Pt 5 - राग सूही - बाणी शब्द, Part 5 - Raag Suhi - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 780) सूही महला ५ ॥
करि किरपा मेरे प्रीतम सुआमी नेत्र देखहि दरसु तेरा राम ॥ लाख जिहवा देहु मेरे पिआरे मुखु हरि आराधे मेरा राम ॥ हरि आराधे जम पंथु साधे दूखु न विआपै कोई ॥ जलि थलि महीअलि पूरन सुआमी जत देखा तत सोई ॥ भरम मोह बिकार नाठे प्रभु नेर हू ते नेरा ॥ नानक कउ प्रभ किरपा कीजै नेत्र देखहि दरसु तेरा ॥१॥

कोटि करन दीजहि प्रभ प्रीतम हरि गुण सुणीअहि अबिनासी राम ॥ सुणि सुणि इहु मनु निरमलु होवै कटीऐ काल की फासी राम ॥ कटीऐ जम फासी सिमरि अबिनासी सगल मंगल सुगिआना ॥ हरि हरि जपु जपीऐ दिनु राती लागै सहजि धिआना ॥ कलमल दुख जारे प्रभू चितारे मन की दुरमति नासी ॥ कहु नानक प्रभ किरपा कीजै हरि गुण सुणीअहि अविनासी ॥२॥

करोड़ि हसत तेरी टहल कमावहि चरण चलहि प्रभ मारगि राम ॥ भव सागर नाव हरि सेवा जो चड़ै तिसु तारगि राम ॥ भवजलु तरिआ हरि हरि सिमरिआ सगल मनोरथ पूरे ॥ महा बिकार गए सुख उपजे बाजे अनहद तूरे ॥ मन बांछत फल पाए सगले कुदरति कीम अपारगि ॥ कहु नानक प्रभ किरपा कीजै मनु सदा चलै तेरै मारगि ॥३॥

एहो वरु एहा वडिआई इहु धनु होइ वडभागा राम ॥ एहो रंगु एहो रस भोगा हरि चरणी मनु लागा राम ॥ मनु लागा चरणे प्रभ की सरणे करण कारण गोपाला ॥ सभु किछु तेरा तू प्रभु मेरा मेरे ठाकुर दीन दइआला ॥ मोहि निरगुण प्रीतम सुख सागर संतसंगि मनु जागा ॥ कहु नानक प्रभि किरपा कीन्ही चरण कमल मनु लागा ॥४॥३॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 781) सूही महला ५ ॥
हरि जपे हरि मंदरु साजिआ संत भगत गुण गावहि राम ॥ सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपना सगले पाप तजावहि राम ॥ हरि गुण गाइ परम पदु पाइआ प्रभ की ऊतम बाणी ॥ सहज कथा प्रभ की अति मीठी कथी अकथ कहाणी ॥ भला संजोगु मूरतु पलु साचा अबिचल नीव रखाई ॥ जन नानक प्रभ भए दइआला सरब कला बणि आई ॥१॥

आनंदा वजहि नित वाजे पारब्रहमु मनि वूठा राम ॥ गुरमुखे सचु करणी सारी बिनसे भ्रम भै झूठा राम ॥ अनहद बाणी गुरमुखि वखाणी जसु सुणि सुणि मनु तनु हरिआ ॥ सरब सुखा तिस ही बणि आए जो प्रभि अपना करिआ ॥ घर महि नव निधि भरे भंडारा राम नामि रंगु लागा ॥ नानक जन प्रभु कदे न विसरै पूरन जा के भागा ॥२॥

छाइआ प्रभि छत्रपति कीन्ही सगली तपति बिनासी राम ॥ दूख पाप का डेरा ढाठा कारजु आइआ रासी राम ॥ हरि प्रभि फुरमाइआ मिटी बलाइआ साचु धरमु पुंनु फलिआ ॥ सो प्रभु अपुना सदा धिआईऐ सोवत बैसत खलिआ ॥ गुण निधान सुख सागर सुआमी जलि थलि महीअलि सोई ॥ जन नानक प्रभ की सरणाई तिसु बिनु अवरु न कोई ॥३॥

