राग तुखारी - बाणी शब्द, Raag Tukhari - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1107) तुखारी छंत महला १ बारह माहा
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तू सुणि किरत करमा पुरबि कमाइआ ॥ सिरि सिरि सुख सहमा देहि सु तू भला ॥ हरि रचना तेरी किआ गति मेरी हरि बिनु घड़ी न जीवा ॥ प्रिअ बाझु दुहेली कोइ न बेली गुरमुखि अम्रितु पीवां ॥ रचना राचि रहे निरंकारी प्रभ मनि करम सुकरमा ॥ नानक पंथु निहाले सा धन तू सुणि आतम रामा ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1107) बाबीहा प्रिउ बोले कोकिल बाणीआ ॥ सा धन सभि रस चोलै अंकि समाणीआ ॥ हरि अंकि समाणी जा प्रभ भाणी सा सोहागणि नारे ॥ नव घर थापि महल घरु ऊचउ निज घरि वासु मुरारे ॥ सभ तेरी तू मेरा प्रीतमु निसि बासुर रंगि रावै ॥ नानक प्रिउ प्रिउ चवै बबीहा कोकिल सबदि सुहावै ॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1107) तू सुणि हरि रस भिंने प्रीतम आपणे ॥ मनि तनि रवत रवंने घड़ी न बीसरै ॥ किउ घड़ी बिसारी हउ बलिहारी हउ जीवा गुण गाए ॥ ना कोई मेरा हउ किसु केरा हरि बिनु रहणु न जाए ॥ ओट गही हरि चरण निवासे भए पवित्र सरीरा ॥ नानक द्रिसटि दीरघ सुखु पावै गुर सबदी मनु धीरा ॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1107) बरसै अम्रित धार बूंद सुहावणी ॥ साजन मिले सहजि सुभाइ हरि सिउ प्रीति बणी ॥ हरि मंदरि आवै जा प्रभ भावै धन ऊभी गुण सारी ॥ घरि घरि कंतु रवै सोहागणि हउ किउ कंति विसारी ॥ उनवि घन छाए बरसु सुभाए मनि तनि प्रेमु सुखावै ॥ नानक वरसै अम्रित बाणी करि किरपा घरि आवै ॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1107) चेतु बसंतु भला भवर सुहावड़े ॥ बन फूले मंझ बारि मै पिरु घरि बाहुड़ै ॥ पिरु घरि नही आवै धन किउ सुखु पावै बिरहि बिरोध तनु छीजै ॥ कोकिल अ्मबि सुहावी बोलै किउ दुखु अंकि सहीजै ॥ भवरु भवंता फूली डाली किउ जीवा मरु माए ॥ नानक चेति सहजि सुखु पावै जे हरि वरु घरि धन पाए ॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1108) वैसाखु भला साखा वेस करे ॥ धन देखै हरि दुआरि आवहु दइआ करे ॥ घरि आउ पिआरे दुतर तारे तुधु बिनु अढु न मोलो ॥ कीमति कउण करे तुधु भावां देखि दिखावै ढोलो ॥ दूरि न जाना अंतरि माना हरि का महलु पछाना ॥ नानक वैसाखीं प्रभु पावै सुरति सबदि मनु माना ॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1108) माहु जेठु भला प्रीतमु किउ बिसरै ॥ थल तापहि सर भार सा धन बिनउ करै ॥ धन बिनउ करेदी गुण सारेदी गुण सारी प्रभ भावा ॥ साचै महलि रहै बैरागी आवण देहि त आवा ॥ निमाणी निताणी हरि बिनु किउ पावै सुख महली ॥ नानक जेठि जाणै तिसु जैसी करमि मिलै गुण गहिली ॥७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1108) आसाड़ु भला सूरजु गगनि तपै ॥ धरती दूख सहै सोखै अगनि भखै ॥ अगनि रसु सोखै मरीऐ धोखै भी सो किरतु न हारे ॥ रथु फिरै छाइआ धन ताकै टीडु लवै मंझि बारे ॥ अवगण बाधि चली दुखु आगै सुखु तिसु साचु समाले ॥ नानक जिस नो इहु मनु दीआ मरणु जीवणु प्रभ नाले ॥८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1108) सावणि सरस मना घण वरसहि रुति आए ॥ मै मनि तनि सहु भावै पिर परदेसि सिधाए ॥ पिरु घरि नही आवै मरीऐ हावै दामनि चमकि डराए ॥ सेज इकेली खरी दुहेली मरणु भइआ दुखु माए ॥ हरि बिनु नीद भूख कहु कैसी कापड़ु तनि न सुखावए ॥ नानक सा सोहागणि कंती पिर कै अंकि समावए ॥९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1108) भादउ भरमि भुली भरि जोबनि पछुताणी ॥ जल थल नीरि भरे बरस रुते रंगु माणी ॥ बरसै निसि काली किउ सुखु बाली दादर मोर लवंते ॥ प्रिउ प्रिउ चवै बबीहा बोले भुइअंगम फिरहि डसंते ॥ मछर डंग साइर भर सुभर बिनु हरि किउ सुखु पाईऐ ॥ नानक पूछि चलउ गुर अपुने जह प्रभु तह ही जाईऐ ॥१०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1108) असुनि आउ पिरा सा धन झूरि मुई ॥ ता मिलीऐ प्रभ मेले दूजै भाइ खुई ॥ झूठि विगुती ता पिर मुती कुकह काह सि फुले ॥ आगै घाम पिछै रुति जाडा देखि चलत मनु डोले ॥ दह दिसि साख हरी हरीआवल सहजि पकै सो मीठा ॥ नानक असुनि मिलहु पिआरे सतिगुर भए बसीठा ॥११॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1109) कतकि किरतु पइआ जो प्रभ भाइआ ॥ दीपकु सहजि बलै तति जलाइआ ॥ दीपक रस तेलो धन पिर मेलो धन ओमाहै सरसी ॥ अवगण मारी मरै न सीझै गुणि मारी ता मरसी ॥ नामु भगति दे निज घरि बैठे अजहु तिनाड़ी आसा ॥ नानक मिलहु कपट दर खोलहु एक घड़ी खटु मासा ॥१२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1109) मंघर माहु भला हरि गुण अंकि समावए ॥ गुणवंती गुण रवै मै पिरु निहचलु भावए ॥ निहचलु चतुरु सुजाणु बिधाता चंचलु जगतु सबाइआ ॥ गिआनु धिआनु गुण अंकि समाणे प्रभ भाणे ता भाइआ ॥ गीत नाद कवित कवे सुणि राम नामि दुखु भागै ॥ नानक सा धन नाह पिआरी अभ भगती पिर आगै ॥१३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1109) पोखि तुखारु पड़ै वणु त्रिणु रसु सोखै ॥ आवत की नाही मनि तनि वसहि मुखे ॥ मनि तनि रवि रहिआ जगजीवनु गुर सबदी रंगु माणी ॥ अंडज जेरज सेतज उतभुज घटि घटि जोति समाणी ॥ दरसनु देहु दइआपति दाते गति पावउ मति देहो ॥ नानक रंगि रवै रसि रसीआ हरि सिउ प्रीति सनेहो ॥१४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1109) माघि पुनीत भई तीरथु अंतरि जानिआ ॥ साजन सहजि मिले गुण गहि अंकि समानिआ ॥ प्रीतम गुण अंके सुणि प्रभ बंके तुधु भावा सरि नावा ॥ गंग जमुन तह बेणी संगम सात समुंद समावा ॥ पुंन दान पूजा परमेसुर जुगि जुगि एको जाता ॥ नानक माघि महा रसु हरि जपि अठसठि तीरथ नाता ॥१५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1109) फलगुनि मनि रहसी प्रेमु सुभाइआ ॥ अनदिनु रहसु भइआ आपु गवाइआ ॥ मन मोहु चुकाइआ जा तिसु भाइआ करि किरपा घरि आओ ॥ बहुते वेस करी पिर बाझहु महली लहा न थाओ ॥ हार डोर रस पाट पट्मबर पिरि लोड़ी सीगारी ॥ नानक मेलि लई गुरि अपणै घरि वरु पाइआ नारी ॥१६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1109) बे दस माह रुती थिती वार भले ॥ घड़ी मूरत पल साचे आए सहजि मिले ॥ प्रभ मिले पिआरे कारज सारे करता सभ बिधि जाणै ॥ जिनि सीगारी तिसहि पिआरी मेलु भइआ रंगु माणै ॥ घरि सेज सुहावी जा पिरि रावी गुरमुखि मसतकि भागो ॥ नानक अहिनिसि रावै प्रीतमु हरि वरु थिरु सोहागो ॥१७॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1110) तुखारी महला १ ॥
पहिलै पहरै नैण सलोनड़ीए रैणि अंधिआरी राम ॥ वखरु राखु मुईए आवै वारी राम ॥ वारी आवै कवणु जगावै सूती जम रसु चूसए ॥ रैणि अंधेरी किआ पति तेरी चोरु पड़ै घरु मूसए ॥ राखणहारा अगम अपारा सुणि बेनंती मेरीआ ॥ नानक मूरखु कबहि न चेतै किआ सूझै रैणि अंधेरीआ ॥१॥

