Pt 3 - राग सोरठि - बाणी शब्द, Part 3 - Raag Sorath - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 619) सोरठि महला ५ ॥
हमरी गणत न गणीआ काई अपणा बिरदु पछाणि ॥ हाथ देइ राखे करि अपुने सदा सदा रंगु माणि ॥१॥

साचा साहिबु सद मिहरवाण ॥ बंधु पाइआ मेरै सतिगुरि पूरै होई सरब कलिआण ॥ रहाउ ॥

जीउ पाइ पिंडु जिनि साजिआ दिता पैनणु खाणु ॥ अपणे दास की आपि पैज राखी नानक सद कुरबाणु ॥२॥१६॥४४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 620) सोरठि महला ५ ॥
दुरतु गवाइआ हरि प्रभि आपे सभु संसारु उबारिआ ॥ पारब्रहमि प्रभि किरपा धारी अपणा बिरदु समारिआ ॥१॥

होई राजे राम की रखवाली ॥ सूख सहज आनद गुण गावहु मनु तनु देह सुखाली ॥ रहाउ ॥

पतित उधारणु सतिगुरु मेरा मोहि तिस का भरवासा ॥ बखसि लए सभि सचै साहिबि सुणि नानक की अरदासा ॥२॥१७॥४५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 620) सोरठि महला ५ ॥
बखसिआ पारब्रहम परमेसरि सगले रोग बिदारे ॥ गुर पूरे की सरणी उबरे कारज सगल सवारे ॥१॥

हरि जनि सिमरिआ नाम अधारि ॥ तापु उतारिआ सतिगुरि पूरै अपणी किरपा धारि ॥ रहाउ ॥

सदा अनंद करह मेरे पिआरे हरि गोविदु गुरि राखिआ ॥ वडी वडिआई नानक करते की साचु सबदु सति भाखिआ ॥२॥१८॥४६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 620) सोरठि महला ५ ॥
भए क्रिपाल सुआमी मेरे तितु साचै दरबारि ॥ सतिगुरि तापु गवाइआ भाई ठांढि पई संसारि ॥ अपणे जीअ जंत आपे राखे जमहि कीओ हटतारि ॥१॥

हरि के चरण रिदै उरि धारि ॥ सदा सदा प्रभु सिमरीऐ भाई दुख किलबिख काटणहारु ॥१॥ रहाउ ॥

तिस की सरणी ऊबरै भाई जिनि रचिआ सभु कोइ ॥ करण कारण समरथु सो भाई सचै सची सोइ ॥ नानक प्रभू धिआईऐ भाई मनु तनु सीतलु होइ ॥२॥१९॥४७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 620) सोरठि महला ५ ॥
संतहु हरि हरि नामु धिआई ॥ सुख सागर प्रभु विसरउ नाही मन चिंदिअड़ा फलु पाई ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुरि पूरै तापु गवाइआ अपणी किरपा धारी ॥ पारब्रहम प्रभ भए दइआला दुखु मिटिआ सभ परवारी ॥१॥

सरब निधान मंगल रस रूपा हरि का नामु अधारो ॥ नानक पति राखी परमेसरि उधरिआ सभु संसारो ॥२॥२०॥४८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 620) सोरठि महला ५ ॥
मेरा सतिगुरु रखवाला होआ ॥ धारि क्रिपा प्रभ हाथ दे राखिआ हरि गोविदु नवा निरोआ ॥१॥ रहाउ ॥

तापु गइआ प्रभि आपि मिटाइआ जन की लाज रखाई ॥ साधसंगति ते सभ फल पाए सतिगुर कै बलि जांई ॥१॥

हलतु पलतु प्रभ दोवै सवारे हमरा गुणु अवगुणु न बीचारिआ ॥ अटल बचनु नानक गुर तेरा सफल करु मसतकि धारिआ ॥२॥२१॥४९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 621) सोरठि महला ५ ॥
जीअ जंत्र सभि तिस के कीए सोई संत सहाई ॥ अपुने सेवक की आपे राखै पूरन भई बडाई ॥१॥

पारब्रहमु पूरा मेरै नालि ॥ गुरि पूरै पूरी सभ राखी होए सरब दइआल ॥१॥ रहाउ ॥

अनदिनु नानकु नामु धिआए जीअ प्रान का दाता ॥ अपुने दास कउ कंठि लाइ राखै जिउ बारिक पित माता ॥२॥२२॥५०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 621) सोरठि महला ५ घरु ३ चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मिलि पंचहु नही सहसा चुकाइआ ॥ सिकदारहु नह पतीआइआ ॥ उमरावहु आगै झेरा ॥ मिलि राजन राम निबेरा ॥१॥

