Pt 5 - राग सिरीरागु - बाणी शब्द, Part 5 - Raag Sri - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू नानक देव जी -- SGGS 62) सिरीरागु महला १ ॥
चिते दिसहि धउलहर बगे बंक दुआर ॥ करि मन खुसी उसारिआ दूजै हेति पिआरि ॥ अंदरु खाली प्रेम बिनु ढहि ढेरी तनु छारु ॥१॥

भाई रे तनु धनु साथि न होइ ॥ राम नामु धनु निरमलो गुरु दाति करे प्रभु सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

राम नामु धनु निरमलो जे देवै देवणहारु ॥ आगै पूछ न होवई जिसु बेली गुरु करतारु ॥ आपि छडाए छुटीऐ आपे बखसणहारु ॥२॥

मनमुखु जाणै आपणे धीआ पूत संजोगु ॥ नारी देखि विगासीअहि नाले हरखु सु सोगु ॥ गुरमुखि सबदि रंगावले अहिनिसि हरि रसु भोगु ॥३॥

चितु चलै वितु जावणो साकत डोलि डोलाइ ॥ बाहरि ढूंढि विगुचीऐ घर महि वसतु सुथाइ ॥ मनमुखि हउमै करि मुसी गुरमुखि पलै पाइ ॥४॥

साकत निरगुणिआरिआ आपणा मूलु पछाणु ॥ रकतु बिंदु का इहु तनो अगनी पासि पिराणु ॥ पवणै कै वसि देहुरी मसतकि सचु नीसाणु ॥५॥

बहुता जीवणु मंगीऐ मुआ न लोड़ै कोइ ॥ सुख जीवणु तिसु आखीऐ जिसु गुरमुखि वसिआ सोइ ॥ नाम विहूणे किआ गणी जिसु हरि गुर दरसु न होइ ॥६॥

जिउ सुपनै निसि भुलीऐ जब लगि निद्रा होइ ॥ इउ सरपनि कै वसि जीअड़ा अंतरि हउमै दोइ ॥ गुरमति होइ वीचारीऐ सुपना इहु जगु लोइ ॥७॥

अगनि मरै जलु पाईऐ जिउ बारिक दूधै माइ ॥ बिनु जल कमल सु ना थीऐ बिनु जल मीनु मराइ ॥ नानक गुरमुखि हरि रसि मिलै जीवा हरि गुण गाइ ॥८॥१५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 63) सिरीरागु महला १ ॥
डूंगरु देखि डरावणो पेईअड़ै डरीआसु ॥ ऊचउ परबतु गाखड़ो ना पउड़ी तितु तासु ॥ गुरमुखि अंतरि जाणिआ गुरि मेली तरीआसु ॥१॥

भाई रे भवजलु बिखमु डरांउ ॥ पूरा सतिगुरु रसि मिलै गुरु तारे हरि नाउ ॥१॥ रहाउ ॥

चला चला जे करी जाणा चलणहारु ॥ जो आइआ सो चलसी अमरु सु गुरु करतारु ॥ भी सचा सालाहणा सचै थानि पिआरु ॥२॥

दर घर महला सोहणे पके कोट हजार ॥ हसती घोड़े पाखरे लसकर लख अपार ॥ किस ही नालि न चलिआ खपि खपि मुए असार ॥३॥

सुइना रुपा संचीऐ मालु जालु जंजालु ॥ सभ जग महि दोही फेरीऐ बिनु नावै सिरि कालु ॥ पिंडु पड़ै जीउ खेलसी बदफैली किआ हालु ॥४॥

पुता देखि विगसीऐ नारी सेज भतार ॥ चोआ चंदनु लाईऐ कापड़ु रूपु सीगारु ॥ खेहू खेह रलाईऐ छोडि चलै घर बारु ॥५॥

महर मलूक कहाईऐ राजा राउ कि खानु ॥ चउधरी राउ सदाईऐ जलि बलीऐ अभिमान ॥ मनमुखि नामु विसारिआ जिउ डवि दधा कानु ॥६॥

हउमै करि करि जाइसी जो आइआ जग माहि ॥ सभु जगु काजल कोठड़ी तनु मनु देह सुआहि ॥ गुरि राखे से निरमले सबदि निवारी भाहि ॥७॥

नानक तरीऐ सचि नामि सिरि साहा पातिसाहु ॥ मै हरि नामु न वीसरै हरि नामु रतनु वेसाहु ॥ मनमुख भउजलि पचि मुए गुरमुखि तरे अथाहु ॥८॥१६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 64) सिरीरागु महला १ घरु २ ॥
मुकामु करि घरि बैसणा नित चलणै की धोख ॥ मुकामु ता परु जाणीऐ जा रहै निहचलु लोक ॥१॥

