रहरासि साहिब, Rehraas Sahib (Mahalla 1 3 4 5 10) Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


सलोकु म १ ॥
दुखु दारू सुखु रोगु भया जा सुखु तामि न होयी ॥ तूं करता करना मै नाही जा हउ करी न होयी ॥१॥

बलेहारी कुदरति वस्या ॥ तेरा अंतु न जायी लख्या ॥१॥ रहाउ ॥

जाति मह जोति जोति मह जाता अकल कला भरपूरि रहआ ॥ तूं सचा साहबु सिफति सुआलिउ जिनि कीती सो पारि पया ॥ कहु नानक करते किया बाता जो किछु करना सु करि रहआ ॥२॥

सोदरु रागु आसा महला १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सो दरु तेरा केहा सो घरु केहा जितु बह सरब समाले ॥ वाजे तेरे नाद अनेक असंखा केते तेरे वावणहारे ॥ केते तेरे राग परी स्यु कहियह केते तेरे गावणहारे ॥ गावनि तुधनो पवनु पानी बैसंतरु गावै राजाधरमु दुआरे ॥ गावनि तुधनो चितु गुपतु लिखि जाणनि लिखि लिखि धरमु बीचारे ॥ गावनि तुधनो ईसरु ब्रहमा देवी सोहनि तेरे सदा सवारे ॥ गावनि तुधनो इन्द्र इन्द्रासनि बैठे देवत्या दरि नाले ॥ गावनि तुधनो सिध समाधी अन्दरि गावनि तुधनो साध बीचारे ॥ गावनि तुधनो जती सती संतोखी गावनि तुधनो वीर करारे ॥ गावनि तुधनो पंडित पड़नि रखीसुर जुगु जुगु वेदा नाले ॥ गावनि तुधनो मोहणिया मनु मोहनि सुरगु मछु पयाले ॥ गावनि तुधनो रतन उपाए तेरे अठसठि तीरथ नाले ॥ गावनि तुधनो जोध महाबल सूरा गावनि तुधनो खानी चारे ॥ गावनि तुधनो खंड मंडल ब्रहमंडा करि करि रखे तेरे धारे ॥ सेयी तुधनो गावनि जो तुधु भावनि रते तेरे भगत रसाले ॥ होरि केते तुधनो गावनि से मै चिति न आवनि नानकु क्या बीचारे ॥ सोयी सोयी सदा सचु साहबु साचा साची नायी ॥ है भी होसी जाय न जासी रचना जिनि रचायी ॥ रंगी रंगी भाती करि करि जिनसी मायआ जिनि उपायी ॥ करि करि देखै कीता आपना ज्यु तिस दी वड्यायी ॥ जो तिसु भावै सोयी करसी फिरि हुकमु न करना जायी ॥ सो पातिसाहु साहा पतिसाहबु नानक रहनु रजायी ॥१॥

आसा महला १ ॥
सुनि वडा आखै सभु कोइ ॥ केवडु वडा डीठा होइ ॥ कीमति पाय न कहआ जाय ॥ कहनै वाले तेरे रहे समाय ॥१॥

वडे मेरे साहबा गहर गंभीरा गुनी गहीरा ॥ कोइ न जानै तेरा केता केवडु चीरा ॥१॥ रहाउ ॥

सभि सुरती मिलि सुरति कमायी ॥ सभ कीमति मिलि कीमति पायी ॥ ग्यानी ध्यानी गुर गुरहायी ॥ कहनु न जायी तेरी तिलु वड्यायी ॥२॥

सभि सत सभि तप सभि चंग्याईआ ॥ सिधा पुरखा किया वड्याईआ ॥ तुधु विनु सिधी किनै न पाईआ ॥ करमि मिलै नाही ठाकि रहाईआ ॥३॥

आखन वाला क्या वेचारा ॥ सिफती भरे तेरे भंडारा ॥ जिसु तू देह तिसै क्या चारा ॥ नानक सचु सवारणहारा ॥४॥२॥

