Pt 35 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 35 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग मारू -- SGGS 1005) मारू महला ५ ॥
कत कउ डहकावहु लोगा मोहन दीन किरपाई ॥१॥

ऐसी जानि पाई ॥ सरणि सूरो गुर दाता राखै आपि वडाई ॥१॥ रहाउ ॥

भगता का आगिआकारी सदा सदा सुखदाई ॥२॥

अपने कउ किरपा करीअहु इकु नामु धिआई ॥३॥

नानकु दीनु नामु मागै दुतीआ भरमु चुकाई ॥४॥४॥२०॥

(राग मारू -- SGGS 1005) मारू महला ५ ॥
मेरा ठाकुरु अति भारा ॥ मोहि सेवकु बेचारा ॥१॥

मोहनु लालु मेरा प्रीतम मन प्राना ॥ मो कउ देहु दाना ॥१॥ रहाउ ॥

सगले मै देखे जोई ॥ बीजउ अवरु न कोई ॥२॥

जीअन प्रतिपालि समाहै ॥ है होसी आहे ॥३॥

दइआ मोहि कीजै देवा ॥ नानक लागो सेवा ॥४॥५॥२१॥

(राग मारू -- SGGS 1005) मारू महला ५ ॥
पतित उधारन तारन बलि बलि बले बलि जाईऐ ॥ ऐसा कोई भेटै संतु जितु हरि हरे हरि धिआईऐ ॥१॥

मो कउ कोइ न जानत कहीअत दासु तुमारा ॥ एहा ओट आधारा ॥१॥ रहाउ ॥

सरब धारन प्रतिपारन इक बिनउ दीना ॥ तुमरी बिधि तुम ही जानहु तुम जल हम मीना ॥२॥

पूरन बिसथीरन सुआमी आहि आइओ पाछै ॥ सगलो भू मंडल खंडल प्रभ तुम ही आछै ॥३॥

अटल अखइओ देवा मोहन अलख अपारा ॥ दानु पावउ संता संगु नानक रेनु दासारा ॥४॥६॥२२॥

(राग मारू -- SGGS 1006) मारू महला ५ ॥
त्रिपति आघाए संता ॥ गुर जाने जिन मंता ॥ ता की किछु कहनु न जाई ॥ जा कउ नाम बडाई ॥१॥

लालु अमोला लालो ॥ अगह अतोला नामो ॥१॥ रहाउ ॥

अविगत सिउ मानिआ मानो ॥ गुरमुखि ततु गिआनो ॥ पेखत सगल धिआनो ॥ तजिओ मन ते अभिमानो ॥२॥

निहचलु तिन का ठाणा ॥ गुर ते महलु पछाणा ॥ अनदिनु गुर मिलि जागे ॥ हरि की सेवा लागे ॥३॥

पूरन त्रिपति अघाए ॥ सहज समाधि सुभाए ॥ हरि भंडारु हाथि आइआ ॥ नानक गुर ते पाइआ ॥४॥७॥२३॥

(राग मारू -- SGGS 1006) मारू महला ५ घरु ६ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
छोडि सगल सिआणपा मिलि साध तिआगि गुमानु ॥ अवरु सभु किछु मिथिआ रसना राम राम वखानु ॥१॥

मेरे मन करन सुणि हरि नामु ॥ मिटहि अघ तेरे जनम जनम के कवनु बपुरो जामु ॥१॥ रहाउ ॥

दूख दीन न भउ बिआपै मिलै सुख बिस्रामु ॥ गुर प्रसादि नानकु बखानै हरि भजनु ततु गिआनु ॥२॥१॥२४॥

(राग मारू -- SGGS 1006) मारू महला ५ ॥
जिनी नामु विसारिआ से होत देखे खेह ॥ पुत्र मित्र बिलास बनिता तूटते ए नेह ॥१॥

मेरे मन नामु नित नित लेह ॥ जलत नाही अगनि सागर सूखु मनि तनि देह ॥१॥ रहाउ ॥

बिरख छाइआ जैसे बिनसत पवन झूलत मेह ॥ हरि भगति द्रिड़ु मिलु साध नानक तेरै कामि आवत एह ॥२॥२॥२५॥

(राग मारू -- SGGS 1006) मारू महला ५ ॥
पुरखु पूरन सुखह दाता संगि बसतो नीत ॥ मरै न आवै न जाइ बिनसै बिआपत उसन न सीत ॥१॥

मेरे मन नाम सिउ करि प्रीति ॥ चेति मन महि हरि हरि निधाना एह निरमल रीति ॥१॥ रहाउ ॥

क्रिपाल दइआल गोपाल गोबिद जो जपै तिसु सीधि ॥ नवल नवतन चतुर सुंदर मनु नानक तिसु संगि बीधि ॥२॥३॥२६॥

(राग मारू -- SGGS 1006) मारू महला ५ ॥
चलत बैसत सोवत जागत गुर मंत्रु रिदै चितारि ॥ चरण सरण भजु संगि साधू भव सागर उतरहि पारि ॥१॥

मेरे मन नामु हिरदै धारि ॥ करि प्रीति मनु तनु लाइ हरि सिउ अवर सगल विसारि ॥१॥ रहाउ ॥

जीउ मनु तनु प्राण प्रभ के तू आपन आपु निवारि ॥ गोविद भजु सभि सुआरथ पूरे नानक कबहु न हारि ॥२॥४॥२७॥

(राग मारू -- SGGS 1007) मारू महला ५ ॥
तजि आपु बिनसी तापु रेण साधू थीउ ॥ तिसहि परापति नामु तेरा करि क्रिपा जिसु दीउ ॥१॥

मेरे मन नामु अम्रितु पीउ ॥ आन साद बिसारि होछे अमरु जुगु जुगु जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

नामु इक रस रंग नामा नामि लागी लीउ ॥ मीतु साजनु सखा बंधपु हरि एकु नानक कीउ ॥२॥५॥२८॥

(राग मारू -- SGGS 1007) मारू महला ५ ॥
प्रतिपालि माता उदरि राखै लगनि देत न सेक ॥ सोई सुआमी ईहा राखै बूझु बुधि बिबेक ॥१॥

मेरे मन नाम की करि टेक ॥ तिसहि बूझु जिनि तू कीआ प्रभु करण कारण एक ॥१॥ रहाउ ॥

चेति मन महि तजि सिआणप छोडि सगले भेख ॥ सिमरि हरि हरि सदा नानक तरे कई अनेक ॥२॥६॥२९॥

(राग मारू -- SGGS 1007) मारू महला ५ ॥
पतित पावन नामु जा को अनाथ को है नाथु ॥ महा भउजल माहि तुलहो जा को लिखिओ माथ ॥१॥

डूबे नाम बिनु घन साथ ॥ करण कारणु चिति न आवै दे करि राखै हाथ ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगति गुण उचारण हरि नाम अम्रित पाथ ॥ करहु क्रिपा मुरारि माधउ सुणि नानक जीवै गाथ ॥२॥७॥३०॥

(राग मारू -- SGGS 1007) मारू अंजुली महला ५ घरु ७
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
संजोगु विजोगु धुरहु ही हूआ ॥ पंच धातु करि पुतला कीआ ॥ साहै कै फुरमाइअड़ै जी देही विचि जीउ आइ पइआ ॥१॥

जिथै अगनि भखै भड़हारे ॥ ऊरध मुख महा गुबारे ॥ सासि सासि समाले सोई ओथै खसमि छडाइ लइआ ॥२॥

विचहु गरभै निकलि आइआ ॥ खसमु विसारि दुनी चितु लाइआ ॥ आवै जाइ भवाईऐ जोनी रहणु न कितही थाइ भइआ ॥३॥

मिहरवानि रखि लइअनु आपे ॥ जीअ जंत सभि तिस के थापे ॥ जनमु पदारथु जिणि चलिआ नानक आइआ सो परवाणु थिआ ॥४॥१॥३१॥

(राग मारू -- SGGS 1008) मारू महला ५ ॥
वैदो न वाई भैणो न भाई एको सहाई रामु हे ॥१॥

कीता जिसो होवै पापां मलो धोवै सो सिमरहु परधानु हे ॥२॥

घटि घटे वासी सरब निवासी असथिरु जा का थानु हे ॥३॥

आवै न जावै संगे समावै पूरन जा का कामु हे ॥४॥

भगत जना का राखणहारा ॥ संत जीवहि जपि प्रान अधारा ॥ करन कारन समरथु सुआमी नानकु तिसु कुरबानु हे ॥५॥२॥३२॥

(राग मारू -- SGGS 1017) मारू महला ५ घरु ३ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
लख चउरासीह भ्रमते भ्रमते दुलभ जनमु अब पाइओ ॥१॥

रे मूड़े तू होछै रसि लपटाइओ ॥ अम्रितु संगि बसतु है तेरै बिखिआ सिउ उरझाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

रतन जवेहर बनजनि आइओ कालरु लादि चलाइओ ॥२॥

जिह घर महि तुधु रहना बसना सो घरु चीति न आइओ ॥३॥

अटल अखंड प्राण सुखदाई इक निमख नही तुझु गाइओ ॥४॥

जहा जाणा सो थानु विसारिओ इक निमख नही मनु लाइओ ॥५॥

पुत्र कलत्र ग्रिह देखि समग्री इस ही महि उरझाइओ ॥६॥

जितु को लाइओ तित ही लागा तैसे करम कमाइओ ॥७॥

जउ भइओ क्रिपालु ता साधसंगु पाइआ जन नानक ब्रहमु धिआइओ ॥८॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1017) मारू महला ५ ॥
करि अनुग्रहु राखि लीनो भइओ साधू संगु ॥ हरि नाम रसु रसना उचारै मिसट गूड़ा रंगु ॥१॥

मेरे मान को असथानु ॥ मीत साजन सखा बंधपु अंतरजामी जानु ॥१॥ रहाउ ॥

संसार सागरु जिनि उपाइओ सरणि प्रभ की गही ॥ गुर प्रसादी प्रभु अराधे जमकंकरु किछु न कही ॥२॥

मोख मुकति दुआरि जा कै संत रिदा भंडारु ॥ जीअ जुगति सुजाणु सुआमी सदा राखणहारु ॥३॥

दूख दरद कलेस बिनसहि जिसु बसै मन माहि ॥ मिरतु नरकु असथान बिखड़े बिखु न पोहै ताहि ॥४॥

रिधि सिधि नव निधि जा कै अम्रिता परवाह ॥ आदि अंते मधि पूरन ऊच अगम अगाह ॥५॥

सिध साधिक देव मुनि जन बेद करहि उचारु ॥ सिमरि सुआमी सुख सहजि भुंचहि नही अंतु पारावारु ॥६॥

अनिक प्राछत मिटहि खिन महि रिदै जपि भगवान ॥ पावना ते महा पावन कोटि दान इसनान ॥७॥

बल बुधि सुधि पराण सरबसु संतना की रासि ॥ बिसरु नाही निमख मन ते नानक की अरदासि ॥८॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1017) मारू महला ५ ॥
ससत्रि तीखणि काटि डारिओ मनि न कीनो रोसु ॥ काजु उआ को ले सवारिओ तिलु न दीनो दोसु ॥१॥

मन मेरे राम रउ नित नीति ॥ दइआल देव क्रिपाल गोबिंद सुनि संतना की रीति ॥१॥ रहाउ ॥

चरण तलै उगाहि बैसिओ स्रमु न रहिओ सरीरि ॥ महा सागरु नह विआपै खिनहि उतरिओ तीरि ॥२॥

चंदन अगर कपूर लेपन तिसु संगे नही प्रीति ॥ बिसटा मूत्र खोदि तिलु तिलु मनि न मनी बिपरीति ॥३॥

ऊच नीच बिकार सुक्रित संलगन सभ सुख छत्र ॥ मित्र सत्रु न कछू जानै सरब जीअ समत ॥४॥

करि प्रगासु प्रचंड प्रगटिओ अंधकार बिनास ॥ पवित्र अपवित्रह किरण लागे मनि न भइओ बिखादु ॥५॥

सीत मंद सुगंध चलिओ सरब थान समान ॥ जहा सा किछु तहा लागिओ तिलु न संका मान ॥६॥

सुभाइ अभाइ जु निकटि आवै सीतु ता का जाइ ॥ आप पर का कछु न जाणै सदा सहजि सुभाइ ॥७॥

चरण सरण सनाथ इहु मनु रंगि राते लाल ॥ गोपाल गुण नित गाउ नानक भए प्रभ किरपाल ॥८॥३॥

(राग मारू -- SGGS 1018) मारू महला ५ घरु ४ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चादना चादनु आंगनि प्रभ जीउ अंतरि चादना ॥१॥

आराधना अराधनु नीका हरि हरि नामु अराधना ॥२॥

तिआगना तिआगनु नीका कामु क्रोधु लोभु तिआगना ॥३॥

मागना मागनु नीका हरि जसु गुर ते मागना ॥४॥

जागना जागनु नीका हरि कीरतन महि जागना ॥५॥

लागना लागनु नीका गुर चरणी मनु लागना ॥६॥

इह बिधि तिसहि परापते जा कै मसतकि भागना ॥७॥

कहु नानक तिसु सभु किछु नीका जो प्रभ की सरनागना ॥८॥१॥४॥

(राग मारू -- SGGS 1018) मारू महला ५ ॥
आउ जी तू आउ हमारै हरि जसु स्रवन सुनावना ॥१॥ रहाउ ॥

तुधु आवत मेरा मनु तनु हरिआ हरि जसु तुम संगि गावना ॥१॥

संत क्रिपा ते हिरदै वासै दूजा भाउ मिटावना ॥२॥

भगत दइआ ते बुधि परगासै दुरमति दूख तजावना ॥३॥

दरसनु भेटत होत पुनीता पुनरपि गरभि न पावना ॥४॥

नउ निधि रिधि सिधि पाई जो तुमरै मनि भावना ॥५॥

संत बिना मै थाउ न कोई अवर न सूझै जावना ॥६॥

मोहि निरगुन कउ कोइ न राखै संता संगि समावना ॥७॥

कहु नानक गुरि चलतु दिखाइआ मन मधे हरि हरि रावना ॥८॥२॥५॥

(राग मारू -- SGGS 1019) मारू महला ५ ॥
जीवना सफल जीवन सुनि हरि जपि जपि सद जीवना ॥१॥ रहाउ ॥

पीवना जितु मनु आघावै नामु अम्रित रसु पीवना ॥१॥

खावना जितु भूख न लागै संतोखि सदा त्रिपतीवना ॥२॥

पैनणा रखु पति परमेसुर फिरि नागे नही थीवना ॥३॥

भोगना मन मधे हरि रसु संतसंगति महि लीवना ॥४॥

बिनु तागे बिनु सूई आनी मनु हरि भगती संगि सीवना ॥५॥

मातिआ हरि रस महि राते तिसु बहुड़ि न कबहू अउखीवना ॥६॥

मिलिओ तिसु सरब निधाना प्रभि क्रिपालि जिसु दीवना ॥७॥

सुखु नानक संतन की सेवा चरण संत धोइ पीवना ॥८॥३॥६॥

(राग मारू -- SGGS 1019) मारू महला ५ घरु ८ अंजुलीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिसु ग्रिहि बहुतु तिसै ग्रिहि चिंता ॥ जिसु ग्रिहि थोरी सु फिरै भ्रमंता ॥ दुहू बिवसथा ते जो मुकता सोई सुहेला भालीऐ ॥१॥

ग्रिह राज महि नरकु उदास करोधा ॥ बहु बिधि बेद पाठ सभि सोधा ॥ देही महि जो रहै अलिपता तिसु जन की पूरन घालीऐ ॥२॥

जागत सूता भरमि विगूता ॥ बिनु गुर मुकति न होईऐ मीता ॥ साधसंगि तुटहि हउ बंधन एको एकु निहालीऐ ॥३॥

करम करै त बंधा नह करै त निंदा ॥ मोह मगन मनु विआपिआ चिंदा ॥ गुर प्रसादि सुखु दुखु सम जाणै घटि घटि रामु हिआलीऐ ॥४॥

संसारै महि सहसा बिआपै ॥ अकथ कथा अगोचर नही जापै ॥ जिसहि बुझाए सोई बूझै ओहु बालक वागी पालीऐ ॥५॥

छोडि बहै तउ छूटै नाही ॥ जउ संचै तउ भउ मन माही ॥ इस ही महि जिस की पति राखै तिसु साधू चउरु ढालीऐ ॥६॥

जो सूरा तिस ही होइ मरणा ॥ जो भागै तिसु जोनी फिरणा ॥ जो वरताए सोई भल मानै बुझि हुकमै दुरमति जालीऐ ॥७॥

जितु जितु लावहि तितु तितु लगना ॥ करि करि वेखै अपणे जचना ॥ नानक के पूरन सुखदाते तू देहि त नामु समालीऐ ॥८॥१॥७॥

(राग मारू -- SGGS 1019) मारू महला ५ ॥
बिरखै हेठि सभि जंत इकठे ॥ इकि तते इकि बोलनि मिठे ॥ असतु उदोतु भइआ उठि चले जिउ जिउ अउध विहाणीआ ॥१॥

पाप करेदड़ सरपर मुठे ॥ अजराईलि फड़े फड़ि कुठे ॥ दोजकि पाए सिरजणहारै लेखा मंगै बाणीआ ॥२॥

संगि न कोई भईआ बेबा ॥ मालु जोबनु धनु छोडि वञेसा ॥ करण करीम न जातो करता तिल पीड़े जिउ घाणीआ ॥३॥

खुसि खुसि लैदा वसतु पराई ॥ वेखै सुणे तेरै नालि खुदाई ॥ दुनीआ लबि पइआ खात अंदरि अगली गल न जाणीआ ॥४॥

जमि जमि मरै मरै फिरि जमै ॥ बहुतु सजाइ पइआ देसि लमै ॥ जिनि कीता तिसै न जाणी अंधा ता दुखु सहै पराणीआ ॥५॥

खालक थावहु भुला मुठा ॥ दुनीआ खेलु बुरा रुठ तुठा ॥ सिदकु सबूरी संतु न मिलिओ वतै आपण भाणीआ ॥६॥

मउला खेल करे सभि आपे ॥ इकि कढे इकि लहरि विआपे ॥ जिउ नचाए तिउ तिउ नचनि सिरि सिरि किरत विहाणीआ ॥७॥

मिहर करे ता खसमु धिआई ॥ संता संगति नरकि न पाई ॥ अम्रित नाम दानु नानक कउ गुण गीता नित वखाणीआ ॥८॥२॥८॥१२॥२०॥

(राग मारू -- SGGS 1071) मारू सोलहे महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कला उपाइ धरी जिनि धरणा ॥ गगनु रहाइआ हुकमे चरणा ॥ अगनि उपाइ ईधन महि बाधी सो प्रभु राखै भाई हे ॥१॥

जीअ जंत कउ रिजकु स्मबाहे ॥ करण कारण समरथ आपाहे ॥ खिन महि थापि उथापनहारा सोई तेरा सहाई हे ॥२॥

मात गरभ महि जिनि प्रतिपालिआ ॥ सासि ग्रासि होइ संगि समालिआ ॥ सदा सदा जपीऐ सो प्रीतमु वडी जिसु वडिआई हे ॥३॥

सुलतान खान करे खिन कीरे ॥ गरीब निवाजि करे प्रभु मीरे ॥ गरब निवारण सरब सधारण किछु कीमति कही न जाई हे ॥४॥

सो पतिवंता सो धनवंता ॥ जिसु मनि वसिआ हरि भगवंता ॥ मात पिता सुत बंधप भाई जिनि इह स्रिसटि उपाई हे ॥५॥

प्रभ आए सरणा भउ नही करणा ॥ साधसंगति निहचउ है तरणा ॥ मन बच करम अराधे करता तिसु नाही कदे सजाई हे ॥६॥

गुण निधान मन तन महि रविआ ॥ जनम मरण की जोनि न भविआ ॥ दूख बिनास कीआ सुखि डेरा जा त्रिपति रहे आघाई हे ॥७॥

मीतु हमारा सोई सुआमी ॥ थान थनंतरि अंतरजामी ॥ सिमरि सिमरि पूरन परमेसुर चिंता गणत मिटाई हे ॥८॥

हरि का नामु कोटि लख बाहा ॥ हरि जसु कीरतनु संगि धनु ताहा ॥ गिआन खड़गु करि किरपा दीना दूत मारे करि धाई हे ॥९॥

हरि का जापु जपहु जपु जपने ॥ जीति आवहु वसहु घरि अपने ॥ लख चउरासीह नरक न देखहु रसकि रसकि गुण गाई हे ॥१०॥

खंड ब्रहमंड उधारणहारा ॥ ऊच अथाह अगम अपारा ॥ जिस नो क्रिपा करे प्रभु अपनी सो जनु तिसहि धिआई हे ॥११॥

बंधन तोड़ि लीए प्रभि मोले ॥ करि किरपा कीने घर गोले ॥ अनहद रुण झुणकारु सहज धुनि साची कार कमाई हे ॥१२॥

मनि परतीति बनी प्रभ तेरी ॥ बिनसि गई हउमै मति मेरी ॥ अंगीकारु कीआ प्रभि अपनै जग महि सोभ सुहाई हे ॥१३॥

जै जै कारु जपहु जगदीसै ॥ बलि बलि जाई प्रभ अपुने ईसै ॥ तिसु बिनु दूजा अवरु न दीसै एका जगति सबाई हे ॥१४॥

सति सति सति प्रभु जाता ॥ गुर परसादि सदा मनु राता ॥ सिमरि सिमरि जीवहि जन तेरे एकंकारि समाई हे ॥१५॥

भगत जना का प्रीतमु पिआरा ॥ सभै उधारणु खसमु हमारा ॥ सिमरि नामु पुंनी सभ इछा जन नानक पैज रखाई हे ॥१६॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1072) मारू सोलहे महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
संगी जोगी नारि लपटाणी ॥ उरझि रही रंग रस माणी ॥ किरत संजोगी भए इकत्रा करते भोग बिलासा हे ॥१॥

जो पिरु करै सु धन ततु मानै ॥ पिरु धनहि सीगारि रखै संगानै ॥ मिलि एकत्र वसहि दिनु राती प्रिउ दे धनहि दिलासा हे ॥२॥

धन मागै प्रिउ बहु बिधि धावै ॥ जो पावै सो आणि दिखावै ॥ एक वसतु कउ पहुचि न साकै धन रहती भूख पिआसा हे ॥३॥

धन करै बिनउ दोऊ कर जोरै ॥ प्रिअ परदेसि न जाहु वसहु घरि मोरै ॥ ऐसा बणजु करहु ग्रिह भीतरि जितु उतरै भूख पिआसा हे ॥४॥

सगले करम धरम जुग साधा ॥ बिनु हरि रस सुखु तिलु नही लाधा ॥ भई क्रिपा नानक सतसंगे तउ धन पिर अनंद उलासा हे ॥५॥

धन अंधी पिरु चपलु सिआना ॥ पंच ततु का रचनु रचाना ॥ जिसु वखर कउ तुम आए हहु सो पाइओ सतिगुर पासा हे ॥६॥

धन कहै तू वसु मै नाले ॥ प्रिअ सुखवासी बाल गुपाले ॥ तुझै बिना हउ कित ही न लेखै वचनु देहि छोडि न जासा हे ॥७॥

पिरि कहिआ हउ हुकमी बंदा ॥ ओहु भारो ठाकुरु जिसु काणि न छंदा ॥ जिचरु राखै तिचरु तुम संगि रहणा जा सदे त ऊठि सिधासा हे ॥८॥

जउ प्रिअ बचन कहे धन साचे ॥ धन कछू न समझै चंचलि काचे ॥ बहुरि बहुरि पिर ही संगु मागै ओहु बात जानै करि हासा हे ॥९॥

आई आगिआ पिरहु बुलाइआ ॥ ना धन पुछी न मता पकाइआ ॥ ऊठि सिधाइओ छूटरि माटी देखु नानक मिथन मोहासा हे ॥१०॥

रे मन लोभी सुणि मन मेरे ॥ सतिगुरु सेवि दिनु राति सदेरे ॥ बिनु सतिगुर पचि मूए साकत निगुरे गलि जम फासा हे ॥११॥

मनमुखि आवै मनमुखि जावै ॥ मनमुखि फिरि फिरि चोटा खावै ॥ जितने नरक से मनमुखि भोगै गुरमुखि लेपु न मासा हे ॥१२॥

गुरमुखि सोइ जि हरि जीउ भाइआ ॥ तिसु कउणु मिटावै जि प्रभि पहिराइआ ॥ सदा अनंदु करे आनंदी जिसु सिरपाउ पइआ गलि खासा हे ॥१३॥

हउ बलिहारी सतिगुर पूरे ॥ सरणि के दाते बचन के सूरे ॥ ऐसा प्रभु मिलिआ सुखदाता विछुड़ि न कत ही जासा हे ॥१४॥

गुण निधान किछु कीम न पाई ॥ घटि घटि पूरि रहिओ सभ ठाई ॥ नानक सरणि दीन दुख भंजन हउ रेण तेरे जो दासा हे ॥१५॥१॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1073) मारू सोलहे महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करै अनंदु अनंदी मेरा ॥ घटि घटि पूरनु सिर सिरहि निबेरा ॥ सिरि साहा कै सचा साहिबु अवरु नाही को दूजा हे ॥१॥

हरखवंत आनंत दइआला ॥ प्रगटि रहिओ प्रभु सरब उजाला ॥ रूप करे करि वेखै विगसै आपे ही आपि पूजा हे ॥२॥

आपे कुदरति करे वीचारा ॥ आपे ही सचु करे पसारा ॥ आपे खेल खिलावै दिनु राती आपे सुणि सुणि भीजा हे ॥३॥

साचा तखतु सची पातिसाही ॥ सचु खजीना साचा साही ॥ आपे सचु धारिओ सभु साचा सचे सचि वरतीजा हे ॥४॥

सचु तपावसु सचे केरा ॥ साचा थानु सदा प्रभ तेरा ॥ सची कुदरति सची बाणी सचु साहिब सुखु कीजा हे ॥५॥

एको आपि तूहै वड राजा ॥ हुकमि सचे कै पूरे काजा ॥ अंतरि बाहरि सभु किछु जाणै आपे ही आपि पतीजा हे ॥६॥

तू वड रसीआ तू वड भोगी ॥ तू निरबाणु तूहै ही जोगी ॥ सरब सूख सहज घरि तेरै अमिउ तेरी द्रिसटीजा हे ॥७॥

तेरी दाति तुझै ते होवै ॥ देहि दानु सभसै जंत लोऐ ॥ तोटि न आवै पूर भंडारै त्रिपति रहे आघीजा हे ॥८॥

जाचहि सिध साधिक बनवासी ॥ जाचहि जती सती सुखवासी ॥ इकु दातारु सगल है जाचिक देहि दानु स्रिसटीजा हे ॥९॥

करहि भगति अरु रंग अपारा ॥ खिन महि थापि उथापनहारा ॥ भारो तोलु बेअंत सुआमी हुकमु मंनि भगतीजा हे ॥१०॥

जिसु देहि दरसु सोई तुधु जाणै ॥ ओहु गुर कै सबदि सदा रंग माणै ॥ चतुरु सरूपु सिआणा सोई जो मनि तेरै भावीजा हे ॥११॥

जिसु चीति आवहि सो वेपरवाहा ॥ जिसु चीति आवहि सो साचा साहा ॥ जिसु चीति आवहि तिसु भउ केहा अवरु कहा किछु कीजा हे ॥१२॥

त्रिसना बूझी अंतरु ठंढा ॥ गुरि पूरै लै तूटा गंढा ॥ सुरति सबदु रिद अंतरि जागी अमिउ झोलि झोलि पीजा हे ॥१३॥

मरै नाही सद सद ही जीवै ॥ अमरु भइआ अबिनासी थीवै ॥ ना को आवै ना को जावै गुरि दूरि कीआ भरमीजा हे ॥१४॥

पूरे गुर की पूरी बाणी ॥ पूरै लागा पूरे माहि समाणी ॥ चड़ै सवाइआ नित नित रंगा घटै नाही तोलीजा हे ॥१५॥

बारहा कंचनु सुधु कराइआ ॥ नदरि सराफ वंनी सचड़ाइआ ॥ परखि खजानै पाइआ सराफी फिरि नाही ताईजा हे ॥१६॥

अम्रित नामु तुमारा सुआमी ॥ नानक दास सदा कुरबानी ॥ संतसंगि महा सुखु पाइआ देखि दरसनु इहु मनु भीजा हे ॥१७॥१॥३॥

(राग मारू -- SGGS 1074) मारू महला ५ सोलहे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरु गोपालु गुरु गोविंदा ॥ गुरु दइआलु सदा बखसिंदा ॥ गुरु सासत सिम्रिति खटु करमा गुरु पवित्रु असथाना हे ॥१॥

गुरु सिमरत सभि किलविख नासहि ॥ गुरु सिमरत जम संगि न फासहि ॥ गुरु सिमरत मनु निरमलु होवै गुरु काटे अपमाना हे ॥२॥

गुर का सेवकु नरकि न जाए ॥ गुर का सेवकु पारब्रहमु धिआए ॥ गुर का सेवकु साधसंगु पाए गुरु करदा नित जीअ दाना हे ॥३॥

गुर दुआरै हरि कीरतनु सुणीऐ ॥ सतिगुरु भेटि हरि जसु मुखि भणीऐ ॥ कलि कलेस मिटाए सतिगुरु हरि दरगह देवै मानां हे ॥४॥

अगमु अगोचरु गुरू दिखाइआ ॥ भूला मारगि सतिगुरि पाइआ ॥ गुर सेवक कउ बिघनु न भगती हरि पूर द्रिड़्हाइआ गिआनां हे ॥५॥

गुरि द्रिसटाइआ सभनी ठांई ॥ जलि थलि पूरि रहिआ गोसाई ॥ ऊच ऊन सभ एक समानां मनि लागा सहजि धिआना हे ॥६॥

गुरि मिलिऐ सभ त्रिसन बुझाई ॥ गुरि मिलिऐ नह जोहै माई ॥ सतु संतोखु दीआ गुरि पूरै नामु अम्रितु पी पानां हे ॥७॥

गुर की बाणी सभ माहि समाणी ॥ आपि सुणी तै आपि वखाणी ॥ जिनि जिनि जपी तेई सभि निसत्रे तिन पाइआ निहचल थानां हे ॥८॥

सतिगुर की महिमा सतिगुरु जाणै ॥ जो किछु करे सु आपण भाणै ॥ साधू धूरि जाचहि जन तेरे नानक सद कुरबानां हे ॥९॥१॥४॥

(राग मारू -- SGGS 1075) मारू सोलहे महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आदि निरंजनु प्रभु निरंकारा ॥ सभ महि वरतै आपि निरारा ॥ वरनु जाति चिहनु नही कोई सभ हुकमे स्रिसटि उपाइदा ॥१॥

लख चउरासीह जोनि सबाई ॥ माणस कउ प्रभि दीई वडिआई ॥ इसु पउड़ी ते जो नरु चूकै सो आइ जाइ दुखु पाइदा ॥२॥

कीता होवै तिसु किआ कहीऐ ॥ गुरमुखि नामु पदारथु लहीऐ ॥ जिसु आपि भुलाए सोई भूलै सो बूझै जिसहि बुझाइदा ॥३॥

हरख सोग का नगरु इहु कीआ ॥ से उबरे जो सतिगुर सरणीआ ॥ त्रिहा गुणा ते रहै निरारा सो गुरमुखि सोभा पाइदा ॥४॥

अनिक करम कीए बहुतेरे ॥ जो कीजै सो बंधनु पैरे ॥ कुरुता बीजु बीजे नही जमै सभु लाहा मूलु गवाइदा ॥५॥

कलजुग महि कीरतनु परधाना ॥ गुरमुखि जपीऐ लाइ धिआना ॥ आपि तरै सगले कुल तारे हरि दरगह पति सिउ जाइदा ॥६॥

खंड पताल दीप सभि लोआ ॥ सभि कालै वसि आपि प्रभि कीआ ॥ निहचलु एकु आपि अबिनासी सो निहचलु जो तिसहि धिआइदा ॥७॥

हरि का सेवकु सो हरि जेहा ॥ भेदु न जाणहु माणस देहा ॥ जिउ जल तरंग उठहि बहु भाती फिरि सललै सलल समाइदा ॥८॥

इकु जाचिकु मंगै दानु दुआरै ॥ जा प्रभ भावै ता किरपा धारै ॥ देहु दरसु जितु मनु त्रिपतासै हरि कीरतनि मनु ठहराइदा ॥९॥

रूड़ो ठाकुरु कितै वसि न आवै ॥ हरि सो किछु करे जि हरि किआ संता भावै ॥ कीता लोड़नि सोई कराइनि दरि फेरु न कोई पाइदा ॥१०॥

जिथै अउघटु आइ बनतु है प्राणी ॥ तिथै हरि धिआईऐ सारिंगपाणी ॥ जिथै पुत्रु कलत्रु न बेली कोई तिथै हरि आपि छडाइदा ॥११॥

वडा साहिबु अगम अथाहा ॥ किउ मिलीऐ प्रभ वेपरवाहा ॥ काटि सिलक जिसु मारगि पाए सो विचि संगति वासा पाइदा ॥१२॥

हुकमु बूझै सो सेवकु कहीऐ ॥ बुरा भला दुइ समसरि सहीऐ ॥ हउमै जाइ त एको बूझै सो गुरमुखि सहजि समाइदा ॥१३॥

हरि के भगत सदा सुखवासी ॥ बाल सुभाइ अतीत उदासी ॥ अनिक रंग करहि बहु भाती जिउ पिता पूतु लाडाइदा ॥१४॥

अगम अगोचरु कीमति नही पाई ॥ ता मिलीऐ जा लए मिलाई ॥ गुरमुखि प्रगटु भइआ तिन जन कउ जिन धुरि मसतकि लेखु लिखाइदा ॥१५॥

तू आपे करता कारण करणा ॥ स्रिसटि उपाइ धरी सभ धरणा ॥ जन नानकु सरणि पइआ हरि दुआरै हरि भावै लाज रखाइदा ॥१६॥१॥५॥

(राग मारू -- SGGS 1076) मारू सोलहे महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जो दीसै सो एको तूहै ॥ बाणी तेरी स्रवणि सुणीऐ ॥ दूजी अवर न जापसि काई सगल तुमारी धारणा ॥१॥

आपि चितारे अपणा कीआ ॥ आपे आपि आपि प्रभु थीआ ॥ आपि उपाइ रचिओनु पसारा आपे घटि घटि सारणा ॥२॥

इकि उपाए वड दरवारी ॥ इकि उदासी इकि घर बारी ॥ इकि भूखे इकि त्रिपति अघाए सभसै तेरा पारणा ॥३॥

आपे सति सति सति साचा ॥ ओति पोति भगतन संगि राचा ॥ आपे गुपतु आपे है परगटु अपणा आपु पसारणा ॥४॥

सदा सदा सद होवणहारा ॥ ऊचा अगमु अथाहु अपारा ॥ ऊणे भरे भरे भरि ऊणे एहि चलत सुआमी के कारणा ॥५॥

मुखि सालाही सचे साहा ॥ नैणी पेखा अगम अथाहा ॥ करनी सुणि सुणि मनु तनु हरिआ मेरे साहिब सगल उधारणा ॥६॥

करि करि वेखहि कीता अपणा ॥ जीअ जंत सोई है जपणा ॥ अपणी कुदरति आपे जाणै नदरी नदरि निहालणा ॥७॥

संत सभा जह बैसहि प्रभ पासे ॥ अनंद मंगल हरि चलत तमासे ॥ गुण गावहि अनहद धुनि बाणी तह नानक दासु चितारणा ॥८॥

आवणु जाणा सभु चलतु तुमारा ॥ करि करि देखै खेलु अपारा ॥ आपि उपाए उपावणहारा अपणा कीआ पालणा ॥९॥

सुणि सुणि जीवा सोइ तुमारी ॥ सदा सदा जाई बलिहारी ॥ दुइ कर जोड़ि सिमरउ दिनु राती मेरे सुआमी अगम अपारणा ॥१०॥

तुधु बिनु दूजे किसु सालाही ॥ एको एकु जपी मन माही ॥ हुकमु बूझि जन भए निहाला इह भगता की घालणा ॥११॥

गुर उपदेसि जपीऐ मनि साचा ॥ गुर उपदेसि राम रंगि राचा ॥ गुर उपदेसि तुटहि सभि बंधन इहु भरमु मोहु परजालणा ॥१२॥

जह राखै सोई सुख थाना ॥ सहजे होइ सोई भल माना ॥ बिनसे बैर नाही को बैरी सभु एको है भालणा ॥१३॥

डर चूके बिनसे अंधिआरे ॥ प्रगट भए प्रभ पुरख निरारे ॥ आपु छोडि पए सरणाई जिस का सा तिसु घालणा ॥१४॥

ऐसा को वडभागी आइआ ॥ आठ पहर जिनि खसमु धिआइआ ॥ तिसु जन कै संगि तरै सभु कोई सो परवार सधारणा ॥१५॥

इह बखसीस खसम ते पावा ॥ आठ पहर कर जोड़ि धिआवा ॥ नामु जपी नामि सहजि समावा नामु नानक मिलै उचारणा ॥१६॥१॥६॥


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