सलोक वारां ते वधीक, Slok Vaaran Te Vadheek (Mahalla 1 3 4 5) Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
सलोक वारां ते वधीक ॥

महला १ ॥

उतंगी पैओहरी गहिरी ग्मभीरी ॥ ससुड़ि सुहीआ किव करी निवणु न जाइ थणी ॥ गचु जि लगा गिड़वड़ी सखीए धउलहरी ॥ से भी ढहदे डिठु मै मुंध न गरबु थणी ॥१॥

सुणि मुंधे हरणाखीए गूड़ा वैणु अपारु ॥ पहिला वसतु सिञाणि कै तां कीचै वापारु ॥ दोही दिचै दुरजना मित्रां कूं जैकारु ॥ जितु दोही सजण मिलनि लहु मुंधे वीचारु ॥ तनु मनु दीजै सजणा ऐसा हसणु सारु ॥ तिस सउ नेहु न कीचई जि दिसै चलणहारु ॥ नानक जिन्ही इव करि बुझिआ तिन्हा विटहु कुरबाणु ॥२॥

जे तूं तारू पाणि ताहू पुछु तिड़ंन्ह कल ॥ ताहू खरे सुजाण वंञा एन्ही कपरी ॥३॥ झड़ झखड़ ओहाड़ लहरी वहनि लखेसरी ॥ सतिगुर सिउ आलाइ बेड़े डुबणि नाहि भउ ॥४॥

नानक दुनीआ कैसी होई ॥ सालकु मितु न रहिओ कोई ॥ भाई बंधी हेतु चुकाइआ ॥ दुनीआ कारणि दीनु गवाइआ ॥५॥

है है करि कै ओहि करेनि ॥ गल्हा पिटनि सिरु खोहेनि ॥ नाउ लैनि अरु करनि समाइ ॥ नानक तिन बलिहारै जाइ ॥६॥

रे मन डीगि न डोलीऐ सीधै मारगि धाउ ॥ पाछै बाघु डरावणो आगै अगनि तलाउ ॥ सहसै जीअरा परि रहिओ मा कउ अवरु न ढंगु ॥ नानक गुरमुखि छुटीऐ हरि प्रीतम सिउ संगु ॥७॥

बाघु मरै मनु मारीऐ जिसु सतिगुर दीखिआ होइ ॥ आपु पछाणै हरि मिलै बहुड़ि न मरणा होइ ॥ कीचड़ि हाथु न बूडई एका नदरि निहालि ॥ नानक गुरमुखि उबरे गुरु सरवरु सची पालि ॥८॥

अगनि मरै जलु लोड़ि लहु विणु गुर निधि जलु नाहि ॥ जनमि मरै भरमाईऐ जे लख करम कमाहि ॥ जमु जागाति न लगई जे चलै सतिगुर भाइ ॥ नानक निरमलु अमर पदु गुरु हरि मेलै मेलाइ ॥९॥

कलर केरी छपड़ी कऊआ मलि मलि नाइ ॥ मनु तनु मैला अवगुणी चिंजु भरी गंधी आइ ॥ सरवरु हंसि न जाणिआ काग कुपंखी संगि ॥ साकत सिउ ऐसी प्रीति है बूझहु गिआनी रंगि ॥ संत सभा जैकारु करि गुरमुखि करम कमाउ ॥ निरमलु न्हावणु नानका गुरु तीरथु दरीआउ ॥१०॥

जनमे का फलु किआ गणी जां हरि भगति न भाउ ॥ पैधा खाधा बादि है जां मनि दूजा भाउ ॥ वेखणु सुनणा झूठु है मुखि झूठा आलाउ ॥ नानक नामु सलाहि तू होरु हउमै आवउ जाउ ॥११॥

हैनि विरले नाही घणे फैल फकड़ु संसारु ॥१२॥

नानक लगी तुरि मरै जीवण नाही ताणु ॥ चोटै सेती जो मरै लगी सा परवाणु ॥ जिस नो लाए तिसु लगै लगी ता परवाणु ॥ पिरम पैकामु न निकलै लाइआ तिनि सुजाणि ॥१३॥

भांडा धोवै कउणु जि कचा साजिआ ॥ धातू पंजि रलाइ कूड़ा पाजिआ ॥ भांडा आणगु रासि जां तिसु भावसी ॥ परम जोति जागाइ वाजा वावसी ॥१४॥

मनहु जि अंधे घूप कहिआ बिरदु न जाणनी ॥ मनि अंधै ऊंधै कवल दिसनि खरे करूप ॥ इकि कहि जाणनि कहिआ बुझनि ते नर सुघड़ सरूप ॥ इकना नादु न बेदु न गीअ रसु रसु कसु न जाणंति ॥ इकना सिधि न बुधि न अकलि सर अखर का भेउ न लहंति ॥ नानक ते नर असलि खर जि बिनु गुण गरबु करंत ॥१५॥

सो ब्रहमणु जो बिंदै ब्रहमु ॥ जपु तपु संजमु कमावै करमु ॥ सील संतोख का रखै धरमु ॥ बंधन तोड़ै होवै मुकतु ॥ सोई ब्रहमणु पूजण जुगतु ॥१६॥

खत्री सो जु करमा का सूरु ॥ पुंन दान का करै सरीरु ॥ खेतु पछाणै बीजै दानु ॥ सो खत्री दरगह परवाणु ॥ लबु लोभु जे कूड़ु कमावै ॥ अपणा कीता आपे पावै ॥१७॥

तनु न तपाइ तनूर जिउ बालणु हड न बालि ॥ सिरि पैरी किआ फेड़िआ अंदरि पिरी सम्हालि ॥१८॥

सभनी घटी सहु वसै सह बिनु घटु न कोइ ॥ नानक ते सोहागणी जिन्हा गुरमुखि परगटु होइ ॥१९॥

जउ तउ प्रेम खेलण का चाउ ॥ सिरु धरि तली गली मेरी आउ ॥ इतु मारगि पैरु धरीजै ॥ सिरु दीजै काणि न कीजै ॥२०॥

नालि किराड़ा दोसती कूड़ै कूड़ी पाइ ॥ मरणु न जापै मूलिआ आवै कितै थाइ ॥२१॥

गिआन हीणं अगिआन पूजा ॥ अंध वरतावा भाउ दूजा ॥२२॥

गुर बिनु गिआनु धरम बिनु धिआनु ॥ सच बिनु साखी मूलो न बाकी ॥२३॥

माणू घलै उठी चलै ॥ सादु नाही इवेही गलै ॥२४॥

रामु झुरै दल मेलवै अंतरि बलु अधिकार ॥ बंतर की सैना सेवीऐ मनि तनि जुझु अपारु ॥ सीता लै गइआ दहसिरो लछमणु मूओ सरापि ॥ नानक करता करणहारु करि वेखै थापि उथापि ॥२५॥

मन महि झूरै रामचंदु सीता लछमण जोगु ॥ हणवंतरु आराधिआ आइआ करि संजोगु ॥ भूला दैतु न समझई तिनि प्रभ कीए काम ॥ नानक वेपरवाहु सो किरतु न मिटई राम ॥२६॥

लाहौर सहरु जहरु कहरु सवा पहरु ॥२७॥

महला ३ ॥

लाहौर सहरु अम्रित सरु सिफती दा घरु ॥२८॥

महला १ ॥

उदोसाहै किआ नीसानी तोटि न आवै अंनी ॥ उदोसीअ घरे ही वुठी कुड़िईं रंनी धमी ॥ सती रंनी घरे सिआपा रोवनि कूड़ी कमी ॥ जो लेवै सो देवै नाही खटे दम सहमी ॥२९॥

पबर तूं हरीआवला कवला कंचन वंनि ॥ कै दोखड़ै सड़िओहि काली होईआ देहुरी नानक मै तनि भंगु ॥ जाणा पाणी ना लहां जै सेती मेरा संगु ॥ जितु डिठै तनु परफुड़ै चड़ै चवगणि वंनु ॥३०॥

रजि न कोई जीविआ पहुचि न चलिआ कोइ ॥ गिआनी जीवै सदा सदा सुरती ही पति होइ ॥ सरफै सरफै सदा सदा एवै गई विहाइ ॥ नानक किस नो आखीऐ विणु पुछिआ ही लै जाइ ॥३१॥

दोसु न देअहु राइ नो मति चलै जां बुढा होवै ॥ गलां करे घणेरीआ तां अंन्हे पवणा खाती टोवै ॥३२॥

पूरे का कीआ सभ किछु पूरा घटि वधि किछु नाही ॥ नानक गुरमुखि ऐसा जाणै पूरे मांहि समांही ॥३३॥

सलोक महला ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

अभिआगत एह न आखीअहि जिन कै मन महि भरमु ॥ तिन के दिते नानका तेहो जेहा धरमु ॥१॥

अभै निरंजन परम पदु ता का भीखकु होइ ॥ तिस का भोजनु नानका विरला पाए कोइ ॥२॥

होवा पंडितु जोतकी वेद पड़ा मुखि चारि ॥ नवा खंडा विचि जाणीआ अपने चज वीचार ॥३॥

ब्रहमण कैली घातु कंञका अणचारी का धानु ॥ फिटक फिटका कोड़ु बदीआ सदा सदा अभिमानु ॥ पाहि एते जाहि वीसरि नानका इकु नामु ॥ सभ बुधी जालीअहि इकु रहै ततु गिआनु ॥४॥

माथै जो धुरि लिखिआ सु मेटि न सकै कोइ ॥ नानक जो लिखिआ सो वरतदा सो बूझै जिस नो नदरि होइ ॥५॥

जिनी नामु विसारिआ कूड़ै लालचि लगि ॥ धंधा माइआ मोहणी अंतरि तिसना अगि ॥ जिन्हा वेलि न तू्मबड़ी माइआ ठगे ठगि ॥ मनमुख बंन्हि चलाईअहि ना मिलही वगि सगि ॥ आपि भुलाए भुलीऐ आपे मेलि मिलाइ ॥ नानक गुरमुखि छुटीऐ जे चलै सतिगुर भाइ ॥६॥

सालाही सालाहणा भी सचा सालाहि ॥ नानक सचा एकु दरु बीभा परहरि आहि ॥७॥

नानक जह जह मै फिरउ तह तह साचा सोइ ॥ जह देखा तह एकु है गुरमुखि परगटु होइ ॥८॥

दूख विसारणु सबदु है जे मंनि वसाए कोइ ॥ गुर किरपा ते मनि वसै करम परापति होइ ॥९॥

नानक हउ हउ करते खपि मुए खूहणि लख असंख ॥ सतिगुर मिले सु उबरे साचै सबदि अलंख ॥१०॥

जिना सतिगुरु इक मनि सेविआ तिन जन लागउ पाइ ॥ गुर सबदी हरि मनि वसै माइआ की भुख जाइ ॥ से जन निरमल ऊजले जि गुरमुखि नामि समाइ ॥ नानक होरि पतिसाहीआ कूड़ीआ नामि रते पातिसाह ॥११॥

जिउ पुरखै घरि भगती नारि है अति लोचै भगती भाइ ॥ बहु रस सालणे सवारदी खट रस मीठे पाइ ॥ तिउ बाणी भगत सलाहदे हरि नामै चितु लाइ ॥ मनु तनु धनु आगै राखिआ सिरु वेचिआ गुर आगै जाइ ॥ भै भगती भगत बहु लोचदे प्रभ लोचा पूरि मिलाइ ॥ हरि प्रभु वेपरवाहु है कितु खाधै तिपताइ ॥ सतिगुर कै भाणै जो चलै तिपतासै हरि गुण गाइ ॥ धनु धनु कलजुगि नानका जि चले सतिगुर भाइ ॥१२॥

सतिगुरू न सेविओ सबदु न रखिओ उर धारि ॥ धिगु तिना का जीविआ कितु आए संसारि ॥ गुरमती भउ मनि पवै तां हरि रसि लगै पिआरि ॥ नाउ मिलै धुरि लिखिआ जन नानक पारि उतारि ॥१३॥

माइआ मोहि जगु भरमिआ घरु मुसै खबरि न होइ ॥ काम क्रोधि मनु हिरि लइआ मनमुख अंधा लोइ ॥ गिआन खड़ग पंच दूत संघारे गुरमति जागै सोइ ॥ नाम रतनु परगासिआ मनु तनु निरमलु होइ ॥ नामहीन नकटे फिरहि बिनु नावै बहि रोइ ॥ नानक जो धुरि करतै लिखिआ सु मेटि न सकै कोइ ॥१४॥

गुरमुखा हरि धनु खटिआ गुर कै सबदि वीचारि ॥ नामु पदारथु पाइआ अतुट भरे भंडार ॥ हरि गुण बाणी उचरहि अंतु न पारावारु ॥ नानक सभ कारण करता करै वेखै सिरजनहारु ॥१५॥

गुरमुखि अंतरि सहजु है मनु चड़िआ दसवै आकासि ॥ तिथै ऊंघ न भुख है हरि अम्रित नामु सुख वासु ॥ नानक दुखु सुखु विआपत नही जिथै आतम राम प्रगासु ॥१६॥

काम क्रोध का चोलड़ा सभ गलि आए पाइ ॥ इकि उपजहि इकि बिनसि जांहि हुकमे आवै जाइ ॥ जमणु मरणु न चुकई रंगु लगा दूजै भाइ ॥ बंधनि बंधि भवाईअनु करणा कछू न जाइ ॥१७॥

जिन कउ किरपा धारीअनु तिना सतिगुरु मिलिआ आइ ॥ सतिगुरि मिले उलटी भई मरि जीविआ सहजि सुभाइ ॥ नानक भगती रतिआ हरि हरि नामि समाइ ॥१८॥

मनमुख चंचल मति है अंतरि बहुतु चतुराई ॥ कीता करतिआ बिरथा गइआ इकु तिलु थाइ न पाई ॥ पुंन दानु जो बीजदे सभ धरम राइ कै जाई ॥ बिनु सतिगुरू जमकालु न छोडई दूजै भाइ खुआई ॥ जोबनु जांदा नदरि न आवई जरु पहुचै मरि जाई ॥ पुतु कलतु मोहु हेतु है अंति बेली को न सखाई ॥ सतिगुरु सेवे सो सुखु पाए नाउ वसै मनि आई ॥ नानक से वडे वडभागी जि गुरमुखि नामि समाई ॥१९॥

मनमुख नामु न चेतनी बिनु नावै दुख रोइ ॥ आतमा रामु न पूजनी दूजै किउ सुखु होइ ॥ हउमै अंतरि मैलु है सबदि न काढहि धोइ ॥ नानक बिनु नावै मैलिआ मुए जनमु पदारथु खोइ ॥२०॥

मनमुख बोले अंधुले तिसु महि अगनी का वासु ॥ बाणी सुरति न बुझनी सबदि न करहि प्रगासु ॥ ओना आपणी अंदरि सुधि नही गुर बचनि न करहि विसासु ॥ गिआनीआ अंदरि गुर सबदु है नित हरि लिव सदा विगासु ॥ हरि गिआनीआ की रखदा हउ सद बलिहारी तासु ॥ गुरमुखि जो हरि सेवदे जन नानकु ता का दासु ॥२१॥

माइआ भुइअंगमु सरपु है जगु घेरिआ बिखु माइ ॥ बिखु का मारणु हरि नामु है गुर गरुड़ सबदु मुखि पाइ ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन सतिगुरु मिलिआ आइ ॥ मिलि सतिगुर निरमलु होइआ बिखु हउमै गइआ बिलाइ ॥ गुरमुखा के मुख उजले हरि दरगह सोभा पाइ ॥ जन नानकु सदा कुरबाणु तिन जो चालहि सतिगुर भाइ ॥२२॥

सतिगुर पुरखु निरवैरु है नित हिरदै हरि लिव लाइ ॥ निरवैरै नालि वैरु रचाइदा अपणै घरि लूकी लाइ ॥ अंतरि क्रोधु अहंकारु है अनदिनु जलै सदा दुखु पाइ ॥ कूड़ु बोलि बोलि नित भउकदे बिखु खाधे दूजै भाइ ॥ बिखु माइआ कारणि भरमदे फिरि घरि घरि पति गवाइ ॥ बेसुआ केरे पूत जिउ पिता नामु तिसु जाइ ॥ हरि हरि नामु न चेतनी करतै आपि खुआइ ॥ हरि गुरमुखि किरपा धारीअनु जन विछुड़े आपि मिलाइ ॥ जन नानकु तिसु बलिहारणै जो सतिगुर लागे पाइ ॥२३॥

नामि लगे से ऊबरे बिनु नावै जम पुरि जांहि ॥ नानक बिनु नावै सुखु नही आइ गए पछुताहि ॥२४॥

चिंता धावत रहि गए तां मनि भइआ अनंदु ॥ गुर प्रसादी बुझीऐ सा धन सुती निचिंद ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन्हा भेटिआ गुर गोविंदु ॥ नानक सहजे मिलि रहे हरि पाइआ परमानंदु ॥२५॥

सतिगुरु सेवनि आपणा गुर सबदी वीचारि ॥ सतिगुर का भाणा मंनि लैनि हरि नामु रखहि उर धारि ॥ ऐथै ओथै मंनीअनि हरि नामि लगे वापारि ॥ गुरमुखि सबदि सिञापदे तितु साचै दरबारि ॥ सचा सउदा खरचु सचु अंतरि पिरमु पिआरु ॥ जमकालु नेड़ि न आवई आपि बखसे करतारि ॥ नानक नाम रते से धनवंत हैनि निरधनु होरु संसारु ॥२६॥

जन की टेक हरि नामु हरि बिनु नावै ठवर न ठाउ ॥ गुरमती नाउ मनि वसै सहजे सहजि समाउ ॥ वडभागी नामु धिआइआ अहिनिसि लागा भाउ ॥ जन नानकु मंगै धूड़ि तिन हउ सद कुरबाणै जाउ ॥२७॥

लख चउरासीह मेदनी तिसना जलती करे पुकार ॥ इहु मोहु माइआ सभु पसरिआ नालि चलै न अंती वार ॥ बिनु हरि सांति न आवई किसु आगै करी पुकार ॥ वडभागी सतिगुरु पाइआ बूझिआ ब्रहमु बिचारु ॥ तिसना अगनि सभ बुझि गई जन नानक हरि उरि धारि ॥२८॥

असी खते बहुतु कमावदे अंतु न पारावारु ॥ हरि किरपा करि कै बखसि लैहु हउ पापी वड गुनहगारु ॥ हरि जीउ लेखै वार न आवई तूं बखसि मिलावणहारु ॥ गुर तुठै हरि प्रभु मेलिआ सभ किलविख कटि विकार ॥ जिना हरि हरि नामु धिआइआ जन नानक तिन्ह जैकारु ॥२९॥

विछुड़ि विछुड़ि जो मिले सतिगुर के भै भाइ ॥ जनम मरण निहचलु भए गुरमुखि नामु धिआइ ॥ गुर साधू संगति मिलै हीरे रतन लभंन्हि ॥ नानक लालु अमोलका गुरमुखि खोजि लहंन्हि ॥३०॥

मनमुख नामु न चेतिओ धिगु जीवणु धिगु वासु ॥ जिस दा दिता खाणा पैनणा सो मनि न वसिओ गुणतासु ॥ इहु मनु सबदि न भेदिओ किउ होवै घर वासु ॥ मनमुखीआ दोहागणी आवण जाणि मुईआसु ॥ गुरमुखि नामु सुहागु है मसतकि मणी लिखिआसु ॥ हरि हरि नामु उरि धारिआ हरि हिरदै कमल प्रगासु ॥ सतिगुरु सेवनि आपणा हउ सद बलिहारी तासु ॥ नानक तिन मुख उजले जिन अंतरि नामु प्रगासु ॥३१॥

सबदि मरै सोई जनु सिझै बिनु सबदै मुकति न होई ॥ भेख करहि बहु करम विगुते भाइ दूजै परज विगोई ॥ नानक बिनु सतिगुर नाउ न पाईऐ जे सउ लोचै कोई ॥३२॥

हरि का नाउ अति वड ऊचा ऊची हू ऊचा होई ॥ अपड़ि कोइ न सकई जे सउ लोचै कोई ॥ मुखि संजम हछा न होवई करि भेख भवै सभ कोई ॥ गुर की पउड़ी जाइ चड़ै करमि परापति होई ॥ अंतरि आइ वसै गुर सबदु वीचारै कोइ ॥ नानक सबदि मरै मनु मानीऐ साचे साची सोइ ॥३३॥

माइआ मोहु दुखु सागरु है बिखु दुतरु तरिआ न जाइ ॥ मेरा मेरा करदे पचि मुए हउमै करत विहाइ ॥ मनमुखा उरवारु न पारु है अध विचि रहे लपटाइ ॥ जो धुरि लिखिआ सु कमावणा करणा कछू न जाइ ॥ गुरमती गिआनु रतनु मनि वसै सभु देखिआ ब्रहमु सुभाइ ॥ नानक सतिगुरि बोहिथै वडभागी चड़ै ते भउजलि पारि लंघाइ ॥३४॥

बिनु सतिगुर दाता को नही जो हरि नामु देइ आधारु ॥ गुर किरपा ते नाउ मनि वसै सदा रहै उरि धारि ॥ तिसना बुझै तिपति होइ हरि कै नाइ पिआरि ॥ नानक गुरमुखि पाईऐ हरि अपनी किरपा धारि ॥३५॥

बिनु सबदै जगतु बरलिआ कहणा कछू न जाइ ॥ हरि रखे से उबरे सबदि रहे लिव लाइ ॥ नानक करता सभ किछु जाणदा जिनि रखी बणत बणाइ ॥३६॥

होम जग सभि तीरथा पड़्हि पंडित थके पुराण ॥ बिखु माइआ मोहु न मिटई विचि हउमै आवणु जाणु ॥ सतिगुर मिलिऐ मलु उतरी हरि जपिआ पुरखु सुजाणु ॥ जिना हरि हरि प्रभु सेविआ जन नानकु सद कुरबाणु ॥३७॥

माइआ मोहु बहु चितवदे बहु आसा लोभु विकार ॥ मनमुखि असथिरु ना थीऐ मरि बिनसि जाइ खिन वार ॥ वड भागु होवै सतिगुरु मिलै हउमै तजै विकार ॥ हरि नामा जपि सुखु पाइआ जन नानक सबदु वीचार ॥३८॥

बिनु सतिगुर भगति न होवई नामि न लगै पिआरु ॥ जन नानक नामु अराधिआ गुर कै हेति पिआरि ॥३९॥

लोभी का वेसाहु न कीजै जे का पारि वसाइ ॥ अंति कालि तिथै धुहै जिथै हथु न पाइ ॥ मनमुख सेती संगु करे मुहि कालख दागु लगाइ ॥ मुह काले तिन्ह लोभीआं जासनि जनमु गवाइ ॥ सतसंगति हरि मेलि प्रभ हरि नामु वसै मनि आइ ॥ जनम मरन की मलु उतरै जन नानक हरि गुन गाइ ॥४०॥

धुरि हरि प्रभि करतै लिखिआ सु मेटणा न जाइ ॥ जीउ पिंडु सभु तिस दा प्रतिपालि करे हरि राइ ॥ चुगल निंदक भुखे रुलि मुए एना हथु न किथाऊ पाइ ॥ बाहरि पाखंड सभ करम करहि मनि हिरदै कपटु कमाइ ॥ खेति सरीरि जो बीजीऐ सो अंति खलोआ आइ ॥ नानक की प्रभ बेनती हरि भावै बखसि मिलाइ ॥४१॥

मन आवण जाणु न सुझई ना सुझै दरबारु ॥ माइआ मोहि पलेटिआ अंतरि अगिआनु गुबारु ॥ तब नरु सुता जागिआ सिरि डंडु लगा बहु भारु ॥ गुरमुखां करां उपरि हरि चेतिआ से पाइनि मोख दुआरु ॥ नानक आपि ओहि उधरे सभ कुट्मब तरे परवार ॥४२॥

सबदि मरै सो मुआ जापै ॥ गुर परसादी हरि रसि ध्रापै ॥ हरि दरगहि गुर सबदि सिञापै ॥ बिनु सबदै मुआ है सभु कोइ ॥ मनमुखु मुआ अपुना जनमु खोइ ॥ हरि नामु न चेतहि अंति दुखु रोइ ॥ नानक करता करे सु होइ ॥४३॥

गुरमुखि बुढे कदे नाही जिन्हा अंतरि सुरति गिआनु ॥ सदा सदा हरि गुण रवहि अंतरि सहज धिआनु ॥ ओइ सदा अनंदि बिबेक रहहि दुखि सुखि एक समानि ॥ तिना नदरी इको आइआ सभु आतम रामु पछानु ॥४४॥

मनमुखु बालकु बिरधि समानि है जिन्हा अंतरि हरि सुरति नाही ॥ विचि हउमै करम कमावदे सभ धरम राइ कै जांही ॥ गुरमुखि हछे निरमले गुर कै सबदि सुभाइ ॥ ओना मैलु पतंगु न लगई जि चलनि सतिगुर भाइ ॥ मनमुख जूठि न उतरै जे सउ धोवण पाइ ॥ नानक गुरमुखि मेलिअनु गुर कै अंकि समाइ ॥४५॥

बुरा करे सु केहा सिझै ॥ आपणै रोहि आपे ही दझै ॥ मनमुखि कमला रगड़ै लुझै ॥ गुरमुखि होइ तिसु सभ किछु सुझै ॥ नानक गुरमुखि मन सिउ लुझै ॥४६॥

जिना सतिगुरु पुरखु न सेविओ सबदि न कीतो वीचारु ॥ ओइ माणस जूनि न आखीअनि पसू ढोर गावार ॥ ओना अंतरि गिआनु न धिआनु है हरि सउ प्रीति न पिआरु ॥ मनमुख मुए विकार महि मरि जमहि वारो वार ॥ जीवदिआ नो मिलै सु जीवदे हरि जगजीवन उर धारि ॥ नानक गुरमुखि सोहणे तितु सचै दरबारि ॥४७॥

हरि मंदरु हरि साजिआ हरि वसै जिसु नालि ॥ गुरमती हरि पाइआ माइआ मोह परजालि ॥ हरि मंदरि वसतु अनेक है नव निधि नामु समालि ॥ धनु भगवंती नानका जिना गुरमुखि लधा हरि भालि ॥ वडभागी गड़ मंदरु खोजिआ हरि हिरदै पाइआ नालि ॥४८॥

मनमुख दह दिसि फिरि रहे अति तिसना लोभ विकार ॥ माइआ मोहु न चुकई मरि जमहि वारो वार ॥ सतिगुरु सेवि सुखु पाइआ अति तिसना तजि विकार ॥ जनम मरन का दुखु गइआ जन नानक सबदु बीचारि ॥४९॥

हरि हरि नामु धिआइ मन हरि दरगह पावहि मानु ॥ किलविख पाप सभि कटीअहि हउमै चुकै गुमानु ॥ गुरमुखि कमलु विगसिआ सभु आतम ब्रहमु पछानु ॥ हरि हरि किरपा धारि प्रभ जन नानक जपि हरि नामु ॥५०॥

धनासरी धनवंती जाणीऐ भाई जां सतिगुर की कार कमाइ ॥ तनु मनु सउपे जीअ सउ भाई लए हुकमि फिराउ ॥ जह बैसावहि बैसह भाई जह भेजहि तह जाउ ॥ एवडु धनु होरु को नही भाई जेवडु सचा नाउ ॥ सदा सचे के गुण गावां भाई सदा सचे कै संगि रहाउ ॥ पैनणु गुण चंगिआईआ भाई आपणी पति के साद आपे खाइ ॥ तिस का किआ सालाहीऐ भाई दरसन कउ बलि जाइ ॥ सतिगुर विचि वडीआ वडिआईआ भाई करमि मिलै तां पाइ ॥ इकि हुकमु मंनि न जाणनी भाई दूजै भाइ फिराइ ॥ संगति ढोई ना मिलै भाई बैसणि मिलै न थाउ ॥ नानक हुकमु तिना मनाइसी भाई जिना धुरे कमाइआ नाउ ॥ तिन्ह विटहु हउ वारिआ भाई तिन कउ सद बलिहारै जाउ ॥५१॥

से दाड़ीआं सचीआ जि गुर चरनी लगंन्हि ॥ अनदिनु सेवनि गुरु आपणा अनदिनु अनदि रहंन्हि ॥ नानक से मुह सोहणे सचै दरि दिसंन्हि ॥५२॥

मुख सचे सचु दाड़ीआ सचु बोलहि सचु कमाहि ॥ सचा सबदु मनि वसिआ सतिगुर मांहि समांहि ॥ सची रासी सचु धनु उतम पदवी पांहि ॥ सचु सुणहि सचु मंनि लैनि सची कार कमाहि ॥ सची दरगह बैसणा सचे माहि समाहि ॥ नानक विणु सतिगुर सचु न पाईऐ मनमुख भूले जांहि ॥५३॥

बाबीहा प्रिउ प्रिउ करे जलनिधि प्रेम पिआरि ॥ गुर मिले सीतल जलु पाइआ सभि दूख निवारणहारु ॥ तिस चुकै सहजु ऊपजै चुकै कूक पुकार ॥ नानक गुरमुखि सांति होइ नामु रखहु उरि धारि ॥५४॥

बाबीहा तूं सचु चउ सचे सउ लिव लाइ ॥ बोलिआ तेरा थाइ पवै गुरमुखि होइ अलाइ ॥ सबदु चीनि तिख उतरै मंनि लै रजाइ ॥ चारे कुंडा झोकि वरसदा बूंद पवै सहजि सुभाइ ॥ जल ही ते सभ ऊपजै बिनु जल पिआस न जाइ ॥ नानक हरि जलु जिनि पीआ तिसु भूख न लागै आइ ॥५५॥

बाबीहा तूं सहजि बोलि सचै सबदि सुभाइ ॥ सभु किछु तेरै नालि है सतिगुरि दीआ दिखाइ ॥ आपु पछाणहि प्रीतमु मिलै वुठा छहबर लाइ ॥ झिमि झिमि अम्रितु वरसदा तिसना भुख सभ जाइ ॥ कूक पुकार न होवई जोती जोति मिलाइ ॥ नानक सुखि सवन्हि सोहागणी सचै नामि समाइ ॥५६॥

धुरहु खसमि भेजिआ सचै हुकमि पठाइ ॥ इंदु वरसै दइआ करि गूड़्ही छहबर लाइ ॥ बाबीहे तनि मनि सुखु होइ जां ततु बूंद मुहि पाइ ॥ अनु धनु बहुता उपजै धरती सोभा पाइ ॥ अनदिनु लोकु भगति करे गुर कै सबदि समाइ ॥ आपे सचा बखसि लए करि किरपा करै रजाइ ॥ हरि गुण गावहु कामणी सचै सबदि समाइ ॥ भै का सहजु सीगारु करिहु सचि रहहु लिव लाइ ॥ नानक नामो मनि वसै हरि दरगह लए छडाइ ॥५७॥

बाबीहा सगली धरती जे फिरहि ऊडि चड़हि आकासि ॥ सतिगुरि मिलिऐ जलु पाईऐ चूकै भूख पिआस ॥ जीउ पिंडु सभु तिस का सभु किछु तिस कै पासि ॥ विणु बोलिआ सभु किछु जाणदा किसु आगै कीचै अरदासि ॥ नानक घटि घटि एको वरतदा सबदि करे परगास ॥५८॥

नानक तिसै बसंतु है जि सतिगुरु सेवि समाइ ॥ हरि वुठा मनु तनु सभु परफड़ै सभु जगु हरीआवलु होइ ॥५९॥

सबदे सदा बसंतु है जितु तनु मनु हरिआ होइ ॥ नानक नामु न वीसरै जिनि सिरिआ सभु कोइ ॥६०॥

नानक तिना बसंतु है जिना गुरमुखि वसिआ मनि सोइ ॥ हरि वुठै मनु तनु परफड़ै सभु जगु हरिआ होइ ॥६१॥

वडड़ै झालि झलु्मभलै नावड़ा लईऐ किसु ॥ नाउ लईऐ परमेसरै भंनण घड़ण समरथु ॥६२॥

हरहट भी तूं तूं करहि बोलहि भली बाणि ॥ साहिबु सदा हदूरि है किआ उची करहि पुकार ॥ जिनि जगतु उपाइ हरि रंगु कीआ तिसै विटहु कुरबाणु ॥ आपु छोडहि तां सहु मिलै सचा एहु वीचारु ॥ हउमै फिका बोलणा बुझि न सका कार ॥ वणु त्रिणु त्रिभवणु तुझै धिआइदा अनदिनु सदा विहाण ॥ बिनु सतिगुर किनै न पाइआ करि करि थके वीचार ॥ नदरि करहि जे आपणी तां आपे लैहि सवारि ॥ नानक गुरमुखि जिन्ही धिआइआ आए से परवाणु ॥६३॥

जोगु न भगवी कपड़ी जोगु न मैले वेसि ॥ नानक घरि बैठिआ जोगु पाईऐ सतिगुर कै उपदेसि ॥६४॥

चारे कुंडा जे भवहि बेद पड़हि जुग चारि ॥ नानक साचा भेटै हरि मनि वसै पावहि मोख दुआर ॥६५॥

नानक हुकमु वरतै खसम का मति भवी फिरहि चल चित ॥ मनमुख सउ करि दोसती सुख कि पुछहि मित ॥ गुरमुख सउ करि दोसती सतिगुर सउ लाइ चितु ॥ जमण मरण का मूलु कटीऐ तां सुखु होवी मित ॥६६॥

भुलिआं आपि समझाइसी जा कउ नदरि करे ॥ नानक नदरी बाहरी करण पलाह करे ॥६७॥

सलोक महला ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

वडभागीआ सोहागणी जिन्हा गुरमुखि मिलिआ हरि राइ ॥ अंतरि जोति परगासीआ नानक नामि समाइ ॥१॥

वाहु वाहु सतिगुरु पुरखु है जिनि सचु जाता सोइ ॥ जितु मिलिऐ तिख उतरै तनु मनु सीतलु होइ ॥ वाहु वाहु सतिगुरु सति पुरखु है जिस नो समतु सभ कोइ ॥ वाहु वाहु सतिगुरु निरवैरु है जिसु निंदा उसतति तुलि होइ ॥ वाहु वाहु सतिगुरु सुजाणु है जिसु अंतरि ब्रहमु वीचारु ॥ वाहु वाहु सतिगुरु निरंकारु है जिसु अंतु न पारावारु ॥ वाहु वाहु सतिगुरू है जि सचु द्रिड़ाए सोइ ॥ नानक सतिगुर वाहु वाहु जिस ते नामु परापति होइ ॥२॥

हरि प्रभ सचा सोहिला गुरमुखि नामु गोविंदु ॥ अनदिनु नामु सलाहणा हरि जपिआ मनि आनंदु ॥ वडभागी हरि पाइआ पूरन परमानंदु ॥ जन नानक नामु सलाहिआ बहुड़ि न मनि तनि भंगु ॥३॥

मूं पिरीआ सउ नेहु किउ सजण मिलहि पिआरिआ ॥ हउ ढूढेदी तिन सजण सचि सवारिआ ॥ सतिगुरु मैडा मितु है जे मिलै त इहु मनु वारिआ ॥ देंदा मूं पिरु दसि हरि सजणु सिरजणहारिआ ॥ नानक हउ पिरु भाली आपणा सतिगुर नालि दिखालिआ ॥४॥

हउ खड़ी निहाली पंधु मतु मूं सजणु आवए ॥ को आणि मिलावै अजु मै पिरु मेलि मिलावए ॥ हउ जीउ करी तिस विटउ चउ खंनीऐ जो मै पिरी दिखावए ॥ नानक हरि होइ दइआलु तां गुरु पूरा मेलावए ॥५॥

अंतरि जोरु हउमै तनि माइआ कूड़ी आवै जाइ ॥ सतिगुर का फुरमाइआ मंनि न सकी दुतरु तरिआ न जाइ ॥ नदरि करे जिसु आपणी सो चलै सतिगुर भाइ ॥ सतिगुर का दरसनु सफलु है जो इछै सो फलु पाइ ॥ जिनी सतिगुरु मंनिआं हउ तिन के लागउ पाइ ॥ नानकु ता का दासु है जि अनदिनु रहै लिव लाइ ॥६॥

जिना पिरी पिआरु बिनु दरसन किउ त्रिपतीऐ ॥ नानक मिले सुभाइ गुरमुखि इहु मनु रहसीऐ ॥७॥

जिना पिरी पिआरु किउ जीवनि पिर बाहरे ॥ जां सहु देखनि आपणा नानक थीवनि भी हरे ॥८॥

जिना गुरमुखि अंदरि नेहु तै प्रीतम सचै लाइआ ॥ राती अतै डेहु नानक प्रेमि समाइआ ॥९॥

गुरमुखि सची आसकी जितु प्रीतमु सचा पाईऐ ॥ अनदिनु रहहि अनंदि नानक सहजि समाईऐ ॥१०॥

सचा प्रेम पिआरु गुर पूरे ते पाईऐ ॥ कबहू न होवै भंगु नानक हरि गुण गाईऐ ॥११॥

जिन्हा अंदरि सचा नेहु किउ जीवन्हि पिरी विहूणिआ ॥ गुरमुखि मेले आपि नानक चिरी विछुंनिआ ॥१२॥

जिन कउ प्रेम पिआरु तउ आपे लाइआ करमु करि ॥ नानक लेहु मिलाइ मै जाचिक दीजै नामु हरि ॥१३॥

गुरमुखि हसै गुरमुखि रोवै ॥ जि गुरमुखि करे साई भगति होवै ॥ गुरमुखि होवै सु करे वीचारु ॥ गुरमुखि नानक पावै पारु ॥१४॥

जिना अंदरि नामु निधानु है गुरबाणी वीचारि ॥ तिन के मुख सद उजले तितु सचै दरबारि ॥ तिन बहदिआ उठदिआ कदे न विसरै जि आपि बखसे करतारि ॥ नानक गुरमुखि मिले न विछुड़हि जि मेले सिरजणहारि ॥१५॥

गुर पीरां की चाकरी महां करड़ी सुख सारु ॥ नदरि करे जिसु आपणी तिसु लाए हेत पिआरु ॥ सतिगुर की सेवै लगिआ भउजलु तरै संसारु ॥ मन चिंदिआ फलु पाइसी अंतरि बिबेक बीचारु ॥ नानक सतिगुरि मिलिऐ प्रभु पाईऐ सभु दूख निवारणहारु ॥१६॥

मनमुख सेवा जो करे दूजै भाइ चितु लाइ ॥ पुतु कलतु कुट्मबु है माइआ मोहु वधाइ ॥ दरगहि लेखा मंगीऐ कोई अंति न सकी छडाइ ॥ बिनु नावै सभु दुखु है दुखदाई मोह माइ ॥ नानक गुरमुखि नदरी आइआ मोह माइआ विछुड़ि सभ जाइ ॥१७॥

गुरमुखि हुकमु मंने सह केरा हुकमे ही सुखु पाए ॥ हुकमो सेवे हुकमु अराधे हुकमे समै समाए ॥ हुकमु वरतु नेमु सुच संजमु मन चिंदिआ फलु पाए ॥ सदा सुहागणि जि हुकमै बुझै सतिगुरु सेवै लिव लाए ॥ नानक क्रिपा करे जिन ऊपरि तिना हुकमे लए मिलाए ॥१८॥

मनमुखि हुकमु न बुझे बपुड़ी नित हउमै करम कमाइ ॥ वरत नेमु सुच संजमु पूजा पाखंडि भरमु न जाइ ॥ अंतरहु कुसुधु माइआ मोहि बेधे जिउ हसती छारु उडाए ॥ जिनि उपाए तिसै न चेतहि बिनु चेते किउ सुखु पाए ॥ नानक परपंचु कीआ धुरि करतै पूरबि लिखिआ कमाए ॥१९॥

गुरमुखि परतीति भई मनु मानिआ अनदिनु सेवा करत समाइ ॥ अंतरि सतिगुरु गुरू सभ पूजे सतिगुर का दरसु देखै सभ आइ ॥ मंनीऐ सतिगुर परम बीचारी जितु मिलिऐ तिसना भुख सभ जाइ ॥ हउ सदा सदा बलिहारी गुर अपुने जो प्रभु सचा देइ मिलाइ ॥ नानक करमु पाइआ तिन सचा जो गुर चरणी लगे आइ ॥२०॥

जिन पिरीआ सउ नेहु से सजण मै नालि ॥ अंतरि बाहरि हउ फिरां भी हिरदै रखा समालि ॥२१॥

जिना इक मनि इक चिति धिआइआ सतिगुर सउ चितु लाइ ॥ तिन की दुख भुख हउमै वडा रोगु गइआ निरदोख भए लिव लाइ ॥ गुण गावहि गुण उचरहि गुण महि सवै समाइ ॥ नानक गुर पूरे ते पाइआ सहजि मिलिआ प्रभु आइ ॥२२॥

मनमुखि माइआ मोहु है नामि न लगै पिआरु ॥ कूड़ु कमावै कूड़ु संघरै कूड़ि करै आहारु ॥ बिखु माइआ धनु संचि मरहि अंति होइ सभु छारु ॥ करम धरम सुचि संजमु करहि अंतरि लोभु विकार ॥ नानक मनमुखि जि कमावै सु थाइ न पवै दरगह होइ खुआरु ॥२३॥

सभना रागां विचि सो भला भाई जितु वसिआ मनि आइ ॥ रागु नादु सभु सचु है कीमति कही न जाइ ॥ रागै नादै बाहरा इनी हुकमु न बूझिआ जाइ ॥ नानक हुकमै बूझै तिना रासि होइ सतिगुर ते सोझी पाइ ॥ सभु किछु तिस ते होइआ जिउ तिसै दी रजाइ ॥२४॥

सतिगुर विचि अम्रित नामु है अम्रितु कहै कहाइ ॥ गुरमती नामु निरमलो निरमल नामु धिआइ ॥ अम्रित बाणी ततु है गुरमुखि वसै मनि आइ ॥ हिरदै कमलु परगासिआ जोती जोति मिलाइ ॥ नानक सतिगुरु तिन कउ मेलिओनु जिन धुरि मसतकि भागु लिखाइ ॥२५॥

अंदरि तिसना अगि है मनमुख भुख न जाइ ॥ मोहु कुट्मबु सभु कूड़ु है कूड़ि रहिआ लपटाइ ॥ अनदिनु चिंता चिंतवै चिंता बधा जाइ ॥ जमणु मरणु न चुकई हउमै करम कमाइ ॥ गुर सरणाई उबरै नानक लए छडाइ ॥२६॥

सतिगुर पुरखु हरि धिआइदा सतसंगति सतिगुर भाइ ॥ सतसंगति सतिगुर सेवदे हरि मेले गुरु मेलाइ ॥ एहु भउजलु जगतु संसारु है गुरु बोहिथु नामि तराइ ॥ गुरसिखी भाणा मंनिआ गुरु पूरा पारि लंघाइ ॥ गुरसिखां की हरि धूड़ि देहि हम पापी भी गति पांहि ॥ धुरि मसतकि हरि प्रभ लिखिआ गुर नानक मिलिआ आइ ॥ जमकंकर मारि बिदारिअनु हरि दरगह लए छडाइ ॥ गुरसिखा नो साबासि है हरि तुठा मेलि मिलाइ ॥२७॥

गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ जिनि विचहु भरमु चुकाइआ ॥ राम नामु हरि कीरति गाइ करि चानणु मगु देखाइआ ॥ हउमै मारि एक लिव लागी अंतरि नामु वसाइआ ॥ गुरमती जमु जोहि न सकै सचै नाइ समाइआ ॥ सभु आपे आपि वरतै करता जो भावै सो नाइ लाइआ ॥ जन नानकु नाउ लए तां जीवै बिनु नावै खिनु मरि जाइआ ॥२८॥

मन अंतरि हउमै रोगु भ्रमि भूले हउमै साकत दुरजना ॥ नानक रोगु गवाइ मिलि सतिगुर साधू सजणा ॥२९॥

गुरमती हरि हरि बोले ॥ हरि प्रेमि कसाई दिनसु राति हरि रती हरि रंगि चोले ॥ हरि जैसा पुरखु न लभई सभु देखिआ जगतु मै टोले ॥ गुर सतिगुरि नामु दिड़ाइआ मनु अनत न काहू डोले ॥ जन नानकु हरि का दासु है गुर सतिगुर के गुल गोले ॥३०॥

सलोक महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

रते सेई जि मुखु न मोड़ंन्हि जिन्ही सिञाता साई ॥ झड़ि झड़ि पवदे कचे बिरही जिन्हा कारि न आई ॥१॥

धणी विहूणा पाट पट्मबर भाही सेती जाले ॥ धूड़ी विचि लुडंदड़ी सोहां नानक तै सह नाले ॥२॥

गुर कै सबदि अराधीऐ नामि रंगि बैरागु ॥ जीते पंच बैराईआ नानक सफल मारू इहु रागु ॥३॥

जां मूं इकु त लख तउ जिती पिनणे दरि कितड़े ॥ बामणु बिरथा गइओ जनमु जिनि कीतो सो विसरे ॥४॥

सोरठि सो रसु पीजीऐ कबहू न फीका होइ ॥ नानक राम नाम गुन गाईअहि दरगह निरमल सोइ ॥५॥

जो प्रभि रखे आपि तिन कोइ न मारई ॥ अंदरि नामु निधानु सदा गुण सारई ॥ एका टेक अगम मनि तनि प्रभु धारई ॥ लगा रंगु अपारु को न उतारई ॥ गुरमुखि हरि गुण गाइ सहजि सुखु सारई ॥ नानक नामु निधानु रिदै उरि हारई ॥६॥

करे सु चंगा मानि दुयी गणत लाहि ॥ अपणी नदरि निहालि आपे लैहु लाइ ॥ जन देहु मती उपदेसु विचहु भरमु जाइ ॥ जो धुरि लिखिआ लेखु सोई सभ कमाइ ॥ सभु कछु तिस दै वसि दूजी नाहि जाइ ॥ नानक सुख अनद भए प्रभ की मंनि रजाइ ॥७॥

गुरु पूरा जिन सिमरिआ सेई भए निहाल ॥ नानक नामु अराधणा कारजु आवै रासि ॥८॥

पापी करम कमावदे करदे हाए हाइ ॥ नानक जिउ मथनि माधाणीआ तिउ मथे ध्रम राइ ॥९॥

नामु धिआइनि साजना जनम पदारथु जीति ॥ नानक धरम ऐसे चवहि कीतो भवनु पुनीत ॥१०॥

खुभड़ी कुथाइ मिठी गलणि कुमंत्रीआ ॥ नानक सेई उबरे जिना भागु मथाहि ॥११॥

सुतड़े सुखी सवंन्हि जो रते सह आपणै ॥ प्रेम विछोहा धणी सउ अठे पहर लवंन्हि ॥१२॥

सुतड़े असंख माइआ झूठी कारणे ॥ नानक से जागंन्हि जि रसना नामु उचारणे ॥१३॥

म्रिग तिसना पेखि भुलणे वुठे नगर गंध्रब ॥ जिनी सचु अराधिआ नानक मनि तनि फब ॥१४॥

पतित उधारण पारब्रहमु सम्रथ पुरखु अपारु ॥ जिसहि उधारे नानका सो सिमरे सिरजणहारु ॥१५॥

दूजी छोडि कुवाटड़ी इकस सउ चितु लाइ ॥ दूजै भावीं नानका वहणि लुड़्हंदड़ी जाइ ॥१६॥

तिहटड़े बाजार सउदा करनि वणजारिआ ॥ सचु वखरु जिनी लदिआ से सचड़े पासार ॥१७॥

पंथा प्रेम न जाणई भूली फिरै गवारि ॥ नानक हरि बिसराइ कै पउदे नरकि अंध्यार ॥१८॥

माइआ मनहु न वीसरै मांगै दमां दम ॥ सो प्रभु चिति न आवई नानक नही करमि ॥१९॥

तिचरु मूलि न थुड़ींदो जिचरु आपि क्रिपालु ॥ सबदु अखुटु बाबा नानका खाहि खरचि धनु मालु ॥२०॥

ख्मभ विकांदड़े जे लहां घिंना सावी तोलि ॥ तंनि जड़ांई आपणै लहां सु सजणु टोलि ॥२१॥

सजणु सचा पातिसाहु सिरि साहां दै साहु ॥ जिसु पासि बहिठिआ सोहीऐ सभनां दा वेसाहु ॥२२॥


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