राग सारंग - बाणी शब्द, Raag Sarang - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1197) रागु सारग चउपदे महला १ घरु १
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
अपुने ठाकुर की हउ चेरी ॥ चरन गहे जगजीवन प्रभ के हउमै मारि निबेरी ॥१॥ रहाउ ॥

पूरन परम जोति परमेसर प्रीतम प्रान हमारे ॥ मोहन मोहि लीआ मनु मेरा समझसि सबदु बीचारे ॥१॥

मनमुख हीन होछी मति झूठी मनि तनि पीर सरीरे ॥ जब की राम रंगीलै राती राम जपत मन धीरे ॥२॥

हउमै छोडि भई बैरागनि तब साची सुरति समानी ॥ अकुल निरंजन सिउ मनु मानिआ बिसरी लाज लोकानी ॥३॥

भूर भविख नाही तुम जैसे मेरे प्रीतम प्रान अधारा ॥ हरि कै नामि रती सोहागनि नानक राम भतारा ॥४॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1197) सारग महला १ ॥
हरि बिनु किउ रहीऐ दुखु बिआपै ॥ जिहवा सादु न फीकी रस बिनु बिनु प्रभ कालु संतापै ॥१॥ रहाउ ॥

जब लगु दरसु न परसै प्रीतम तब लगु भूख पिआसी ॥ दरसनु देखत ही मनु मानिआ जल रसि कमल बिगासी ॥१॥

ऊनवि घनहरु गरजै बरसै कोकिल मोर बैरागै ॥ तरवर बिरख बिहंग भुइअंगम घरि पिरु धन सोहागै ॥२॥

कुचिल कुरूपि कुनारि कुलखनी पिर का सहजु न जानिआ ॥ हरि रस रंगि रसन नही त्रिपती दुरमति दूख समानिआ ॥३॥

आइ न जावै ना दुखु पावै ना दुख दरदु सरीरे ॥ नानक प्रभ ते सहज सुहेली प्रभ देखत ही मनु धीरे ॥४॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1197) सारग महला १ ॥
दूरि नाही मेरो प्रभु पिआरा ॥ सतिगुर बचनि मेरो मनु मानिआ हरि पाए प्रान अधारा ॥१॥ रहाउ ॥

इन बिधि हरि मिलीऐ वर कामनि धन सोहागु पिआरी ॥ जाति बरन कुल सहसा चूका गुरमति सबदि बीचारी ॥१॥

जिसु मनु मानै अभिमानु न ता कउ हिंसा लोभु विसारे ॥ सहजि रवै वरु कामणि पिर की गुरमुखि रंगि सवारे ॥२॥

जारउ ऐसी प्रीति कुट्मब सनबंधी माइआ मोह पसारी ॥ जिसु अंतरि प्रीति राम रसु नाही दुबिधा करम बिकारी ॥३॥

अंतरि रतन पदारथ हित कौ दुरै न लाल पिआरी ॥ नानक गुरमुखि नामु अमोलकु जुगि जुगि अंतरि धारी ॥४॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1198) सारंग महला ४ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि के संत जना की हम धूरि ॥ मिलि सतसंगति परम पदु पाइआ आतम रामु रहिआ भरपूरि ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुरु संतु मिलै सांति पाईऐ किलविख दुख काटे सभि दूरि ॥ आतम जोति भई परफूलित पुरखु निरंजनु देखिआ हजूरि ॥१॥

वडै भागि सतसंगति पाई हरि हरि नामु रहिआ भरपूरि ॥ अठसठि तीरथ मजनु कीआ सतसंगति पग नाए धूरि ॥२॥

दुरमति बिकार मलीन मति होछी हिरदा कुसुधु लागा मोह कूरु ॥ बिनु करमा किउ संगति पाईऐ हउमै बिआपि रहिआ मनु झूरि ॥३॥

होहु दइआल क्रिपा करि हरि जी मागउ सतसंगति पग धूरि ॥ नानक संतु मिलै हरि पाईऐ जनु हरि भेटिआ रामु हजूरि ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1198) सारंग महला ४ ॥
गोबिंद चरनन कउ बलिहारी ॥ भवजलु जगतु न जाई तरणा जपि हरि हरि पारि उतारी ॥१॥ रहाउ ॥

हिरदै प्रतीति बनी प्रभ केरी सेवा सुरति बीचारी ॥ अनदिनु राम नामु जपि हिरदै सरब कला गुणकारी ॥१॥

प्रभु अगम अगोचरु रविआ स्रब ठाई मनि तनि अलख अपारी ॥ गुर किरपाल भए तब पाइआ हिरदै अलखु लखारी ॥२॥