दुनीआ कैसि मुकामे ॥ करि सिदकु करणी खरचु बाधहु लागि रहु नामे ॥१॥ रहाउ ॥

जोगी त आसणु करि बहै मुला बहै मुकामि ॥ पंडित वखाणहि पोथीआ सिध बहहि देव सथानि ॥२॥

सुर सिध गण गंधरब मुनि जन सेख पीर सलार ॥ दरि कूच कूचा करि गए अवरे भि चलणहार ॥३॥

सुलतान खान मलूक उमरे गए करि करि कूचु ॥ घड़ी मुहति कि चलणा दिल समझु तूं भि पहूचु ॥४॥

सबदाह माहि वखाणीऐ विरला त बूझै कोइ ॥ नानकु वखाणै बेनती जलि थलि महीअलि सोइ ॥५॥

अलाहु अलखु अगमु कादरु करणहारु करीमु ॥ सभ दुनी आवण जावणी मुकामु एकु रहीमु ॥६॥

मुकामु तिस नो आखीऐ जिसु सिसि न होवी लेखु ॥ असमानु धरती चलसी मुकामु ओही एकु ॥७॥

दिन रवि चलै निसि ससि चलै तारिका लख पलोइ ॥ मुकामु ओही एकु है नानका सचु बुगोइ ॥८॥१७॥

महले पहिले सतारह असटपदीआ ॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 64) सिरीरागु महला ३ घरु १ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरमुखि क्रिपा करे भगति कीजै बिनु गुर भगति न होइ ॥ आपै आपु मिलाए बूझै ता निरमलु होवै कोइ ॥ हरि जीउ सचा सची बाणी सबदि मिलावा होइ ॥१॥

भाई रे भगतिहीणु काहे जगि आइआ ॥ पूरे गुर की सेव न कीनी बिरथा जनमु गवाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

आपे हरि जगजीवनु दाता आपे बखसि मिलाए ॥ जीअ जंत ए किआ वेचारे किआ को आखि सुणाए ॥ गुरमुखि आपे दे वडिआई आपे सेव कराए ॥२॥

देखि कुट्मबु मोहि लोभाणा चलदिआ नालि न जाई ॥ सतिगुरु सेवि गुण निधानु पाइआ तिस की कीम न पाई ॥ प्रभु सखा हरि जीउ मेरा अंते होइ सखाई ॥३॥

पेईअड़ै जगजीवनु दाता मनमुखि पति गवाई ॥ बिनु सतिगुर को मगु न जाणै अंधे ठउर न काई ॥ हरि सुखदाता मनि नही वसिआ अंति गइआ पछुताई ॥४॥

पेईअड़ै जगजीवनु दाता गुरमति मंनि वसाइआ ॥ अनदिनु भगति करहि दिनु राती हउमै मोहु चुकाइआ ॥ जिसु सिउ राता तैसो होवै सचे सचि समाइआ ॥५॥

आपे नदरि करे भाउ लाए गुर सबदी बीचारि ॥ सतिगुरु सेविऐ सहजु ऊपजै हउमै त्रिसना मारि ॥ हरि गुणदाता सद मनि वसै सचु रखिआ उर धारि ॥६॥

प्रभु मेरा सदा निरमला मनि निरमलि पाइआ जाइ ॥ नामु निधानु हरि मनि वसै हउमै दुखु सभु जाइ ॥ सतिगुरि सबदु सुणाइआ हउ सद बलिहारै जाउ ॥७॥

आपणै मनि चिति कहै कहाए बिनु गुर आपु न जाई ॥ हरि जीउ भगति वछलु सुखदाता करि किरपा मंनि वसाई ॥ नानक सोभा सुरति देइ प्रभु आपे गुरमुखि दे वडिआई ॥८॥१॥१८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 65) सिरीरागु महला ३ ॥
हउमै करम कमावदे जमडंडु लगै तिन आइ ॥ जि सतिगुरु सेवनि से उबरे हरि सेती लिव लाइ ॥१॥

मन रे गुरमुखि नामु धिआइ ॥ धुरि पूरबि करतै लिखिआ तिना गुरमति नामि समाइ ॥१॥ रहाउ ॥

विणु सतिगुर परतीति न आवई नामि न लागो भाउ ॥ सुपनै सुखु न पावई दुख महि सवै समाइ ॥२॥

जे हरि हरि कीचै बहुतु लोचीऐ किरतु न मेटिआ जाइ ॥ हरि का भाणा भगती मंनिआ से भगत पए दरि थाइ ॥३॥

गुरु सबदु दिड़ावै रंग सिउ बिनु किरपा लइआ न जाइ ॥ जे सउ अम्रितु नीरीऐ भी बिखु फलु लागै धाइ ॥४॥

से जन सचे निरमले जिन सतिगुर नालि पिआरु ॥ सतिगुर का भाणा कमावदे बिखु हउमै तजि विकारु ॥५॥

मनहठि कितै उपाइ न छूटीऐ सिम्रिति सासत्र सोधहु जाइ ॥ मिलि संगति साधू उबरे गुर का सबदु कमाइ ॥६॥

हरि का नामु निधानु है जिसु अंतु न पारावारु ॥ गुरमुखि सेई सोहदे जिन किरपा करे करतारु ॥७॥

नानक दाता एकु है दूजा अउरु न कोइ ॥ गुर परसादी पाईऐ करमि परापति होइ ॥८॥२॥१९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 66) सिरीरागु महला ३ ॥
पंखी बिरखि सुहावड़ा सचु चुगै गुर भाइ ॥ हरि रसु पीवै सहजि रहै उडै न आवै जाइ ॥ निज घरि वासा पाइआ हरि हरि नामि समाइ ॥१॥

मन रे गुर की कार कमाइ ॥ गुर कै भाणै जे चलहि ता अनदिनु राचहि हरि नाइ ॥१॥ रहाउ ॥

पंखी बिरख सुहावड़े ऊडहि चहु दिसि जाहि ॥ जेता ऊडहि दुख घणे नित दाझहि तै बिललाहि ॥ बिनु गुर महलु न जापई ना अम्रित फल पाहि ॥२॥

गुरमुखि ब्रहमु हरीआवला साचै सहजि सुभाइ ॥ साखा तीनि निवारीआ एक सबदि लिव लाइ ॥ अम्रित फलु हरि एकु है आपे देइ खवाइ ॥३॥

मनमुख ऊभे सुकि गए ना फलु तिंना छाउ ॥ तिंना पासि न बैसीऐ ओना घरु न गिराउ ॥ कटीअहि तै नित जालीअहि ओना सबदु न नाउ ॥४॥

हुकमे करम कमावणे पइऐ किरति फिराउ ॥ हुकमे दरसनु देखणा जह भेजहि तह जाउ ॥ हुकमे हरि हरि मनि वसै हुकमे सचि समाउ ॥५॥

हुकमु न जाणहि बपुड़े भूले फिरहि गवार ॥ मनहठि करम कमावदे नित नित होहि खुआरु ॥ अंतरि सांति न आवई ना सचि लगै पिआरु ॥६॥

गुरमुखीआ मुह सोहणे गुर कै हेति पिआरि ॥ सची भगती सचि रते दरि सचै सचिआर ॥ आए से परवाणु है सभ कुल का करहि उधारु ॥७॥

सभ नदरी करम कमावदे नदरी बाहरि न कोइ ॥ जैसी नदरि करि देखै सचा तैसा ही को होइ ॥ नानक नामि वडाईआ करमि परापति होइ ॥८॥३॥२०॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 66) सिरीरागु महला ३ ॥
गुरमुखि नामु धिआईऐ मनमुखि बूझ न पाइ ॥ गुरमुखि सदा मुख ऊजले हरि वसिआ मनि आइ ॥ सहजे ही सुखु पाईऐ सहजे रहै समाइ ॥१॥

भाई रे दासनि दासा होइ ॥ गुर की सेवा गुर भगति है विरला पाए कोइ ॥१॥ रहाउ ॥

सदा सुहागु सुहागणी जे चलहि सतिगुर भाइ ॥ सदा पिरु निहचलु पाईऐ ना ओहु मरै न जाइ ॥ सबदि मिली ना वीछुड़ै पिर कै अंकि समाइ ॥२॥

हरि निरमलु अति ऊजला बिनु गुर पाइआ न जाइ ॥ पाठु पड़ै ना बूझई भेखी भरमि भुलाइ ॥ गुरमती हरि सदा पाइआ रसना हरि रसु समाइ ॥३॥

माइआ मोहु चुकाइआ गुरमती सहजि सुभाइ ॥ बिनु सबदै जगु दुखीआ फिरै मनमुखा नो गई खाइ ॥ सबदे नामु धिआईऐ सबदे सचि समाइ ॥४॥

माइआ भूले सिध फिरहि समाधि न लगै सुभाइ ॥ तीने लोअ विआपत है अधिक रही लपटाइ ॥ बिनु गुर मुकति न पाईऐ ना दुबिधा माइआ जाइ ॥५॥

माइआ किस नो आखीऐ किआ माइआ करम कमाइ ॥ दुखि सुखि एहु जीउ बधु है हउमै करम कमाइ ॥ बिनु सबदै भरमु न चूकई ना विचहु हउमै जाइ ॥६॥

बिनु प्रीती भगति न होवई बिनु सबदै थाइ न पाइ ॥ सबदे हउमै मारीऐ माइआ का भ्रमु जाइ ॥ नामु पदारथु पाईऐ गुरमुखि सहजि सुभाइ ॥७॥

बिनु गुर गुण न जापनी बिनु गुण भगति न होइ ॥ भगति वछलु हरि मनि वसिआ सहजि मिलिआ प्रभु सोइ ॥ नानक सबदे हरि सालाहीऐ करमि परापति होइ ॥८॥४॥२१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 67) सिरीरागु महला ३ ॥
माइआ मोहु मेरै प्रभि कीना आपे भरमि भुलाए ॥ मनमुखि करम करहि नही बूझहि बिरथा जनमु गवाए ॥ गुरबाणी इसु जग महि चानणु करमि वसै मनि आए ॥१॥

मन रे नामु जपहु सुखु होइ ॥ गुरु पूरा सालाहीऐ सहजि मिलै प्रभु सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

भरमु गइआ भउ भागिआ हरि चरणी चितु लाइ ॥ गुरमुखि सबदु कमाईऐ हरि वसै मनि आइ ॥ घरि महलि सचि समाईऐ जमकालु न सकै खाइ ॥२॥

नामा छीबा कबीरु जोलाहा पूरे गुर ते गति पाई ॥ ब्रहम के बेते सबदु पछाणहि हउमै जाति गवाई ॥ सुरि नर तिन की बाणी गावहि कोइ न मेटै भाई ॥३॥

दैत पुतु करम धरम किछु संजम न पड़ै दूजा भाउ न जाणै ॥ सतिगुरु भेटिऐ निरमलु होआ अनदिनु नामु वखाणै ॥ एको पड़ै एको नाउ बूझै दूजा अवरु न जाणै ॥४॥

खटु दरसन जोगी संनिआसी बिनु गुर भरमि भुलाए ॥ सतिगुरु सेवहि ता गति मिति पावहि हरि जीउ मंनि वसाए ॥ सची बाणी सिउ चितु लागै आवणु जाणु रहाए ॥५॥

पंडित पड़ि पड़ि वादु वखाणहि बिनु गुर भरमि भुलाए ॥ लख चउरासीह फेरु पइआ बिनु सबदै मुकति न पाए ॥ जा नाउ चेतै ता गति पाए जा सतिगुरु मेलि मिलाए ॥६॥

सतसंगति महि नामु हरि उपजै जा सतिगुरु मिलै सुभाए ॥ मनु तनु अरपी आपु गवाई चला सतिगुर भाए ॥ सद बलिहारी गुर अपुने विटहु जि हरि सेती चितु लाए ॥७॥

सो ब्राहमणु ब्रहमु जो बिंदे हरि सेती रंगि राता ॥ प्रभु निकटि वसै सभना घट अंतरि गुरमुखि विरलै जाता ॥ नानक नामु मिलै वडिआई गुर कै सबदि पछाता ॥८॥५॥२२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 68) सिरीरागु महला ३ ॥
सहजै नो सभ लोचदी बिनु गुर पाइआ न जाइ ॥ पड़ि पड़ि पंडित जोतकी थके भेखी भरमि भुलाइ ॥ गुर भेटे सहजु पाइआ आपणी किरपा करे रजाइ ॥१॥

भाई रे गुर बिनु सहजु न होइ ॥ सबदै ही ते सहजु ऊपजै हरि पाइआ सचु सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

सहजे गाविआ थाइ पवै बिनु सहजै कथनी बादि ॥ सहजे ही भगति ऊपजै सहजि पिआरि बैरागि ॥ सहजै ही ते सुख साति होइ बिनु सहजै जीवणु बादि ॥२॥

सहजि सालाही सदा सदा सहजि समाधि लगाइ ॥ सहजे ही गुण ऊचरै भगति करे लिव लाइ ॥ सबदे ही हरि मनि वसै रसना हरि रसु खाइ ॥३॥

सहजे कालु विडारिआ सच सरणाई पाइ ॥ सहजे हरि नामु मनि वसिआ सची कार कमाइ ॥ से वडभागी जिनी पाइआ सहजे रहे समाइ ॥४॥

माइआ विचि सहजु न ऊपजै माइआ दूजै भाइ ॥ मनमुख करम कमावणे हउमै जलै जलाइ ॥ जमणु मरणु न चूकई फिरि फिरि आवै जाइ ॥५॥

त्रिहु गुणा विचि सहजु न पाईऐ त्रै गुण भरमि भुलाइ ॥ पड़ीऐ गुणीऐ किआ कथीऐ जा मुंढहु घुथा जाइ ॥ चउथे पद महि सहजु है गुरमुखि पलै पाइ ॥६॥

निरगुण नामु निधानु है सहजे सोझी होइ ॥ गुणवंती सालाहिआ सचे सची सोइ ॥ भुलिआ सहजि मिलाइसी सबदि मिलावा होइ ॥७॥

बिनु सहजै सभु अंधु है माइआ मोहु गुबारु ॥ सहजे ही सोझी पई सचै सबदि अपारि ॥ आपे बखसि मिलाइअनु पूरे गुर करतारि ॥८॥

सहजे अदिसटु पछाणीऐ निरभउ जोति निरंकारु ॥ सभना जीआ का इकु दाता जोती जोति मिलावणहारु ॥ पूरै सबदि सलाहीऐ जिस दा अंतु न पारावारु ॥९॥

गिआनीआ का धनु नामु है सहजि करहि वापारु ॥ अनदिनु लाहा हरि नामु लैनि अखुट भरे भंडार ॥ नानक तोटि न आवई दीए देवणहारि ॥१०॥६॥२३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 69) सिरीरागु महला ३ ॥
सतिगुरि मिलिऐ फेरु न पवै जनम मरण दुखु जाइ ॥ पूरै सबदि सभ सोझी होई हरि नामै रहै समाइ ॥१॥

मन मेरे सतिगुर सिउ चितु लाइ ॥ निरमलु नामु सद नवतनो आपि वसै मनि आइ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि जीउ राखहु अपुनी सरणाई जिउ राखहि तिउ रहणा ॥ गुर कै सबदि जीवतु मरै गुरमुखि भवजलु तरणा ॥२॥

वडै भागि नाउ पाईऐ गुरमति सबदि सुहाई ॥ आपे मनि वसिआ प्रभु करता सहजे रहिआ समाई ॥३॥

इकना मनमुखि सबदु न भावै बंधनि बंधि भवाइआ ॥ लख चउरासीह फिरि फिरि आवै बिरथा जनमु गवाइआ ॥४॥

भगता मनि आनंदु है सचै सबदि रंगि राते ॥ अनदिनु गुण गावहि सद निरमल सहजे नामि समाते ॥५॥

गुरमुखि अम्रित बाणी बोलहि सभ आतम रामु पछाणी ॥ एको सेवनि एकु अराधहि गुरमुखि अकथ कहाणी ॥६॥

सचा साहिबु सेवीऐ गुरमुखि वसै मनि आइ ॥ सदा रंगि राते सच सिउ अपुनी किरपा करे मिलाइ ॥७॥

आपे करे कराए आपे इकना सुतिआ देइ जगाइ ॥ आपे मेलि मिलाइदा नानक सबदि समाइ ॥८॥७॥२४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 69) सिरीरागु महला ३ ॥
सतिगुरि सेविऐ मनु निरमला भए पवितु सरीर ॥ मनि आनंदु सदा सुखु पाइआ भेटिआ गहिर ग्मभीरु ॥ सची संगति बैसणा सचि नामि मनु धीर ॥१॥

मन रे सतिगुरु सेवि निसंगु ॥ सतिगुरु सेविऐ हरि मनि वसै लगै न मैलु पतंगु ॥१॥ रहाउ ॥

सचै सबदि पति ऊपजै सचे सचा नाउ ॥ जिनी हउमै मारि पछाणिआ हउ तिन बलिहारै जाउ ॥ मनमुख सचु न जाणनी तिन ठउर न कतहू थाउ ॥२॥

सचु खाणा सचु पैनणा सचे ही विचि वासु ॥ सदा सचा सालाहणा सचै सबदि निवासु ॥ सभु आतम रामु पछाणिआ गुरमती निज घरि वासु ॥३॥

सचु वेखणु सचु बोलणा तनु मनु सचा होइ ॥ सची साखी उपदेसु सचु सचे सची सोइ ॥ जिंनी सचु विसारिआ से दुखीए चले रोइ ॥४॥

सतिगुरु जिनी न सेविओ से कितु आए संसारि ॥ जम दरि बधे मारीअहि कूक न सुणै पूकार ॥ बिरथा जनमु गवाइआ मरि जमहि वारो वार ॥५॥

एहु जगु जलता देखि कै भजि पए सतिगुर सरणा ॥ सतिगुरि सचु दिड़ाइआ सदा सचि संजमि रहणा ॥ सतिगुर सचा है बोहिथा सबदे भवजलु तरणा ॥६॥

लख चउरासीह फिरदे रहे बिनु सतिगुर मुकति न होई ॥ पड़ि पड़ि पंडित मोनी थके दूजै भाइ पति खोई ॥ सतिगुरि सबदु सुणाइआ बिनु सचे अवरु न कोई ॥७॥

जो सचै लाए से सचि लगे नित सची कार करंनि ॥ तिना निज घरि वासा पाइआ सचै महलि रहंनि ॥ नानक भगत सुखीए सदा सचै नामि रचंनि ॥८॥१७॥८॥२५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 70) सिरीरागु महला ५ ॥
जा कउ मुसकलु अति बणै ढोई कोइ न देइ ॥ लागू होए दुसमना साक भि भजि खले ॥ सभो भजै आसरा चुकै सभु असराउ ॥ चिति आवै ओसु पारब्रहमु लगै न तती वाउ ॥१॥

साहिबु निताणिआ का ताणु ॥ आइ न जाई थिरु सदा गुर सबदी सचु जाणु ॥१॥ रहाउ ॥

जे को होवै दुबला नंग भुख की पीर ॥ दमड़ा पलै ना पवै ना को देवै धीर ॥ सुआरथु सुआउ न को करे ना किछु होवै काजु ॥ चिति आवै ओसु पारब्रहमु ता निहचलु होवै राजु ॥२॥

जा कउ चिंता बहुतु बहुतु देही विआपै रोगु ॥ ग्रिसति कुट्मबि पलेटिआ कदे हरखु कदे सोगु ॥ गउणु करे चहु कुंट का घड़ी न बैसणु सोइ ॥ चिति आवै ओसु पारब्रहमु तनु मनु सीतलु होइ ॥३॥

कामि करोधि मोहि वसि कीआ किरपन लोभि पिआरु ॥ चारे किलविख उनि अघ कीए होआ असुर संघारु ॥ पोथी गीत कवित किछु कदे न करनि धरिआ ॥ चिति आवै ओसु पारब्रहमु ता निमख सिमरत तरिआ ॥४॥

सासत सिम्रिति बेद चारि मुखागर बिचरे ॥ तपे तपीसर जोगीआ तीरथि गवनु करे ॥ खटु करमा ते दुगुणे पूजा करता नाइ ॥ रंगु न लगी पारब्रहम ता सरपर नरके जाइ ॥५॥

राज मिलक सिकदारीआ रस भोगण बिसथार ॥ बाग सुहावे सोहणे चलै हुकमु अफार ॥ रंग तमासे बहु बिधी चाइ लगि रहिआ ॥ चिति न आइओ पारब्रहमु ता सरप की जूनि गइआ ॥६॥

बहुतु धनाढि अचारवंतु सोभा निरमल रीति ॥ मात पिता सुत भाईआ साजन संगि परीति ॥ लसकर तरकसबंद बंद जीउ जीउ सगली कीत ॥ चिति न आइओ पारब्रहमु ता खड़ि रसातलि दीत ॥७॥

काइआ रोगु न छिद्रु किछु ना किछु काड़ा सोगु ॥ मिरतु न आवी चिति तिसु अहिनिसि भोगै भोगु ॥ सभ किछु कीतोनु आपणा जीइ न संक धरिआ ॥ चिति न आइओ पारब्रहमु जमकंकर वसि परिआ ॥८॥

किरपा करे जिसु पारब्रहमु होवै साधू संगु ॥ जिउ जिउ ओहु वधाईऐ तिउ तिउ हरि सिउ रंगु ॥ दुहा सिरिआ का खसमु आपि अवरु न दूजा थाउ ॥ सतिगुर तुठै पाइआ नानक सचा नाउ ॥९॥१॥२६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 71) सिरीरागु महला ५ घरु ५ ॥
जानउ नही भावै कवन बाता ॥ मन खोजि मारगु ॥१॥ रहाउ ॥

धिआनी धिआनु लावहि ॥ गिआनी गिआनु कमावहि ॥ प्रभु किन ही जाता ॥१॥

भगउती रहत जुगता ॥ जोगी कहत मुकता ॥ तपसी तपहि राता ॥२॥

मोनी मोनिधारी ॥ सनिआसी ब्रहमचारी ॥ उदासी उदासि राता ॥३॥

भगति नवै परकारा ॥ पंडितु वेदु पुकारा ॥ गिरसती गिरसति धरमाता ॥४॥

इक सबदी बहु रूपि अवधूता ॥ कापड़ी कउते जागूता ॥ इकि तीरथि नाता ॥५॥

निरहार वरती आपरसा ॥ इकि लूकि न देवहि दरसा ॥ इकि मन ही गिआता ॥६॥

घाटि न किन ही कहाइआ ॥ सभ कहते है पाइआ ॥ जिसु मेले सो भगता ॥७॥

सगल उकति उपावा ॥ तिआगी सरनि पावा ॥ नानकु गुर चरणि पराता ॥८॥२॥२७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 71) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिरीरागु महला १ घरु ३ ॥
जोगी अंदरि जोगीआ ॥ तूं भोगी अंदरि भोगीआ ॥ तेरा अंतु न पाइआ सुरगि मछि पइआलि जीउ ॥१॥

हउ वारी हउ वारणै कुरबाणु तेरे नाव नो ॥१॥ रहाउ ॥

तुधु संसारु उपाइआ ॥ सिरे सिरि धंधे लाइआ ॥ वेखहि कीता आपणा करि कुदरति पासा ढालि जीउ ॥२॥

परगटि पाहारै जापदा ॥ सभु नावै नो परतापदा ॥ सतिगुर बाझु न पाइओ सभ मोही माइआ जालि जीउ ॥३॥

सतिगुर कउ बलि जाईऐ ॥ जितु मिलिऐ परम गति पाईऐ ॥ सुरि नर मुनि जन लोचदे सो सतिगुरि दीआ बुझाइ जीउ ॥४॥

सतसंगति कैसी जाणीऐ ॥ जिथै एको नामु वखाणीऐ ॥ एको नामु हुकमु है नानक सतिगुरि दीआ बुझाइ जीउ ॥५॥

इहु जगतु भरमि भुलाइआ ॥ आपहु तुधु खुआइआ ॥ परतापु लगा दोहागणी भाग जिना के नाहि जीउ ॥६॥

दोहागणी किआ नीसाणीआ ॥ खसमहु घुथीआ फिरहि निमाणीआ ॥ मैले वेस तिना कामणी दुखी रैणि विहाइ जीउ ॥७॥

सोहागणी किआ करमु कमाइआ ॥ पूरबि लिखिआ फलु पाइआ ॥ नदरि करे कै आपणी आपे लए मिलाइ जीउ ॥८॥

हुकमु जिना नो मनाइआ ॥ तिन अंतरि सबदु वसाइआ ॥ सहीआ से सोहागणी जिन सह नालि पिआरु जीउ ॥९॥

जिना भाणे का रसु आइआ ॥ तिन विचहु भरमु चुकाइआ ॥ नानक सतिगुरु ऐसा जाणीऐ जो सभसै लए मिलाइ जीउ ॥१०॥

सतिगुरि मिलिऐ फलु पाइआ ॥ जिनि विचहु अहकरणु चुकाइआ ॥ दुरमति का दुखु कटिआ भागु बैठा मसतकि आइ जीउ ॥११॥

अम्रितु तेरी बाणीआ ॥ तेरिआ भगता रिदै समाणीआ ॥ सुख सेवा अंदरि रखिऐ आपणी नदरि करहि निसतारि जीउ ॥१२॥

सतिगुरु मिलिआ जाणीऐ ॥ जितु मिलिऐ नामु वखाणीऐ ॥ सतिगुर बाझु न पाइओ सभ थकी करम कमाइ जीउ ॥१३॥

हउ सतिगुर विटहु घुमाइआ ॥ जिनि भ्रमि भुला मारगि पाइआ ॥ नदरि करे जे आपणी आपे लए रलाइ जीउ ॥१४॥

तूं सभना माहि समाइआ ॥ तिनि करतै आपु लुकाइआ ॥ नानक गुरमुखि परगटु होइआ जा कउ जोति धरी करतारि जीउ ॥१५॥

आपे खसमि निवाजिआ ॥ जीउ पिंडु दे साजिआ ॥ आपणे सेवक की पैज रखीआ दुइ कर मसतकि धारि जीउ ॥१६॥

सभि संजम रहे सिआणपा ॥ मेरा प्रभु सभु किछु जाणदा ॥ प्रगट प्रतापु वरताइओ सभु लोकु करै जैकारु जीउ ॥१७॥

मेरे गुण अवगन न बीचारिआ ॥ प्रभि अपणा बिरदु समारिआ ॥ कंठि लाइ कै रखिओनु लगै न तती वाउ जीउ ॥१८॥

मै मनि तनि प्रभू धिआइआ ॥ जीइ इछिअड़ा फलु पाइआ ॥ साह पातिसाह सिरि खसमु तूं जपि नानक जीवै नाउ जीउ ॥१९॥

तुधु आपे आपु उपाइआ ॥ दूजा खेलु करि दिखलाइआ ॥ सभु सचो सचु वरतदा जिसु भावै तिसै बुझाइ जीउ ॥२०॥

गुर परसादी पाइआ ॥ तिथै माइआ मोहु चुकाइआ ॥ किरपा करि कै आपणी आपे लए समाइ जीउ ॥२१॥

गोपी नै गोआलीआ ॥ तुधु आपे गोइ उठालीआ ॥ हुकमी भांडे साजिआ तूं आपे भंनि सवारि जीउ ॥२२॥

जिन सतिगुर सिउ चितु लाइआ ॥ तिनी दूजा भाउ चुकाइआ ॥ निरमल जोति तिन प्राणीआ ओइ चले जनमु सवारि जीउ ॥२३॥

तेरीआ सदा सदा चंगिआईआ ॥ मै राति दिहै वडिआईआं ॥ अणमंगिआ दानु देवणा कहु नानक सचु समालि जीउ ॥२४॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 73) सिरीरागु महला ५ ॥
पै पाइ मनाई सोइ जीउ ॥ सतिगुर पुरखि मिलाइआ तिसु जेवडु अवरु न कोइ जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

गोसाई मिहंडा इठड़ा ॥ अम अबे थावहु मिठड़ा ॥ भैण भाई सभि सजणा तुधु जेहा नाही कोइ जीउ ॥१॥

तेरै हुकमे सावणु आइआ ॥ मै सत का हलु जोआइआ ॥ नाउ बीजण लगा आस करि हरि बोहल बखस जमाइ जीउ ॥२॥

हउ गुर मिलि इकु पछाणदा ॥ दुया कागलु चिति न जाणदा ॥ हरि इकतै कारै लाइओनु जिउ भावै तिंवै निबाहि जीउ ॥३॥

तुसी भोगिहु भुंचहु भाईहो ॥ गुरि दीबाणि कवाइ पैनाईओ ॥ हउ होआ माहरु पिंड दा बंनि आदे पंजि सरीक जीउ ॥४॥

हउ आइआ साम्है तिहंडीआ ॥ पंजि किरसाण मुजेरे मिहडिआ ॥ कंनु कोई कढि न हंघई नानक वुठा घुघि गिराउ जीउ ॥५॥

हउ वारी घुमा जावदा ॥ इक साहा तुधु धिआइदा ॥ उजड़ु थेहु वसाइओ हउ तुध विटहु कुरबाणु जीउ ॥६॥

हरि इठै नित धिआइदा ॥ मनि चिंदी सो फलु पाइदा ॥ सभे काज सवारिअनु लाहीअनु मन की भुख जीउ ॥७॥

मै छडिआ सभो धंधड़ा ॥ गोसाई सेवी सचड़ा ॥ नउ निधि नामु निधानु हरि मै पलै बधा छिकि जीउ ॥८॥

मै सुखी हूं सुखु पाइआ ॥ गुरि अंतरि सबदु वसाइआ ॥ सतिगुरि पुरखि विखालिआ मसतकि धरि कै हथु जीउ ॥९॥

मै बधी सचु धरम साल है ॥ गुरसिखा लहदा भालि कै ॥ पैर धोवा पखा फेरदा तिसु निवि निवि लगा पाइ जीउ ॥१०॥

सुणि गला गुर पहि आइआ ॥ नामु दानु इसनानु दिड़ाइआ ॥ सभु मुकतु होआ सैसारड़ा नानक सची बेड़ी चाड़ि जीउ ॥११॥

सभ स्रिसटि सेवे दिनु राति जीउ ॥ दे कंनु सुणहु अरदासि जीउ ॥ ठोकि वजाइ सभ डिठीआ तुसि आपे लइअनु छडाइ जीउ ॥१२॥

हुणि हुकमु होआ मिहरवाण दा ॥ पै कोइ न किसै रञाणदा ॥ सभ सुखाली वुठीआ इहु होआ हलेमी राजु जीउ ॥१३॥

झिमि झिमि अम्रितु वरसदा ॥ बोलाइआ बोली खसम दा ॥ बहु माणु कीआ तुधु उपरे तूं आपे पाइहि थाइ जीउ ॥१४॥

तेरिआ भगता भुख सद तेरीआ ॥ हरि लोचा पूरन मेरीआ ॥ देहु दरसु सुखदातिआ मै गल विचि लैहु मिलाइ जीउ ॥१५॥

तुधु जेवडु अवरु न भालिआ ॥ तूं दीप लोअ पइआलिआ ॥ तूं थानि थनंतरि रवि रहिआ नानक भगता सचु अधारु जीउ ॥१६॥

हउ गोसाई दा पहिलवानड़ा ॥ मै गुर मिलि उच दुमालड़ा ॥ सभ होई छिंझ इकठीआ दयु बैठा वेखै आपि जीउ ॥१७॥

वात वजनि टमक भेरीआ ॥ मल लथे लैदे फेरीआ ॥ निहते पंजि जुआन मै गुर थापी दिती कंडि जीउ ॥१८॥

सभ इकठे होइ आइआ ॥ घरि जासनि वाट वटाइआ ॥ गुरमुखि लाहा लै गए मनमुख चले मूलु गवाइ जीउ ॥१९॥

तूं वरना चिहना बाहरा ॥ हरि दिसहि हाजरु जाहरा ॥ सुणि सुणि तुझै धिआइदे तेरे भगत रते गुणतासु जीउ ॥२०॥

मै जुगि जुगि दयै सेवड़ी ॥ गुरि कटी मिहडी जेवड़ी ॥ हउ बाहुड़ि छिंझ न नचऊ नानक अउसरु लधा भालि जीउ ॥२१॥२॥२९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 74) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिरीरागु महला १ पहरे घरु १ ॥
पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हुकमि पइआ गरभासि ॥ उरध तपु अंतरि करे वणजारिआ मित्रा खसम सेती अरदासि ॥ खसम सेती अरदासि वखाणै उरध धिआनि लिव लागा ॥ ना मरजादु आइआ कलि भीतरि बाहुड़ि जासी नागा ॥ जैसी कलम वुड़ी है मसतकि तैसी जीअड़े पासि ॥ कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै हुकमि पइआ गरभासि ॥१॥

दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा विसरि गइआ धिआनु ॥ हथो हथि नचाईऐ वणजारिआ मित्रा जिउ जसुदा घरि कानु ॥ हथो हथि नचाईऐ प्राणी मात कहै सुतु मेरा ॥ चेति अचेत मूड़ मन मेरे अंति नही कछु तेरा ॥ जिनि रचि रचिआ तिसहि न जाणै मन भीतरि धरि गिआनु ॥ कहु नानक प्राणी दूजै पहरै विसरि गइआ धिआनु ॥२॥

तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा धन जोबन सिउ चितु ॥ हरि का नामु न चेतही वणजारिआ मित्रा बधा छुटहि जितु ॥ हरि का नामु न चेतै प्राणी बिकलु भइआ संगि माइआ ॥ धन सिउ रता जोबनि मता अहिला जनमु गवाइआ ॥ धरम सेती वापारु न कीतो करमु न कीतो मितु ॥ कहु नानक तीजै पहरै प्राणी धन जोबन सिउ चितु ॥३॥

चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा लावी आइआ खेतु ॥ जा जमि पकड़ि चलाइआ वणजारिआ मित्रा किसै न मिलिआ भेतु ॥ भेतु चेतु हरि किसै न मिलिओ जा जमि पकड़ि चलाइआ ॥ झूठा रुदनु होआ दोआलै खिन महि भइआ पराइआ ॥ साई वसतु परापति होई जिसु सिउ लाइआ हेतु ॥ कहु नानक प्राणी चउथै पहरै लावी लुणिआ खेतु ॥४॥१॥


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