संकट मोचन शब्द, Sankat mochan / Gurshabad sidhi / Shradha puran Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


** सभी इच्छा सम्पूर्ण **
(गुरू नानक देव जी) (अंग 1)
ੴ सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥

** जप तप की प्राप्ति **
(गुरू नानक देव जी) (अंग 3)
असंख जप असंख भाउ ॥ असंख पूजा असंख तप ताउ ॥ असंख गरंथ मुखि वेद पाठ ॥ असंख जोग मनि रहहि उदास ॥ असंख भगत गुण गिआन वीचार ॥ असंख सती असंख दातार ॥ असंख सूर मुह भख सार ॥ असंख मोनि लिव लाइ तार ॥ कुदरति कवण कहा वीचारु ॥ वारिआ न जावा एक वार ॥ जो तुधु भावै साई भली कार ॥ तू सदा सलामति निरंकार ॥१७॥

** सभी कार्य सम्पूर्ण **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 628)
सोरठि महला ५ ॥
ऐथै ओथै रखवाला ॥ प्रभ सतिगुर दीन दइआला ॥ दास अपने आपि राखे ॥ घटि घटि सबदु सुभाखे ॥१॥ गुर के चरण ऊपरि बलि जाई ॥ दिनसु रैनि सासि सासि समाली पूरनु सभनी थाई ॥ रहाउ ॥ आपि सहाई होआ ॥ सचे दा सचा ढोआ ॥ तेरी भगति वडिआई ॥ पाई नानक प्रभ सरणाई ॥२॥१४॥७८॥

** घर में सुख शांति **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 825)
बिलावलु महला ५ ॥
दोवै थाव रखे गुर सूरे ॥ हलत पलत पारब्रहमि सवारे कारज होए सगले पूरे ॥१॥ रहाउ ॥ हरि हरि नामु जपत सुख सहजे मजनु होवत साधू धूरे ॥ आवण जाण रहे थिति पाई जनम मरण के मिटे बिसूरे ॥१॥ भ्रम भै तरे छुटे भै जम के घटि घटि एकु रहिआ भरपूरे ॥ नानक सरणि परिओ दुख भंजन अंतरि बाहरि पेखि हजूरे ॥२॥२२॥१०८॥

** कार्य पूर्ण हो **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 201)
गउड़ी महला ५ ॥
थिरु घरि बैसहु हरि जन पिआरे ॥ सतिगुरि तुमरे काज सवारे ॥१॥ रहाउ ॥ दुसट दूत परमेसरि मारे ॥ जन की पैज रखी करतारे ॥१॥ बादिसाह साह सभ वसि करि दीने ॥ अम्रित नाम महा रस पीने ॥२॥ निरभउ होइ भजहु भगवान ॥ साधसंगति मिलि कीनो दानु ॥३॥ सरणि परे प्रभ अंतरजामी ॥ नानक ओट पकरी प्रभ सुआमी ॥४॥१०८॥

** सुख की प्राप्ति **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 783)
घर मंदर हटनाले सोहे जिसु विचि नामु निवासी राम ॥ संत भगत हरि नामु अराधहि कटीऐ जम की फासी राम ॥ काटी जम फासी प्रभि अबिनासी हरि हरि नामु धिआए ॥ सगल समग्री पूरन होई मन इछे फल पाए ॥ संत सजन सुखि माणहि रलीआ दूख दरद भ्रम नासी ॥ सबदि सवारे सतिगुरि पूरै नानक सद बलि जासी ॥२॥

** बिगड़े काम ठीक हो जाए **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 625)
सोरठि मः ५ ॥
गुरु पूरा नमसकारे ॥ प्रभि सभे काज सवारे ॥ हरि अपणी किरपा धारी ॥ प्रभ पूरन पैज सवारी ॥१॥ अपने दास को भइओ सहाई ॥ सगल मनोरथ कीने करतै ऊणी बात न काई ॥ रहाउ ॥ करतै पुरखि तालु दिवाइआ ॥ पिछै लगि चली माइआ ॥ तोटि न कतहू आवै ॥ मेरे पूरे सतगुर भावै ॥२॥ सिमरि सिमरि दइआला ॥ सभि जीअ भए किरपाला ॥ जै जै कारु गुसाई ॥ जिनि पूरी बणत बणाई ॥३॥ तू भारो सुआमी मोरा ॥ इहु पुंनु पदारथु तेरा ॥ जन नानक एकु धिआइआ ॥ सरब फला पुंनु पाइआ ॥४॥१४॥६४॥

** कार्यों की पूर्ति के लिए **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 621)
सोरठि महला ५ ॥
गुरि पूरै किरपा धारी ॥ प्रभि पूरी लोच हमारी ॥ करि इसनानु ग्रिहि आए ॥ अनद मंगल सुख पाए ॥१॥ संतहु राम नामि निसतरीऐ ॥ ऊठत बैठत हरि हरि धिआईऐ अनदिनु सुक्रितु करीऐ ॥१॥ रहाउ ॥ संत का मारगु धरम की पउड़ी को वडभागी पाए ॥ कोटि जनम के किलबिख नासे हरि चरणी चितु लाए ॥२॥ उसतति करहु सदा प्रभ अपने जिनि पूरी कल राखी ॥ जीअ जंत सभि भए पवित्रा सतिगुर की सचु साखी ॥३॥ बिघन बिनासन सभि दुख नासन सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ ॥ खोए पाप भए सभि पावन जन नानक सुखि घरि आइआ ॥४॥३॥५३॥

** सुख प्राप्त करने के लिए **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 187)
गउड़ी महला ५ ॥
गुर के चरण ऊपरि मेरे माथे ॥ ता ते दुख मेरे सगले लाथे ॥१॥ सतिगुर अपुने कउ कुरबानी ॥ आतम चीनि परम रंग मानी ॥१॥ रहाउ ॥ चरण रेणु गुर की मुखि लागी ॥ अह्मबुधि तिनि सगल तिआगी ॥२॥ गुर का सबदु लगो मनि मीठा ॥ पारब्रहमु ता ते मोहि डीठा ॥३॥ गुरु सुखदाता गुरु करतारु ॥ जीअ प्राण नानक गुरु आधारु ॥४॥३८॥१०७॥

** सभी की भलाई के लिए **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 261)
पउड़ी ॥
हे अचुत हे पारब्रहम अबिनासी अघनास ॥ हे पूरन हे सरब मै दुख भंजन गुणतास ॥ हे संगी हे निरंकार हे निरगुण सभ टेक ॥ हे गोबिद हे गुण निधान जा कै सदा बिबेक ॥ हे अपर्मपर हरि हरे हहि भी होवनहार ॥ हे संतह कै सदा संगि निधारा आधार ॥ हे ठाकुर हउ दासरो मै निरगुन गुनु नही कोइ ॥ नानक दीजै नाम दानु राखउ हीऐ परोइ ॥५५॥

** मन की शांति हो **
(गुरू अमरदास जी) (अंग 560)
वडहंसु महला ३ ॥
रसना हरि सादि लगी सहजि सुभाइ ॥ मनु त्रिपतिआ हरि नामु धिआइ ॥१॥ सदा सुखु साचै सबदि वीचारी ॥ आपणे सतगुर विटहु सदा बलिहारी ॥१॥ रहाउ ॥ अखी संतोखीआ एक लिव लाइ ॥ मनु संतोखिआ दूजा भाउ गवाइ ॥२॥ देह सरीरि सुखु होवै सबदि हरि नाइ ॥ नामु परमलु हिरदै रहिआ समाइ ॥३॥ नानक मसतकि जिसु वडभागु ॥ गुर की बाणी सहज बैरागु ॥४॥७॥

** घर की भलाई के लिए **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 268)
तू ठाकुरु तुम पहि अरदासि ॥ जीउ पिंडु सभु तेरी रासि ॥ तुम मात पिता हम बारिक तेरे ॥ तुमरी क्रिपा महि सूख घनेरे ॥ कोइ न जानै तुमरा अंतु ॥ ऊचे ते ऊचा भगवंत ॥ सगल समग्री तुमरै सूत्रि धारी ॥ तुम ते होइ सु आगिआकारी ॥ तुमरी गति मिति तुम ही जानी ॥ नानक दास सदा कुरबानी ॥८॥४॥

** सुख की प्राप्ति हो **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 630)
सोरठि महला ५ ॥
सरब सुखा का दाता सतिगुरु ता की सरनी पाईऐ ॥ दरसनु भेटत होत अनंदा दूखु गइआ हरि गाईऐ ॥१॥ हरि रसु पीवहु भाई ॥ नामु जपहु नामो आराधहु गुर पूरे की सरनाई ॥ रहाउ ॥ तिसहि परापति जिसु धुरि लिखिआ सोई पूरनु भाई ॥ नानक की बेनंती प्रभ जी नामि रहा लिव लाई ॥२॥२५॥८९॥

** मन वांछित फल मिले **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 812)
बिलावलु महला ५ ॥
एक टेक गोविंद की तिआगी अन आस ॥ सभ ऊपरि समरथ प्रभ पूरन गुणतास ॥१॥ जन का नामु अधारु है प्रभ सरणी पाहि ॥ परमेसर का आसरा संतन मन माहि ॥१॥ रहाउ ॥ आपि रखै आपि देवसी आपे प्रतिपारै ॥ दीन दइआल क्रिपा निधे सासि सासि सम्हारै ॥२॥ करणहारु जो करि रहिआ साई वडिआई ॥ गुरि पूरै उपदेसिआ सुखु खसम रजाई ॥३॥ चिंत अंदेसा गणत तजि जनि हुकमु पछाता ॥ नह बिनसै नह छोडि जाइ नानक रंगि राता ॥४॥१८॥४८॥

** मन की शांति **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 817)
रागु बिलावलु महला ५ दुपदे घरु ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अवरि उपाव सभि तिआगिआ दारू नामु लइआ ॥ ताप पाप सभि मिटे रोग सीतल मनु भइआ ॥१॥ गुरु पूरा आराधिआ सगला दुखु गइआ ॥ राखनहारै राखिआ अपनी करि मइआ ॥१॥ रहाउ ॥ बाह पकड़ि प्रभि काढिआ कीना अपनइआ ॥ सिमरि सिमरि मन तन सुखी नानक निरभइआ ॥२॥१॥६५॥

** बिगड़े काम ठीक हो जाए **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 816)
बिलावलु महला ५ ॥
सिमरि सिमरि पूरन प्रभू कारज भए रासि ॥ करतार पुरि करता वसै संतन कै पासि ॥१॥ रहाउ ॥ बिघनु न कोऊ लागता गुर पहि अरदासि ॥ रखवाला गोबिंद राइ भगतन की रासि ॥१॥ तोटि न आवै कदे मूलि पूरन भंडार ॥ चरन कमल मनि तनि बसे प्रभ अगम अपार ॥२॥ बसत कमावत सभि सुखी किछु ऊन न दीसै ॥ संत प्रसादि भेटे प्रभू पूरन जगदीसै ॥३॥ जै जै कारु सभै करहि सचु थानु सुहाइआ ॥ जपि नानक नामु निधान सुख पूरा गुरु पाइआ ॥४॥३३॥६३॥

** सुख की प्राप्ति हो **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 192)
गउड़ी महला ५ ॥
जिसु सिमरत दूखु सभु जाइ ॥ नामु रतनु वसै मनि आइ ॥१॥ जपि मन मेरे गोविंद की बाणी ॥ साधू जन रामु रसन वखाणी ॥१॥ रहाउ ॥ इकसु बिनु नाही दूजा कोइ ॥ जा की द्रिसटि सदा सुखु होइ ॥२॥ साजनु मीतु सखा करि एकु ॥ हरि हरि अखर मन महि लेखु ॥३॥ रवि रहिआ सरबत सुआमी ॥ गुण गावै नानकु अंतरजामी ॥४॥६२॥१३१॥

** कल्याण के लिए **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 826)
बिलावलु महला ५ ॥
गोबिदु सिमरि होआ कलिआणु ॥ मिटी उपाधि भइआ सुखु साचा अंतरजामी सिमरिआ जाणु ॥१॥ रहाउ ॥ जिस के जीअ तिनि कीए सुखाले भगत जना कउ साचा ताणु ॥ दास अपुने की आपे राखी भै भंजन ऊपरि करते माणु ॥१॥ भई मित्राई मिटी बुराई द्रुसट दूत हरि काढे छाणि ॥ सूख सहज आनंद घनेरे नानक जीवै हरि गुणह वखाणि ॥२॥२६॥११२॥

** अटके काम पूरे हों **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 386)
आसा महला ५ ॥
ऊठत बैठत सोवत धिआईऐ ॥ मारगि चलत हरे हरि गाईऐ ॥१॥ स्रवन सुनीजै अम्रित कथा ॥ जासु सुनी मनि होइ अनंदा दूख रोग मन सगले लथा ॥१॥ रहाउ ॥ कारजि कामि बाट घाट जपीजै ॥ गुर प्रसादि हरि अम्रितु पीजै ॥२॥ दिनसु रैनि हरि कीरतनु गाईऐ ॥ सो जनु जम की वाट न पाईऐ ॥३॥ आठ पहर जिसु विसरहि नाही ॥ गति होवै नानक तिसु लगि पाई ॥४॥१०॥६१॥

** प्रफुल्लता के लिए **
(गुरू अर्जन देव जी) (अंग 681)
धनासरी महला ५ ॥
चतुर दिसा कीनो बलु अपना सिर ऊपरि करु धारिओ ॥ क्रिपा कटाख्य अवलोकनु कीनो दास का दूखु बिदारिओ ॥१॥ हरि जन राखे गुर गोविंद ॥ कंठि लाइ अवगुण सभि मेटे दइआल पुरख बखसंद ॥ रहाउ ॥ जो मागहि ठाकुर अपुने ते सोई सोई देवै ॥ नानक दासु मुख ते जो बोलै ईहा ऊहा सचु होवै ॥२॥१४॥४५॥


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