सिरीराग की वार (महला 4), SriRaag ki vaar (Mahalla 4) Path in Hindi Gurbani online


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ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिरीराग की वार महला ४ सलोका नालि ॥

सलोक मः ३ ॥
रागा विचि स्रीरागु है जे सचि धरे पिआरु ॥ सदा हरि सचु मनि वसै निहचल मति अपारु ॥ रतनु अमोलकु पाइआ गुर का सबदु बीचारु ॥ जिहवा सची मनु सचा सचा सरीर अकारु ॥ नानक सचै सतिगुरि सेविऐ सदा सचु वापारु ॥१॥

मः ३ ॥
होरु बिरहा सभ धातु है जब लगु साहिब प्रीति न होइ ॥ इहु मनु माइआ मोहिआ वेखणु सुनणु न होइ ॥ सह देखे बिनु प्रीति न ऊपजै अंधा किआ करेइ ॥ नानक जिनि अखी लीतीआ सोई सचा देइ ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि इको करता इकु इको दीबाणु हरि ॥ हरि इकसै दा है अमरु इको हरि चिति धरि ॥ हरि तिसु बिनु कोई नाहि डरु भ्रमु भउ दूरि करि ॥ हरि तिसै नो सालाहि जि तुधु रखै बाहरि घरि ॥ हरि जिस नो होइ दइआलु सो हरि जपि भउ बिखमु तरि ॥१॥

सलोक मः १ ॥
दाती साहिब संदीआ किआ चलै तिसु नालि ॥ इक जागंदे ना लहंनि इकना सुतिआ देइ उठालि ॥१॥

मः १ ॥
सिदकु सबूरी सादिका सबरु तोसा मलाइकां ॥ दीदारु पूरे पाइसा थाउ नाही खाइका ॥२॥

पउड़ी ॥
सभ आपे तुधु उपाइ कै आपि कारै लाई ॥ तूं आपे वेखि विगसदा आपणी वडिआई ॥ हरि तुधहु बाहरि किछु नाही तूं सचा साई ॥ तूं आपे आपि वरतदा सभनी ही थाई ॥ हरि तिसै धिआवहु संत जनहु जो लए छडाई ॥२॥

सलोक मः १ ॥
फकड़ जाती फकड़ु नाउ ॥ सभना जीआ इका छाउ ॥ आपहु जे को भला कहाए ॥ नानक ता परु जापै जा पति लेखै पाए ॥१॥

मः २ ॥
जिसु पिआरे सिउ नेहु तिसु आगै मरि चलीऐ ॥ ध्रिगु जीवणु संसारि ता कै पाछै जीवणा ॥२॥

पउड़ी ॥
तुधु आपे धरती साजीऐ चंदु सूरजु दुइ दीवे ॥ दस चारि हट तुधु साजिआ वापारु करीवे ॥ इकना नो हरि लाभु देइ जो गुरमुखि थीवे ॥ तिन जमकालु न विआपई जिन सचु अम्रितु पीवे ॥ ओइ आपि छुटे परवार सिउ तिन पिछै सभु जगतु छुटीवे ॥३॥

सलोक मः १ ॥
कुदरति करि कै वसिआ सोइ ॥ वखतु वीचारे सु बंदा होइ ॥ कुदरति है कीमति नही पाइ ॥ जा कीमति पाइ त कही न जाइ ॥ सरै सरीअति करहि बीचारु ॥ बिनु बूझे कैसे पावहि पारु ॥ सिदकु करि सिजदा मनु करि मखसूदु ॥ जिह धिरि देखा तिह धिरि मउजूदु ॥१॥

मः ३ ॥
गुर सभा एव न पाईऐ ना नेड़ै ना दूरि ॥ नानक सतिगुरु तां मिलै जा मनु रहै हदूरि ॥२॥