अंतरि हरि नामु सरब धरणीधर साकत कउ दूरि भइआ अहंकारी ॥ त्रिसना जलत न कबहू बूझहि जूऐ बाजी हारी ॥३॥

ऊठत बैठत हरि गुन गावहि गुरि किंचत किरपा धारी ॥ नानक जिन कउ नदरि भई है तिन की पैज सवारी ॥४॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1199) सारग महला ४ ॥
हरि हरि अम्रित नामु देहु पिआरे ॥ जिन ऊपरि गुरमुखि मनु मानिआ तिन के काज सवारे ॥१॥ रहाउ ॥

जो जन दीन भए गुर आगै तिन के दूख निवारे ॥ अनदिनु भगति करहि गुर आगै गुर कै सबदि सवारे ॥१॥

हिरदै नामु अम्रित रसु रसना रसु गावहि रसु बीचारे ॥ गुर परसादि अम्रित रसु चीन्हिआ ओइ पावहि मोख दुआरे ॥२॥

सतिगुरु पुरखु अचलु अचला मति जिसु द्रिड़ता नामु अधारे ॥ तिसु आगै जीउ देवउ अपुना हउ सतिगुर कै बलिहारे ॥३॥

मनमुख भ्रमि दूजै भाइ लागे अंतरि अगिआन गुबारे ॥ सतिगुरु दाता नदरि न आवै ना उरवारि न पारे ॥४॥

सरबे घटि घटि रविआ सुआमी सरब कला कल धारे ॥ नानकु दासनि दासु कहत है करि किरपा लेहु उबारे ॥५॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1199) सारग महला ४ ॥
गोबिद की ऐसी कार कमाइ ॥ जो किछु करे सु सति करि मानहु गुरमुखि नामि रहहु लिव लाइ ॥१॥ रहाउ ॥

गोबिद प्रीति लगी अति मीठी अवर विसरि सभ जाइ ॥ अनदिनु रहसु भइआ मनु मानिआ जोती जोति मिलाइ ॥१॥

जब गुण गाइ तब ही मनु त्रिपतै सांति वसै मनि आइ ॥ गुर किरपाल भए तब पाइआ हरि चरणी चितु लाइ ॥२॥

मति प्रगास भई हरि धिआइआ गिआनि तति लिव लाइ ॥ अंतरि जोति प्रगटी मनु मानिआ हरि सहजि समाधि लगाइ ॥३॥

हिरदै कपटु नित कपटु कमावहि मुखहु हरि हरि सुणाइ ॥ अंतरि लोभु महा गुबारा तुह कूटै दुख खाइ ॥४॥

जब सुप्रसंन भए प्रभ मेरे गुरमुखि परचा लाइ ॥ नानक नाम निरंजनु पाइआ नामु जपत सुखु पाइ ॥५॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1199) सारग महला ४ ॥
मेरा मनु राम नामि मनु मानी ॥ मेरै हीअरै सतिगुरि प्रीति लगाई मनि हरि हरि कथा सुखानी ॥१॥ रहाउ ॥

दीन दइआल होवहु जन ऊपरि जन देवहु अकथ कहानी ॥ संत जना मिलि हरि रसु पाइआ हरि मनि तनि मीठ लगानी ॥१॥

हरि कै रंगि रते बैरागी जिन्ह गुरमति नामु पछानी ॥ पुरखै पुरखु मिलिआ सुखु पाइआ सभ चूकी आवण जानी ॥२॥

नैणी बिरहु देखा प्रभ सुआमी रसना नामु वखानी ॥ स्रवणी कीरतनु सुनउ दिनु राती हिरदै हरि हरि भानी ॥३॥

पंच जना गुरि वसगति आणे तउ उनमनि नामि लगानी ॥ जन नानक हरि किरपा धारी हरि रामै नामि समानी ॥४॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1200) सारग महला ४ ॥
जपि मन राम नामु पड़्हु सारु ॥ राम नाम बिनु थिरु नही कोई होरु निहफल सभु बिसथारु ॥१॥ रहाउ ॥

किआ लीजै किआ तजीऐ बउरे जो दीसै सो छारु ॥ जिसु बिखिआ कउ तुम्ह अपुनी करि जानहु सा छाडि जाहु सिरि भारु ॥१॥

तिलु तिलु पलु पलु अउध फुनि घाटै बूझि न सकै गवारु ॥ सो किछु करै जि साथि न चालै इहु साकत का आचारु ॥२॥

