Pt 4 - राग सोरठि - बाणी शब्द, Part 4 - Raag Sorath - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 631) सोरठि महला ९ ॥
मन रे कउनु कुमति तै लीनी ॥ पर दारा निंदिआ रस रचिओ राम भगति नहि कीनी ॥१॥ रहाउ ॥

मुकति पंथु जानिओ तै नाहनि धन जोरन कउ धाइआ ॥ अंति संग काहू नही दीना बिरथा आपु बंधाइआ ॥१॥

ना हरि भजिओ न गुर जनु सेविओ नह उपजिओ कछु गिआना ॥ घट ही माहि निरंजनु तेरै तै खोजत उदिआना ॥२॥

बहुतु जनम भरमत तै हारिओ असथिर मति नही पाई ॥ मानस देह पाइ पद हरि भजु नानक बात बताई ॥३॥३॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 632) सोरठि महला ९ ॥
मन रे प्रभ की सरनि बिचारो ॥ जिह सिमरत गनका सी उधरी ता को जसु उर धारो ॥१॥ रहाउ ॥

अटल भइओ ध्रूअ जा कै सिमरनि अरु निरभै पदु पाइआ ॥ दुख हरता इह बिधि को सुआमी तै काहे बिसराइआ ॥१॥

जब ही सरनि गही किरपा निधि गज गराह ते छूटा ॥ महमा नाम कहा लउ बरनउ राम कहत बंधन तिह तूटा ॥२॥

अजामलु पापी जगु जाने निमख माहि निसतारा ॥ नानक कहत चेत चिंतामनि तै भी उतरहि पारा ॥३॥४॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 632) सोरठि महला ९ ॥
प्रानी कउनु उपाउ करै ॥ जा ते भगति राम की पावै जम को त्रासु हरै ॥१॥ रहाउ ॥

कउनु करम बिदिआ कहु कैसी धरमु कउनु फुनि करई ॥ कउनु नामु गुर जा कै सिमरै भव सागर कउ तरई ॥१॥

कल मै एकु नामु किरपा निधि जाहि जपै गति पावै ॥ अउर धरम ता कै सम नाहनि इह बिधि बेदु बतावै ॥२॥

सुखु दुखु रहत सदा निरलेपी जा कउ कहत गुसाई ॥ सो तुम ही महि बसै निरंतरि नानक दरपनि निआई ॥३॥५॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 632) सोरठि महला ९ ॥
माई मै किहि बिधि लखउ गुसाई ॥ महा मोह अगिआनि तिमरि मो मनु रहिओ उरझाई ॥१॥ रहाउ ॥

सगल जनम भरम ही भरम खोइओ नह असथिरु मति पाई ॥ बिखिआसकत रहिओ निस बासुर नह छूटी अधमाई ॥१॥

साधसंगु कबहू नही कीना नह कीरति प्रभ गाई ॥ जन नानक मै नाहि कोऊ गुनु राखि लेहु सरनाई ॥२॥६॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 632) सोरठि महला ९ ॥
माई मनु मेरो बसि नाहि ॥ निस बासुर बिखिअन कउ धावत किहि बिधि रोकउ ताहि ॥१॥ रहाउ ॥

बेद पुरान सिम्रिति के मत सुनि निमख न हीए बसावै ॥ पर धन पर दारा सिउ रचिओ बिरथा जनमु सिरावै ॥१॥

मदि माइआ कै भइओ बावरो सूझत नह कछु गिआना ॥ घट ही भीतरि बसत निरंजनु ता को मरमु न जाना ॥२॥

जब ही सरनि साध की आइओ दुरमति सगल बिनासी ॥ तब नानक चेतिओ चिंतामनि काटी जम की फासी ॥३॥७॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 633) सोरठि महला ९ ॥
रे नर इह साची जीअ धारि ॥ सगल जगतु है जैसे सुपना बिनसत लगत न बार ॥१॥ रहाउ ॥

बारू भीति बनाई रचि पचि रहत नही दिन चारि ॥ तैसे ही इह सुख माइआ के उरझिओ कहा गवार ॥१॥

अजहू समझि कछु बिगरिओ नाहिनि भजि ले नामु मुरारि ॥ कहु नानक निज मतु साधन कउ भाखिओ तोहि पुकारि ॥२॥८॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 633) सोरठि महला ९ ॥
इह जगि मीतु न देखिओ कोई ॥ सगल जगतु अपनै सुखि लागिओ दुख मै संगि न होई ॥१॥ रहाउ ॥

दारा मीत पूत सनबंधी सगरे धन सिउ लागे ॥ जब ही निरधन देखिओ नर कउ संगु छाडि सभ भागे ॥१॥

कहंउ कहा यिआ मन बउरे कउ इन सिउ नेहु लगाइओ ॥ दीना नाथ सकल भै भंजन जसु ता को बिसराइओ ॥२॥

