भक्त त्रिलोचन जी - बाणी शब्द, Bhagat Trilochan ji - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(राग सिरीरागु -- SGGS 92) सिरीरागु त्रिलोचन का ॥
माइआ मोहु मनि आगलड़ा प्राणी जरा मरणु भउ विसरि गइआ ॥ कुट्मबु देखि बिगसहि कमला जिउ पर घरि जोहहि कपट नरा ॥१॥

दूड़ा आइओहि जमहि तणा ॥ तिन आगलड़ै मै रहणु न जाइ ॥ कोई कोई साजणु आइ कहै ॥ मिलु मेरे बीठुला लै बाहड़ी वलाइ ॥ मिलु मेरे रमईआ मै लेहि छडाइ ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक अनिक भोग राज बिसरे प्राणी संसार सागर पै अमरु भइआ ॥ माइआ मूठा चेतसि नाही जनमु गवाइओ आलसीआ ॥२॥

बिखम घोर पंथि चालणा प्राणी रवि ससि तह न प्रवेसं ॥ माइआ मोहु तब बिसरि गइआ जां तजीअले संसारं ॥३॥

आजु मेरै मनि प्रगटु भइआ है पेखीअले धरमराओ ॥ तह कर दल करनि महाबली तिन आगलड़ै मै रहणु न जाइ ॥४॥

जे को मूं उपदेसु करतु है ता वणि त्रिणि रतड़ा नाराइणा ॥ ऐ जी तूं आपे सभ किछु जाणदा बदति त्रिलोचनु रामईआ ॥५॥२॥

(राग गूजरी -- SGGS 525) गूजरी स्री त्रिलोचन जीउ के पदे घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अंतरु मलि निरमलु नही कीना बाहरि भेख उदासी ॥ हिरदै कमलु घटि ब्रहमु न चीन्हा काहे भइआ संनिआसी ॥१॥

भरमे भूली रे जै चंदा ॥ नही नही चीन्हिआ परमानंदा ॥१॥ रहाउ ॥

घरि घरि खाइआ पिंडु बधाइआ खिंथा मुंदा माइआ ॥ भूमि मसाण की भसम लगाई गुर बिनु ततु न पाइआ ॥२॥

काइ जपहु रे काइ तपहु रे काइ बिलोवहु पाणी ॥ लख चउरासीह जिन्हि उपाई सो सिमरहु निरबाणी ॥३॥

काइ कमंडलु कापड़ीआ रे अठसठि काइ फिराही ॥ बदति त्रिलोचनु सुनु रे प्राणी कण बिनु गाहु कि पाही ॥४॥१॥

(राग गूजरी -- SGGS 526) गूजरी ॥
अंति कालि जो लछमी सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥ सरप जोनि वलि वलि अउतरै ॥१॥

अरी बाई गोबिद नामु मति बीसरै ॥ रहाउ ॥ अंति कालि जो इसत्री सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥ बेसवा जोनि वलि वलि अउतरै ॥२॥

अंति कालि जो लड़िके सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥ सूकर जोनि वलि वलि अउतरै ॥३॥

अंति कालि जो मंदर सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥ प्रेत जोनि वलि वलि अउतरै ॥४॥

अंति कालि नाराइणु सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥ बदति तिलोचनु ते नर मुकता पीत्मबरु वा के रिदै बसै ॥५॥२॥

(राग धनासरी -- SGGS 695) धनासरी बाणी भगतां की त्रिलोचन
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाराइण निंदसि काइ भूली गवारी ॥ दुक्रितु सुक्रितु थारो करमु री ॥१॥ रहाउ ॥

संकरा मसतकि बसता सुरसरी इसनान रे ॥ कुल जन मधे मिल्यिो सारग पान रे ॥ करम करि कलंकु मफीटसि री ॥१॥

बिस्व का दीपकु स्वामी ता चे रे सुआरथी पंखी राइ गरुड़ ता चे बाधवा ॥ करम करि अरुण पिंगुला री ॥२॥

अनिक पातिक हरता त्रिभवण नाथु री तीरथि तीरथि भ्रमता लहै न पारु री ॥ करम करि कपालु मफीटसि री ॥३॥

अम्रित ससीअ धेन लछिमी कलपतर सिखरि सुनागर नदी चे नाथं ॥ करम करि खारु मफीटसि री ॥४॥

दाधीले लंका गड़ु उपाड़ीले रावण बणु सलि बिसलि आणि तोखीले हरी ॥ करम करि कछउटी मफीटसि री ॥५॥

पूरबलो क्रित करमु न मिटै री घर गेहणि ता चे मोहि जापीअले राम चे नामं ॥ बदति त्रिलोचन राम जी ॥६॥१॥


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