आसा महला १ ॥
आखा जीवा विसरै मरि जाउ ॥ आखनि अउखा साचा नाउ ॥ साचे नाम की लागै भूख ॥ उतु भूखै खाय चलियह दूख ॥१॥

सो क्यु विसरै मेरी माय ॥ साचा साहबु साचै नाय ॥१॥ रहाउ ॥

साचे नाम की तिलु वड्यायी ॥ आखि थके कीमति नही पायी ॥ जे सभि मिलि कै आखन पाह ॥ वडा न होवै घाटि न जाय ॥२॥

ना ओहु मरै न होवै सोगु ॥ देदा रहै न चूकै भोगु ॥ गुनु एहो होरु नाही कोइ ॥ ना को होआ ना को होइ ॥३॥

जेवडु आपि तेवड तेरी दाति ॥ जिनि दिनु करि कै कीती राति ॥ खसमु विसारह ते कमजाति नानक नावै बाझु सनाति ॥४॥३॥

रागु गूजरी महला ४ ॥
हरि के जन सतिगुर सत पुरखा बिनउ करउ गुर पासि ॥ हम कीरे किरम सतिगुर सरणायी करि दया नामु परगासि ॥१॥

मेरे मीत गुरदेव मोकउ राम नामु परगासि ॥ गुरमति नामु मेरा प्रान सखायी हरि कीरति हमरी रहरासि ॥१॥ रहाउ ॥

हरिजन के वडभाग वडेरे जिन हरि हरि सरधा हरि प्यास ॥ हरि हरि नामु मिलै त्रिपतासह मिलि संगति गुन परगासि ॥२॥

जिन हरि हरि हरि रसु नामु न पायआ ते भागहीन जम पासि ॥ जो सतिगुर सरनि संगति नही आए ध्रिगु जीवे ध्रिगु जीवासि ॥३॥

जिन हरिजन सतिगुर संगित पायी तिन धुरि मसतकि लिख्या लिखासि ॥ धनु धन्नु सतसंगित जितु हरि रसु पायआ मिलि जन नानक नामु परगासि ॥४॥४॥

रागु गूजरी महला ५ ॥
काहे रे मन चितवह उदमु जा आहरि हरि जीउ पर्या ॥ सैल पथर मह जंत उपाए ता का रिजकु आगै करि धर्या ॥१॥

मेरे माधउ जी सतसंगति मिले सु तर्या ॥ गुरपरसादि परमपदु पायआ सूके कासट हर्या ॥१॥ रहाउ ॥

जननि पिता लोक सुत बनिता कोइ न किस की धर्या ॥ सिरि सिरि रिजकु सम्बाहे ठाकुरु काहे मन भउ कर्या ॥२॥

ऊडे ऊडि आवै सै कोसा तिसु पाछै बचरे छर्या ॥ तिन कवनु खलावै कवनु चुगावै मन मह सिमरनु कर्या ॥३॥

सभि निधान दस असट सिधान ठाकुर कर तल धर्या ॥ जन नानक बलि बलि सद बलि जाईऐ तेरा अंतु न पारावर्या ॥४॥५॥

रागु आसा महला ४ सो पुरखु
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सो पुरखु निरंजनु हरि पुरखु निरंजनु हरि अगमा अगम अपारा ॥ सभि ध्यावह सभि ध्यावह तुधु जी हरि सचे सिरजणहारा ॥ सभि जिय तुमारे जी तूं जिया का दातारा ॥ हरि ध्यावहु संतहु जी सभि दूख विसारणहारा ॥ हरि आपे ठाकुरु हरि आपे सेवकु जी क्या नानक जंत विचारा ॥१॥

तू घट घट अंतरि सरब निरंतरि जी हरि एको पुरखु समाना ॥ इकि दाते इकि भेखारी जी सभि तेरे चोज विडाना ॥ तूं आपे दाता आपे भुगता जी हउ तुधु बिनु अवरु न जाना ॥ तूं पारब्रहमु बेअंतु बेअंतु जी तेरे क्या गुन आखि वखाना ॥ जो सेवह जो सेवह तुधु जी जनु नानकु तिन कुरबाना ॥२॥

हरि ध्यावह हरि ध्यावह तुधु जी से जन जुग मह सुखवासी ॥ से मुकतु से मुकतु भए जिन हरि ध्याया जी तिन तूटी जम की फासी ॥ जिन निरभउ जिन हरि निरभउ ध्याया जी तिन का भउ सभु गवासी ॥ जिन सेव्या जिन सेव्या मेरा हरि जी ते हरि हरि रूपि समासी ॥ से धन्नु से धन्नु जिन हरि ध्याया जी जनु नानकु तिन बलि जासी ॥३॥

तेरी भगति तेरी भगति भंडार जी भरे बिअंत बेअंता ॥ तेरे भगत तेरे भगत सलाहनि तुधु जी हरि अनिक अनेक अनंता ॥ तेरी अनिक तेरी अनिक करह हरि पूजा जी तपु तापह जपह बेअंता ॥ तेरे अनेक तेरे अनेक पड़ह बहु सिमृति सासत जी करि किर्या खटु करम करंता ॥ से भगत से भगत भले जन नानक जी जो भावह मेरे हरि भगवंता ॥४॥

तूं आदि पुरखु अपरम्परु करता जी तुधु जेवडु अवरु न कोयी ॥ तूं जुगु जुगु एको सदा सदा तूं एको जी तूं नेहचलु करता सोयी ॥ तुधु आपे भावै सोयी वरतै जी तूं आपे करह सु होयी ॥ तुधु आपे स्रिसटि सभ उपायी जी तुधु आपे सिरजि सभ गोयी ॥ जनु नानकु गुन गावै करते के जी जो सभसै का जाणोयी ॥५॥१॥

आसा महला ४ ॥
तूं करता सच्यारु मैडा सांयी ॥ जो तउ भावै सोयी थीसी जो तू देह सोयी हउ पायी ॥१॥ रहाउ ॥

सभ तेरी तूं सभनी ध्याया ॥ जिसनो क्रिपा करह तिनि नाम रतनु पायआ ॥ गुरमुखि लाधा मनमुखि गवायआ ॥ तुधु आपि विछोड़्या आपि मिलायआ ॥१॥

तूं दरियाउ सभ तुझ ही माह ॥ तुझ बिनु दूजा कोयी नाह ॥ जिय जंत सभि तेरा खेलु ॥ विजोगि मिलि विछुड़्या संजोगी मेलु ॥२॥

जिसनो तूं जाणायह सोयी जनु जानै ॥ हरि गुन सद ही आखि वखानै ॥ जिनि हरि सेव्या तिनि सुखु पायआ ॥ सहजे ही हरि नामि समायआ ॥३॥

तूं आपे करता तेरा किया सभु होइ ॥ तुधु बिनु दूजा अवरु न कोइ ॥ तू करि करि वेखह जानह सोइ ॥ जन नानक गुरमुखि परगटु होइ ॥४॥२॥

आसा महला १ ॥
तितु सरवरड़ै भईले निवासा पानी पावकु तिनह किया ॥ पंक जु मोह पगु नही चालै हम देखा तह डूबियले ॥१॥

मन एकु न चेतसि मूड़ मना ॥ हरि बिसरत तेरे गुन गल्या ॥१॥ रहाउ ॥

ना हउ जती सती नही पड़्या मूरख मुगधा जनमु भया ॥ प्रणवति नानक तिन की सरना जिन तूं नाही वीसर्या ॥२॥३॥

आसा महला ५ ॥
भयी परापति मानुख देहुरिया ॥ गोबिन्द मिलन की इह तेरी बरिया ॥ अवरि काज तेरै कितै न काम ॥ मिलु साधसंगति भजु केवल नाम ॥१॥

सरंजामि लागु भवजल तरन कै ॥ जनमु ब्रिथा जात रंगि मायआ कै ॥१॥ रहाउ ॥

जपु तपु संजमु धरमु न कमायआ ॥ सेवा साध न जान्या हरि रायआ ॥ कहु नानक हम नीच करंमा ॥ सरनि परे की राखहु सरमा ॥२॥४॥

ੴ स्री वाहगुरू जी की फतह ॥
पातिसाही १० ॥
कबियो बाच बेनती ॥
चौपयी ॥

हमरी करो हाथ दै रच्छा ॥ पूरन होइ चित की इच्छा ॥ तव चरनन मन रहै हमारा ॥ अपना जान करो प्रतिपारा ॥३७७॥

हमरे दुसट सभै तुम घावहु ॥ आपु हाथ दै मोहि बचावहु ॥ सुखी बसै मोरो परिवारा ॥ सेवक सिक्ख सभै करतारा ॥३७८॥

मो रच्छा निज कर दै करियै ॥ सभ बैरन को आज संघरियै ॥ पूरन होइ हमारी आसा ॥ तोर भजन की रहै पिआसा ॥३७९॥

तुमहि छाडि कोई अवर न धियाऊं ॥ जो बर चहों सु तुम ते पाऊं ॥ सेवक सिक्ख हमारे तारीअहि ॥ चुनि चुनि सत्र हमारे मारीअहि ॥३८०॥

आप हाथ दै मुझै उबरियै ॥ मरन काल का त्रास निवरियै ॥ हूजो सदा हमारे पच्छा ॥ स्री असिधुज जू करियहु रच्छा ॥३८१॥

राखि लेहु मुहि राखनहारे ॥ साहिब संत सहाइ पियारे ॥ दीन बंधु दुसटन के हंता ॥ तुम हो पुरी चतुर दस कंता ॥३८२॥

काल पाइ ब्रहमा बपु धरा ॥ काल पाइ सिवजू अवतरा ॥ काल पाइ कर बिसनु प्रकासा ॥ सकल काल का कीआ तमासा ॥३८३॥

जवन काल जोगी सिव कीओ ॥ बेद राज ब्रहमा जू थीओ ॥ जवन काल सभ लोक सवारा ॥ नमसकार है ताहि हमारा ॥३८४॥

जवन काल सभ जगत बनायो ॥ देव दैत जच्छन उपजायो ॥ आदि अंति एकै अवतारा ॥ सोई गुरू समझियहु हमारा ॥३८५॥

नमसकार तिस ही को हमारी ॥ सकल प्रजा जिन आप सवारी ॥ सिवकन को सिवगुन सुख दीओ ॥ सत्रुन को पल मो बध कीओ ॥३८६॥

घट घट के अंतर की जानत ॥ भले बुरे की पीर पछानत ॥ चीटी ते कुँचर असथूला ॥ सभ पर कृपा दृसटि कर फूला ॥३८७॥

संतन दुख पाए ते दुखी ॥ सुख पाए साधुन के सुखी ॥ एक एक की पीर पछानैं ॥ घट घट के पट पट की जानैं ॥३८८॥

जब उदकरख करा करतारा ॥ प्रजा धरत तब देह अपारा ॥ जब आकरख करत हो कबहूँ ॥ तुम मै मिलत देह धर सभहूँ ॥३८९॥

जेते बदन सृसटि सभ धारै ॥ आपु आपनी बूझ उचारै ॥ तुम सभही ते रहत निरालम ॥ जानत बेद भेद अर आलम ॥३९०॥

निरंकार नृबिकार निरलंभ ॥ आदि अनील अनादि असंभ ॥ ताका मूड़्ह उचारत भेदा ॥ जा को भेव न पावत बेदा ॥३९१॥

ता को करि पाहन अनुमानत ॥ महा मूड़्ह कछु भेद न जानत ॥ महादेव को कहत सदा सिव ॥ निरंकार का चीनत नहि भिव ॥३९२॥

आपु आपनी बुधि है जेती ॥ बरनत भिंन भिंन तुहि तेती ॥ तुमरा लखा न जाइ पसारा ॥ किह बिधि सजा प्रथम संसारा ॥३९३॥

एकै रूप अनूप सरूपा ॥ रंक भयो राव कही भूपा ॥ अंडज जेरज सेतज कीनी ॥ उतभुज खानि बहुर रचि दीनी ॥३९४॥

कहूँ फूल राजा ह्वै बैठा ॥ कहूँ सिमटि भि्यो संकर इकैठा ॥ सगरी सृसटि दिखाइ अचंभव ॥ आदि जुगादि सरूप सुयंभव ॥३९५॥

अब रच्छा मेरी तुम करो ॥ सिक्ख उबारि असिक्ख संघरो ॥ दुशट जिते उठवत उतपाता ॥ सकल मलेछ करो रण घाता ॥३९६॥

जे असिधुज तव सरनी परे ॥ तिन के दुशट दुखित ह्वै मरे ॥ पुरख जवन पग परे तिहारे ॥ तिन के तुम संकट सभ टारे ॥३९७॥

जो कलि को इक बार धिऐ है ॥ ता के काल निकटि नहि ऐहै ॥ रच्छा होइ ताहि सभ काला ॥ दुसट अरिसट टरें ततकाला ॥३९८॥

कृपा दृसटि तन जाहि निहरिहो ॥ ताके ताप तनक मो हरिहो ॥ रिद्धि सिद्धि घर मो सभ होई ॥ दुशट छाह छ्वै सकै न कोई ॥३९९॥

एक बार जिन तुमै संभारा ॥ काल फास ते ताहि उबारा ॥ जिन नर नाम तिहारो कहा ॥ दारिद दुसट दोख ते रहा ॥४००॥

खड़ग केत मै सरणि तिहारी ॥ आप हाथ दै लेहु उबारी ॥ सरब ठौर मो होहु सहाई ॥ दुसट दोख ते लेहु बचाई ॥४०१॥

स्वैया ॥
पांइ गहे जब ते तुमरे तब ते कोऊ आंख तरे नही आनयो ॥ राम रहीम पुरान कुरान अनेक कहैं मत एक न मानयो ॥ सिंमृति सासत्र बेद सभै बहु भेद कहैं हम एक न जानयो ॥ स्री असिपान कृपा तुमरी करि मै न कहयो सभ तोहि बखानयो ॥८६३॥

दोहरा ॥
सगल दुआर कउ छाडि कै गहयो तुहारो दुआर ॥ बांह गहे की लाज अस गोबिन्द दास तुहार ॥८६४॥

रामकली महला ३ अनन्दु
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अनन्दु भया मेरी माए सतिगुरू मै पायआ ॥ सतिगुरु त पायआ सहज सेती मनि वजिया वाधाईआ ॥ राग रतन परवार परिया सबद गावन आईआ ॥ सबदो त गावहु हरी केरा मनि जिनी वसायआ ॥ कहै नानकु अनन्दु होआ सतिगुरू मै पायआ ॥१॥

ए मन मेर्या तू सदा रहु हरि नाले ॥ हरि नालि रहु तू मन्न मेरे दूख सभि विसारना ॥ अंगीकारु ओहु करे तेरा कारज सभि सवारना ॥ सभना गला समरथु सुआमी सो क्यु मनहु विसारे ॥ कहै नानकु मन्न मेरे सदा रहु हरि नाले ॥२॥

साचे साहबा क्या नाही घरि तेरै ॥ घरि त तेरै सभु किछु है जिसु देह सु पावए ॥ सदा सिफति सलाह तेरी नामु मनि वसावए ॥ नामु जिन कै मनि वस्या वाजे सबद घनेरे ॥ कहै नानकु सचे साहब क्या नाही घरि तेरै ॥३॥