दूजा पहरु भइआ जागु अचेती राम ॥ वखरु राखु मुईए खाजै खेती राम ॥ राखहु खेती हरि गुर हेती जागत चोरु न लागै ॥ जम मगि न जावहु ना दुखु पावहु जम का डरु भउ भागै ॥ रवि ससि दीपक गुरमति दुआरै मनि साचा मुखि धिआवए ॥ नानक मूरखु अजहु न चेतै किव दूजै सुखु पावए ॥२॥

तीजा पहरु भइआ नीद विआपी राम ॥ माइआ सुत दारा दूखि संतापी राम ॥ माइआ सुत दारा जगत पिआरा चोग चुगै नित फासै ॥ नामु धिआवै ता सुखु पावै गुरमति कालु न ग्रासै ॥ जमणु मरणु कालु नही छोडै विणु नावै संतापी ॥ नानक तीजै त्रिबिधि लोका माइआ मोहि विआपी ॥३॥

चउथा पहरु भइआ दउतु बिहागै राम ॥ तिन घरु राखिअड़ा जो अनदिनु जागै राम ॥ गुर पूछि जागे नामि लागे तिना रैणि सुहेलीआ ॥ गुर सबदु कमावहि जनमि न आवहि तिना हरि प्रभु बेलीआ ॥ कर क्मपि चरण सरीरु क्मपै नैण अंधुले तनु भसम से ॥ नानक दुखीआ जुग चारे बिनु नाम हरि के मनि वसे ॥४॥

खूली गंठि उठो लिखिआ आइआ राम ॥ रस कस सुख ठाके बंधि चलाइआ राम ॥ बंधि चलाइआ जा प्रभ भाइआ ना दीसै ना सुणीऐ ॥ आपण वारी सभसै आवै पकी खेती लुणीऐ ॥ घड़ी चसे का लेखा लीजै बुरा भला सहु जीआ ॥ नानक सुरि नर सबदि मिलाए तिनि प्रभि कारणु कीआ ॥५॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1110) तुखारी महला १ ॥
तारा चड़िआ लमा किउ नदरि निहालिआ राम ॥ सेवक पूर करमा सतिगुरि सबदि दिखालिआ राम ॥ गुर सबदि दिखालिआ सचु समालिआ अहिनिसि देखि बीचारिआ ॥ धावत पंच रहे घरु जाणिआ कामु क्रोधु बिखु मारिआ ॥ अंतरि जोति भई गुर साखी चीने राम करमा ॥ नानक हउमै मारि पतीणे तारा चड़िआ लमा ॥१॥

गुरमुखि जागि रहे चूकी अभिमानी राम ॥ अनदिनु भोरु भइआ साचि समानी राम ॥ साचि समानी गुरमुखि मनि भानी गुरमुखि साबतु जागे ॥ साचु नामु अम्रितु गुरि दीआ हरि चरनी लिव लागे ॥ प्रगटी जोति जोति महि जाता मनमुखि भरमि भुलाणी ॥ नानक भोरु भइआ मनु मानिआ जागत रैणि विहाणी ॥२॥