पउड़ी ॥
सपत दीप सपत सागरा नव खंड चारि वेद दस असट पुराणा ॥ हरि सभना विचि तूं वरतदा हरि सभना भाणा ॥ सभि तुझै धिआवहि जीअ जंत हरि सारग पाणा ॥ जो गुरमुखि हरि आराधदे तिन हउ कुरबाणा ॥ तूं आपे आपि वरतदा करि चोज विडाणा ॥४॥

सलोक मः ३ ॥
कलउ मसाजनी किआ सदाईऐ हिरदै ही लिखि लेहु ॥ सदा साहिब कै रंगि रहै कबहूं न तूटसि नेहु ॥ कलउ मसाजनी जाइसी लिखिआ भी नाले जाइ ॥ नानक सह प्रीति न जाइसी जो धुरि छोडी सचै पाइ ॥१॥

मः ३ ॥
नदरी आवदा नालि न चलई वेखहु को विउपाइ ॥ सतिगुरि सचु द्रिड़ाइआ सचि रहहु लिव लाइ ॥ नानक सबदी सचु है करमी पलै पाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि अंदरि बाहरि इकु तूं तूं जाणहि भेतु ॥ जो कीचै सो हरि जाणदा मेरे मन हरि चेतु ॥ सो डरै जि पाप कमावदा धरमी विगसेतु ॥ तूं सचा आपि निआउ सचु ता डरीऐ केतु ॥ जिना नानक सचु पछाणिआ से सचि रलेतु ॥५॥

सलोक मः ३ ॥
कलम जलउ सणु मसवाणीऐ कागदु भी जलि जाउ ॥ लिखण वाला जलि बलउ जिनि लिखिआ दूजा भाउ ॥ नानक पूरबि लिखिआ कमावणा अवरु न करणा जाइ ॥१॥

मः ३ ॥
होरु कूड़ु पड़णा कूड़ु बोलणा माइआ नालि पिआरु ॥ नानक विणु नावै को थिरु नही पड़ि पड़ि होइ खुआरु ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि की वडिआई वडी है हरि कीरतनु हरि का ॥ हरि की वडिआई वडी है जा निआउ है धरम का ॥ हरि की वडिआई वडी है जा फलु है जीअ का ॥ हरि की वडिआई वडी है जा न सुणई कहिआ चुगल का ॥ हरि की वडिआई वडी है अपुछिआ दानु देवका ॥६॥

सलोक मः ३ ॥
हउ हउ करती सभ मुई स्मपउ किसै न नालि ॥ दूजै भाइ दुखु पाइआ सभ जोही जमकालि ॥ नानक गुरमुखि उबरे साचा नामु समालि ॥१॥

मः १ ॥
गलीं असी चंगीआ आचारी बुरीआह ॥ मनहु कुसुधा कालीआ बाहरि चिटवीआह ॥ रीसा करिह तिनाड़ीआ जो सेवहि दरु खड़ीआह ॥ नालि खसमै रतीआ माणहि सुखि रलीआह ॥ होदै ताणि निताणीआ रहहि निमानणीआह ॥ नानक जनमु सकारथा जे तिन कै संगि मिलाह ॥२॥

पउड़ी ॥
तूं आपे जलु मीना है आपे आपे ही आपि जालु ॥ तूं आपे जालु वताइदा आपे विचि सेबालु ॥ तूं आपे कमलु अलिपतु है सै हथा विचि गुलालु ॥ तूं आपे मुकति कराइदा इक निमख घड़ी करि खिआलु ॥ हरि तुधहु बाहरि किछु नही गुर सबदी वेखि निहालु ॥७॥

सलोक मः ३ ॥
हुकमु न जाणै बहुता रोवै ॥ अंदरि धोखा नीद न सोवै ॥ जे धन खसमै चलै रजाई ॥ दरि घरि सोभा महलि बुलाई ॥ नानक करमी इह मति पाई ॥ गुर परसादी सचि समाई ॥१॥