अब ढूढन कतहु न जाई ॥ गोबिद भेटे गुर गोसाई ॥ रहाउ ॥

आइआ प्रभ दरबारा ॥ ता सगली मिटी पूकारा ॥ लबधि आपणी पाई ॥ ता कत आवै कत जाई ॥२॥

तह साच निआइ निबेरा ॥ ऊहा सम ठाकुरु सम चेरा ॥ अंतरजामी जानै ॥ बिनु बोलत आपि पछानै ॥३॥

सरब थान को राजा ॥ तह अनहद सबद अगाजा ॥ तिसु पहि किआ चतुराई ॥ मिलु नानक आपु गवाई ॥४॥१॥५१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 621) सोरठि महला ५ ॥
हिरदै नामु वसाइहु ॥ घरि बैठे गुरू धिआइहु ॥ गुरि पूरै सचु कहिआ ॥ सो सुखु साचा लहिआ ॥१॥

अपुना होइओ गुरु मिहरवाना ॥ अनद सूख कलिआण मंगल सिउ घरि आए करि इसनाना ॥ रहाउ ॥

साची गुर वडिआई ॥ ता की कीमति कहणु न जाई ॥ सिरि साहा पातिसाहा ॥ गुर भेटत मनि ओमाहा ॥२॥

सगल पराछत लाथे ॥ मिलि साधसंगति कै साथे ॥ गुण निधान हरि नामा ॥ जपि पूरन होए कामा ॥३॥

गुरि कीनो मुकति दुआरा ॥ सभ स्रिसटि करै जैकारा ॥ नानक प्रभु मेरै साथे ॥ जनम मरण भै लाथे ॥४॥२॥५२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 621) सोरठि महला ५ ॥
गुरि पूरै किरपा धारी ॥ प्रभि पूरी लोच हमारी ॥ करि इसनानु ग्रिहि आए ॥ अनद मंगल सुख पाए ॥१॥

संतहु राम नामि निसतरीऐ ॥ ऊठत बैठत हरि हरि धिआईऐ अनदिनु सुक्रितु करीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

संत का मारगु धरम की पउड़ी को वडभागी पाए ॥ कोटि जनम के किलबिख नासे हरि चरणी चितु लाए ॥२॥

उसतति करहु सदा प्रभ अपने जिनि पूरी कल राखी ॥ जीअ जंत सभि भए पवित्रा सतिगुर की सचु साखी ॥३॥

बिघन बिनासन सभि दुख नासन सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ ॥ खोए पाप भए सभि पावन जन नानक सुखि घरि आइआ ॥४॥३॥५३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 622) सोरठि महला ५ ॥
साहिबु गुनी गहेरा ॥ घरु लसकरु सभु तेरा ॥ रखवाले गुर गोपाला ॥ सभि जीअ भए दइआला ॥१॥

जपि अनदि रहउ गुर चरणा ॥ भउ कतहि नही प्रभ सरणा ॥ रहाउ ॥

तेरिआ दासा रिदै मुरारी ॥ प्रभि अबिचल नीव उसारी ॥ बलु धनु तकीआ तेरा ॥ तू भारो ठाकुरु मेरा ॥२॥

जिनि जिनि साधसंगु पाइआ ॥ सो प्रभि आपि तराइआ ॥ करि किरपा नाम रसु दीआ ॥ कुसल खेम सभ थीआ ॥३॥

होए प्रभू सहाई ॥ सभ उठि लागी पाई ॥ सासि सासि प्रभु धिआईऐ ॥ हरि मंगलु नानक गाईऐ ॥४॥४॥५४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 622) सोरठि महला ५ ॥
सूख सहज आनंदा ॥ प्रभु मिलिओ मनि भावंदा ॥ पूरै गुरि किरपा धारी ॥ ता गति भई हमारी ॥१॥

हरि की प्रेम भगति मनु लीना ॥ नित बाजे अनहत बीना ॥ रहाउ ॥

हरि चरण की ओट सताणी ॥ सभ चूकी काणि लोकाणी ॥ जगजीवनु दाता पाइआ ॥ हरि रसकि रसकि गुण गाइआ ॥२॥

प्रभ काटिआ जम का फासा ॥ मन पूरन होई आसा ॥ जह पेखा तह सोई ॥ हरि प्रभ बिनु अवरु न कोई ॥३॥

करि किरपा प्रभि राखे ॥ सभि जनम जनम दुख लाथे ॥ निरभउ नामु धिआइआ ॥ अटल सुखु नानक पाइआ ॥४॥५॥५५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 622) सोरठि महला ५ ॥
ठाढि पाई करतारे ॥ तापु छोडि गइआ परवारे ॥ गुरि पूरै है राखी ॥ सरणि सचे की ताकी ॥१॥

परमेसरु आपि होआ रखवाला ॥ सांति सहज सुख खिन महि उपजे मनु होआ सदा सुखाला ॥ रहाउ ॥

हरि हरि नामु दीओ दारू ॥ तिनि सगला रोगु बिदारू ॥ अपणी किरपा धारी ॥ तिनि सगली बात सवारी ॥२॥