सुआन पूछ जिउ भइओ न सूधउ बहुतु जतनु मै कीनउ ॥ नानक लाज बिरद की राखहु नामु तुहारउ लीनउ ॥३॥९॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 633) सोरठि महला ९ ॥
मन रे गहिओ न गुर उपदेसु ॥ कहा भइओ जउ मूडु मुडाइओ भगवउ कीनो भेसु ॥१॥ रहाउ ॥

साच छाडि कै झूठह लागिओ जनमु अकारथु खोइओ ॥ करि परपंच उदर निज पोखिओ पसु की निआई सोइओ ॥१॥

राम भजन की गति नही जानी माइआ हाथि बिकाना ॥ उरझि रहिओ बिखिअन संगि बउरा नामु रतनु बिसराना ॥२॥

रहिओ अचेतु न चेतिओ गोबिंद बिरथा अउध सिरानी ॥ कहु नानक हरि बिरदु पछानउ भूले सदा परानी ॥३॥१०॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 633) सोरठि महला ९ ॥
जो नरु दुख मै दुखु नही मानै ॥ सुख सनेहु अरु भै नही जा कै कंचन माटी मानै ॥१॥ रहाउ ॥

नह निंदिआ नह उसतति जा कै लोभु मोहु अभिमाना ॥ हरख सोग ते रहै निआरउ नाहि मान अपमाना ॥१॥

आसा मनसा सगल तिआगै जग ते रहै निरासा ॥ कामु क्रोधु जिह परसै नाहनि तिह घटि ब्रहमु निवासा ॥२॥

गुर किरपा जिह नर कउ कीनी तिह इह जुगति पछानी ॥ नानक लीन भइओ गोबिंद सिउ जिउ पानी संगि पानी ॥३॥११॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 634) सोरठि महला ९ ॥
प्रीतम जानि लेहु मन माही ॥ अपने सुख सिउ ही जगु फांधिओ को काहू को नाही ॥१॥ रहाउ ॥

सुख मै आनि बहुतु मिलि बैठत रहत चहू दिसि घेरै ॥ बिपति परी सभ ही संगु छाडित कोऊ न आवत नेरै ॥१॥

घर की नारि बहुतु हितु जा सिउ सदा रहत संग लागी ॥ जब ही हंस तजी इह कांइआ प्रेत प्रेत करि भागी ॥२॥

इह बिधि को बिउहारु बनिओ है जा सिउ नेहु लगाइओ ॥ अंत बार नानक बिनु हरि जी कोऊ कामि न आइओ ॥३॥१२॥१३९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 634) सोरठि महला १ घरु १ असटपदीआ चउतुकी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुबिधा न पड़उ हरि बिनु होरु न पूजउ मड़ै मसाणि न जाई ॥ त्रिसना राचि न पर घरि जावा त्रिसना नामि बुझाई ॥ घर भीतरि घरु गुरू दिखाइआ सहजि रते मन भाई ॥ तू आपे दाना आपे बीना तू देवहि मति साई ॥१॥

मनु बैरागि रतउ बैरागी सबदि मनु बेधिआ मेरी माई ॥ अंतरि जोति निरंतरि बाणी साचे साहिब सिउ लिव लाई ॥ रहाउ ॥

असंख बैरागी कहहि बैराग सो बैरागी जि खसमै भावै ॥ हिरदै सबदि सदा भै रचिआ गुर की कार कमावै ॥ एको चेतै मनूआ न डोलै धावतु वरजि रहावै ॥ सहजे माता सदा रंगि राता साचे के गुण गावै ॥२॥

मनूआ पउणु बिंदु सुखवासी नामि वसै सुख भाई ॥ जिहबा नेत्र सोत्र सचि राते जलि बूझी तुझहि बुझाई ॥ आस निरास रहै बैरागी निज घरि ताड़ी लाई ॥ भिखिआ नामि रजे संतोखी अम्रितु सहजि पीआई ॥३॥

दुबिधा विचि बैरागु न होवी जब लगु दूजी राई ॥ सभु जगु तेरा तू एको दाता अवरु न दूजा भाई ॥ मनमुखि जंत दुखि सदा निवासी गुरमुखि दे वडिआई ॥ अपर अपार अगम अगोचर कहणै कीम न पाई ॥४॥

सुंन समाधि महा परमारथु तीनि भवण पति नामं ॥ मसतकि लेखु जीआ जगि जोनी सिरि सिरि लेखु सहामं ॥ करम सुकरम कराए आपे आपे भगति द्रिड़ामं ॥ मनि मुखि जूठि लहै भै मानं आपे गिआनु अगामं ॥५॥