मः ३ ॥
मनमुख नाम विहूणिआ रंगु कसु्मभा देखि न भुलु ॥ इस का रंगु दिन थोड़िआ छोछा इस दा मुलु ॥ दूजै लगे पचि मुए मूरख अंध गवार ॥ बिसटा अंदरि कीट से पइ पचहि वारो वार ॥ नानक नाम रते से रंगुले गुर कै सहजि सुभाइ ॥ भगती रंगु न उतरै सहजे रहै समाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
सिसटि उपाई सभ तुधु आपे रिजकु स्मबाहिआ ॥ इकि वलु छलु करि कै खावदे मुहहु कूड़ु कुसतु तिनी ढाहिआ ॥ तुधु आपे भावै सो करहि तुधु ओतै कमि ओइ लाइआ ॥ इकना सचु बुझाइओनु तिना अतुट भंडार देवाइआ ॥ हरि चेति खाहि तिना सफलु है अचेता हथ तडाइआ ॥८॥

सलोक मः ३ ॥
पड़ि पड़ि पंडित बेद वखाणहि माइआ मोह सुआइ ॥ दूजै भाइ हरि नामु विसारिआ मन मूरख मिलै सजाइ ॥ जिनि जीउ पिंडु दिता तिसु कबहूं न चेतै जो देंदा रिजकु स्मबाहि ॥ जम का फाहा गलहु न कटीऐ फिरि फिरि आवै जाइ ॥ मनमुखि किछू न सूझै अंधुले पूरबि लिखिआ कमाइ ॥ पूरै भागि सतिगुरु मिलै सुखदाता नामु वसै मनि आइ ॥ सुखु माणहि सुखु पैनणा सुखे सुखि विहाइ ॥ नानक सो नाउ मनहु न विसारीऐ जितु दरि सचै सोभा पाइ ॥१॥

मः ३ ॥
सतिगुरु सेवि सुखु पाइआ सचु नामु गुणतासु ॥ गुरमती आपु पछाणिआ राम नाम परगासु ॥ सचो सचु कमावणा वडिआई वडे पासि ॥ जीउ पिंडु सभु तिस का सिफति करे अरदासि ॥ सचै सबदि सालाहणा सुखे सुखि निवासु ॥ जपु तपु संजमु मनै माहि बिनु नावै ध्रिगु जीवासु ॥ गुरमती नाउ पाईऐ मनमुख मोहि विणासु ॥ जिउ भावै तिउ राखु तूं नानकु तेरा दासु ॥२॥

पउड़ी ॥
सभु को तेरा तूं सभसु दा तूं सभना रासि ॥ सभि तुधै पासहु मंगदे नित करि अरदासि ॥ जिसु तूं देहि तिसु सभु किछु मिलै इकना दूरि है पासि ॥ तुधु बाझहु थाउ को नाही जिसु पासहु मंगीऐ मनि वेखहु को निरजासि ॥ सभि तुधै नो सालाहदे दरि गुरमुखा नो परगासि ॥९॥

सलोक मः ३ ॥
पंडितु पड़ि पड़ि उचा कूकदा माइआ मोहि पिआरु ॥ अंतरि ब्रहमु न चीनई मनि मूरखु गावारु ॥ दूजै भाइ जगतु परबोधदा ना बूझै बीचारु ॥ बिरथा जनमु गवाइआ मरि जमै वारो वार ॥१॥

मः ३ ॥
जिनी सतिगुरु सेविआ तिनी नाउ पाइआ बूझहु करि बीचारु ॥ सदा सांति सुखु मनि वसै चूकै कूक पुकार ॥ आपै नो आपु खाइ मनु निरमलु होवै गुर सबदी वीचारु ॥ नानक सबदि रते से मुकतु है हरि जीउ हेति पिआरु ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि की सेवा सफल है गुरमुखि पावै थाइ ॥ जिसु हरि भावै तिसु गुरु मिलै सो हरि नामु धिआइ ॥ गुर सबदी हरि पाईऐ हरि पारि लघाइ ॥ मनहठि किनै न पाइओ पुछहु वेदा जाइ ॥ नानक हरि की सेवा सो करे जिसु लए हरि लाइ ॥१०॥