प्रभि अपना बिरदु समारिआ ॥ हमरा गुणु अवगुणु न बीचारिआ ॥ गुर का सबदु भइओ साखी ॥ तिनि सगली लाज राखी ॥३॥

बोलाइआ बोली तेरा ॥ तू साहिबु गुणी गहेरा ॥ जपि नानक नामु सचु साखी ॥ अपुने दास की पैज राखी ॥४॥६॥५६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 623) सोरठि महला ५ ॥
विचि करता पुरखु खलोआ ॥ वालु न विंगा होआ ॥ मजनु गुर आंदा रासे ॥ जपि हरि हरि किलविख नासे ॥१॥

संतहु रामदास सरोवरु नीका ॥ जो नावै सो कुलु तरावै उधारु होआ है जी का ॥१॥ रहाउ ॥

जै जै कारु जगु गावै ॥ मन चिंदिअड़े फल पावै ॥ सही सलामति नाइ आए ॥ अपणा प्रभू धिआए ॥२॥

संत सरोवर नावै ॥ सो जनु परम गति पावै ॥ मरै न आवै जाई ॥ हरि हरि नामु धिआई ॥३॥

इहु ब्रहम बिचारु सु जानै ॥ जिसु दइआलु होइ भगवानै ॥ बाबा नानक प्रभ सरणाई ॥ सभ चिंता गणत मिटाई ॥४॥७॥५७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 623) सोरठि महला ५ ॥
पारब्रहमि निबाही पूरी ॥ काई बात न रहीआ ऊरी ॥ गुरि चरन लाइ निसतारे ॥ हरि हरि नामु सम्हारे ॥१॥

अपने दास का सदा रखवाला ॥ करि किरपा अपुने करि राखे मात पिता जिउ पाला ॥१॥ रहाउ ॥

वडभागी सतिगुरु पाइआ ॥ जिनि जम का पंथु मिटाइआ ॥ हरि भगति भाइ चितु लागा ॥ जपि जीवहि से वडभागा ॥२॥

हरि अम्रित बाणी गावै ॥ साधा की धूरी नावै ॥ अपुना नामु आपे दीआ ॥ प्रभ करणहार रखि लीआ ॥३॥

हरि दरसन प्रान अधारा ॥ इहु पूरन बिमल बीचारा ॥ करि किरपा अंतरजामी ॥ दास नानक सरणि सुआमी ॥४॥८॥५८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 623) सोरठि महला ५ ॥
गुरि पूरै चरनी लाइआ ॥ हरि संगि सहाई पाइआ ॥ जह जाईऐ तहा सुहेले ॥ करि किरपा प्रभि मेले ॥१॥

हरि गुण गावहु सदा सुभाई ॥ मन चिंदे सगले फल पावहु जीअ कै संगि सहाई ॥१॥ रहाउ ॥

नाराइण प्राण अधारा ॥ हम संत जनां रेनारा ॥ पतित पुनीत करि लीने ॥ करि किरपा हरि जसु दीने ॥२॥

पारब्रहमु करे प्रतिपाला ॥ सद जीअ संगि रखवाला ॥ हरि दिनु रैनि कीरतनु गाईऐ ॥ बहुड़ि न जोनी पाईऐ ॥३॥

जिसु देवै पुरखु बिधाता ॥ हरि रसु तिन ही जाता ॥ जमकंकरु नेड़ि न आइआ ॥ सुखु नानक सरणी पाइआ ॥४॥९॥५९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 624) सोरठि महला ५ ॥
गुरि पूरै कीती पूरी ॥ प्रभु रवि रहिआ भरपूरी ॥ खेम कुसल भइआ इसनाना ॥ पारब्रहम विटहु कुरबाना ॥१॥

गुर के चरन कवल रिद धारे ॥ बिघनु न लागै तिल का कोई कारज सगल सवारे ॥१॥ रहाउ ॥

मिलि साधू दुरमति खोए ॥ पतित पुनीत सभ होए ॥ रामदासि सरोवर नाते ॥ सभ लाथे पाप कमाते ॥२॥

गुन गोबिंद नित गाईऐ ॥ साधसंगि मिलि धिआईऐ ॥ मन बांछत फल पाए ॥ गुरु पूरा रिदै धिआए ॥३॥

गुर गोपाल आनंदा ॥ जपि जपि जीवै परमानंदा ॥ जन नानक नामु धिआइआ ॥ प्रभ अपना बिरदु रखाइआ ॥४॥१०॥६०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 624) रागु सोरठि महला ५ ॥
दह दिस छत्र मेघ घटा घट दामनि चमकि डराइओ ॥ सेज इकेली नीद नहु नैनह पिरु परदेसि सिधाइओ ॥१॥