अउगण वीसरिआ गुणी घरु कीआ राम ॥ एको रवि रहिआ अवरु न बीआ राम ॥ रवि रहिआ सोई अवरु न कोई मन ही ते मनु मानिआ ॥ जिनि जल थल त्रिभवण घटु घटु थापिआ सो प्रभु गुरमुखि जानिआ ॥ करण कारण समरथ अपारा त्रिबिधि मेटि समाई ॥ नानक अवगण गुणह समाणे ऐसी गुरमति पाई ॥३॥

आवण जाण रहे चूका भोला राम ॥ हउमै मारि मिले साचा चोला राम ॥ हउमै गुरि खोई परगटु होई चूके सोग संतापै ॥ जोती अंदरि जोति समाणी आपु पछाता आपै ॥ पेईअड़ै घरि सबदि पतीणी साहुरड़ै पिर भाणी ॥ नानक सतिगुरि मेलि मिलाई चूकी काणि लोकाणी ॥४॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1111) तुखारी महला १ ॥
भोलावड़ै भुली भुलि भुलि पछोताणी ॥ पिरि छोडिअड़ी सुती पिर की सार न जाणी ॥ पिरि छोडी सुती अवगणि मुती तिसु धन विधण राते ॥ कामि क्रोधि अहंकारि विगुती हउमै लगी ताते ॥ उडरि हंसु चलिआ फुरमाइआ भसमै भसम समाणी ॥ नानक सचे नाम विहूणी भुलि भुलि पछोताणी ॥१॥

सुणि नाह पिआरे इक बेनंती मेरी ॥ तू निज घरि वसिअड़ा हउ रुलि भसमै ढेरी ॥ बिनु अपने नाहै कोइ न चाहै किआ कहीऐ किआ कीजै ॥ अम्रित नामु रसन रसु रसना गुर सबदी रसु पीजै ॥ विणु नावै को संगि न साथी आवै जाइ घनेरी ॥ नानक लाहा लै घरि जाईऐ साची सचु मति तेरी ॥२॥

साजन देसि विदेसीअड़े सानेहड़े देदी ॥ सारि समाले तिन सजणा मुंध नैण भरेदी ॥ मुंध नैण भरेदी गुण सारेदी किउ प्रभ मिला पिआरे ॥ मारगु पंथु न जाणउ विखड़ा किउ पाईऐ पिरु पारे ॥ सतिगुर सबदी मिलै विछुंनी तनु मनु आगै राखै ॥ नानक अम्रित बिरखु महा रस फलिआ मिलि प्रीतम रसु चाखै ॥३॥

महलि बुलाइड़ीए बिलमु न कीजै ॥ अनदिनु रतड़ीए सहजि मिलीजै ॥ सुखि सहजि मिलीजै रोसु न कीजै गरबु निवारि समाणी ॥ साचै राती मिलै मिलाई मनमुखि आवण जाणी ॥ जब नाची तब घूघटु कैसा मटुकी फोड़ि निरारी ॥ नानक आपै आपु पछाणै गुरमुखि ततु बीचारी ॥४॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1112) तुखारी महला १ ॥
मेरे लाल रंगीले हम लालन के लाले ॥ गुरि अलखु लखाइआ अवरु न दूजा भाले ॥ गुरि अलखु लखाइआ जा तिसु भाइआ जा प्रभि किरपा धारी ॥ जगजीवनु दाता पुरखु बिधाता सहजि मिले बनवारी ॥ नदरि करहि तू तारहि तरीऐ सचु देवहु दीन दइआला ॥ प्रणवति नानक दासनि दासा तू सरब जीआ प्रतिपाला ॥१॥

भरिपुरि धारि रहे अति पिआरे ॥ सबदे रवि रहिआ गुर रूपि मुरारे ॥ गुर रूप मुरारे त्रिभवण धारे ता का अंतु न पाइआ ॥ रंगी जिनसी जंत उपाए नित देवै चड़ै सवाइआ ॥ अपर्मपरु आपे थापि उथापे तिसु भावै सो होवै ॥ नानक हीरा हीरै बेधिआ गुण कै हारि परोवै ॥२॥