सलोक मः ३ ॥
नानक सो सूरा वरीआमु जिनि विचहु दुसटु अहंकरणु मारिआ ॥ गुरमुखि नामु सालाहि जनमु सवारिआ ॥ आपि होआ सदा मुकतु सभु कुलु निसतारिआ ॥ सोहनि सचि दुआरि नामु पिआरिआ ॥ मनमुख मरहि अहंकारि मरणु विगाड़िआ ॥ सभो वरतै हुकमु किआ करहि विचारिआ ॥ आपहु दूजै लगि खसमु विसारिआ ॥ नानक बिनु नावै सभु दुखु सुखु विसारिआ ॥१॥

मः ३ ॥
गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ तिनि विचहु भरमु चुकाइआ ॥ राम नामु हरि कीरति गाई करि चानणु मगु दिखाइआ ॥ हउमै मारि एक लिव लागी अंतरि नामु वसाइआ ॥ गुरमती जमु जोहि न साकै साचै नामि समाइआ ॥ सभु आपे आपि वरतै करता जो भावै सो नाइ लाइआ ॥ जन नानकु नामु लए ता जीवै बिनु नावै खिनु मरि जाइआ ॥२॥

पउड़ी ॥
जो मिलिआ हरि दीबाण सिउ सो सभनी दीबाणी मिलिआ ॥ जिथै ओहु जाइ तिथै ओहु सुरखरू उस कै मुहि डिठै सभ पापी तरिआ ॥ ओसु अंतरि नामु निधानु है नामो परवरिआ ॥ नाउ पूजीऐ नाउ मंनीऐ नाइ किलविख सभ हिरिआ ॥ जिनी नामु धिआइआ इक मनि इक चिति से असथिरु जगि रहिआ ॥११॥

सलोक मः ३ ॥
आतमा देउ पूजीऐ गुर कै सहजि सुभाइ ॥ आतमे नो आतमे दी प्रतीति होइ ता घर ही परचा पाइ ॥ आतमा अडोलु न डोलई गुर कै भाइ सुभाइ ॥ गुर विणु सहजु न आवई लोभु मैलु न विचहु जाइ ॥ खिनु पलु हरि नामु मनि वसै सभ अठसठि तीरथ नाइ ॥ सचे मैलु न लगई मलु लागै दूजै भाइ ॥ धोती मूलि न उतरै जे अठसठि तीरथ नाइ ॥ मनमुख करम करे अहंकारी सभु दुखो दुखु कमाइ ॥ नानक मैला ऊजलु ता थीऐ जा सतिगुर माहि समाइ ॥१॥

मः ३ ॥
मनमुखु लोकु समझाईऐ कदहु समझाइआ जाइ ॥ मनमुखु रलाइआ ना रलै पइऐ किरति फिराइ ॥ लिव धातु दुइ राह है हुकमी कार कमाइ ॥ गुरमुखि आपणा मनु मारिआ सबदि कसवटी लाइ ॥ मन ही नालि झगड़ा मन ही नालि सथ मन ही मंझि समाइ ॥ मनु जो इछे सो लहै सचै सबदि सुभाइ ॥ अम्रित नामु सद भुंचीऐ गुरमुखि कार कमाइ ॥ विणु मनै जि होरी नालि लुझणा जासी जनमु गवाइ ॥ मनमुखी मनहठि हारिआ कूड़ु कुसतु कमाइ ॥ गुर परसादी मनु जिणै हरि सेती लिव लाइ ॥ नानक गुरमुखि सचु कमावै मनमुखि आवै जाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि के संत सुणहु जन भाई हरि सतिगुर की इक साखी ॥ जिसु धुरि भागु होवै मुखि मसतकि तिनि जनि लै हिरदै राखी ॥ हरि अम्रित कथा सरेसट ऊतम गुर बचनी सहजे चाखी ॥ तह भइआ प्रगासु मिटिआ अंधिआरा जिउ सूरज रैणि किराखी ॥ अदिसटु अगोचरु अलखु निरंजनु सो देखिआ गुरमुखि आखी ॥१२॥

