Pt 8 - संकट मोचन शब्द, Part 8 - Sankat mochan / Gurshabad sidhi / Shradha puran Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


** बच्चों की बीमारियां दूर हों **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 191)
गउड़ी महला ५ ॥
सूके हरे कीए खिन माहे ॥ अम्रित द्रिसटि संचि जीवाए ॥१॥ काटे कसट पूरे गुरदेव ॥ सेवक कउ दीनी अपुनी सेव ॥१॥ रहाउ ॥ मिटि गई चिंत पुनी मन आसा ॥ करी दइआ सतिगुरि गुणतासा ॥२॥ दुख नाठे सुख आइ समाए ॥ ढील न परी जा गुरि फुरमाए ॥३॥ इछ पुनी पूरे गुर मिले ॥ नानक ते जन सुफल फले ॥४॥५८॥१२७॥

** संतान की प्राप्ति **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 182)
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
जा कै वसि खान सुलतान ॥ जा कै वसि है सगल जहान ॥ जा का कीआ सभु किछु होइ ॥ तिस ते बाहरि नाही कोइ ॥१॥ कहु बेनंती अपुने सतिगुर पाहि ॥ काज तुमारे देइ निबाहि ॥१॥ रहाउ ॥ सभ ते ऊच जा का दरबारु ॥ सगल भगत जा का नामु अधारु ॥ सरब बिआपित पूरन धनी ॥ जा की सोभा घटि घटि बनी ॥२॥ जिसु सिमरत दुख डेरा ढहै ॥ जिसु सिमरत जमु किछू न कहै ॥ जिसु सिमरत होत सूके हरे ॥ जिसु सिमरत डूबत पाहन तरे ॥३॥ संत सभा कउ सदा जैकारु ॥ हरि हरि नामु जन प्रान अधारु ॥ कहु नानक मेरी सुणी अरदासि ॥ संत प्रसादि मो कउ नाम निवासि ॥४॥२१॥९०॥

** बच्चों के डर दूर हों **
(गुरू रामदास जी) (अंग 83)
पउड़ी ॥
हरि इको करता इकु इको दीबाणु हरि ॥ हरि इकसै दा है अमरु इको हरि चिति धरि ॥ हरि तिसु बिनु कोई नाहि डरु भ्रमु भउ दूरि करि ॥ हरि तिसै नो सालाहि जि तुधु रखै बाहरि घरि ॥ हरि जिस नो होइ दइआलु सो हरि जपि भउ बिखमु तरि ॥१॥

** बच्चे की प्राप्ति **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 396)
आसा महला ५ ॥
सतिगुर साचै दीआ भेजि ॥ चिरु जीवनु उपजिआ संजोगि ॥ उदरै माहि आइ कीआ निवासु ॥ माता कै मनि बहुतु बिगासु ॥१॥ जमिआ पूतु भगतु गोविंद का ॥ प्रगटिआ सभ महि लिखिआ धुर का ॥ रहाउ ॥ दसी मासी हुकमि बालक जनमु लीआ ॥ मिटिआ सोगु महा अनंदु थीआ ॥ गुरबाणी सखी अनंदु गावै ॥ साचे साहिब कै मनि भावै ॥२॥ वधी वेलि बहु पीड़ी चाली ॥ धरम कला हरि बंधि बहाली ॥ मन चिंदिआ सतिगुरू दिवाइआ ॥ भए अचिंत एक लिव लाइआ ॥३॥ जिउ बालकु पिता ऊपरि करे बहु माणु ॥ बुलाइआ बोलै गुर कै भाणि ॥ गुझी छंनी नाही बात ॥ गुरु नानकु तुठा कीनी दाति ॥४॥७॥१०१॥

** बच्चे के स्वास्थ्य के लिए **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 619)
सोरठि महला ५ ॥
सूख मंगल कलिआण सहज धुनि प्रभ के चरण निहारिआ ॥ राखनहारै राखिओ बारिकु सतिगुरि तापु उतारिआ ॥१॥ उबरे सतिगुर की सरणाई ॥ जा की सेव न बिरथी जाई ॥ रहाउ ॥ घर महि सूख बाहरि फुनि सूखा प्रभ अपुने भए दइआला ॥ नानक बिघनु न लागै कोऊ मेरा प्रभु होआ किरपाला ॥२॥१२॥४०॥

** माँ की रक्षा के लिए **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 396)
आसा महला ५ ॥
गुर पूरे राखिआ दे हाथ ॥ प्रगटु भइआ जन का परतापु ॥१॥ गुरु गुरु जपी गुरू गुरु धिआई ॥ जीअ की अरदासि गुरू पहि पाई ॥ रहाउ ॥ सरनि परे साचे गुरदेव ॥ पूरन होई सेवक सेव ॥२॥ जीउ पिंडु जोबनु राखै प्रान ॥ कहु नानक गुर कउ कुरबान ॥३॥८॥१०२॥

** गर्भावस्था की रक्षा के लिए **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 613)
सोरठि महला ५ घरु २ ॥
मात गरभ महि आपन सिमरनु दे तह तुम राखनहारे ॥ पावक सागर अथाह लहरि महि तारहु तारनहारे ॥१॥ माधौ तू ठाकुरु सिरि मोरा ॥ ईहा ऊहा तुहारो धोरा ॥ रहाउ ॥ कीते कउ मेरै समानै करणहारु त्रिणु जानै ॥ तू दाता मागन कउ सगली दानु देहि प्रभ भानै ॥२॥ खिन महि अवरु खिनै महि अवरा अचरज चलत तुमारे ॥ रूड़ो गूड़ो गहिर ग्मभीरो ऊचौ अगम अपारे ॥३॥ साधसंगि जउ तुमहि मिलाइओ तउ सुनी तुमारी बाणी ॥ अनदु भइआ पेखत ही नानक प्रताप पुरख निरबाणी ॥४॥७॥१८॥

** बच्चों की सुरक्षा **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 821)
बिलावलु महला ५ ॥
तापु लाहिआ गुर सिरजनहारि ॥ सतिगुर अपने कउ बलि जाई जिनि पैज रखी सारै संसारि ॥१॥ रहाउ ॥ करु मसतकि धारि बालिकु रखि लीनो ॥ प्रभि अम्रित नामु महा रसु दीनो ॥१॥ दास की लाज रखै मिहरवानु ॥ गुरु नानकु बोलै दरगह परवानु ॥२॥६॥८६॥

** बच्चे के स्वास्थ्य के लिए **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 819)
बिलावलु महला ५ ॥
अपणे बालक आपि रखिअनु पारब्रहम गुरदेव ॥ सुख सांति सहज आनद भए पूरन भई सेव ॥१॥ रहाउ ॥ भगत जना की बेनती सुणी प्रभि आपि ॥ रोग मिटाइ जीवालिअनु जा का वड परतापु ॥१॥ दोख हमारे बखसिअनु अपणी कल धारी ॥ मन बांछत फल दितिअनु नानक बलिहारी ॥२॥१६॥८०॥

** बच्चे की प्राप्ति **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 181)
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
तूं मेरा सखा तूंही मेरा मीतु ॥ तूं मेरा प्रीतमु तुम संगि हीतु ॥ तूं मेरी पति तूहै मेरा गहणा ॥ तुझ बिनु निमखु न जाई रहणा ॥१॥ तूं मेरे लालन तूं मेरे प्रान ॥ तूं मेरे साहिब तूं मेरे खान ॥१॥ रहाउ ॥ जिउ तुम राखहु तिव ही रहना ॥ जो तुम कहहु सोई मोहि करना ॥ जह पेखउ तहा तुम बसना ॥ निरभउ नामु जपउ तेरा रसना ॥२॥ तूं मेरी नव निधि तूं भंडारु ॥ रंग रसा तूं मनहि अधारु ॥ तूं मेरी सोभा तुम संगि रचीआ ॥ तूं मेरी ओट तूं है मेरा तकीआ ॥३॥ मन तन अंतरि तुही धिआइआ ॥ मरमु तुमारा गुर ते पाइआ ॥ सतिगुर ते द्रिड़िआ इकु एकै ॥ नानक दास हरि हरि हरि टेकै ॥४॥१८॥८७॥


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