Pt 2 - राग धनासरी - बाणी शब्द, Part 2 - Raag Dhanasri - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 672) धनासरी मः ५ ॥
लवै न लागन कउ है कछूऐ जा कउ फिरि इहु धावै ॥ जा कउ गुरि दीनो इहु अम्रितु तिस ही कउ बनि आवै ॥१॥

जा कउ आइओ एकु रसा ॥ खान पान आन नही खुधिआ ता कै चिति न बसा ॥ रहाउ ॥

मउलिओ मनु तनु होइओ हरिआ एक बूंद जिनि पाई ॥ बरनि न साकउ उसतति ता की कीमति कहणु न जाई ॥२॥

घाल न मिलिओ सेव न मिलिओ मिलिओ आइ अचिंता ॥ जा कउ दइआ करी मेरै ठाकुरि तिनि गुरहि कमानो मंता ॥३॥

दीन दैआल सदा किरपाला सरब जीआ प्रतिपाला ॥ ओति पोति नानक संगि रविआ जिउ माता बाल गोपाला ॥४॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 672) धनासरी महला ५ ॥
बारि जाउ गुर अपुने ऊपरि जिनि हरि हरि नामु द्रिड़्हाया ॥ महा उदिआन अंधकार महि जिनि सीधा मारगु दिखाया ॥१॥

हमरे प्रान गुपाल गोबिंद ॥ ईहा ऊहा सरब थोक की जिसहि हमारी चिंद ॥१॥ रहाउ ॥

जा कै सिमरनि सरब निधाना मानु महतु पति पूरी ॥ नामु लैत कोटि अघ नासे भगत बाछहि सभि धूरी ॥२॥

सरब मनोरथ जे को चाहै सेवै एकु निधाना ॥ पारब्रहम अपर्मपर सुआमी सिमरत पारि पराना ॥३॥

सीतल सांति महा सुखु पाइआ संतसंगि रहिओ ओल्हा ॥ हरि धनु संचनु हरि नामु भोजनु इहु नानक कीनो चोल्हा ॥४॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 673) धनासरी महला ५ ॥
जिह करणी होवहि सरमिंदा इहा कमानी रीति ॥ संत की निंदा साकत की पूजा ऐसी द्रिड़्ही बिपरीति ॥१॥

माइआ मोह भूलो अवरै हीत ॥ हरिचंदउरी बन हर पात रे इहै तुहारो बीत ॥१॥ रहाउ ॥

चंदन लेप होत देह कउ सुखु गरधभ भसम संगीति ॥ अम्रित संगि नाहि रुच आवत बिखै ठगउरी प्रीति ॥२॥

उतम संत भले संजोगी इसु जुग महि पवित पुनीत ॥ जात अकारथ जनमु पदारथ काच बादरै जीत ॥३॥

जनम जनम के किलविख दुख भागे गुरि गिआन अंजनु नेत्र दीत ॥ साधसंगि इन दुख ते निकसिओ नानक एक परीत ॥४॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 673) धनासरी महला ५ ॥
पानी पखा पीसउ संत आगै गुण गोविंद जसु गाई ॥ सासि सासि मनु नामु सम्हारै इहु बिस्राम निधि पाई ॥१॥

तुम्ह करहु दइआ मेरे साई ॥ ऐसी मति दीजै मेरे ठाकुर सदा सदा तुधु धिआई ॥१॥ रहाउ ॥

तुम्हरी क्रिपा ते मोहु मानु छूटै बिनसि जाइ भरमाई ॥ अनद रूपु रविओ सभ मधे जत कत पेखउ जाई ॥२॥

तुम्ह दइआल किरपाल क्रिपा निधि पतित पावन गोसाई ॥ कोटि सूख आनंद राज पाए मुख ते निमख बुलाई ॥३॥

जाप ताप भगति सा पूरी जो प्रभ कै मनि भाई ॥ नामु जपत त्रिसना सभ बुझी है नानक त्रिपति अघाई ॥४॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 673) धनासरी महला ५ ॥
जिनि कीने वसि अपुनै त्रै गुण भवण चतुर संसारा ॥ जग इसनान ताप थान खंडे किआ इहु जंतु विचारा ॥१॥

प्रभ की ओट गही तउ छूटो ॥ साध प्रसादि हरि हरि हरि गाए बिखै बिआधि तब हूटो ॥१॥ रहाउ ॥

नह सुणीऐ नह मुख ते बकीऐ नह मोहै उह डीठी ॥ ऐसी ठगउरी पाइ भुलावै मनि सभ कै लागै मीठी ॥२॥

माइ बाप पूत हित भ्राता उनि घरि घरि मेलिओ दूआ ॥ किस ही वाधि घाटि किस ही पहि सगले लरि लरि मूआ ॥३॥

हउ बलिहारी सतिगुर अपुने जिनि इहु चलतु दिखाइआ ॥ गूझी भाहि जलै संसारा भगत न बिआपै माइआ ॥४॥

संत प्रसादि महा सुखु पाइआ सगले बंधन काटे ॥ हरि हरि नामु नानक धनु पाइआ अपुनै घरि लै आइआ खाटे ॥५॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 673) धनासरी महला ५ ॥
तुम दाते ठाकुर प्रतिपालक नाइक खसम हमारे ॥ निमख निमख तुम ही प्रतिपालहु हम बारिक तुमरे धारे ॥१॥

जिहवा एक कवन गुन कहीऐ ॥ बेसुमार बेअंत सुआमी तेरो अंतु न किन ही लहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि पराध हमारे खंडहु अनिक बिधी समझावहु ॥ हम अगिआन अलप मति थोरी तुम आपन बिरदु रखावहु ॥२॥

तुमरी सरणि तुमारी आसा तुम ही सजन सुहेले ॥ राखहु राखनहार दइआला नानक घर के गोले ॥३॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 674) धनासरी महला ५ ॥
पूजा वरत तिलक इसनाना पुंन दान बहु दैन ॥ कहूं न भीजै संजम सुआमी बोलहि मीठे बैन ॥१॥

प्रभ जी को नामु जपत मन चैन ॥ बहु प्रकार खोजहि सभि ता कउ बिखमु न जाई लैन ॥१॥ रहाउ ॥

जाप ताप भ्रमन बसुधा करि उरध ताप लै गैन ॥ इह बिधि नह पतीआनो ठाकुर जोग जुगति करि जैन ॥२॥

अम्रित नामु निरमोलकु हरि जसु तिनि पाइओ जिसु किरपैन ॥ साधसंगि रंगि प्रभ भेटे नानक सुखि जन रैन ॥३॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 674) धनासरी महला ५ ॥
बंधन ते छुटकावै प्रभू मिलावै हरि हरि नामु सुनावै ॥ असथिरु करे निहचलु इहु मनूआ बहुरि न कतहू धावै ॥१॥

है कोऊ ऐसो हमरा मीतु ॥ सगल समग्री जीउ हीउ देउ अरपउ अपनो चीतु ॥१॥ रहाउ ॥

पर धन पर तन पर की निंदा इन सिउ प्रीति न लागै ॥ संतह संगु संत स्मभाखनु हरि कीरतनि मनु जागै ॥२॥

गुण निधान दइआल पुरख प्रभ सरब सूख दइआला ॥ मागै दानु नामु तेरो नानकु जिउ माता बाल गुपाला ॥३॥१४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 674) धनासरी महला ५ ॥
हरि हरि लीने संत उबारि ॥ हरि के दास की चितवै बुरिआई तिस ही कउ फिरि मारि ॥१॥ रहाउ ॥

जन का आपि सहाई होआ निंदक भागे हारि ॥ भ्रमत भ्रमत ऊहां ही मूए बाहुड़ि ग्रिहि न मंझारि ॥१॥

नानक सरणि परिओ दुख भंजन गुन गावै सदा अपारि ॥ निंदक का मुखु काला होआ दीन दुनीआ कै दरबारि ॥२॥१५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 674) धनासिरी महला ५ ॥
अब हरि राखनहारु चितारिआ ॥ पतित पुनीत कीए खिन भीतरि सगला रोगु बिदारिआ ॥१॥ रहाउ ॥

गोसटि भई साध कै संगमि काम क्रोधु लोभु मारिआ ॥ सिमरि सिमरि पूरन नाराइन संगी सगले तारिआ ॥१॥

अउखध मंत्र मूल मन एकै मनि बिस्वासु प्रभ धारिआ ॥ चरन रेन बांछै नित नानकु पुनह पुनह बलिहारिआ ॥२॥१६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 675) धनासरी महला ५ ॥
मेरा लागो राम सिउ हेतु ॥ सतिगुरु मेरा सदा सहाई जिनि दुख का काटिआ केतु ॥१॥ रहाउ ॥

हाथ देइ राखिओ अपुना करि बिरथा सगल मिटाई ॥ निंदक के मुख काले कीने जन का आपि सहाई ॥१॥

साचा साहिबु होआ रखवाला राखि लीए कंठि लाइ ॥ निरभउ भए सदा सुख माणे नानक हरि गुण गाइ ॥२॥१७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 675) धनासिरी महला ५ ॥
अउखधु तेरो नामु दइआल ॥ मोहि आतुर तेरी गति नही जानी तूं आपि करहि प्रतिपाल ॥१॥ रहाउ ॥

धारि अनुग्रहु सुआमी मेरे दुतीआ भाउ निवारि ॥ बंधन काटि लेहु अपुने करि कबहू न आवह हारि ॥१॥

तेरी सरनि पइआ हउ जीवां तूं सम्रथु पुरखु मिहरवानु ॥ आठ पहर प्रभ कउ आराधी नानक सद कुरबानु ॥२॥१८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 675) रागु धनासरी महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हा हा प्रभ राखि लेहु ॥ हम ते किछू न होइ मेरे स्वामी करि किरपा अपुना नामु देहु ॥१॥ रहाउ ॥

अगनि कुट्मब सागर संसार ॥ भरम मोह अगिआन अंधार ॥१॥

ऊच नीच सूख दूख ॥ ध्रापसि नाही त्रिसना भूख ॥२॥

मनि बासना रचि बिखै बिआधि ॥ पंच दूत संगि महा असाध ॥३॥

जीअ जहानु प्रान धनु तेरा ॥ नानक जानु सदा हरि नेरा ॥४॥१॥१९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 675) धनासरी महला ५ ॥
दीन दरद निवारि ठाकुर राखै जन की आपि ॥ तरण तारण हरि निधि दूखु न सकै बिआपि ॥१॥

साधू संगि भजहु गुपाल ॥ आन संजम किछु न सूझै इह जतन काटि कलि काल ॥ रहाउ ॥

आदि अंति दइआल पूरन तिसु बिना नही कोइ ॥ जनम मरण निवारि हरि जपि सिमरि सुआमी सोइ ॥२॥

बेद सिम्रिति कथै सासत भगत करहि बीचारु ॥ मुकति पाईऐ साधसंगति बिनसि जाइ अंधारु ॥३॥

चरन कमल अधारु जन का रासि पूंजी एक ॥ ताणु माणु दीबाणु साचा नानक की प्रभ टेक ॥४॥२॥२०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 676) धनासरी महला ५ ॥
फिरत फिरत भेटे जन साधू पूरै गुरि समझाइआ ॥ आन सगल बिधि कांमि न आवै हरि हरि नामु धिआइआ ॥१॥

ता ते मोहि धारी ओट गोपाल ॥ सरनि परिओ पूरन परमेसुर बिनसे सगल जंजाल ॥ रहाउ ॥

सुरग मिरत पइआल भू मंडल सगल बिआपे माइ ॥ जीअ उधारन सभ कुल तारन हरि हरि नामु धिआइ ॥२॥

नानक नामु निरंजनु गाईऐ पाईऐ सरब निधाना ॥ करि किरपा जिसु देइ सुआमी बिरले काहू जाना ॥३॥३॥२१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 676) धनासरी महला ५ घरु २ चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
छोडि जाहि से करहि पराल ॥ कामि न आवहि से जंजाल ॥ संगि न चालहि तिन सिउ हीत ॥ जो बैराई सेई मीत ॥१॥

ऐसे भरमि भुले संसारा ॥ जनमु पदारथु खोइ गवारा ॥ रहाउ ॥

साचु धरमु नही भावै डीठा ॥ झूठ धोह सिउ रचिओ मीठा ॥ दाति पिआरी विसरिआ दातारा ॥ जाणै नाही मरणु विचारा ॥२॥

वसतु पराई कउ उठि रोवै ॥ करम धरम सगला ई खोवै ॥ हुकमु न बूझै आवण जाणे ॥ पाप करै ता पछोताणे ॥३॥

जो तुधु भावै सो परवाणु ॥ तेरे भाणे नो कुरबाणु ॥ नानकु गरीबु बंदा जनु तेरा ॥ राखि लेइ साहिबु प्रभु मेरा ॥४॥१॥२२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 676) धनासरी महला ५ ॥
मोहि मसकीन प्रभु नामु अधारु ॥ खाटण कउ हरि हरि रोजगारु ॥ संचण कउ हरि एको नामु ॥ हलति पलति ता कै आवै काम ॥१॥

नामि रते प्रभ रंगि अपार ॥ साध गावहि गुण एक निरंकार ॥ रहाउ ॥

साध की सोभा अति मसकीनी ॥ संत वडाई हरि जसु चीनी ॥ अनदु संतन कै भगति गोविंद ॥ सूखु संतन कै बिनसी चिंद ॥२॥

जह साध संतन होवहि इकत्र ॥ तह हरि जसु गावहि नाद कवित ॥ साध सभा महि अनद बिस्राम ॥ उन संगु सो पाए जिसु मसतकि कराम ॥३॥

दुइ कर जोड़ि करी अरदासि ॥ चरन पखारि कहां गुणतास ॥ प्रभ दइआल किरपाल हजूरि ॥ नानकु जीवै संता धूरि ॥४॥२॥२३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 677) धनासरी मः ५ ॥
सो कत डरै जि खसमु सम्हारै ॥ डरि डरि पचे मनमुख वेचारे ॥१॥ रहाउ ॥

सिर ऊपरि मात पिता गुरदेव ॥ सफल मूरति जा की निरमल सेव ॥ एकु निरंजनु जा की रासि ॥ मिलि साधसंगति होवत परगास ॥१॥

जीअन का दाता पूरन सभ ठाइ ॥ कोटि कलेस मिटहि हरि नाइ ॥ जनम मरन सगला दुखु नासै ॥ गुरमुखि जा कै मनि तनि बासै ॥२॥

जिस नो आपि लए लड़ि लाइ ॥ दरगह मिलै तिसै ही जाइ ॥ सेई भगत जि साचे भाणे ॥ जमकाल ते भए निकाणे ॥३॥

साचा साहिबु सचु दरबारु ॥ कीमति कउणु कहै बीचारु ॥ घटि घटि अंतरि सगल अधारु ॥ नानकु जाचै संत रेणारु ॥४॥३॥२४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 677) धनासरी महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
घरि बाहरि तेरा भरवासा तू जन कै है संगि ॥ करि किरपा प्रीतम प्रभ अपुने नामु जपउ हरि रंगि ॥१॥

जन कउ प्रभ अपने का ताणु ॥ जो तू करहि करावहि सुआमी सा मसलति परवाणु ॥ रहाउ ॥

पति परमेसरु गति नाराइणु धनु गुपाल गुण साखी ॥ चरन सरन नानक दास हरि हरि संती इह बिधि जाती ॥२॥१॥२५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 677) धनासरी महला ५ ॥
सगल मनोरथ प्रभ ते पाए कंठि लाइ गुरि राखे ॥ संसार सागर महि जलनि न दीने किनै न दुतरु भाखे ॥१॥

जिन कै मनि साचा बिस्वासु ॥ पेखि पेखि सुआमी की सोभा आनदु सदा उलासु ॥ रहाउ ॥

चरन सरनि पूरन परमेसुर अंतरजामी साखिओ ॥ जानि बूझि अपना कीओ नानक भगतन का अंकुरु राखिओ ॥२॥२॥२६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 677) धनासरी महला ५ ॥
जह जह पेखउ तह हजूरि दूरि कतहु न जाई ॥ रवि रहिआ सरबत्र मै मन सदा धिआई ॥१॥

ईत ऊत नही बीछुड़ै सो संगी गनीऐ ॥ बिनसि जाइ जो निमख महि सो अलप सुखु भनीऐ ॥ रहाउ ॥

प्रतिपालै अपिआउ देइ कछु ऊन न होई ॥ सासि सासि समालता मेरा प्रभु सोई ॥२॥

अछल अछेद अपार प्रभ ऊचा जा का रूपु ॥ जपि जपि करहि अनंदु जन अचरज आनूपु ॥३॥

सा मति देहु दइआल प्रभ जितु तुमहि अराधा ॥ नानकु मंगै दानु प्रभ रेन पग साधा ॥४॥३॥२७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 678) धनासरी महला ५ ॥
जिनि तुम भेजे तिनहि बुलाए सुख सहज सेती घरि आउ ॥ अनद मंगल गुन गाउ सहज धुनि निहचल राजु कमाउ ॥१॥

तुम घरि आवहु मेरे मीत ॥ तुमरे दोखी हरि आपि निवारे अपदा भई बितीत ॥ रहाउ ॥

प्रगट कीने प्रभ करनेहारे नासन भाजन थाके ॥ घरि मंगल वाजहि नित वाजे अपुनै खसमि निवाजे ॥२॥

असथिर रहहु डोलहु मत कबहू गुर कै बचनि अधारि ॥ जै जै कारु सगल भू मंडल मुख ऊजल दरबार ॥३॥

जिन के जीअ तिनै ही फेरे आपे भइआ सहाई ॥ अचरजु कीआ करनैहारै नानक सचु वडिआई ॥४॥४॥२८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 678) धनासरी महला ५ घरु ६
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुनहु संत पिआरे बिनउ हमारे जीउ ॥ हरि बिनु मुकति न काहू जीउ ॥ रहाउ ॥

मन निरमल करम करि तारन तरन हरि अवरि जंजाल तेरै काहू न काम जीउ ॥ जीवन देवा पारब्रहम सेवा इहु उपदेसु मो कउ गुरि दीना जीउ ॥१॥

तिसु सिउ न लाईऐ हीतु जा को किछु नाही बीतु अंत की बार ओहु संगि न चालै ॥ मनि तनि तू आराध हरि के प्रीतम साध जा कै संगि तेरे बंधन छूटै ॥२॥

गहु पारब्रहम सरन हिरदै कमल चरन अवर आस कछु पटलु न कीजै ॥ सोई भगतु गिआनी धिआनी तपा सोई नानक जा कउ किरपा कीजै ॥३॥१॥२९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 678) धनासरी महला ५ ॥
मेरे लाल भलो रे भलो रे भलो हरि मंगना ॥ देखहु पसारि नैन सुनहु साधू के बैन प्रानपति चिति राखु सगल है मरना ॥ रहाउ ॥

चंदन चोआ रस भोग करत अनेकै बिखिआ बिकार देखु सगल है फीके एकै गोबिद को नामु नीको कहत है साध जन ॥ तनु धनु आपन थापिओ हरि जपु न निमख जापिओ अरथु द्रबु देखु कछु संगि नाही चलना ॥१॥

जा को रे करमु भला तिनि ओट गही संत पला तिन नाही रे जमु संतावै साधू की संगना ॥ पाइओ रे परम निधानु मिटिओ है अभिमानु एकै निरंकार नानक मनु लगना ॥२॥२॥३०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 679) धनासरी महला ५ घरु ७
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि एकु सिमरि एकु सिमरि एकु सिमरि पिआरे ॥ कलि कलेस लोभ मोह महा भउजलु तारे ॥ रहाउ ॥

सासि सासि निमख निमख दिनसु रैनि चितारे ॥ साधसंग जपि निसंग मनि निधानु धारे ॥१॥

चरन कमल नमसकार गुन गोबिद बीचारे ॥ साध जना की रेन नानक मंगल सूख सधारे ॥२॥१॥३१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 679) धनासरी महला ५ घरु ८ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिमरउ सिमरि सिमरि सुख पावउ सासि सासि समाले ॥ इह लोकि परलोकि संगि सहाई जत कत मोहि रखवाले ॥१॥

गुर का बचनु बसै जीअ नाले ॥ जलि नही डूबै तसकरु नही लेवै भाहि न साकै जाले ॥१॥ रहाउ ॥

निरधन कउ धनु अंधुले कउ टिक मात दूधु जैसे बाले ॥ सागर महि बोहिथु पाइओ हरि नानक करी क्रिपा किरपाले ॥२॥१॥३२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 679) धनासरी महला ५ ॥
भए क्रिपाल दइआल गोबिंदा अम्रितु रिदै सिंचाई ॥ नव निधि रिधि सिधि हरि लागि रही जन पाई ॥१॥

संतन कउ अनदु सगल ही जाई ॥ ग्रिहि बाहरि ठाकुरु भगतन का रवि रहिआ स्रब ठाई ॥१॥ रहाउ ॥

ता कउ कोइ न पहुचनहारा जा कै अंगि गुसाई ॥ जम की त्रास मिटै जिसु सिमरत नानक नामु धिआई ॥२॥२॥३३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 679) धनासरी महला ५ ॥
दरबवंतु दरबु देखि गरबै भूमवंतु अभिमानी ॥ राजा जानै सगल राजु हमरा तिउ हरि जन टेक सुआमी ॥१॥

जे कोऊ अपुनी ओट समारै ॥ जैसा बितु तैसा होइ वरतै अपुना बलु नही हारै ॥१॥ रहाउ ॥

आन तिआगि भए इक आसर सरणि सरणि करि आए ॥ संत अनुग्रह भए मन निरमल नानक हरि गुन गाए ॥२॥३॥३४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 679) धनासरी महला ५ ॥
जा कउ हरि रंगु लागो इसु जुग महि सो कहीअत है सूरा ॥ आतम जिणै सगल वसि ता कै जा का सतिगुरु पूरा ॥१॥

ठाकुरु गाईऐ आतम रंगि ॥ सरणी पावन नाम धिआवन सहजि समावन संगि ॥१॥ रहाउ ॥

जन के चरन वसहि मेरै हीअरै संगि पुनीता देही ॥ जन की धूरि देहु किरपा निधि नानक कै सुखु एही ॥२॥४॥३५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 680) धनासरी महला ५ ॥
जतन करै मानुख डहकावै ओहु अंतरजामी जानै ॥ पाप करे करि मूकरि पावै भेख करै निरबानै ॥१॥

जानत दूरि तुमहि प्रभ नेरि ॥ उत ताकै उत ते उत पेखै आवै लोभी फेरि ॥ रहाउ ॥

जब लगु तुटै नाही मन भरमा तब लगु मुकतु न कोई ॥ कहु नानक दइआल सुआमी संतु भगतु जनु सोई ॥२॥५॥३६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 680) धनासरी महला ५ ॥
नामु गुरि दीओ है अपुनै जा कै मसतकि करमा ॥ नामु द्रिड़ावै नामु जपावै ता का जुग महि धरमा ॥१॥

जन कउ नामु वडाई सोभ ॥ नामो गति नामो पति जन की मानै जो जो होग ॥१॥ रहाउ ॥

नाम धनु जिसु जन कै पालै सोई पूरा साहा ॥ नामु बिउहारा नानक आधारा नामु परापति लाहा ॥२॥६॥३७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 680) धनासरी महला ५ ॥
नेत्र पुनीत भए दरस पेखे माथै परउ रवाल ॥ रसि रसि गुण गावउ ठाकुर के मोरै हिरदै बसहु गोपाल ॥१॥

तुम तउ राखनहार दइआल ॥ सुंदर सुघर बेअंत पिता प्रभ होहु प्रभू किरपाल ॥१॥ रहाउ ॥

महा अनंद मंगल रूप तुमरे बचन अनूप रसाल ॥ हिरदै चरण सबदु सतिगुर को नानक बांधिओ पाल ॥२॥७॥३८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 680) धनासरी महला ५ ॥
अपनी उकति खलावै भोजन अपनी उकति खेलावै ॥ सरब सूख भोग रस देवै मन ही नालि समावै ॥१॥

हमरे पिता गोपाल दइआल ॥ जिउ राखै महतारी बारिक कउ तैसे ही प्रभ पाल ॥१॥ रहाउ ॥

मीत साजन सरब गुण नाइक सदा सलामति देवा ॥ ईत ऊत जत कत तत तुम ही मिलै नानक संत सेवा ॥२॥८॥३९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 680) धनासरी महला ५ ॥
संत क्रिपाल दइआल दमोदर काम क्रोध बिखु जारे ॥ राजु मालु जोबनु तनु जीअरा इन ऊपरि लै बारे ॥१॥

मनि तनि राम नाम हितकारे ॥ सूख सहज आनंद मंगल सहित भव निधि पारि उतारे ॥ रहाउ ॥

धंनि सु थानु धंनि ओइ भवना जा महि संत बसारे ॥ जन नानक की सरधा पूरहु ठाकुर भगत तेरे नमसकारे ॥२॥९॥४०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 681) धनासरी महला ५ ॥
छडाइ लीओ महा बली ते अपने चरन पराति ॥ एकु नामु दीओ मन मंता बिनसि न कतहू जाति ॥१॥

सतिगुरि पूरै कीनी दाति ॥ हरि हरि नामु दीओ कीरतन कउ भई हमारी गाति ॥ रहाउ ॥

अंगीकारु कीओ प्रभि अपुनै भगतन की राखी पाति ॥ नानक चरन गहे प्रभ अपने सुखु पाइओ दिन राति ॥२॥१०॥४१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 681) धनासरी महला ५ ॥
पर हरना लोभु झूठ निंद इव ही करत गुदारी ॥ म्रिग त्रिसना आस मिथिआ मीठी इह टेक मनहि साधारी ॥१॥

साकत की आवरदा जाइ ब्रिथारी ॥ जैसे कागद के भार मूसा टूकि गवावत कामि नही गावारी ॥ रहाउ ॥

करि किरपा पारब्रहम सुआमी इह बंधन छुटकारी ॥ बूडत अंध नानक प्रभ काढत साध जना संगारी ॥२॥११॥४२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 681) धनासरी महला ५ ॥
सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपना सीतल तनु मनु छाती ॥ रूप रंग सूख धनु जीअ का पारब्रहम मोरै जाती ॥१॥

रसना राम रसाइनि माती ॥ रंग रंगी राम अपने कै चरन कमल निधि थाती ॥ रहाउ ॥

जिस का सा तिन ही रखि लीआ पूरन प्रभ की भाती ॥ मेलि लीओ आपे सुखदातै नानक हरि राखी पाती ॥२॥१२॥४३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 681) धनासरी महला ५ ॥
दूत दुसमन सभि तुझ ते निवरहि प्रगट प्रतापु तुमारा ॥ जो जो तेरे भगत दुखाए ओहु ततकाल तुम मारा ॥१॥

निरखउ तुमरी ओरि हरि नीत ॥ मुरारि सहाइ होहु दास कउ करु गहि उधरहु मीत ॥ रहाउ ॥

सुणी बेनती ठाकुरि मेरै खसमाना करि आपि ॥ नानक अनद भए दुख भागे सदा सदा हरि जापि ॥२॥१३॥४४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 681) धनासरी महला ५ ॥
चतुर दिसा कीनो बलु अपना सिर ऊपरि करु धारिओ ॥ क्रिपा कटाख्य अवलोकनु कीनो दास का दूखु बिदारिओ ॥१॥

हरि जन राखे गुर गोविंद ॥ कंठि लाइ अवगुण सभि मेटे दइआल पुरख बखसंद ॥ रहाउ ॥

जो मागहि ठाकुर अपुने ते सोई सोई देवै ॥ नानक दासु मुख ते जो बोलै ईहा ऊहा सचु होवै ॥२॥१४॥४५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 682) धनासरी महला ५ ॥
अउखी घड़ी न देखण देई अपना बिरदु समाले ॥ हाथ देइ राखै अपने कउ सासि सासि प्रतिपाले ॥१॥

प्रभ सिउ लागि रहिओ मेरा चीतु ॥ आदि अंति प्रभु सदा सहाई धंनु हमारा मीतु ॥ रहाउ ॥

मनि बिलास भए साहिब के अचरज देखि बडाई ॥ हरि सिमरि सिमरि आनद करि नानक प्रभि पूरन पैज रखाई ॥२॥१५॥४६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 682) धनासरी महला ५ ॥
जिस कउ बिसरै प्रानपति दाता सोई गनहु अभागा ॥ चरन कमल जा का मनु रागिओ अमिअ सरोवर पागा ॥१॥

तेरा जनु राम नाम रंगि जागा ॥ आलसु छीजि गइआ सभु तन ते प्रीतम सिउ मनु लागा ॥ रहाउ ॥

जह जह पेखउ तह नाराइण सगल घटा महि तागा ॥ नाम उदकु पीवत जन नानक तिआगे सभि अनुरागा ॥२॥१६॥४७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 682) धनासरी महला ५ ॥
जन के पूरन होए काम ॥ कली काल महा बिखिआ महि लजा राखी राम ॥१॥ रहाउ ॥

सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपुना निकटि न आवै जाम ॥ मुकति बैकुंठ साध की संगति जन पाइओ हरि का धाम ॥१॥

चरन कमल हरि जन की थाती कोटि सूख बिस्राम ॥ गोबिंदु दमोदर सिमरउ दिन रैनि नानक सद कुरबान ॥२॥१७॥४८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 682) धनासरी महला ५ ॥
मांगउ राम ते इकु दानु ॥ सगल मनोरथ पूरन होवहि सिमरउ तुमरा नामु ॥१॥ रहाउ ॥

चरन तुम्हारे हिरदै वासहि संतन का संगु पावउ ॥ सोग अगनि महि मनु न विआपै आठ पहर गुण गावउ ॥१॥

स्वसति बिवसथा हरि की सेवा मध्यंत प्रभ जापण ॥ नानक रंगु लगा परमेसर बाहुड़ि जनम न छापण ॥२॥१८॥४९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 682) धनासरी महला ५ ॥
मांगउ राम ते सभि थोक ॥ मानुख कउ जाचत स्रमु पाईऐ प्रभ कै सिमरनि मोख ॥१॥ रहाउ ॥

घोखे मुनि जन सिम्रिति पुरानां बेद पुकारहि घोख ॥ क्रिपा सिंधु सेवि सचु पाईऐ दोवै सुहेले लोक ॥१॥

आन अचार बिउहार है जेते बिनु हरि सिमरन फोक ॥ नानक जनम मरण भै काटे मिलि साधू बिनसे सोक ॥२॥१९॥५०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 682) धनासरी महला ५ ॥
त्रिसना बुझै हरि कै नामि ॥ महा संतोखु होवै गुर बचनी प्रभ सिउ लागै पूरन धिआनु ॥१॥ रहाउ ॥

महा कलोल बुझहि माइआ के करि किरपा मेरे दीन दइआल ॥ अपणा नामु देहि जपि जीवा पूरन होइ दास की घाल ॥१॥

सरब मनोरथ राज सूख रस सद खुसीआ कीरतनु जपि नाम ॥ जिस कै करमि लिखिआ धुरि करतै नानक जन के पूरन काम ॥२॥२०॥५१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 683) धनासरी मः ५ ॥
जन की कीनी पारब्रहमि सार ॥ निंदक टिकनु न पावनि मूले ऊडि गए बेकार ॥१॥ रहाउ ॥

जह जह देखउ तह तह सुआमी कोइ न पहुचनहार ॥ जो जो करै अवगिआ जन की होइ गइआ तत छार ॥१॥

करनहारु रखवाला होआ जा का अंतु न पारावार ॥ नानक दास रखे प्रभि अपुनै निंदक काढे मारि ॥२॥२१॥५२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 683) धनासरी महला ५ घरु ९ पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि चरन सरन गोबिंद दुख भंजना दास अपुने कउ नामु देवहु ॥ द्रिसटि प्रभ धारहु क्रिपा करि तारहु भुजा गहि कूप ते काढि लेवहु ॥ रहाउ ॥

काम क्रोध करि अंध माइआ के बंध अनिक दोखा तनि छादि पूरे ॥ प्रभ बिना आन न राखनहारा नामु सिमरावहु सरनि सूरे ॥१॥

पतित उधारणा जीअ जंत तारणा बेद उचार नही अंतु पाइओ ॥ गुणह सुख सागरा ब्रहम रतनागरा भगति वछलु नानक गाइओ ॥२॥१॥५३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 683) धनासरी महला ५ ॥
हलति सुखु पलति सुखु नित सुखु सिमरनो नामु गोबिंद का सदा लीजै ॥ मिटहि कमाणे पाप चिराणे साधसंगति मिलि मुआ जीजै ॥१॥ रहाउ ॥

राज जोबन बिसरंत हरि माइआ महा दुखु एहु महांत कहै ॥ आस पिआस रमण हरि कीरतन एहु पदारथु भागवंतु लहै ॥१॥

सरणि समरथ अकथ अगोचरा पतित उधारण नामु तेरा ॥ अंतरजामी नानक के सुआमी सरबत पूरन ठाकुरु मेरा ॥२॥२॥५४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 683) धनासरी महला ५ घरु १२
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बंदना हरि बंदना गुण गावहु गोपाल राइ ॥ रहाउ ॥

वडै भागि भेटे गुरदेवा ॥ कोटि पराध मिटे हरि सेवा ॥१॥

चरन कमल जा का मनु रापै ॥ सोग अगनि तिसु जन न बिआपै ॥२॥

सागरु तरिआ साधू संगे ॥ निरभउ नामु जपहु हरि रंगे ॥३॥

पर धन दोख किछु पाप न फेड़े ॥ जम जंदारु न आवै नेड़े ॥४॥

त्रिसना अगनि प्रभि आपि बुझाई ॥ नानक उधरे प्रभ सरणाई ॥५॥१॥५५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 684) धनासरी महला ५ ॥
त्रिपति भई सचु भोजनु खाइआ ॥ मनि तनि रसना नामु धिआइआ ॥१॥

जीवना हरि जीवना ॥ जीवनु हरि जपि साधसंगि ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक प्रकारी बसत्र ओढाए ॥ अनदिनु कीरतनु हरि गुन गाए ॥२॥

हसती रथ असु असवारी ॥ हरि का मारगु रिदै निहारी ॥३॥

मन तन अंतरि चरन धिआइआ ॥ हरि सुख निधान नानक दासि पाइआ ॥४॥२॥५६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 684) धनासरी महला ५ ॥
गुर के चरन जीअ का निसतारा ॥ समुंदु सागरु जिनि खिन महि तारा ॥१॥ रहाउ ॥

कोई होआ क्रम रतु कोई तीरथ नाइआ ॥ दासीं हरि का नामु धिआइआ ॥१॥

बंधन काटनहारु सुआमी ॥ जन नानकु सिमरै अंतरजामी ॥२॥३॥५७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 684) धनासरी महला ५ ॥
कितै प्रकारि न तूटउ प्रीति ॥ दास तेरे की निरमल रीति ॥१॥ रहाउ ॥

जीअ प्रान मन धन ते पिआरा ॥ हउमै बंधु हरि देवणहारा ॥१॥

चरन कमल सिउ लागउ नेहु ॥ नानक की बेनंती एह ॥२॥४॥५८॥


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates