Pt 4 - भक्त कबीर जी - सलोक दोहे बाणी शब्द, Part 4 - Bhagat Kabir ji - Slok Dohe Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग गोंड -- SGGS 870) रागु गोंड बाणी भगता की ॥
कबीर जी घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
संतु मिलै किछु सुनीऐ कहीऐ ॥ मिलै असंतु मसटि करि रहीऐ ॥१॥

बाबा बोलना किआ कहीऐ ॥ जैसे राम नाम रवि रहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

संतन सिउ बोले उपकारी ॥ मूरख सिउ बोले झख मारी ॥२॥

बोलत बोलत बढहि बिकारा ॥ बिनु बोले किआ करहि बीचारा ॥३॥

कहु कबीर छूछा घटु बोलै ॥ भरिआ होइ सु कबहु न डोलै ॥४॥१॥

(राग गोंड -- SGGS 870) गोंड ॥
नरू मरै नरु कामि न आवै ॥ पसू मरै दस काज सवारै ॥१॥

अपने करम की गति मै किआ जानउ ॥ मै किआ जानउ बाबा रे ॥१॥ रहाउ ॥

हाड जले जैसे लकरी का तूला ॥ केस जले जैसे घास का पूला ॥२॥

कहु कबीर तब ही नरु जागै ॥ जम का डंडु मूंड महि लागै ॥३॥२॥

(राग गोंड -- SGGS 870) गोंड ॥
आकासि गगनु पातालि गगनु है चहु दिसि गगनु रहाइले ॥ आनद मूलु सदा पुरखोतमु घटु बिनसै गगनु न जाइले ॥१॥

मोहि बैरागु भइओ ॥ इहु जीउ आइ कहा गइओ ॥१॥ रहाउ ॥

पंच ततु मिलि काइआ कीन्ही ततु कहा ते कीनु रे ॥ करम बध तुम जीउ कहत हौ करमहि किनि जीउ दीनु रे ॥२॥

हरि महि तनु है तन महि हरि है सरब निरंतरि सोइ रे ॥ कहि कबीर राम नामु न छोडउ सहजे होइ सु होइ रे ॥३॥३॥

(राग गोंड -- SGGS 870) रागु गोंड बाणी कबीर जीउ की घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भुजा बांधि भिला करि डारिओ ॥ हसती क्रोपि मूंड महि मारिओ ॥ हसति भागि कै चीसा मारै ॥ इआ मूरति कै हउ बलिहारै ॥१॥

आहि मेरे ठाकुर तुमरा जोरु ॥ काजी बकिबो हसती तोरु ॥१॥ रहाउ ॥

रे महावत तुझु डारउ काटि ॥ इसहि तुरावहु घालहु साटि ॥ हसति न तोरै धरै धिआनु ॥ वा कै रिदै बसै भगवानु ॥२॥

किआ अपराधु संत है कीन्हा ॥ बांधि पोट कुंचर कउ दीन्हा ॥ कुंचरु पोट लै लै नमसकारै ॥ बूझी नही काजी अंधिआरै ॥३॥

तीनि बार पतीआ भरि लीना ॥ मन कठोरु अजहू न पतीना ॥ कहि कबीर हमरा गोबिंदु ॥ चउथे पद महि जन की जिंदु ॥४॥१॥४॥

(राग गोंड -- SGGS 871) गोंड ॥
ना इहु मानसु ना इहु देउ ॥ ना इहु जती कहावै सेउ ॥ ना इहु जोगी ना अवधूता ॥ ना इसु माइ न काहू पूता ॥१॥

इआ मंदर महि कौन बसाई ॥ ता का अंतु न कोऊ पाई ॥१॥ रहाउ ॥

ना इहु गिरही ना ओदासी ॥ ना इहु राज न भीख मंगासी ॥ ना इसु पिंडु न रकतू राती ॥ ना इहु ब्रहमनु ना इहु खाती ॥२॥

ना इहु तपा कहावै सेखु ॥ ना इहु जीवै न मरता देखु ॥ इसु मरते कउ जे कोऊ रोवै ॥ जो रोवै सोई पति खोवै ॥३॥

गुर प्रसादि मै डगरो पाइआ ॥ जीवन मरनु दोऊ मिटवाइआ ॥ कहु कबीर इहु राम की अंसु ॥ जस कागद पर मिटै न मंसु ॥४॥२॥५॥

(राग गोंड -- SGGS 871) गोंड ॥
तूटे तागे निखुटी पानि ॥ दुआर ऊपरि झिलकावहि कान ॥ कूच बिचारे फूए फाल ॥ इआ मुंडीआ सिरि चढिबो काल ॥१॥

इहु मुंडीआ सगलो द्रबु खोई ॥ आवत जात नाक सर होई ॥१॥ रहाउ ॥

तुरी नारि की छोडी बाता ॥ राम नाम वा का मनु राता ॥ लरिकी लरिकन खैबो नाहि ॥ मुंडीआ अनदिनु धापे जाहि ॥२॥

इक दुइ मंदरि इक दुइ बाट ॥ हम कउ साथरु उन कउ खाट ॥ मूड पलोसि कमर बधि पोथी ॥ हम कउ चाबनु उन कउ रोटी ॥३॥

मुंडीआ मुंडीआ हूए एक ॥ ए मुंडीआ बूडत की टेक ॥ सुनि अंधली लोई बेपीरि ॥ इन्ह मुंडीअन भजि सरनि कबीर ॥४॥३॥६॥

(राग गोंड -- SGGS 871) गोंड ॥
खसमु मरै तउ नारि न रोवै ॥ उसु रखवारा अउरो होवै ॥ रखवारे का होइ बिनास ॥ आगै नरकु ईहा भोग बिलास ॥१॥

एक सुहागनि जगत पिआरी ॥ सगले जीअ जंत की नारी ॥१॥ रहाउ ॥

सोहागनि गलि सोहै हारु ॥ संत कउ बिखु बिगसै संसारु ॥ करि सीगारु बहै पखिआरी ॥ संत की ठिठकी फिरै बिचारी ॥२॥

संत भागि ओह पाछै परै ॥ गुर परसादी मारहु डरै ॥ साकत की ओह पिंड पराइणि ॥ हम कउ द्रिसटि परै त्रखि डाइणि ॥३॥

हम तिस का बहु जानिआ भेउ ॥ जब हूए क्रिपाल मिले गुरदेउ ॥ कहु कबीर अब बाहरि परी ॥ संसारै कै अंचलि लरी ॥४॥४॥७॥

(राग गोंड -- SGGS 872) गोंड ॥
ग्रिहि सोभा जा कै रे नाहि ॥ आवत पहीआ खूधे जाहि ॥ वा कै अंतरि नही संतोखु ॥ बिनु सोहागनि लागै दोखु ॥१॥

धनु सोहागनि महा पवीत ॥ तपे तपीसर डोलै चीत ॥१॥ रहाउ ॥

सोहागनि किरपन की पूती ॥ सेवक तजि जगत सिउ सूती ॥ साधू कै ठाढी दरबारि ॥ सरनि तेरी मो कउ निसतारि ॥२॥

सोहागनि है अति सुंदरी ॥ पग नेवर छनक छनहरी ॥ जउ लगु प्रान तऊ लगु संगे ॥ नाहि त चली बेगि उठि नंगे ॥३॥

सोहागनि भवन त्रै लीआ ॥ दस अठ पुराण तीरथ रस कीआ ॥ ब्रहमा बिसनु महेसर बेधे ॥ बडे भूपति राजे है छेधे ॥४॥

सोहागनि उरवारि न पारि ॥ पांच नारद कै संगि बिधवारि ॥ पांच नारद के मिटवे फूटे ॥ कहु कबीर गुर किरपा छूटे ॥५॥५॥८॥

(राग गोंड -- SGGS 872) गोंड ॥
जैसे मंदर महि बलहर ना ठाहरै ॥ नाम बिना कैसे पारि उतरै ॥ कु्मभ बिना जलु ना टीकावै ॥ साधू बिनु ऐसे अबगतु जावै ॥१॥

जारउ तिसै जु रामु न चेतै ॥ तन मन रमत रहै महि खेतै ॥१॥ रहाउ ॥

जैसे हलहर बिना जिमी नही बोईऐ ॥ सूत बिना कैसे मणी परोईऐ ॥ घुंडी बिनु किआ गंठि चड़्हाईऐ ॥ साधू बिनु तैसे अबगतु जाईऐ ॥२॥

जैसे मात पिता बिनु बालु न होई ॥ बि्मब बिना कैसे कपरे धोई ॥ घोर बिना कैसे असवार ॥ साधू बिनु नाही दरवार ॥३॥

जैसे बाजे बिनु नही लीजै फेरी ॥ खसमि दुहागनि तजि अउहेरी ॥ कहै कबीरु एकै करि करना ॥ गुरमुखि होइ बहुरि नही मरना ॥४॥६॥९॥

(राग गोंड -- SGGS 872) गोंड ॥
कूटनु सोइ जु मन कउ कूटै ॥ मन कूटै तउ जम ते छूटै ॥ कुटि कुटि मनु कसवटी लावै ॥ सो कूटनु मुकति बहु पावै ॥१॥

कूटनु किसै कहहु संसार ॥ सगल बोलन के माहि बीचार ॥१॥ रहाउ ॥

नाचनु सोइ जु मन सिउ नाचै ॥ झूठि न पतीऐ परचै साचै ॥ इसु मन आगे पूरै ताल ॥ इसु नाचन के मन रखवाल ॥२॥

बजारी सो जु बजारहि सोधै ॥ पांच पलीतह कउ परबोधै ॥ नउ नाइक की भगति पछानै ॥ सो बाजारी हम गुर माने ॥३॥

तसकरु सोइ जि ताति न करै ॥ इंद्री कै जतनि नामु उचरै ॥ कहु कबीर हम ऐसे लखन ॥ धंनु गुरदेव अति रूप बिचखन ॥४॥७॥१०॥

(राग गोंड -- SGGS 873) गोंड ॥
धंनु गुपाल धंनु गुरदेव ॥ धंनु अनादि भूखे कवलु टहकेव ॥ धनु ओइ संत जिन ऐसी जानी ॥ तिन कउ मिलिबो सारिंगपानी ॥१॥

आदि पुरख ते होइ अनादि ॥ जपीऐ नामु अंन कै सादि ॥१॥ रहाउ ॥

जपीऐ नामु जपीऐ अंनु ॥ अ्मभै कै संगि नीका वंनु ॥ अंनै बाहरि जो नर होवहि ॥ तीनि भवन महि अपनी खोवहि ॥२॥

छोडहि अंनु करहि पाखंड ॥ ना सोहागनि ना ओहि रंड ॥ जग महि बकते दूधाधारी ॥ गुपती खावहि वटिका सारी ॥३॥

अंनै बिना न होइ सुकालु ॥ तजिऐ अंनि न मिलै गुपालु ॥ कहु कबीर हम ऐसे जानिआ ॥ धंनु अनादि ठाकुर मनु मानिआ ॥४॥८॥११॥

(राग रामकली -- SGGS 947) सलोकु ॥
कबीर महिदी करि कै घालिआ आपु पीसाइ पीसाइ ॥ तै सह बात न पुछीआ कबहू न लाई पाइ ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 948) सलोकु ॥
कबीर कसउटी राम की झूठा टिकै न कोइ ॥ राम कसउटी सो सहै जो मरजीवा होइ ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 968) रामकली बाणी भगता की ॥ कबीर जीउ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
काइआ कलालनि लाहनि मेलउ गुर का सबदु गुड़ु कीनु रे ॥ त्रिसना कामु क्रोधु मद मतसर काटि काटि कसु दीनु रे ॥१॥

कोई है रे संतु सहज सुख अंतरि जा कउ जपु तपु देउ दलाली रे ॥ एक बूंद भरि तनु मनु देवउ जो मदु देइ कलाली रे ॥१॥ रहाउ ॥

भवन चतुर दस भाठी कीन्ही ब्रहम अगनि तनि जारी रे ॥ मुद्रा मदक सहज धुनि लागी सुखमन पोचनहारी रे ॥२॥

तीरथ बरत नेम सुचि संजम रवि ससि गहनै देउ रे ॥ सुरति पिआल सुधा रसु अम्रितु एहु महा रसु पेउ रे ॥३॥

निझर धार चुऐ अति निरमल इह रस मनूआ रातो रे ॥ कहि कबीर सगले मद छूछे इहै महा रसु साचो रे ॥४॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 969) गुड़ु करि गिआनु धिआनु करि महूआ भउ भाठी मन धारा ॥ सुखमन नारी सहज समानी पीवै पीवनहारा ॥१॥

अउधू मेरा मनु मतवारा ॥ उनमद चढा मदन रसु चाखिआ त्रिभवन भइआ उजिआरा ॥१॥ रहाउ ॥

दुइ पुर जोरि रसाई भाठी पीउ महा रसु भारी ॥ कामु क्रोधु दुइ कीए जलेता छूटि गई संसारी ॥२॥

प्रगट प्रगास गिआन गुर गमित सतिगुर ते सुधि पाई ॥ दासु कबीरु तासु मद माता उचकि न कबहू जाई ॥३॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 969) तूं मेरो मेरु परबतु सुआमी ओट गही मै तेरी ॥ ना तुम डोलहु ना हम गिरते रखि लीनी हरि मेरी ॥१॥

अब तब जब कब तुही तुही ॥ हम तुअ परसादि सुखी सद ही ॥१॥ रहाउ ॥

तोरे भरोसे मगहर बसिओ मेरे तन की तपति बुझाई ॥ पहिले दरसनु मगहर पाइओ फुनि कासी बसे आई ॥२॥

जैसा मगहरु तैसी कासी हम एकै करि जानी ॥ हम निरधन जिउ इहु धनु पाइआ मरते फूटि गुमानी ॥३॥

करै गुमानु चुभहि तिसु सूला को काढन कउ नाही ॥ अजै सु चोभ कउ बिलल बिलाते नरके घोर पचाही ॥४॥

कवनु नरकु किआ सुरगु बिचारा संतन दोऊ रादे ॥ हम काहू की काणि न कढते अपने गुर परसादे ॥५॥

अब तउ जाइ चढे सिंघासनि मिले है सारिंगपानी ॥ राम कबीरा एक भए है कोइ न सकै पछानी ॥६॥३॥

(राग रामकली -- SGGS 969) संता मानउ दूता डानउ इह कुटवारी मेरी ॥ दिवस रैनि तेरे पाउ पलोसउ केस चवर करि फेरी ॥१॥

हम कूकर तेरे दरबारि ॥ भउकहि आगै बदनु पसारि ॥१॥ रहाउ ॥

पूरब जनम हम तुम्हरे सेवक अब तउ मिटिआ न जाई ॥ तेरे दुआरै धुनि सहज की माथै मेरे दगाई ॥२॥

दागे होहि सु रन महि जूझहि बिनु दागे भगि जाई ॥ साधू होइ सु भगति पछानै हरि लए खजानै पाई ॥३॥

कोठरे महि कोठरी परम कोठी बीचारि ॥ गुरि दीनी बसतु कबीर कउ लेवहु बसतु सम्हारि ॥४॥

कबीरि दीई संसार कउ लीनी जिसु मसतकि भागु ॥ अम्रित रसु जिनि पाइआ थिरु ता का सोहागु ॥५॥४॥

(राग रामकली -- SGGS 970) जिह मुख बेदु गाइत्री निकसै सो किउ ब्रहमनु बिसरु करै ॥ जा कै पाइ जगतु सभु लागै सो किउ पंडितु हरि न कहै ॥१॥

काहे मेरे बाम्हन हरि न कहहि ॥ रामु न बोलहि पाडे दोजकु भरहि ॥१॥ रहाउ ॥

आपन ऊच नीच घरि भोजनु हठे करम करि उदरु भरहि ॥ चउदस अमावस रचि रचि मांगहि कर दीपकु लै कूपि परहि ॥२॥

तूं ब्रहमनु मै कासीक जुलहा मुहि तोहि बराबरी कैसे कै बनहि ॥ हमरे राम नाम कहि उबरे बेद भरोसे पांडे डूबि मरहि ॥३॥५॥

(राग रामकली -- SGGS 970) तरवरु एकु अनंत डार साखा पुहप पत्र रस भरीआ ॥ इह अम्रित की बाड़ी है रे तिनि हरि पूरै करीआ ॥१॥

जानी जानी रे राजा राम की कहानी ॥ अंतरि जोति राम परगासा गुरमुखि बिरलै जानी ॥१॥ रहाउ ॥

भवरु एकु पुहप रस बीधा बारह ले उर धरिआ ॥ सोरह मधे पवनु झकोरिआ आकासे फरु फरिआ ॥२॥

सहज सुंनि इकु बिरवा उपजिआ धरती जलहरु सोखिआ ॥ कहि कबीर हउ ता का सेवकु जिनि इहु बिरवा देखिआ ॥३॥६॥

(राग रामकली -- SGGS 970) मुंद्रा मोनि दइआ करि झोली पत्र का करहु बीचारु रे ॥ खिंथा इहु तनु सीअउ अपना नामु करउ आधारु रे ॥१॥

ऐसा जोगु कमावहु जोगी ॥ जप तप संजमु गुरमुखि भोगी ॥१॥ रहाउ ॥

बुधि बिभूति चढावउ अपुनी सिंगी सुरति मिलाई ॥ करि बैरागु फिरउ तनि नगरी मन की किंगुरी बजाई ॥२॥

पंच ततु लै हिरदै राखहु रहै निरालम ताड़ी ॥ कहतु कबीरु सुनहु रे संतहु धरमु दइआ करि बाड़ी ॥३॥७॥

(राग रामकली -- SGGS 970) कवन काज सिरजे जग भीतरि जनमि कवन फलु पाइआ ॥ भव निधि तरन तारन चिंतामनि इक निमख न इहु मनु लाइआ ॥१॥

गोबिंद हम ऐसे अपराधी ॥ जिनि प्रभि जीउ पिंडु था दीआ तिस की भाउ भगति नही साधी ॥१॥ रहाउ ॥

पर धन पर तन पर ती निंदा पर अपबादु न छूटै ॥ आवा गवनु होतु है फुनि फुनि इहु परसंगु न तूटै ॥२॥

जिह घरि कथा होत हरि संतन इक निमख न कीन्हो मै फेरा ॥ ल्मपट चोर दूत मतवारे तिन संगि सदा बसेरा ॥३॥

काम क्रोध माइआ मद मतसर ए स्मपै मो माही ॥ दइआ धरमु अरु गुर की सेवा ए सुपनंतरि नाही ॥४॥

दीन दइआल क्रिपाल दमोदर भगति बछल भै हारी ॥ कहत कबीर भीर जन राखहु हरि सेवा करउ तुम्हारी ॥५॥८॥

(राग रामकली -- SGGS 971) जिह सिमरनि होइ मुकति दुआरु ॥ जाहि बैकुंठि नही संसारि ॥ निरभउ कै घरि बजावहि तूर ॥ अनहद बजहि सदा भरपूर ॥१॥

ऐसा सिमरनु करि मन माहि ॥ बिनु सिमरन मुकति कत नाहि ॥१॥ रहाउ ॥

जिह सिमरनि नाही ननकारु ॥ मुकति करै उतरै बहु भारु ॥ नमसकारु करि हिरदै माहि ॥ फिरि फिरि तेरा आवनु नाहि ॥२॥

जिह सिमरनि करहि तू केल ॥ दीपकु बांधि धरिओ बिनु तेल ॥ सो दीपकु अमरकु संसारि ॥ काम क्रोध बिखु काढीले मारि ॥३॥

जिह सिमरनि तेरी गति होइ ॥ सो सिमरनु रखु कंठि परोइ ॥ सो सिमरनु करि नही राखु उतारि ॥ गुर परसादी उतरहि पारि ॥४॥

जिह सिमरनि नाही तुहि कानि ॥ मंदरि सोवहि पट्मबर तानि ॥ सेज सुखाली बिगसै जीउ ॥ सो सिमरनु तू अनदिनु पीउ ॥५॥

जिह सिमरनि तेरी जाइ बलाइ ॥ जिह सिमरनि तुझु पोहै न माइ ॥ सिमरि सिमरि हरि हरि मनि गाईऐ ॥ इहु सिमरनु सतिगुर ते पाईऐ ॥६॥

सदा सदा सिमरि दिनु राति ॥ ऊठत बैठत सासि गिरासि ॥ जागु सोइ सिमरन रस भोग ॥ हरि सिमरनु पाईऐ संजोग ॥७॥

जिह सिमरनि नाही तुझु भार ॥ सो सिमरनु राम नाम अधारु ॥ कहि कबीर जा का नही अंतु ॥ तिस के आगे तंतु न मंतु ॥८॥९॥

(राग रामकली -- SGGS 971) रामकली घरु २ बाणी कबीर जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बंधचि बंधनु पाइआ ॥ मुकतै गुरि अनलु बुझाइआ ॥ जब नख सिख इहु मनु चीन्हा ॥ तब अंतरि मजनु कीन्हा ॥१॥

पवनपति उनमनि रहनु खरा ॥ नही मिरतु न जनमु जरा ॥१॥ रहाउ ॥

उलटी ले सकति सहारं ॥ पैसीले गगन मझारं ॥ बेधीअले चक्र भुअंगा ॥ भेटीअले राइ निसंगा ॥२॥

चूकीअले मोह मइआसा ॥ ससि कीनो सूर गिरासा ॥ जब कु्मभकु भरिपुरि लीणा ॥ तह बाजे अनहद बीणा ॥३॥

बकतै बकि सबदु सुनाइआ ॥ सुनतै सुनि मंनि बसाइआ ॥ करि करता उतरसि पारं ॥ कहै कबीरा सारं ॥४॥१॥१०॥

(राग रामकली -- SGGS 972) चंदु सूरजु दुइ जोति सरूपु ॥ जोती अंतरि ब्रहमु अनूपु ॥१॥

करु रे गिआनी ब्रहम बीचारु ॥ जोती अंतरि धरिआ पसारु ॥१॥ रहाउ ॥

हीरा देखि हीरे करउ आदेसु ॥ कहै कबीरु निरंजन अलेखु ॥२॥२॥११॥

(राग रामकली -- SGGS 972) दुनीआ हुसीआर बेदार जागत मुसीअत हउ रे भाई ॥
निगम हुसीआर पहरूआ देखत जमु ले जाई ॥१॥ रहाउ ॥

नींबु भइओ आंबु आंबु भइओ नींबा केला पाका झारि ॥ नालीएर फलु सेबरि पाका मूरख मुगध गवार ॥१॥

हरि भइओ खांडु रेतु महि बिखरिओ हसतीं चुनिओ न जाई ॥ कहि कमीर कुल जाति पांति तजि चीटी होइ चुनि खाई ॥२॥३॥१२॥

(राग मारू -- SGGS 1102) रागु मारू बाणी कबीर जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पडीआ कवन कुमति तुम लागे ॥ बूडहुगे परवार सकल सिउ रामु न जपहु अभागे ॥१॥ रहाउ ॥

बेद पुरान पड़े का किआ गुनु खर चंदन जस भारा ॥ राम नाम की गति नही जानी कैसे उतरसि पारा ॥१॥

जीअ बधहु सु धरमु करि थापहु अधरमु कहहु कत भाई ॥ आपस कउ मुनिवर करि थापहु का कउ कहहु कसाई ॥२॥

मन के अंधे आपि न बूझहु काहि बुझावहु भाई ॥ माइआ कारन बिदिआ बेचहु जनमु अबिरथा जाई ॥३॥

नारद बचन बिआसु कहत है सुक कउ पूछहु जाई ॥ कहि कबीर रामै रमि छूटहु नाहि त बूडे भाई ॥४॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1103) बनहि बसे किउ पाईऐ जउ लउ मनहु न तजहि बिकार ॥ जिह घरु बनु समसरि कीआ ते पूरे संसार ॥१॥

सार सुखु पाईऐ रामा ॥ रंगि रवहु आतमै राम ॥१॥ रहाउ ॥

जटा भसम लेपन कीआ कहा गुफा महि बासु ॥ मनु जीते जगु जीतिआ जां ते बिखिआ ते होइ उदासु ॥२॥

अंजनु देइ सभै कोई टुकु चाहन माहि बिडानु ॥ गिआन अंजनु जिह पाइआ ते लोइन परवानु ॥३॥

कहि कबीर अब जानिआ गुरि गिआनु दीआ समझाइ ॥ अंतरगति हरि भेटिआ अब मेरा मनु कतहू न जाइ ॥४॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1103) रिधि सिधि जा कउ फुरी तब काहू सिउ किआ काज ॥ तेरे कहने की गति किआ कहउ मै बोलत ही बड लाज ॥१॥

रामु जिह पाइआ राम ॥ ते भवहि न बारै बार ॥१॥ रहाउ ॥

झूठा जगु डहकै घना दिन दुइ बरतन की आस ॥ राम उदकु जिह जन पीआ तिहि बहुरि न भई पिआस ॥२॥

गुर प्रसादि जिह बूझिआ आसा ते भइआ निरासु ॥ सभु सचु नदरी आइआ जउ आतम भइआ उदासु ॥३॥

राम नाम रसु चाखिआ हरि नामा हर तारि ॥ कहु कबीर कंचनु भइआ भ्रमु गइआ समुद्रै पारि ॥४॥३॥

(राग मारू -- SGGS 1103) उदक समुंद सलल की साखिआ नदी तरंग समावहिगे ॥ सुंनहि सुंनु मिलिआ समदरसी पवन रूप होइ जावहिगे ॥१॥

बहुरि हम काहे आवहिगे ॥ आवन जाना हुकमु तिसै का हुकमै बुझि समावहिगे ॥१॥ रहाउ ॥

जब चूकै पंच धातु की रचना ऐसे भरमु चुकावहिगे ॥ दरसनु छोडि भए समदरसी एको नामु धिआवहिगे ॥२॥

जित हम लाए तित ही लागे तैसे करम कमावहिगे ॥ हरि जी क्रिपा करे जउ अपनी तौ गुर के सबदि समावहिगे ॥३॥

जीवत मरहु मरहु फुनि जीवहु पुनरपि जनमु न होई ॥ कहु कबीर जो नामि समाने सुंन रहिआ लिव सोई ॥४॥४॥

(राग मारू -- SGGS 1104) जउ तुम्ह मो कउ दूरि करत हउ तउ तुम मुकति बतावहु ॥ एक अनेक होइ रहिओ सगल महि अब कैसे भरमावहु ॥१॥

राम मो कउ तारि कहां लै जई है ॥ सोधउ मुकति कहा देउ कैसी करि प्रसादु मोहि पाई है ॥१॥ रहाउ ॥

तारन तरनु तबै लगु कहीऐ जब लगु ततु न जानिआ ॥ अब तउ बिमल भए घट ही महि कहि कबीर मनु मानिआ ॥२॥५॥

(राग मारू -- SGGS 1104) जिनि गड़ कोट कीए कंचन के छोडि गइआ सो रावनु ॥१॥

काहे कीजतु है मनि भावनु ॥ जब जमु आइ केस ते पकरै तह हरि को नामु छडावन ॥१॥ रहाउ ॥

कालु अकालु खसम का कीन्हा इहु परपंचु बधावनु ॥ कहि कबीर ते अंते मुकते जिन्ह हिरदै राम रसाइनु ॥२॥६॥

(राग मारू -- SGGS 1104) देही गावा जीउ धर महतउ बसहि पंच किरसाना ॥ नैनू नकटू स्रवनू रसपति इंद्री कहिआ न माना ॥१॥

बाबा अब न बसउ इह गाउ ॥ घरी घरी का लेखा मागै काइथु चेतू नाउ ॥१॥ रहाउ ॥

धरम राइ जब लेखा मागै बाकी निकसी भारी ॥ पंच क्रिसानवा भागि गए लै बाधिओ जीउ दरबारी ॥२॥

कहै कबीरु सुनहु रे संतहु खेत ही करहु निबेरा ॥ अब की बार बखसि बंदे कउ बहुरि न भउजलि फेरा ॥३॥७॥

(राग मारू -- SGGS 1104) रागु मारू बाणी कबीर जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अनभउ किनै न देखिआ बैरागीअड़े ॥ बिनु भै अनभउ होइ वणाह्मबै ॥१॥

सहु हदूरि देखै तां भउ पवै बैरागीअड़े ॥ हुकमै बूझै त निरभउ होइ वणाह्मबै ॥२॥

हरि पाखंडु न कीजई बैरागीअड़े ॥ पाखंडि रता सभु लोकु वणाह्मबै ॥३॥

त्रिसना पासु न छोडई बैरागीअड़े ॥ ममता जालिआ पिंडु वणाह्मबै ॥४॥

चिंता जालि तनु जालिआ बैरागीअड़े ॥ जे मनु मिरतकु होइ वणाह्मबै ॥५॥

सतिगुर बिनु बैरागु न होवई बैरागीअड़े ॥ जे लोचै सभु कोइ वणाह्मबै ॥६॥

करमु होवै सतिगुरु मिलै बैरागीअड़े ॥ सहजे पावै सोइ वणाह्मबै ॥७॥

कहु कबीर इक बेनती बैरागीअड़े ॥ मो कउ भउजलु पारि उतारि वणाह्मबै ॥८॥१॥८॥

(राग मारू -- SGGS 1105) राजन कउनु तुमारै आवै ॥ ऐसो भाउ बिदर को देखिओ ओहु गरीबु मोहि भावै ॥१॥ रहाउ ॥

हसती देखि भरम ते भूला स्री भगवानु न जानिआ ॥ तुमरो दूधु बिदर को पान्हो अम्रितु करि मै मानिआ ॥१॥

खीर समानि सागु मै पाइआ गुन गावत रैनि बिहानी ॥ कबीर को ठाकुरु अनद बिनोदी जाति न काहू की मानी ॥२॥९॥

(राग मारू -- SGGS 1105) सलोक कबीर ॥
गगन दमामा बाजिओ परिओ नीसानै घाउ ॥ खेतु जु मांडिओ सूरमा अब जूझन को दाउ ॥१॥

सूरा सो पहिचानीऐ जु लरै दीन के हेत ॥ पुरजा पुरजा कटि मरै कबहू न छाडै खेतु ॥२॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1105) मारू कबीर जीउ ॥
दीनु बिसारिओ रे दिवाने दीनु बिसारिओ रे ॥ पेटु भरिओ पसूआ जिउ सोइओ मनुखु जनमु है हारिओ ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगति कबहू नही कीनी रचिओ धंधै झूठ ॥ सुआन सूकर बाइस जिवै भटकतु चालिओ ऊठि ॥१॥

आपस कउ दीरघु करि जानै अउरन कउ लग मात ॥ मनसा बाचा करमना मै देखे दोजक जात ॥२॥

कामी क्रोधी चातुरी बाजीगर बेकाम ॥ निंदा करते जनमु सिरानो कबहू न सिमरिओ रामु ॥३॥

कहि कबीर चेतै नही मूरखु मुगधु गवारु ॥ रामु नामु जानिओ नही कैसे उतरसि पारि ॥४॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1106) कबीरु ॥ मारू ॥
रामु सिमरु पछुताहिगा मन ॥ पापी जीअरा लोभु करतु है आजु कालि उठि जाहिगा ॥१॥ रहाउ ॥

लालच लागे जनमु गवाइआ माइआ भरम भुलाहिगा ॥ धन जोबन का गरबु न कीजै कागद जिउ गलि जाहिगा ॥१॥

जउ जमु आइ केस गहि पटकै ता दिन किछु न बसाहिगा ॥ सिमरनु भजनु दइआ नही कीनी तउ मुखि चोटा खाहिगा ॥२॥

धरम राइ जब लेखा मागै किआ मुखु लै कै जाहिगा ॥ कहतु कबीरु सुनहु रे संतहु साधसंगति तरि जांहिगा ॥३॥१॥

(राग केदारा -- SGGS 1123) रागु केदारा बाणी कबीर जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उसतति निंदा दोऊ बिबरजित तजहु मानु अभिमाना ॥ लोहा कंचनु सम करि जानहि ते मूरति भगवाना ॥१॥

तेरा जनु एकु आधु कोई ॥ कामु क्रोधु लोभु मोहु बिबरजित हरि पदु चीन्है सोई ॥१॥ रहाउ ॥

रज गुण तम गुण सत गुण कहीऐ इह तेरी सभ माइआ ॥ चउथे पद कउ जो नरु चीन्है तिन्ह ही परम पदु पाइआ ॥२॥

तीरथ बरत नेम सुचि संजम सदा रहै निहकामा ॥ त्रिसना अरु माइआ भ्रमु चूका चितवत आतम रामा ॥३॥

जिह मंदरि दीपकु परगासिआ अंधकारु तह नासा ॥ निरभउ पूरि रहे भ्रमु भागा कहि कबीर जन दासा ॥४॥१॥

(राग केदारा -- SGGS 1123) किनही बनजिआ कांसी तांबा किनही लउग सुपारी ॥ संतहु बनजिआ नामु गोबिद का ऐसी खेप हमारी ॥१॥

हरि के नाम के बिआपारी ॥ हीरा हाथि चड़िआ निरमोलकु छूटि गई संसारी ॥१॥ रहाउ ॥

साचे लाए तउ सच लागे साचे के बिउहारी ॥ साची बसतु के भार चलाए पहुचे जाइ भंडारी ॥२॥

आपहि रतन जवाहर मानिक आपै है पासारी ॥ आपै दह दिस आप चलावै निहचलु है बिआपारी ॥३॥

मनु करि बैलु सुरति करि पैडा गिआन गोनि भरि डारी ॥ कहतु कबीरु सुनहु रे संतहु निबही खेप हमारी ॥४॥२॥

(राग केदारा -- SGGS 1123) री कलवारि गवारि मूढ मति उलटो पवनु फिरावउ ॥ मनु मतवार मेर सर भाठी अम्रित धार चुआवउ ॥१॥

बोलहु भईआ राम की दुहाई ॥ पीवहु संत सदा मति दुरलभ सहजे पिआस बुझाई ॥१॥ रहाउ ॥

भै बिचि भाउ भाइ कोऊ बूझहि हरि रसु पावै भाई ॥ जेते घट अम्रितु सभ ही महि भावै तिसहि पीआई ॥२॥

नगरी एकै नउ दरवाजे धावतु बरजि रहाई ॥ त्रिकुटी छूटै दसवा दरु खूल्है ता मनु खीवा भाई ॥३॥

अभै पद पूरि ताप तह नासे कहि कबीर बीचारी ॥ उबट चलंते इहु मदु पाइआ जैसे खोंद खुमारी ॥४॥३॥

(राग केदारा -- SGGS 1123) काम क्रोध त्रिसना के लीने गति नही एकै जानी ॥ फूटी आखै कछू न सूझै बूडि मूए बिनु पानी ॥१॥

चलत कत टेढे टेढे टेढे ॥ असति चरम बिसटा के मूंदे दुरगंध ही के बेढे ॥१॥ रहाउ ॥

राम न जपहु कवन भ्रम भूले तुम ते कालु न दूरे ॥ अनिक जतन करि इहु तनु राखहु रहै अवसथा पूरे ॥२॥

आपन कीआ कछू न होवै किआ को करै परानी ॥ जा तिसु भावै सतिगुरु भेटै एको नामु बखानी ॥३॥

बलूआ के घरूआ महि बसते फुलवत देह अइआने ॥ कहु कबीर जिह रामु न चेतिओ बूडे बहुतु सिआने ॥४॥४॥

(राग केदारा -- SGGS 1124) टेढी पाग टेढे चले लागे बीरे खान ॥ भाउ भगति सिउ काजु न कछूऐ मेरो कामु दीवान ॥१॥

रामु बिसारिओ है अभिमानि ॥ कनिक कामनी महा सुंदरी पेखि पेखि सचु मानि ॥१॥ रहाउ ॥

लालच झूठ बिकार महा मद इह बिधि अउध बिहानि ॥ कहि कबीर अंत की बेर आइ लागो कालु निदानि ॥२॥५॥

(राग केदारा -- SGGS 1124) चारि दिन अपनी नउबति चले बजाइ ॥ इतनकु खटीआ गठीआ मटीआ संगि न कछु लै जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

दिहरी बैठी मिहरी रोवै दुआरै लउ संगि माइ ॥ मरहट लगि सभु लोगु कुट्मबु मिलि हंसु इकेला जाइ ॥१॥

वै सुत वै बित वै पुर पाटन बहुरि न देखै आइ ॥ कहतु कबीरु रामु की न सिमरहु जनमु अकारथु जाइ ॥२॥६॥

(राग भैरउ -- SGGS 1157) भैरउ बाणी भगता की ॥
कबीर जीउ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
इहु धनु मेरे हरि को नाउ ॥ गांठि न बाधउ बेचि न खाउ ॥१॥ रहाउ ॥

नाउ मेरे खेती नाउ मेरे बारी ॥ भगति करउ जनु सरनि तुम्हारी ॥१॥

नाउ मेरे माइआ नाउ मेरे पूंजी ॥ तुमहि छोडि जानउ नही दूजी ॥२॥

नाउ मेरे बंधिप नाउ मेरे भाई ॥ नाउ मेरे संगि अंति होइ सखाई ॥३॥

माइआ महि जिसु रखै उदासु ॥ कहि कबीर हउ ता को दासु ॥४॥१॥

(राग भैरउ -- SGGS 1157) नांगे आवनु नांगे जाना ॥ कोइ न रहिहै राजा राना ॥१॥

रामु राजा नउ निधि मेरै ॥ स्मपै हेतु कलतु धनु तेरै ॥१॥ रहाउ ॥

आवत संग न जात संगाती ॥ कहा भइओ दरि बांधे हाथी ॥२॥

लंका गढु सोने का भइआ ॥ मूरखु रावनु किआ ले गइआ ॥३॥

कहि कबीर किछु गुनु बीचारि ॥ चले जुआरी दुइ हथ झारि ॥४॥२॥

(राग भैरउ -- SGGS 1158) मैला ब्रहमा मैला इंदु ॥ रवि मैला मैला है चंदु ॥१॥

मैला मलता इहु संसारु ॥ इकु हरि निरमलु जा का अंतु न पारु ॥१॥ रहाउ ॥

मैले ब्रहमंडाइ कै ईस ॥ मैले निसि बासुर दिन तीस ॥२॥

मैला मोती मैला हीरु ॥ मैला पउनु पावकु अरु नीरु ॥३॥

मैले सिव संकरा महेस ॥ मैले सिध साधिक अरु भेख ॥४॥

मैले जोगी जंगम जटा सहेति ॥ मैली काइआ हंस समेति ॥५॥

कहि कबीर ते जन परवान ॥ निरमल ते जो रामहि जान ॥६॥३॥

(राग भैरउ -- SGGS 1158) मनु करि मका किबला करि देही ॥ बोलनहारु परम गुरु एही ॥१॥

कहु रे मुलां बांग निवाज ॥ एक मसीति दसै दरवाज ॥१॥ रहाउ ॥

मिसिमिलि तामसु भरमु कदूरी ॥ भाखि ले पंचै होइ सबूरी ॥२॥

हिंदू तुरक का साहिबु एक ॥ कह करै मुलां कह करै सेख ॥३॥

कहि कबीर हउ भइआ दिवाना ॥ मुसि मुसि मनूआ सहजि समाना ॥४॥४॥

(राग भैरउ -- SGGS 1158) गंगा कै संगि सलिता बिगरी ॥ सो सलिता गंगा होइ निबरी ॥१॥

बिगरिओ कबीरा राम दुहाई ॥ साचु भइओ अन कतहि न जाई ॥१॥ रहाउ ॥

चंदन कै संगि तरवरु बिगरिओ ॥ सो तरवरु चंदनु होइ निबरिओ ॥२॥

पारस कै संगि तांबा बिगरिओ ॥ सो तांबा कंचनु होइ निबरिओ ॥३॥

संतन संगि कबीरा बिगरिओ ॥ सो कबीरु रामै होइ निबरिओ ॥४॥५॥

(राग भैरउ -- SGGS 1158) माथे तिलकु हथि माला बानां ॥ लोगन रामु खिलउना जानां ॥१॥

जउ हउ बउरा तउ राम तोरा ॥ लोगु मरमु कह जानै मोरा ॥१॥ रहाउ ॥

तोरउ न पाती पूजउ न देवा ॥ राम भगति बिनु निहफल सेवा ॥२॥

सतिगुरु पूजउ सदा सदा मनावउ ॥ ऐसी सेव दरगह सुखु पावउ ॥३॥

लोगु कहै कबीरु बउराना ॥ कबीर का मरमु राम पहिचानां ॥४॥६॥

(राग भैरउ -- SGGS 1158) उलटि जाति कुल दोऊ बिसारी ॥ सुंन सहज महि बुनत हमारी ॥१॥

हमरा झगरा रहा न कोऊ ॥ पंडित मुलां छाडे दोऊ ॥१॥ रहाउ ॥

बुनि बुनि आप आपु पहिरावउ ॥ जह नही आपु तहा होइ गावउ ॥२॥

पंडित मुलां जो लिखि दीआ ॥ छाडि चले हम कछू न लीआ ॥३॥

रिदै इखलासु निरखि ले मीरा ॥ आपु खोजि खोजि मिले कबीरा ॥४॥७॥

(राग भैरउ -- SGGS 1159) निरधन आदरु कोई न देइ ॥ लाख जतन करै ओहु चिति न धरेइ ॥१॥ रहाउ ॥

जउ निरधनु सरधन कै जाइ ॥ आगे बैठा पीठि फिराइ ॥१॥

जउ सरधनु निरधन कै जाइ ॥ दीआ आदरु लीआ बुलाइ ॥२॥

निरधनु सरधनु दोनउ भाई ॥ प्रभ की कला न मेटी जाई ॥३॥

कहि कबीर निरधनु है सोई ॥ जा के हिरदै नामु न होई ॥४॥८॥

(राग भैरउ -- SGGS 1159) गुर सेवा ते भगति कमाई ॥ तब इह मानस देही पाई ॥ इस देही कउ सिमरहि देव ॥ सो देही भजु हरि की सेव ॥१॥

भजहु गोबिंद भूलि मत जाहु ॥ मानस जनम का एही लाहु ॥१॥ रहाउ ॥

जब लगु जरा रोगु नही आइआ ॥ जब लगु कालि ग्रसी नही काइआ ॥ जब लगु बिकल भई नही बानी ॥ भजि लेहि रे मन सारिगपानी ॥२॥

अब न भजसि भजसि कब भाई ॥ आवै अंतु न भजिआ जाई ॥ जो किछु करहि सोई अब सारु ॥ फिरि पछुताहु न पावहु पारु ॥३॥

सो सेवकु जो लाइआ सेव ॥ तिन ही पाए निरंजन देव ॥ गुर मिलि ता के खुल्हे कपाट ॥ बहुरि न आवै जोनी बाट ॥४॥

इही तेरा अउसरु इह तेरी बार ॥ घट भीतरि तू देखु बिचारि ॥ कहत कबीरु जीति कै हारि ॥ बहु बिधि कहिओ पुकारि पुकारि ॥५॥१॥९॥

(राग भैरउ -- SGGS 1159) सिव की पुरी बसै बुधि सारु ॥ तह तुम्ह मिलि कै करहु बिचारु ॥ ईत ऊत की सोझी परै ॥ कउनु करम मेरा करि करि मरै ॥१॥

निज पद ऊपरि लागो धिआनु ॥ राजा राम नामु मोरा ब्रहम गिआनु ॥१॥ रहाउ ॥

मूल दुआरै बंधिआ बंधु ॥ रवि ऊपरि गहि राखिआ चंदु ॥ पछम दुआरै सूरजु तपै ॥ मेर डंड सिर ऊपरि बसै ॥२॥

पसचम दुआरे की सिल ओड़ ॥ तिह सिल ऊपरि खिड़की अउर ॥ खिड़की ऊपरि दसवा दुआरु ॥ कहि कबीर ता का अंतु न पारु ॥३॥२॥१०॥

(राग भैरउ -- SGGS 1159) सो मुलां जो मन सिउ लरै ॥ गुर उपदेसि काल सिउ जुरै ॥ काल पुरख का मरदै मानु ॥ तिसु मुला कउ सदा सलामु ॥१॥

है हजूरि कत दूरि बतावहु ॥ दुंदर बाधहु सुंदर पावहु ॥१॥ रहाउ ॥

काजी सो जु काइआ बीचारै ॥ काइआ की अगनि ब्रहमु परजारै ॥ सुपनै बिंदु न देई झरना ॥ तिसु काजी कउ जरा न मरना ॥२॥

सो सुरतानु जु दुइ सर तानै ॥ बाहरि जाता भीतरि आनै ॥ गगन मंडल महि लसकरु करै ॥ सो सुरतानु छत्रु सिरि धरै ॥३॥

जोगी गोरखु गोरखु करै ॥ हिंदू राम नामु उचरै ॥ मुसलमान का एकु खुदाइ ॥ कबीर का सुआमी रहिआ समाइ ॥४॥३॥११॥


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