मेरा घरु बनिआ बनु तालु बनिआ प्रभ परसे हरि राइआ राम ॥ मेरा मनु सोहिआ मीत साजन सरसे गुण मंगल हरि गाइआ राम ॥ गुण गाइ प्रभू धिआइ साचा सगल इछा पाईआ ॥ गुर चरण लागे सदा जागे मनि वजीआ वाधाईआ ॥ करी नदरि सुआमी सुखह गामी हलतु पलतु सवारिआ ॥ बिनवंति नानक नित नामु जपीऐ जीउ पिंडु जिनि धारिआ ॥४॥४॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 782) सूही महला ५ ॥
भै सागरो भै सागरु तरिआ हरि हरि नामु धिआए राम ॥ बोहिथड़ा हरि चरण अराधे मिलि सतिगुर पारि लघाए राम ॥ गुर सबदी तरीऐ बहुड़ि न मरीऐ चूकै आवण जाणा ॥ जो किछु करै सोई भल मानउ ता मनु सहजि समाणा ॥ दूख न भूख न रोगु न बिआपै सुख सागर सरणी पाए ॥ हरि सिमरि सिमरि नानक रंगि राता मन की चिंत मिटाए ॥१॥

संत जना हरि मंत्रु द्रिड़ाइआ हरि साजन वसगति कीने राम ॥ आपनड़ा मनु आगै धरिआ सरबसु ठाकुरि दीने राम ॥ करि अपुनी दासी मिटी उदासी हरि मंदरि थिति पाई ॥ अनद बिनोद सिमरहु प्रभु साचा विछुड़ि कबहू न जाई ॥ सा वडभागणि सदा सोहागणि राम नाम गुण चीन्हे ॥ कहु नानक रवहि रंगि राते प्रेम महा रसि भीने ॥२॥

अनद बिनोद भए नित सखीए मंगल सदा हमारै राम ॥ आपनड़ै प्रभि आपि सीगारी सोभावंती नारे राम ॥ सहज सुभाइ भए किरपाला गुण अवगण न बीचारिआ ॥ कंठि लगाइ लीए जन अपुने राम नाम उरि धारिआ ॥ मान मोह मद सगल बिआपी करि किरपा आपि निवारे ॥ कहु नानक भै सागरु तरिआ पूरन काज हमारे ॥३॥

गुण गोपाल गावहु नित सखीहो सगल मनोरथ पाए राम ॥ सफल जनमु होआ मिलि साधू एकंकारु धिआए राम ॥ जपि एक प्रभू अनेक रविआ सरब मंडलि छाइआ ॥ ब्रहमो पसारा ब्रहमु पसरिआ सभु ब्रहमु द्रिसटी आइआ ॥ जलि थलि महीअलि पूरि पूरन तिसु बिना नही जाए ॥ पेखि दरसनु नानक बिगसे आपि लए मिलाए ॥४॥५॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 783) सूही महला ५ ॥
अबिचल नगरु गोबिंद गुरू का नामु जपत सुखु पाइआ राम ॥ मन इछे सेई फल पाए करतै आपि वसाइआ राम ॥ करतै आपि वसाइआ सरब सुख पाइआ पुत भाई सिख बिगासे ॥ गुण गावहि पूरन परमेसुर कारजु आइआ रासे ॥ प्रभु आपि सुआमी आपे रखा आपि पिता आपि माइआ ॥ कहु नानक सतिगुर बलिहारी जिनि एहु थानु सुहाइआ ॥१॥

घर मंदर हटनाले सोहे जिसु विचि नामु निवासी राम ॥ संत भगत हरि नामु अराधहि कटीऐ जम की फासी राम ॥ काटी जम फासी प्रभि अबिनासी हरि हरि नामु धिआए ॥ सगल समग्री पूरन होई मन इछे फल पाए ॥ संत सजन सुखि माणहि रलीआ दूख दरद भ्रम नासी ॥ सबदि सवारे सतिगुरि पूरै नानक सद बलि जासी ॥२॥

दाति खसम की पूरी होई नित नित चड़ै सवाई राम ॥ पारब्रहमि खसमाना कीआ जिस दी वडी वडिआई राम ॥ आदि जुगादि भगतन का राखा सो प्रभु भइआ दइआला ॥ जीअ जंत सभि सुखी वसाए प्रभि आपे करि प्रतिपाला ॥ दह दिस पूरि रहिआ जसु सुआमी कीमति कहणु न जाई ॥ कहु नानक सतिगुर बलिहारी जिनि अबिचल नीव रखाई ॥३॥

गिआन धिआन पूरन परमेसुर हरि हरि कथा नित सुणीऐ राम ॥ अनहद चोज भगत भव भंजन अनहद वाजे धुनीऐ राम ॥ अनहद झुणकारे ततु बीचारे संत गोसटि नित होवै ॥ हरि नामु अराधहि मैलु सभ काटहि किलविख सगले खोवै ॥ तह जनम न मरणा आवण जाणा बहुड़ि न पाईऐ जोनीऐ ॥ नानक गुरु परमेसरु पाइआ जिसु प्रसादि इछ पुनीऐ ॥४॥६॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 783) सूही महला ५ ॥
संता के कारजि आपि खलोइआ हरि कमु करावणि आइआ राम ॥ धरति सुहावी तालु सुहावा विचि अम्रित जलु छाइआ राम ॥ अम्रित जलु छाइआ पूरन साजु कराइआ सगल मनोरथ पूरे ॥ जै जै कारु भइआ जग अंतरि लाथे सगल विसूरे ॥ पूरन पुरख अचुत अबिनासी जसु वेद पुराणी गाइआ ॥ अपना बिरदु रखिआ परमेसरि नानक नामु धिआइआ ॥१॥

नव निधि सिधि रिधि दीने करते तोटि न आवै काई राम ॥ खात खरचत बिलछत सुखु पाइआ करते की दाति सवाई राम ॥ दाति सवाई निखुटि न जाई अंतरजामी पाइआ ॥ कोटि बिघन सगले उठि नाठे दूखु न नेड़ै आइआ ॥ सांति सहज आनंद घनेरे बिनसी भूख सबाई ॥ नानक गुण गावहि सुआमी के अचरजु जिसु वडिआई राम ॥२॥

जिस का कारजु तिन ही कीआ माणसु किआ वेचारा राम ॥ भगत सोहनि हरि के गुण गावहि सदा करहि जैकारा राम ॥ गुण गाइ गोबिंद अनद उपजे साधसंगति संगि बनी ॥ जिनि उदमु कीआ ताल केरा तिस की उपमा किआ गनी ॥ अठसठि तीरथ पुंन किरिआ महा निरमल चारा ॥ पतित पावनु बिरदु सुआमी नानक सबद अधारा ॥३॥

गुण निधान मेरा प्रभु करता उसतति कउनु करीजै राम ॥ संता की बेनंती सुआमी नामु महा रसु दीजै राम ॥ नामु दीजै दानु कीजै बिसरु नाही इक खिनो ॥ गुण गोपाल उचरु रसना सदा गाईऐ अनदिनो ॥ जिसु प्रीति लागी नाम सेती मनु तनु अम्रित भीजै ॥ बिनवंति नानक इछ पुंनी पेखि दरसनु जीजै ॥४॥७॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 784) रागु सूही महला ५ छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मिठ बोलड़ा जी हरि सजणु सुआमी मोरा ॥ हउ समलि थकी जी ओहु कदे न बोलै कउरा ॥ कउड़ा बोलि न जानै पूरन भगवानै अउगणु को न चितारे ॥ पतित पावनु हरि बिरदु सदाए इकु तिलु नही भंनै घाले ॥ घट घट वासी सरब निवासी नेरै ही ते नेरा ॥ नानक दासु सदा सरणागति हरि अम्रित सजणु मेरा ॥१॥

हउ बिसमु भई जी हरि दरसनु देखि अपारा ॥ मेरा सुंदरु सुआमी जी हउ चरन कमल पग छारा ॥ प्रभ पेखत जीवा ठंढी थीवा तिसु जेवडु अवरु न कोई ॥ आदि अंति मधि प्रभु रविआ जलि थलि महीअलि सोई ॥ चरन कमल जपि सागरु तरिआ भवजल उतरे पारा ॥ नानक सरणि पूरन परमेसुर तेरा अंतु न पारावारा ॥२॥

हउ निमख न छोडा जी हरि प्रीतम प्रान अधारो ॥ गुरि सतिगुर कहिआ जी साचा अगम बीचारो ॥ मिलि साधू दीना ता नामु लीना जनम मरण दुख नाठे ॥ सहज सूख आनंद घनेरे हउमै बिनठी गाठे ॥ सभ कै मधि सभ हू ते बाहरि राग दोख ते निआरो ॥ नानक दास गोबिंद सरणाई हरि प्रीतमु मनहि सधारो ॥३॥

मै खोजत खोजत जी हरि निहचलु सु घरु पाइआ ॥ सभि अध्रुव डिठे जीउ ता चरन कमल चितु लाइआ ॥ प्रभु अबिनासी हउ तिस की दासी मरै न आवै जाए ॥ धरम अरथ काम सभि पूरन मनि चिंदी इछ पुजाए ॥ स्रुति सिम्रिति गुन गावहि करते सिध साधिक मुनि जन धिआइआ ॥ नानक सरनि क्रिपा निधि सुआमी वडभागी हरि हरि गाइआ ॥४॥१॥११॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 785) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
वार सूही की सलोका नालि महला ३ ॥
सलोकु मः ३ ॥
सूहै वेसि दोहागणी पर पिरु रावण जाइ ॥ पिरु छोडिआ घरि आपणै मोही दूजै भाइ ॥ मिठा करि कै खाइआ बहु सादहु वधिआ रोगु ॥ सुधु भतारु हरि छोडिआ फिरि लगा जाइ विजोगु ॥ गुरमुखि होवै सु पलटिआ हरि राती साजि सीगारि ॥ सहजि सचु पिरु राविआ हरि नामा उर धारि ॥ आगिआकारी सदा सोहागणि आपि मेली करतारि ॥ नानक पिरु पाइआ हरि साचा सदा सोहागणि नारि ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 785) मः ३ ॥
सूहवीए निमाणीए सो सहु सदा सम्हालि ॥ नानक जनमु सवारहि आपणा कुलु भी छुटी नालि ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 785) पउड़ी ॥
आपे तखतु रचाइओनु आकास पताला ॥ हुकमे धरती साजीअनु सची धरम साला ॥ आपि उपाइ खपाइदा सचे दीन दइआला ॥ सभना रिजकु स्मबाहिदा तेरा हुकमु निराला ॥ आपे आपि वरतदा आपे प्रतिपाला ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 785) सलोकु मः ३ ॥
सूहब ता सोहागणी जा मंनि लैहि सचु नाउ ॥ सतिगुरु अपणा मनाइ लै रूपु चड़ी ता अगला दूजा नाही थाउ ॥ ऐसा सीगारु बणाइ तू मैला कदे न होवई अहिनिसि लागै भाउ ॥ नानक सोहागणि का किआ चिहनु है अंदरि सचु मुखु उजला खसमै माहि समाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 785) मः ३ ॥
लोका वे हउ सूहवी सूहा वेसु करी ॥ वेसी सहु न पाईऐ करि करि वेस रही ॥ नानक तिनी सहु पाइआ जिनी गुर की सिख सुणी ॥ जो तिसु भावै सो थीऐ इन बिधि कंत मिली ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 786) पउड़ी ॥
हुकमी स्रिसटि साजीअनु बहु भिति संसारा ॥ तेरा हुकमु न जापी केतड़ा सचे अलख अपारा ॥ इकना नो तू मेलि लैहि गुर सबदि बीचारा ॥ सचि रते से निरमले हउमै तजि विकारा ॥ जिसु तू मेलहि सो तुधु मिलै सोई सचिआरा ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 786) सलोकु मः ३ ॥
सूहवीए सूहा सभु संसारु है जिन दुरमति दूजा भाउ ॥ खिन महि झूठु सभु बिनसि जाइ जिउ टिकै न बिरख की छाउ ॥ गुरमुखि लालो लालु है जिउ रंगि मजीठ सचड़ाउ ॥ उलटी सकति सिवै घरि आई मनि वसिआ हरि अम्रित नाउ ॥ नानक बलिहारी गुर आपणे जितु मिलिऐ हरि गुण गाउ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 786) मः ३ ॥
सूहा रंगु विकारु है कंतु न पाइआ जाइ ॥ इसु लहदे बिलम न होवई रंड बैठी दूजै भाइ ॥ मुंध इआणी दुमणी सूहै वेसि लोभाइ ॥ सबदि सचै रंगु लालु करि भै भाइ सीगारु बणाइ ॥ नानक सदा सोहागणी जि चलनि सतिगुर भाइ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 786) पउड़ी ॥
आपे आपि उपाइअनु आपि कीमति पाई ॥ तिस दा अंतु न जापई गुर सबदि बुझाई ॥ माइआ मोहु गुबारु है दूजै भरमाई ॥ मनमुख ठउर न पाइन्ही फिरि आवै जाई ॥ जो तिसु भावै सो थीऐ सभ चलै रजाई ॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 786) सलोकु मः ३ ॥
सूहै वेसि कामणि कुलखणी जो प्रभ छोडि पर पुरख धरे पिआरु ॥ ओसु सीलु न संजमु सदा झूठु बोलै मनमुखि करम खुआरु ॥ जिसु पूरबि होवै लिखिआ तिसु सतिगुरु मिलै भतारु ॥ सूहा वेसु सभु उतारि धरे गलि पहिरै खिमा सीगारु ॥ पेईऐ साहुरै बहु सोभा पाए तिसु पूज करे सभु सैसारु ॥ ओह रलाई किसै दी ना रलै जिसु रावे सिरजनहारु ॥ नानक गुरमुखि सदा सुहागणी जिसु अविनासी पुरखु भरतारु ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 786) मः १ ॥
सूहा रंगु सुपनै निसी बिनु तागे गलि हारु ॥ सचा रंगु मजीठ का गुरमुखि ब्रहम बीचारु ॥ नानक प्रेम महा रसी सभि बुरिआईआ छारु ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 786) पउड़ी ॥
इहु जगु आपि उपाइओनु करि चोज विडानु ॥ पंच धातु विचि पाईअनु मोहु झूठु गुमानु ॥ आवै जाइ भवाईऐ मनमुखु अगिआनु ॥ इकना आपि बुझाइओनु गुरमुखि हरि गिआनु ॥ भगति खजाना बखसिओनु हरि नामु निधानु ॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 786) सलोकु मः ३ ॥
सूहवीए सूहा वेसु छडि तू ता पिर लगी पिआरु ॥ सूहै वेसि पिरु किनै न पाइओ मनमुखि दझि मुई गावारि ॥ सतिगुरि मिलिऐ सूहा वेसु गइआ हउमै विचहु मारि ॥ मनु तनु रता लालु होआ रसना रती गुण सारि ॥ सदा सोहागणि सबदु मनि भै भाइ करे सीगारु ॥ नानक करमी महलु पाइआ पिरु राखिआ उर धारि ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 787) मः ३ ॥
मुंधे सूहा परहरहु लालु करहु सीगारु ॥ आवण जाणा वीसरै गुर सबदी वीचारु ॥ मुंध सुहावी सोहणी जिसु घरि सहजि भतारु ॥ नानक सा धन रावीऐ रावे रावणहारु ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 787) पउड़ी ॥
मोहु कूड़ु कुट्मबु है मनमुखु मुगधु रता ॥ हउमै मेरा करि मुए किछु साथि न लिता ॥ सिर उपरि जमकालु न सुझई दूजै भरमिता ॥ फिरि वेला हथि न आवई जमकालि वसि किता ॥ जेहा धुरि लिखि पाइओनु से करम कमिता ॥५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 787) सलोकु मः ३ ॥
सतीआ एहि न आखीअनि जो मड़िआ लगि जलंन्हि ॥ नानक सतीआ जाणीअन्हि जि बिरहे चोट मरंन्हि ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 787) मः ३ ॥
भी सो सतीआ जाणीअनि सील संतोखि रहंन्हि ॥ सेवनि साई आपणा नित उठि सम्हालंन्हि ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 787) मः ३ ॥
कंता नालि महेलीआ सेती अगि जलाहि ॥ जे जाणहि पिरु आपणा ता तनि दुख सहाहि ॥ नानक कंत न जाणनी से किउ अगि जलाहि ॥ भावै जीवउ कै मरउ दूरहु ही भजि जाहि ॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 787) पउड़ी ॥
तुधु दुखु सुखु नालि उपाइआ लेखु करतै लिखिआ ॥ नावै जेवड होर दाति नाही तिसु रूपु न रिखिआ ॥ नामु अखुटु निधानु है गुरमुखि मनि वसिआ ॥ करि किरपा नामु देवसी फिरि लेखु न लिखिआ ॥ सेवक भाइ से जन मिले जिन हरि जपु जपिआ ॥६॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 787) सलोकु मः २ ॥
जिनी चलणु जाणिआ से किउ करहि विथार ॥ चलण सार न जाणनी काज सवारणहार ॥१॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 787) मः २ ॥
राति कारणि धनु संचीऐ भलके चलणु होइ ॥ नानक नालि न चलई फिरि पछुतावा होइ ॥२॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 787) मः २ ॥
बधा चटी जो भरे ना गुणु ना उपकारु ॥ सेती खुसी सवारीऐ नानक कारजु सारु ॥३॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 787) मः २ ॥
मनहठि तरफ न जिपई जे बहुता घाले ॥ तरफ जिणै सत भाउ दे जन नानक सबदु वीचारे ॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 787) पउड़ी ॥
करतै कारणु जिनि कीआ सो जाणै सोई ॥ आपे स्रिसटि उपाईअनु आपे फुनि गोई ॥ जुग चारे सभ भवि थकी किनि कीमति होई ॥ सतिगुरि एकु विखालिआ मनि तनि सुखु होई ॥ गुरमुखि सदा सलाहीऐ करता करे सु होई ॥७॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 788) सलोक महला २ ॥
जिना भउ तिन्ह नाहि भउ मुचु भउ निभविआह ॥ नानक एहु पटंतरा तितु दीबाणि गइआह ॥१॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 788) मः २ ॥
तुरदे कउ तुरदा मिलै उडते कउ उडता ॥ जीवते कउ जीवता मिलै मूए कउ मूआ ॥ नानक सो सालाहीऐ जिनि कारणु कीआ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 788) पउड़ी ॥
सचु धिआइनि से सचे गुर सबदि वीचारी ॥ हउमै मारि मनु निरमला हरि नामु उरि धारी ॥ कोठे मंडप माड़ीआ लगि पए गावारी ॥ जिन्हि कीए तिसहि न जाणनी मनमुखि गुबारी ॥ जिसु बुझाइहि सो बुझसी सचिआ किआ जंत विचारी ॥८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 788) सलोक मः ३ ॥
कामणि तउ सीगारु करि जा पहिलां कंतु मनाइ ॥ मतु सेजै कंतु न आवई एवै बिरथा जाइ ॥ कामणि पिर मनु मानिआ तउ बणिआ सीगारु ॥ कीआ तउ परवाणु है जा सहु धरे पिआरु ॥ भउ सीगारु तबोल रसु भोजनु भाउ करेइ ॥ तनु मनु सउपे कंत कउ तउ नानक भोगु करेइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 788) मः ३ ॥
काजल फूल त्मबोल रसु ले धन कीआ सीगारु ॥ सेजै कंतु न आइओ एवै भइआ विकारु ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 788) मः ३ ॥
धन पिरु एहि न आखीअनि बहनि इकठे होइ ॥ एक जोति दुइ मूरती धन पिरु कहीऐ सोइ ॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 788) पउड़ी ॥
भै बिनु भगति न होवई नामि न लगै पिआरु ॥ सतिगुरि मिलिऐ भउ ऊपजै भै भाइ रंगु सवारि ॥ तनु मनु रता रंग सिउ हउमै त्रिसना मारि ॥ मनु तनु निरमलु अति सोहणा भेटिआ क्रिसन मुरारि ॥ भउ भाउ सभु तिस दा सो सचु वरतै संसारि ॥९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 788) सलोक मः १ ॥
वाहु खसम तू वाहु जिनि रचि रचना हम कीए ॥ सागर लहरि समुंद सर वेलि वरस वराहु ॥ आपि खड़ोवहि आपि करि आपीणै आपाहु ॥ गुरमुखि सेवा थाइ पवै उनमनि ततु कमाहु ॥ मसकति लहहु मजूरीआ मंगि मंगि खसम दराहु ॥ नानक पुर दर वेपरवाह तउ दरि ऊणा नाहि को सचा वेपरवाहु ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 788) महला १ ॥
उजल मोती सोहणे रतना नालि जुड़ंनि ॥ तिन जरु वैरी नानका जि बुढे थीइ मरंनि ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 789) पउड़ी ॥
हरि सालाही सदा सदा तनु मनु सउपि सरीरु ॥ गुर सबदी सचु पाइआ सचा गहिर ग्मभीरु ॥ मनि तनि हिरदै रवि रहिआ हरि हीरा हीरु ॥ जनम मरण का दुखु गइआ फिरि पवै न फीरु ॥ नानक नामु सलाहि तू हरि गुणी गहीरु ॥१०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 789) सलोक मः १ ॥
नानक इहु तनु जालि जिनि जलिऐ नामु विसारिआ ॥ पउदी जाइ परालि पिछै हथु न अ्मबड़ै तितु निवंधै तालि ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 789) मः १ ॥
नानक मन के कम फिटिआ गणत न आवही ॥ किती लहा सहम जा बखसे ता धका नही ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 789) पउड़ी ॥
सचा अमरु चलाइओनु करि सचु फुरमाणु ॥ सदा निहचलु रवि रहिआ सो पुरखु सुजाणु ॥ गुर परसादी सेवीऐ सचु सबदि नीसाणु ॥ पूरा थाटु बणाइआ रंगु गुरमति माणु ॥ अगम अगोचरु अलखु है गुरमुखि हरि जाणु ॥११॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 789) सलोक मः १ ॥
नानक बदरा माल का भीतरि धरिआ आणि ॥ खोटे खरे परखीअनि साहिब कै दीबाणि ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 789) मः १ ॥
नावण चले तीरथी मनि खोटै तनि चोर ॥ इकु भाउ लथी नातिआ दुइ भा चड़ीअसु होर ॥ बाहरि धोती तूमड़ी अंदरि विसु निकोर ॥ साध भले अणनातिआ चोर सि चोरा चोर ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 789) पउड़ी ॥
आपे हुकमु चलाइदा जगु धंधै लाइआ ॥ इकि आपे ही आपि लाइअनु गुर ते सुखु पाइआ ॥ दह दिस इहु मनु धावदा गुरि ठाकि रहाइआ ॥ नावै नो सभ लोचदी गुरमती पाइआ ॥ धुरि लिखिआ मेटि न सकीऐ जो हरि लिखि पाइआ ॥१२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 789) सलोक मः १ ॥
दुइ दीवे चउदह हटनाले ॥ जेते जीअ तेते वणजारे ॥ खुल्हे हट होआ वापारु ॥ जो पहुचै सो चलणहारु ॥ धरमु दलालु पाए नीसाणु ॥ नानक नामु लाहा परवाणु ॥ घरि आए वजी वाधाई ॥ सच नाम की मिली वडिआई ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 789) मः १ ॥
राती होवनि कालीआ सुपेदा से वंन ॥ दिहु बगा तपै घणा कालिआ काले वंन ॥ अंधे अकली बाहरे मूरख अंध गिआनु ॥ नानक नदरी बाहरे कबहि न पावहि मानु ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 789) पउड़ी ॥
काइआ कोटु रचाइआ हरि सचै आपे ॥ इकि दूजै भाइ खुआइअनु हउमै विचि विआपे ॥ इहु मानस जनमु दुल्मभु सा मनमुख संतापे ॥ जिसु आपि बुझाए सो बुझसी जिसु सतिगुरु थापे ॥ सभु जगु खेलु रचाइओनु सभ वरतै आपे ॥१३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 790) सलोक मः १ ॥
चोरा जारा रंडीआ कुटणीआ दीबाणु ॥ वेदीना की दोसती वेदीना का खाणु ॥ सिफती सार न जाणनी सदा वसै सैतानु ॥ गदहु चंदनि खउलीऐ भी साहू सिउ पाणु ॥ नानक कूड़ै कतिऐ कूड़ा तणीऐ ताणु ॥ कूड़ा कपड़ु कछीऐ कूड़ा पैनणु माणु ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 790) मः १ ॥
बांगा बुरगू सिंङीआ नाले मिली कलाण ॥ इकि दाते इकि मंगते नामु तेरा परवाणु ॥ नानक जिन्ही सुणि कै मंनिआ हउ तिना विटहु कुरबाणु ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 790) पउड़ी ॥
माइआ मोहु सभु कूड़ु है कूड़ो होइ गइआ ॥ हउमै झगड़ा पाइओनु झगड़ै जगु मुइआ ॥ गुरमुखि झगड़ु चुकाइओनु इको रवि रहिआ ॥ सभु आतम रामु पछाणिआ भउजलु तरि गइआ ॥ जोति समाणी जोति विचि हरि नामि समइआ ॥१४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 790) सलोक मः १ ॥
सतिगुर भीखिआ देहि मै तूं सम्रथु दातारु ॥ हउमै गरबु निवारीऐ कामु क्रोधु अहंकारु ॥ लबु लोभु परजालीऐ नामु मिलै आधारु ॥ अहिनिसि नवतन निरमला मैला कबहूं न होइ ॥ नानक इह बिधि छुटीऐ नदरि तेरी सुखु होइ ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 790) मः १ ॥
इको कंतु सबाईआ जिती दरि खड़ीआह ॥ नानक कंतै रतीआ पुछहि बातड़ीआह ॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 790) मः १ ॥
सभे कंतै रतीआ मै दोहागणि कितु ॥ मै तनि अवगण एतड़े खसमु न फेरे चितु ॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 790) मः १ ॥
हउ बलिहारी तिन कउ सिफति जिना दै वाति ॥ सभि राती सोहागणी इक मै दोहागणि राति ॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 790) पउड़ी ॥
दरि मंगतु जाचै दानु हरि दीजै क्रिपा करि ॥ गुरमुखि लेहु मिलाइ जनु पावै नामु हरि ॥ अनहद सबदु वजाइ जोती जोति धरि ॥ हिरदै हरि गुण गाइ जै जै सबदु हरि ॥ जग महि वरतै आपि हरि सेती प्रीति करि ॥१५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 790) सलोक मः १ ॥
जिनी न पाइओ प्रेम रसु कंत न पाइओ साउ ॥ सुंञे घर का पाहुणा जिउ आइआ तिउ जाउ ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 790) मः १ ॥
सउ ओलाम्हे दिनै के राती मिलन्हि सहंस ॥ सिफति सलाहणु छडि कै करंगी लगा हंसु ॥ फिटु इवेहा जीविआ जितु खाइ वधाइआ पेटु ॥ नानक सचे नाम विणु सभो दुसमनु हेतु ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 790) पउड़ी ॥
ढाढी गुण गावै नित जनमु सवारिआ ॥ गुरमुखि सेवि सलाहि सचा उर धारिआ ॥ घरु दरु पावै महलु नामु पिआरिआ ॥ गुरमुखि पाइआ नामु हउ गुर कउ वारिआ ॥ तू आपि सवारहि आपि सिरजनहारिआ ॥१६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 791) सलोक मः १ ॥
दीवा बलै अंधेरा जाइ ॥ बेद पाठ मति पापा खाइ ॥ उगवै सूरु न जापै चंदु ॥ जह गिआन प्रगासु अगिआनु मिटंतु ॥ बेद पाठ संसार की कार ॥ पड़्हि पड़्हि पंडित करहि बीचार ॥ बिनु बूझे सभ होइ खुआर ॥ नानक गुरमुखि उतरसि पारि ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 791) मः १ ॥
सबदै सादु न आइओ नामि न लगो पिआरु ॥ रसना फिका बोलणा नित नित होइ खुआरु ॥ नानक पइऐ किरति कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 791) पउड़ी ॥
जि प्रभु सालाहे आपणा सो सोभा पाए ॥ हउमै विचहु दूरि करि सचु मंनि वसाए ॥ सचु बाणी गुण उचरै सचा सुखु पाए ॥ मेलु भइआ चिरी विछुंनिआ गुर पुरखि मिलाए ॥ मनु मैला इव सुधु है हरि नामु धिआए ॥१७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 791) सलोक मः १ ॥
काइआ कूमल फुल गुण नानक गुपसि माल ॥ एनी फुली रउ करे अवर कि चुणीअहि डाल ॥१॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 791) महला २ ॥
नानक तिना बसंतु है जिन्ह घरि वसिआ कंतु ॥ जिन के कंत दिसापुरी से अहिनिसि फिरहि जलंत ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 791) पउड़ी ॥
आपे बखसे दइआ करि गुर सतिगुर बचनी ॥ अनदिनु सेवी गुण रवा मनु सचै रचनी ॥ प्रभु मेरा बेअंतु है अंतु किनै न लखनी ॥ सतिगुर चरणी लगिआ हरि नामु नित जपनी ॥ जो इछै सो फलु पाइसी सभि घरै विचि जचनी ॥१८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 791) सलोक मः १ ॥
पहिल बसंतै आगमनि पहिला मउलिओ सोइ ॥ जितु मउलिऐ सभ मउलीऐ तिसहि न मउलिहु कोइ ॥१॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 791) मः २ ॥
पहिल बसंतै आगमनि तिस का करहु बीचारु ॥ नानक सो सालाहीऐ जि सभसै दे आधारु ॥२॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 791) मः २ ॥
मिलिऐ मिलिआ ना मिलै मिलै मिलिआ जे होइ ॥ अंतर आतमै जो मिलै मिलिआ कहीऐ सोइ ॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 791) पउड़ी ॥
हरि हरि नामु सलाहीऐ सचु कार कमावै ॥ दूजी कारै लगिआ फिरि जोनी पावै ॥ नामि रतिआ नामु पाईऐ नामे गुण गावै ॥ गुर कै सबदि सलाहीऐ हरि नामि समावै ॥ सतिगुर सेवा सफल है सेविऐ फल पावै ॥१९॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 791) सलोक मः २ ॥
किस ही कोई कोइ मंञु निमाणी इकु तू ॥ किउ न मरीजै रोइ जा लगु चिति न आवही ॥१॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 792) मः २ ॥
जां सुखु ता सहु राविओ दुखि भी सम्हालिओइ ॥ नानकु कहै सिआणीए इउ कंत मिलावा होइ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 792) पउड़ी ॥
हउ किआ सालाही किरम जंतु वडी तेरी वडिआई ॥ तू अगम दइआलु अगमु है आपि लैहि मिलाई ॥ मै तुझ बिनु बेली को नही तू अंति सखाई ॥ जो तेरी सरणागती तिन लैहि छडाई ॥ नानक वेपरवाहु है तिसु तिलु न तमाई ॥२०॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 792) रागु सूही बाणी स्री कबीर जीउ तथा सभना भगता की ॥ कबीर के
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अवतरि आइ कहा तुम कीना ॥ राम को नामु न कबहू लीना ॥१॥

राम न जपहु कवन मति लागे ॥ मरि जइबे कउ किआ करहु अभागे ॥१॥ रहाउ ॥

दुख सुख करि कै कुट्मबु जीवाइआ ॥ मरती बार इकसर दुखु पाइआ ॥२॥

कंठ गहन तब करन पुकारा ॥ कहि कबीर आगे ते न सम्हारा ॥३॥१॥


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