33 सवये (पातसाही 10), 33 Savaiye (Patshahi 10) Path in Hindi Gurbani online


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ੴ वाहिगुरू जी की फतहि ॥
सवये ॥
स्री मुखवाक पातसाही १० ॥
सवैया ॥

जागत जोति जपै निस बासुर एकु बिना मनि नैक न आनै ॥ पूरन प्रेम प्रतीत सजै ब्रत गोर मड़्रही मठ भूल न मानै ॥ तीरथ दान दइआ तप संजम एकु बिना नहि एक पछानै ॥ पूरन जोति जगै घट मै तब खालस ताहि न खालस जानै ॥१॥

सति सदैव सरूप सत ब्रत आदि अनादि अगाध अजै है ॥ दान दया दम संजम नेम जत ब्रत सील सुबृत अबै है ॥ आदि अनील अनादि अनाहद आपि अद्वेख अभेख अभै है ॥ रूप अरूप अरेख जरारदन दीन दयाल कृपाल भए है ॥२॥

आदि अद्वैख अवेख महा प्रभ सति सरूप सु जोति प्रकासी ॥ पूर रहयो सभ ही घट कै पट तत समाधि सुभाव प्रनासी ॥ आदि जुगादि जगादि तुही प्रभ फैल रहयो सभ अंतर बासी ॥ दीन दयाल कृपाल कृपा कर आदि अजोन अजै अबिनासी ॥३॥

आदि अभेख अछेद सदा प्रभ बेद कतेबनि भेदु न पायो ॥ दीन दयाल कृपाल कृपानिधि सति सदैव सभै घट छायो ॥ सेस सुरेस गणेस महेसुर गाहि फिरै स्रुति थाह ना आयो ॥ रे मन मूड़ि अगूड़ इसो प्रभ तै किहि काजि कहो बिसरायो ॥४॥

अचुत आदि अनील अनाहद सत सरूप सदैव बखाने ॥ आदि अजोनि अजाइ जहा बिनु परम पुनीत परंपर माने ॥ सिध सयंभू प्रसिध सबै जग एक ही ठौर अनेक बखाने ॥ रे मन रंक कलंक बिना हरि तै किह कारण ते न पहिचाने ॥५॥

अछर आदि अनील अनाहद सत सदैव तुही करतारा ॥ जीव जिते जल मै थल मै सब कै सद पेट कौ पोखन हारा ॥ बेद पुरान कुरान दुहूँ मिलि भाति अनेक बिचार बिचारा ॥ और जहान निदान कछू नहि ए सुबहान तुही सिरदारा ॥६॥

आदि अगाधि अछेद अभेद अलेख अजेअ अनाहद जाना ॥ भूत भविख भवान तुही सबहूँ सब ठौरन मो मन माना ॥ सदेव अदेव मणीधर नारद सारद सति सदैव पछाना ॥ दीन दयाल कृपानिधिको कछु भेद पुरान कुरान न जाना ॥७॥

सति सदैव सरूप सदाब्रत बेद कतेब तुही उपजायो ॥ देव अदेवन देव महीधर भूत भवान वही ठहरायो ॥ आदि जुगादि अनील अनाहद लोक अलोक बिलोक न पायो ॥ रे मन मूड़ अगूड़ि इसो प्रभ तोहि कहो किहि आन सुनायो ॥८॥

देव अदेव महीधर नागन सिध प्रसिध बडो तपु कीनो ॥ बेद पुरान कुरान सबै गुन गाइ थके पै तो जाइ न चीनो ॥ भूमि अकास पतार दिसा बिदिसा जिहि सो सब के चित चीनो ॥ पूर रही महि मो महिमा मन मै तिनि आनि मुझै कहि दीनो ॥९॥

बेद कतेब न भेद लहयो तिहि सिध समाधि सबै करि हारे ॥ सिंमृत सासत्र बेद सबै बहु भाति पुरान बीचार बीचारे ॥ आदि अनादि अगाधि कथा ध्रूअ से प्रहिलादि अजामल तारे ॥ नामु उचार तरी गनिका सोई नामु अधार बीचार हमारे ॥१०॥

आदि अनादि अगाधि सदा प्रभ सिध स्वरूप सबो पहिचानयो ॥ गंध्रब जछ महीधर नागन भूमि अकास चहूँ चक जानयो ॥ लोक अलोक दिसा बिदिसा अरु देव अदेव दुहूँ प्रभ मानयो ॥ चित अगयान सु जान सुयंभव कौन की कानि निधान भुलानयो ॥११॥

काहूँ लै ठोकि बधे उरि ठाकुर काहूँ महेस को एस बखानयो ॥ काहू कहियो हरि मंदर मै हरि काहू मसीत कै बीच प्रमानयो ॥ काहूँ ने राम कहयो कृसना कहु काहू मनै अवतारन मानयो ॥ फोकट धरम बिसार सबै करतार ही कउ करता जीअ जानयो ॥१२॥

जौ कहो राम अजोनि अजै अति काहे कौ कौसलि कुख जयो जू ॥ काल हूँ काल कहो जिह कौ किहि कारण काल ते दीन भयो जू ॥ सति सरूप बिबैर कहाइ सु कयों पथ को रथ हाकि धयो जू ॥ ताही को मानि प्रभू करि कै जिह को कोऊ भेदु न लैन लयो जू ॥१३॥

क्यो कहो कृसन कृपानिधि है किह काज ते बधक बाणु लगायो ॥ अउर कुलीन उधारत जो किह ते अपनो कुलि नासु करायो ॥ आदि अजोनि कहाइ कहो किम देवकि के जठरंतर आयो ॥ तात न मात कहै जिह को तिह कयो बसुदेवहि बापु कहायो ॥१४॥

काहे कौ एस महेसहि भाखत काहि दिजेस को एस बखानयो ॥ है न रघ्वेस जद्वेस रमापति तै जिन को बिसुनाथ पछानयो ॥ एक को छाडि अनेक भजे सुकदेव परासर बयास झुठानयो ॥ फोकट धरम सजे सब ही हम एक ही कौ बिधि नेक प्रमानयो ॥१५॥

कोऊ दिजेस कु मानत है अरु कोऊ महेस को एस बतै है ॥ कोऊ कहै बिसनो बिसुनाइक जाहि भजे अघ ओघ कटै है ॥ बार हजार बिचार अरे जड़ अंत समे सब ही तजि जै है ॥ ता ही को धयान प्रमानि हीए जोऊ के अब है अर आगै ऊ ह्वै है ॥१६॥

कोटक इंद्र करे जिह के कई कोटि उपिंद्र बनाइ खपायो ॥ दानव देव फनिंद्र धराधर पछ पसू नहि जाति गनायो ॥ आज लगे तपु साधत है सिव ऊ ब्रहमा कछु पार न पायो ॥ बेद कतेब न भेद लखयो जिह सोऊ गुरू गुर मोहि बतायो ॥१७॥

धयान लगाइ ठगिओ सब लोगन सीस जटा न हाथि बढाए ॥ लाइ बिभूत फिरयो मुख ऊपरि देव अदेव सबै डहकाए ॥ लोभ के लागे फिरयो घर ही घरि जोग के नयास सबै बिसराए ॥ लाज गई कछु काजु सरयो नहि प्रेम बिना प्रभ पानि न आए ॥१८॥

काहे कउ डिंभ करै मन मूरख डिंभ करे अपुनी पति ख्वै है ॥ काहे कउ लोग ठगे ठग लोगनि लोग गयो परलोग गवै है ॥ दील दयाल की ठौर जहा तिहि ठौर बिखै तुहि ठौर न ह्वै है ॥ चेत रे चेत अचेत महा जड़ भेख के कीने अलेख न पै है ॥१९॥

काहे कउ पूजत पाहन कउ कछु पाहन मै परमेसर नाही ॥ ताही को पूज प्रभू करि के जिह पूजत ही अघ ओघ मिटाही ॥ आधि बिआधि के बंधन जेतक नाम के लेत सबै छुटि जाही ॥ ताही को धयानु प्रमान सदा इन फोकट धरम करे फलु नाही ॥२०॥

फोकट धरम भयो फल हीन जु पूज सिला जुगि कोटि गवाई ॥ सिधि कहा सिल के परसै बलु बृध घटी नव निधि न पाई ॥ आज ही आजु समो जु बितयो नहि काजि सरयो कछु लाजि न आई ॥ स्री भगवंत भजयो न अरे जड़ ऐसे ही ऐसे सु बैस गवाई ॥२१॥

जौ जुग ते कर है तपसा कुछ तोहि प्रसंनु न पाहन कै है ॥ हाथि उठाइ भली बिधि सो जड़ तोहि कछू बरदानु न दै है ॥ कउन भरोसो भया इह को कहु भीर परी नहि आनि बचै है ॥ जानु रे जानु अजान हठी इह फोकट धरम सु भरम गवै है ॥२२॥

जाल बधे सब ही मृत के कोऊ राम रसूल न बाचन पाए ॥ दानव देव फनिंद धराधर भूत भविख उपाइ मिटाए ॥ अंत मरे पछुताइ पृथी परि जे जग मै अवतार कहाए ॥ रे मन लैल इकेल ही काल के लागत काहि न पाइन धाए ॥२३॥

काल ही पाइ भइओ ब्रहमा गहि दंड कमंडल भूमि भ्रमानयो ॥ काल ही पाइ सदा सिव जू सभ देस बदेस भइआ हम जानयो ॥ काल ही पाइ भयो मिट गयो जग या ही ते ताहि सभो पहिचानयो ॥ बेद कतेब के भेद सबै तजि केवल काल कृपानिधि मानयो ॥२४॥

काल गयो इन कामन सिउ जड़ काल कृपाल हीऐ न चितारयो ॥ लाज को छाडि नृलाज अरे तजि काजि अकाज के काज सवारयो ॥ बाज बने गजराज बडे खर को चड़िबो चित बीच बिचारयो ॥ स्री भगवंत भजयो न अरे जड़ लाज ही लाज तै काजु बिगारयो ॥२५॥

बेद कतेब पड़े बहुते दिन भेद कछू तिन को नहि पायो ॥ पूजत ठौर अनेक फिरयो पर एक कबै हीय मै न बसायो ॥ पाहन को असथालय को सिर नयाइ फिरयो कछु हाथि न आयो ॥ रे मन मूड़ अगूड़ प्रभू तजि आपन हूड़ कहा उरझायो ॥२६॥

जो जुगियान के जाइ उठि आस्रम गोरख को तिह जाप जपावै ॥ जाइ संनयासन के तिह कौ कहि दत ही सति है मंत्र दृड़ावै ॥ जो कोऊ जाइ तुरकन मै महिदीन के दीन तिसे गहि लयावै ॥ आपहि बीच गनै करता करतार को भेदु न कोऊ बतावै ॥२७॥

जो जुगीआन के जाइ कहै सब जोगन को गृह माल उठै दै ॥ जो परो भाजि संन्यासन कै कहै दत्त के नाम पै धाम लुटै दै ॥ जो करि कोऊ मसंदन सौ कहै सरब दरब लै मोहि अबै दै ॥ लेउ ही लेउ कहै सब को नर कोऊ न ब्रहम बताइ हमै दै ॥२८॥

जो करि सेव मसंदन की कहै आनि प्रसादि सबै मोहि दीजै ॥ जो कछु माल तवालय सो अब ही उठि भेट हमारी ही कीजै ॥ मेरो ई धयान धरो निसि बासुर भूल कै अउर को नामु न लीजै ॥ दीने को नामु सुनै भजि रातहि लीने बिना नहि नैकु प्रसीजै ॥२९॥

आखन भीतरि तेल कौ डार सु लोगन नीरु बहाइ दिखावै ॥ जो धनवानु लखै निज सेवक ताही परोसि प्रसादि जिमावै ॥ जो धन हीन लखै तिह देत न मागन जात मुखो न दिखावै ॥ लूटत है पसु लोगन को कबहूँ न प्रमेसुर के गुन गावै ॥३०॥

आँखन मीचि रहै बक की जिम लोगन एक प्रपंच दिखायो ॥ निआत फिरयो सिरु बधक जयो धयान बिलोक बिड़ाल लजायो ॥ लागि फिरयो धन आस जितै तित लोग गयो परलोग गवायो ॥ स्री भगवंत भजयो न अरे जड़ धाम के काम कहा उरझायो ॥३१॥

फोकट करम दृड़ात कहा इन लोगन को कोई काम न ऐ है ॥ भाजत का धन हेत अरे जम किंकर ते नह भाजन पै है ॥ पुत्र कलित्र न मित्र सबै ऊहा सिख सखा कोऊ साख न दै है ॥ चेत रे चेत अचेत महा पसु अंत की बार इकेलो ई जै है ॥३२॥

तो तन तयागत ही सुन रे जड़ प्रेत बखान तृआ भजि जै है ॥ पुत्र कलत्र सु मित्र सखा इह बेग निकारहु आइसु दै है ॥ भउन भंडार धरा गड़ जेतक छाडत प्रान बिगान कहै है ॥ चेत रे चेत अचेत महा पसु अंत की बारि इकेलो ई जै है ॥३३॥


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