सोरठि की वार (महला 4), Sorath ki vaar (Mahalla 4) Path in Hindi Gurbani online


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रागु सोरठि वार महले ४ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

सलोकु मः १ ॥
सोरठि सदा सुहावणी जे सचा मनि होइ ॥ दंदी मैलु न कतु मनि जीभै सचा सोइ ॥ ससुरै पेईऐ भै वसी सतिगुरु सेवि निसंग ॥ परहरि कपड़ु जे पिर मिलै खुसी रावै पिरु संगि ॥ सदा सीगारी नाउ मनि कदे न मैलु पतंगु ॥ देवर जेठ मुए दुखि ससू का डरु किसु ॥ जे पिर भावै नानका करम मणी सभु सचु ॥१॥

मः ४ ॥
सोरठि तामि सुहावणी जा हरि नामु ढंढोले ॥ गुर पुरखु मनावै आपणा गुरमती हरि हरि बोले ॥ हरि प्रेमि कसाई दिनसु राति हरि रती हरि रंगि चोले ॥ हरि जैसा पुरखु न लभई सभु देखिआ जगतु मै टोले ॥ गुरि सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ मनु अनत न काहू डोले ॥ जनु नानकु हरि का दासु है गुर सतिगुर के गोल गोले ॥२॥

पउड़ी ॥
तू आपे सिसटि करता सिरजणहारिआ ॥ तुधु आपे खेलु रचाइ तुधु आपि सवारिआ ॥ दाता करता आपि आपि भोगणहारिआ ॥ सभु तेरा सबदु वरतै उपावणहारिआ ॥ हउ गुरमुखि सदा सलाही गुर कउ वारिआ ॥१॥

सलोकु मः ३ ॥
हउमै जलते जलि मुए भ्रमि आए दूजै भाइ ॥ पूरै सतिगुरि राखि लीए आपणै पंनै पाइ ॥ इहु जगु जलता नदरी आइआ गुर कै सबदि सुभाइ ॥ सबदि रते से सीतल भए नानक सचु कमाइ ॥१॥

मः ३ ॥
सफलिओ सतिगुरु सेविआ धंनु जनमु परवाणु ॥ जिना सतिगुरु जीवदिआ मुइआ न विसरै सेई पुरख सुजाण ॥ कुलु उधारे आपणा सो जनु होवै परवाणु ॥ गुरमुखि मुए जीवदे परवाणु हहि मनमुख जनमि मराहि ॥ नानक मुए न आखीअहि जि गुर कै सबदि समाहि ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि पुरखु निरंजनु सेवि हरि नामु धिआईऐ ॥ सतसंगति साधू लगि हरि नामि समाईऐ ॥ हरि तेरी वडी कार मै मूरख लाईऐ ॥ हउ गोला लाला तुधु मै हुकमु फुरमाईऐ ॥ हउ गुरमुखि कार कमावा जि गुरि समझाईऐ ॥२॥

सलोकु मः ३ ॥
पूरबि लिखिआ कमावणा जि करतै आपि लिखिआसु ॥ मोह ठगउली पाईअनु विसरिआ गुणतासु ॥ मतु जाणहु जगु जीवदा दूजै भाइ मुइआसु ॥ जिनी गुरमुखि नामु न चेतिओ से बहणि न मिलनी पासि ॥ दुखु लागा बहु अति घणा पुतु कलतु न साथि कोई जासि ॥ लोका विचि मुहु काला होआ अंदरि उभे सास ॥ मनमुखा नो को न विसही चुकि गइआ वेसासु ॥ नानक गुरमुखा नो सुखु अगला जिना अंतरि नाम निवासु ॥१॥

मः ३ ॥
से सैण से सजणा जि गुरमुखि मिलहि सुभाइ ॥ सतिगुर का भाणा अनदिनु करहि से सचि रहे समाइ ॥ दूजै भाइ लगे सजण न आखीअहि जि अभिमानु करहि वेकार ॥ मनमुख आप सुआरथी कारजु न सकहि सवारि ॥ नानक पूरबि लिखिआ कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥२॥

पउड़ी ॥
तुधु आपे जगतु उपाइ कै आपि खेलु रचाइआ ॥ त्रै गुण आपि सिरजिआ माइआ मोहु वधाइआ ॥ विचि हउमै लेखा मंगीऐ फिरि आवै जाइआ ॥ जिना हरि आपि क्रिपा करे से गुरि समझाइआ ॥ बलिहारी गुर आपणे सदा सदा घुमाइआ ॥३॥

