रामकली की वार (बलवंडि सतै), Ramkali ki vaar (Balwand Satte) Path in Hindi Gurbani online


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रामकली की वार
राइ बलवंडि तथा सतै डूमि आखी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

नाउ करता कादरु करे किउ बोलु होवै जोखीवदै ॥ दे गुना सति भैण भराव है पारंगति दानु पड़ीवदै ॥ नानकि राजु चलाइआ सचु कोटु सताणी नीव दै ॥ लहणे धरिओनु छतु सिरि करि सिफती अम्रितु पीवदै ॥ मति गुर आतम देव दी खड़गि जोरि पराकुइ जीअ दै ॥ गुरि चेले रहरासि कीई नानकि सलामति थीवदै ॥ सहि टिका दितोसु जीवदै ॥१॥

लहणे दी फेराईऐ नानका दोही खटीऐ ॥ जोति ओहा जुगति साइ सहि काइआ फेरि पलटीऐ ॥ झुलै सु छतु निरंजनी मलि तखतु बैठा गुर हटीऐ ॥ करहि जि गुर फुरमाइआ सिल जोगु अलूणी चटीऐ ॥ लंगरु चलै गुर सबदि हरि तोटि न आवी खटीऐ ॥ खरचे दिति खसम दी आप खहदी खैरि दबटीऐ ॥ होवै सिफति खसम दी नूरु अरसहु कुरसहु झटीऐ ॥ तुधु डिठे सचे पातिसाह मलु जनम जनम दी कटीऐ ॥ सचु जि गुरि फुरमाइआ किउ एदू बोलहु हटीऐ ॥ पुत्री कउलु न पालिओ करि पीरहु कंन्ह मुरटीऐ ॥ दिलि खोटै आकी फिरन्हि बंन्हि भारु उचाइन्हि छटीऐ ॥ जिनि आखी सोई करे जिनि कीती तिनै थटीऐ ॥ कउणु हारे किनि उवटीऐ ॥२॥

जिनि कीती सो मंनणा को सालु जिवाहे साली ॥ धरम राइ है देवता लै गला करे दलाली ॥ सतिगुरु आखै सचा करे सा बात होवै दरहाली ॥ गुर अंगद दी दोही फिरी सचु करतै बंधि बहाली ॥ नानकु काइआ पलटु करि मलि तखतु बैठा सै डाली ॥ दरु सेवे उमति खड़ी मसकलै होइ जंगाली ॥ दरि दरवेसु खसम दै नाइ सचै बाणी लाली ॥ बलवंड खीवी नेक जन जिसु बहुती छाउ पत्राली ॥ लंगरि दउलति वंडीऐ रसु अम्रितु खीरि घिआली ॥ गुरसिखा के मुख उजले मनमुख थीए पराली ॥ पए कबूलु खसम नालि जां घाल मरदी घाली ॥ माता खीवी सहु सोइ जिनि गोइ उठाली ॥३॥

होरिंओ गंग वहाईऐ दुनिआई आखै कि किओनु ॥ नानक ईसरि जगनाथि उचहदी वैणु विरिकिओनु ॥ माधाणा परबतु करि नेत्रि बासकु सबदि रिड़किओनु ॥ चउदह रतन निकालिअनु करि आवा गउणु चिलकिओनु ॥ कुदरति अहि वेखालीअनु जिणि ऐवड पिड ठिणकिओनु ॥ लहणे धरिओनु छत्रु सिरि असमानि किआड़ा छिकिओनु ॥ जोति समाणी जोति माहि आपु आपै सेती मिकिओनु ॥ सिखां पुत्रां घोखि कै सभ उमति वेखहु जि किओनु ॥ जां सुधोसु तां लहणा टिकिओनु ॥४॥

फेरि वसाइआ फेरुआणि सतिगुरि खाडूरु ॥ जपु तपु संजमु नालि तुधु होरु मुचु गरूरु ॥ लबु विणाहे माणसा जिउ पाणी बूरु ॥ वर्हिऐ दरगह गुरू की कुदरती नूरु ॥ जितु सु हाथ न लभई तूं ओहु ठरूरु ॥ नउ निधि नामु निधानु है तुधु विचि भरपूरु ॥ निंदा तेरी जो करे सो वंञै चूरु ॥ नेड़ै दिसै मात लोक तुधु सुझै दूरु ॥ फेरि वसाइआ फेरुआणि सतिगुरि खाडूरु ॥५॥

सो टिका सो बैहणा सोई दीबाणु ॥ पियू दादे जेविहा पोता परवाणु ॥ जिनि बासकु नेत्रै घतिआ करि नेही ताणु ॥ जिनि समुंदु विरोलिआ करि मेरु मधाणु ॥ चउदह रतन निकालिअनु कीतोनु चानाणु ॥ घोड़ा कीतो सहज दा जतु कीओ पलाणु ॥ धणखु चड़ाइओ सत दा जस हंदा बाणु ॥ कलि विचि धू अंधारु सा चड़िआ रै भाणु ॥ सतहु खेतु जमाइओ सतहु छावाणु ॥ नित रसोई तेरीऐ घिउ मैदा खाणु ॥ चारे कुंडां सुझीओसु मन महि सबदु परवाणु ॥ आवा गउणु निवारिओ करि नदरि नीसाणु ॥ अउतरिआ अउतारु लै सो पुरखु सुजाणु ॥ झखड़ि वाउ न डोलई परबतु मेराणु ॥ जाणै बिरथा जीअ की जाणी हू जाणु ॥ किआ सालाही सचे पातिसाह जां तू सुघड़ु सुजाणु ॥ दानु जि सतिगुर भावसी सो सते दाणु ॥ नानक हंदा छत्रु सिरि उमति हैराणु ॥ सो टिका सो बैहणा सोई दीबाणु ॥ पियू दादे जेविहा पोत्रा परवाणु ॥६॥

धंनु धंनु रामदास गुरु जिनि सिरिआ तिनै सवारिआ ॥ पूरी होई करामाति आपि सिरजणहारै धारिआ ॥ सिखी अतै संगती पारब्रहमु करि नमसकारिआ ॥ अटलु अथाहु अतोलु तू तेरा अंतु न पारावारिआ ॥ जिन्ही तूं सेविआ भाउ करि से तुधु पारि उतारिआ ॥ लबु लोभु कामु क्रोधु मोहु मारि कढे तुधु सपरवारिआ ॥ धंनु सु तेरा थानु है सचु तेरा पैसकारिआ ॥ नानकु तू लहणा तूहै गुरु अमरु तू वीचारिआ ॥ गुरु डिठा तां मनु साधारिआ ॥७॥

चारे जागे चहु जुगी पंचाइणु आपे होआ ॥ आपीन्है आपु साजिओनु आपे ही थम्हि खलोआ ॥ आपे पटी कलम आपि आपि लिखणहारा होआ ॥ सभ उमति आवण जावणी आपे ही नवा निरोआ ॥ तखति बैठा अरजन गुरू सतिगुर का खिवै चंदोआ ॥ उगवणहु तै आथवणहु चहु चकी कीअनु लोआ ॥ जिन्ही गुरू न सेविओ मनमुखा पइआ मोआ ॥ दूणी चउणी करामाति सचे का सचा ढोआ ॥ चारे जागे चहु जुगी पंचाइणु आपे होआ ॥८॥१॥


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