राग सूही - बाणी शब्द, Raag Suhi - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू नानक देव जी -- SGGS 728) ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
रागु सूही महला १ चउपदे घरु १
भांडा धोइ बैसि धूपु देवहु तउ दूधै कउ जावहु ॥ दूधु करम फुनि सुरति समाइणु होइ निरास जमावहु ॥१॥

जपहु त एको नामा ॥ अवरि निराफल कामा ॥१॥ रहाउ ॥

इहु मनु ईटी हाथि करहु फुनि नेत्रउ नीद न आवै ॥ रसना नामु जपहु तब मथीऐ इन बिधि अम्रितु पावहु ॥२॥

मनु स्मपटु जितु सत सरि नावणु भावन पाती त्रिपति करे ॥ पूजा प्राण सेवकु जे सेवे इन्ह बिधि साहिबु रवतु रहै ॥३॥

कहदे कहहि कहे कहि जावहि तुम सरि अवरु न कोई ॥ भगति हीणु नानकु जनु ज्मपै हउ सालाही सचा सोई ॥४॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 728) सूही महला १ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अंतरि वसै न बाहरि जाइ ॥ अम्रितु छोडि काहे बिखु खाइ ॥१॥

ऐसा गिआनु जपहु मन मेरे ॥ होवहु चाकर साचे केरे ॥१॥ रहाउ ॥

गिआनु धिआनु सभु कोई रवै ॥ बांधनि बांधिआ सभु जगु भवै ॥२॥

सेवा करे सु चाकरु होइ ॥ जलि थलि महीअलि रवि रहिआ सोइ ॥३॥

हम नही चंगे बुरा नही कोइ ॥ प्रणवति नानकु तारे सोइ ॥४॥१॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 729) सूही महला १ घरु ६
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उजलु कैहा चिलकणा घोटिम कालड़ी मसु ॥ धोतिआ जूठि न उतरै जे सउ धोवा तिसु ॥१॥

सजण सेई नालि मै चलदिआ नालि चलंन्हि ॥ जिथै लेखा मंगीऐ तिथै खड़े दिसंनि ॥१॥ रहाउ ॥

कोठे मंडप माड़ीआ पासहु चितवीआहा ॥ ढठीआ कमि न आवन्ही विचहु सखणीआहा ॥२॥

बगा बगे कपड़े तीरथ मंझि वसंन्हि ॥ घुटि घुटि जीआ खावणे बगे ना कहीअन्हि ॥३॥

सिमल रुखु सरीरु मै मैजन देखि भुलंन्हि ॥ से फल कमि न आवन्ही ते गुण मै तनि हंन्हि ॥४॥

अंधुलै भारु उठाइआ डूगर वाट बहुतु ॥ अखी लोड़ी ना लहा हउ चड़ि लंघा कितु ॥५॥

चाकरीआ चंगिआईआ अवर सिआणप कितु ॥ नानक नामु समालि तूं बधा छुटहि जितु ॥६॥१॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 729) सूही महला १ ॥
जप तप का बंधु बेड़ुला जितु लंघहि वहेला ॥ ना सरवरु ना ऊछलै ऐसा पंथु सुहेला ॥१॥

तेरा एको नामु मंजीठड़ा रता मेरा चोला सद रंग ढोला ॥१॥ रहाउ ॥

साजन चले पिआरिआ किउ मेला होई ॥ जे गुण होवहि गंठड़ीऐ मेलेगा सोई ॥२॥

मिलिआ होइ न वीछुड़ै जे मिलिआ होई ॥ आवा गउणु निवारिआ है साचा सोई ॥३॥

हउमै मारि निवारिआ सीता है चोला ॥ गुर बचनी फलु पाइआ सह के अम्रित बोला ॥४॥

नानकु कहै सहेलीहो सहु खरा पिआरा ॥ हम सह केरीआ दासीआ साचा खसमु हमारा ॥५॥२॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 729) सूही महला १ ॥
जिन कउ भांडै भाउ तिना सवारसी ॥ सूखी करै पसाउ दूख विसारसी ॥ सहसा मूले नाहि सरपर तारसी ॥१॥

तिन्हा मिलिआ गुरु आइ जिन कउ लीखिआ ॥ अम्रितु हरि का नाउ देवै दीखिआ ॥ चालहि सतिगुर भाइ भवहि न भीखिआ ॥२॥

जा कउ महलु हजूरि दूजे निवै किसु ॥ दरि दरवाणी नाहि मूले पुछ तिसु ॥ छुटै ता कै बोलि साहिब नदरि जिसु ॥३॥

घले आणे आपि जिसु नाही दूजा मतै कोइ ॥ ढाहि उसारे साजि जाणै सभ सोइ ॥ नाउ नानक बखसीस नदरी करमु होइ ॥४॥३॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 730) सूही महला १ ॥
भांडा हछा सोइ जो तिसु भावसी ॥ भांडा अति मलीणु धोता हछा न होइसी ॥ गुरू दुआरै होइ सोझी पाइसी ॥ एतु दुआरै धोइ हछा होइसी ॥ मैले हछे का वीचारु आपि वरताइसी ॥ मतु को जाणै जाइ अगै पाइसी ॥ जेहे करम कमाइ तेहा होइसी ॥ अम्रितु हरि का नाउ आपि वरताइसी ॥ चलिआ पति सिउ जनमु सवारि वाजा वाइसी ॥ माणसु किआ वेचारा तिहु लोक सुणाइसी ॥ नानक आपि निहाल सभि कुल तारसी ॥१॥४॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 730) सूही महला १ ॥
जोगी होवै जोगवै भोगी होवै खाइ ॥ तपीआ होवै तपु करे तीरथि मलि मलि नाइ ॥१॥

तेरा सदड़ा सुणीजै भाई जे को बहै अलाइ ॥१॥ रहाउ ॥

जैसा बीजै सो लुणे जो खटे सो खाइ ॥ अगै पुछ न होवई जे सणु नीसाणै जाइ ॥२॥

तैसो जैसा काढीऐ जैसी कार कमाइ ॥ जो दमु चिति न आवई सो दमु बिरथा जाइ ॥३॥

इहु तनु वेची बै करी जे को लए विकाइ ॥ नानक कमि न आवई जितु तनि नाही सचा नाउ ॥४॥५॥७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 730) सूही महला १ घरु ७
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जोगु न खिंथा जोगु न डंडै जोगु न भसम चड़ाईऐ ॥ जोगु न मुंदी मूंडि मुडाइऐ जोगु न सिंङी वाईऐ ॥ अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति इव पाईऐ ॥१॥

गली जोगु न होई ॥ एक द्रिसटि करि समसरि जाणै जोगी कहीऐ सोई ॥१॥ रहाउ ॥

जोगु न बाहरि मड़ी मसाणी जोगु न ताड़ी लाईऐ ॥ जोगु न देसि दिसंतरि भविऐ जोगु न तीरथि नाईऐ ॥ अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति इव पाईऐ ॥२॥

सतिगुरु भेटै ता सहसा तूटै धावतु वरजि रहाईऐ ॥ निझरु झरै सहज धुनि लागै घर ही परचा पाईऐ ॥ अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति इव पाईऐ ॥३॥

नानक जीवतिआ मरि रहीऐ ऐसा जोगु कमाईऐ ॥ वाजे बाझहु सिंङी वाजै तउ निरभउ पदु पाईऐ ॥ अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति तउ पाईऐ ॥४॥१॥८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 730) सूही महला १ ॥
कउण तराजी कवणु तुला तेरा कवणु सराफु बुलावा ॥ कउणु गुरू कै पहि दीखिआ लेवा कै पहि मुलु करावा ॥१॥

मेरे लाल जीउ तेरा अंतु न जाणा ॥ तूं जलि थलि महीअलि भरिपुरि लीणा तूं आपे सरब समाणा ॥१॥ रहाउ ॥

मनु ताराजी चितु तुला तेरी सेव सराफु कमावा ॥ घट ही भीतरि सो सहु तोली इन बिधि चितु रहावा ॥२॥

आपे कंडा तोलु तराजी आपे तोलणहारा ॥ आपे देखै आपे बूझै आपे है वणजारा ॥३॥

अंधुला नीच जाति परदेसी खिनु आवै तिलु जावै ॥ ता की संगति नानकु रहदा किउ करि मूड़ा पावै ॥४॥२॥९॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 731) रागु सूही महला ४ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मनि राम नामु आराधिआ गुर सबदि गुरू गुर के ॥ सभि इछा मनि तनि पूरीआ सभु चूका डरु जम के ॥१॥

मेरे मन गुण गावहु राम नाम हरि के ॥ गुरि तुठै मनु परबोधिआ हरि पीआ रसु गटके ॥१॥ रहाउ ॥

सतसंगति ऊतम सतिगुर केरी गुन गावै हरि प्रभ के ॥ हरि किरपा धारि मेलहु सतसंगति हम धोवह पग जन के ॥२॥

राम नामु सभु है राम नामा रसु गुरमति रसु रसके ॥ हरि अम्रितु हरि जलु पाइआ सभ लाथी तिस तिस के ॥३॥

हमरी जाति पाति गुरु सतिगुरु हम वेचिओ सिरु गुर के ॥ जन नानक नामु परिओ गुर चेला गुर राखहु लाज जन के ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 731) सूही महला ४ ॥
हरि हरि नामु भजिओ पुरखोतमु सभि बिनसे दालद दलघा ॥ भउ जनम मरणा मेटिओ गुर सबदी हरि असथिरु सेवि सुखि समघा ॥१॥

मेरे मन भजु राम नाम अति पिरघा ॥ मै मनु तनु अरपि धरिओ गुर आगै सिरु वेचि लीओ मुलि महघा ॥१॥ रहाउ ॥

नरपति राजे रंग रस माणहि बिनु नावै पकड़ि खड़े सभि कलघा ॥ धरम राइ सिरि डंडु लगाना फिरि पछुताने हथ फलघा ॥२॥

हरि राखु राखु जन किरम तुमारे सरणागति पुरख प्रतिपलघा ॥ दरसनु संत देहु सुखु पावै प्रभ लोच पूरि जनु तुमघा ॥३॥

तुम समरथ पुरख वडे प्रभ सुआमी मो कउ कीजै दानु हरि निमघा ॥ जन नानक नामु मिलै सुखु पावै हम नाम विटहु सद घुमघा ॥४॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 731) सूही महला ४ ॥
हरि नामा हरि रंङु है हरि रंङु मजीठै रंङु ॥ गुरि तुठै हरि रंगु चाड़िआ फिरि बहुड़ि न होवी भंङु ॥१॥

मेरे मन हरि राम नामि करि रंङु ॥ गुरि तुठै हरि उपदेसिआ हरि भेटिआ राउ निसंङु ॥१॥ रहाउ ॥

मुंध इआणी मनमुखी फिरि आवण जाणा अंङु ॥ हरि प्रभु चिति न आइओ मनि दूजा भाउ सहलंङु ॥२॥

हम मैलु भरे दुहचारीआ हरि राखहु अंगी अंङु ॥ गुरि अम्रित सरि नवलाइआ सभि लाथे किलविख पंङु ॥३॥

हरि दीना दीन दइआल प्रभु सतसंगति मेलहु संङु ॥ मिलि संगति हरि रंगु पाइआ जन नानक मनि तनि रंङु ॥४॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 732) सूही महला ४ ॥
हरि हरि करहि नित कपटु कमावहि हिरदा सुधु न होई ॥ अनदिनु करम करहि बहुतेरे सुपनै सुखु न होई ॥१॥

गिआनी गुर बिनु भगति न होई ॥ कोरै रंगु कदे न चड़ै जे लोचै सभु कोई ॥१॥ रहाउ ॥

जपु तप संजम वरत करे पूजा मनमुख रोगु न जाई ॥ अंतरि रोगु महा अभिमाना दूजै भाइ खुआई ॥२॥

बाहरि भेख बहुतु चतुराई मनूआ दह दिसि धावै ॥ हउमै बिआपिआ सबदु न चीन्है फिरि फिरि जूनी आवै ॥३॥

नानक नदरि करे सो बूझै सो जनु नामु धिआए ॥ गुर परसादी एको बूझै एकसु माहि समाए ॥४॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 732) सूही महला ४ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरमति नगरी खोजि खोजाई ॥ हरि हरि नामु पदारथु पाई ॥१॥

मेरै मनि हरि हरि सांति वसाई ॥ तिसना अगनि बुझी खिन अंतरि गुरि मिलिऐ सभ भुख गवाई ॥१॥ रहाउ ॥

हरि गुण गावा जीवा मेरी माई ॥ सतिगुरि दइआलि गुण नामु द्रिड़ाई ॥२॥

हउ हरि प्रभु पिआरा ढूढि ढूढाई ॥ सतसंगति मिलि हरि रसु पाई ॥३॥

धुरि मसतकि लेख लिखे हरि पाई ॥ गुरु नानकु तुठा मेलै हरि भाई ॥४॥१॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 732) सूही महला ४ ॥
हरि क्रिपा करे मनि हरि रंगु लाए ॥ गुरमुखि हरि हरि नामि समाए ॥१॥

हरि रंगि राता मनु रंग माणे ॥ सदा अनंदि रहै दिन राती पूरे गुर कै सबदि समाणे ॥१॥ रहाउ ॥

हरि रंग कउ लोचै सभु कोई ॥ गुरमुखि रंगु चलूला होई ॥२॥

मनमुखि मुगधु नरु कोरा होइ ॥ जे सउ लोचै रंगु न होवै कोइ ॥३॥

नदरि करे ता सतिगुरु पावै ॥ नानक हरि रसि हरि रंगि समावै ॥४॥२॥६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 733) सूही महला ४ ॥
जिहवा हरि रसि रही अघाइ ॥ गुरमुखि पीवै सहजि समाइ ॥१॥

हरि रसु जन चाखहु जे भाई ॥ तउ कत अनत सादि लोभाई ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमति रसु राखहु उर धारि ॥ हरि रसि राते रंगि मुरारि ॥२॥

मनमुखि हरि रसु चाखिआ न जाइ ॥ हउमै करै बहुती मिलै सजाइ ॥३॥

नदरि करे ता हरि रसु पावै ॥ नानक हरि रसि हरि गुण गावै ॥४॥३॥७॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 733) सूही महला ४ घरु ६
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नीच जाति हरि जपतिआ उतम पदवी पाइ ॥ पूछहु बिदर दासी सुतै किसनु उतरिआ घरि जिसु जाइ ॥१॥

हरि की अकथ कथा सुनहु जन भाई जितु सहसा दूख भूख सभ लहि जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

रविदासु चमारु उसतति करे हरि कीरति निमख इक गाइ ॥ पतित जाति उतमु भइआ चारि वरन पए पगि आइ ॥२॥

नामदेअ प्रीति लगी हरि सेती लोकु छीपा कहै बुलाइ ॥ खत्री ब्राहमण पिठि दे छोडे हरि नामदेउ लीआ मुखि लाइ ॥३॥

जितने भगत हरि सेवका मुखि अठसठि तीरथ तिन तिलकु कढाइ ॥ जनु नानकु तिन कउ अनदिनु परसे जे क्रिपा करे हरि राइ ॥४॥१॥८॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 733) सूही महला ४ ॥
तिन्ही अंतरि हरि आराधिआ जिन कउ धुरि लिखिआ लिखतु लिलारा ॥ तिन की बखीली कोई किआ करे जिन का अंगु करे मेरा हरि करतारा ॥१॥

हरि हरि धिआइ मन मेरे मन धिआइ हरि जनम जनम के सभि दूख निवारणहारा ॥१॥ रहाउ ॥

धुरि भगत जना कउ बखसिआ हरि अम्रित भगति भंडारा ॥ मूरखु होवै सु उन की रीस करे तिसु हलति पलति मुहु कारा ॥२॥

से भगत से सेवका जिना हरि नामु पिआरा ॥ तिन की सेवा ते हरि पाईऐ सिरि निंदक कै पवै छारा ॥३॥

जिसु घरि विरती सोई जाणै जगत गुर नानक पूछि करहु बीचारा ॥ चहु पीड़ी आदि जुगादि बखीली किनै न पाइओ हरि सेवक भाइ निसतारा ॥४॥२॥९॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 733) सूही महला ४ ॥
जिथै हरि आराधीऐ तिथै हरि मितु सहाई ॥ गुर किरपा ते हरि मनि वसै होरतु बिधि लइआ न जाई ॥१॥

हरि धनु संचीऐ भाई ॥ जि हलति पलति हरि होइ सखाई ॥१॥ रहाउ ॥

सतसंगती संगि हरि धनु खटीऐ होर थै होरतु उपाइ हरि धनु कितै न पाई ॥ हरि रतनै का वापारीआ हरि रतन धनु विहाझे कचै के वापारीए वाकि हरि धनु लइआ न जाई ॥२॥

हरि धनु रतनु जवेहरु माणकु हरि धनै नालि अम्रित वेलै वतै हरि भगती हरि लिव लाई ॥ हरि धनु अम्रित वेलै वतै का बीजिआ भगत खाइ खरचि रहे निखुटै नाही ॥ हलति पलति हरि धनै की भगता कउ मिली वडिआई ॥३॥

हरि धनु निरभउ सदा सदा असथिरु है साचा इहु हरि धनु अगनी तसकरै पाणीऐ जमदूतै किसै का गवाइआ न जाई ॥ हरि धन कउ उचका नेड़ि न आवई जमु जागाती डंडु न लगाई ॥४॥

साकती पाप करि कै बिखिआ धनु संचिआ तिना इक विख नालि न जाई ॥ हलतै विचि साकत दुहेले भए हथहु छुड़कि गइआ अगै पलति साकतु हरि दरगह ढोई न पाई ॥५॥

इसु हरि धन का साहु हरि आपि है संतहु जिस नो देइ सु हरि धनु लदि चलाई ॥ इसु हरि धनै का तोटा कदे न आवई जन नानक कउ गुरि सोझी पाई ॥६॥३॥१०॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 734) सूही महला ४ ॥
जिस नो हरि सुप्रसंनु होइ सो हरि गुणा रवै सो भगतु सो परवानु ॥ तिस की महिमा किआ वरनीऐ जिस कै हिरदै वसिआ हरि पुरखु भगवानु ॥१॥

गोविंद गुण गाईऐ जीउ लाइ सतिगुरू नालि धिआनु ॥१॥ रहाउ ॥

सो सतिगुरू सा सेवा सतिगुर की सफल है जिस ते पाईऐ परम निधानु ॥ जो दूजै भाइ साकत कामना अरथि दुरगंध सरेवदे सो निहफल सभु अगिआनु ॥२॥

जिस नो परतीति होवै तिस का गाविआ थाइ पवै सो पावै दरगह मानु ॥ जो बिनु परतीती कपटी कूड़ी कूड़ी अखी मीटदे उन का उतरि जाइगा झूठु गुमानु ॥३॥

जेता जीउ पिंडु सभु तेरा तूं अंतरजामी पुरखु भगवानु ॥ दासनि दासु कहै जनु नानकु जेहा तूं कराइहि तेहा हउ करी वखिआनु ॥४॥४॥११॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 735) सूही महला ४ घरु ७
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तेरे कवन कवन गुण कहि कहि गावा तू साहिब गुणी निधाना ॥ तुमरी महिमा बरनि न साकउ तूं ठाकुर ऊच भगवाना ॥१॥

मै हरि हरि नामु धर सोई ॥ जिउ भावै तिउ राखु मेरे साहिब मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥१॥ रहाउ ॥

मै ताणु दीबाणु तूहै मेरे सुआमी मै तुधु आगै अरदासि ॥ मै होरु थाउ नाही जिसु पहि करउ बेनंती मेरा दुखु सुखु तुझ ही पासि ॥२॥

विचे धरती विचे पाणी विचि कासट अगनि धरीजै ॥ बकरी सिंघु इकतै थाइ राखे मन हरि जपि भ्रमु भउ दूरि कीजै ॥३॥

हरि की वडिआई देखहु संतहु हरि निमाणिआ माणु देवाए ॥ जिउ धरती चरण तले ते ऊपरि आवै तिउ नानक साध जना जगतु आणि सभु पैरी पाए ॥४॥१॥१२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 735) सूही महला ४ ॥
तूं करता सभु किछु आपे जाणहि किआ तुधु पहि आखि सुणाईऐ ॥ बुरा भला तुधु सभु किछु सूझै जेहा को करे तेहा को पाईऐ ॥१॥

मेरे साहिब तूं अंतर की बिधि जाणहि ॥ बुरा भला तुधु सभु किछु सूझै तुधु भावै तिवै बुलावहि ॥१॥ रहाउ ॥

सभु मोहु माइआ सरीरु हरि कीआ विचि देही मानुख भगति कराई ॥ इकना सतिगुरु मेलि सुखु देवहि इकि मनमुखि धंधु पिटाई ॥२॥

सभु को तेरा तूं सभना का मेरे करते तुधु सभना सिरि लिखिआ लेखु ॥ जेही तूं नदरि करहि तेहा को होवै बिनु नदरी नाही को भेखु ॥३॥

तेरी वडिआई तूंहै जाणहि सभ तुधनो नित धिआए ॥ जिस नो तुधु भावै तिस नो तूं मेलहि जन नानक सो थाइ पाए ॥४॥२॥१३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 735) सूही महला ४ ॥
जिन कै अंतरि वसिआ मेरा हरि हरि तिन के सभि रोग गवाए ॥ ते मुकत भए जिन हरि नामु धिआइआ तिन पवितु परम पदु पाए ॥१॥

मेरे राम हरि जन आरोग भए ॥ गुर बचनी जिना जपिआ मेरा हरि हरि तिन के हउमै रोग गए ॥१॥ रहाउ ॥

ब्रहमा बिसनु महादेउ त्रै गुण रोगी विचि हउमै कार कमाई ॥ जिनि कीए तिसहि न चेतहि बपुड़े हरि गुरमुखि सोझी पाई ॥२॥

हउमै रोगि सभु जगतु बिआपिआ तिन कउ जनम मरण दुखु भारी ॥ गुर परसादी को विरला छूटै तिसु जन कउ हउ बलिहारी ॥३॥

जिनि सिसटि साजी सोई हरि जाणै ता का रूपु अपारो ॥ नानक आपे वेखि हरि बिगसै गुरमुखि ब्रहम बीचारो ॥४॥३॥१४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 736) सूही महला ४ ॥
कीता करणा सरब रजाई किछु कीचै जे करि सकीऐ ॥ आपणा कीता किछू न होवै जिउ हरि भावै तिउ रखीऐ ॥१॥

मेरे हरि जीउ सभु को तेरै वसि ॥ असा जोरु नाही जे किछु करि हम साकह जिउ भावै तिवै बखसि ॥१॥ रहाउ ॥

सभु जीउ पिंडु दीआ तुधु आपे तुधु आपे कारै लाइआ ॥ जेहा तूं हुकमु करहि तेहे को करम कमावै जेहा तुधु धुरि लिखि पाइआ ॥२॥

पंच ततु करि तुधु स्रिसटि सभ साजी कोई छेवा करिउ जे किछु कीता होवै ॥ इकना सतिगुरु मेलि तूं बुझावहि इकि मनमुखि करहि सि रोवै ॥३॥

हरि की वडिआई हउ आखि न साका हउ मूरखु मुगधु नीचाणु ॥ जन नानक कउ हरि बखसि लै मेरे सुआमी सरणागति पइआ अजाणु ॥४॥४॥१५॥२४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 736) रागु सूही महला ५ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बाजीगरि जैसे बाजी पाई ॥ नाना रूप भेख दिखलाई ॥ सांगु उतारि थम्हिओ पासारा ॥ तब एको एकंकारा ॥१॥

कवन रूप द्रिसटिओ बिनसाइओ ॥ कतहि गइओ उहु कत ते आइओ ॥१॥ रहाउ ॥

जल ते ऊठहि अनिक तरंगा ॥ कनिक भूखन कीने बहु रंगा ॥ बीजु बीजि देखिओ बहु परकारा ॥ फल पाके ते एकंकारा ॥२॥

सहस घटा महि एकु आकासु ॥ घट फूटे ते ओही प्रगासु ॥ भरम लोभ मोह माइआ विकार ॥ भ्रम छूटे ते एकंकार ॥३॥

ओहु अबिनासी बिनसत नाही ॥ ना को आवै ना को जाही ॥ गुरि पूरै हउमै मलु धोई ॥ कहु नानक मेरी परम गति होई ॥४॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 736) सूही महला ५ ॥
कीता लोड़हि सो प्रभ होइ ॥ तुझ बिनु दूजा नाही कोइ ॥ जो जनु सेवे तिसु पूरन काज ॥ दास अपुने की राखहु लाज ॥१॥

तेरी सरणि पूरन दइआला ॥ तुझ बिनु कवनु करे प्रतिपाला ॥१॥ रहाउ ॥

जलि थलि महीअलि रहिआ भरपूरि ॥ निकटि वसै नाही प्रभु दूरि ॥ लोक पतीआरै कछू न पाईऐ ॥ साचि लगै ता हउमै जाईऐ ॥२॥

जिस नो लाइ लए सो लागै ॥ गिआन रतनु अंतरि तिसु जागै ॥ दुरमति जाइ परम पदु पाए ॥ गुर परसादी नामु धिआए ॥३॥

दुइ कर जोड़ि करउ अरदासि ॥ तुधु भावै ता आणहि रासि ॥ करि किरपा अपनी भगती लाइ ॥ जन नानक प्रभु सदा धिआइ ॥४॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 737) सूही महला ५ ॥
धनु सोहागनि जो प्रभू पछानै ॥ मानै हुकमु तजै अभिमानै ॥ प्रिअ सिउ राती रलीआ मानै ॥१॥

सुनि सखीए प्रभ मिलण नीसानी ॥ मनु तनु अरपि तजि लाज लोकानी ॥१॥ रहाउ ॥

सखी सहेली कउ समझावै ॥ सोई कमावै जो प्रभ भावै ॥ सा सोहागणि अंकि समावै ॥२॥

गरबि गहेली महलु न पावै ॥ फिरि पछुतावै जब रैणि बिहावै ॥ करमहीणि मनमुखि दुखु पावै ॥३॥

बिनउ करी जे जाणा दूरि ॥ प्रभु अबिनासी रहिआ भरपूरि ॥ जनु नानकु गावै देखि हदूरि ॥४॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 737) सूही महला ५ ॥
ग्रिहु वसि गुरि कीना हउ घर की नारि ॥ दस दासी करि दीनी भतारि ॥ सगल समग्री मै घर की जोड़ी ॥ आस पिआसी पिर कउ लोड़ी ॥१॥

कवन कहा गुन कंत पिआरे ॥ सुघड़ सरूप दइआल मुरारे ॥१॥ रहाउ ॥

सतु सीगारु भउ अंजनु पाइआ ॥ अम्रित नामु त्मबोलु मुखि खाइआ ॥ कंगन बसत्र गहने बने सुहावे ॥ धन सभ सुख पावै जां पिरु घरि आवै ॥२॥

गुण कामण करि कंतु रीझाइआ ॥ वसि करि लीना गुरि भरमु चुकाइआ ॥ सभ ते ऊचा मंदरु मेरा ॥ सभ कामणि तिआगी प्रिउ प्रीतमु मेरा ॥३॥

प्रगटिआ सूरु जोति उजीआरा ॥ सेज विछाई सरध अपारा ॥ नव रंग लालु सेज रावण आइआ ॥ जन नानक पिर धन मिलि सुखु पाइआ ॥४॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 737) सूही महला ५ ॥
उमकिओ हीउ मिलन प्रभ ताई ॥ खोजत चरिओ देखउ प्रिअ जाई ॥ सुनत सदेसरो प्रिअ ग्रिहि सेज विछाई ॥ भ्रमि भ्रमि आइओ तउ नदरि न पाई ॥१॥

किन बिधि हीअरो धीरै निमानो ॥ मिलु साजन हउ तुझु कुरबानो ॥१॥ रहाउ ॥

एका सेज विछी धन कंता ॥ धन सूती पिरु सद जागंता ॥ पीओ मदरो धन मतवंता ॥ धन जागै जे पिरु बोलंता ॥२॥

भई निरासी बहुतु दिन लागे ॥ देस दिसंतर मै सगले झागे ॥ खिनु रहनु न पावउ बिनु पग पागे ॥ होइ क्रिपालु प्रभ मिलह सभागे ॥३॥

भइओ क्रिपालु सतसंगि मिलाइआ ॥ बूझी तपति घरहि पिरु पाइआ ॥ सगल सीगार हुणि मुझहि सुहाइआ ॥ कहु नानक गुरि भरमु चुकाइआ ॥४॥

जह देखा तह पिरु है भाई ॥ खोल्हिओ कपाटु ता मनु ठहराई ॥१॥ रहाउ दूजा ॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 738) सूही महला ५ ॥
किआ गुण तेरे सारि सम्हाली मोहि निरगुन के दातारे ॥ बै खरीदु किआ करे चतुराई इहु जीउ पिंडु सभु थारे ॥१॥

लाल रंगीले प्रीतम मनमोहन तेरे दरसन कउ हम बारे ॥१॥ रहाउ ॥

प्रभु दाता मोहि दीनु भेखारी तुम्ह सदा सदा उपकारे ॥ सो किछु नाही जि मै ते होवै मेरे ठाकुर अगम अपारे ॥२॥

किआ सेव कमावउ किआ कहि रीझावउ बिधि कितु पावउ दरसारे ॥ मिति नही पाईऐ अंतु न लहीऐ मनु तरसै चरनारे ॥३॥

पावउ दानु ढीठु होइ मागउ मुखि लागै संत रेनारे ॥ जन नानक कउ गुरि किरपा धारी प्रभि हाथ देइ निसतारे ॥४॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 738) सूही महला ५ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सेवा थोरी मागनु बहुता ॥ महलु न पावै कहतो पहुता ॥१॥

जो प्रिअ माने तिन की रीसा ॥ कूड़े मूरख की हाठीसा ॥१॥ रहाउ ॥

भेख दिखावै सचु न कमावै ॥ कहतो महली निकटि न आवै ॥२॥

अतीतु सदाए माइआ का माता ॥ मनि नही प्रीति कहै मुखि राता ॥३॥

कहु नानक प्रभ बिनउ सुनीजै ॥ कुचलु कठोरु कामी मुकतु कीजै ॥४॥

दरसन देखे की वडिआई ॥ तुम्ह सुखदाते पुरख सुभाई ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 738) सूही महला ५ ॥
बुरे काम कउ ऊठि खलोइआ ॥ नाम की बेला पै पै सोइआ ॥१॥

अउसरु अपना बूझै न इआना ॥ माइआ मोह रंगि लपटाना ॥१॥ रहाउ ॥

लोभ लहरि कउ बिगसि फूलि बैठा ॥ साध जना का दरसु न डीठा ॥२॥

कबहू न समझै अगिआनु गवारा ॥ बहुरि बहुरि लपटिओ जंजारा ॥१॥ रहाउ ॥

बिखै नाद करन सुणि भीना ॥ हरि जसु सुनत आलसु मनि कीना ॥३॥

द्रिसटि नाही रे पेखत अंधे ॥ छोडि जाहि झूठे सभि धंधे ॥१॥ रहाउ ॥

कहु नानक प्रभ बखस करीजै ॥ करि किरपा मोहि साधसंगु दीजै ॥४॥

तउ किछु पाईऐ जउ होईऐ रेना ॥ जिसहि बुझाए तिसु नामु लैना ॥१॥ रहाउ ॥२॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 739) सूही महला ५ ॥
घर महि ठाकुरु नदरि न आवै ॥ गल महि पाहणु लै लटकावै ॥१॥

भरमे भूला साकतु फिरता ॥ नीरु बिरोलै खपि खपि मरता ॥१॥ रहाउ ॥

जिसु पाहण कउ ठाकुरु कहता ॥ ओहु पाहणु लै उस कउ डुबता ॥२॥

गुनहगार लूण हरामी ॥ पाहण नाव न पारगिरामी ॥३॥

गुर मिलि नानक ठाकुरु जाता ॥ जलि थलि महीअलि पूरन बिधाता ॥४॥३॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 739) सूही महला ५ ॥
लालनु राविआ कवन गती री ॥ सखी बतावहु मुझहि मती री ॥१॥

सूहब सूहब सूहवी ॥ अपने प्रीतम कै रंगि रती ॥१॥ रहाउ ॥

पाव मलोवउ संगि नैन भतीरी ॥ जहा पठावहु जांउ तती री ॥२॥

जप तप संजम देउ जती री ॥ इक निमख मिलावहु मोहि प्रानपती री ॥३॥

माणु ताणु अह्मबुधि हती री ॥ सा नानक सोहागवती री ॥४॥४॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 739) सूही महला ५ ॥
तूं जीवनु तूं प्रान अधारा ॥ तुझ ही पेखि पेखि मनु साधारा ॥१॥

तूं साजनु तूं प्रीतमु मेरा ॥ चितहि न बिसरहि काहू बेरा ॥१॥ रहाउ ॥

बै खरीदु हउ दासरो तेरा ॥ तूं भारो ठाकुरु गुणी गहेरा ॥२॥

कोटि दास जा कै दरबारे ॥ निमख निमख वसै तिन्ह नाले ॥३॥

हउ किछु नाही सभु किछु तेरा ॥ ओति पोति नानक संगि बसेरा ॥४॥५॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 739) सूही महला ५ ॥
सूख महल जा के ऊच दुआरे ॥ ता महि वासहि भगत पिआरे ॥१॥

सहज कथा प्रभ की अति मीठी ॥ विरलै काहू नेत्रहु डीठी ॥१॥ रहाउ ॥

तह गीत नाद अखारे संगा ॥ ऊहा संत करहि हरि रंगा ॥२॥

तह मरणु न जीवणु सोगु न हरखा ॥ साच नाम की अम्रित वरखा ॥३॥

गुहज कथा इह गुर ते जाणी ॥ नानकु बोलै हरि हरि बाणी ॥४॥६॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 739) सूही महला ५ ॥
जा कै दरसि पाप कोटि उतारे ॥ भेटत संगि इहु भवजलु तारे ॥१॥

ओइ साजन ओइ मीत पिआरे ॥ जो हम कउ हरि नामु चितारे ॥१॥ रहाउ ॥

जा का सबदु सुनत सुख सारे ॥ जा की टहल जमदूत बिदारे ॥२॥

जा की धीरक इसु मनहि सधारे ॥ जा कै सिमरणि मुख उजलारे ॥३॥

प्रभ के सेवक प्रभि आपि सवारे ॥ सरणि नानक तिन्ह सद बलिहारे ॥४॥७॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 740) सूही महला ५ ॥
रहणु न पावहि सुरि नर देवा ॥ ऊठि सिधारे करि मुनि जन सेवा ॥१॥

जीवत पेखे जिन्ही हरि हरि धिआइआ ॥ साधसंगि तिन्ही दरसनु पाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

बादिसाह साह वापारी मरना ॥ जो दीसै सो कालहि खरना ॥२॥

कूड़ै मोहि लपटि लपटाना ॥ छोडि चलिआ ता फिरि पछुताना ॥३॥

क्रिपा निधान नानक कउ करहु दाति ॥ नामु तेरा जपी दिनु राति ॥४॥८॥१४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 740) सूही महला ५ ॥
घट घट अंतरि तुमहि बसारे ॥ सगल समग्री सूति तुमारे ॥१॥

तूं प्रीतम तूं प्रान अधारे ॥ तुम ही पेखि पेखि मनु बिगसारे ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक जोनि भ्रमि भ्रमि भ्रमि हारे ॥ ओट गही अब साध संगारे ॥२॥

अगम अगोचरु अलख अपारे ॥ नानकु सिमरै दिनु रैनारे ॥३॥९॥१५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 740) सूही महला ५ ॥
कवन काज माइआ वडिआई ॥ जा कउ बिनसत बार न काई ॥१॥

इहु सुपना सोवत नही जानै ॥ अचेत बिवसथा महि लपटानै ॥१॥ रहाउ ॥

महा मोहि मोहिओ गावारा ॥ पेखत पेखत ऊठि सिधारा ॥२॥

ऊच ते ऊच ता का दरबारा ॥ कई जंत बिनाहि उपारा ॥३॥

दूसर होआ ना को होई ॥ जपि नानक प्रभ एको सोई ॥४॥१०॥१६॥


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