद अंतरि पूजा प्रान को आधारु ॥१॥

प्रभ दीन दइआल सुनहु बेनंती किरपा अपनी धारु ॥ नामु निधानु उचरउ नित रसना नानक सद बलिहारु ॥२॥७०॥९३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1222) सारग महला ५ ॥
हरि के नामहीन मति थोरी ॥ सिमरत नाहि सिरीधर ठाकुर मिलत अंध दुख घोरी ॥१॥ रहाउ ॥

हरि के नाम सिउ प्रीति न लागी अनिक भेख बहु जोरी ॥ तूटत बार न लागै ता कउ जिउ गागरि जल फोरी ॥१॥

करि किरपा भगति रसु दीजै मनु खचित प्रेम रस खोरी ॥ नानक दास तेरी सरणाई प्रभ बिनु आन न होरी ॥२॥७१॥९४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1222) सारग महला ५ ॥
चितवउ वा अउसर मन माहि ॥ होइ इकत्र मिलहु संत साजन गुण गोबिंद नित गाहि ॥१॥ रहाउ ॥

बिनु हरि भजन जेते काम करीअहि तेते बिरथे जांहि ॥ पूरन परमानंद मनि मीठो तिसु बिनु दूसर नाहि ॥१॥

जप तप संजम करम सुख साधन तुलि न कछूऐ लाहि ॥ चरन कमल नानक मनु बेधिओ चरनह संगि समाहि ॥२॥७२॥९५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1222) सारग महला ५ ॥
मेरा प्रभु संगे अंतरजामी ॥ आगै कुसल पाछै खेम सूखा सिमरत नामु सुआमी ॥१॥ रहाउ ॥

साजन मीत सखा हरि मेरै गुन गोपाल हरि राइआ ॥ बिसरि न जाई निमख हिरदै ते पूरै गुरू मिलाइआ ॥१॥

करि किरपा राखे दास अपने जीअ जंत वसि जा कै ॥ एका लिव पूरन परमेसुर भउ नही नानक ता कै ॥२॥७३॥९६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1223) सारग महला ५ ॥
जा कै राम को बलु होइ ॥ सगल मनोरथ पूरन ताहू के दूखु न बिआपै कोइ ॥१॥ रहाउ ॥

जो जनु भगतु दासु निजु प्रभ का सुणि जीवां तिसु सोइ ॥ उदमु करउ दरसनु पेखन कौ करमि परापति होइ ॥१॥

गुर परसादी द्रिसटि निहारउ दूसर नाही कोइ ॥ दानु देहि नानक अपने कउ चरन जीवां संत धोइ ॥२॥७४॥९७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1223) सारग महला ५ ॥
जीवतु राम के गुण गाइ ॥ करहु क्रिपा गोपाल बीठुले बिसरि न कब ही जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

मनु तनु धनु सभु तुमरा सुआमी आन न दूजी जाइ ॥ जिउ तू राखहि तिव ही रहणा तुम्हरा पैन्है खाइ ॥१॥

साधसंगति कै बलि बलि जाई बहुड़ि न जनमा धाइ ॥ नानक दास तेरी सरणाई जिउ भावै तिवै चलाइ ॥२॥७५॥९८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1223) सारग महला ५ ॥
मन रे नाम को सुख सार ॥ आन काम बिकार माइआ सगल दीसहि छार ॥१॥ रहाउ ॥

ग्रिहि अंध कूप पतित प्राणी नरक घोर गुबार ॥ अनिक जोनी भ्रमत हारिओ भ्रमत बारं बार ॥१॥

पतित पावन भगति बछल दीन किरपा धार ॥ कर जोड़ि नानकु दानु मांगै साधसंगि उधार ॥२॥७६॥९९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1223) सारग महला ५ ॥
बिराजित राम को परताप ॥ आधि बिआधि उपाधि सभ नासी बिनसे तीनै ताप ॥१॥ रहाउ ॥

त्रिसना बुझी पूरन सभ आसा चूके सोग संताप ॥ गुण गावत अचुत अबिनासी मन तन आतम ध्राप ॥१॥

काम क्रोध लोभ मद मतसर साधू कै संगि खाप ॥ भगति वछल भै काटनहारे नानक के माई बाप ॥२॥७७॥१००॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1223) सारग महला ५ ॥
आतुरु नाम बिनु संसार ॥ त्रिपति न होवत कूकरी आसा इतु लागो बिखिआ छार ॥१॥ रहाउ ॥

पाइ ठगउरी आपि भुलाइओ जनमत बारो बार ॥ हरि का सिमरनु निमख न सिमरिओ जमकंकर करत खुआर ॥१॥

होहु क्रिपाल दीन दुख भंजन तेरिआ संतह की रावार ॥ नानक दासु दरसु प्रभ जाचै मन तन को आधार ॥२॥७८॥१०१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1224) सारग महला ५ ॥
मैला हरि के नाम बिनु जीउ ॥ तिनि प्रभि साचै आपि भुलाइआ बिखै ठगउरी पीउ ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि जनम भ्रमतौ बहु भांती थिति नही कतहू पाई ॥ पूरा सतिगुरु सहजि न भेटिआ साकतु आवै जाई ॥१॥

राखि लेहु प्रभ सम्रिथ दाते तुम प्रभ अगम अपार ॥ नानक दास तेरी सरणाई भवजलु उतरिओ पार ॥२॥७९॥१०२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1224) सारग महला ५ ॥
रमण कउ राम के गुण बाद ॥ साधसंगि धिआईऐ परमेसरु अम्रित जा के सुआद ॥१॥ रहाउ ॥

सिमरत एकु अचुत अबिनासी बिनसे माइआ माद ॥ सहज अनद अनहद धुनि बाणी बहुरि न भए बिखाद ॥१॥

सनकादिक ब्रहमादिक गावत गावत सुक प्रहिलाद ॥ पीवत अमिउ मनोहर हरि रसु जपि नानक हरि बिसमाद ॥२॥८०॥१०३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1224) सारग महला ५ ॥
कीन्हे पाप के बहु कोट ॥ दिनसु रैनी थकत नाही कतहि नाही छोट ॥१॥ रहाउ ॥

महा बजर बिख बिआधी सिरि उठाई पोट ॥ उघरि गईआं खिनहि भीतरि जमहि ग्रासे झोट ॥१॥

पसु परेत उसट गरधभ अनिक जोनी लेट ॥ भजु साधसंगि गोबिंद नानक कछु न लागै फेट ॥२॥८१॥१०४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1224) सारग महला ५ ॥
अंधे खावहि बिसू के गटाक ॥ नैन स्रवन सरीरु सभु हुटिओ सासु गइओ तत घाट ॥१॥ रहाउ ॥

अनाथ रञाणि उदरु ले पोखहि माइआ गईआ हाटि ॥ किलबिख करत करत पछुतावहि कबहु न साकहि छांटि ॥१॥

निंदकु जमदूती आइ संघारिओ देवहि मूंड उपरि मटाक ॥ नानक आपन कटारी आपस कउ लाई मनु अपना कीनो फाट ॥२॥८२॥१०५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1224) सारग महला ५ ॥
टूटी निंदक की अध बीच ॥ जन का राखा आपि सुआमी बेमुख कउ आइ पहूची मीच ॥१॥ रहाउ ॥

उस का कहिआ कोइ न सुणई कही न बैसणु पावै ॥ ईहां दुखु आगै नरकु भुंचै बहु जोनी भरमावै ॥१॥

प्रगटु भइआ खंडी ब्रहमंडी कीता अपणा पाइआ ॥ नानक सरणि निरभउ करते की अनद मंगल गुण गाइआ ॥२॥८३॥१०६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1224) सारग महला ५ ॥
त्रिसना चलत बहु परकारि ॥ पूरन होत न कतहु बातहि अंति परती हारि ॥१॥ रहाउ ॥

सांति सूख न सहजु उपजै इहै इसु बिउहारि ॥ आप पर का कछु न जानै काम क्रोधहि जारि ॥१॥

संसार सागरु दुखि बिआपिओ दास लेवहु तारि ॥ चरन कमल सरणाइ नानक सद सदा बलिहारि ॥२॥८४॥१०७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1225) सारग महला ५ ॥
रे पापी तै कवन की मति लीन ॥ निमख घरी न सिमरि सुआमी जीउ पिंडु जिनि दीन ॥१॥ रहाउ ॥

खात पीवत सवंत सुखीआ नामु सिमरत खीन ॥ गरभ उदर बिललाट करता तहां होवत दीन ॥१॥

महा माद बिकार बाधा अनिक जोनि भ्रमीन ॥ गोबिंद बिसरे कवन दुख गनीअहि सुखु नानक हरि पद चीन्ह ॥२॥८५॥१०८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1225) सारग महला ५ ॥
माई री चरनह ओट गही ॥ दरसनु पेखि मेरा मनु मोहिओ दुरमति जात बही ॥१॥ रहाउ ॥

अगह अगाधि ऊच अबिनासी कीमति जात न कही ॥ जलि थलि पेखि पेखि मनु बिगसिओ पूरि रहिओ स्रब मही ॥१॥

दीन दइआल प्रीतम मनमोहन मिलि साधह कीनो सही ॥ सिमरि सिमरि जीवत हरि नानक जम की भीर न फही ॥२॥८६॥१०९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1225) सारग महला ५ ॥
माई री मनु मेरो मतवारो ॥ पेखि दइआल अनद सुख पूरन हरि रसि रपिओ खुमारो ॥१॥ रहाउ ॥

निरमल भए ऊजल जसु गावत बहुरि न होवत कारो ॥ चरन कमल सिउ डोरी राची भेटिओ पुरखु अपारो ॥१॥

करु गहि लीने सरबसु दीने दीपक भइओ उजारो ॥ नानक नामि रसिक बैरागी कुलह समूहां तारो ॥२॥८७॥११०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1225) सारग महला ५ ॥
माई री आन सिमरि मरि जांहि ॥ तिआगि गोबिदु जीअन को दाता माइआ संगि लपटाहि ॥१॥ रहाउ ॥

नामु बिसारि चलहि अन मारगि नरक घोर महि पाहि ॥ अनिक सजांई गणत न आवै गरभै गरभि भ्रमाहि ॥१॥

से धनवंते से पतिवंते हरि की सरणि समाहि ॥ गुर प्रसादि नानक जगु जीतिओ बहुरि न आवहि जांहि ॥२॥८८॥१११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1225) सारग महला ५ ॥
हरि काटी कुटिलता कुठारि ॥ भ्रम बन दहन भए खिन भीतरि राम नाम परहारि ॥१॥ रहाउ ॥

काम क्रोध निंदा परहरीआ काढे साधू कै संगि मारि ॥ जनमु पदारथु गुरमुखि जीतिआ बहुरि न जूऐ हारि ॥१॥

आठ पहर प्रभ के गुण गावह पूरन सबदि बीचारि ॥ नानक दासनि दासु जनु तेरा पुनह पुनह नमसकारि ॥२॥८९॥११२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1226) सारग महला ५ ॥
पोथी परमेसर का थानु ॥ साधसंगि गावहि गुण गोबिंद पूरन ब्रहम गिआनु ॥१॥ रहाउ ॥

साधिक सिध सगल मुनि लोचहि बिरले लागै धिआनु ॥ जिसहि क्रिपालु होइ मेरा सुआमी पूरन ता को कामु ॥१॥

जा कै रिदै वसै भै भंजनु तिसु जानै सगल जहानु ॥ खिनु पलु बिसरु नही मेरे करते इहु नानकु मांगै दानु ॥२॥९०॥११३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1226) सारग महला ५ ॥
वूठा सरब थाई मेहु ॥ अनद मंगल गाउ हरि जसु पूरन प्रगटिओ नेहु ॥१॥ रहाउ ॥

चारि कुंट दह दिसि जल निधि ऊन थाउ न केहु ॥ क्रिपा निधि गोबिंद पूरन जीअ दानु सभ देहु ॥१॥

सति सति हरि सति सुआमी सति साधसंगेहु ॥ सति ते जन जिन परतीति उपजी नानक नह भरमेहु ॥२॥९१॥११४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1226) सारग महला ५ ॥
गोबिद जीउ तू मेरे प्रान अधार ॥ साजन मीत सहाई तुम ही तू मेरो परवार ॥१॥ रहाउ ॥

करु मसतकि धारिओ मेरै माथै साधसंगि गुण गाए ॥ तुमरी क्रिपा ते सभ फल पाए रसकि राम नाम धिआए ॥१॥

अबिचल नीव धराई सतिगुरि कबहू डोलत नाही ॥ गुर नानक जब भए दइआरा सरब सुखा निधि पांही ॥२॥९२॥११५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1226) सारग महला ५ ॥
निबही नाम की सचु खेप ॥ लाभु हरि गुण गाइ निधि धनु बिखै माहि अलेप ॥१॥ रहाउ ॥

जीअ जंत सगल संतोखे आपना प्रभु धिआइ ॥ रतन जनमु अपार जीतिओ बहुड़ि जोनि न पाइ ॥१॥

भए क्रिपाल दइआल गोबिद भइआ साधू संगु ॥ हरि चरन रासि नानक पाई लगा प्रभ सिउ रंगु ॥२॥९३॥११६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1226) सारग महला ५ ॥
माई री पेखि रही बिसमाद ॥ अनहद धुनी मेरा मनु मोहिओ अचरज ता के स्वाद ॥१॥ रहाउ ॥

मात पिता बंधप है सोई मनि हरि को अहिलाद ॥ साधसंगि गाए गुन गोबिंद बिनसिओ सभु परमाद ॥१॥

डोरी लपटि रही चरनह संगि भ्रम भै सगले खाद ॥ एकु अधारु नानक जन कीआ बहुरि न जोनि भ्रमाद ॥२॥९४॥११७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1227) सारग महला ५ ॥
माई री माती चरण समूह ॥ एकसु बिनु हउ आन न जानउ दुतीआ भाउ सभ लूह ॥१॥ रहाउ ॥

तिआगि गोपाल अवर जो करणा ते बिखिआ के खूह ॥ दरस पिआस मेरा मनु मोहिओ काढी नरक ते धूह ॥१॥

संत प्रसादि मिलिओ सुखदाता बिनसी हउमै हूह ॥ राम रंगि राते दास नानक मउलिओ मनु तनु जूह ॥२॥९५॥११८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1227) सारग महला ५ ॥
बिनसे काच के बिउहार ॥ राम भजु मिलि साधसंगति इहै जग महि सार ॥१॥ रहाउ ॥

ईत ऊत न डोलि कतहू नामु हिरदै धारि ॥ गुर चरन बोहिथ मिलिओ भागी उतरिओ संसार ॥१॥

जलि थलि महीअलि पूरि रहिओ सरब नाथ अपार ॥ हरि नामु अम्रितु पीउ नानक आन रस सभि खार ॥२॥९६॥११९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1227) सारग महला ५ ॥
ता ते करण पलाह करे ॥ महा बिकार मोह मद मातौ सिमरत नाहि हरे ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगि जपते नाराइण तिन के दोख जरे ॥ सफल देह धंनि ओइ जनमे प्रभ कै संगि रले ॥१॥

चारि पदारथ असट दसा सिधि सभ ऊपरि साध भले ॥ नानक दास धूरि जन बांछै उधरहि लागि पले ॥२॥९७॥१२०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1227) सारग महला ५ ॥
हरि के नाम के जन कांखी ॥ मनि तनि बचनि एही सुखु चाहत प्रभ दरसु देखहि कब आखी ॥१॥ रहाउ ॥

तू बेअंतु पारब्रहम सुआमी गति तेरी जाइ न लाखी ॥ चरन कमल प्रीति मनु बेधिआ करि सरबसु अंतरि राखी ॥१॥

बेद पुरान सिम्रिति साधू जन इह बाणी रसना भाखी ॥ जपि राम नामु नानक निसतरीऐ होरु दुतीआ बिरथी साखी ॥२॥९८॥१२१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1227) सारग महला ५ ॥
माखी राम की तू माखी ॥ जह दुरगंध तहा तू बैसहि महा बिखिआ मद चाखी ॥१॥ रहाउ ॥

कितहि असथानि तू टिकनु न पावहि इह बिधि देखी आखी ॥ संता बिनु तै कोइ न छाडिआ संत परे गोबिद की पाखी ॥१॥

जीअ जंत सगले तै मोहे बिनु संता किनै न लाखी ॥ नानक दासु हरि कीरतनि राता सबदु सुरति सचु साखी ॥२॥९९॥१२२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1227) सारग महला ५ ॥
माई री काटी जम की फास ॥ हरि हरि जपत सरब सुख पाए बीचे ग्रसत उदास ॥१॥ रहाउ ॥

करि किरपा लीने करि अपुने उपजी दरस पिआस ॥ संतसंगि मिलि हरि गुण गाए बिनसी दुतीआ आस ॥१॥

महा उदिआन अटवी ते काढे मारगु संत कहिओ ॥ देखत दरसु पाप सभि नासे हरि नानक रतनु लहिओ ॥२॥१००॥१२३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1228) सारग महला ५ ॥
माई री अरिओ प्रेम की खोरि ॥ दरसन रुचित पिआस मनि सुंदर सकत न कोई तोरि ॥१॥ रहाउ ॥

प्रान मान पति पित सुत बंधप हरि सरबसु धन मोर ॥ ध्रिगु सरीरु असत बिसटा क्रिम बिनु हरि जानत होर ॥१॥

भइओ क्रिपाल दीन दुख भंजनु परा पूरबला जोर ॥ नानक सरणि क्रिपा निधि सागर बिनसिओ आन निहोर ॥२॥१०१॥१२४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1228) सारग महला ५ ॥
नीकी राम की धुनि सोइ ॥ चरन कमल अनूप सुआमी जपत साधू होइ ॥१॥ रहाउ ॥

चितवता गोपाल दरसन कलमला कढु धोइ ॥ जनम मरन बिकार अंकुर हरि काटि छाडे खोइ ॥१॥

परा पूरबि जिसहि लिखिआ बिरला पाए कोइ ॥ रवण गुण गोपाल करते नानका सचु जोइ ॥२॥१०२॥१२५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1228) सारग महला ५ ॥
हरि के नाम की मति सार ॥ हरि बिसारि जु आन राचहि मिथन सभ बिसथार ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगमि भजु सुआमी पाप होवत खार ॥ चरनारबिंद बसाइ हिरदै बहुरि जनम न मार ॥१॥

करि अनुग्रह राखि लीने एक नाम अधार ॥ दिन रैनि सिमरत सदा नानक मुख ऊजल दरबारि ॥२॥१०३॥१२६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1228) सारग महला ५ ॥
मानी तूं राम कै दरि मानी ॥ साधसंगि मिलि हरि गुन गाए बिनसी सभ अभिमानी ॥१॥ रहाउ ॥

धारि अनुग्रहु अपुनी करि लीनी गुरमुखि पूर गिआनी ॥ सरब सूख आनंद घनेरे ठाकुर दरस धिआनी ॥१॥

निकटि वरतनि सा सदा सुहागनि दह दिस साई जानी ॥ प्रिअ रंग रंगि रती नाराइन नानक तिसु कुरबानी ॥२॥१०४॥१२७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1228) सारग महला ५ ॥
तुअ चरन आसरो ईस ॥ तुमहि पछानू साकु तुमहि संगि राखनहार तुमै जगदीस ॥ रहाउ ॥

तू हमरो हम तुमरे कहीऐ इत उत तुम ही राखे ॥ तू बेअंतु अपर्मपरु सुआमी गुर किरपा कोई लाखै ॥१॥

बिनु बकने बिनु कहन कहावन अंतरजामी जानै ॥ जा कउ मेलि लए प्रभु नानकु से जन दरगह माने ॥२॥१०५॥१२८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1229) सारंग महला ५ चउपदे घरु ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि भजि आन करम बिकार ॥ मान मोहु न बुझत त्रिसना काल ग्रस संसार ॥१॥ रहाउ ॥

खात पीवत हसत सोवत अउध बिती असार ॥ नरक उदरि भ्रमंत जलतो जमहि कीनी सार ॥१॥

पर द्रोह करत बिकार निंदा पाप रत कर झार ॥ बिना सतिगुर बूझ नाही तम मोह महां अंधार ॥२॥

बिखु ठगउरी खाइ मूठो चिति न सिरजनहार ॥ गोबिंद गुपत होइ रहिओ निआरो मातंग मति अहंकार ॥३॥

करि क्रिपा प्रभ संत राखे चरन कमल अधार ॥ कर जोरि नानकु सरनि आइओ गोपाल पुरख अपार ॥४॥१॥१२९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1229) सारग महला ५ घरु ६ पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुभ बचन बोलि गुन अमोल ॥ किंकरी बिकार ॥ देखु री बीचार ॥ गुर सबदु धिआइ महलु पाइ ॥ हरि संगि रंग करती महा केल ॥१॥ रहाउ ॥

सुपन री संसारु ॥ मिथनी बिसथारु ॥ सखी काइ मोहि मोहिली प्रिअ प्रीति रिदै मेल ॥१॥

सरब री प्रीति पिआरु ॥ प्रभु सदा री दइआरु ॥ कांएं आन आन रुचीऐ ॥ हरि संगि संगि खचीऐ ॥ जउ साधसंग पाए ॥ कहु नानक हरि धिआए ॥ अब रहे जमहि मेल ॥२॥१॥१३०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1229) सारग महला ५ ॥
कंचना बहु दत करा ॥ भूमि दानु अरपि धरा ॥ मन अनिक सोच पवित्र करत ॥ नाही रे नाम तुलि मन चरन कमल लागे ॥१॥ रहाउ ॥

चारि बेद जिहव भने ॥ दस असट खसट स्रवन सुने ॥ नही तुलि गोबिद नाम धुने ॥ मन चरन कमल लागे ॥१॥

बरत संधि सोच चार ॥ क्रिआ कुंटि निराहार ॥ अपरस करत पाकसार ॥ निवली करम बहु बिसथार ॥ धूप दीप करते हरि नाम तुलि न लागे ॥ राम दइआर सुनि दीन बेनती ॥ देहु दरसु नैन पेखउ जन नानक नाम मिसट लागे ॥२॥२॥१३१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1229) सारग महला ५ ॥
राम राम राम जापि रमत राम सहाई ॥१॥ रहाउ ॥

संतन कै चरन लागे काम क्रोध लोभ तिआगे गुर गोपाल भए क्रिपाल लबधि अपनी पाई ॥१॥

बिनसे भ्रम मोह अंध टूटे माइआ के बंध पूरन सरबत्र ठाकुर नह कोऊ बैराई ॥ सुआमी सुप्रसंन भए जनम मरन दोख गए संतन कै चरन लागि नानक गुन गाई ॥२॥३॥१३२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1230) सारग महला ५ ॥
हरि हरे हरि मुखहु बोलि हरि हरे मनि धारे ॥१॥ रहाउ ॥

स्रवन सुनन भगति करन अनिक पातिक पुनहचरन ॥ सरन परन साधू आन बानि बिसारे ॥१॥

हरि चरन प्रीति नीत नीति पावना महि महा पुनीत ॥ सेवक भै दूरि करन कलिमल दोख जारे ॥ कहत मुकत सुनत मुकत रहत जनम रहते ॥ राम राम सार भूत नानक ततु बीचारे ॥२॥४॥१३३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1230) सारग महला ५ ॥
नाम भगति मागु संत तिआगि सगल कामी ॥१॥ रहाउ ॥

प्रीति लाइ हरि धिआइ गुन गोबिंद सदा गाइ ॥ हरि जन की रेन बांछु दैनहार सुआमी ॥१॥

सरब कुसल सुख बिस्राम आनदा आनंद नाम जम की कछु नाहि त्रास सिमरि अंतरजामी ॥ एक सरन गोबिंद चरन संसार सगल ताप हरन ॥ नाव रूप साधसंग नानक पारगरामी ॥२॥५॥१३४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1230) सारग महला ५ ॥
गुन लाल गावउ गुर देखे ॥ पंचा ते एकु छूटा जउ साधसंगि पग रउ ॥१॥ रहाउ ॥

द्रिसटउ कछु संगि न जाइ मानु तिआगि मोहा ॥ एकै हरि प्रीति लाइ मिलि साधसंगि सोहा ॥१॥

पाइओ है गुण निधानु सगल आस पूरी ॥ नानक मनि अनंद भए गुरि बिखम गार्ह तोरी ॥२॥६॥१३५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1230) सारग महला ५ ॥
मनि बिरागैगी ॥ खोजती दरसार ॥१॥ रहाउ ॥

साधू संतन सेवि कै प्रिउ हीअरै धिआइओ ॥ आनंद रूपी पेखि कै हउ महलु पावउगी ॥१॥

काम करी सभ तिआगि कै हउ सरणि परउगी ॥ नानक सुआमी गरि मिले हउ गुर मनावउगी ॥२॥७॥१३६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1230) सारग महला ५ ॥
ऐसी होइ परी ॥ जानते दइआर ॥१॥ रहाउ ॥

मातर पितर तिआगि कै मनु संतन पाहि बेचाइओ ॥ जाति जनम कुल खोईऐ हउ गावउ हरि हरी ॥१॥

लोक कुट्मब ते टूटीऐ प्रभ किरति किरति करी ॥ गुरि मो कउ उपदेसिआ नानक सेवि एक हरी ॥२॥८॥१३७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1231) सारग महला ५ ॥
लाल लाल मोहन गोपाल तू ॥ कीट हसति पाखाण जंत सरब मै प्रतिपाल तू ॥१॥ रहाउ ॥

नह दूरि पूरि हजूरि संगे ॥ सुंदर रसाल तू ॥१॥

नह बरन बरन नह कुलह कुल ॥ नानक प्रभ किरपाल तू ॥२॥९॥१३८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1231) सारग मः ५ ॥
करत केल बिखै मेल चंद्र सूर मोहे ॥ उपजता बिकार दुंदर नउपरी झुनंतकार सुंदर अनिग भाउ करत फिरत बिनु गोपाल धोहे ॥ रहाउ ॥

तीनि भउने लपटाइ रही काच करमि न जात सही उनमत अंध धंध रचित जैसे महा सागर होहे ॥१॥

उधरे हरि संत दास काटि दीनी जम की फास पतित पावन नामु जा को सिमरि नानक ओहे ॥२॥१०॥१३९॥३॥१३॥१५५॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 1231) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु सारंग महला ९ ॥
हरि बिनु तेरो को न सहाई ॥ कां की मात पिता सुत बनिता को काहू को भाई ॥१॥ रहाउ ॥

धनु धरनी अरु स्मपति सगरी जो मानिओ अपनाई ॥ तन छूटै कछु संगि न चालै कहा ताहि लपटाई ॥१॥

दीन दइआल सदा दुख भंजन ता सिउ रुचि न बढाई ॥ नानक कहत जगत सभ मिथिआ जिउ सुपना रैनाई ॥२॥१॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 1231) सारंग महला ९ ॥
कहा मन बिखिआ सिउ लपटाही ॥ या जग महि कोऊ रहनु न पावै इकि आवहि इकि जाही ॥१॥ रहाउ ॥

कां को तनु धनु स्मपति कां की का सिउ नेहु लगाही ॥ जो दीसै सो सगल बिनासै जिउ बादर की छाही ॥१॥

तजि अभिमानु सरणि संतन गहु मुकति होहि छिन माही ॥ जन नानक भगवंत भजन बिनु सुखु सुपनै भी नाही ॥२॥२॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 1231) सारंग महला ९ ॥
कहा नर अपनो जनमु गवावै ॥ माइआ मदि बिखिआ रसि रचिओ राम सरनि नही आवै ॥१॥ रहाउ ॥

इहु संसारु सगल है सुपनो देखि कहा लोभावै ॥ जो उपजै सो सगल बिनासै रहनु न कोऊ पावै ॥१॥

मिथिआ तनु साचो करि मानिओ इह बिधि आपु बंधावै ॥ जन नानक सोऊ जनु मुकता राम भजन चितु लावै ॥२॥३॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 1231) सारंग महला ९ ॥
मन करि कबहू न हरि गुन गाइओ ॥ बिखिआसकत रहिओ निसि बासुर कीनो अपनो भाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

गुर उपदेसु सुनिओ नहि काननि पर दारा लपटाइओ ॥ पर निंदा कारनि बहु धावत समझिओ नह समझाइओ ॥१॥

कहा कहउ मै अपुनी करनी जिह बिधि जनमु गवाइओ ॥ कहि नानक सभ अउगन मो महि राखि लेहु सरनाइओ ॥२॥४॥३॥१३॥१३९॥४॥१५९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1232) रागु सारग असटपदीआ महला १ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि बिनु किउ जीवा मेरी माई ॥ जै जगदीस तेरा जसु जाचउ मै हरि बिनु रहनु न जाई ॥१॥ रहाउ ॥

हरि की पिआस पिआसी कामनि देखउ रैनि सबाई ॥ स्रीधर नाथ मेरा मनु लीना प्रभु जानै पीर पराई ॥१॥

गणत सरीरि पीर है हरि बिनु गुर सबदी हरि पांई ॥ होहु दइआल क्रिपा करि हरि जीउ हरि सिउ रहां समाई ॥२॥

ऐसी रवत रवहु मन मेरे हरि चरणी चितु लाई ॥ बिसम भए गुण गाइ मनोहर निरभउ सहजि समाई ॥३॥

हिरदै नामु सदा धुनि निहचल घटै न कीमति पाई ॥ बिनु नावै सभु कोई निरधनु सतिगुरि बूझ बुझाई ॥४॥

प्रीतम प्रान भए सुनि सजनी दूत मुए बिखु खाई ॥ जब की उपजी तब की तैसी रंगुल भई मनि भाई ॥५॥

सहज समाधि सदा लिव हरि सिउ जीवां हरि गुन गाई ॥ गुर कै सबदि रता बैरागी निज घरि ताड़ी लाई ॥६॥

सुध रस नामु महा रसु मीठा निज घरि ततु गुसांईं ॥ तह ही मनु जह ही तै राखिआ ऐसी गुरमति पाई ॥७॥

सनक सनादि ब्रहमादि इंद्रादिक भगति रते बनि आई ॥ नानक हरि बिनु घरी न जीवां हरि का नामु वडाई ॥८॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1232) सारग महला १ ॥
हरि बिनु किउ धीरै मनु मेरा ॥ कोटि कलप के दूख बिनासन साचु द्रिड़ाइ निबेरा ॥१॥ रहाउ ॥

क्रोधु निवारि जले हउ ममता प्रेमु सदा नउ रंगी ॥ अनभउ बिसरि गए प्रभु जाचिआ हरि निरमाइलु संगी ॥१॥

चंचल मति तिआगि भउ भंजनु पाइआ एक सबदि लिव लागी ॥ हरि रसु चाखि त्रिखा निवारी हरि मेलि लए बडभागी ॥२॥

अभरत सिंचि भए सुभर सर गुरमति साचु निहाला ॥ मन रति नामि रते निहकेवल आदि जुगादि दइआला ॥३॥

मोहनि मोहि लीआ मनु मोरा बडै भाग लिव लागी ॥ साचु बीचारि किलविख दुख काटे मनु निरमलु अनरागी ॥४॥

गहिर ग्मभीर सागर रतनागर अवर नही अन पूजा ॥ सबदु बीचारि भरम भउ भंजनु अवरु न जानिआ दूजा ॥५॥

मनूआ मारि निरमल पदु चीनिआ हरि रस रते अधिकाई ॥ एकस बिनु मै अवरु न जानां सतिगुरि बूझ बुझाई ॥६॥

अगम अगोचरु अनाथु अजोनी गुरमति एको जानिआ ॥ सुभर भरे नाही चितु डोलै मन ही ते मनु मानिआ ॥७॥

गुर परसादी अकथउ कथीऐ कहउ कहावै सोई ॥ नानक दीन दइआल हमारे अवरु न जानिआ कोई ॥८॥२॥


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