Pt 3 - संकट मोचन शब्द, Part 3 - Sankat mochan / Gurshabad sidhi / Shradha puran Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


** धन की प्राप्ति **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 10)
रागु गूजरी महला ५ ॥
काहे रे मन चितवहि उदमु जा आहरि हरि जीउ परिआ ॥ सैल पथर महि जंत उपाए ता का रिजकु आगै करि धरिआ ॥१॥ मेरे माधउ जी सतसंगति मिले सु तरिआ ॥ गुर परसादि परम पदु पाइआ सूके कासट हरिआ ॥१॥ रहाउ ॥ जननि पिता लोक सुत बनिता कोइ न किस की धरिआ ॥ सिरि सिरि रिजकु स्मबाहे ठाकुरु काहे मन भउ करिआ ॥२॥ ऊडे ऊडि आवै सै कोसा तिसु पाछै बचरे छरिआ ॥ तिन कवणु खलावै कवणु चुगावै मन महि सिमरनु करिआ ॥३॥ सभि निधान दस असट सिधान ठाकुर कर तल धरिआ ॥ जन नानक बलि बलि सद बलि जाईऐ तेरा अंतु न पारावरिआ ॥४॥५॥

** व्यापार में वृद्धि **
(गुरू नानक देव जी) (अंग 5)
अमुल गुण अमुल वापार ॥ अमुल वापारीए अमुल भंडार ॥ अमुल आवहि अमुल लै जाहि ॥ अमुल भाइ अमुला समाहि ॥ अमुलु धरमु अमुलु दीबाणु ॥ अमुलु तुलु अमुलु परवाणु ॥ अमुलु बखसीस अमुलु नीसाणु ॥ अमुलु करमु अमुलु फुरमाणु ॥ अमुलो अमुलु आखिआ न जाइ ॥ आखि आखि रहे लिव लाइ ॥ आखहि वेद पाठ पुराण ॥ आखहि पड़े करहि वखिआण ॥ आखहि बरमे आखहि इंद ॥ आखहि गोपी तै गोविंद ॥ आखहि ईसर आखहि सिध ॥ आखहि केते कीते बुध ॥ आखहि दानव आखहि देव ॥ आखहि सुरि नर मुनि जन सेव ॥ केते आखहि आखणि पाहि ॥ केते कहि कहि उठि उठि जाहि ॥ एते कीते होरि करेहि ॥ ता आखि न सकहि केई केइ ॥ जेवडु भावै तेवडु होइ ॥ नानक जाणै साचा सोइ ॥ जे को आखै बोलुविगाड़ु ॥ ता लिखीऐ सिरि गावारा गावारु ॥२६॥

** व्यापार में वृद्धि **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 44)
सिरीरागु महला ५ ॥
सभे थोक परापते जे आवै इकु हथि ॥ जनमु पदारथु सफलु है जे सचा सबदु कथि ॥ गुर ते महलु परापते जिसु लिखिआ होवै मथि ॥१॥ मेरे मन एकस सिउ चितु लाइ ॥ एकस बिनु सभ धंधु है सभ मिथिआ मोहु माइ ॥१॥ रहाउ ॥ लख खुसीआ पातिसाहीआ जे सतिगुरु नदरि करेइ ॥ निमख एक हरि नामु देइ मेरा मनु तनु सीतलु होइ ॥ जिस कउ पूरबि लिखिआ तिनि सतिगुर चरन गहे ॥२॥ सफल मूरतु सफला घड़ी जितु सचे नालि पिआरु ॥ दूखु संतापु न लगई जिसु हरि का नामु अधारु ॥ बाह पकड़ि गुरि काढिआ सोई उतरिआ पारि ॥३॥ थानु सुहावा पवितु है जिथै संत सभा ॥ ढोई तिस ही नो मिलै जिनि पूरा गुरू लभा ॥ नानक बधा घरु तहां जिथै मिरतु न जनमु जरा ॥४॥६॥७६॥

** लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 1096)
पउड़ी ॥
जा तू मेरै वलि है ता किआ मुहछंदा ॥ तुधु सभु किछु मैनो सउपिआ जा तेरा बंदा ॥ लखमी तोटि न आवई खाइ खरचि रहंदा ॥ लख चउरासीह मेदनी सभ सेव करंदा ॥ एह वैरी मित्र सभि कीतिआ नह मंगहि मंदा ॥ लेखा कोइ न पुछई जा हरि बखसंदा ॥ अनंदु भइआ सुखु पाइआ मिलि गुर गोविंदा ॥ सभे काज सवारिऐ जा तुधु भावंदा ॥७॥

** कर्ज ख़तम हो **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 816)
बिलावलु महला ५ ॥
जीअ जंत सुप्रसंन भए देखि प्रभ परताप ॥ करजु उतारिआ सतिगुरू करि आहरु आप ॥१॥ खात खरचत निबहत रहै गुर सबदु अखूट ॥ पूरन भई समगरी कबहू नही तूट ॥१॥ रहाउ ॥ साधसंगि आराधना हरि निधि आपार ॥ धरम अरथ अरु काम मोख देते नही बार ॥२॥ भगत अराधहि एक रंगि गोबिंद गुपाल ॥ राम नाम धनु संचिआ जा का नही सुमारु ॥३॥ सरनि परे प्रभ तेरीआ प्रभ की वडिआई ॥ नानक अंतु न पाईऐ बेअंत गुसाई ॥४॥३२॥६२॥

** धन का अचानक अधिग्रहण **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 185)
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
हम धनवंत भागठ सच नाइ ॥ हरि गुण गावह सहजि सुभाइ ॥१॥ रहाउ ॥ पीऊ दादे का खोलि डिठा खजाना ॥ ता मेरै मनि भइआ निधाना ॥१॥ रतन लाल जा का कछू न मोलु ॥ भरे भंडार अखूट अतोल ॥२॥ खावहि खरचहि रलि मिलि भाई ॥ तोटि न आवै वधदो जाई ॥३॥ कहु नानक जिसु मसतकि लेखु लिखाइ ॥ सु एतु खजानै लइआ रलाइ ॥४॥३१॥१००॥

** व्यापार में वृद्धि हो **
(गुरू नानक देव जी) (अंग 22)
सिरीरागु महला १ ॥
वणजु करहु वणजारिहो वखरु लेहु समालि ॥ तैसी वसतु विसाहीऐ जैसी निबहै नालि ॥ अगै साहु सुजाणु है लैसी वसतु समालि ॥१॥ भाई रे रामु कहहु चितु लाइ ॥ हरि जसु वखरु लै चलहु सहु देखै पतीआइ ॥१॥ रहाउ ॥ जिना रासि न सचु है किउ तिना सुखु होइ ॥ खोटै वणजि वणंजिऐ मनु तनु खोटा होइ ॥ फाही फाथे मिरग जिउ दूखु घणो नित रोइ ॥२॥ खोटे पोतै ना पवहि तिन हरि गुर दरसु न होइ ॥ खोटे जाति न पति है खोटि न सीझसि कोइ ॥ खोटे खोटु कमावणा आइ गइआ पति खोइ ॥३॥ नानक मनु समझाईऐ गुर कै सबदि सालाह ॥ राम नाम रंगि रतिआ भारु न भरमु तिनाह ॥ हरि जपि लाहा अगला निरभउ हरि मन माह ॥४॥२३॥

** पैसे की प्राप्ति **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 1146)
भैरउ महला ५ ॥
निरधन कउ तुम देवहु धना ॥ अनिक पाप जाहि निरमल मना ॥ सगल मनोरथ पूरन काम ॥ भगत अपुने कउ देवहु नाम ॥१॥ सफल सेवा गोपाल राइ ॥ करन करावनहार सुआमी ता ते बिरथा कोइ न जाइ ॥१॥ रहाउ ॥ रोगी का प्रभ खंडहु रोगु ॥ दुखीए का मिटावहु प्रभ सोगु ॥ निथावे कउ तुम्ह थानि बैठावहु ॥ दास अपने कउ भगती लावहु ॥२॥ निमाणे कउ प्रभ देतो मानु ॥ मूड़ मुगधु होइ चतुर सुगिआनु ॥ सगल भइआन का भउ नसै ॥ जन अपने कै हरि मनि बसै ॥३॥ पारब्रहम प्रभ सूख निधान ॥ ततु गिआनु हरि अम्रित नाम ॥ करि किरपा संत टहलै लाए ॥ नानक साधू संगि समाए ॥४॥२३॥३६॥

** व्यापार में वृद्धि **
(गुरू रामदास जी) (अंग 165)
गउड़ी बैरागणि महला ४ ॥
साहु हमारा तूं धणी जैसी तूं रासि देहि तैसी हम लेहि ॥ हरि नामु वणंजह रंग सिउ जे आपि दइआलु होइ देहि ॥१॥ हम वणजारे राम के ॥ हरि वणजु करावै दे रासि रे ॥१॥ रहाउ ॥ लाहा हरि भगति धनु खटिआ हरि सचे साह मनि भाइआ ॥ हरि जपि हरि वखरु लदिआ जमु जागाती नेड़ि न आइआ ॥२॥ होरु वणजु करहि वापारीए अनंत तरंगी दुखु माइआ ॥ ओइ जेहै वणजि हरि लाइआ फलु तेहा तिन पाइआ ॥३॥ हरि हरि वणजु सो जनु करे जिसु क्रिपालु होइ प्रभु देई ॥ जन नानक साहु हरि सेविआ फिरि लेखा मूलि न लेई ॥४॥१॥७॥४५॥

** पैदावार बढ़ाने के लिए **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 104)
माझ महला ५ ॥
हुकमी वरसण लागे मेहा ॥ साजन संत मिलि नामु जपेहा ॥ सीतल सांति सहज सुखु पाइआ ठाढि पाई प्रभि आपे जीउ ॥१॥ सभु किछु बहुतो बहुतु उपाइआ ॥ करि किरपा प्रभि सगल रजाइआ ॥ दाति करहु मेरे दातारा जीअ जंत सभि ध्रापे जीउ ॥२॥ सचा साहिबु सची नाई ॥ गुर परसादि तिसु सदा धिआई ॥ जनम मरण भै काटे मोहा बिनसे सोग संतापे जीउ ॥३॥ सासि सासि नानकु सालाहे ॥ सिमरत नामु काटे सभि फाहे ॥ पूरन आस करी खिन भीतरि हरि हरि हरि गुण जापे जीउ ॥४॥२७॥३४॥


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