जिन चाखिआ सेई सादु जाणनि जिउ गुंगे मिठिआई ॥ अकथै का किआ कथीऐ भाई चालउ सदा रजाई ॥ गुरु दाता मेले ता मति होवै निगुरे मति न काई ॥ जिउ चलाए तिउ चालह भाई होर किआ को करे चतुराई ॥६॥

इकि भरमि भुलाए इकि भगती राते तेरा खेलु अपारा ॥ जितु तुधु लाए तेहा फलु पाइआ तू हुकमि चलावणहारा ॥ सेवा करी जे किछु होवै अपणा जीउ पिंडु तुमारा ॥ सतिगुरि मिलिऐ किरपा कीनी अम्रित नामु अधारा ॥७॥

गगनंतरि वासिआ गुण परगासिआ गुण महि गिआन धिआनं ॥ नामु मनि भावै कहै कहावै ततो ततु वखानं ॥ सबदु गुर पीरा गहिर ग्मभीरा बिनु सबदै जगु बउरानं ॥ पूरा बैरागी सहजि सुभागी सचु नानक मनु मानं ॥८॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 635) सोरठि महला १ तितुकी ॥
आसा मनसा बंधनी भाई करम धरम बंधकारी ॥ पापि पुंनि जगु जाइआ भाई बिनसै नामु विसारी ॥ इह माइआ जगि मोहणी भाई करम सभे वेकारी ॥१॥

सुणि पंडित करमा कारी ॥ जितु करमि सुखु ऊपजै भाई सु आतम ततु बीचारी ॥ रहाउ ॥

सासतु बेदु बकै खड़ो भाई करम करहु संसारी ॥ पाखंडि मैलु न चूकई भाई अंतरि मैलु विकारी ॥ इन बिधि डूबी माकुरी भाई ऊंडी सिर कै भारी ॥२॥

दुरमति घणी विगूती भाई दूजै भाइ खुआई ॥ बिनु सतिगुर नामु न पाईऐ भाई बिनु नामै भरमु न जाई ॥ सतिगुरु सेवे ता सुखु पाए भाई आवणु जाणु रहाई ॥३॥

साचु सहजु गुर ते ऊपजै भाई मनु निरमलु साचि समाई ॥ गुरु सेवे सो बूझै भाई गुर बिनु मगु न पाई ॥ जिसु अंतरि लोभु कि करम कमावै भाई कूड़ु बोलि बिखु खाई ॥४॥

पंडित दही विलोईऐ भाई विचहु निकलै तथु ॥ जलु मथीऐ जलु देखीऐ भाई इहु जगु एहा वथु ॥ गुर बिनु भरमि विगूचीऐ भाई घटि घटि देउ अलखु ॥५॥

इहु जगु तागो सूत को भाई दह दिस बाधो माइ ॥ बिनु गुर गाठि न छूटई भाई थाके करम कमाइ ॥ इहु जगु भरमि भुलाइआ भाई कहणा किछू न जाइ ॥६॥

गुर मिलिऐ भउ मनि वसै भाई भै मरणा सचु लेखु ॥ मजनु दानु चंगिआईआ भाई दरगह नामु विसेखु ॥ गुरु अंकसु जिनि नामु द्रिड़ाइआ भाई मनि वसिआ चूका भेखु ॥७॥

इहु तनु हाटु सराफ को भाई वखरु नामु अपारु ॥ इहु वखरु वापारी सो द्रिड़ै भाई गुर सबदि करे वीचारु ॥ धनु वापारी नानका भाई मेलि करे वापारु ॥८॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 636) सोरठि महला १ ॥
जिन्ही सतिगुरु सेविआ पिआरे तिन्ह के साथ तरे ॥ तिन्हा ठाक न पाईऐ पिआरे अम्रित रसन हरे ॥ बूडे भारे भै बिना पिआरे तारे नदरि करे ॥१॥

भी तूहै सालाहणा पिआरे भी तेरी सालाह ॥ विणु बोहिथ भै डुबीऐ पिआरे कंधी पाइ कहाह ॥१॥ रहाउ ॥

सालाही सालाहणा पिआरे दूजा अवरु न कोइ ॥ मेरे प्रभ सालाहनि से भले पिआरे सबदि रते रंगु होइ ॥ तिस की संगति जे मिलै पिआरे रसु लै ततु विलोइ ॥२॥

पति परवाना साच का पिआरे नामु सचा नीसाणु ॥ आइआ लिखि लै जावणा पिआरे हुकमी हुकमु पछाणु ॥ गुर बिनु हुकमु न बूझीऐ पिआरे साचे साचा ताणु ॥३॥

हुकमै अंदरि निमिआ पिआरे हुकमै उदर मझारि ॥ हुकमै अंदरि जमिआ पिआरे ऊधउ सिर कै भारि ॥ गुरमुखि दरगह जाणीऐ पिआरे चलै कारज सारि ॥४॥

हुकमै अंदरि आइआ पिआरे हुकमे जादो जाइ ॥ हुकमे बंन्हि चलाईऐ पिआरे मनमुखि लहै सजाइ ॥ हुकमे सबदि पछाणीऐ पिआरे दरगह पैधा जाइ ॥५॥

हुकमे गणत गणाईऐ पिआरे हुकमे हउमै दोइ ॥ हुकमे भवै भवाईऐ पिआरे अवगणि मुठी रोइ ॥ हुकमु सिञापै साह का पिआरे सचु मिलै वडिआई होइ ॥६॥

आखणि अउखा आखीऐ पिआरे किउ सुणीऐ सचु नाउ ॥ जिन्ही सो सालाहिआ पिआरे हउ तिन्ह बलिहारै जाउ ॥ नाउ मिलै संतोखीआं पिआरे नदरी मेलि मिलाउ ॥७॥

काइआ कागदु जे थीऐ पिआरे मनु मसवाणी धारि ॥ ललता लेखणि सच की पिआरे हरि गुण लिखहु वीचारि ॥ धनु लेखारी नानका पिआरे साचु लिखै उरि धारि ॥८॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 636) सोरठि महला १ पहिला दुतुकी ॥
तू गुणदातौ निरमलो भाई निरमलु ना मनु होइ ॥ हम अपराधी निरगुणे भाई तुझ ही ते गुणु सोइ ॥१॥

मेरे प्रीतमा तू करता करि वेखु ॥ हउ पापी पाखंडीआ भाई मनि तनि नाम विसेखु ॥ रहाउ ॥

बिखु माइआ चितु मोहिआ भाई चतुराई पति खोइ ॥ चित महि ठाकुरु सचि वसै भाई जे गुर गिआनु समोइ ॥२॥

रूड़ौ रूड़ौ आखीऐ भाई रूड़ौ लाल चलूलु ॥ जे मनु हरि सिउ बैरागीऐ भाई दरि घरि साचु अभूलु ॥३॥

पाताली आकासि तू भाई घरि घरि तू गुण गिआनु ॥ गुर मिलिऐ सुखु पाइआ भाई चूका मनहु गुमानु ॥४॥

जलि मलि काइआ माजीऐ भाई भी मैला तनु होइ ॥ गिआनि महा रसि नाईऐ भाई मनु तनु निरमलु होइ ॥५॥

देवी देवा पूजीऐ भाई किआ मागउ किआ देहि ॥ पाहणु नीरि पखालीऐ भाई जल महि बूडहि तेहि ॥६॥

गुर बिनु अलखु न लखीऐ भाई जगु बूडै पति खोइ ॥ मेरे ठाकुर हाथि वडाईआ भाई जै भावै तै देइ ॥७॥

बईअरि बोलै मीठुली भाई साचु कहै पिर भाइ ॥ बिरहै बेधी सचि वसी भाई अधिक रही हरि नाइ ॥८॥

सभु को आखै आपणा भाई गुर ते बुझै सुजानु ॥ जो बीधे से ऊबरे भाई सबदु सचा नीसानु ॥९॥

ईधनु अधिक सकेलीऐ भाई पावकु रंचक पाइ ॥ खिनु पलु नामु रिदै वसै भाई नानक मिलणु सुभाइ ॥१०॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 637) सोरठि महला ३ घरु १ तितुकी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भगता दी सदा तू रखदा हरि जीउ धुरि तू रखदा आइआ ॥ प्रहिलाद जन तुधु राखि लए हरि जीउ हरणाखसु मारि पचाइआ ॥ गुरमुखा नो परतीति है हरि जीउ मनमुख भरमि भुलाइआ ॥१॥

हरि जी एह तेरी वडिआई ॥ भगता की पैज रखु तू सुआमी भगत तेरी सरणाई ॥ रहाउ ॥

भगता नो जमु जोहि न साकै कालु न नेड़ै जाई ॥ केवल राम नामु मनि वसिआ नामे ही मुकति पाई ॥ रिधि सिधि सभ भगता चरणी लागी गुर कै सहजि सुभाई ॥२॥

मनमुखा नो परतीति न आवी अंतरि लोभ सुआउ ॥ गुरमुखि हिरदै सबदु न भेदिओ हरि नामि न लागा भाउ ॥ कूड़ कपट पाजु लहि जासी मनमुख फीका अलाउ ॥३॥

भगता विचि आपि वरतदा प्रभ जी भगती हू तू जाता ॥ माइआ मोह सभ लोक है तेरी तू एको पुरखु बिधाता ॥ हउमै मारि मनसा मनहि समाणी गुर कै सबदि पछाता ॥४॥

अचिंत कम करहि प्रभ तिन के जिन हरि का नामु पिआरा ॥ गुर परसादि सदा मनि वसिआ सभि काज सवारणहारा ॥ ओना की रीस करे सु विगुचै जिन हरि प्रभु है रखवारा ॥५॥

बिनु सतिगुर सेवे किनै न पाइआ मनमुखि भउकि मुए बिललाई ॥ आवहि जावहि ठउर न पावहि दुख महि दुखि समाई ॥ गुरमुखि होवै सु अम्रितु पीवै सहजे साचि समाई ॥६॥

बिनु सतिगुर सेवे जनमु न छोडै जे अनेक करम करै अधिकाई ॥ वेद पड़हि तै वाद वखाणहि बिनु हरि पति गवाई ॥ सचा सतिगुरु साची जिसु बाणी भजि छूटहि गुर सरणाई ॥७॥

जिन हरि मनि वसिआ से दरि साचे दरि साचै सचिआरा ॥ ओना दी सोभा जुगि जुगि होई कोइ न मेटणहारा ॥ नानक तिन कै सद बलिहारै जिन हरि राखिआ उरि धारा ॥८॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 638) सोरठि महला ३ दुतुकी ॥
निगुणिआ नो आपे बखसि लए भाई सतिगुर की सेवा लाइ ॥ सतिगुर की सेवा ऊतम है भाई राम नामि चितु लाइ ॥१॥

हरि जीउ आपे बखसि मिलाइ ॥ गुणहीण हम अपराधी भाई पूरै सतिगुरि लए रलाइ ॥ रहाउ ॥

कउण कउण अपराधी बखसिअनु पिआरे साचै सबदि वीचारि ॥ भउजलु पारि उतारिअनु भाई सतिगुर बेड़ै चाड़ि ॥२॥

मनूरै ते कंचन भए भाई गुरु पारसु मेलि मिलाइ ॥ आपु छोडि नाउ मनि वसिआ भाई जोती जोति मिलाइ ॥३॥

हउ वारी हउ वारणै भाई सतिगुर कउ सद बलिहारै जाउ ॥ नामु निधानु जिनि दिता भाई गुरमति सहजि समाउ ॥४॥

गुर बिनु सहजु न ऊपजै भाई पूछहु गिआनीआ जाइ ॥ सतिगुर की सेवा सदा करि भाई विचहु आपु गवाइ ॥५॥

गुरमती भउ ऊपजै भाई भउ करणी सचु सारु ॥ प्रेम पदारथु पाईऐ भाई सचु नामु आधारु ॥६॥

जो सतिगुरु सेवहि आपणा भाई तिन कै हउ लागउ पाइ ॥ जनमु सवारी आपणा भाई कुलु भी लई बखसाइ ॥७॥

सचु बाणी सचु सबदु है भाई गुर किरपा ते होइ ॥ नानक नामु हरि मनि वसै भाई तिसु बिघनु न लागै कोइ ॥८॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 639) सोरठि महला ३ ॥
हरि जीउ सबदे जापदा भाई पूरै भागि मिलाइ ॥ सदा सुखु सोहागणी भाई अनदिनु रतीआ रंगु लाइ ॥१॥

हरि जी तू आपे रंगु चड़ाइ ॥ गावहु गावहु रंगि रातिहो भाई हरि सेती रंगु लाइ ॥ रहाउ ॥

गुर की कार कमावणी भाई आपु छोडि चितु लाइ ॥ सदा सहजु फिरि दुखु न लगई भाई हरि आपि वसै मनि आइ ॥२॥

पिर का हुकमु न जाणई भाई सा कुलखणी कुनारि ॥ मनहठि कार कमावणी भाई विणु नावै कूड़िआरि ॥३॥

से गावहि जिन मसतकि भागु है भाई भाइ सचै बैरागु ॥ अनदिनु राते गुण रवहि भाई निरभउ गुर लिव लागु ॥४॥

सभना मारि जीवालदा भाई सो सेवहु दिनु राति ॥ सो किउ मनहु विसारीऐ भाई जिस दी वडी है दाति ॥५॥

मनमुखि मैली डुमणी भाई दरगह नाही थाउ ॥ गुरमुखि होवै त गुण रवै भाई मिलि प्रीतम साचि समाउ ॥६॥

एतु जनमि हरि न चेतिओ भाई किआ मुहु देसी जाइ ॥ किड़ी पवंदी मुहाइओनु भाई बिखिआ नो लोभाइ ॥७॥

नामु समालहि सुखि वसहि भाई सदा सुखु सांति सरीर ॥ नानक नामु समालि तू भाई अपर्मपर गुणी गहीर ॥८॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 639) सोरठि महला ५ घरु १ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सभु जगु जिनहि उपाइआ भाई करण कारण समरथु ॥ जीउ पिंडु जिनि साजिआ भाई दे करि अपणी वथु ॥ किनि कहीऐ किउ देखीऐ भाई करता एकु अकथु ॥ गुरु गोविंदु सलाहीऐ भाई जिस ते जापै तथु ॥१॥

मेरे मन जपीऐ हरि भगवंता ॥ नाम दानु देइ जन अपने दूख दरद का हंता ॥ रहाउ ॥

जा कै घरि सभु किछु है भाई नउ निधि भरे भंडार ॥ तिस की कीमति ना पवै भाई ऊचा अगम अपार ॥ जीअ जंत प्रतिपालदा भाई नित नित करदा सार ॥ सतिगुरु पूरा भेटीऐ भाई सबदि मिलावणहार ॥२॥

सचे चरण सरेवीअहि भाई भ्रमु भउ होवै नासु ॥ मिलि संत सभा मनु मांजीऐ भाई हरि कै नामि निवासु ॥ मिटै अंधेरा अगिआनता भाई कमल होवै परगासु ॥ गुर बचनी सुखु ऊपजै भाई सभि फल सतिगुर पासि ॥३॥

मेरा तेरा छोडीऐ भाई होईऐ सभ की धूरि ॥ घटि घटि ब्रहमु पसारिआ भाई पेखै सुणै हजूरि ॥ जितु दिनि विसरै पारब्रहमु भाई तितु दिनि मरीऐ झूरि ॥ करन करावन समरथो भाई सरब कला भरपूरि ॥४॥

प्रेम पदारथु नामु है भाई माइआ मोह बिनासु ॥ तिसु भावै ता मेलि लए भाई हिरदै नाम निवासु ॥ गुरमुखि कमलु प्रगासीऐ भाई रिदै होवै परगासु ॥ प्रगटु भइआ परतापु प्रभ भाई मउलिआ धरति अकासु ॥५॥

गुरि पूरै संतोखिआ भाई अहिनिसि लागा भाउ ॥ रसना रामु रवै सदा भाई साचा सादु सुआउ ॥ करनी सुणि सुणि जीविआ भाई निहचलु पाइआ थाउ ॥ जिसु परतीति न आवई भाई सो जीअड़ा जलि जाउ ॥६॥

बहु गुण मेरे साहिबै भाई हउ तिस कै बलि जाउ ॥ ओहु निरगुणीआरे पालदा भाई देइ निथावे थाउ ॥ रिजकु स्मबाहे सासि सासि भाई गूड़ा जा का नाउ ॥ जिसु गुरु साचा भेटीऐ भाई पूरा तिसु करमाउ ॥७॥

तिसु बिनु घड़ी न जीवीऐ भाई सरब कला भरपूरि ॥ सासि गिरासि न विसरै भाई पेखउ सदा हजूरि ॥ साधू संगि मिलाइआ भाई सरब रहिआ भरपूरि ॥ जिना प्रीति न लगीआ भाई से नित नित मरदे झूरि ॥८॥

अंचलि लाइ तराइआ भाई भउजलु दुखु संसारु ॥ करि किरपा नदरि निहालिआ भाई कीतोनु अंगु अपारु ॥ मनु तनु सीतलु होइआ भाई भोजनु नाम अधारु ॥ नानक तिसु सरणागती भाई जि किलबिख काटणहारु ॥९॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 640) सोरठि महला ५ ॥
मात गरभ दुख सागरो पिआरे तह अपणा नामु जपाइआ ॥ बाहरि काढि बिखु पसरीआ पिआरे माइआ मोहु वधाइआ ॥ जिस नो कीतो करमु आपि पिआरे तिसु पूरा गुरू मिलाइआ ॥ सो आराधे सासि सासि पिआरे राम नाम लिव लाइआ ॥१॥

मनि तनि तेरी टेक है पिआरे मनि तनि तेरी टेक ॥ तुधु बिनु अवरु न करनहारु पिआरे अंतरजामी एक ॥ रहाउ ॥

कोटि जनम भ्रमि आइआ पिआरे अनिक जोनि दुखु पाइ ॥ साचा साहिबु विसरिआ पिआरे बहुती मिलै सजाइ ॥ जिन भेटै पूरा सतिगुरू पिआरे से लागे साचै नाइ ॥ तिना पिछै छुटीऐ पिआरे जो साची सरणाइ ॥२॥

मिठा करि कै खाइआ पिआरे तिनि तनि कीता रोगु ॥ कउड़ा होइ पतिसटिआ पिआरे तिस ते उपजिआ सोगु ॥ भोग भुंचाइ भुलाइअनु पिआरे उतरै नही विजोगु ॥ जो गुर मेलि उधारिआ पिआरे तिन धुरे पइआ संजोगु ॥३॥

माइआ लालचि अटिआ पिआरे चिति न आवहि मूलि ॥ जिन तू विसरहि पारब्रहम सुआमी से तन होए धूड़ि ॥ बिललाट करहि बहुतेरिआ पिआरे उतरै नाही सूलु ॥ जो गुर मेलि सवारिआ पिआरे तिन का रहिआ मूलु ॥४॥

साकत संगु न कीजई पिआरे जे का पारि वसाइ ॥ जिसु मिलिऐ हरि विसरै पिआरे सो मुहि कालै उठि जाइ ॥ मनमुखि ढोई नह मिलै पिआरे दरगह मिलै सजाइ ॥ जो गुर मेलि सवारिआ पिआरे तिना पूरी पाइ ॥५॥

संजम सहस सिआणपा पिआरे इक न चली नालि ॥ जो बेमुख गोबिंद ते पिआरे तिन कुलि लागै गालि ॥ होदी वसतु न जातीआ पिआरे कूड़ु न चली नालि ॥ सतिगुरु जिना मिलाइओनु पिआरे साचा नामु समालि ॥६॥

सतु संतोखु गिआनु धिआनु पिआरे जिस नो नदरि करे ॥ अनदिनु कीरतनु गुण रवै पिआरे अम्रिति पूर भरे ॥ दुख सागरु तिन लंघिआ पिआरे भवजलु पारि परे ॥ जिसु भावै तिसु मेलि लैहि पिआरे सेई सदा खरे ॥७॥

सम्रथ पुरखु दइआल देउ पिआरे भगता तिस का ताणु ॥ तिसु सरणाई ढहि पए पिआरे जि अंतरजामी जाणु ॥ हलतु पलतु सवारिआ पिआरे मसतकि सचु नीसाणु ॥ सो प्रभु कदे न वीसरै पिआरे नानक सद कुरबाणु ॥८॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 641) सोरठि महला ५ घरु २ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पाठु पड़िओ अरु बेदु बीचारिओ निवलि भुअंगम साधे ॥ पंच जना सिउ संगु न छुटकिओ अधिक अह्मबुधि बाधे ॥१॥

पिआरे इन बिधि मिलणु न जाई मै कीए करम अनेका ॥ हारि परिओ सुआमी कै दुआरै दीजै बुधि बिबेका ॥ रहाउ ॥

मोनि भइओ करपाती रहिओ नगन फिरिओ बन माही ॥ तट तीरथ सभ धरती भ्रमिओ दुबिधा छुटकै नाही ॥२॥

मन कामना तीरथ जाइ बसिओ सिरि करवत धराए ॥ मन की मैलु न उतरै इह बिधि जे लख जतन कराए ॥३॥

कनिक कामिनी हैवर गैवर बहु बिधि दानु दातारा ॥ अंन बसत्र भूमि बहु अरपे नह मिलीऐ हरि दुआरा ॥४॥

पूजा अरचा बंदन डंडउत खटु करमा रतु रहता ॥ हउ हउ करत बंधन महि परिआ नह मिलीऐ इह जुगता ॥५॥

जोग सिध आसण चउरासीह ए भी करि करि रहिआ ॥ वडी आरजा फिरि फिरि जनमै हरि सिउ संगु न गहिआ ॥६॥

राज लीला राजन की रचना करिआ हुकमु अफारा ॥ सेज सोहनी चंदनु चोआ नरक घोर का दुआरा ॥७॥

हरि कीरति साधसंगति है सिरि करमन कै करमा ॥ कहु नानक तिसु भइओ परापति जिसु पुरब लिखे का लहना ॥८॥

तेरो सेवकु इह रंगि माता ॥ भइओ क्रिपालु दीन दुख भंजनु हरि हरि कीरतनि इहु मनु राता ॥ रहाउ दूजा ॥१॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 642) रागु सोरठि वार महले ४ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
(गुरू नानक देव जी -- SGGS 642) सलोकु मः १ ॥
सोरठि सदा सुहावणी जे सचा मनि होइ ॥ दंदी मैलु न कतु मनि जीभै सचा सोइ ॥ ससुरै पेईऐ भै वसी सतिगुरु सेवि निसंग ॥ परहरि कपड़ु जे पिर मिलै खुसी रावै पिरु संगि ॥ सदा सीगारी नाउ मनि कदे न मैलु पतंगु ॥ देवर जेठ मुए दुखि ससू का डरु किसु ॥ जे पिर भावै नानका करम मणी सभु सचु ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 642) मः ४ ॥
सोरठि तामि सुहावणी जा हरि नामु ढंढोले ॥ गुर पुरखु मनावै आपणा गुरमती हरि हरि बोले ॥ हरि प्रेमि कसाई दिनसु राति हरि रती हरि रंगि चोले ॥ हरि जैसा पुरखु न लभई सभु देखिआ जगतु मै टोले ॥ गुरि सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ मनु अनत न काहू डोले ॥ जनु नानकु हरि का दासु है गुर सतिगुर के गोल गोले ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 642) पउड़ी ॥
तू आपे सिसटि करता सिरजणहारिआ ॥ तुधु आपे खेलु रचाइ तुधु आपि सवारिआ ॥ दाता करता आपि आपि भोगणहारिआ ॥ सभु तेरा सबदु वरतै उपावणहारिआ ॥ हउ गुरमुखि सदा सलाही गुर कउ वारिआ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 643) सलोकु मः ३ ॥
हउमै जलते जलि मुए भ्रमि आए दूजै भाइ ॥ पूरै सतिगुरि राखि लीए आपणै पंनै पाइ ॥ इहु जगु जलता नदरी आइआ गुर कै सबदि सुभाइ ॥ सबदि रते से सीतल भए नानक सचु कमाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 643) मः ३ ॥
सफलिओ सतिगुरु सेविआ धंनु जनमु परवाणु ॥ जिना सतिगुरु जीवदिआ मुइआ न विसरै सेई पुरख सुजाण ॥ कुलु उधारे आपणा सो जनु होवै परवाणु ॥ गुरमुखि मुए जीवदे परवाणु हहि मनमुख जनमि मराहि ॥ नानक मुए न आखीअहि जि गुर कै सबदि समाहि ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 643) पउड़ी ॥
हरि पुरखु निरंजनु सेवि हरि नामु धिआईऐ ॥ सतसंगति साधू लगि हरि नामि समाईऐ ॥ हरि तेरी वडी कार मै मूरख लाईऐ ॥ हउ गोला लाला तुधु मै हुकमु फुरमाईऐ ॥ हउ गुरमुखि कार कमावा जि गुरि समझाईऐ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 643) सलोकु मः ३ ॥
पूरबि लिखिआ कमावणा जि करतै आपि लिखिआसु ॥ मोह ठगउली पाईअनु विसरिआ गुणतासु ॥ मतु जाणहु जगु जीवदा दूजै भाइ मुइआसु ॥ जिनी गुरमुखि नामु न चेतिओ से बहणि न मिलनी पासि ॥ दुखु लागा बहु अति घणा पुतु कलतु न साथि कोई जासि ॥ लोका विचि मुहु काला होआ अंदरि उभे सास ॥ मनमुखा नो को न विसही चुकि गइआ वेसासु ॥ नानक गुरमुखा नो सुखु अगला जिना अंतरि नाम निवासु ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 643) मः ३ ॥
से सैण से सजणा जि गुरमुखि मिलहि सुभाइ ॥ सतिगुर का भाणा अनदिनु करहि से सचि रहे समाइ ॥ दूजै भाइ लगे सजण न आखीअहि जि अभिमानु करहि वेकार ॥ मनमुख आप सुआरथी कारजु न सकहि सवारि ॥ नानक पूरबि लिखिआ कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 643) पउड़ी ॥
तुधु आपे जगतु उपाइ कै आपि खेलु रचाइआ ॥ त्रै गुण आपि सिरजिआ माइआ मोहु वधाइआ ॥ विचि हउमै लेखा मंगीऐ फिरि आवै जाइआ ॥ जिना हरि आपि क्रिपा करे से गुरि समझाइआ ॥ बलिहारी गुर आपणे सदा सदा घुमाइआ ॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 643) सलोकु मः ३ ॥
माइआ ममता मोहणी जिनि विणु दंता जगु खाइआ ॥ मनमुख खाधे गुरमुखि उबरे जिनी सचि नामि चितु लाइआ ॥ बिनु नावै जगु कमला फिरै गुरमुखि नदरी आइआ ॥ धंधा करतिआ निहफलु जनमु गवाइआ सुखदाता मनि न वसाइआ ॥ नानक नामु तिना कउ मिलिआ जिन कउ धुरि लिखि पाइआ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 644) मः ३ ॥
घर ही महि अम्रितु भरपूरु है मनमुखा सादु न पाइआ ॥ जिउ कसतूरी मिरगु न जाणै भ्रमदा भरमि भुलाइआ ॥ अम्रितु तजि बिखु संग्रहै करतै आपि खुआइआ ॥ गुरमुखि विरले सोझी पई तिना अंदरि ब्रहमु दिखाइआ ॥ तनु मनु सीतलु होइआ रसना हरि सादु आइआ ॥ सबदे ही नाउ ऊपजै सबदे मेलि मिलाइआ ॥ बिनु सबदै सभु जगु बउराना बिरथा जनमु गवाइआ ॥ अम्रितु एको सबदु है नानक गुरमुखि पाइआ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 644) पउड़ी ॥
सो हरि पुरखु अगमु है कहु कितु बिधि पाईऐ ॥ तिसु रूपु न रेख अद्रिसटु कहु जन किउ धिआईऐ ॥ निरंकारु निरंजनु हरि अगमु किआ कहि गुण गाईऐ ॥ जिसु आपि बुझाए आपि सु हरि मारगि पाईऐ ॥ गुरि पूरै वेखालिआ गुर सेवा पाईऐ ॥४॥


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