गुण गुणहि समाणे मसतकि नाम नीसाणो ॥ सचु साचि समाइआ चूका आवण जाणो ॥ सचु साचि पछाता साचै राता साचु मिलै मनि भावै ॥ साचे ऊपरि अवरु न दीसै साचे साचि समावै ॥ मोहनि मोहि लीआ मनु मेरा बंधन खोलि निरारे ॥ नानक जोती जोति समाणी जा मिलिआ अति पिआरे ॥३॥

सच घरु खोजि लहे साचा गुर थानो ॥ मनमुखि नह पाईऐ गुरमुखि गिआनो ॥ देवै सचु दानो सो परवानो सद दाता वड दाणा ॥ अमरु अजोनी असथिरु जापै साचा महलु चिराणा ॥ दोति उचापति लेखु न लिखीऐ प्रगटी जोति मुरारी ॥ नानक साचा साचै राचा गुरमुखि तरीऐ तारी ॥४॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1112) तुखारी महला १ ॥
ए मन मेरिआ तू समझु अचेत इआणिआ राम ॥ ए मन मेरिआ छडि अवगण गुणी समाणिआ राम ॥ बहु साद लुभाणे किरत कमाणे विछुड़िआ नही मेला ॥ किउ दुतरु तरीऐ जम डरि मरीऐ जम का पंथु दुहेला ॥ मनि रामु नही जाता साझ प्रभाता अवघटि रुधा किआ करे ॥ बंधनि बाधिआ इन बिधि छूटै गुरमुखि सेवै नरहरे ॥१॥

ए मन मेरिआ तू छोडि आल जंजाला राम ॥ ए मन मेरिआ हरि सेवहु पुरखु निराला राम ॥ हरि सिमरि एकंकारु साचा सभु जगतु जिंनि उपाइआ ॥ पउणु पाणी अगनि बाधे गुरि खेलु जगति दिखाइआ ॥ आचारि तू वीचारि आपे हरि नामु संजम जप तपो ॥ सखा सैनु पिआरु प्रीतमु नामु हरि का जपु जपो ॥२॥

ए मन मेरिआ तू थिरु रहु चोट न खावही राम ॥ ए मन मेरिआ गुण गावहि सहजि समावही राम ॥ गुण गाइ राम रसाइ रसीअहि गुर गिआन अंजनु सारहे ॥ त्रै लोक दीपकु सबदि चानणु पंच दूत संघारहे ॥ भै काटि निरभउ तरहि दुतरु गुरि मिलिऐ कारज सारए ॥ रूपु रंगु पिआरु हरि सिउ हरि आपि किरपा धारए ॥३॥

ए मन मेरिआ तू किआ लै आइआ किआ लै जाइसी राम ॥ ए मन मेरिआ ता छुटसी जा भरमु चुकाइसी राम ॥ धनु संचि हरि हरि नाम वखरु गुर सबदि भाउ पछाणहे ॥ मैलु परहरि सबदि निरमलु महलु घरु सचु जाणहे ॥ पति नामु पावहि घरि सिधावहि झोलि अम्रित पी रसो ॥ हरि नामु धिआईऐ सबदि रसु पाईऐ वडभागि जपीऐ हरि जसो ॥४॥

ए मन मेरिआ बिनु पउड़ीआ मंदरि किउ चड़ै राम ॥ ए मन मेरिआ बिनु बेड़ी पारि न अ्मबड़ै राम ॥ पारि साजनु अपारु प्रीतमु गुर सबद सुरति लंघावए ॥ मिलि साधसंगति करहि रलीआ फिरि न पछोतावए ॥ करि दइआ दानु दइआल साचा हरि नाम संगति पावओ ॥ नानकु पइअ्मपै सुणहु प्रीतम गुर सबदि मनु समझावओ ॥५॥६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1113) तुखारी छंत महला ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अंतरि पिरी पिआरु किउ पिर बिनु जीवीऐ राम ॥ जब लगु दरसु न होइ किउ अम्रितु पीवीऐ राम ॥ किउ अम्रितु पीवीऐ हरि बिनु जीवीऐ तिसु बिनु रहनु न जाए ॥ अनदिनु प्रिउ प्रिउ करे दिनु राती पिर बिनु पिआस न जाए ॥ अपणी क्रिपा करहु हरि पिआरे हरि हरि नामु सद सारिआ ॥ गुर कै सबदि मिलिआ मै प्रीतमु हउ सतिगुर विटहु वारिआ ॥१॥