हुणि नही संदेसरो माइओ ॥ एक कोसरो सिधि करत लालु तब चतुर पातरो आइओ ॥ रहाउ ॥

किउ बिसरै इहु लालु पिआरो सरब गुणा सुखदाइओ ॥ मंदरि चरि कै पंथु निहारउ नैन नीरि भरि आइओ ॥२॥

हउ हउ भीति भइओ है बीचो सुनत देसि निकटाइओ ॥ भांभीरी के पात परदो बिनु पेखे दूराइओ ॥३॥

भइओ किरपालु सरब को ठाकुरु सगरो दूखु मिटाइओ ॥ कहु नानक हउमै भीति गुरि खोई तउ दइआरु बीठलो पाइओ ॥४॥

सभु रहिओ अंदेसरो माइओ ॥ जो चाहत सो गुरू मिलाइओ ॥ सरब गुना निधि राइओ ॥ रहाउ दूजा ॥११॥६१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 624) सोरठि महला ५ ॥
गई बहोड़ु बंदी छोड़ु निरंकारु दुखदारी ॥ करमु न जाणा धरमु न जाणा लोभी माइआधारी ॥ नामु परिओ भगतु गोविंद का इह राखहु पैज तुमारी ॥१॥

हरि जीउ निमाणिआ तू माणु ॥ निचीजिआ चीज करे मेरा गोविंदु तेरी कुदरति कउ कुरबाणु ॥ रहाउ ॥

जैसा बालकु भाइ सुभाई लख अपराध कमावै ॥ करि उपदेसु झिड़के बहु भाती बहुड़ि पिता गलि लावै ॥ पिछले अउगुण बखसि लए प्रभु आगै मारगि पावै ॥२॥

हरि अंतरजामी सभ बिधि जाणै ता किसु पहि आखि सुणाईऐ ॥ कहणै कथनि न भीजै गोबिंदु हरि भावै पैज रखाईऐ ॥ अवर ओट मै सगली देखी इक तेरी ओट रहाईऐ ॥३॥

होइ दइआलु किरपालु प्रभु ठाकुरु आपे सुणै बेनंती ॥ पूरा सतगुरु मेलि मिलावै सभ चूकै मन की चिंती ॥ हरि हरि नामु अवखदु मुखि पाइआ जन नानक सुखि वसंती ॥४॥१२॥६२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 625) सोरठि महला ५ ॥
सिमरि सिमरि प्रभ भए अनंदा दुख कलेस सभि नाठे ॥ गुन गावत धिआवत प्रभु अपना कारज सगले सांठे ॥१॥

जगजीवन नामु तुमारा ॥ गुर पूरे दीओ उपदेसा जपि भउजलु पारि उतारा ॥ रहाउ ॥

तूहै मंत्री सुनहि प्रभ तूहै सभु किछु करणैहारा ॥ तू आपे दाता आपे भुगता किआ इहु जंतु विचारा ॥२॥

किआ गुण तेरे आखि वखाणी कीमति कहणु न जाई ॥ पेखि पेखि जीवै प्रभु अपना अचरजु तुमहि वडाई ॥३॥

धारि अनुग्रहु आपि प्रभ स्वामी पति मति कीनी पूरी ॥ सदा सदा नानक बलिहारी बाछउ संता धूरी ॥४॥१३॥६३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 625) सोरठि मः ५ ॥
गुरु पूरा नमसकारे ॥ प्रभि सभे काज सवारे ॥ हरि अपणी किरपा धारी ॥ प्रभ पूरन पैज सवारी ॥१॥

अपने दास को भइओ सहाई ॥ सगल मनोरथ कीने करतै ऊणी बात न काई ॥ रहाउ ॥

करतै पुरखि तालु दिवाइआ ॥ पिछै लगि चली माइआ ॥ तोटि न कतहू आवै ॥ मेरे पूरे सतगुर भावै ॥२॥

सिमरि सिमरि दइआला ॥ सभि जीअ भए किरपाला ॥ जै जै कारु गुसाई ॥ जिनि पूरी बणत बणाई ॥३॥

तू भारो सुआमी मोरा ॥ इहु पुंनु पदारथु तेरा ॥ जन नानक एकु धिआइआ ॥ सरब फला पुंनु पाइआ ॥४॥१४॥६४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 625) सोरठि महला ५ घरु ३ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रामदास सरोवरि नाते ॥ सभि उतरे पाप कमाते ॥ निरमल होए करि इसनाना ॥ गुरि पूरै कीने दाना ॥१॥

सभि कुसल खेम प्रभि धारे ॥ सही सलामति सभि थोक उबारे गुर का सबदु वीचारे ॥ रहाउ ॥

साधसंगि मलु लाथी ॥ पारब्रहमु भइओ साथी ॥ नानक नामु धिआइआ ॥ आदि पुरख प्रभु पाइआ ॥२॥१॥६५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 625) सोरठि महला ५ ॥
जितु पारब्रहमु चिति आइआ ॥ सो घरु दयि वसाइआ ॥ सुख सागरु गुरु पाइआ ॥ ता सहसा सगल मिटाइआ ॥१॥

हरि के नाम की वडिआई ॥ आठ पहर गुण गाई ॥ गुर पूरे ते पाई ॥ रहाउ ॥

प्रभ की अकथ कहाणी ॥ जन बोलहि अम्रित बाणी ॥ नानक दास वखाणी ॥ गुर पूरे ते जाणी ॥२॥२॥६६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 626) सोरठि महला ५ ॥
आगै सुखु गुरि दीआ ॥ पाछै कुसल खेम गुरि कीआ ॥ सरब निधान सुख पाइआ ॥ गुरु अपुना रिदै धिआइआ ॥१॥

अपने सतिगुर की वडिआई ॥ मन इछे फल पाई ॥ संतहु दिनु दिनु चड़ै सवाई ॥ रहाउ ॥

जीअ जंत सभि भए दइआला प्रभि अपने करि दीने ॥ सहज सुभाइ मिले गोपाला नानक साचि पतीने ॥२॥३॥६७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 626) सोरठि महला ५ ॥
गुर का सबदु रखवारे ॥ चउकी चउगिरद हमारे ॥ राम नामि मनु लागा ॥ जमु लजाइ करि भागा ॥१॥

प्रभ जी तू मेरो सुखदाता ॥ बंधन काटि करे मनु निरमलु पूरन पुरखु बिधाता ॥ रहाउ ॥

नानक प्रभु अबिनासी ॥ ता की सेव न बिरथी जासी ॥ अनद करहि तेरे दासा ॥ जपि पूरन होई आसा ॥२॥४॥६८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 626) सोरठि महला ५ ॥
गुर अपुने बलिहारी ॥ जिनि पूरन पैज सवारी ॥ मन चिंदिआ फलु पाइआ ॥ प्रभु अपुना सदा धिआइआ ॥१॥

संतहु तिसु बिनु अवरु न कोई ॥ करण कारण प्रभु सोई ॥ रहाउ ॥

प्रभि अपनै वर दीने ॥ सगल जीअ वसि कीने ॥ जन नानक नामु धिआइआ ॥ ता सगले दूख मिटाइआ ॥२॥५॥६९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 626) सोरठि महला ५ ॥
तापु गवाइआ गुरि पूरे ॥ वाजे अनहद तूरे ॥ सरब कलिआण प्रभि कीने ॥ करि किरपा आपि दीने ॥१॥

बेदन सतिगुरि आपि गवाई ॥ सिख संत सभि सरसे होए हरि हरि नामु धिआई ॥ रहाउ ॥

जो मंगहि सो लेवहि ॥ प्रभ अपणिआ संता देवहि ॥ हरि गोविदु प्रभि राखिआ ॥ जन नानक साचु सुभाखिआ ॥२॥६॥७०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 626) सोरठि महला ५ ॥
सोई कराइ जो तुधु भावै ॥ मोहि सिआणप कछू न आवै ॥ हम बारिक तउ सरणाई ॥ प्रभि आपे पैज रखाई ॥१॥

मेरा मात पिता हरि राइआ ॥ करि किरपा प्रतिपालण लागा करीं तेरा कराइआ ॥ रहाउ ॥

जीअ जंत तेरे धारे ॥ प्रभ डोरी हाथि तुमारे ॥ जि करावै सो करणा ॥ नानक दास तेरी सरणा ॥२॥७॥७१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 627) सोरठि महला ५ ॥
हरि नामु रिदै परोइआ ॥ सभु काजु हमारा होइआ ॥ प्रभ चरणी मनु लागा ॥ पूरन जा के भागा ॥१॥

मिलि साधसंगि हरि धिआइआ ॥ आठ पहर अराधिओ हरि हरि मन चिंदिआ फलु पाइआ ॥ रहाउ ॥

परा पूरबला अंकुरु जागिआ ॥ राम नामि मनु लागिआ ॥ मनि तनि हरि दरसि समावै ॥ नानक दास सचे गुण गावै ॥२॥८॥७२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 627) सोरठि महला ५ ॥
गुर मिलि प्रभू चितारिआ ॥ कारज सभि सवारिआ ॥ मंदा को न अलाए ॥ सभ जै जै कारु सुणाए ॥१॥

संतहु साची सरणि सुआमी ॥ जीअ जंत सभि हाथि तिसै कै सो प्रभु अंतरजामी ॥ रहाउ ॥

करतब सभि सवारे ॥ प्रभि अपुना बिरदु समारे ॥ पतित पावन प्रभ नामा ॥ जन नानक सद कुरबाना ॥२॥९॥७३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 627) सोरठि महला ५ ॥
पारब्रहमि साजि सवारिआ ॥ इहु लहुड़ा गुरू उबारिआ ॥ अनद करहु पित माता ॥ परमेसरु जीअ का दाता ॥१॥

सुभ चितवनि दास तुमारे ॥ राखहि पैज दास अपुने की कारज आपि सवारे ॥ रहाउ ॥

मेरा प्रभु परउपकारी ॥ पूरन कल जिनि धारी ॥ नानक सरणी आइआ ॥ मन चिंदिआ फलु पाइआ ॥२॥१०॥७४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 627) सोरठि महला ५ ॥
सदा सदा हरि जापे ॥ प्रभ बालक राखे आपे ॥ सीतला ठाकि रहाई ॥ बिघन गए हरि नाई ॥१॥

मेरा प्रभु होआ सदा दइआला ॥ अरदासि सुणी भगत अपुने की सभ जीअ भइआ किरपाला ॥ रहाउ ॥

प्रभ करण कारण समराथा ॥ हरि सिमरत सभु दुखु लाथा ॥ अपणे दास की सुणी बेनंती ॥ सभ नानक सुखि सवंती ॥२॥११॥७५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 627) सोरठि महला ५ ॥
अपना गुरू धिआए ॥ मिलि कुसल सेती घरि आए ॥ नामै की वडिआई ॥ तिसु कीमति कहणु न जाई ॥१॥

संतहु हरि हरि हरि आराधहु ॥ हरि आराधि सभो किछु पाईऐ कारज सगले साधहु ॥ रहाउ ॥

प्रेम भगति प्रभ लागी ॥ सो पाए जिसु वडभागी ॥ जन नानक नामु धिआइआ ॥ तिनि सरब सुखा फल पाइआ ॥२॥१२॥७६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 627) सोरठि महला ५ ॥
परमेसरि दिता बंना ॥ दुख रोग का डेरा भंना ॥ अनद करहि नर नारी ॥ हरि हरि प्रभि किरपा धारी ॥१॥

संतहु सुखु होआ सभ थाई ॥ पारब्रहमु पूरन परमेसरु रवि रहिआ सभनी जाई ॥ रहाउ ॥

धुर की बाणी आई ॥ तिनि सगली चिंत मिटाई ॥ दइआल पुरख मिहरवाना ॥ हरि नानक साचु वखाना ॥२॥१३॥७७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 628) सोरठि महला ५ ॥
ऐथै ओथै रखवाला ॥ प्रभ सतिगुर दीन दइआला ॥ दास अपने आपि राखे ॥ घटि घटि सबदु सुभाखे ॥१॥

गुर के चरण ऊपरि बलि जाई ॥ दिनसु रैनि सासि सासि समाली पूरनु सभनी थाई ॥ रहाउ ॥

आपि सहाई होआ ॥ सचे दा सचा ढोआ ॥ तेरी भगति वडिआई ॥ पाई नानक प्रभ सरणाई ॥२॥१४॥७८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 628) सोरठि महला ५ ॥
सतिगुर पूरे भाणा ॥ ता जपिआ नामु रमाणा ॥ गोबिंद किरपा धारी ॥ प्रभि राखी पैज हमारी ॥१॥

हरि के चरन सदा सुखदाई ॥ जो इछहि सोई फलु पावहि बिरथी आस न जाई ॥१॥ रहाउ ॥

क्रिपा करे जिसु प्रानपति दाता सोई संतु गुण गावै ॥ प्रेम भगति ता का मनु लीणा पारब्रहम मनि भावै ॥२॥

आठ पहर हरि का जसु रवणा बिखै ठगउरी लाथी ॥ संगि मिलाइ लीआ मेरै करतै संत साध भए साथी ॥३॥

करु गहि लीने सरबसु दीने आपहि आपु मिलाइआ ॥ कहु नानक सरब थोक पूरन पूरा सतिगुरु पाइआ ॥४॥१५॥७९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 628) सोरठि महला ५ ॥
गरीबी गदा हमारी ॥ खंना सगल रेनु छारी ॥ इसु आगै को न टिकै वेकारी ॥ गुर पूरे एह गल सारी ॥१॥

हरि हरि नामु संतन की ओटा ॥ जो सिमरै तिस की गति होवै उधरहि सगले कोटा ॥१॥ रहाउ ॥

संत संगि जसु गाइआ ॥ इहु पूरन हरि धनु पाइआ ॥ कहु नानक आपु मिटाइआ ॥ सभु पारब्रहमु नदरी आइआ ॥२॥१६॥८०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 628) सोरठि महला ५ ॥
गुरि पूरै पूरी कीनी ॥ बखस अपुनी करि दीनी ॥ नित अनंद सुख पाइआ ॥ थाव सगले सुखी वसाइआ ॥१॥

हरि की भगति फल दाती ॥ गुरि पूरै किरपा करि दीनी विरलै किन ही जाती ॥ रहाउ ॥

गुरबाणी गावह भाई ॥ ओह सफल सदा सुखदाई ॥ नानक नामु धिआइआ ॥ पूरबि लिखिआ पाइआ ॥२॥१७॥८१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 628) सोरठि महला ५ ॥
गुरु पूरा आराधे ॥ कारज सगले साधे ॥ सगल मनोरथ पूरे ॥ बाजे अनहद तूरे ॥१॥

संतहु रामु जपत सुखु पाइआ ॥ संत असथानि बसे सुख सहजे सगले दूख मिटाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

गुर पूरे की बाणी ॥ पारब्रहम मनि भाणी ॥ नानक दासि वखाणी ॥ निरमल अकथ कहाणी ॥२॥१८॥८२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 629) सोरठि महला ५ ॥
भूखे खावत लाज न आवै ॥ तिउ हरि जनु हरि गुण गावै ॥१॥

अपने काज कउ किउ अलकाईऐ ॥ जितु सिमरनि दरगह मुखु ऊजल सदा सदा सुखु पाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

जिउ कामी कामि लुभावै ॥ तिउ हरि दास हरि जसु भावै ॥२॥

जिउ माता बालि लपटावै ॥ तिउ गिआनी नामु कमावै ॥३॥

गुर पूरे ते पावै ॥ जन नानक नामु धिआवै ॥४॥१९॥८३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 629) सोरठि महला ५ ॥
सुख सांदि घरि आइआ ॥ निंदक कै मुखि छाइआ ॥ पूरै गुरि पहिराइआ ॥ बिनसे दुख सबाइआ ॥१॥

संतहु साचे की वडिआई ॥ जिनि अचरज सोभ बणाई ॥१॥ रहाउ ॥

बोले साहिब कै भाणै ॥ दासु बाणी ब्रहमु वखाणै ॥ नानक प्रभ सुखदाई ॥ जिनि पूरी बणत बणाई ॥२॥२०॥८४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 629) सोरठि महला ५ ॥
प्रभु अपुना रिदै धिआए ॥ घरि सही सलामति आए ॥ संतोखु भइआ संसारे ॥ गुरि पूरै लै तारे ॥१॥

संतहु प्रभु मेरा सदा दइआला ॥ अपने भगत की गणत न गणई राखै बाल गुपाला ॥१॥ रहाउ ॥

हरि नामु रिदै उरि धारे ॥ तिनि सभे थोक सवारे ॥ गुरि पूरै तुसि दीआ ॥ फिरि नानक दूखु न थीआ ॥२॥२१॥८५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 629) सोरठि महला ५ ॥
हरि मनि तनि वसिआ सोई ॥ जै जै कारु करे सभु कोई ॥ गुर पूरे की वडिआई ॥ ता की कीमति कही न जाई ॥१॥

हउ कुरबानु जाई तेरे नावै ॥ जिस नो बखसि लैहि मेरे पिआरे सो जसु तेरा गावै ॥१॥ रहाउ ॥

तूं भारो सुआमी मेरा ॥ संतां भरवासा तेरा ॥ नानक प्रभ सरणाई ॥ मुखि निंदक कै छाई ॥२॥२२॥८६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 629) सोरठि महला ५ ॥
आगै सुखु मेरे मीता ॥ पाछे आनदु प्रभि कीता ॥ परमेसुरि बणत बणाई ॥ फिरि डोलत कतहू नाही ॥१॥

साचे साहिब सिउ मनु मानिआ ॥ हरि सरब निरंतरि जानिआ ॥१॥ रहाउ ॥

सभ जीअ तेरे दइआला ॥ अपने भगत करहि प्रतिपाला ॥ अचरजु तेरी वडिआई ॥ नित नानक नामु धिआई ॥२॥२३॥८७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 630) सोरठि महला ५ ॥
नालि नराइणु मेरै ॥ जमदूतु न आवै नेरै ॥ कंठि लाइ प्रभ राखै ॥ सतिगुर की सचु साखै ॥१॥

गुरि पूरै पूरी कीती ॥ दुसमन मारि विडारे सगले दास कउ सुमति दीती ॥१॥ रहाउ ॥

प्रभि सगले थान वसाए ॥ सुखि सांदि फिरि आए ॥ नानक प्रभ सरणाए ॥ जिनि सगले रोग मिटाए ॥२॥२४॥८८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 630) सोरठि महला ५ ॥
सरब सुखा का दाता सतिगुरु ता की सरनी पाईऐ ॥ दरसनु भेटत होत अनंदा दूखु गइआ हरि गाईऐ ॥१॥

