Pt 19 - गुरू अमरदास जी - सलोक बाणी शब्द, Part 19 - Guru Amardas ji (Mahalla 3) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग मलार -- SGGS 1276) मलार महला ३ असटपदीआ घरु १ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करमु होवै ता सतिगुरु पाईऐ विणु करमै पाइआ न जाइ ॥ सतिगुरु मिलिऐ कंचनु होईऐ जां हरि की होइ रजाइ ॥१॥

मन मेरे हरि हरि नामि चितु लाइ ॥ सतिगुर ते हरि पाईऐ साचा हरि सिउ रहै समाइ ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुर ते गिआनु ऊपजै तां इह संसा जाइ ॥ सतिगुर ते हरि बुझीऐ गरभ जोनी नह पाइ ॥२॥

गुर परसादी जीवत मरै मरि जीवै सबदु कमाइ ॥ मुकति दुआरा सोई पाए जि विचहु आपु गवाइ ॥३॥

गुर परसादी सिव घरि जमै विचहु सकति गवाइ ॥ अचरु चरै बिबेक बुधि पाए पुरखै पुरखु मिलाइ ॥४॥

धातुर बाजी संसारु अचेतु है चलै मूलु गवाइ ॥ लाहा हरि सतसंगति पाईऐ करमी पलै पाइ ॥५॥

सतिगुर विणु किनै न पाइआ मनि वेखहु रिदै बीचारि ॥ वडभागी गुरु पाइआ भवजलु उतरे पारि ॥६॥

हरि नामां हरि टेक है हरि हरि नामु अधारु ॥ क्रिपा करहु गुरु मेलहु हरि जीउ पावउ मोख दुआरु ॥७॥

मसतकि लिलाटि लिखिआ धुरि ठाकुरि मेटणा न जाइ ॥ नानक से जन पूरन होए जिन हरि भाणा भाइ ॥८॥१॥

(राग मलार -- SGGS 1276) मलार महला ३ ॥
बेद बाणी जगु वरतदा त्रै गुण करे बीचारु ॥ बिनु नावै जम डंडु सहै मरि जनमै वारो वार ॥ सतिगुर भेटे मुकति होइ पाए मोख दुआरु ॥१॥

मन रे सतिगुरु सेवि समाइ ॥ वडै भागि गुरु पूरा पाइआ हरि हरि नामु धिआइ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि आपणै भाणै स्रिसटि उपाई हरि आपे देइ अधारु ॥ हरि आपणै भाणै मनु निरमलु कीआ हरि सिउ लागा पिआरु ॥ हरि कै भाणै सतिगुरु भेटिआ सभु जनमु सवारणहारु ॥२॥

वाहु वाहु बाणी सति है गुरमुखि बूझै कोइ ॥ वाहु वाहु करि प्रभु सालाहीऐ तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥ आपे बखसे मेलि लए करमि परापति होइ ॥३॥

साचा साहिबु माहरो सतिगुरि दीआ दिखाइ ॥ अम्रितु वरसै मनु संतोखीऐ सचि रहै लिव लाइ ॥ हरि कै नाइ सदा हरीआवली फिरि सुकै ना कुमलाइ ॥४॥

बिनु सतिगुर किनै न पाइओ मनि वेखहु को पतीआइ ॥ हरि किरपा ते सतिगुरु पाईऐ भेटै सहजि सुभाइ ॥ मनमुख भरमि भुलाइआ बिनु भागा हरि धनु न पाइ ॥५॥

त्रै गुण सभा धातु है पड़ि पड़ि करहि वीचारु ॥ मुकति कदे न होवई नहु पाइन्हि मोख दुआरु ॥ बिनु सतिगुर बंधन न तुटही नामि न लगै पिआरु ॥६॥

पड़ि पड़ि पंडित मोनी थके बेदां का अभिआसु ॥ हरि नामु चिति न आवई नह निज घरि होवै वासु ॥ जमकालु सिरहु न उतरै अंतरि कपट विणासु ॥७॥

हरि नावै नो सभु को परतापदा विणु भागां पाइआ न जाइ ॥ नदरि करे गुरु भेटीऐ हरि नामु वसै मनि आइ ॥ नानक नामे ही पति ऊपजै हरि सिउ रहां समाइ ॥८॥२॥

(राग मलार -- SGGS 1277) मलार महला ३ असटपदी घरु २ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि हरि क्रिपा करे गुर की कारै लाए ॥ दुखु पल्हरि हरि नामु वसाए ॥ साची गति साचै चितु लाए ॥ गुर की बाणी सबदि सुणाए ॥१॥

मन मेरे हरि हरि सेवि निधानु ॥ गुर किरपा ते हरि धनु पाईऐ अनदिनु लागै सहजि धिआनु ॥१॥ रहाउ ॥

बिनु पिर कामणि करे सींगारु ॥ दुहचारणी कहीऐ नित होइ खुआरु ॥ मनमुख का इहु बादि आचारु ॥ बहु करम द्रिड़ावहि नामु विसारि ॥२॥

गुरमुखि कामणि बणिआ सीगारु ॥ सबदे पिरु राखिआ उर धारि ॥ एकु पछाणै हउमै मारि ॥ सोभावंती कहीऐ नारि ॥३॥

बिनु गुर दाते किनै न पाइआ ॥ मनमुख लोभि दूजै लोभाइआ ॥ ऐसे गिआनी बूझहु कोइ ॥ बिनु गुर भेटे मुकति न होइ ॥४॥

कहि कहि कहणु कहै सभु कोइ ॥ बिनु मन मूए भगति न होइ ॥ गिआन मती कमल परगासु ॥ तितु घटि नामै नामि निवासु ॥५॥

हउमै भगति करे सभु कोइ ॥ ना मनु भीजै ना सुखु होइ ॥ कहि कहि कहणु आपु जाणाए ॥ बिरथी भगति सभु जनमु गवाए ॥६॥

से भगत सतिगुर मनि भाए ॥ अनदिनु नामि रहे लिव लाए ॥ सद ही नामु वेखहि हजूरि ॥ गुर कै सबदि रहिआ भरपूरि ॥७॥

आपे बखसे देइ पिआरु ॥ हउमै रोगु वडा संसारि ॥ गुर किरपा ते एहु रोगु जाइ ॥ नानक साचे साचि समाइ ॥८॥१॥३॥५॥८॥

सलोक महला ३ ॥
गुरि मिलिऐ मनु रहसीऐ जिउ वुठै धरणि सीगारु ॥ सभ दिसै हरीआवली सर भरे सुभर ताल ॥ अंदरु रचै सच रंगि जिउ मंजीठै लालु ॥ कमलु विगसै सचु मनि गुर कै सबदि निहालु ॥ मनमुख दूजी तरफ है वेखहु नदरि निहालि ॥ फाही फाथे मिरग जिउ सिरि दीसै जमकालु ॥ खुधिआ त्रिसना निंदा बुरी कामु क्रोधु विकरालु ॥ एनी अखी नदरि न आवई जिचरु सबदि न करे बीचारु ॥ तुधु भावै संतोखीआं चूकै आल जंजालु ॥ मूलु रहै गुरु सेविऐ गुर पउड़ी बोहिथु ॥ नानक लगी ततु लै तूं सचा मनि सचु ॥१॥

(राग मलार -- SGGS 1280) सलोक मः ३ ॥
ऊंनवि ऊंनवि आइआ अवरि करेंदा वंन ॥ किआ जाणा तिसु साह सिउ केव रहसी रंगु ॥ रंगु रहिआ तिन्ह कामणी जिन्ह मनि भउ भाउ होइ ॥ नानक भै भाइ बाहरी तिन तनि सुखु न होइ ॥१॥

(राग मलार -- SGGS 1280) मः ३ ॥
ऊंनवि ऊंनवि आइआ वरसै नीरु निपंगु ॥ नानक दुखु लागा तिन्ह कामणी जिन्ह कंतै सिउ मनि भंगु ॥२॥

(राग मलार -- SGGS 1280) सलोक मः ३ ॥
ऊंनवि ऊंनवि आइआ वरसै लाइ झड़ी ॥ नानक भाणै चलै कंत कै सु माणे सदा रली ॥१॥

(राग मलार -- SGGS 1280) मः ३ ॥
किआ उठि उठि देखहु बपुड़ें इसु मेघै हथि किछु नाहि ॥ जिनि एहु मेघु पठाइआ तिसु राखहु मन मांहि ॥ तिस नो मंनि वसाइसी जा कउ नदरि करेइ ॥ नानक नदरी बाहरी सभ करण पलाह करेइ ॥२॥

(राग मलार -- SGGS 1281) सलोक मः ३ ॥
बाबीहा जिस नो तू पूकारदा तिस नो लोचै सभु कोइ ॥ अपणी किरपा करि कै वससी वणु त्रिणु हरिआ होइ ॥ गुर परसादी पाईऐ विरला बूझै कोइ ॥ बहदिआ उठदिआ नित धिआईऐ सदा सदा सुखु होइ ॥ नानक अम्रितु सद ही वरसदा गुरमुखि देवै हरि सोइ ॥१॥

(राग मलार -- SGGS 1281) मः ३ ॥
कलमलि होई मेदनी अरदासि करे लिव लाइ ॥ सचै सुणिआ कंनु दे धीरक देवै सहजि सुभाइ ॥ इंद्रै नो फुरमाइआ वुठा छहबर लाइ ॥ अनु धनु उपजै बहु घणा कीमति कहणु न जाइ ॥ नानक नामु सलाहि तू सभना जीआ देदा रिजकु स्मबाहि ॥ जितु खाधै सुखु ऊपजै फिरि दूखु न लागै आइ ॥२॥

(राग मलार -- SGGS 1281) सलोक मः ३ ॥
नानक सो सालाहीऐ जिसु वसि सभु किछु होइ ॥ तिसै सरेविहु प्राणीहो तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ गुरमुखि हरि प्रभु मनि वसै तां सदा सदा सुखु होइ ॥ सहसा मूलि न होवई सभ चिंता विचहु जाइ ॥ जो किछु होइ सु सहजे होइ कहणा किछू न जाइ ॥ सचा साहिबु मनि वसै तां मनि चिंदिआ फलु पाइ ॥ नानक तिन का आखिआ आपि सुणे जि लइअनु पंनै पाइ ॥१॥

(राग मलार -- SGGS 1281) मः ३ ॥
अम्रितु सदा वरसदा बूझनि बूझणहार ॥ गुरमुखि जिन्ही बुझिआ हरि अम्रितु रखिआ उरि धारि ॥ हरि अम्रितु पीवहि सदा रंगि राते हउमै त्रिसना मारि ॥ अम्रितु हरि का नामु है वरसै किरपा धारि ॥ नानक गुरमुखि नदरी आइआ हरि आतम रामु मुरारि ॥२॥

(राग मलार -- SGGS 1282) सलोक मः ३ ॥
बाबीहा ना बिललाइ ना तरसाइ एहु मनु खसम का हुकमु मंनि ॥ नानक हुकमि मंनिऐ तिख उतरै चड़ै चवगलि वंनु ॥१॥

(राग मलार -- SGGS 1282) मः ३ ॥
बाबीहा जल महि तेरा वासु है जल ही माहि फिराहि ॥ जल की सार न जाणही तां तूं कूकण पाहि ॥ जल थल चहु दिसि वरसदा खाली को थाउ नाहि ॥ एतै जलि वरसदै तिख मरहि भाग तिना के नाहि ॥ नानक गुरमुखि तिन सोझी पई जिन वसिआ मन माहि ॥२॥

(राग मलार -- SGGS 1282) सलोक मः ३ ॥
इहु जलु सभ तै वरसदा वरसै भाइ सुभाइ ॥ से बिरखा हरीआवले जो गुरमुखि रहे समाइ ॥ नानक नदरी सुखु होइ एना जंता का दुखु जाइ ॥१॥

(राग मलार -- SGGS 1282) मः ३ ॥
भिंनी रैणि चमकिआ वुठा छहबर लाइ ॥ जितु वुठै अनु धनु बहुतु ऊपजै जां सहु करे रजाइ ॥ जितु खाधै मनु त्रिपतीऐ जीआं जुगति समाइ ॥ इहु धनु करते का खेलु है कदे आवै कदे जाइ ॥ गिआनीआ का धनु नामु है सद ही रहै समाइ ॥ नानक जिन कउ नदरि करे तां इहु धनु पलै पाइ ॥२॥

(राग मलार -- SGGS 1283) सलोक मः ३ ॥
बाबीहा एहु जगतु है मत को भरमि भुलाइ ॥ इहु बाबींहा पसू है इस नो बूझणु नाहि ॥ अम्रितु हरि का नामु है जितु पीतै तिख जाइ ॥ नानक गुरमुखि जिन्ह पीआ तिन्ह बहुड़ि न लागी आइ ॥१॥

(राग मलार -- SGGS 1283) मः ३ ॥
मलारु सीतल रागु है हरि धिआइऐ सांति होइ ॥ हरि जीउ अपणी क्रिपा करे तां वरतै सभ लोइ ॥ वुठै जीआ जुगति होइ धरणी नो सीगारु होइ ॥ नानक इहु जगतु सभु जलु है जल ही ते सभ कोइ ॥ गुर परसादी को विरला बूझै सो जनु मुकतु सदा होइ ॥२॥

(राग मलार -- SGGS 1283) सलोक मः ३ ॥
बाबीहा खसमै का महलु न जाणही महलु देखि अरदासि पाइ ॥ आपणै भाणै बहुता बोलहि बोलिआ थाइ न पाइ ॥ खसमु वडा दातारु है जो इछे सो फल पाइ ॥ बाबीहा किआ बपुड़ा जगतै की तिख जाइ ॥१॥

(राग मलार -- SGGS 1283) मः ३ ॥
बाबीहा भिंनी रैणि बोलिआ सहजे सचि सुभाइ ॥ इहु जलु मेरा जीउ है जल बिनु रहणु न जाइ ॥ गुर सबदी जलु पाईऐ विचहु आपु गवाइ ॥ नानक जिसु बिनु चसा न जीवदी सो सतिगुरि दीआ मिलाइ ॥२॥

(राग मलार -- SGGS 1283) सलोक मः ३ ॥
बाबीहा गुणवंती महलु पाइआ अउगणवंती दूरि ॥ अंतरि तेरै हरि वसै गुरमुखि सदा हजूरि ॥ कूक पुकार न होवई नदरी नदरि निहाल ॥ नानक नामि रते सहजे मिले सबदि गुरू कै घाल ॥१॥

(राग मलार -- SGGS 1284) मः ३ ॥
बाबीहा बेनती करे करि किरपा देहु जीअ दान ॥ जल बिनु पिआस न ऊतरै छुटकि जांहि मेरे प्रान ॥ तू सुखदाता बेअंतु है गुणदाता नेधानु ॥ नानक गुरमुखि बखसि लए अंति बेली होइ भगवानु ॥२॥

(राग मलार -- SGGS 1284) सलोक मः ३ ॥
बाबीहै हुकमु पछाणिआ गुर कै सहजि सुभाइ ॥ मेघु वरसै दइआ करि गूड़ी छहबर लाइ ॥ बाबीहे कूक पुकार रहि गई सुखु वसिआ मनि आइ ॥ नानक सो सालाहीऐ जि देंदा सभनां जीआ रिजकु समाइ ॥१॥

(राग मलार -- SGGS 1284) मः ३ ॥
चात्रिक तू न जाणही किआ तुधु विचि तिखा है कितु पीतै तिख जाइ ॥ दूजै भाइ भरमिआ अम्रित जलु पलै न पाइ ॥ नदरि करे जे आपणी तां सतिगुरु मिलै सुभाइ ॥ नानक सतिगुर ते अम्रित जलु पाइआ सहजे रहिआ समाइ ॥२॥

(राग मलार -- SGGS 1285) सलोक मः ३ ॥
बाबीहा अम्रित वेलै बोलिआ तां दरि सुणी पुकार ॥ मेघै नो फुरमानु होआ वरसहु किरपा धारि ॥ हउ तिन कै बलिहारणै जिनी सचु रखिआ उरि धारि ॥ नानक नामे सभ हरीआवली गुर कै सबदि वीचारि ॥१॥

(राग मलार -- SGGS 1285) मः ३ ॥
बाबीहा इव तेरी तिखा न उतरै जे सउ करहि पुकार ॥ नदरी सतिगुरु पाईऐ नदरी उपजै पिआरु ॥ नानक साहिबु मनि वसै विचहु जाहि विकार ॥२॥

(राग मलार -- SGGS 1285) सलोक मः ३ ॥
सावणि सरसी कामणी गुर सबदी वीचारि ॥ नानक सदा सुहागणी गुर कै हेति अपारि ॥१॥

(राग मलार -- SGGS 1285) मः ३ ॥
सावणि दझै गुण बाहरी जिसु दूजै भाइ पिआरु ॥ नानक पिर की सार न जाणई सभु सीगारु खुआरु ॥२॥

(राग मलार -- SGGS 1285) सलोक मः ३ ॥
गुरमुखि मलार रागु जो करहि तिन मनु तनु सीतलु होइ ॥ गुर सबदी एकु पछाणिआ एको सचा सोइ ॥ मनु तनु सचा सचु मनि सचे सची सोइ ॥ अंदरि सची भगति है सहजे ही पति होइ ॥ कलिजुग महि घोर अंधारु है मनमुख राहु न कोइ ॥ से वडभागी नानका जिन गुरमुखि परगटु होइ ॥१॥

(राग मलार -- SGGS 1285) मः ३ ॥
इंदु वरसै करि दइआ लोकां मनि उपजै चाउ ॥ जिस कै हुकमि इंदु वरसदा तिस कै सद बलिहारै जांउ ॥ गुरमुखि सबदु सम्हालीऐ सचे के गुण गाउ ॥ नानक नामि रते जन निरमले सहजे सचि समाउ ॥२॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1332) रागु प्रभाती महला ३ चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरमुखि विरला कोई बूझै सबदे रहिआ समाई ॥ नामि रते सदा सुखु पावै साचि रहै लिव लाई ॥१॥

हरि हरि नामु जपहु जन भाई ॥ गुर प्रसादि मनु असथिरु होवै अनदिनु हरि रसि रहिआ अघाई ॥१॥ रहाउ ॥

अनदिनु भगति करहु दिनु राती इसु जुग का लाहा भाई ॥ सदा जन निरमल मैलु न लागै सचि नामि चितु लाई ॥२॥

सुखु सीगारु सतिगुरू दिखाइआ नामि वडी वडिआई ॥ अखुट भंडार भरे कदे तोटि न आवै सदा हरि सेवहु भाई ॥३॥

आपे करता जिस नो देवै तिसु वसै मनि आई ॥ नानक नामु धिआइ सदा तू सतिगुरि दीआ दिखाई ॥४॥१॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1333) प्रभाती महला ३ ॥
निरगुणीआरे कउ बखसि लै सुआमी आपे लैहु मिलाई ॥ तू बिअंतु तेरा अंतु न पाइआ सबदे देहु बुझाई ॥१॥

हरि जीउ तुधु विटहु बलि जाई ॥ तनु मनु अरपी तुधु आगै राखउ सदा रहां सरणाई ॥१॥ रहाउ ॥

आपणे भाणे विचि सदा रखु सुआमी हरि नामो देहि वडिआई ॥ पूरे गुर ते भाणा जापै अनदिनु सहजि समाई ॥२॥

तेरै भाणै भगति जे तुधु भावै आपे बखसि मिलाई ॥ तेरै भाणै सदा सुखु पाइआ गुरि त्रिसना अगनि बुझाई ॥३॥

जो तू करहि सु होवै करते अवरु न करणा जाई ॥ नानक नावै जेवडु अवरु न दाता पूरे गुर ते पाई ॥४॥२॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1333) प्रभाती महला ३ ॥
गुरमुखि हरि सालाहिआ जिंना तिन सलाहि हरि जाता ॥ विचहु भरमु गइआ है दूजा गुर कै सबदि पछाता ॥१॥

हरि जीउ तू मेरा इकु सोई ॥ तुधु जपी तुधै सालाही गति मति तुझ ते होई ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमुखि सालाहनि से सादु पाइनि मीठा अम्रितु सारु ॥ सदा मीठा कदे न फीका गुर सबदी वीचारु ॥२॥

जिनि मीठा लाइआ सोई जाणै तिसु विटहु बलि जाई ॥ सबदि सलाही सदा सुखदाता विचहु आपु गवाई ॥३॥

सतिगुरु मेरा सदा है दाता जो इछै सो फलु पाए ॥ नानक नामु मिलै वडिआई गुर सबदी सचु पाए ॥४॥३॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1333) प्रभाती महला ३ ॥
जो तेरी सरणाई हरि जीउ तिन तू राखन जोगु ॥ तुधु जेवडु मै अवरु न सूझै ना को होआ न होगु ॥१॥

हरि जीउ सदा तेरी सरणाई ॥ जिउ भावै तिउ राखहु मेरे सुआमी एह तेरी वडिआई ॥१॥ रहाउ ॥

जो तेरी सरणाई हरि जीउ तिन की करहि प्रतिपाल ॥ आपि क्रिपा करि राखहु हरि जीउ पोहि न सकै जमकालु ॥२॥

तेरी सरणाई सची हरि जीउ ना ओह घटै न जाइ ॥ जो हरि छोडि दूजै भाइ लागै ओहु जमै तै मरि जाइ ॥३॥

जो तेरी सरणाई हरि जीउ तिना दूख भूख किछु नाहि ॥ नानक नामु सलाहि सदा तू सचै सबदि समाहि ॥४॥४॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1334) प्रभाती महला ३ ॥
गुरमुखि हरि जीउ सदा धिआवहु जब लगु जीअ परान ॥ गुर सबदी मनु निरमलु होआ चूका मनि अभिमानु ॥ सफलु जनमु तिसु प्रानी केरा हरि कै नामि समान ॥१॥

मेरे मन गुर की सिख सुणीजै ॥ हरि का नामु सदा सुखदाता सहजे हरि रसु पीजै ॥१॥ रहाउ ॥

मूलु पछाणनि तिन निज घरि वासा सहजे ही सुखु होई ॥ गुर कै सबदि कमलु परगासिआ हउमै दुरमति खोई ॥ सभना महि एको सचु वरतै विरला बूझै कोई ॥२॥

गुरमती मनु निरमलु होआ अम्रितु ततु वखानै ॥ हरि का नामु सदा मनि वसिआ विचि मन ही मनु मानै ॥ सद बलिहारी गुर अपुने विटहु जितु आतम रामु पछानै ॥३॥

मानस जनमि सतिगुरू न सेविआ बिरथा जनमु गवाइआ ॥ नदरि करे तां सतिगुरु मेले सहजे सहजि समाइआ ॥ नानक नामु मिलै वडिआई पूरै भागि धिआइआ ॥४॥५॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1334) प्रभाती महला ३ ॥
आपे भांति बणाए बहु रंगी सिसटि उपाइ प्रभि खेलु कीआ ॥ करि करि वेखै करे कराए सरब जीआ नो रिजकु दीआ ॥१॥

कली काल महि रविआ रामु ॥ घटि घटि पूरि रहिआ प्रभु एको गुरमुखि परगटु हरि हरि नामु ॥१॥ रहाउ ॥

गुपता नामु वरतै विचि कलजुगि घटि घटि हरि भरपूरि रहिआ ॥ नामु रतनु तिना हिरदै प्रगटिआ जो गुर सरणाई भजि पइआ ॥२॥

इंद्री पंच पंचे वसि आणै खिमा संतोखु गुरमति पावै ॥ सो धनु धनु हरि जनु वड पूरा जो भै बैरागि हरि गुण गावै ॥३॥

गुर ते मुहु फेरे जे कोई गुर का कहिआ न चिति धरै ॥ करि आचार बहु स्मपउ संचै जो किछु करै सु नरकि परै ॥४॥

एको सबदु एको प्रभु वरतै सभ एकसु ते उतपति चलै ॥ नानक गुरमुखि मेलि मिलाए गुरमुखि हरि हरि जाइ रलै ॥५॥६॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1334) प्रभाती महला ३ ॥
मेरे मन गुरु अपणा सालाहि ॥ पूरा भागु होवै मुखि मसतकि सदा हरि के गुण गाहि ॥१॥ रहाउ ॥

अम्रित नामु भोजनु हरि देइ ॥ कोटि मधे कोई विरला लेइ ॥ जिस नो अपणी नदरि करेइ ॥१॥

गुर के चरण मन माहि वसाइ ॥ दुखु अन्हेरा अंदरहु जाइ ॥ आपे साचा लए मिलाइ ॥२॥

गुर की बाणी सिउ लाइ पिआरु ॥ ऐथै ओथै एहु अधारु ॥ आपे देवै सिरजनहारु ॥३॥

सचा मनाए अपणा भाणा ॥ सोई भगतु सुघड़ु सोजाणा ॥ नानकु तिस कै सद कुरबाणा ॥४॥७॥१७॥७॥२४॥

(राग परभाती बिभास -- SGGS 1346) प्रभाती महला ३ बिभास
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुर परसादी वेखु तू हरि मंदरु तेरै नालि ॥ हरि मंदरु सबदे खोजीऐ हरि नामो लेहु सम्हालि ॥१॥

मन मेरे सबदि रपै रंगु होइ ॥ सची भगति सचा हरि मंदरु प्रगटी साची सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि मंदरु एहु सरीरु है गिआनि रतनि परगटु होइ ॥ मनमुख मूलु न जाणनी माणसि हरि मंदरु न होइ ॥२॥

हरि मंदरु हरि जीउ साजिआ रखिआ हुकमि सवारि ॥ धुरि लेखु लिखिआ सु कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥३॥

सबदु चीन्हि सुखु पाइआ सचै नाइ पिआर ॥ हरि मंदरु सबदे सोहणा कंचनु कोटु अपार ॥४॥

हरि मंदरु एहु जगतु है गुर बिनु घोरंधार ॥ दूजा भाउ करि पूजदे मनमुख अंध गवार ॥५॥

जिथै लेखा मंगीऐ तिथै देह जाति न जाइ ॥ साचि रते से उबरे दुखीए दूजै भाइ ॥६॥

हरि मंदर महि नामु निधानु है ना बूझहि मुगध गवार ॥ गुर परसादी चीन्हिआ हरि राखिआ उरि धारि ॥७॥

गुर की बाणी गुर ते जाती जि सबदि रते रंगु लाइ ॥ पवितु पावन से जन निरमल हरि कै नामि समाइ ॥८॥

हरि मंदरु हरि का हाटु है रखिआ सबदि सवारि ॥ तिसु विचि सउदा एकु नामु गुरमुखि लैनि सवारि ॥९॥

हरि मंदर महि मनु लोहटु है मोहिआ दूजै भाइ ॥ पारसि भेटिऐ कंचनु भइआ कीमति कही न जाइ ॥१०॥

हरि मंदर महि हरि वसै सरब निरंतरि सोइ ॥ नानक गुरमुखि वणजीऐ सचा सउदा होइ ॥११॥१॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1346) प्रभाती महला ३ ॥
भै भाइ जागे से जन जाग्रण करहि हउमै मैलु उतारि ॥ सदा जागहि घरु अपणा राखहि पंच तसकर काढहि मारि ॥१॥

मन मेरे गुरमुखि नामु धिआइ ॥ जितु मारगि हरि पाईऐ मन सेई करम कमाइ ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमुखि सहज धुनि ऊपजै दुखु हउमै विचहु जाइ ॥ हरि नामा हरि मनि वसै सहजे हरि गुण गाइ ॥२॥

गुरमती मुख सोहणे हरि राखिआ उरि धारि ॥ ऐथै ओथै सुखु घणा जपि हरि हरि उतरे पारि ॥३॥

हउमै विचि जाग्रणु न होवई हरि भगति न पवई थाइ ॥ मनमुख दरि ढोई ना लहहि भाइ दूजै करम कमाइ ॥४॥

ध्रिगु खाणा ध्रिगु पैन्हणा जिन्हा दूजै भाइ पिआरु ॥ बिसटा के कीड़े बिसटा राते मरि जमहि होहि खुआरु ॥५॥

जिन कउ सतिगुरु भेटिआ तिना विटहु बलि जाउ ॥ तिन की संगति मिलि रहां सचे सचि समाउ ॥६॥

पूरै भागि गुरु पाईऐ उपाइ कितै न पाइआ जाइ ॥ सतिगुर ते सहजु ऊपजै हउमै सबदि जलाइ ॥७॥

हरि सरणाई भजु मन मेरे सभ किछु करणै जोगु ॥ नानक नामु न वीसरै जो किछु करै सु होगु ॥८॥२॥७॥२॥९॥

(SGGS 1376) मः ३ ॥
चिंता भि आपि कराइसी अचिंतु भि आपे देइ ॥ नानक सो सालाहीऐ जि सभना सार करेइ ॥२२०॥

(SGGS 1378) मः ३ ॥
फरीदा काली धउली साहिबु सदा है जे को चिति करे ॥ आपणा लाइआ पिरमु न लगई जे लोचै सभु कोइ ॥ एहु पिरमु पिआला खसम का जै भावै तै देइ ॥१३॥

(SGGS 1380) मः ३ ॥
इहु तनु सभो रतु है रतु बिनु तंनु न होइ ॥ जो सह रते आपणे तितु तनि लोभु रतु न होइ ॥ भै पइऐ तनु खीणु होइ लोभु रतु विचहु जाइ ॥ जिउ बैसंतरि धातु सुधु होइ तिउ हरि का भउ दुरमति मैलु गवाइ ॥ नानक ते जन सोहणे जि रते हरि रंगु लाइ ॥५२॥

(SGGS 1383) मः ३ ॥
काइ पटोला पाड़ती क्मबलड़ी पहिरेइ ॥ नानक घर ही बैठिआ सहु मिलै जे नीअति रासि करेइ ॥१०४॥

(SGGS 1412) महला ३ ॥
लाहौर सहरु अम्रित सरु सिफती दा घरु ॥२८॥

(SGGS 1413) सलोक महला ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अभिआगत एह न आखीअहि जिन कै मन महि भरमु ॥ तिन के दिते नानका तेहो जेहा धरमु ॥१॥

(SGGS 1413) अभै निरंजन परम पदु ता का भीखकु होइ ॥ तिस का भोजनु नानका विरला पाए कोइ ॥२॥

(SGGS 1413) होवा पंडितु जोतकी वेद पड़ा मुखि चारि ॥ नवा खंडा विचि जाणीआ अपने चज वीचार ॥३॥

(SGGS 1413) ब्रहमण कैली घातु कंञका अणचारी का धानु ॥ फिटक फिटका कोड़ु बदीआ सदा सदा अभिमानु ॥ पाहि एते जाहि वीसरि नानका इकु नामु ॥ सभ बुधी जालीअहि इकु रहै ततु गिआनु ॥४॥

(SGGS 1413) माथै जो धुरि लिखिआ सु मेटि न सकै कोइ ॥ नानक जो लिखिआ सो वरतदा सो बूझै जिस नो नदरि होइ ॥५॥

(SGGS 1413) जिनी नामु विसारिआ कूड़ै लालचि लगि ॥ धंधा माइआ मोहणी अंतरि तिसना अगि ॥ जिन्हा वेलि न तू्मबड़ी माइआ ठगे ठगि ॥ मनमुख बंन्हि चलाईअहि ना मिलही वगि सगि ॥ आपि भुलाए भुलीऐ आपे मेलि मिलाइ ॥ नानक गुरमुखि छुटीऐ जे चलै सतिगुर भाइ ॥६॥

(SGGS 1413) सालाही सालाहणा भी सचा सालाहि ॥ नानक सचा एकु दरु बीभा परहरि आहि ॥७॥

(SGGS 1413) नानक जह जह मै फिरउ तह तह साचा सोइ ॥ जह देखा तह एकु है गुरमुखि परगटु होइ ॥८॥

(SGGS 1413) दूख विसारणु सबदु है जे मंनि वसाए कोइ ॥ गुर किरपा ते मनि वसै करम परापति होइ ॥९॥

(SGGS 1413) नानक हउ हउ करते खपि मुए खूहणि लख असंख ॥ सतिगुर मिले सु उबरे साचै सबदि अलंख ॥१०॥

(SGGS 1413) जिना सतिगुरु इक मनि सेविआ तिन जन लागउ पाइ ॥ गुर सबदी हरि मनि वसै माइआ की भुख जाइ ॥ से जन निरमल ऊजले जि गुरमुखि नामि समाइ ॥ नानक होरि पतिसाहीआ कूड़ीआ नामि रते पातिसाह ॥११॥

(SGGS 1413) जिउ पुरखै घरि भगती नारि है अति लोचै भगती भाइ ॥ बहु रस सालणे सवारदी खट रस मीठे पाइ ॥ तिउ बाणी भगत सलाहदे हरि नामै चितु लाइ ॥ मनु तनु धनु आगै राखिआ सिरु वेचिआ गुर आगै जाइ ॥ भै भगती भगत बहु लोचदे प्रभ लोचा पूरि मिलाइ ॥ हरि प्रभु वेपरवाहु है कितु खाधै तिपताइ ॥ सतिगुर कै भाणै जो चलै तिपतासै हरि गुण गाइ ॥ धनु धनु कलजुगि नानका जि चले सतिगुर भाइ ॥१२॥

(SGGS 1414) सतिगुरू न सेविओ सबदु न रखिओ उर धारि ॥ धिगु तिना का जीविआ कितु आए संसारि ॥ गुरमती भउ मनि पवै तां हरि रसि लगै पिआरि ॥ नाउ मिलै धुरि लिखिआ जन नानक पारि उतारि ॥१३॥

(SGGS 1414) माइआ मोहि जगु भरमिआ घरु मुसै खबरि न होइ ॥ काम क्रोधि मनु हिरि लइआ मनमुख अंधा लोइ ॥ गिआन खड़ग पंच दूत संघारे गुरमति जागै सोइ ॥ नाम रतनु परगासिआ मनु तनु निरमलु होइ ॥ नामहीन नकटे फिरहि बिनु नावै बहि रोइ ॥ नानक जो धुरि करतै लिखिआ सु मेटि न सकै कोइ ॥१४॥

(SGGS 1414) गुरमुखा हरि धनु खटिआ गुर कै सबदि वीचारि ॥ नामु पदारथु पाइआ अतुट भरे भंडार ॥ हरि गुण बाणी उचरहि अंतु न पारावारु ॥ नानक सभ कारण करता करै वेखै सिरजनहारु ॥१५॥

(SGGS 1414) गुरमुखि अंतरि सहजु है मनु चड़िआ दसवै आकासि ॥ तिथै ऊंघ न भुख है हरि अम्रित नामु सुख वासु ॥ नानक दुखु सुखु विआपत नही जिथै आतम राम प्रगासु ॥१६॥

(SGGS 1414) काम क्रोध का चोलड़ा सभ गलि आए पाइ ॥ इकि उपजहि इकि बिनसि जांहि हुकमे आवै जाइ ॥ जमणु मरणु न चुकई रंगु लगा दूजै भाइ ॥ बंधनि बंधि भवाईअनु करणा कछू न जाइ ॥१७॥

(SGGS 1414) जिन कउ किरपा धारीअनु तिना सतिगुरु मिलिआ आइ ॥ सतिगुरि मिले उलटी भई मरि जीविआ सहजि सुभाइ ॥ नानक भगती रतिआ हरि हरि नामि समाइ ॥१८॥

(SGGS 1414) मनमुख चंचल मति है अंतरि बहुतु चतुराई ॥ कीता करतिआ बिरथा गइआ इकु तिलु थाइ न पाई ॥ पुंन दानु जो बीजदे सभ धरम राइ कै जाई ॥ बिनु सतिगुरू जमकालु न छोडई दूजै भाइ खुआई ॥ जोबनु जांदा नदरि न आवई जरु पहुचै मरि जाई ॥ पुतु कलतु मोहु हेतु है अंति बेली को न सखाई ॥ सतिगुरु सेवे सो सुखु पाए नाउ वसै मनि आई ॥ नानक से वडे वडभागी जि गुरमुखि नामि समाई ॥१९॥

(SGGS 1414) मनमुख नामु न चेतनी बिनु नावै दुख रोइ ॥ आतमा रामु न पूजनी दूजै किउ सुखु होइ ॥ हउमै अंतरि मैलु है सबदि न काढहि धोइ ॥ नानक बिनु नावै मैलिआ मुए जनमु पदारथु खोइ ॥२०॥

(SGGS 1415) मनमुख बोले अंधुले तिसु महि अगनी का वासु ॥ बाणी सुरति न बुझनी सबदि न करहि प्रगासु ॥ ओना आपणी अंदरि सुधि नही गुर बचनि न करहि विसासु ॥ गिआनीआ अंदरि गुर सबदु है नित हरि लिव सदा विगासु ॥ हरि गिआनीआ की रखदा हउ सद बलिहारी तासु ॥ गुरमुखि जो हरि सेवदे जन नानकु ता का दासु ॥२१॥

(SGGS 1415) माइआ भुइअंगमु सरपु है जगु घेरिआ बिखु माइ ॥ बिखु का मारणु हरि नामु है गुर गरुड़ सबदु मुखि पाइ ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन सतिगुरु मिलिआ आइ ॥ मिलि सतिगुर निरमलु होइआ बिखु हउमै गइआ बिलाइ ॥ गुरमुखा के मुख उजले हरि दरगह सोभा पाइ ॥ जन नानकु सदा कुरबाणु तिन जो चालहि सतिगुर भाइ ॥२२॥

(SGGS 1415) सतिगुर पुरखु निरवैरु है नित हिरदै हरि लिव लाइ ॥ निरवैरै नालि वैरु रचाइदा अपणै घरि लूकी लाइ ॥ अंतरि क्रोधु अहंकारु है अनदिनु जलै सदा दुखु पाइ ॥ कूड़ु बोलि बोलि नित भउकदे बिखु खाधे दूजै भाइ ॥ बिखु माइआ कारणि भरमदे फिरि घरि घरि पति गवाइ ॥ बेसुआ केरे पूत जिउ पिता नामु तिसु जाइ ॥ हरि हरि नामु न चेतनी करतै आपि खुआइ ॥ हरि गुरमुखि किरपा धारीअनु जन विछुड़े आपि मिलाइ ॥ जन नानकु तिसु बलिहारणै जो सतिगुर लागे पाइ ॥२३॥

(SGGS 1415) नामि लगे से ऊबरे बिनु नावै जम पुरि जांहि ॥ नानक बिनु नावै सुखु नही आइ गए पछुताहि ॥२४॥


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