सलोकु मः ३ ॥
माइआ ममता मोहणी जिनि विणु दंता जगु खाइआ ॥ मनमुख खाधे गुरमुखि उबरे जिनी सचि नामि चितु लाइआ ॥ बिनु नावै जगु कमला फिरै गुरमुखि नदरी आइआ ॥ धंधा करतिआ निहफलु जनमु गवाइआ सुखदाता मनि न वसाइआ ॥ नानक नामु तिना कउ मिलिआ जिन कउ धुरि लिखि पाइआ ॥१॥

मः ३ ॥
घर ही महि अम्रितु भरपूरु है मनमुखा सादु न पाइआ ॥ जिउ कसतूरी मिरगु न जाणै भ्रमदा भरमि भुलाइआ ॥ अम्रितु तजि बिखु संग्रहै करतै आपि खुआइआ ॥ गुरमुखि विरले सोझी पई तिना अंदरि ब्रहमु दिखाइआ ॥ तनु मनु सीतलु होइआ रसना हरि सादु आइआ ॥ सबदे ही नाउ ऊपजै सबदे मेलि मिलाइआ ॥ बिनु सबदै सभु जगु बउराना बिरथा जनमु गवाइआ ॥ अम्रितु एको सबदु है नानक गुरमुखि पाइआ ॥२॥

पउड़ी ॥
सो हरि पुरखु अगमु है कहु कितु बिधि पाईऐ ॥ तिसु रूपु न रेख अद्रिसटु कहु जन किउ धिआईऐ ॥ निरंकारु निरंजनु हरि अगमु किआ कहि गुण गाईऐ ॥ जिसु आपि बुझाए आपि सु हरि मारगि पाईऐ ॥ गुरि पूरै वेखालिआ गुर सेवा पाईऐ ॥४॥

सलोकु मः ३ ॥
जिउ तनु कोलू पीड़ीऐ रतु न भोरी डेहि ॥ जीउ वंञै चउ खंनीऐ सचे संदड़ै नेहि ॥ नानक मेलु न चुकई राती अतै डेह ॥१॥

मः ३ ॥
सजणु मैडा रंगुला रंगु लाए मनु लेइ ॥ जिउ माजीठै कपड़े रंगे भी पाहेहि ॥ नानक रंगु न उतरै बिआ न लगै केह ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि आपि वरतै आपि हरि आपि बुलाइदा ॥ हरि आपे स्रिसटि सवारि सिरि धंधै लाइदा ॥ इकना भगती लाइ इकि आपि खुआइदा ॥ इकना मारगि पाइ इकि उझड़ि पाइदा ॥ जनु नानकु नामु धिआए गुरमुखि गुण गाइदा ॥५॥

सलोकु मः ३ ॥
सतिगुर की सेवा सफलु है जे को करे चितु लाइ ॥ मनि चिंदिआ फलु पावणा हउमै विचहु जाइ ॥ बंधन तोड़ै मुकति होइ सचे रहै समाइ ॥ इसु जग महि नामु अलभु है गुरमुखि वसै मनि आइ ॥ नानक जो गुरु सेवहि आपणा हउ तिन बलिहारै जाउ ॥१॥

मः ३ ॥
मनमुख मंनु अजितु है दूजै लगै जाइ ॥ तिस नो सुखु सुपनै नही दुखे दुखि विहाइ ॥ घरि घरि पड़ि पड़ि पंडित थके सिध समाधि लगाइ ॥ इहु मनु वसि न आवई थके करम कमाइ ॥ भेखधारी भेख करि थके अठिसठि तीरथ नाइ ॥ मन की सार न जाणनी हउमै भरमि भुलाइ ॥ गुर परसादी भउ पइआ वडभागि वसिआ मनि आइ ॥ भै पइऐ मनु वसि होआ हउमै सबदि जलाइ ॥ सचि रते से निरमले जोती जोति मिलाइ ॥ सतिगुरि मिलिऐ नाउ पाइआ नानक सुखि समाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
एह भूपति राणे रंग दिन चारि सुहावणा ॥ एहु माइआ रंगु कसु्मभ खिन महि लहि जावणा ॥ चलदिआ नालि न चलै सिरि पाप लै जावणा ॥ जां पकड़ि चलाइआ कालि तां खरा डरावणा ॥ ओह वेला हथि न आवै फिरि पछुतावणा ॥६॥

सलोकु मः ३ ॥
सतिगुर ते जो मुह फिरे से बधे दुख सहाहि ॥ फिरि फिरि मिलणु न पाइनी जमहि तै मरि जाहि ॥ सहसा रोगु न छोडई दुख ही महि दुख पाहि ॥ नानक नदरी बखसि लेहि सबदे मेलि मिलाहि ॥१॥

मः ३ ॥
जो सतिगुर ते मुह फिरे तिना ठउर न ठाउ ॥ जिउ छुटड़ि घरि घरि फिरै दुहचारणि बदनाउ ॥ नानक गुरमुखि बखसीअहि से सतिगुर मेलि मिलाउ ॥२॥

पउड़ी ॥
जो सेवहि सति मुरारि से भवजल तरि गइआ ॥ जो बोलहि हरि हरि नाउ तिन जमु छडि गइआ ॥ से दरगह पैधे जाहि जिना हरि जपि लइआ ॥ हरि सेवहि सेई पुरख जिना हरि तुधु मइआ ॥ गुण गावा पिआरे नित गुरमुखि भ्रम भउ गइआ ॥७॥

सलोकु मः ३ ॥
थालै विचि तै वसतू पईओ हरि भोजनु अम्रितु सारु ॥ जितु खाधै मनु त्रिपतीऐ पाईऐ मोख दुआरु ॥ इहु भोजनु अलभु है संतहु लभै गुर वीचारि ॥ एह मुदावणी किउ विचहु कढीऐ सदा रखीऐ उरि धारि ॥ एह मुदावणी सतिगुरू पाई गुरसिखा लधी भालि ॥ नानक जिसु बुझाए सु बुझसी हरि पाइआ गुरमुखि घालि ॥१॥

मः ३ ॥
जो धुरि मेले से मिलि रहे सतिगुर सिउ चितु लाइ ॥ आपि विछोड़ेनु से विछुड़े दूजै भाइ खुआइ ॥ नानक विणु करमा किआ पाईऐ पूरबि लिखिआ कमाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
बहि सखीआ जसु गावहि गावणहारीआ ॥ हरि नामु सलाहिहु नित हरि कउ बलिहारीआ ॥ जिनी सुणि मंनिआ हरि नाउ तिना हउ वारीआ ॥ गुरमुखीआ हरि मेलु मिलावणहारीआ ॥ हउ बलि जावा दिनु राति गुर देखणहारीआ ॥८॥

सलोकु मः ३ ॥
विणु नावै सभि भरमदे नित जगि तोटा सैसारि ॥ मनमुखि करम कमावणे हउमै अंधु गुबारु ॥ गुरमुखि अम्रितु पीवणा नानक सबदु वीचारि ॥१॥

मः ३ ॥
सहजे जागै सहजे सोवै ॥ गुरमुखि अनदिनु उसतति होवै ॥ मनमुख भरमै सहसा होवै ॥ अंतरि चिंता नीद न सोवै ॥ गिआनी जागहि सवहि सुभाइ ॥ नानक नामि रतिआ बलि जाउ ॥२॥

पउड़ी ॥
से हरि नामु धिआवहि जो हरि रतिआ ॥ हरि इकु धिआवहि इकु इको हरि सतिआ ॥ हरि इको वरतै इकु इको उतपतिआ ॥ जो हरि नामु धिआवहि तिन डरु सटि घतिआ ॥ गुरमती देवै आपि गुरमुखि हरि जपिआ ॥९॥

सलोक मः ३ ॥
अंतरि गिआनु न आइओ जितु किछु सोझी पाइ ॥ विणु डिठा किआ सालाहीऐ अंधा अंधु कमाइ ॥ नानक सबदु पछाणीऐ नामु वसै मनि आइ ॥१॥

मः ३ ॥
इका बाणी इकु गुरु इको सबदु वीचारि ॥ सचा सउदा हटु सचु रतनी भरे भंडार ॥ गुर किरपा ते पाईअनि जे देवै देवणहारु ॥ सचा सउदा लाभु सदा खटिआ नामु अपारु ॥ विखु विचि अम्रितु प्रगटिआ करमि पीआवणहारु ॥ नानक सचु सलाहीऐ धंनु सवारणहारु ॥२॥

पउड़ी ॥
जिना अंदरि कूड़ु वरतै सचु न भावई ॥ जे को बोलै सचु कूड़ा जलि जावई ॥ कूड़िआरी रजै कूड़ि जिउ विसटा कागु खावई ॥ जिसु हरि होइ क्रिपालु सो नामु धिआवई ॥ हरि गुरमुखि नामु अराधि कूड़ु पापु लहि जावई ॥१०॥

सलोकु मः ३ ॥
सेखा चउचकिआ चउवाइआ एहु मनु इकतु घरि आणि ॥ एहड़ तेहड़ छडि तू गुर का सबदु पछाणु ॥ सतिगुर अगै ढहि पउ सभु किछु जाणै जाणु ॥ आसा मनसा जलाइ तू होइ रहु मिहमाणु ॥ सतिगुर कै भाणै भी चलहि ता दरगह पावहि माणु ॥ नानक जि नामु न चेतनी तिन धिगु पैनणु धिगु खाणु ॥१॥

मः ३ ॥
हरि गुण तोटि न आवई कीमति कहणु न जाइ ॥ नानक गुरमुखि हरि गुण रवहि गुण महि रहै समाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि चोली देह सवारी कढि पैधी भगति करि ॥ हरि पाटु लगा अधिकाई बहु बहु बिधि भाति करि ॥ कोई बूझै बूझणहारा अंतरि बिबेकु करि ॥ सो बूझै एहु बिबेकु जिसु बुझाए आपि हरि ॥ जनु नानकु कहै विचारा गुरमुखि हरि सति हरि ॥११॥

सलोकु मः ३ ॥
परथाइ साखी महा पुरख बोलदे साझी सगल जहानै ॥ गुरमुखि होइ सु भउ करे आपणा आपु पछाणै ॥ गुर परसादी जीवतु मरै ता मन ही ते मनु मानै ॥ जिन कउ मन की परतीति नाही नानक से किआ कथहि गिआनै ॥१॥

मः ३ ॥
गुरमुखि चितु न लाइओ अंति दुखु पहुता आइ ॥ अंदरहु बाहरहु अंधिआं सुधि न काई पाइ ॥ पंडित तिन की बरकती सभु जगतु खाइ जो रते हरि नाइ ॥ जिन गुर कै सबदि सलाहिआ हरि सिउ रहे समाइ ॥ पंडित दूजै भाइ बरकति न होवई ना धनु पलै पाइ ॥ पड़ि थके संतोखु न आइओ अनदिनु जलत विहाइ ॥ कूक पूकार न चुकई ना संसा विचहु जाइ ॥ नानक नाम विहूणिआ मुहि कालै उठि जाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि सजण मेलि पिआरे मिलि पंथु दसाई ॥ जो हरि दसे मितु तिसु हउ बलि जाई ॥ गुण साझी तिन सिउ करी हरि नामु धिआई ॥ हरि सेवी पिआरा नित सेवि हरि सुखु पाई ॥ बलिहारी सतिगुर तिसु जिनि सोझी पाई ॥१२॥

सलोकु मः ३ ॥
पंडित मैलु न चुकई जे वेद पड़ै जुग चारि ॥ त्रै गुण माइआ मूलु है विचि हउमै नामु विसारि ॥ पंडित भूले दूजै लागे माइआ कै वापारि ॥ अंतरि त्रिसना भुख है मूरख भुखिआ मुए गवार ॥ सतिगुरि सेविऐ सुखु पाइआ सचै सबदि वीचारि ॥ अंदरहु त्रिसना भुख गई सचै नाइ पिआरि ॥ नानक नामि रते सहजे रजे जिना हरि रखिआ उरि धारि ॥१॥

मः ३ ॥
मनमुख हरि नामु न सेविआ दुखु लगा बहुता आइ ॥ अंतरि अगिआनु अंधेरु है सुधि न काई पाइ ॥ मनहठि सहजि न बीजिओ भुखा कि अगै खाइ ॥ नामु निधानु विसारिआ दूजै लगा जाइ ॥ नानक गुरमुखि मिलहि वडिआईआ जे आपे मेलि मिलाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि रसना हरि जसु गावै खरी सुहावणी ॥ जो मनि तनि मुखि हरि बोलै सा हरि भावणी ॥ जो गुरमुखि चखै सादु सा त्रिपतावणी ॥ गुण गावै पिआरे नित गुण गाइ गुणी समझावणी ॥ जिसु होवै आपि दइआलु सा सतिगुरू गुरू बुलावणी ॥१३॥

सलोकु मः ३ ॥
हसती सिरि जिउ अंकसु है अहरणि जिउ सिरु देइ ॥ मनु तनु आगै राखि कै ऊभी सेव करेइ ॥ इउ गुरमुखि आपु निवारीऐ सभु राजु स्रिसटि का लेइ ॥ नानक गुरमुखि बुझीऐ जा आपे नदरि करेइ ॥१॥

मः ३ ॥
जिन गुरमुखि नामु धिआइआ आए ते परवाणु ॥ नानक कुल उधारहि आपणा दरगह पावहि माणु ॥२॥

पउड़ी ॥
गुरमुखि सखीआ सिख गुरू मेलाईआ ॥ इकि सेवक गुर पासि इकि गुरि कारै लाईआ ॥ जिना गुरु पिआरा मनि चिति तिना भाउ गुरू देवाईआ ॥ गुर सिखा इको पिआरु गुर मिता पुता भाईआ ॥ गुरु सतिगुरु बोलहु सभि गुरु आखि गुरू जीवाईआ ॥१४॥

सलोकु मः ३ ॥
नानक नामु न चेतनी अगिआनी अंधुले अवरे करम कमाहि ॥ जम दरि बधे मारीअहि फिरि विसटा माहि पचाहि ॥१॥

मः ३ ॥
नानक सतिगुरु सेवहि आपणा से जन सचे परवाणु ॥ हरि कै नाइ समाइ रहे चूका आवणु जाणु ॥२॥

पउड़ी ॥
धनु स्मपै माइआ संचीऐ अंते दुखदाई ॥ घर मंदर महल सवारीअहि किछु साथि न जाई ॥ हर रंगी तुरे नित पालीअहि कितै कामि न आई ॥ जन लावहु चितु हरि नाम सिउ अंति होइ सखाई ॥ जन नानक नामु धिआइआ गुरमुखि सुखु पाई ॥१५॥

सलोकु मः ३ ॥
बिनु करमै नाउ न पाईऐ पूरै करमि पाइआ जाइ ॥ नानक नदरि करे जे आपणी ता गुरमति मेलि मिलाइ ॥१॥

मः १ ॥
इक दझहि इक दबीअहि इकना कुते खाहि ॥ इकि पाणी विचि उसटीअहि इकि भी फिरि हसणि पाहि ॥ नानक एव न जापई किथै जाइ समाहि ॥२॥

पउड़ी ॥
तिन का खाधा पैधा माइआ सभु पवितु है जो नामि हरि राते ॥ तिन के घर मंदर महल सराई सभि पवितु हहि जिनी गुरमुखि सेवक सिख अभिआगत जाइ वरसाते ॥ तिन के तुरे जीन खुरगीर सभि पवितु हहि जिनी गुरमुखि सिख साध संत चड़ि जाते ॥ तिन के करम धरम कारज सभि पवितु हहि जो बोलहि हरि हरि राम नामु हरि साते ॥ जिन कै पोतै पुंनु है से गुरमुखि सिख गुरू पहि जाते ॥१६॥

सलोकु मः ३ ॥
नानक नावहु घुथिआ हलतु पलतु सभु जाइ ॥ जपु तपु संजमु सभु हिरि लइआ मुठी दूजै भाइ ॥ जम दरि बधे मारीअहि बहुती मिलै सजाइ ॥१॥

मः ३ ॥
संता नालि वैरु कमावदे दुसटा नालि मोहु पिआरु ॥ अगै पिछै सुखु नही मरि जमहि वारो वार ॥ त्रिसना कदे न बुझई दुबिधा होइ खुआरु ॥ मुह काले तिना निंदका तितु सचै दरबारि ॥ नानक नाम विहूणिआ ना उरवारि न पारि ॥२॥

पउड़ी ॥
जो हरि नामु धिआइदे से हरि हरि नामि रते मन माही ॥ जिना मनि चिति इकु अराधिआ तिना इकस बिनु दूजा को नाही ॥ सेई पुरख हरि सेवदे जिन धुरि मसतकि लेखु लिखाही ॥ हरि के गुण नित गावदे हरि गुण गाइ गुणी समझाही ॥ वडिआई वडी गुरमुखा गुर पूरै हरि नामि समाही ॥१७॥

सलोकु मः ३ ॥
सतिगुर की सेवा गाखड़ी सिरु दीजै आपु गवाइ ॥ सबदि मरहि फिरि ना मरहि ता सेवा पवै सभ थाइ ॥ पारस परसिऐ पारसु होवै सचि रहै लिव लाइ ॥ जिसु पूरबि होवै लिखिआ तिसु सतिगुरु मिलै प्रभु आइ ॥ नानक गणतै सेवकु ना मिलै जिसु बखसे सो पवै थाइ ॥१॥

मः ३ ॥
महलु कुमहलु न जाणनी मूरख अपणै सुआइ ॥ सबदु चीनहि ता महलु लहहि जोती जोति समाइ ॥ सदा सचे का भउ मनि वसै ता सभा सोझी पाइ ॥ सतिगुरु अपणै घरि वरतदा आपे लए मिलाइ ॥ नानक सतिगुरि मिलिऐ सभ पूरी पई जिस नो किरपा करे रजाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
धंनु धनु भाग तिना भगत जना जो हरि नामा हरि मुखि कहतिआ ॥ धनु धनु भाग तिना संत जना जो हरि जसु स्रवणी सुणतिआ ॥ धनु धनु भाग तिना साध जना हरि कीरतनु गाइ गुणी जन बणतिआ ॥ धनु धनु भाग तिना गुरमुखा जो गुरसिख लै मनु जिणतिआ ॥ सभ दू वडे भाग गुरसिखा के जो गुर चरणी सिख पड़तिआ ॥१८॥

सलोकु मः ३ ॥
ब्रहमु बिंदै तिस दा ब्रहमतु रहै एक सबदि लिव लाइ ॥ नव निधी अठारह सिधी पिछै लगीआ फिरहि जो हरि हिरदै सदा वसाइ ॥ बिनु सतिगुर नाउ न पाईऐ बुझहु करि वीचारु ॥ नानक पूरै भागि सतिगुरु मिलै सुखु पाए जुग चारि ॥१॥

मः ३ ॥
किआ गभरू किआ बिरधि है मनमुख त्रिसना भुख न जाइ ॥ गुरमुखि सबदे रतिआ सीतलु होए आपु गवाइ ॥ अंदरु त्रिपति संतोखिआ फिरि भुख न लगै आइ ॥ नानक जि गुरमुखि करहि सो परवाणु है जो नामि रहे लिव लाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
हउ बलिहारी तिंन कंउ जो गुरमुखि सिखा ॥ जो हरि नामु धिआइदे तिन दरसनु पिखा ॥ सुणि कीरतनु हरि गुण रवा हरि जसु मनि लिखा ॥ हरि नामु सलाही रंग सिउ सभि किलविख क्रिखा ॥ धनु धंनु सुहावा सो सरीरु थानु है जिथै मेरा गुरु धरे विखा ॥१९॥

सलोकु मः ३ ॥
गुर बिनु गिआनु न होवई ना सुखु वसै मनि आइ ॥ नानक नाम विहूणे मनमुखी जासनि जनमु गवाइ ॥१॥

मः ३ ॥
सिध साधिक नावै नो सभि खोजदे थकि रहे लिव लाइ ॥ बिनु सतिगुर किनै न पाइओ गुरमुखि मिलै मिलाइ ॥ बिनु नावै पैनणु खाणु सभु बादि है धिगु सिधी धिगु करमाति ॥ सा सिधि सा करमाति है अचिंतु करे जिसु दाति ॥ नानक गुरमुखि हरि नामु मनि वसै एहा सिधि एहा करमाति ॥२॥

पउड़ी ॥
हम ढाढी हरि प्रभ खसम के नित गावह हरि गुण छंता ॥ हरि कीरतनु करह हरि जसु सुणह तिसु कवला कंता ॥ हरि दाता सभु जगतु भिखारीआ मंगत जन जंता ॥ हरि देवहु दानु दइआल होइ विचि पाथर क्रिम जंता ॥ जन नानक नामु धिआइआ गुरमुखि धनवंता ॥२०॥

सलोकु मः ३ ॥
पड़णा गुड़णा संसार की कार है अंदरि त्रिसना विकारु ॥ हउमै विचि सभि पड़ि थके दूजै भाइ खुआरु ॥ सो पड़िआ सो पंडितु बीना गुर सबदि करे वीचारु ॥ अंदरु खोजै ततु लहै पाए मोख दुआरु ॥ गुण निधानु हरि पाइआ सहजि करे वीचारु ॥ धंनु वापारी नानका जिसु गुरमुखि नामु अधारु ॥१॥

मः ३ ॥
विणु मनु मारे कोइ न सिझई वेखहु को लिव लाइ ॥ भेखधारी तीरथी भवि थके ना एहु मनु मारिआ जाइ ॥ गुरमुखि एहु मनु जीवतु मरै सचि रहै लिव लाइ ॥ नानक इसु मन की मलु इउ उतरै हउमै सबदि जलाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि हरि संत मिलहु मेरे भाई हरि नामु द्रिड़ावहु इक किनका ॥ हरि हरि सीगारु बनावहु हरि जन हरि कापड़ु पहिरहु खिम का ॥ ऐसा सीगारु मेरे प्रभ भावै हरि लागै पिआरा प्रिम का ॥ हरि हरि नामु बोलहु दिनु राती सभि किलबिख काटै इक पलका ॥ हरि हरि दइआलु होवै जिसु उपरि सो गुरमुखि हरि जपि जिणका ॥२१॥

सलोकु मः ३ ॥
जनम जनम की इसु मन कउ मलु लागी काला होआ सिआहु ॥ खंनली धोती उजली न होवई जे सउ धोवणि पाहु ॥ गुर परसादी जीवतु मरै उलटी होवै मति बदलाहु ॥ नानक मैलु न लगई ना फिरि जोनी पाहु ॥१॥

