Pt 2 - राग कानड़ा - बाणी शब्द, Part 2 - Raag Kanrha - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1306) कानड़ा मः ५ घरु ९ ॥
तां ते जापि मना हरि जापि ॥ जो संत बेद कहत पंथु गाखरो मोह मगन अहं ताप ॥ रहाउ ॥

जो राते माते संगि बपुरी माइआ मोह संताप ॥१॥

नामु जपत सोऊ जनु उधरै जिसहि उधारहु आप ॥ बिनसि जाइ मोह भै भरमा नानक संत प्रताप ॥२॥५॥४४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1307) कानड़ा महला ५ घरु १०
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ऐसो दानु देहु जी संतहु जात जीउ बलिहारि ॥ मान मोही पंच दोही उरझि निकटि बसिओ ताकी सरनि साधूआ दूत संगु निवारि ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि जनम जोनि भ्रमिओ हारि परिओ दुआरि ॥१॥

किरपा गोबिंद भई मिलिओ नामु अधारु ॥ दुलभ जनमु सफलु नानक भव उतारि पारि ॥२॥१॥४५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1307) कानड़ा महला ५ घरु ११
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सहज सुभाए आपन आए ॥ कछू न जानौ कछू दिखाए ॥ प्रभु मिलिओ सुख बाले भोले ॥१॥ रहाउ ॥

संजोगि मिलाए साध संगाए ॥ कतहू न जाए घरहि बसाए ॥ गुन निधानु प्रगटिओ इह चोलै ॥१॥

चरन लुभाए आन तजाए ॥ थान थनाए सरब समाए ॥ रसकि रसकि नानकु गुन बोलै ॥२॥१॥४६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1307) कानड़ा महला ५ ॥
गोबिंद ठाकुर मिलन दुराईं ॥ परमिति रूपु अगम अगोचर रहिओ सरब समाई ॥१॥ रहाउ ॥

कहनि भवनि नाही पाइओ पाइओ अनिक उकति चतुराई ॥१॥

जतन जतन अनिक उपाव रे तउ मिलिओ जउ किरपाई ॥ प्रभू दइआर क्रिपार क्रिपा निधि जन नानक संत रेनाई ॥२॥२॥४७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1307) कानड़ा महला ५ ॥
माई सिमरत राम राम राम ॥ प्रभ बिना नाही होरु ॥ चितवउ चरनारबिंद सासन निसि भोर ॥१॥ रहाउ ॥

लाइ प्रीति कीन आपन तूटत नही जोरु ॥ प्रान मनु धनु सरबसो हरि गुन निधे सुख मोर ॥१॥

ईत ऊत राम पूरनु निरखत रिद खोरि ॥ संत सरन तरन नानक बिनसिओ दुखु घोर ॥२॥३॥४८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1307) कानड़ा महला ५ ॥
जन को प्रभु संगे असनेहु ॥ साजनो तू मीतु मेरा ग्रिहि तेरै सभु केहु ॥१॥ रहाउ ॥

मानु मांगउ तानु मांगउ धनु लखमी सुत देह ॥१॥

मुकति जुगति भुगति पूरन परमानंद परम निधान ॥ भै भाइ भगति निहाल नानक सदा सदा कुरबान ॥२॥४॥४९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1308) कानड़ा महला ५ ॥
करत करत चरच चरच चरचरी ॥ जोग धिआन भेख गिआन फिरत फिरत धरत धरत धरचरी ॥१॥ रहाउ ॥

अहं अहं अहै अवर मूड़ मूड़ मूड़ बवरई ॥ जति जात जात जात सदा सदा सदा सदा काल हई ॥१॥

मानु मानु मानु तिआगि मिरतु मिरतु निकटि निकटि सदा हई ॥ हरि हरे हरे भाजु कहतु नानकु सुनहु रे मूड़ बिनु भजन भजन भजन अहिला जनमु गई ॥२॥५॥५०॥१२॥६२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1308) कानड़ा असटपदीआ महला ४ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जपि मन राम नामु सुखु पावैगो ॥ जिउ जिउ जपै तिवै सुखु पावै सतिगुरु सेवि समावैगो ॥१॥ रहाउ ॥

भगत जनां की खिनु खिनु लोचा नामु जपत सुखु पावैगो ॥ अन रस साद गए सभ नीकरि बिनु नावै किछु न सुखावैगो ॥१॥

गुरमति हरि हरि मीठा लागा गुरु मीठे बचन कढावैगो ॥ सतिगुर बाणी पुरखु पुरखोतम बाणी सिउ चितु लावैगो ॥२॥

गुरबाणी सुनत मेरा मनु द्रविआ मनु भीना निज घरि आवैगो ॥ तह अनहत धुनी बाजहि नित बाजे नीझर धार चुआवैगो ॥३॥

राम नामु इकु तिल तिल गावै मनु गुरमति नामि समावैगो ॥ नामु सुणै नामो मनि भावै नामे ही त्रिपतावैगो ॥४॥

कनिक कनिक पहिरे बहु कंगना कापरु भांति बनावैगो ॥ नाम बिना सभि फीक फिकाने जनमि मरै फिरि आवैगो ॥५॥

माइआ पटल पटल है भारी घरु घूमनि घेरि घुलावैगो ॥ पाप बिकार मनूर सभि भारे बिखु दुतरु तरिओ न जावैगो ॥६॥

भउ बैरागु भइआ है बोहिथु गुरु खेवटु सबदि तरावैगो ॥ राम नामु हरि भेटीऐ हरि रामै नामि समावैगो ॥७॥

अगिआनि लाइ सवालिआ गुर गिआनै लाइ जगावैगो ॥ नानक भाणै आपणै जिउ भावै तिवै चलावैगो ॥८॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1308) कानड़ा महला ४ ॥
जपि मन हरि हरि नामु तरावैगो ॥ जो जो जपै सोई गति पावै जिउ ध्रू प्रहिलादु समावैगो ॥१॥ रहाउ ॥

क्रिपा क्रिपा क्रिपा करि हरि जीउ करि किरपा नामि लगावैगो ॥ करि किरपा सतिगुरू मिलावहु मिलि सतिगुर नामु धिआवैगो ॥१॥

जनम जनम की हउमै मलु लागी मिलि संगति मलु लहि जावैगो ॥ जिउ लोहा तरिओ संगि कासट लगि सबदि गुरू हरि पावैगो ॥२॥

संगति संत मिलहु सतसंगति मिलि संगति हरि रसु आवैगो ॥ बिनु संगति करम करै अभिमानी कढि पाणी चीकड़ु पावैगो ॥३॥

भगत जना के हरि रखवारे जन हरि रसु मीठ लगावैगो ॥ खिनु खिनु नामु देइ वडिआई सतिगुर उपदेसि समावैगो ॥४॥

भगत जना कउ सदा निवि रहीऐ जन निवहि ता फल गुन पावैगो ॥ जो निंदा दुसट करहि भगता की हरनाखस जिउ पचि जावैगो ॥५॥

ब्रहम कमल पुतु मीन बिआसा तपु तापन पूज करावैगो ॥ जो जो भगतु होइ सो पूजहु भरमन भरमु चुकावैगो ॥६॥

जात नजाति देखि मत भरमहु सुक जनक पगीं लगि धिआवैगो ॥ जूठन जूठि पई सिर ऊपरि खिनु मनूआ तिलु न डुलावैगो ॥७॥

जनक जनक बैठे सिंघासनि नउ मुनी धूरि लै लावैगो ॥ नानक क्रिपा क्रिपा करि ठाकुर मै दासनि दास करावैगो ॥८॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1309) कानड़ा महला ४ ॥
मनु गुरमति रसि गुन गावैगो ॥ जिहवा एक होइ लख कोटी लख कोटी कोटि धिआवैगो ॥१॥ रहाउ ॥

सहस फनी जपिओ सेखनागै हरि जपतिआ अंतु न पावैगो ॥ तू अथाहु अति अगमु अगमु है मति गुरमति मनु ठहरावैगो ॥१॥

जिन तू जपिओ तेई जन नीके हरि जपतिअहु कउ सुखु पावैगो ॥ बिदर दासी सुतु छोक छोहरा क्रिसनु अंकि गलि लावैगो ॥२॥

जल ते ओपति भई है कासट कासट अंगि तरावैगो ॥ राम जना हरि आपि सवारे अपना बिरदु रखावैगो ॥३॥

हम पाथर लोह लोह बड पाथर गुर संगति नाव तरावैगो ॥ जिउ सतसंगति तरिओ जुलाहो संत जना मनि भावैगो ॥४॥

खरे खरोए बैठत ऊठत मारगि पंथि धिआवैगो ॥ सतिगुर बचन बचन है सतिगुर पाधरु मुकति जनावैगो ॥५॥

सासनि सासि सासि बलु पाई है निहसासनि नामु धिआवैगो ॥ गुर परसादी हउमै बूझै तौ गुरमति नामि समावैगो ॥६॥

सतिगुरु दाता जीअ जीअन को भागहीन नही भावैगो ॥ फिरि एह वेला हाथि न आवै परतापै पछुतावैगो ॥७॥

जे को भला लोड़ै भल अपना गुर आगै ढहि ढहि पावैगो ॥ नानक दइआ दइआ करि ठाकुर मै सतिगुर भसम लगावैगो ॥८॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1310) कानड़ा महला ४ ॥
मनु हरि रंगि राता गावैगो ॥ भै भै त्रास भए है निरमल गुरमति लागि लगावैगो ॥१॥ रहाउ ॥

हरि रंगि राता सद बैरागी हरि निकटि तिना घरि आवैगो ॥ तिन की पंक मिलै तां जीवा करि किरपा आपि दिवावैगो ॥१॥

दुबिधा लोभि लगे है प्राणी मनि कोरै रंगु न आवैगो ॥ फिरि उलटिओ जनमु होवै गुर बचनी गुरु पुरखु मिलै रंगु लावैगो ॥२॥

इंद्री दसे दसे फुनि धावत त्रै गुणीआ खिनु न टिकावैगो ॥ सतिगुर परचै वसगति आवै मोख मुकति सो पावैगो ॥३॥

ओअंकारि एको रवि रहिआ सभु एकस माहि समावैगो ॥ एको रूपु एको बहु रंगी सभु एकतु बचनि चलावैगो ॥४॥

गुरमुखि एको एकु पछाता गुरमुखि होइ लखावैगो ॥ गुरमुखि जाइ मिलै निज महली अनहद सबदु बजावैगो ॥५॥

जीअ जंत सभ सिसटि उपाई गुरमुखि सोभा पावैगो ॥ बिनु गुर भेटे को महलु न पावै आइ जाइ दुखु पावैगो ॥६॥

अनेक जनम विछुड़े मेरे प्रीतम करि किरपा गुरू मिलावैगो ॥ सतिगुर मिलत महा सुखु पाइआ मति मलीन बिगसावैगो ॥७॥

हरि हरि क्रिपा करहु जगजीवन मै सरधा नामि लगावैगो ॥ नानक गुरू गुरू है सतिगुरु मै सतिगुरु सरनि मिलावैगो ॥८॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1310) कानड़ा महला ४ ॥
मन गुरमति चाल चलावैगो ॥ जिउ मैगलु मसतु दीजै तलि कुंडे गुर अंकसु सबदु द्रिड़ावैगो ॥१॥ रहाउ ॥

चलतौ चलै चलै दह दह दिसि गुरु राखै हरि लिव लावैगो ॥ सतिगुरु सबदु देइ रिद अंतरि मुखि अम्रितु नामु चुआवैगो ॥१॥

बिसीअर बिसू भरे है पूरन गुरु गरुड़ सबदु मुखि पावैगो ॥ माइआ भुइअंग तिसु नेड़ि न आवै बिखु झारि झारि लिव लावैगो ॥२॥

सुआनु लोभु नगर महि सबला गुरु खिन महि मारि कढावैगो ॥ सतु संतोखु धरमु आनि राखे हरि नगरी हरि गुन गावैगो ॥३॥

पंकज मोह निघरतु है प्रानी गुरु निघरत काढि कढावैगो ॥ त्राहि त्राहि सरनि जन आए गुरु हाथी दे निकलावैगो ॥४॥

सुपनंतरु संसारु सभु बाजी सभु बाजी खेलु खिलावैगो ॥ लाहा नामु गुरमति लै चालहु हरि दरगह पैधा जावैगो ॥५॥

हउमै करै करावै हउमै पाप कोइले आनि जमावैगो ॥ आइआ कालु दुखदाई होए जो बीजे सो खवलावैगो ॥६॥

संतहु राम नामु धनु संचहु लै खरचु चले पति पावैगो ॥ खाइ खरचि देवहि बहुतेरा हरि देदे तोटि न आवैगो ॥७॥

राम नाम धनु है रिद अंतरि धनु गुर सरणाई पावैगो ॥ नानक दइआ दइआ करि दीनी दुखु दालदु भंजि समावैगो ॥८॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1311) कानड़ा महला ४ ॥
मनु सतिगुर सरनि धिआवैगो ॥ लोहा हिरनु होवै संगि पारस गुनु पारस को होइ आवैगो ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुरु महा पुरखु है पारसु जो लागै सो फलु पावैगो ॥ जिउ गुर उपदेसि तरे प्रहिलादा गुरु सेवक पैज रखावैगो ॥१॥

सतिगुर बचनु बचनु है नीको गुर बचनी अम्रितु पावैगो ॥ जिउ अ्मबरीकि अमरा पद पाए सतिगुर मुख बचन धिआवैगो ॥२॥

सतिगुर सरनि सरनि मनि भाई सुधा सुधा करि धिआवैगो ॥ दइआल दीन भए है सतिगुर हरि मारगु पंथु दिखावैगो ॥३॥

सतिगुर सरनि पए से थापे तिन राखन कउ प्रभु आवैगो ॥ जे को सरु संधै जन ऊपरि फिरि उलटो तिसै लगावैगो ॥४॥

हरि हरि हरि हरि हरि सरु सेवहि तिन दरगह मानु दिवावैगो ॥ गुरमति गुरमति गुरमति धिआवहि हरि गलि मिलि मेलि मिलावैगो ॥५॥

गुरमुखि नादु बेदु है गुरमुखि गुर परचै नामु धिआवैगो ॥ हरि हरि रूपु हरि रूपो होवै हरि जन कउ पूज करावैगो ॥६॥

साकत नर सतिगुरु नही कीआ ते बेमुख हरि भरमावैगो ॥ लोभ लहरि सुआन की संगति बिखु माइआ करंगि लगावैगो ॥७॥

राम नामु सभ जग का तारकु लगि संगति नामु धिआवैगो ॥ नानक राखु राखु प्रभ मेरे सतसंगति राखि समावैगो ॥८॥६॥ छका १ ॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1312) कानड़ा छंत महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
से उधरे जिन राम धिआए ॥ जतन माइआ के कामि न आए ॥ राम धिआए सभि फल पाए धनि धंनि ते बडभागीआ ॥ सतसंगि जागे नामि लागे एक सिउ लिव लागीआ ॥ तजि मान मोह बिकार साधू लगि तरउ तिन कै पाए ॥ बिनवंति नानक सरणि सुआमी बडभागि दरसनु पाए ॥१॥

मिलि साधू नित भजह नाराइण ॥ रसकि रसकि सुआमी गुण गाइण ॥ गुण गाइ जीवह हरि अमिउ पीवह जनम मरणा भागए ॥ सतसंगि पाईऐ हरि धिआईऐ बहुड़ि दूखु न लागए ॥ करि दइआ दाते पुरख बिधाते संत सेव कमाइण ॥ बिनवंति नानक जन धूरि बांछहि हरि दरसि सहजि समाइण ॥२॥

सगले जंत भजहु गोपालै ॥ जप तप संजम पूरन घालै ॥ नित भजहु सुआमी अंतरजामी सफल जनमु सबाइआ ॥ गोबिदु गाईऐ नित धिआईऐ परवाणु सोई आइआ ॥ जप ताप संजम हरि हरि निरंजन गोबिंद धनु संगि चालै ॥ बिनवंति नानक करि दइआ दीजै हरि रतनु बाधउ पालै ॥३॥

मंगलचार चोज आनंदा ॥ करि किरपा मिले परमानंदा ॥ प्रभ मिले सुआमी सुखहगामी इछ मन की पुंनीआ ॥ बजी बधाई सहजे समाई बहुड़ि दूखि न रुंनीआ ॥ ले कंठि लाए सुख दिखाए बिकार बिनसे मंदा ॥ बिनवंति नानक मिले सुआमी पुरख परमानंदा ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1312) कानड़े की वार महला ४ मूसे की वार की धुनी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक मः ४ ॥
राम नामु निधानु हरि गुरमति रखु उर धारि ॥ दासन दासा होइ रहु हउमै बिखिआ मारि ॥ जनमु पदारथु जीतिआ कदे न आवै हारि ॥ धनु धनु वडभागी नानका जिन गुरमति हरि रसु सारि ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1312) मः ४ ॥
गोविंदु गोविदु गोविदु हरि गोविदु गुणी निधानु ॥ गोविदु गोविदु गुरमति धिआईऐ तां दरगह पाईऐ मानु ॥ गोविदु गोविदु गोविदु जपि मुखु ऊजला परधानु ॥ नानक गुरु गोविंदु हरि जितु मिलि हरि पाइआ नामु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1313) पउड़ी ॥
तूं आपे ही सिध साधिको तू आपे ही जुग जोगीआ ॥ तू आपे ही रस रसीअड़ा तू आपे ही भोग भोगीआ ॥ तू आपे आपि वरतदा तू आपे करहि सु होगीआ ॥ सतसंगति सतिगुर धंनु धनो धंन धंन धनो जितु मिलि हरि बुलग बुलोगीआ ॥ सभि कहहु मुखहु हरि हरि हरे हरि हरि हरे हरि बोलत सभि पाप लहोगीआ ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1313) सलोक मः ४ ॥
हरि हरि हरि हरि नामु है गुरमुखि पावै कोइ ॥ हउमै ममता नासु होइ दुरमति कढै धोइ ॥ नानक अनदिनु गुण उचरै जिन कउ धुरि लिखिआ होइ ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1313) मः ४ ॥
हरि आपे आपि दइआलु हरि आपे करे सु होइ ॥ हरि आपे आपि वरतदा हरि जेवडु अवरु न कोइ ॥ जो हरि प्रभ भावै सो थीऐ जो हरि प्रभु करे सु होइ ॥ कीमति किनै न पाईआ बेअंतु प्रभू हरि सोइ ॥ नानक गुरमुखि हरि सालाहिआ तनु मनु सीतलु होइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1313) पउड़ी ॥
सभ जोति तेरी जगजीवना तू घटि घटि हरि रंग रंगना ॥ सभि धिआवहि तुधु मेरे प्रीतमा तू सति सति पुरख निरंजना ॥ इकु दाता सभु जगतु भिखारीआ हरि जाचहि सभ मंग मंगना ॥ सेवकु ठाकुरु सभु तूहै तूहै गुरमती हरि चंग चंगना ॥ सभि कहहु मुखहु रिखीकेसु हरे रिखीकेसु हरे जितु पावहि सभ फल फलना ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1313) सलोक मः ४ ॥
हरि हरि नामु धिआइ मन हरि दरगह पावहि मानु ॥ जो इछहि सो फलु पाइसी गुर सबदी लगै धिआनु ॥ किलविख पाप सभि कटीअहि हउमै चुकै गुमानु ॥ गुरमुखि कमलु विगसिआ सभु आतम ब्रहमु पछानु ॥ हरि हरि किरपा धारि प्रभ जन नानक जपि हरि नामु ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1313) मः ४ ॥
हरि हरि नामु पवितु है नामु जपत दुखु जाइ ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन मनि वसिआ आइ ॥ सतिगुर कै भाणै जो चलै तिन दालदु दुखु लहि जाइ ॥ आपणै भाणै किनै न पाइओ जन वेखहु मनि पतीआइ ॥ जनु नानकु दासन दासु है जो सतिगुर लागे पाइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1313) पउड़ी ॥
तूं थान थनंतरि भरपूरु हहि करते सभ तेरी बणत बणावणी ॥ रंग परंग सिसटि सभ साजी बहु बहु बिधि भांति उपावणी ॥ सभ तेरी जोति जोती विचि वरतहि गुरमती तुधै लावणी ॥ जिन होहि दइआलु तिन सतिगुरु मेलहि मुखि गुरमुखि हरि समझावणी ॥ सभि बोलहु राम रमो स्री राम रमो जितु दालदु दुख भुख सभ लहि जावणी ॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1314) सलोक मः ४ ॥
हरि हरि अम्रितु नाम रसु हरि अम्रितु हरि उर धारि ॥ विचि संगति हरि प्रभु वरतदा बुझहु सबद वीचारि ॥ मनि हरि हरि नामु धिआइआ बिखु हउमै कढी मारि ॥ जिन हरि हरि नामु न चेतिओ तिन जूऐ जनमु सभु हारि ॥ गुरि तुठै हरि चेताइआ हरि नामा हरि उर धारि ॥ जन नानक ते मुख उजले तितु सचै दरबारि ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1314) मः ४ ॥
हरि कीरति उतमु नामु है विचि कलिजुग करणी सारु ॥ मति गुरमति कीरति पाईऐ हरि नामा हरि उरि हारु ॥ वडभागी जिन हरि धिआइआ तिन सउपिआ हरि भंडारु ॥ बिनु नावै जि करम कमावणे नित हउमै होइ खुआरु ॥ जलि हसती मलि नावालीऐ सिरि भी फिरि पावै छारु ॥ हरि मेलहु सतिगुरु दइआ करि मनि वसै एकंकारु ॥ जिन गुरमुखि सुणि हरि मंनिआ जन नानक तिन जैकारु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1314) पउड़ी ॥
राम नामु वखरु है ऊतमु हरि नाइकु पुरखु हमारा ॥ हरि खेलु कीआ हरि आपे वरतै सभु जगतु कीआ वणजारा ॥ सभ जोति तेरी जोती विचि करते सभु सचु तेरा पासारा ॥ सभि धिआवहि तुधु सफल से गावहि गुरमती हरि निरंकारा ॥ सभि चवहु मुखहु जगंनाथु जगंनाथु जगजीवनो जितु भवजल पारि उतारा ॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1314) सलोक मः ४ ॥
हमरी जिहबा एक प्रभ हरि के गुण अगम अथाह ॥ हम किउ करि जपह इआणिआ हरि तुम वड अगम अगाह ॥ हरि देहु प्रभू मति ऊतमा गुर सतिगुर कै पगि पाह ॥ सतसंगति हरि मेलि प्रभ हम पापी संगि तराह ॥ जन नानक कउ हरि बखसि लैहु हरि तुठै मेलि मिलाह ॥ हरि किरपा करि सुणि बेनती हम पापी किरम तराह ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1314) मः ४ ॥
हरि करहु क्रिपा जगजीवना गुरु सतिगुरु मेलि दइआलु ॥ गुर सेवा हरि हम भाईआ हरि होआ हरि किरपालु ॥ सभ आसा मनसा विसरी मनि चूका आल जंजालु ॥ गुरि तुठै नामु द्रिड़ाइआ हम कीए सबदि निहालु ॥ जन नानकि अतुटु धनु पाइआ हरि नामा हरि धनु मालु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1315) पउड़ी ॥
हरि तुम्ह वड वडे वडे वड ऊचे सभ ऊपरि वडे वडौना ॥ जो धिआवहि हरि अपर्मपरु हरि हरि हरि धिआइ हरे ते होना ॥ जो गावहि सुणहि तेरा जसु सुआमी तिन काटे पाप कटोना ॥ तुम जैसे हरि पुरख जाने मति गुरमति मुखि वड वड भाग वडोना ॥ सभि धिआवहु आदि सते जुगादि सते परतखि सते सदा सदा सते जनु नानकु दासु दसोना ॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1315) सलोक मः ४ ॥
हमरे हरि जगजीवना हरि जपिओ हरि गुर मंत ॥ हरि अगमु अगोचरु अगमु हरि हरि मिलिआ आइ अचिंत ॥ हरि आपे घटि घटि वरतदा हरि आपे आपि बिअंत ॥ हरि आपे सभ रस भोगदा हरि आपे कवला कंत ॥ हरि आपे भिखिआ पाइदा सभ सिसटि उपाई जीअ जंत ॥ हरि देवहु दानु दइआल प्रभ हरि मांगहि हरि जन संत ॥ जन नानक के प्रभ आइ मिलु हम गावह हरि गुण छंत ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1315) मः ४ ॥
हरि प्रभु सजणु नामु हरि मै मनि तनि नामु सरीरि ॥ सभि आसा गुरमुखि पूरीआ जन नानक सुणि हरि धीर ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1315) पउड़ी ॥
हरि ऊतमु हरिआ नामु है हरि पुरखु निरंजनु मउला ॥ जो जपदे हरि हरि दिनसु राति तिन सेवे चरन नित कउला ॥ नित सारि समाल्हे सभ जीअ जंत हरि वसै निकटि सभ जउला ॥ सो बूझै जिसु आपि बुझाइसी जिसु सतिगुरु पुरखु प्रभु सउला ॥ सभि गावहु गुण गोविंद हरे गोविंद हरे गोविंद हरे गुण गावत गुणी समउला ॥६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1315) सलोक मः ४ ॥
सुतिआ हरि प्रभु चेति मनि हरि सहजि समाधि समाइ ॥ जन नानक हरि हरि चाउ मनि गुरु तुठा मेले माइ ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1315) मः ४ ॥
हरि इकसु सेती पिरहड़ी हरि इको मेरै चिति ॥ जन नानक इकु अधारु हरि प्रभ इकस ते गति पति ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1315) पउड़ी ॥
पंचे सबद वजे मति गुरमति वडभागी अनहदु वजिआ ॥ आनद मूलु रामु सभु देखिआ गुर सबदी गोविदु गजिआ ॥ आदि जुगादि वेसु हरि एको मति गुरमति हरि प्रभु भजिआ ॥ हरि देवहु दानु दइआल प्रभ जन राखहु हरि प्रभ लजिआ ॥ सभि धंनु कहहु गुरु सतिगुरू गुरु सतिगुरू जितु मिलि हरि पड़दा कजिआ ॥७॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1316) सलोकु मः ४ ॥
भगति सरोवरु उछलै सुभर भरे वहंनि ॥ जिना सतिगुरु मंनिआ जन नानक वड भाग लहंनि ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1316) मः ४ ॥
हरि हरि नाम असंख हरि हरि के गुन कथनु न जाहि ॥ हरि हरि अगमु अगाधि हरि जन कितु बिधि मिलहि मिलाहि ॥ हरि हरि जसु जपत जपंत जन इकु तिलु नही कीमति पाइ ॥ जन नानक हरि अगम प्रभ हरि मेलि लैहु लड़ि लाइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1316) पउड़ी ॥
हरि अगमु अगोचरु अगमु हरि किउ करि हरि दरसनु पिखा ॥ किछु वखरु होइ सु वरनीऐ तिसु रूपु न रिखा ॥ जिसु बुझाए आपि बुझाइ देइ सोई जनु दिखा ॥ सतसंगति सतिगुर चटसाल है जितु हरि गुण सिखा ॥ धनु धंनु सु रसना धंनु कर धंनु सु पाधा सतिगुरू जितु मिलि हरि लेखा लिखा ॥८॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1316) सलोक मः ४ ॥
हरि हरि नामु अम्रितु है हरि जपीऐ सतिगुर भाइ ॥ हरि हरि नामु पवितु है हरि जपत सुनत दुखु जाइ ॥ हरि नामु तिनी आराधिआ जिन मसतकि लिखिआ धुरि पाइ ॥ हरि दरगह जन पैनाईअनि जिन हरि मनि वसिआ आइ ॥ जन नानक ते मुख उजले जिन हरि सुणिआ मनि भाइ ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1316) मः ४ ॥
हरि हरि नामु निधानु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥ जिन धुरि मसतकि लिखिआ तिन सतिगुरु मिलिआ आइ ॥ तनु मनु सीतलु होइआ सांति वसी मनि आइ ॥ नानक हरि हरि चउदिआ सभु दालदु दुखु लहि जाइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1316) पउड़ी ॥
हउ वारिआ तिन कउ सदा सदा जिना सतिगुरु मेरा पिआरा देखिआ ॥ तिन कउ मिलिआ मेरा सतिगुरू जिन कउ धुरि मसतकि लेखिआ ॥ हरि अगमु धिआइआ गुरमती तिसु रूपु नही प्रभ रेखिआ ॥ गुर बचनि धिआइआ जिना अगमु हरि ते ठाकुर सेवक रलि एकिआ ॥ सभि कहहु मुखहु नर नरहरे नर नरहरे नर नरहरे हरि लाहा हरि भगति विसेखिआ ॥९॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1316) सलोक मः ४ ॥
राम नामु रमु रवि रहे रमु रामो रामु रमीति ॥ घटि घटि आतम रामु है प्रभि खेलु कीओ रंगि रीति ॥ हरि निकटि वसै जगजीवना परगासु कीओ गुर मीति ॥ हरि सुआमी हरि प्रभु तिन मिले जिन लिखिआ धुरि हरि प्रीति ॥ जन नानक नामु धिआइआ गुर बचनि जपिओ मनि चीति ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1317) मः ४ ॥
हरि प्रभु सजणु लोड़ि लहु भागि वसै वडभागि ॥ गुरि पूरै देखालिआ नानक हरि लिव लागि ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1317) पउड़ी ॥
धनु धनु सुहावी सफल घड़ी जितु हरि सेवा मनि भाणी ॥ हरि कथा सुणावहु मेरे गुरसिखहु मेरे हरि प्रभ अकथ कहाणी ॥ किउ पाईऐ किउ देखीऐ मेरा हरि प्रभु सुघड़ु सुजाणी ॥ हरि मेलि दिखाए आपि हरि गुर बचनी नामि समाणी ॥ तिन विटहु नानकु वारिआ जो जपदे हरि निरबाणी ॥१०॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1317) सलोक मः ४ ॥
हरि प्रभ रते लोइणा गिआन अंजनु गुरु देइ ॥ मै प्रभु सजणु पाइआ जन नानक सहजि मिलेइ ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1317) मः ४ ॥
गुरमुखि अंतरि सांति है मनि तनि नामि समाइ ॥ नामु चितवै नामो पड़ै नामि रहै लिव लाइ ॥ नामु पदारथु पाईऐ चिंता गई बिलाइ ॥ सतिगुरि मिलिऐ नामु ऊपजै त्रिसना भुख सभ जाइ ॥ नानक नामे रतिआ नामो पलै पाइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1317) पउड़ी ॥
तुधु आपे जगतु उपाइ कै तुधु आपे वसगति कीता ॥ इकि मनमुख करि हाराइअनु इकना मेलि गुरू तिना जीता ॥ हरि ऊतमु हरि प्रभ नामु है गुर बचनि सभागै लीता ॥ दुखु दालदु सभो लहि गइआ जां नाउ गुरू हरि दीता ॥ सभि सेवहु मोहनो मनमोहनो जगमोहनो जिनि जगतु उपाइ सभो वसि कीता ॥११॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1317) सलोक मः ४ ॥
मन अंतरि हउमै रोगु है भ्रमि भूले मनमुख दुरजना ॥ नानक रोगु वञाइ मिलि सतिगुर साधू सजना ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1317) मः ४ ॥
मनु तनु तामि सगारवा जां देखा हरि नैणे ॥ नानक सो प्रभु मै मिलै हउ जीवा सदु सुणे ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1317) पउड़ी ॥
जगंनाथ जगदीसर करते अपर्मपर पुरखु अतोलु ॥ हरि नामु धिआवहु मेरे गुरसिखहु हरि ऊतमु हरि नामु अमोलु ॥ जिन धिआइआ हिरदै दिनसु राति ते मिले नही हरि रोलु ॥ वडभागी संगति मिलै गुर सतिगुर पूरा बोलु ॥ सभि धिआवहु नर नाराइणो नाराइणो जितु चूका जम झगड़ु झगोलु ॥१२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1317) सलोक मः ४ ॥
हरि जन हरि हरि चउदिआ सरु संधिआ गावार ॥ नानक हरि जन हरि लिव उबरे जिन संधिआ तिसु फिरि मार ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1318) मः ४ ॥
अखी प्रेमि कसाईआ हरि हरि नामु पिखंन्हि ॥ जे करि दूजा देखदे जन नानक कढि दिचंन्हि ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1318) पउड़ी ॥
जलि थलि महीअलि पूरनो अपर्मपरु सोई ॥ जीअ जंत प्रतिपालदा जो करे सु होई ॥ मात पिता सुत भ्रात मीत तिसु बिनु नही कोई ॥ घटि घटि अंतरि रवि रहिआ जपिअहु जन कोई ॥ सगल जपहु गोपाल गुन परगटु सभ लोई ॥१३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1318) सलोक मः ४ ॥
गुरमुखि मिले सि सजणा हरि प्रभ पाइआ रंगु ॥ जन नानक नामु सलाहि तू लुडि लुडि दरगहि वंञु ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1318) मः ४ ॥
हरि तूहै दाता सभस दा सभि जीअ तुम्हारे ॥ सभि तुधै नो आराधदे दानु देहि पिआरे ॥ हरि दातै दातारि हथु कढिआ मीहु वुठा सैसारे ॥ अंनु जमिआ खेती भाउ करि हरि नामु सम्हारे ॥ जनु नानकु मंगै दानु प्रभ हरि नामु अधारे ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1318) पउड़ी ॥
इछा मन की पूरीऐ जपीऐ सुख सागरु ॥ हरि के चरन अराधीअहि गुर सबदि रतनागरु ॥ मिलि साधू संगि उधारु होइ फाटै जम कागरु ॥ जनम पदारथु जीतीऐ जपि हरि बैरागरु ॥ सभि पवहु सरनि सतिगुरू की बिनसै दुख दागरु ॥१४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1318) सलोक मः ४ ॥
हउ ढूंढेंदी सजणा सजणु मैडै नालि ॥ जन नानक अलखु न लखीऐ गुरमुखि देहि दिखालि ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1318) मः ४ ॥
नानक प्रीति लाई तिनि सचै तिसु बिनु रहणु न जाई ॥ सतिगुरु मिलै त पूरा पाईऐ हरि रसि रसन रसाई ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1318) पउड़ी ॥
कोई गावै को सुणै को उचरि सुनावै ॥ जनम जनम की मलु उतरै मन चिंदिआ पावै ॥ आवणु जाणा मेटीऐ हरि के गुण गावै ॥ आपि तरहि संगी तराहि सभ कुट्मबु तरावै ॥ जनु नानकु तिसु बलिहारणै जो मेरे हरि प्रभ भावै ॥१५॥१॥ सुधु ॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 1318) रागु कानड़ा बाणी नामदेव जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ऐसो राम राइ अंतरजामी ॥ जैसे दरपन माहि बदन परवानी ॥१॥ रहाउ ॥

बसै घटा घट लीप न छीपै ॥ बंधन मुकता जातु न दीसै ॥१॥

पानी माहि देखु मुखु जैसा ॥ नामे को सुआमी बीठलु ऐसा ॥२॥१॥


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