हरि रसु पीवहु भाई ॥ नामु जपहु नामो आराधहु गुर पूरे की सरनाई ॥ रहाउ ॥

तिसहि परापति जिसु धुरि लिखिआ सोई पूरनु भाई ॥ नानक की बेनंती प्रभ जी नामि रहा लिव लाई ॥२॥२५॥८९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 630) सोरठि महला ५ ॥
करन करावन हरि अंतरजामी जन अपुने की राखै ॥ जै जै कारु होतु जग भीतरि सबदु गुरू रसु चाखै ॥१॥

प्रभ जी तेरी ओट गुसाई ॥ तू समरथु सरनि का दाता आठ पहर तुम्ह धिआई ॥ रहाउ ॥

जो जनु भजनु करे प्रभ तेरा तिसै अंदेसा नाही ॥ सतिगुर चरन लगे भउ मिटिआ हरि गुन गाए मन माही ॥२॥

सूख सहज आनंद घनेरे सतिगुर दीआ दिलासा ॥ जिणि घरि आए सोभा सेती पूरन होई आसा ॥३॥

पूरा गुरु पूरी मति जा की पूरन प्रभ के कामा ॥ गुर चरनी लागि तरिओ भव सागरु जपि नानक हरि हरि नामा ॥४॥२६॥९०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 630) सोरठि महला ५ ॥
भइओ किरपालु दीन दुख भंजनु आपे सभ बिधि थाटी ॥ खिन महि राखि लीओ जनु अपुना गुर पूरै बेड़ी काटी ॥१॥

मेरे मन गुर गोविंदु सद धिआईऐ ॥ सगल कलेस मिटहि इसु तन ते मन चिंदिआ फलु पाईऐ ॥ रहाउ ॥

जीअ जंत जा के सभि कीने प्रभु ऊचा अगम अपारा ॥ साधसंगि नानक नामु धिआइआ मुख ऊजल भए दरबारा ॥२॥२७॥९१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 630) सोरठि महला ५ ॥
सिमरउ अपुना सांई ॥ दिनसु रैनि सद धिआई ॥ हाथ देइ जिनि राखे ॥ हरि नाम महा रस चाखे ॥१॥

अपने गुर ऊपरि कुरबानु ॥ भए किरपाल पूरन प्रभ दाते जीअ होए मिहरवान ॥ रहाउ ॥

नानक जन सरनाई ॥ जिनि पूरन पैज रखाई ॥ सगले दूख मिटाई ॥ सुखु भुंचहु मेरे भाई ॥२॥२८॥९२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 631) सोरठि महला ५ ॥
सुनहु बिनंती ठाकुर मेरे जीअ जंत तेरे धारे ॥ राखु पैज नाम अपुने की करन करावनहारे ॥१॥

प्रभ जीउ खसमाना करि पिआरे ॥ बुरे भले हम थारे ॥ रहाउ ॥

सुणी पुकार समरथ सुआमी बंधन काटि सवारे ॥ पहिरि सिरपाउ सेवक जन मेले नानक प्रगट पहारे ॥२॥२९॥९३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 631) सोरठि महला ५ ॥
जीअ जंत सभि वसि करि दीने सेवक सभि दरबारे ॥ अंगीकारु कीओ प्रभ अपुने भव निधि पारि उतारे ॥१॥

संतन के कारज सगल सवारे ॥ दीन दइआल क्रिपाल क्रिपा निधि पूरन खसम हमारे ॥ रहाउ ॥

आउ बैठु आदरु सभ थाई ऊन न कतहूं बाता ॥ भगति सिरपाउ दीओ जन अपुने प्रतापु नानक प्रभ जाता ॥२॥३०॥९४॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 631) सोरठि महला ९
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रे मन राम सिउ करि प्रीति ॥ स्रवन गोबिंद गुनु सुनउ अरु गाउ रसना गीति ॥१॥ रहाउ ॥

करि साधसंगति सिमरु माधो होहि पतित पुनीत ॥ कालु बिआलु जिउ परिओ डोलै मुखु पसारे मीत ॥१॥

आजु कालि फुनि तोहि ग्रसि है समझि राखउ चीति ॥ कहै नानकु रामु भजि लै जातु अउसरु बीत ॥२॥१॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 631) सोरठि महला ९ ॥
मन की मन ही माहि रही ॥ ना हरि भजे न तीरथ सेवे चोटी कालि गही ॥१॥ रहाउ ॥

दारा मीत पूत रथ स्मपति धन पूरन सभ मही ॥ अवर सगल मिथिआ ए जानउ भजनु रामु को सही ॥१॥

फिरत फिरत बहुते जुग हारिओ मानस देह लही ॥ नानक कहत मिलन की बरीआ सिमरत कहा नही ॥२॥२॥


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