संत जना कै संगि मिलु बउरे तउ पावहि मोख दुआरु ॥ बिनु सतसंग सुखु किनै न पाइआ जाइ पूछहु बेद बीचारु ॥३॥

राणा राउ सभै कोऊ चालै झूठु छोडि जाइ पासारु ॥ नानक संत सदा थिरु निहचलु जिन राम नामु आधारु ॥४॥६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1200) सारग महला ४ घरु ३ दुपदा
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
काहे पूत झगरत हउ संगि बाप ॥ जिन के जणे बडीरे तुम हउ तिन सिउ झगरत पाप ॥१॥ रहाउ ॥

जिसु धन का तुम गरबु करत हउ सो धनु किसहि न आप ॥ खिन महि छोडि जाइ बिखिआ रसु तउ लागै पछुताप ॥१॥

जो तुमरे प्रभ होते सुआमी हरि तिन के जापहु जाप ॥ उपदेसु करत नानक जन तुम कउ जउ सुनहु तउ जाइ संताप ॥२॥१॥७॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1200) सारग महला ४ घरु ५ दुपदे पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जपि मन जगंनाथ जगदीसरो जगजीवनो मनमोहन सिउ प्रीति लागी मै हरि हरि हरि टेक सभ दिनसु सभ राति ॥१॥ रहाउ ॥

हरि की उपमा अनिक अनिक अनिक गुन गावत सुक नारद ब्रहमादिक तव गुन सुआमी गनिन न जाति ॥ तू हरि बेअंतु तू हरि बेअंतु तू हरि सुआमी तू आपे ही जानहि आपनी भांति ॥१॥

हरि कै निकटि निकटि हरि निकट ही बसते ते हरि के जन साधू हरि भगात ॥ ते हरि के जन हरि सिउ रलि मिले जैसे जन नानक सललै सलल मिलाति ॥२॥१॥८॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1201) सारंग महला ४ ॥
जपि मन नरहरे नरहर सुआमी हरि सगल देव देवा स्री राम राम नामा हरि प्रीतमु मोरा ॥१॥ रहाउ ॥

जितु ग्रिहि गुन गावते हरि के गुन गावते राम गुन गावते तितु ग्रिहि वाजे पंच सबद वड भाग मथोरा ॥ तिन्ह जन के सभि पाप गए सभि दोख गए सभि रोग गए कामु क्रोधु लोभु मोहु अभिमानु गए तिन्ह जन के हरि मारि कढे पंच चोरा ॥१॥

हरि राम बोलहु हरि साधू हरि के जन साधू जगदीसु जपहु मनि बचनि करमि हरि हरि आराधू हरि के जन साधू ॥ हरि राम बोलि हरि राम बोलि सभि पाप गवाधू ॥ नित नित जागरणु करहु सदा सदा आनंदु जपि जगदीसोरा ॥ मन इछे फल पावहु सभै फल पावहु धरमु अरथु काम मोखु जन नानक हरि सिउ मिले हरि भगत तोरा ॥२॥२॥९॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1201) सारग महला ४ ॥
जपि मन माधो मधुसूदनो हरि स्रीरंगो परमेसरो सति परमेसरो प्रभु अंतरजामी ॥ सभ दूखन को हंता सभ सूखन को दाता हरि प्रीतम गुन गाओ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि घटि घटे घटि बसता हरि जलि थले हरि बसता हरि थान थानंतरि बसता मै हरि देखन को चाओ ॥ कोई आवै संतो हरि का जनु संतो मेरा प्रीतम जनु संतो मोहि मारगु दिखलावै ॥ तिसु जन के हउ मलि मलि धोवा पाओ ॥१॥

हरि जन कउ हरि मिलिआ हरि सरधा ते मिलिआ गुरमुखि हरि मिलिआ ॥ मेरै मनि तनि आनंद भए मै देखिआ हरि राओ ॥ जन नानक कउ किरपा भई हरि की किरपा भई जगदीसुर किरपा भई ॥ मै अनदिनो सद सद सदा हरि जपिआ हरि नाओ ॥२॥३॥१०॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1201) सारग महला ४ ॥
जपि मन निरभउ ॥ सति सति सदा सति ॥ निरवैरु अकाल मूरति ॥ आजूनी स्मभउ ॥ मेरे मन अनदिनो धिआइ निरंकारु निराहारी ॥१॥ रहाउ ॥

हरि दरसन कउ हरि दरसन कउ कोटि कोटि तेतीस सिध जती जोगी तट तीरथ परभवन करत रहत निराहारी ॥ तिन जन की सेवा थाइ पई जिन्ह कउ किरपाल होवतु बनवारी ॥१॥