जब देखां पिरु पिआरा हरि गुण रसि रवा राम ॥ मेरै अंतरि होइ विगासु प्रिउ प्रिउ सचु नित चवा राम ॥ प्रिउ चवा पिआरे सबदि निसतारे बिनु देखे त्रिपति न आवए ॥ सबदि सीगारु होवै नित कामणि हरि हरि नामु धिआवए ॥ दइआ दानु मंगत जन दीजै मै प्रीतमु देहु मिलाए ॥ अनदिनु गुरु गोपालु धिआई हम सतिगुर विटहु घुमाए ॥२॥

हम पाथर गुरु नाव बिखु भवजलु तारीऐ राम ॥ गुर देवहु सबदु सुभाइ मै मूड़ निसतारीऐ राम ॥ हम मूड़ मुगध किछु मिति नही पाई तू अगमु वड जाणिआ ॥ तू आपि दइआलु दइआ करि मेलहि हम निरगुणी निमाणिआ ॥ अनेक जनम पाप करि भरमे हुणि तउ सरणागति आए ॥ दइआ करहु रखि लेवहु हरि जीउ हम लागह सतिगुर पाए ॥३॥

गुर पारस हम लोह मिलि कंचनु होइआ राम ॥ जोती जोति मिलाइ काइआ गड़ु सोहिआ राम ॥ काइआ गड़ु सोहिआ मेरै प्रभि मोहिआ किउ सासि गिरासि विसारीऐ ॥ अद्रिसटु अगोचरु पकड़िआ गुर सबदी हउ सतिगुर कै बलिहारीऐ ॥ सतिगुर आगै सीसु भेट देउ जे सतिगुर साचे भावै ॥ आपे दइआ करहु प्रभ दाते नानक अंकि समावै ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1114) तुखारी महला ४ ॥
हरि हरि अगम अगाधि अपर्मपर अपरपरा ॥ जो तुम धिआवहि जगदीस ते जन भउ बिखमु तरा ॥ बिखम भउ तिन तरिआ सुहेला जिन हरि हरि नामु धिआइआ ॥ गुर वाकि सतिगुर जो भाइ चले तिन हरि हरि आपि मिलाइआ ॥ जोती जोति मिलि जोति समाणी हरि क्रिपा करि धरणीधरा ॥ हरि हरि अगम अगाधि अपर्मपर अपरपरा ॥१॥

तुम सुआमी अगम अथाह तू घटि घटि पूरि रहिआ ॥ तू अलख अभेउ अगमु गुर सतिगुर बचनि लहिआ ॥ धनु धंनु ते जन पुरख पूरे जिन गुर संतसंगति मिलि गुण रवे ॥ बिबेक बुधि बीचारि गुरमुखि गुर सबदि खिनु खिनु हरि नित चवे ॥ जा बहहि गुरमुखि हरि नामु बोलहि जा खड़े गुरमुखि हरि हरि कहिआ ॥ तुम सुआमी अगम अथाह तू घटि घटि पूरि रहिआ ॥२॥

सेवक जन सेवहि ते परवाणु जिन सेविआ गुरमति हरे ॥ तिन के कोटि सभि पाप खिनु परहरि हरि दूरि करे ॥ तिन के पाप दोख सभि बिनसे जिन मनि चिति इकु अराधिआ ॥ तिन का जनमु सफलिओ सभु कीआ करतै जिन गुर बचनी सचु भाखिआ ॥ ते धंनु जन वड पुरख पूरे जो गुरमति हरि जपि भउ बिखमु तरे ॥ सेवक जन सेवहि ते परवाणु जिन सेविआ गुरमति हरे ॥३॥

तू अंतरजामी हरि आपि जिउ तू चलावहि पिआरे हउ तिवै चला ॥ हमरै हाथि किछु नाहि जा तू मेलहि ता हउ आइ मिला ॥ जिन कउ तू हरि मेलहि सुआमी सभु तिन का लेखा छुटकि गइआ ॥ तिन की गणत न करिअहु को भाई जो गुर बचनी हरि मेलि लइआ ॥ नानक दइआलु होआ तिन ऊपरि जिन गुर का भाणा मंनिआ भला ॥ तू अंतरजामी हरि आपि जिउ तू चलावहि पिआरे हउ तिवै चला ॥४॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1115) तुखारी महला ४ ॥
तू जगजीवनु जगदीसु सभ करता स्रिसटि नाथु ॥ तिन तू धिआइआ मेरा रामु जिन कै धुरि लेखु माथु ॥ जिन कउ धुरि हरि लिखिआ सुआमी तिन हरि हरि नामु अराधिआ ॥ तिन के पाप इक निमख सभि लाथे जिन गुर बचनी हरि जापिआ ॥ धनु धंनु ते जन जिन हरि नामु जपिआ तिन देखे हउ भइआ सनाथु ॥ तू जगजीवनु जगदीसु सभ करता स्रिसटि नाथु ॥१॥

तू जलि थलि महीअलि भरपूरि सभ ऊपरि साचु धणी ॥ जिन जपिआ हरि मनि चीति हरि जपि जपि मुकतु घणी ॥ जिन जपिआ हरि ते मुकत प्राणी तिन के ऊजल मुख हरि दुआरि ॥ ओइ हलति पलति जन भए सुहेले हरि राखि लीए रखनहारि ॥ हरि संतसंगति जन सुणहु भाई गुरमुखि हरि सेवा सफल बणी ॥ तू जलि थलि महीअलि भरपूरि सभ ऊपरि साचु धणी ॥२॥

तू थान थनंतरि हरि एकु हरि एको एकु रविआ ॥ वणि त्रिणि त्रिभवणि सभ स्रिसटि मुखि हरि हरि नामु चविआ ॥ सभि चवहि हरि हरि नामु करते असंख अगणत हरि धिआवए ॥ सो धंनु धनु हरि संतु साधू जो हरि प्रभ करते भावए ॥ सो सफलु दरसनु देहु करते जिसु हरि हिरदै नामु सद चविआ ॥ तू थान थनंतरि हरि एकु हरि एको एकु रविआ ॥३॥

तेरी भगति भंडार असंख जिसु तू देवहि मेरे सुआमी तिसु मिलहि ॥ जिस कै मसतकि गुर हाथु तिसु हिरदै हरि गुण टिकहि ॥ हरि गुण हिरदै टिकहि तिस कै जिसु अंतरि भउ भावनी होई ॥ बिनु भै किनै न प्रेमु पाइआ बिनु भै पारि न उतरिआ कोई ॥ भउ भाउ प्रीति नानक तिसहि लागै जिसु तू आपणी किरपा करहि ॥ तेरी भगति भंडार असंख जिसु तू देवहि मेरे सुआमी तिसु मिलहि ॥४॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1116) तुखारी महला ४ ॥
नावणु पुरबु अभीचु गुर सतिगुर दरसु भइआ ॥ दुरमति मैलु हरी अगिआनु अंधेरु गइआ ॥ गुर दरसु पाइआ अगिआनु गवाइआ अंतरि जोति प्रगासी ॥ जनम मरण दुख खिन महि बिनसे हरि पाइआ प्रभु अबिनासी ॥ हरि आपि करतै पुरबु कीआ सतिगुरू कुलखेति नावणि गइआ ॥ नावणु पुरबु अभीचु गुर सतिगुर दरसु भइआ ॥१॥

मारगि पंथि चले गुर सतिगुर संगि सिखा ॥ अनदिनु भगति बणी खिनु खिनु निमख विखा ॥ हरि हरि भगति बणी प्रभ केरी सभु लोकु वेखणि आइआ ॥ जिन दरसु सतिगुर गुरू कीआ तिन आपि हरि मेलाइआ ॥ तीरथ उदमु सतिगुरू कीआ सभ लोक उधरण अरथा ॥ मारगि पंथि चले गुर सतिगुर संगि सिखा ॥२॥