सलोकु मः ३ ॥
सतिगुरु सेवे आपणा सो सिरु लेखै लाइ ॥ विचहु आपु गवाइ कै रहनि सचि लिव लाइ ॥ सतिगुरु जिनी न सेविओ तिना बिरथा जनमु गवाइ ॥ नानक जो तिसु भावै सो करे कहणा किछू न जाइ ॥१॥

मः ३ ॥
मनु वेकारी वेड़िआ वेकारा करम कमाइ ॥ दूजै भाइ अगिआनी पूजदे दरगह मिलै सजाइ ॥ आतम देउ पूजीऐ बिनु सतिगुर बूझ न पाइ ॥ जपु तपु संजमु भाणा सतिगुरू का करमी पलै पाइ ॥ नानक सेवा सुरति कमावणी जो हरि भावै सो थाइ पाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु सदा सुखु होवै दिनु राती ॥ हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु सिमरत सभि किलविख पाप लहाती ॥ हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु दालदु दुख भुख सभ लहि जाती ॥ हरि हरि नामु जपहु मन मेरे मुखि गुरमुखि प्रीति लगाती ॥ जितु मुखि भागु लिखिआ धुरि साचै हरि तितु मुखि नामु जपाती ॥१३॥

सलोक मः ३ ॥
सतिगुरु जिनी न सेविओ सबदि न कीतो वीचारु ॥ अंतरि गिआनु न आइओ मिरतकु है संसारि ॥ लख चउरासीह फेरु पइआ मरि जमै होइ खुआरु ॥ सतिगुर की सेवा सो करे जिस नो आपि कराए सोइ ॥ सतिगुर विचि नामु निधानु है करमि परापति होइ ॥ सचि रते गुर सबद सिउ तिन सची सदा लिव होइ ॥ नानक जिस नो मेले न विछुड़ै सहजि समावै सोइ ॥१॥

मः ३ ॥
सो भगउती जो भगवंतै जाणै ॥ गुर परसादी आपु पछाणै ॥ धावतु राखै इकतु घरि आणै ॥ जीवतु मरै हरि नामु वखाणै ॥ ऐसा भगउती उतमु होइ ॥ नानक सचि समावै सोइ ॥२॥

मः ३ ॥
अंतरि कपटु भगउती कहाए ॥ पाखंडि पारब्रहमु कदे न पाए ॥ पर निंदा करे अंतरि मलु लाए ॥ बाहरि मलु धोवै मन की जूठि न जाए ॥ सतसंगति सिउ बादु रचाए ॥ अनदिनु दुखीआ दूजै भाइ रचाए ॥ हरि नामु न चेतै बहु करम कमाए ॥ पूरब लिखिआ सु मेटणा न जाए ॥ नानक बिनु सतिगुर सेवे मोखु न पाए ॥३॥

पउड़ी ॥
सतिगुरु जिनी धिआइआ से कड़ि न सवाही ॥ सतिगुरु जिनी धिआइआ से त्रिपति अघाही ॥ सतिगुरु जिनी धिआइआ तिन जम डरु नाही ॥ जिन कउ होआ क्रिपालु हरि से सतिगुर पैरी पाही ॥ तिन ऐथै ओथै मुख उजले हरि दरगह पैधे जाही ॥१४॥

सलोक मः २ ॥
जो सिरु सांई ना निवै सो सिरु दीजै डारि ॥ नानक जिसु पिंजर महि बिरहा नही सो पिंजरु लै जारि ॥१॥

मः ५ ॥
मुंढहु भुली नानका फिरि फिरि जनमि मुईआसु ॥ कसतूरी कै भोलड़ै गंदे डुमि पईआसु ॥२॥