साचा नामु मेरा आधारो ॥ साचु नामु अधारु मेरा जिनि भुखा सभि गवाईआ ॥ करि सांति सुख मनि आइ वस्या जिनि इछा सभि पुजाईआ ॥ सदा कुरबानु कीता गुरू विटहु जिस दिया एह वड्याईआ ॥ कहै नानकु सुणहु संतहु सबदि धरहु प्यारो ॥ साचा नामु मेरा आधारो ॥४॥

वाजे पंच सबद तितु घरि सभागै ॥ घरि सभागै सबद वाजे कला जितु घरि धारिया ॥ पंच दूत तुधु वसि कीते कालु कंटकु मार्या ॥ धुरि करमि पायआ तुधु जिन कउ सि नामि हरि कै लागे ॥ कहै नानकु तह सुखु होआ तितु घरि अनहद वाजे ॥५॥

अनदु सुणहु वडभागीहो सगल मनोरथ पूरे ॥ पारब्रहमु प्रभु पायआ उतरे सगल विसूरे ॥ दूख रोग संताप उतरे सुनी सची बानी ॥ संत साजन भए सरसे पूरे गुर ते जानी ॥ सुणते पुनीत कहते पवितु सतिगुरु रहआ भरपूरे ॥ बिनवंति नानकु गुर चरन लागे वाजे अनहद तूरे ॥४०॥१॥

मुन्दावनी महला ५ ॥
थाल विचि तिन्नि वसतू पईयो सतु संतोखु वीचारो ॥ अंमृत नामु ठाकुर का पइयो जिस का सभसु अधारो ॥ जे को खावै जे को भुंचै तिस का होइ उधारो ॥ एह वसतु तजी नह जायी नित नित रखु उरि धारो ॥ तम संसारु चरन लगि तरीऐ सभु नानक ब्रहम पसारो ॥१॥

सलोक महला ५ ॥
तेरा कीता जातो नाही मैनो जोगु कीतोयी ॥ मै निरगुण्यारे को गुनु नाही आपे तरसु पइयोयी ॥ तरसु पया मेहरामति होयी सतिगुरु सजनु मिल्या ॥ नानक नामु मिलै तां जीवां तनु मनु थीवै हर्या ॥१॥

पउड़ी ॥
तिथै तू समरथु जिथै कोइ नाह ॥ ओथै तेरी रख अगनी उदर माह ॥ सुनि कै जम के दूत नाय तेरै छडि जाह ॥ भउजलु बिखमु असगाहु गुरसबदी पारि पाह ॥ जिन कउ लगी प्यास अंमृतु सेइ खाह ॥ कलि मह एहो पुन्नु गुन गोविन्द गाह ॥ सभसै नो किरपालु समाले साह साह ॥ बिरथा कोइ न जाय जि आवै तुधु आह ॥९॥

सलोक म ५ ॥
अंतरि गुरु आराधना जेहवा जपि गुर नाउ ॥ नेत्री सतिगुरु पेखना स्रवनी सुनना गुर नाउ ॥ सतिगुर सेती रत्या दरगह पाईऐ ठाउ ॥ कहु नानक किरपा करे जिसनो एह वथु देइ ॥ जग मह उतम काढियह विरले केयी केइ ॥१॥

म ५ ॥
रखे रखणहारि आपि उबारिअनु ॥ गुर की पैरी पाय काज सवारिअनु ॥ होआ आपि दयालु मनहु न विसारिअनु ॥ साध जना कै संगि भवजलु तारिअनु ॥ साकत निन्दक दुसट खिन माह बिदारिअनु ॥ तिसु साहब की टेक नानक मनै माह ॥ जिसु सिमरत सुखु होइ सगले दूख जाह ॥


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates