राग मलार - बाणी शब्द, Raag Malar - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1254) रागु मलार चउपदे महला १ घरु १
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
खाणा पीणा हसणा सउणा विसरि गइआ है मरणा ॥ खसमु विसारि खुआरी कीनी ध्रिगु जीवणु नही रहणा ॥१॥

प्राणी एको नामु धिआवहु ॥ अपनी पति सेती घरि जावहु ॥१॥ रहाउ ॥

तुधनो सेवहि तुझु किआ देवहि मांगहि लेवहि रहहि नही ॥ तू दाता जीआ सभना का जीआ अंदरि जीउ तुही ॥२॥

गुरमुखि धिआवहि सि अम्रितु पावहि सेई सूचे होही ॥ अहिनिसि नामु जपहु रे प्राणी मैले हछे होही ॥३॥

जेही रुति काइआ सुखु तेहा तेहो जेही देही ॥ नानक रुति सुहावी साई बिनु नावै रुति केही ॥४॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1254) मलार महला १ ॥
करउ बिनउ गुर अपने प्रीतम हरि वरु आणि मिलावै ॥ सुणि घन घोर सीतलु मनु मोरा लाल रती गुण गावै ॥१॥

बरसु घना मेरा मनु भीना ॥ अम्रित बूंद सुहानी हीअरै गुरि मोही मनु हरि रसि लीना ॥१॥ रहाउ ॥

सहजि सुखी वर कामणि पिआरी जिसु गुर बचनी मनु मानिआ ॥ हरि वरि नारि भई सोहागणि मनि तनि प्रेमु सुखानिआ ॥२॥

अवगण तिआगि भई बैरागनि असथिरु वरु सोहागु हरी ॥ सोगु विजोगु तिसु कदे न विआपै हरि प्रभि अपणी किरपा करी ॥३॥

आवण जाणु नही मनु निहचलु पूरे गुर की ओट गही ॥ नानक राम नामु जपि गुरमुखि धनु सोहागणि सचु सही ॥४॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1254) मलार महला १ ॥
साची सुरति नामि नही त्रिपते हउमै करत गवाइआ ॥ पर धन पर नारी रतु निंदा बिखु खाई दुखु पाइआ ॥ सबदु चीनि भै कपट न छूटे मनि मुखि माइआ माइआ ॥ अजगरि भारि लदे अति भारी मरि जनमे जनमु गवाइआ ॥१॥

मनि भावै सबदु सुहाइआ ॥ भ्रमि भ्रमि जोनि भेख बहु कीन्हे गुरि राखे सचु पाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

तीरथि तेजु निवारि न न्हाते हरि का नामु न भाइआ ॥ रतन पदारथु परहरि तिआगिआ जत को तत ही आइआ ॥ बिसटा कीट भए उत ही ते उत ही माहि समाइआ ॥ अधिक सुआद रोग अधिकाई बिनु गुर सहजु न पाइआ ॥२॥

सेवा सुरति रहसि गुण गावा गुरमुखि गिआनु बीचारा ॥ खोजी उपजै बादी बिनसै हउ बलि बलि गुर करतारा ॥ हम नीच होते हीणमति झूठे तू सबदि सवारणहारा ॥ आतम चीनि तहा तू तारण सचु तारे तारणहारा ॥३॥

बैसि सुथानि कहां गुण तेरे किआ किआ कथउ अपारा ॥ अलखु न लखीऐ अगमु अजोनी तूं नाथां नाथणहारा ॥ किसु पहि देखि कहउ तू कैसा सभि जाचक तू दातारा ॥ भगतिहीणु नानकु दरि देखहु इकु नामु मिलै उरि धारा ॥४॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1255) मलार महला १ ॥
जिनि धन पिर का सादु न जानिआ सा बिलख बदन कुमलानी ॥ भई निरासी करम की फासी बिनु गुर भरमि भुलानी ॥१॥

बरसु घना मेरा पिरु घरि आइआ ॥ बलि जावां गुर अपने प्रीतम जिनि हरि प्रभु आणि मिलाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

नउतन प्रीति सदा ठाकुर सिउ अनदिनु भगति सुहावी ॥ मुकति भए गुरि दरसु दिखाइआ जुगि जुगि भगति सुभावी ॥२॥

हम थारे त्रिभवण जगु तुमरा तू मेरा हउ तेरा ॥ सतिगुरि मिलिऐ निरंजनु पाइआ बहुरि न भवजलि फेरा ॥३॥

अपुने पिर हरि देखि विगासी तउ धन साचु सीगारो ॥ अकुल निरंजन सिउ सचि साची गुरमति नामु अधारो ॥४॥

मुकति भई बंधन गुरि खोल्हे सबदि सुरति पति पाई ॥ नानक राम नामु रिद अंतरि गुरमुखि मेलि मिलाई ॥५॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1255) महला १ मलार ॥
पर दारा पर धनु पर लोभा हउमै बिखै बिकार ॥ दुसट भाउ तजि निंद पराई कामु क्रोधु चंडार ॥१॥

महल महि बैठे अगम अपार ॥ भीतरि अम्रितु सोई जनु पावै जिसु गुर का सबदु रतनु आचार ॥१॥ रहाउ ॥

दुख सुख दोऊ सम करि जानै बुरा भला संसार ॥ सुधि बुधि सुरति नामि हरि पाईऐ सतसंगति गुर पिआर ॥२॥

अहिनिसि लाहा हरि नामु परापति गुरु दाता देवणहारु ॥ गुरमुखि सिख सोई जनु पाए जिस नो नदरि करे करतारु ॥३॥

काइआ महलु मंदरु घरु हरि का तिसु महि राखी जोति अपार ॥ नानक गुरमुखि महलि बुलाईऐ हरि मेले मेलणहार ॥४॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1256) मलार महला १ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पवणै पाणी जाणै जाति ॥ काइआं अगनि करे निभरांति ॥ जमहि जीअ जाणै जे थाउ ॥ सुरता पंडितु ता का नाउ ॥१॥

गुण गोबिंद न जाणीअहि माइ ॥ अणडीठा किछु कहणु न जाइ ॥ किआ करि आखि वखाणीऐ माइ ॥१॥ रहाउ ॥

ऊपरि दरि असमानि पइआलि ॥ किउ करि कहीऐ देहु वीचारि ॥ बिनु जिहवा जो जपै हिआइ ॥ कोई जाणै कैसा नाउ ॥२॥

कथनी बदनी रहै निभरांति ॥ सो बूझै होवै जिसु दाति ॥ अहिनिसि अंतरि रहै लिव लाइ ॥ सोई पुरखु जि सचि समाइ ॥३॥

जाति कुलीनु सेवकु जे होइ ॥ ता का कहणा कहहु न कोइ ॥ विचि सनातीं सेवकु होइ ॥ नानक पण्हीआ पहिरै सोइ ॥४॥१॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1256) मलार महला १ ॥
दुखु वेछोड़ा इकु दुखु भूख ॥ इकु दुखु सकतवार जमदूत ॥ इकु दुखु रोगु लगै तनि धाइ ॥ वैद न भोले दारू लाइ ॥१॥

वैद न भोले दारू लाइ ॥ दरदु होवै दुखु रहै सरीर ॥ ऐसा दारू लगै न बीर ॥१॥ रहाउ ॥

खसमु विसारि कीए रस भोग ॥ तां तनि उठि खलोए रोग ॥ मन अंधे कउ मिलै सजाइ ॥ वैद न भोले दारू लाइ ॥२॥

चंदन का फलु चंदन वासु ॥ माणस का फलु घट महि सासु ॥ सासि गइऐ काइआ ढलि पाइ ॥ ता कै पाछै कोइ न खाइ ॥३॥

कंचन काइआ निरमल हंसु ॥ जिसु महि नामु निरंजन अंसु ॥ दूख रोग सभि गइआ गवाइ ॥ नानक छूटसि साचै नाइ ॥४॥२॥७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1256) मलार महला १ ॥
दुख महुरा मारण हरि नामु ॥ सिला संतोख पीसणु हथि दानु ॥ नित नित लेहु न छीजै देह ॥ अंत कालि जमु मारै ठेह ॥१॥

ऐसा दारू खाहि गवार ॥ जितु खाधै तेरे जाहि विकार ॥१॥ रहाउ ॥

राजु मालु जोबनु सभु छांव ॥ रथि फिरंदै दीसहि थाव ॥ देह न नाउ न होवै जाति ॥ ओथै दिहु ऐथै सभ राति ॥२॥

साद करि समधां त्रिसना घिउ तेलु ॥ कामु क्रोधु अगनी सिउ मेलु ॥ होम जग अरु पाठ पुराण ॥ जो तिसु भावै सो परवाण ॥३॥

तपु कागदु तेरा नामु नीसानु ॥ जिन कउ लिखिआ एहु निधानु ॥ से धनवंत दिसहि घरि जाइ ॥ नानक जननी धंनी माइ ॥४॥३॥८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1257) मलार महला १ ॥
बागे कापड़ बोलै बैण ॥ लमा नकु काले तेरे नैण ॥ कबहूं साहिबु देखिआ भैण ॥१॥

ऊडां ऊडि चड़ां असमानि ॥ साहिब सम्रिथ तेरै ताणि ॥ जलि थलि डूंगरि देखां तीर ॥ थान थनंतरि साहिबु बीर ॥२॥

जिनि तनु साजि दीए नालि ख्मभ ॥ अति त्रिसना उडणै की डंझ ॥ नदरि करे तां बंधां धीर ॥ जिउ वेखाले तिउ वेखां बीर ॥३॥

न इहु तनु जाइगा न जाहिगे ख्मभ ॥ पउणै पाणी अगनी का सनबंध ॥ नानक करमु होवै जपीऐ करि गुरु पीरु ॥ सचि समावै एहु सरीरु ॥४॥४॥९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1257) मलार महला ३ चउपदे घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
निरंकारु आकारु है आपे आपे भरमि भुलाए ॥ करि करि करता आपे वेखै जितु भावै तितु लाए ॥ सेवक कउ एहा वडिआई जा कउ हुकमु मनाए ॥१॥

आपणा भाणा आपे जाणै गुर किरपा ते लहीऐ ॥ एहा सकति सिवै घरि आवै जीवदिआ मरि रहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

वेद पड़ै पड़ि वादु वखाणै ब्रहमा बिसनु महेसा ॥ एह त्रिगुण माइआ जिनि जगतु भुलाइआ जनम मरण का सहसा ॥ गुर परसादी एको जाणै चूकै मनहु अंदेसा ॥२॥

हम दीन मूरख अवीचारी तुम चिंता करहु हमारी ॥ होहु दइआल करि दासु दासा का सेवा करी तुमारी ॥ एकु निधानु देहि तू अपणा अहिनिसि नामु वखाणी ॥३॥

कहत नानकु गुर परसादी बूझहु कोई ऐसा करे वीचारा ॥ जिउ जल ऊपरि फेनु बुदबुदा तैसा इहु संसारा ॥ जिस ते होआ तिसहि समाणा चूकि गइआ पासारा ॥४॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1258) मलार महला ३ ॥
जिनी हुकमु पछाणिआ से मेले हउमै सबदि जलाइ ॥ सची भगति करहि दिनु राती सचि रहे लिव लाइ ॥ सदा सचु हरि वेखदे गुर कै सबदि सुभाइ ॥१॥

मन रे हुकमु मंनि सुखु होइ ॥ प्रभ भाणा अपणा भावदा जिसु बखसे तिसु बिघनु न कोइ ॥१॥ रहाउ ॥

त्रै गुण सभा धातु है ना हरि भगति न भाइ ॥ गति मुकति कदे न होवई हउमै करम कमाहि ॥ साहिब भावै सो थीऐ पइऐ किरति फिराहि ॥२॥

सतिगुर भेटिऐ मनु मरि रहै हरि नामु वसै मनि आइ ॥ तिस की कीमति ना पवै कहणा किछू न जाइ ॥ चउथै पदि वासा होइआ सचै रहै समाइ ॥३॥

मेरा हरि प्रभु अगमु अगोचरु है कीमति कहणु न जाइ ॥ गुर परसादी बुझीऐ सबदे कार कमाइ ॥ नानक नामु सलाहि तू हरि हरि दरि सोभा पाइ ॥४॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1258) मलार महला ३ ॥
गुरमुखि कोई विरला बूझै जिस नो नदरि करेइ ॥ गुर बिनु दाता कोई नाही बखसे नदरि करेइ ॥ गुर मिलिऐ सांति ऊपजै अनदिनु नामु लएइ ॥१॥

मेरे मन हरि अम्रित नामु धिआइ ॥ सतिगुरु पुरखु मिलै नाउ पाईऐ हरि नामे सदा समाइ ॥१॥ रहाउ ॥

मनमुख सदा विछुड़े फिरहि कोइ न किस ही नालि ॥ हउमै वडा रोगु है सिरि मारे जमकालि ॥ गुरमति सतसंगति न विछुड़हि अनदिनु नामु सम्हालि ॥२॥

सभना करता एकु तू नित करि देखहि वीचारु ॥ इकि गुरमुखि आपि मिलाइआ बखसे भगति भंडार ॥ तू आपे सभु किछु जाणदा किसु आगै करी पूकार ॥३॥

हरि हरि नामु अम्रितु है नदरी पाइआ जाइ ॥ अनदिनु हरि हरि उचरै गुर कै सहजि सुभाइ ॥ नानक नामु निधानु है नामे ही चितु लाइ ॥४॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1258) मलार महला ३ ॥
गुरु सालाही सदा सुखदाता प्रभु नाराइणु सोई ॥ गुर परसादि परम पदु पाइआ वडी वडिआई होई ॥ अनदिनु गुण गावै नित साचे सचि समावै सोई ॥१॥

मन रे गुरमुखि रिदै वीचारि ॥ तजि कूड़ु कुट्मबु हउमै बिखु त्रिसना चलणु रिदै सम्हालि ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुरु दाता राम नाम का होरु दाता कोई नाही ॥ जीअ दानु देइ त्रिपतासे सचै नामि समाही ॥ अनदिनु हरि रविआ रिद अंतरि सहजि समाधि लगाही ॥२॥

सतिगुर सबदी इहु मनु भेदिआ हिरदै साची बाणी ॥ मेरा प्रभु अलखु न जाई लखिआ गुरमुखि अकथ कहाणी ॥ आपे दइआ करे सुखदाता जपीऐ सारिंगपाणी ॥३॥

आवण जाणा बहुड़ि न होवै गुरमुखि सहजि धिआइआ ॥ मन ही ते मनु मिलिआ सुआमी मन ही मंनु समाइआ ॥ साचे ही सचु साचि पतीजै विचहु आपु गवाइआ ॥४॥

एको एकु वसै मनि सुआमी दूजा अवरु न कोई ॥ एको नामु अम्रितु है मीठा जगि निरमल सचु सोई ॥ नानक नामु प्रभू ते पाईऐ जिन कउ धुरि लिखिआ होई ॥५॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1259) मलार महला ३ ॥
गण गंधरब नामे सभि उधरे गुर का सबदु वीचारि ॥ हउमै मारि सद मंनि वसाइआ हरि राखिआ उरि धारि ॥ जिसहि बुझाए सोई बूझै जिस नो आपे लए मिलाइ ॥ अनदिनु बाणी सबदे गांवै साचि रहै लिव लाइ ॥१॥

मन मेरे खिनु खिनु नामु सम्हालि ॥ गुर की दाति सबद सुखु अंतरि सदा निबहै तेरै नालि ॥१॥ रहाउ ॥

मनमुख पाखंडु कदे न चूकै दूजै भाइ दुखु पाए ॥ नामु विसारि बिखिआ मनि राते बिरथा जनमु गवाए ॥ इह वेला फिरि हथि न आवै अनदिनु सदा पछुताए ॥ मरि मरि जनमै कदे न बूझै विसटा माहि समाए ॥२॥

गुरमुखि नामि रते से उधरे गुर का सबदु वीचारि ॥ जीवन मुकति हरि नामु धिआइआ हरि राखिआ उरि धारि ॥ मनु तनु निरमलु निरमल मति ऊतम ऊतम बाणी होई ॥ एको पुरखु एकु प्रभु जाता दूजा अवरु न कोई ॥३॥

आपे करे कराए प्रभु आपे आपे नदरि करेइ ॥ मनु तनु राता गुर की बाणी सेवा सुरति समेइ ॥ अंतरि वसिआ अलख अभेवा गुरमुखि होइ लखाइ ॥ नानक जिसु भावै तिसु आपे देवै भावै तिवै चलाइ ॥४॥५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1259) मलार महला ३ दुतुके ॥
सतिगुर ते पावै घरु दरु महलु सु थानु ॥ गुर सबदी चूकै अभिमानु ॥१॥

जिन कउ लिलाटि लिखिआ धुरि नामु ॥ अनदिनु नामु सदा सदा धिआवहि साची दरगह पावहि मानु ॥१॥ रहाउ ॥

मन की बिधि सतिगुर ते जाणै अनदिनु लागै सद हरि सिउ धिआनु ॥ गुर सबदि रते सदा बैरागी हरि दरगह साची पावहि मानु ॥२॥

इहु मनु खेलै हुकम का बाधा इक खिन महि दह दिस फिरि आवै ॥ जां आपे नदरि करे हरि प्रभु साचा तां इहु मनु गुरमुखि ततकाल वसि आवै ॥३॥

इसु मन की बिधि मन हू जाणै बूझै सबदि वीचारि ॥ नानक नामु धिआइ सदा तू भव सागरु जितु पावहि पारि ॥४॥६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1260) मलार महला ३ ॥
जीउ पिंडु प्राण सभि तिस के घटि घटि रहिआ समाई ॥ एकसु बिनु मै अवरु न जाणा सतिगुरि दीआ बुझाई ॥१॥

मन मेरे नामि रहउ लिव लाई ॥ अदिसटु अगोचरु अपर्मपरु करता गुर कै सबदि हरि धिआई ॥१॥ रहाउ ॥

मनु तनु भीजै एक लिव लागै सहजे रहे समाई ॥ गुर परसादी भ्रमु भउ भागै एक नामि लिव लाई ॥२॥

गुर बचनी सचु कार कमावै गति मति तब ही पाई ॥ कोटि मधे किसहि बुझाए तिनि राम नामि लिव लाई ॥३॥

जह जह देखा तह एको सोई इह गुरमति बुधि पाई ॥ मनु तनु प्रान धरीं तिसु आगै नानक आपु गवाई ॥४॥७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1260) मलार महला ३ ॥
मेरा प्रभु साचा दूख निवारणु सबदे पाइआ जाई ॥ भगती राते सद बैरागी दरि साचै पति पाई ॥१॥

मन रे मन सिउ रहउ समाई ॥ गुरमुखि राम नामि मनु भीजै हरि सेती लिव लाई ॥१॥ रहाउ ॥

मेरा प्रभु अति अगम अगोचरु गुरमति देइ बुझाई ॥ सचु संजमु करणी हरि कीरति हरि सेती लिव लाई ॥२॥

आपे सबदु सचु साखी आपे जिन्ह जोती जोति मिलाई ॥ देही काची पउणु वजाए गुरमुखि अम्रितु पाई ॥३॥

आपे साजे सभ कारै लाए सो सचु रहिआ समाई ॥ नानक नाम बिना कोई किछु नाही नामे देइ वडाई ॥४॥८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1260) मलार महला ३ ॥
हउमै बिखु मनु मोहिआ लदिआ अजगर भारी ॥ गरुड़ु सबदु मुखि पाइआ हउमै बिखु हरि मारी ॥१॥

मन रे हउमै मोहु दुखु भारी ॥ इहु भवजलु जगतु न जाई तरणा गुरमुखि तरु हरि तारी ॥१॥ रहाउ ॥

त्रै गुण माइआ मोहु पसारा सभ वरतै आकारी ॥ तुरीआ गुणु सतसंगति पाईऐ नदरी पारि उतारी ॥२॥

चंदन गंध सुगंध है बहु बासना बहकारि ॥ हरि जन करणी ऊतम है हरि कीरति जगि बिसथारि ॥३॥

क्रिपा क्रिपा करि ठाकुर मेरे हरि हरि हरि उर धारि ॥ नानक सतिगुरु पूरा पाइआ मनि जपिआ नामु मुरारि ॥४॥९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1261) मलार महला ३ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
इहु मनु गिरही कि इहु मनु उदासी ॥ कि इहु मनु अवरनु सदा अविनासी ॥ कि इहु मनु चंचलु कि इहु मनु बैरागी ॥ इसु मन कउ ममता किथहु लागी ॥१॥

पंडित इसु मन का करहु बीचारु ॥ अवरु कि बहुता पड़हि उठावहि भारु ॥१॥ रहाउ ॥

माइआ ममता करतै लाई ॥ एहु हुकमु करि स्रिसटि उपाई ॥ गुर परसादी बूझहु भाई ॥ सदा रहहु हरि की सरणाई ॥२॥

सो पंडितु जो तिहां गुणा की पंड उतारै ॥ अनदिनु एको नामु वखाणै ॥ सतिगुर की ओहु दीखिआ लेइ ॥ सतिगुर आगै सीसु धरेइ ॥ सदा अलगु रहै निरबाणु ॥ सो पंडितु दरगह परवाणु ॥३॥

सभनां महि एको एकु वखाणै ॥ जां एको वेखै तां एको जाणै ॥ जा कउ बखसे मेले सोइ ॥ ऐथै ओथै सदा सुखु होइ ॥४॥

कहत नानकु कवन बिधि करे किआ कोइ ॥ सोई मुकति जा कउ किरपा होइ ॥ अनदिनु हरि गुण गावै सोइ ॥ सासत्र बेद की फिरि कूक न होइ ॥५॥१॥१०॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1261) मलार महला ३ ॥
भ्रमि भ्रमि जोनि मनमुख भरमाई ॥ जमकालु मारे नित पति गवाई ॥ सतिगुर सेवा जम की काणि चुकाई ॥ हरि प्रभु मिलिआ महलु घरु पाई ॥१॥

प्राणी गुरमुखि नामु धिआइ ॥ जनमु पदारथु दुबिधा खोइआ कउडी बदलै जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

करि किरपा गुरमुखि लगै पिआरु ॥ अंतरि भगति हरि हरि उरि धारु ॥ भवजलु सबदि लंघावणहारु ॥ दरि साचै दिसै सचिआरु ॥२॥

बहु करम करे सतिगुरु नही पाइआ ॥ बिनु गुर भरमि भूले बहु माइआ ॥ हउमै ममता बहु मोहु वधाइआ ॥ दूजै भाइ मनमुखि दुखु पाइआ ॥३॥

आपे करता अगम अथाहा ॥ गुर सबदी जपीऐ सचु लाहा ॥ हाजरु हजूरि हरि वेपरवाहा ॥ नानक गुरमुखि नामि समाहा ॥४॥२॥११॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1262) मलार महला ३ ॥
जीवत मुकत गुरमती लागे ॥ हरि की भगति अनदिनु सद जागे ॥ सतिगुरु सेवहि आपु गवाइ ॥ हउ तिन जन के सद लागउ पाइ ॥१॥