पउड़ी ॥
सो ऐसा हरि नामु धिआईऐ मन मेरे जो सभना उपरि हुकमु चलाए ॥ सो ऐसा हरि नामु जपीऐ मन मेरे जो अंती अउसरि लए छडाए ॥ सो ऐसा हरि नामु जपीऐ मन मेरे जु मन की त्रिसना सभ भुख गवाए ॥ सो गुरमुखि नामु जपिआ वडभागी तिन निंदक दुसट सभि पैरी पाए ॥ नानक नामु अराधि सभना ते वडा सभि नावै अगै आणि निवाए ॥१५॥

सलोक मः ३ ॥
वेस करे कुरूपि कुलखणी मनि खोटै कूड़िआरि ॥ पिर कै भाणै ना चलै हुकमु करे गावारि ॥ गुर कै भाणै जो चलै सभि दुख निवारणहारि ॥ लिखिआ मेटि न सकीऐ जो धुरि लिखिआ करतारि ॥ मनु तनु सउपे कंत कउ सबदे धरे पिआरु ॥ बिनु नावै किनै न पाइआ देखहु रिदै बीचारि ॥ नानक सा सुआलिओ सुलखणी जि रावी सिरजनहारि ॥१॥

मः ३ ॥
माइआ मोहु गुबारु है तिस दा न दिसै उरवारु न पारु ॥ मनमुख अगिआनी महा दुखु पाइदे डुबे हरि नामु विसारि ॥ भलके उठि बहु करम कमावहि दूजै भाइ पिआरु ॥ सतिगुरु सेवहि आपणा भउजलु उतरे पारि ॥ नानक गुरमुखि सचि समावहि सचु नामु उर धारि ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि जलि थलि महीअलि भरपूरि दूजा नाहि कोइ ॥ हरि आपि बहि करे निआउ कूड़िआर सभ मारि कढोइ ॥ सचिआरा देइ वडिआई हरि धरम निआउ कीओइ ॥ सभ हरि की करहु उसतति जिनि गरीब अनाथ राखि लीओइ ॥ जैकारु कीओ धरमीआ का पापी कउ डंडु दीओइ ॥१६॥

सलोक मः ३ ॥
मनमुख मैली कामणी कुलखणी कुनारि ॥ पिरु छोडिआ घरि आपणा पर पुरखै नालि पिआरु ॥ त्रिसना कदे न चुकई जलदी करे पूकार ॥ नानक बिनु नावै कुरूपि कुसोहणी परहरि छोडी भतारि ॥१॥

मः ३ ॥
सबदि रती सोहागणी सतिगुर कै भाइ पिआरि ॥ सदा रावे पिरु आपणा सचै प्रेमि पिआरि ॥ अति सुआलिउ सुंदरी सोभावंती नारि ॥ नानक नामि सोहागणी मेली मेलणहारि ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि तेरी सभ करहि उसतति जिनि फाथे काढिआ ॥ हरि तुधनो करहि सभ नमसकारु जिनि पापै ते राखिआ ॥ हरि निमाणिआ तूं माणु हरि डाढी हूं तूं डाढिआ ॥ हरि अहंकारीआ मारि निवाए मनमुख मूड़ साधिआ ॥ हरि भगता देइ वडिआई गरीब अनाथिआ ॥१७॥

सलोक मः ३ ॥
सतिगुर कै भाणै जो चलै तिसु वडिआई वडी होइ ॥ हरि का नामु उतमु मनि वसै मेटि न सकै कोइ ॥ किरपा करे जिसु आपणी तिसु करमि परापति होइ ॥ नानक कारणु करते वसि है गुरमुखि बूझै कोइ ॥१॥

मः ३ ॥
नानक हरि नामु जिनी आराधिआ अनदिनु हरि लिव तार ॥ माइआ बंदी खसम की तिन अगै कमावै कार ॥ पूरै पूरा करि छोडिआ हुकमि सवारणहार ॥ गुर परसादी जिनि बुझिआ तिनि पाइआ मोख दुआरु ॥ मनमुख हुकमु न जाणनी तिन मारे जम जंदारु ॥ गुरमुखि जिनी अराधिआ तिनी तरिआ भउजलु संसारु ॥ सभि अउगण गुणी मिटाइआ गुरु आपे बखसणहारु ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि की भगता परतीति हरि सभ किछु जाणदा ॥ हरि जेवडु नाही कोई जाणु हरि धरमु बीचारदा ॥ काड़ा अंदेसा किउ कीजै जा नाही अधरमि मारदा ॥ सचा साहिबु सचु निआउ पापी नरु हारदा ॥ सालाहिहु भगतहु कर जोड़ि हरि भगत जन तारदा ॥१८॥

सलोक मः ३ ॥
आपणे प्रीतम मिलि रहा अंतरि रखा उरि धारि ॥ सालाही सो प्रभ सदा सदा गुर कै हेति पिआरि ॥ नानक जिसु नदरि करे तिसु मेलि लए साई सुहागणि नारि ॥१॥

मः ३ ॥
गुर सेवा ते हरि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥ माणस ते देवते भए धिआइआ नामु हरे ॥ हउमै मारि मिलाइअनु गुर कै सबदि तरे ॥ नानक सहजि समाइअनु हरि आपणी क्रिपा करे ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि आपणी भगति कराइ वडिआई वेखालीअनु ॥ आपणी आपि करे परतीति आपे सेव घालीअनु ॥ हरि भगता नो देइ अनंदु थिरु घरी बहालिअनु ॥ पापीआ नो न देई थिरु रहणि चुणि नरक घोरि चालिअनु ॥ हरि भगता नो देइ पिआरु करि अंगु निसतारिअनु ॥१९॥

सलोक मः १ ॥
कुबुधि डूमणी कुदइआ कसाइणि पर निंदा घट चूहड़ी मुठी क्रोधि चंडालि ॥ कारी कढी किआ थीऐ जां चारे बैठीआ नालि ॥ सचु संजमु करणी कारां नावणु नाउ जपेही ॥ नानक अगै ऊतम सेई जि पापां पंदि न देही ॥१॥

मः १ ॥
किआ हंसु किआ बगुला जा कउ नदरि करेइ ॥ जो तिसु भावै नानका कागहु हंसु करेइ ॥२॥

पउड़ी ॥
कीता लोड़ीऐ कमु सु हरि पहि आखीऐ ॥ कारजु देइ सवारि सतिगुर सचु साखीऐ ॥ संता संगि निधानु अम्रितु चाखीऐ ॥ भै भंजन मिहरवान दास की राखीऐ ॥ नानक हरि गुण गाइ अलखु प्रभु लाखीऐ ॥२०॥

सलोक मः ३ ॥
जीउ पिंडु सभु तिस का सभसै देइ अधारु ॥ नानक गुरमुखि सेवीऐ सदा सदा दातारु ॥ हउ बलिहारी तिन कउ जिनि धिआइआ हरि निरंकारु ॥ ओना के मुख सद उजले ओना नो सभु जगतु करे नमसकारु ॥१॥

मः ३ ॥
सतिगुर मिलिऐ उलटी भई नव निधि खरचिउ खाउ ॥ अठारह सिधी पिछै लगीआ फिरनि निज घरि वसै निज थाइ ॥ अनहद धुनी सद वजदे उनमनि हरि लिव लाइ ॥ नानक हरि भगति तिना कै मनि वसै जिन मसतकि लिखिआ धुरि पाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
हउ ढाढी हरि प्रभ खसम का हरि कै दरि आइआ ॥ हरि अंदरि सुणी पूकार ढाढी मुखि लाइआ ॥ हरि पुछिआ ढाढी सदि कै कितु अरथि तूं आइआ ॥ नित देवहु दानु दइआल प्रभ हरि नामु धिआइआ ॥ हरि दातै हरि नामु जपाइआ नानकु पैनाइआ ॥२१॥१॥ सुधु


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