मः ३ ॥
चहु जुगी कलि काली कांढी इक उतम पदवी इसु जुग माहि ॥ गुरमुखि हरि कीरति फलु पाईऐ जिन कउ हरि लिखि पाहि ॥ नानक गुर परसादी अनदिनु भगति हरि उचरहि हरि भगती माहि समाहि ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि हरि मेलि साध जन संगति मुखि बोली हरि हरि भली बाणि ॥ हरि गुण गावा हरि नित चवा गुरमती हरि रंगु सदा माणि ॥ हरि जपि जपि अउखध खाधिआ सभि रोग गवाते दुखा घाणि ॥ जिना सासि गिरासि न विसरै से हरि जन पूरे सही जाणि ॥ जो गुरमुखि हरि आराधदे तिन चूकी जम की जगत काणि ॥२२॥

सलोकु मः ३ ॥
रे जन उथारै दबिओहु सुतिआ गई विहाइ ॥ सतिगुर का सबदु सुणि न जागिओ अंतरि न उपजिओ चाउ ॥ सरीरु जलउ गुण बाहरा जो गुर कार न कमाइ ॥ जगतु जलंदा डिठु मै हउमै दूजै भाइ ॥ नानक गुर सरणाई उबरे सचु मनि सबदि धिआइ ॥१॥

मः ३ ॥
सबदि रते हउमै गई सोभावंती नारि ॥ पिर कै भाणै सदा चलै ता बनिआ सीगारु ॥ सेज सुहावी सदा पिरु रावै हरि वरु पाइआ नारि ॥ ना हरि मरै न कदे दुखु लागै सदा सुहागणि नारि ॥ नानक हरि प्रभ मेलि लई गुर कै हेति पिआरि ॥२॥

पउड़ी ॥
जिना गुरु गोपिआ आपणा ते नर बुरिआरी ॥ हरि जीउ तिन का दरसनु ना करहु पापिसट हतिआरी ॥ ओहि घरि घरि फिरहि कुसुध मनि जिउ धरकट नारी ॥ वडभागी संगति मिले गुरमुखि सवारी ॥ हरि मेलहु सतिगुर दइआ करि गुर कउ बलिहारी ॥२३॥

सलोकु मः ३ ॥
गुर सेवा ते सुखु ऊपजै फिरि दुखु न लगै आइ ॥ जमणु मरणा मिटि गइआ कालै का किछु न बसाइ ॥ हरि सेती मनु रवि रहिआ सचे रहिआ समाइ ॥ नानक हउ बलिहारी तिंन कउ जो चलनि सतिगुर भाइ ॥१॥

मः ३ ॥
बिनु सबदै सुधु न होवई जे अनेक करै सीगार ॥ पिर की सार न जाणई दूजै भाइ पिआरु ॥ सा कुसुध सा कुलखणी नानक नारी विचि कुनारि ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि हरि अपणी दइआ करि हरि बोली बैणी ॥ हरि नामु धिआई हरि उचरा हरि लाहा लैणी ॥ जो जपदे हरि हरि दिनसु राति तिन हउ कुरबैणी ॥ जिना सतिगुरु मेरा पिआरा अराधिआ तिन जन देखा नैणी ॥ हउ वारिआ अपणे गुरू कउ जिनि मेरा हरि सजणु मेलिआ सैणी ॥२४॥

सलोकु मः ४ ॥
हरि दासन सिउ प्रीति है हरि दासन को मितु ॥ हरि दासन कै वसि है जिउ जंती कै वसि जंतु ॥ हरि के दास हरि धिआइदे करि प्रीतम सिउ नेहु ॥ किरपा करि कै सुनहु प्रभ सभ जग महि वरसै मेहु ॥ जो हरि दासन की उसतति है सा हरि की वडिआई ॥ हरि आपणी वडिआई भावदी जन का जैकारु कराई ॥ सो हरि जनु नामु धिआइदा हरि हरि जनु इक समानि ॥ जनु नानकु हरि का दासु है हरि पैज रखहु भगवान ॥१॥

मः ४ ॥
नानक प्रीति लाई तिनि साचै तिसु बिनु रहणु न जाई ॥ सतिगुरु मिलै त पूरा पाईऐ हरि रसि रसन रसाई ॥२॥

पउड़ी ॥
रैणि दिनसु परभाति तूहै ही गावणा ॥ जीअ जंत सरबत नाउ तेरा धिआवणा ॥ तू दाता दातारु तेरा दिता खावणा ॥ भगत जना कै संगि पाप गवावणा ॥ जन नानक सद बलिहारै बलि बलि जावणा ॥२५॥

