Pt 4 - संकट मोचन शब्द, Part 4 - Sankat mochan / Gurshabad sidhi / Shradha puran Path in Hindi Gurbani online


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** दरगाह में सम्मान मिले **
(गुरू नानक देव जी) (अंग 3)
पंच परवाण पंच परधानु ॥ पंचे पावहि दरगहि मानु ॥ पंचे सोहहि दरि राजानु ॥ पंचा का गुरु एकु धिआनु ॥ जे को कहै करै वीचारु ॥ करते कै करणै नाही सुमारु ॥ धौलु धरमु दइआ का पूतु ॥ संतोखु थापि रखिआ जिनि सूति ॥ जे को बुझै होवै सचिआरु ॥ धवलै उपरि केता भारु ॥ धरती होरु परै होरु होरु ॥ तिस ते भारु तलै कवणु जोरु ॥ जीअ जाति रंगा के नाव ॥ सभना लिखिआ वुड़ी कलाम ॥ एहु लेखा लिखि जाणै कोइ ॥ लेखा लिखिआ केता होइ ॥ केता ताणु सुआलिहु रूपु ॥ केती दाति जाणै कौणु कूतु ॥ कीता पसाउ एको कवाउ ॥ तिस ते होए लख दरीआउ ॥ कुदरति कवण कहा वीचारु ॥ वारिआ न जावा एक वार ॥ जो तुधु भावै साई भली कार ॥ तू सदा सलामति निरंकार ॥१६॥

** दरबार में सम्मान मिले **
(गुरू नानक देव जी) (अंग 2)
साचा साहिबु साचु नाइ भाखिआ भाउ अपारु ॥ आखहि मंगहि देहि देहि दाति करे दातारु ॥ फेरि कि अगै रखीऐ जितु दिसै दरबारु ॥ मुहौ कि बोलणु बोलीऐ जितु सुणि धरे पिआरु ॥ अम्रित वेला सचु नाउ वडिआई वीचारु ॥ करमी आवै कपड़ा नदरी मोखु दुआरु ॥ नानक एवै जाणीऐ सभु आपे सचिआरु ॥४॥

** शाही दरबार में सम्मान **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 631)
सोरठि महला ५ ॥
सुनहु बिनंती ठाकुर मेरे जीअ जंत तेरे धारे ॥ राखु पैज नाम अपुने की करन करावनहारे ॥१॥ प्रभ जीउ खसमाना करि पिआरे ॥ बुरे भले हम थारे ॥ रहाउ ॥ सुणी पुकार समरथ सुआमी बंधन काटि सवारे ॥ पहिरि सिरपाउ सेवक जन मेले नानक प्रगट पहारे ॥२॥२९॥९३॥

** सम्मान की प्राप्ति **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 631)
सोरठि महला ५ ॥
जीअ जंत सभि वसि करि दीने सेवक सभि दरबारे ॥ अंगीकारु कीओ प्रभ अपुने भव निधि पारि उतारे ॥१॥ संतन के कारज सगल सवारे ॥ दीन दइआल क्रिपाल क्रिपा निधि पूरन खसम हमारे ॥ रहाउ ॥ आउ बैठु आदरु सभ थाई ऊन न कतहूं बाता ॥ भगति सिरपाउ दीओ जन अपुने प्रतापु नानक प्रभ जाता ॥२॥३०॥९४॥

** महिमा बढे **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 827)
बिलावलु महला ५ ॥
राखि लीए सतिगुर की सरण ॥ जै जै कारु होआ जग अंतरि पारब्रहमु मेरो तारण तरण ॥१॥ रहाउ ॥ बिस्व्मभर पूरन सुखदाता सगल समग्री पोखण भरण ॥ थान थनंतरि सरब निरंतरि बलि बलि जांई हरि के चरण ॥१॥ जीअ जुगति वसि मेरे सुआमी सरब सिधि तुम कारण करण ॥ आदि जुगादि प्रभु रखदा आइआ हरि सिमरत नानक नही डरण ॥२॥३०॥११६॥


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