प्रथम आए कुलखेति गुर सतिगुर पुरबु होआ ॥ खबरि भई संसारि आए त्रै लोआ ॥ देखणि आए तीनि लोक सुरि नर मुनि जन सभि आइआ ॥ जिन परसिआ गुरु सतिगुरू पूरा तिन के किलविख नास गवाइआ ॥ जोगी दिग्मबर संनिआसी खटु दरसन करि गए गोसटि ढोआ ॥ प्रथम आए कुलखेति गुर सतिगुर पुरबु होआ ॥३॥

दुतीआ जमुन गए गुरि हरि हरि जपनु कीआ ॥ जागाती मिले दे भेट गुर पिछै लंघाइ दीआ ॥ सभ छुटी सतिगुरू पिछै जिनि हरि हरि नामु धिआइआ ॥ गुर बचनि मारगि जो पंथि चाले तिन जमु जागाती नेड़ि न आइआ ॥ सभ गुरू गुरू जगतु बोलै गुर कै नाइ लइऐ सभि छुटकि गइआ ॥ दुतीआ जमुन गए गुरि हरि हरि जपनु कीआ ॥४॥

त्रितीआ आए सुरसरी तह कउतकु चलतु भइआ ॥ सभ मोही देखि दरसनु गुर संत किनै आढु न दामु लइआ ॥ आढु दामु किछु पइआ न बोलक जागातीआ मोहण मुंदणि पई ॥ भाई हम करह किआ किसु पासि मांगह सभ भागि सतिगुर पिछै पई ॥ जागातीआ उपाव सिआणप करि वीचारु डिठा भंनि बोलका सभि उठि गइआ ॥ त्रितीआ आए सुरसरी तह कउतकु चलतु भइआ ॥५॥

मिलि आए नगर महा जना गुर सतिगुर ओट गही ॥ गुरु सतिगुरु गुरु गोविदु पुछि सिम्रिति कीता सही ॥ सिम्रिति सासत्र सभनी सही कीता सुकि प्रहिलादि स्रीरामि करि गुर गोविदु धिआइआ ॥ देही नगरि कोटि पंच चोर वटवारे तिन का थाउ थेहु गवाइआ ॥ कीरतन पुराण नित पुंन होवहि गुर बचनि नानकि हरि भगति लही ॥ मिलि आए नगर महा जना गुर सतिगुर ओट गही ॥६॥४॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1117) तुखारी छंत महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
घोलि घुमाई लालना गुरि मनु दीना ॥ सुणि सबदु तुमारा मेरा मनु भीना ॥ इहु मनु भीना जिउ जल मीना लागा रंगु मुरारा ॥ कीमति कही न जाई ठाकुर तेरा महलु अपारा ॥ सगल गुणा के दाते सुआमी बिनउ सुनहु इक दीना ॥ देहु दरसु नानक बलिहारी जीअड़ा बलि बलि कीना ॥१॥

इहु तनु मनु तेरा सभि गुण तेरे ॥ खंनीऐ वंञा दरसन तेरे ॥ दरसन तेरे सुणि प्रभ मेरे निमख द्रिसटि पेखि जीवा ॥ अम्रित नामु सुनीजै तेरा किरपा करहि त पीवा ॥ आस पिआसी पिर कै ताई जिउ चात्रिकु बूंदेरे ॥ कहु नानक जीअड़ा बलिहारी देहु दरसु प्रभ मेरे ॥२॥

तू साचा साहिबु साहु अमिता ॥ तू प्रीतमु पिआरा प्रान हित चिता ॥ प्रान सुखदाता गुरमुखि जाता सगल रंग बनि आए ॥ सोई करमु कमावै प्राणी जेहा तू फुरमाए ॥ जा कउ क्रिपा करी जगदीसुरि तिनि साधसंगि मनु जिता ॥ कहु नानक जीअड़ा बलिहारी जीउ पिंडु तउ दिता ॥३॥

निरगुणु राखि लीआ संतन का सदका ॥ सतिगुरि ढाकि लीआ मोहि पापी पड़दा ॥ ढाकनहारे प्रभू हमारे जीअ प्रान सुखदाते ॥ अबिनासी अबिगत सुआमी पूरन पुरख बिधाते ॥ उसतति कहनु न जाइ तुमारी कउणु कहै तू कद का ॥ नानक दासु ता कै बलिहारी मिलै नामु हरि निमका ॥४॥१॥११॥


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