सलोकु मः ४ ॥
अंतरि अगिआनु भई मति मधिम सतिगुर की परतीति नाही ॥ अंदरि कपटु सभु कपटो करि जाणै कपटे खपहि खपाही ॥ सतिगुर का भाणा चिति न आवै आपणै सुआइ फिराही ॥ किरपा करे जे आपणी ता नानक सबदि समाही ॥१॥

मः ४ ॥
मनमुख माइआ मोहि विआपे दूजै भाइ मनूआ थिरु नाहि ॥ अनदिनु जलत रहहि दिनु राती हउमै खपहि खपाहि ॥ अंतरि लोभु महा गुबारा तिन कै निकटि न कोई जाहि ॥ ओइ आपि दुखी सुखु कबहू न पावहि जनमि मरहि मरि जाहि ॥ नानक बखसि लए प्रभु साचा जि गुर चरनी चितु लाहि ॥२॥

पउड़ी ॥
संत भगत परवाणु जो प्रभि भाइआ ॥ सेई बिचखण जंत जिनी हरि धिआइआ ॥ अम्रितु नामु निधानु भोजनु खाइआ ॥ संत जना की धूरि मसतकि लाइआ ॥ नानक भए पुनीत हरि तीरथि नाइआ ॥२६॥

सलोकु मः ४ ॥
गुरमुखि अंतरि सांति है मनि तनि नामि समाइ ॥ नामो चितवै नामु पड़ै नामि रहै लिव लाइ ॥ नामु पदारथु पाइआ चिंता गई बिलाइ ॥ सतिगुरि मिलिऐ नामु ऊपजै तिसना भुख सभ जाइ ॥ नानक नामे रतिआ नामो पलै पाइ ॥१॥

मः ४ ॥
सतिगुर पुरखि जि मारिआ भ्रमि भ्रमिआ घरु छोडि गइआ ॥ ओसु पिछै वजै फकड़ी मुहु काला आगै भइआ ॥ ओसु अरलु बरलु मुहहु निकलै नित झगू सुटदा मुआ ॥ किआ होवै किसै ही दै कीतै जां धुरि किरतु ओस दा एहो जेहा पइआ ॥ जिथै ओहु जाइ तिथै ओहु झूठा कूड़ु बोले किसै न भावै ॥ वेखहु भाई वडिआई हरि संतहु सुआमी अपुने की जैसा कोई करै तैसा कोई पावै ॥ एहु ब्रहम बीचारु होवै दरि साचै अगो दे जनु नानकु आखि सुणावै ॥२॥

पउड़ी ॥
गुरि सचै बधा थेहु रखवाले गुरि दिते ॥ पूरन होई आस गुर चरणी मन रते ॥ गुरि क्रिपालि बेअंति अवगुण सभि हते ॥ गुरि अपणी किरपा धारि अपणे करि लिते ॥ नानक सद बलिहार जिसु गुर के गुण इते ॥२७॥

सलोक मः १ ॥
ता की रजाइ लेखिआ पाइ अब किआ कीजै पांडे ॥ हुकमु होआ हासलु तदे होइ निबड़िआ हंढहि जीअ कमांदे ॥१॥

मः २ ॥
नकि नथ खसम हथ किरतु धके दे ॥ जहा दाणे तहां खाणे नानका सचु हे ॥२॥

पउड़ी ॥
सभे गला आपि थाटि बहालीओनु ॥ आपे रचनु रचाइ आपे ही घालिओनु ॥ आपे जंत उपाइ आपि प्रतिपालिओनु ॥ दास रखे कंठि लाइ नदरि निहालिओनु ॥ नानक भगता सदा अनंदु भाउ दूजा जालिओनु ॥२८॥

सलोकु मः ३ ॥
ए मन हरि जी धिआइ तू इक मनि इक चिति भाइ ॥ हरि कीआ सदा सदा वडिआईआ देइ न पछोताइ ॥ हउ हरि कै सद बलिहारणै जितु सेविऐ सुखु पाइ ॥ नानक गुरमुखि मिलि रहै हउमै सबदि जलाइ ॥१॥

मः ३ ॥
आपे सेवा लाइअनु आपे बखस करेइ ॥ सभना का मा पिउ आपि है आपे सार करेइ ॥ नानक नामु धिआइनि तिन निज घरि वासु है जुगु जुगु सोभा होइ ॥२॥

पउड़ी ॥
तू करण कारण समरथु हहि करते मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥ तुधु आपे सिसटि सिरजीआ आपे फुनि गोई ॥ सभु इको सबदु वरतदा जो करे सु होई ॥ वडिआई गुरमुखि देइ प्रभु हरि पावै सोई ॥ गुरमुखि नानक आराधिआ सभि आखहु धंनु धंनु धंनु गुरु सोई ॥२९॥१॥ सुधु


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