मारू की वार (महला 3), Maaroo ki vaar (Mahalla 3) Path in Hindi Gurbani online


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मारू वार महला ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

सलोकु मः १ ॥
विणु गाहक गुणु वेचीऐ तउ गुणु सहघो जाइ ॥ गुण का गाहकु जे मिलै तउ गुणु लाख विकाइ ॥ गुण ते गुण मिलि पाईऐ जे सतिगुर माहि समाइ ॥ मोलि अमोलु न पाईऐ वणजि न लीजै हाटि ॥ नानक पूरा तोलु है कबहु न होवै घाटि ॥१॥

मः ४ ॥
नाम विहूणे भरमसहि आवहि जावहि नीत ॥ इकि बांधे इकि ढीलिआ इकि सुखीए हरि प्रीति ॥ नानक सचा मंनि लै सचु करणी सचु रीति ॥२॥

पउड़ी ॥
गुर ते गिआनु पाइआ अति खड़गु करारा ॥ दूजा भ्रमु गड़ु कटिआ मोहु लोभु अहंकारा ॥ हरि का नामु मनि वसिआ गुर सबदि वीचारा ॥ सच संजमि मति ऊतमा हरि लगा पिआरा ॥ सभु सचो सचु वरतदा सचु सिरजणहारा ॥१॥

सलोकु मः ३ ॥
केदारा रागा विचि जाणीऐ भाई सबदे करे पिआरु ॥ सतसंगति सिउ मिलदो रहै सचे धरे पिआरु ॥ विचहु मलु कटे आपणी कुला का करे उधारु ॥ गुणा की रासि संग्रहै अवगण कढै विडारि ॥ नानक मिलिआ सो जाणीऐ गुरू न छोडै आपणा दूजै न धरे पिआरु ॥१॥

मः ४ ॥
सागरु देखउ डरि मरउ भै तेरै डरु नाहि ॥ गुर कै सबदि संतोखीआ नानक बिगसा नाइ ॥२॥

मः ४ ॥
चड़ि बोहिथै चालसउ सागरु लहरी देइ ॥ ठाक न सचै बोहिथै जे गुरु धीरक देइ ॥ तितु दरि जाइ उतारीआ गुरु दिसै सावधानु ॥ नानक नदरी पाईऐ दरगह चलै मानु ॥३॥

पउड़ी ॥
निहकंटक राजु भुंचि तू गुरमुखि सचु कमाई ॥ सचै तखति बैठा निआउ करि सतसंगति मेलि मिलाई ॥ सचा उपदेसु हरि जापणा हरि सिउ बणि आई ॥ ऐथै सुखदाता मनि वसै अंति होइ सखाई ॥ हरि सिउ प्रीति ऊपजी गुरि सोझी पाई ॥२॥

सलोकु मः १ ॥
भूली भूली मै फिरी पाधरु कहै न कोइ ॥ पूछहु जाइ सिआणिआ दुखु काटै मेरा कोइ ॥ सतिगुरु साचा मनि वसै साजनु उत ही ठाइ ॥ नानक मनु त्रिपतासीऐ सिफती साचै नाइ ॥१॥

मः ३ ॥
आपे करणी कार आपि आपे करे रजाइ ॥ आपे किस ही बखसि लए आपे कार कमाइ ॥ नानक चानणु गुर मिले दुख बिखु जाली नाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
माइआ वेखि न भुलु तू मनमुख मूरखा ॥ चलदिआ नालि न चलई सभु झूठु दरबु लखा ॥ अगिआनी अंधु न बूझई सिर ऊपरि जम खड़गु कलखा ॥ गुर परसादी उबरे जिन हरि रसु चखा ॥ आपि कराए करे आपि आपे हरि रखा ॥३॥

सलोकु मः ३ ॥
जिना गुरु नही भेटिआ भै की नाही बिंद ॥ आवणु जावणु दुखु घणा कदे न चूकै चिंद ॥ कापड़ जिवै पछोड़ीऐ घड़ी मुहत घड़ीआलु ॥ नानक सचे नाम बिनु सिरहु न चुकै जंजालु ॥१॥