हउ जीवां सदा हरि के गुण गाई ॥ गुर का सबदु महा रसु मीठा हरि कै नामि मुकति गति पाई ॥१॥ रहाउ ॥

माइआ मोहु अगिआनु गुबारु ॥ मनमुख मोहे मुगध गवार ॥ अनदिनु धंधा करत विहाइ ॥ मरि मरि जमहि मिलै सजाइ ॥२॥

गुरमुखि राम नामि लिव लाई ॥ कूड़ै लालचि ना लपटाई ॥ जो किछु होवै सहजि सुभाइ ॥ हरि रसु पीवै रसन रसाइ ॥३॥

कोटि मधे किसहि बुझाई ॥ आपे बखसे दे वडिआई ॥ जो धुरि मिलिआ सु विछुड़ि न जाई ॥ नानक हरि हरि नामि समाई ॥४॥३॥१२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1262) मलार महला ३ ॥
रसना नामु सभु कोई कहै ॥ सतिगुरु सेवे ता नामु लहै ॥ बंधन तोड़े मुकति घरि रहै ॥ गुर सबदी असथिरु घरि बहै ॥१॥

मेरे मन काहे रोसु करीजै ॥ लाहा कलजुगि राम नामु है गुरमति अनदिनु हिरदै रवीजै ॥१॥ रहाउ ॥

बाबीहा खिनु खिनु बिललाइ ॥ बिनु पिर देखे नींद न पाइ ॥ इहु वेछोड़ा सहिआ न जाइ ॥ सतिगुरु मिलै तां मिलै सुभाइ ॥२॥

नामहीणु बिनसै दुखु पाइ ॥ त्रिसना जलिआ भूख न जाइ ॥ विणु भागा नामु न पाइआ जाइ ॥ बहु बिधि थाका करम कमाइ ॥३॥

त्रै गुण बाणी बेद बीचारु ॥ बिखिआ मैलु बिखिआ वापारु ॥ मरि जनमहि फिरि होहि खुआरु ॥ गुरमुखि तुरीआ गुणु उरि धारु ॥४॥

गुरु मानै मानै सभु कोइ ॥ गुर बचनी मनु सीतलु होइ ॥ चहु जुगि सोभा निरमल जनु सोइ ॥ नानक गुरमुखि विरला कोइ ॥५॥४॥१३॥९॥१३॥२२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1262) रागु मलार महला ४ घरु १ चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अनदिनु हरि हरि धिआइओ हिरदै मति गुरमति दूख विसारी ॥ सभ आसा मनसा बंधन तूटे हरि हरि प्रभि किरपा धारी ॥१॥

नैनी हरि हरि लागी तारी ॥ सतिगुरु देखि मेरा मनु बिगसिओ जनु हरि भेटिओ बनवारी ॥१॥ रहाउ ॥

जिनि ऐसा नामु विसारिआ मेरा हरि हरि तिस कै कुलि लागी गारी ॥ हरि तिस कै कुलि परसूति न करीअहु तिसु बिधवा करि महतारी ॥२॥

हरि हरि आनि मिलावहु गुरु साधू जिसु अहिनिसि हरि उरि धारी ॥ गुरि डीठै गुर का सिखु बिगसै जिउ बारिकु देखि महतारी ॥३॥

धन पिर का इक ही संगि वासा विचि हउमै भीति करारी ॥ गुरि पूरै हउमै भीति तोरी जन नानक मिले बनवारी ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1263) मलार महला ४ ॥
गंगा जमुना गोदावरी सरसुती ते करहि उदमु धूरि साधू की ताई ॥ किलविख मैलु भरे परे हमरै विचि हमरी मैलु साधू की धूरि गवाई ॥१॥

तीरथि अठसठि मजनु नाई ॥ सतसंगति की धूरि परी उडि नेत्री सभ दुरमति मैलु गवाई ॥१॥ रहाउ ॥

जाहरनवी तपै भागीरथि आणी केदारु थापिओ महसाई ॥ कांसी क्रिसनु चरावत गाऊ मिलि हरि जन सोभा पाई ॥२॥

जितने तीरथ देवी थापे सभि तितने लोचहि धूरि साधू की ताई ॥ हरि का संतु मिलै गुर साधू लै तिस की धूरि मुखि लाई ॥३॥

जितनी स्रिसटि तुमरी मेरे सुआमी सभ तितनी लोचै धूरि साधू की ताई ॥ नानक लिलाटि होवै जिसु लिखिआ तिसु साधू धूरि दे हरि पारि लंघाई ॥४॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1263) मलार महला ४ ॥
तिसु जन कउ हरि मीठ लगाना जिसु हरि हरि क्रिपा करै ॥ तिस की भूख दूख सभि उतरै जो हरि गुण हरि उचरै ॥१॥

जपि मन हरि हरि हरि निसतरै ॥ गुर के बचन करन सुनि धिआवै भव सागरु पारि परै ॥१॥ रहाउ ॥

तिसु जन के हम हाटि बिहाझे जिसु हरि हरि क्रिपा करै ॥ हरि जन कउ मिलिआं सुखु पाईऐ सभ दुरमति मैलु हरै ॥२॥

हरि जन कउ हरि भूख लगानी जनु त्रिपतै जा हरि गुन बिचरै ॥ हरि का जनु हरि जल का मीना हरि बिसरत फूटि मरै ॥३॥

जिनि एह प्रीति लाई सो जानै कै जानै जिसु मनि धरै ॥ जनु नानकु हरि देखि सुखु पावै सभ तन की भूख टरै ॥४॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1263) मलार महला ४ ॥
जितने जीअ जंत प्रभि कीने तितने सिरि कार लिखावै ॥ हरि जन कउ हरि दीन्ह वडाई हरि जनु हरि कारै लावै ॥१॥

सतिगुरु हरि हरि नामु द्रिड़ावै ॥ हरि बोलहु गुर के सिख मेरे भाई हरि भउजलु जगतु तरावै ॥१॥ रहाउ ॥

जो गुर कउ जनु पूजे सेवे सो जनु मेरे हरि प्रभ भावै ॥ हरि की सेवा सतिगुरु पूजहु करि किरपा आपि तरावै ॥२॥

भरमि भूले अगिआनी अंधुले भ्रमि भ्रमि फूल तोरावै ॥ निरजीउ पूजहि मड़ा सरेवहि सभ बिरथी घाल गवावै ॥३॥

ब्रहमु बिंदे सो सतिगुरु कहीऐ हरि हरि कथा सुणावै ॥ तिसु गुर कउ छादन भोजन पाट पट्मबर बहु बिधि सति करि मुखि संचहु तिसु पुंन की फिरि तोटि न आवै ॥४॥

सतिगुरु देउ परतखि हरि मूरति जो अम्रित बचन सुणावै ॥ नानक भाग भले तिसु जन के जो हरि चरणी चितु लावै ॥५॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1264) मलार महला ४ ॥
जिन्ह कै हीअरै बसिओ मेरा सतिगुरु ते संत भले भल भांति ॥ तिन्ह देखे मेरा मनु बिगसै हउ तिन कै सद बलि जांत ॥१॥

गिआनी हरि बोलहु दिनु राति ॥ तिन्ह की त्रिसना भूख सभ उतरी जो गुरमति राम रसु खांति ॥१॥ रहाउ ॥

हरि के दास साध सखा जन जिन मिलिआ लहि जाइ भरांति ॥ जिउ जल दुध भिंन भिंन काढै चुणि हंसुला तिउ देही ते चुणि काढै साधू हउमै ताति ॥२॥

जिन कै प्रीति नाही हरि हिरदै ते कपटी नर नित कपटु कमांति ॥ तिन कउ किआ कोई देइ खवालै ओइ आपि बीजि आपे ही खांति ॥३॥

हरि का चिहनु सोई हरि जन का हरि आपे जन महि आपु रखांति ॥ धनु धंनु गुरू नानकु समदरसी जिनि निंदा उसतति तरी तरांति ॥४॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1264) मलार महला ४ ॥
अगमु अगोचरु नामु हरि ऊतमु हरि किरपा ते जपि लइआ ॥ सतसंगति साध पाई वडभागी संगि साधू पारि पइआ ॥१॥

मेरै मनि अनदिनु अनदु भइआ ॥ गुर परसादि नामु हरि जपिआ मेरे मन का भ्रमु भउ गइआ ॥१॥ रहाउ ॥

जिन हरि गाइआ जिन हरि जपिआ तिन संगति हरि मेलहु करि मइआ ॥ तिन का दरसु देखि सुखु पाइआ दुखु हउमै रोगु गइआ ॥२॥

जो अनदिनु हिरदै नामु धिआवहि सभु जनमु तिना का सफलु भइआ ॥ ओइ आपि तरे स्रिसटि सभ तारी सभु कुलु भी पारि पइआ ॥३॥

तुधु आपे आपि उपाइआ सभु जगु तुधु आपे वसि करि लइआ ॥ जन नानक कउ प्रभि किरपा धारी बिखु डुबदा काढि लइआ ॥४॥६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1265) मलार महला ४ ॥
गुर परसादी अम्रितु नही पीआ त्रिसना भूख न जाई ॥ मनमुख मूड़्ह जलत अहंकारी हउमै विचि दुखु पाई ॥ आवत जात बिरथा जनमु गवाइआ दुखि लागै पछुताई ॥ जिस ते उपजे तिसहि न चेतहि ध्रिगु जीवणु ध्रिगु खाई ॥१॥

प्राणी गुरमुखि नामु धिआई ॥ हरि हरि क्रिपा करे गुरु मेले हरि हरि नामि समाई ॥१॥ रहाउ ॥

मनमुख जनमु भइआ है बिरथा आवत जात लजाई ॥ कामि क्रोधि डूबे अभिमानी हउमै विचि जलि जाई ॥ तिन सिधि न बुधि भई मति मधिम लोभ लहरि दुखु पाई ॥ गुर बिहून महा दुखु पाइआ जम पकरे बिललाई ॥२॥

हरि का नामु अगोचरु पाइआ गुरमुखि सहजि सुभाई ॥ नामु निधानु वसिआ घट अंतरि रसना हरि गुण गाई ॥ सदा अनंदि रहै दिनु राती एक सबदि लिव लाई ॥ नामु पदारथु सहजे पाइआ इह सतिगुर की वडिआई ॥३॥

सतिगुर ते हरि हरि मनि वसिआ सतिगुर कउ सद बलि जाई ॥ मनु तनु अरपि रखउ सभु आगै गुर चरणी चितु लाई ॥ अपणी क्रिपा करहु गुर पूरे आपे लैहु मिलाई ॥ हम लोह गुर नाव बोहिथा नानक पारि लंघाई ॥४॥७॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1265) मलार महला ४ पड़ताल घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि जन बोलत स्रीराम नामा मिलि साधसंगति हरि तोर ॥१॥ रहाउ ॥

हरि धनु बनजहु हरि धनु संचहु जिसु लागत है नही चोर ॥१॥

चात्रिक मोर बोलत दिनु राती सुनि घनिहर की घोर ॥२॥

जो बोलत है म्रिग मीन पंखेरू सु बिनु हरि जापत है नही होर ॥३॥

नानक जन हरि कीरति गाई छूटि गइओ जम का सभ सोर ॥४॥१॥८॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1265) मलार महला ४ ॥
राम राम बोलि बोलि खोजते बडभागी ॥ हरि का पंथु कोऊ बतावै हउ ता कै पाइ लागी ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हमारो मीतु सखाई हम हरि सिउ प्रीति लागी ॥ हरि हम गावहि हरि हम बोलहि अउरु दुतीआ प्रीति हम तिआगी ॥१॥

मनमोहन मोरो प्रीतम रामु हरि परमानंदु बैरागी ॥ हरि देखे जीवत है नानकु इक निमख पलो मुखि लागी ॥२॥२॥९॥९॥१३॥९॥३१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1266) रागु मलार महला ५ चउपदे घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किआ तू सोचहि किआ तू चितवहि किआ तूं करहि उपाए ॥ ता कउ कहहु परवाह काहू की जिह गोपाल सहाए ॥१॥

बरसै मेघु सखी घरि पाहुन आए ॥ मोहि दीन क्रिपा निधि ठाकुर नव निधि नामि समाए ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक प्रकार भोजन बहु कीए बहु बिंजन मिसटाए ॥ करी पाकसाल सोच पवित्रा हुणि लावहु भोगु हरि राए ॥२॥

दुसट बिदारे साजन रहसे इहि मंदिर घर अपनाए ॥ जउ ग्रिहि लालु रंगीओ आइआ तउ मै सभि सुख पाए ॥३॥

संत सभा ओट गुर पूरे धुरि मसतकि लेखु लिखाए ॥ जन नानक कंतु रंगीला पाइआ फिरि दूखु न लागै आए ॥४॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1266) मलार महला ५ ॥
खीर अधारि बारिकु जब होता बिनु खीरै रहनु न जाई ॥ सारि सम्हालि माता मुखि नीरै तब ओहु त्रिपति अघाई ॥१॥

हम बारिक पिता प्रभु दाता ॥ भूलहि बारिक अनिक लख बरीआ अन ठउर नाही जह जाता ॥१॥ रहाउ ॥

चंचल मति बारिक बपुरे की सरप अगनि कर मेलै ॥ माता पिता कंठि लाइ राखै अनद सहजि तब खेलै ॥२॥

जिस का पिता तू है मेरे सुआमी तिसु बारिक भूख कैसी ॥ नव निधि नामु निधानु ग्रिहि तेरै मनि बांछै सो लैसी ॥३॥

पिता क्रिपालि आगिआ इह दीनी बारिकु मुखि मांगै सो देना ॥ नानक बारिकु दरसु प्रभ चाहै मोहि ह्रिदै बसहि नित चरना ॥४॥२॥


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