मः ३ ॥
त्रिभवण ढूढी सजणा हउमै बुरी जगति ॥ ना झुरु हीअड़े सचु चउ नानक सचो सचु ॥२॥

पउड़ी ॥
गुरमुखि आपे बखसिओनु हरि नामि समाणे ॥ आपे भगती लाइओनु गुर सबदि नीसाणे ॥ सनमुख सदा सोहणे सचै दरि जाणे ॥ ऐथै ओथै मुकति है जिन राम पछाणे ॥ धंनु धंनु से जन जिन हरि सेविआ तिन हउ कुरबाणे ॥४॥

सलोकु मः १ ॥
महल कुचजी मड़वड़ी काली मनहु कसुध ॥ जे गुण होवनि ता पिरु रवै नानक अवगुण मुंध ॥१॥

मः १ ॥
साचु सील सचु संजमी सा पूरी परवारि ॥ नानक अहिनिसि सदा भली पिर कै हेति पिआरि ॥२॥

पउड़ी ॥
आपणा आपु पछाणिआ नामु निधानु पाइआ ॥ किरपा करि कै आपणी गुर सबदि मिलाइआ ॥ गुर की बाणी निरमली हरि रसु पीआइआ ॥ हरि रसु जिनी चाखिआ अन रस ठाकि रहाइआ ॥ हरि रसु पी सदा त्रिपति भए फिरि त्रिसना भुख गवाइआ ॥५॥

सलोकु मः ३ ॥
पिर खुसीए धन रावीए धन उरि नामु सीगारु ॥ नानक धन आगै खड़ी सोभावंती नारि ॥१॥

मः १ ॥
ससुरै पेईऐ कंत की कंतु अगमु अथाहु ॥ नानक धंनु सोहागणी जो भावहि वेपरवाह ॥२॥

पउड़ी ॥
तखति राजा सो बहै जि तखतै लाइक होई ॥ जिनी सचु पछाणिआ सचु राजे सेई ॥ एहि भूपति राजे न आखीअहि दूजै भाइ दुखु होई ॥ कीता किआ सालाहीऐ जिसु जादे बिलम न होई ॥ निहचलु सचा एकु है गुरमुखि बूझै सु निहचलु होई ॥६॥

सलोकु मः ३ ॥
सभना का पिरु एकु है पिर बिनु खाली नाहि ॥ नानक से सोहागणी जि सतिगुर माहि समाहि ॥१॥

मः ३ ॥
मन के अधिक तरंग किउ दरि साहिब छुटीऐ ॥ जे राचै सच रंगि गूड़ै रंगि अपार कै ॥ नानक गुर परसादी छुटीऐ जे चितु लगै सचि ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि का नामु अमोलु है किउ कीमति कीजै ॥ आपे स्रिसटि सभ साजीअनु आपे वरतीजै ॥ गुरमुखि सदा सलाहीऐ सचु कीमति कीजै ॥ गुर सबदी कमलु बिगासिआ इव हरि रसु पीजै ॥ आवण जाणा ठाकिआ सुखि सहजि सवीजै ॥७॥

सलोकु मः १ ॥
ना मैला ना धुंधला ना भगवा ना कचु ॥ नानक लालो लालु है सचै रता सचु ॥१॥

मः ३ ॥
सहजि वणसपति फुलु फलु भवरु वसै भै खंडि ॥ नानक तरवरु एकु है एको फुलु भिरंगु ॥२॥

पउड़ी ॥
जो जन लूझहि मनै सिउ से सूरे परधाना ॥ हरि सेती सदा मिलि रहे जिनी आपु पछाना ॥ गिआनीआ का इहु महतु है मन माहि समाना ॥ हरि जीउ का महलु पाइआ सचु लाइ धिआना ॥ जिन गुर परसादी मनु जीतिआ जगु तिनहि जिताना ॥८॥

सलोकु मः ३ ॥
जोगी होवा जगि भवा घरि घरि भीखिआ लेउ ॥ दरगह लेखा मंगीऐ किसु किसु उतरु देउ ॥ भिखिआ नामु संतोखु मड़ी सदा सचु है नालि ॥ भेखी हाथ न लधीआ सभ बधी जमकालि ॥ नानक गला झूठीआ सचा नामु समालि ॥१॥

मः ३ ॥
जितु दरि लेखा मंगीऐ सो दरु सेविहु न कोइ ॥ ऐसा सतिगुरु लोड़ि लहु जिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥ तिसु सरणाई छूटीऐ लेखा मंगै न कोइ ॥ सचु द्रिड़ाए सचु द्रिड़ु सचा ओहु सबदु देइ ॥ हिरदै जिस दै सचु है तनु मनु भी सचा होइ ॥ नानक सचै हुकमि मंनिऐ सची वडिआई देइ ॥ सचे माहि समावसी जिस नो नदरि करेइ ॥२॥

पउड़ी ॥
सूरे एहि न आखीअहि अहंकारि मरहि दुखु पावहि ॥ अंधे आपु न पछाणनी दूजै पचि जावहि ॥ अति करोध सिउ लूझदे अगै पिछै दुखु पावहि ॥ हरि जीउ अहंकारु न भावई वेद कूकि सुणावहि ॥ अहंकारि मुए से विगती गए मरि जनमहि फिरि आवहि ॥९॥

सलोकु मः ३ ॥
कागउ होइ न ऊजला लोहे नाव न पारु ॥ पिरम पदारथु मंनि लै धंनु सवारणहारु ॥ हुकमु पछाणै ऊजला सिरि कासट लोहा पारि ॥ त्रिसना छोडै भै वसै नानक करणी सारु ॥१॥

मः ३ ॥
मारू मारण जो गए मारि न सकहि गवार ॥ नानक जे इहु मारीऐ गुर सबदी वीचारि ॥ एहु मनु मारिआ ना मरै जे लोचै सभु कोइ ॥ नानक मन ही कउ मनु मारसी जे सतिगुरु भेटै सोइ ॥२॥

पउड़ी ॥
दोवै तरफा उपाईओनु विचि सकति सिव वासा ॥ सकती किनै न पाइओ फिरि जनमि बिनासा ॥ गुरि सेविऐ साति पाईऐ जपि सास गिरासा ॥ सिम्रिति सासत सोधि देखु ऊतम हरि दासा ॥ नानक नाम बिना को थिरु नही नामे बलि जासा ॥१०॥

सलोकु मः ३ ॥
होवा पंडितु जोतकी वेद पड़ा मुखि चारि ॥ नव खंड मधे पूजीआ अपणै चजि वीचारि ॥ मतु सचा अखरु भुलि जाइ चउकै भिटै न कोइ ॥ झूठे चउके नानका सचा एको सोइ ॥१॥

मः ३ ॥
आपि उपाए करे आपि आपे नदरि करेइ ॥ आपे दे वडिआईआ कहु नानक सचा सोइ ॥२॥

पउड़ी ॥
कंटकु कालु एकु है होरु कंटकु न सूझै ॥ अफरिओ जग महि वरतदा पापी सिउ लूझै ॥ गुर सबदी हरि भेदीऐ हरि जपि हरि बूझै ॥ सो हरि सरणाई छुटीऐ जो मन सिउ जूझै ॥ मनि वीचारि हरि जपु करे हरि दरगह सीझै ॥११॥

सलोकु मः १ ॥
हुकमि रजाई साखती दरगह सचु कबूलु ॥ साहिबु लेखा मंगसी दुनीआ देखि न भूलु ॥ दिल दरवानी जो करे दरवेसी दिलु रासि ॥ इसक मुहबति नानका लेखा करते पासि ॥१॥

मः १ ॥
अलगउ जोइ मधूकड़उ सारंगपाणि सबाइ ॥ हीरै हीरा बेधिआ नानक कंठि सुभाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
मनमुख कालु विआपदा मोहि माइआ लागे ॥ खिन महि मारि पछाड़सी भाइ दूजै ठागे ॥ फिरि वेला हथि न आवई जम का डंडु लागे ॥ तिन जम डंडु न लगई जो हरि लिव जागे ॥ सभ तेरी तुधु छडावणी सभ तुधै लागे ॥१२॥

सलोकु मः १ ॥
सरबे जोइ अगछमी दूखु घनेरो आथि ॥ कालरु लादसि सरु लाघणउ लाभु न पूंजी साथि ॥१॥

मः १ ॥
पूंजी साचउ नामु तू अखुटउ दरबु अपारु ॥ नानक वखरु निरमलउ धंनु साहु वापारु ॥२॥

मः १ ॥
पूरब प्रीति पिराणि लै मोटउ ठाकुरु माणि ॥ माथै ऊभै जमु मारसी नानक मेलणु नामि ॥३॥

पउड़ी ॥
आपे पिंडु सवारिओनु विचि नव निधि नामु ॥ इकि आपे भरमि भुलाइअनु तिन निहफल कामु ॥ इकनी गुरमुखि बुझिआ हरि आतम रामु ॥ इकनी सुणि कै मंनिआ हरि ऊतम कामु ॥ अंतरि हरि रंगु उपजिआ गाइआ हरि गुण नामु ॥१३॥

सलोकु मः १ ॥
भोलतणि भै मनि वसै हेकै पाधर हीडु ॥ अति डाहपणि दुखु घणो तीने थाव भरीडु ॥१॥

मः १ ॥
मांदलु बेदि सि बाजणो घणो धड़ीऐ जोइ ॥ नानक नामु समालि तू बीजउ अवरु न कोइ ॥२॥

मः १ ॥
सागरु गुणी अथाहु किनि हाथाला देखीऐ ॥ वडा वेपरवाहु सतिगुरु मिलै त पारि पवा ॥ मझ भरि दुख बदुख ॥ नानक सचे नाम बिनु किसै न लथी भुख ॥३॥

पउड़ी ॥
जिनी अंदरु भालिआ गुर सबदि सुहावै ॥ जो इछनि सो पाइदे हरि नामु धिआवै ॥ जिस नो क्रिपा करे तिसु गुरु मिलै सो हरि गुण गावै ॥ धरम राइ तिन का मितु है जम मगि न पावै ॥ हरि नामु धिआवहि दिनसु राति हरि नामि समावै ॥१४॥

सलोकु मः १ ॥
सुणीऐ एकु वखाणीऐ सुरगि मिरति पइआलि ॥ हुकमु न जाई मेटिआ जो लिखिआ सो नालि ॥ कउणु मूआ कउणु मारसी कउणु आवै कउणु जाइ ॥ कउणु रहसी नानका किस की सुरति समाइ ॥१॥

मः १ ॥
हउ मुआ मै मारिआ पउणु वहै दरीआउ ॥ त्रिसना थकी नानका जा मनु रता नाइ ॥ लोइण रते लोइणी कंनी सुरति समाइ ॥ जीभ रसाइणि चूनड़ी रती लाल लवाइ ॥ अंदरु मुसकि झकोलिआ कीमति कही न जाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
इसु जुग महि नामु निधानु है नामो नालि चलै ॥ एहु अखुटु कदे न निखुटई खाइ खरचिउ पलै ॥ हरि जन नेड़ि न आवई जमकंकर जमकलै ॥ से साह सचे वणजारिआ जिन हरि धनु पलै ॥ हरि किरपा ते हरि पाईऐ जा आपि हरि घलै ॥१५॥

सलोकु मः ३ ॥
मनमुख वापारै सार न जाणनी बिखु विहाझहि बिखु संग्रहहि बिख सिउ धरहि पिआरु ॥ बाहरहु पंडित सदाइदे मनहु मूरख गावार ॥ हरि सिउ चितु न लाइनी वादी धरनि पिआरु ॥ वादा कीआ करनि कहाणीआ कूड़ु बोलि करहि आहारु ॥ जग महि राम नामु हरि निरमला होरु मैला सभु आकारु ॥ नानक नामु न चेतनी होइ मैले मरहि गवार ॥१॥

मः ३ ॥
दुखु लगा बिनु सेविऐ हुकमु मंने दुखु जाइ ॥ आपे दाता सुखै दा आपे देइ सजाइ ॥ नानक एवै जाणीऐ सभु किछु तिसै रजाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि नाम बिना जगतु है निरधनु बिनु नावै त्रिपति नाही ॥ दूजै भरमि भुलाइआ हउमै दुखु पाही ॥ बिनु करमा किछू न पाईऐ जे बहुतु लोचाही ॥ आवै जाइ जमै मरै गुर सबदि छुटाही ॥ आपि करै किसु आखीऐ दूजा को नाही ॥१६॥

सलोकु मः ३ ॥
इसु जग महि संती धनु खटिआ जिना सतिगुरु मिलिआ प्रभु आइ ॥ सतिगुरि सचु द्रिड़ाइआ इसु धन की कीमति कही न जाइ ॥ इतु धनि पाइऐ भुख लथी सुखु वसिआ मनि आइ ॥ जिंन्हा कउ धुरि लिखिआ तिनी पाइआ आइ ॥ मनमुखु जगतु निरधनु है माइआ नो बिललाइ ॥ अनदिनु फिरदा सदा रहै भुख न कदे जाइ ॥ सांति न कदे आवई नह सुखु वसै मनि आइ ॥ सदा चिंत चितवदा रहै सहसा कदे न जाइ ॥ नानक विणु सतिगुर मति भवी सतिगुर नो मिलै ता सबदु कमाइ ॥ सदा सदा सुख महि रहै सचे माहि समाइ ॥१॥

मः ३ ॥
जिनि उपाई मेदनी सोई सार करेइ ॥ एको सिमरहु भाइरहु तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ खाणा सबदु चंगिआईआ जितु खाधै सदा त्रिपति होइ ॥ पैनणु सिफति सनाइ है सदा सदा ओहु ऊजला मैला कदे न होइ ॥ सहजे सचु धनु खटिआ थोड़ा कदे न होइ ॥ देही नो सबदु सीगारु है जितु सदा सदा सुखु होइ ॥ नानक गुरमुखि बुझीऐ जिस नो आपि विखाले सोइ ॥२॥

पउड़ी ॥
अंतरि जपु तपु संजमो गुर सबदी जापै ॥ हरि हरि नामु धिआईऐ हउमै अगिआनु गवापै ॥ अंदरु अम्रिति भरपूरु है चाखिआ सादु जापै ॥ जिन चाखिआ से निरभउ भए से हरि रसि ध्रापै ॥ हरि किरपा धारि पीआइआ फिरि कालु न विआपै ॥१७॥

सलोकु मः ३ ॥
लोकु अवगणा की बंन्है गंठड़ी गुण न विहाझै कोइ ॥ गुण का गाहकु नानका विरला कोई होइ ॥ गुर परसादी गुण पाईअन्हि जिस नो नदरि करेइ ॥१॥

मः ३ ॥
गुण अवगुण समानि हहि जि आपि कीते करतारि ॥ नानक हुकमि मंनिऐ सुखु पाईऐ गुर सबदी वीचारि ॥२॥

पउड़ी ॥
अंदरि राजा तखतु है आपे करे निआउ ॥ गुर सबदी दरु जाणीऐ अंदरि महलु असराउ ॥ खरे परखि खजानै पाईअनि खोटिआ नाही थाउ ॥ सभु सचो सचु वरतदा सदा सचु निआउ ॥ अम्रित का रसु आइआ मनि वसिआ नाउ ॥१८॥

सलोक मः १ ॥
हउ मै करी तां तू नाही तू होवहि हउ नाहि ॥ बूझहु गिआनी बूझणा एह अकथ कथा मन माहि ॥ बिनु गुर ततु न पाईऐ अलखु वसै सभ माहि ॥ सतिगुरु मिलै त जाणीऐ जां सबदु वसै मन माहि ॥ आपु गइआ भ्रमु भउ गइआ जनम मरन दुख जाहि ॥ गुरमति अलखु लखाईऐ ऊतम मति तराहि ॥ नानक सोहं हंसा जपु जापहु त्रिभवण तिसै समाहि ॥१॥

मः ३ ॥
मनु माणकु जिनि परखिआ गुर सबदी वीचारि ॥ से जन विरले जाणीअहि कलजुग विचि संसारि ॥ आपै नो आपु मिलि रहिआ हउमै दुबिधा मारि ॥ नानक नामि रते दुतरु तरे भउजलु बिखमु संसारु ॥२॥

पउड़ी ॥
मनमुख अंदरु न भालनी मुठे अहमते ॥ चारे कुंडां भवि थके अंदरि तिख तते ॥ सिम्रिति सासत न सोधनी मनमुख विगुते ॥ बिनु गुर किनै न पाइओ हरि नामु हरि सते ॥ ततु गिआनु वीचारिआ हरि जपि हरि गते ॥१९॥

सलोक मः २ ॥
आपे जाणै करे आपि आपे आणै रासि ॥ तिसै अगै नानका खलिइ कीचै अरदासि ॥१॥

मः १ ॥
जिनि कीआ तिनि देखिआ आपे जाणै सोइ ॥ किस नो कहीऐ नानका जा घरि वरतै सभु कोइ ॥२॥

पउड़ी ॥
सभे थोक विसारि इको मितु करि ॥ मनु तनु होइ निहालु पापा दहै हरि ॥ आवण जाणा चुकै जनमि न जाहि मरि ॥ सचु नामु आधारु सोगि न मोहि जरि ॥ नानक नामु निधानु मन महि संजि धरि ॥२०॥

सलोक मः ५ ॥
माइआ मनहु न वीसरै मांगै दमा दम ॥ सो प्रभु चिति न आवई नानक नही करम ॥१॥

मः ५ ॥
माइआ साथि न चलई किआ लपटावहि अंध ॥ गुर के चरण धिआइ तू तूटहि माइआ बंध ॥२॥

पउड़ी ॥
भाणै हुकमु मनाइओनु भाणै सुखु पाइआ ॥ भाणै सतिगुरु मेलिओनु भाणै सचु धिआइआ ॥ भाणे जेवड होर दाति नाही सचु आखि सुणाइआ ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन सचु कमाइआ ॥ नानक तिसु सरणागती जिनि जगतु उपाइआ ॥२१॥

सलोक मः ३ ॥
जिन कउ अंदरि गिआनु नही भै की नाही बिंद ॥ नानक मुइआ का किआ मारणा जि आपि मारे गोविंद ॥१॥

मः ३ ॥
मन की पत्री वाचणी सुखी हू सुखु सारु ॥ सो ब्राहमणु भला आखीऐ जि बूझै ब्रहमु बीचारु ॥ हरि सालाहे हरि पड़ै गुर कै सबदि वीचारि ॥ आइआ ओहु परवाणु है जि कुल का करे उधारु ॥ अगै जाति न पुछीऐ करणी सबदु है सारु ॥ होरु कूड़ु पड़णा कूड़ु कमावणा बिखिआ नालि पिआरु ॥ अंदरि सुखु न होवई मनमुख जनमु खुआरु ॥ नानक नामि रते से उबरे गुर कै हेति अपारि ॥२॥

पउड़ी ॥
आपे करि करि वेखदा आपे सभु सचा ॥ जो हुकमु न बूझै खसम का सोई नरु कचा ॥ जितु भावै तितु लाइदा गुरमुखि हरि सचा ॥ सभना का साहिबु एकु है गुर सबदी रचा ॥ गुरमुखि सदा सलाहीऐ सभि तिस दे जचा ॥ जिउ नानक आपि नचाइदा तिव ही को नचा ॥२२॥१॥ सुधु ॥


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