हरि के हो संत भले ते ऊतम भगत भले जो भावत हरि राम मुरारी ॥ जिन्ह का अंगु करै मेरा सुआमी तिन्ह की नानक हरि पैज सवारी ॥२॥४॥११॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1202) सारग महला ४ पड़ताल ॥
जपि मन गोविंदु हरि गोविंदु गुणी निधानु सभ स्रिसटि का प्रभो मेरे मन हरि बोलि हरि पुरखु अबिनासी ॥१॥ रहाउ ॥

हरि का नामु अम्रितु हरि हरि हरे सो पीऐ जिसु रामु पिआसी ॥ हरि आपि दइआलु दइआ करि मेलै जिसु सतिगुरू सो जनु हरि हरि अम्रित नामु चखासी ॥१॥

जो जन सेवहि सद सदा मेरा हरि हरे तिन का सभु दूखु भरमु भउ जासी ॥ जनु नानकु नामु लए तां जीवै जिउ चात्रिकु जलि पीऐ त्रिपतासी ॥२॥५॥१२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1202) सारग महला ४ ॥
जपि मन सिरी रामु ॥ राम रमत रामु ॥ सति सति रामु ॥ बोलहु भईआ सद राम रामु रामु रवि रहिआ सरबगे ॥१॥ रहाउ ॥

रामु आपे आपि आपे सभु करता रामु आपे आपि आपि सभतु जगे ॥ जिसु आपि क्रिपा करे मेरा राम राम राम राइ सो जनु राम नाम लिव लागे ॥१॥

राम नाम की उपमा देखहु हरि संतहु जो भगत जनां की पति राखै विचि कलिजुग अगे ॥ जन नानक का अंगु कीआ मेरै राम राइ दुसमन दूख गए सभि भगे ॥२॥६॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1202) सारंग महला ५ चउपदे घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर मूरति कउ बलि जाउ ॥ अंतरि पिआस चात्रिक जिउ जल की सफल दरसनु कदि पांउ ॥१॥ रहाउ ॥

अनाथा को नाथु सरब प्रतिपालकु भगति वछलु हरि नाउ ॥ जा कउ कोइ न राखै प्राणी तिसु तू देहि असराउ ॥१॥

निधरिआ धर निगतिआ गति निथाविआ तू थाउ ॥ दह दिस जांउ तहां तू संगे तेरी कीरति करम कमाउ ॥२॥

एकसु ते लाख लाख ते एका तेरी गति मिति कहि न सकाउ ॥ तू बेअंतु तेरी मिति नही पाईऐ सभु तेरो खेलु दिखाउ ॥३॥

साधन का संगु साध सिउ गोसटि हरि साधन सिउ लिव लाउ ॥ जन नानक पाइआ है गुरमति हरि देहु दरसु मनि चाउ ॥४॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1202) सारग महला ५ ॥
हरि जीउ अंतरजामी जान ॥ करत बुराई मानुख ते छपाई साखी भूत पवान ॥१॥ रहाउ ॥

बैसनौ नामु करत खट करमा अंतरि लोभ जूठान ॥ संत सभा की निंदा करते डूबे सभ अगिआन ॥१॥

करहि सोम पाकु हिरहि पर दरबा अंतरि झूठ गुमान ॥ सासत्र बेद की बिधि नही जाणहि बिआपे मन कै मान ॥२॥

संधिआ काल करहि सभि वरता जिउ सफरी द्मफान ॥ प्रभू भुलाए ऊझड़ि पाए निहफल सभि करमान ॥३॥

सो गिआनी सो बैसनौ पड़्हिआ जिसु करी क्रिपा भगवान ॥ ओनि सतिगुरु सेवि परम पदु पाइआ उधरिआ सगल बिस्वान ॥४॥

किआ हम कथह किछु कथि नही जाणह प्रभ भावै तिवै बोलान ॥ साधसंगति की धूरि इक मांगउ जन नानक पइओ सरान ॥५॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1203) सारग महला ५ ॥
अब मोरो नाचनो रहो ॥ लालु रगीला सहजे पाइओ सतिगुर बचनि लहो ॥१॥ रहाउ ॥

कुआर कंनिआ जैसे संगि सहेरी प्रिअ बचन उपहास कहो ॥ जउ सुरिजनु ग्रिह भीतरि आइओ तब मुखु काजि लजो ॥१॥

जिउ कनिको कोठारी चड़िओ कबरो होत फिरो ॥ जब ते सुध भए है बारहि तब ते थान थिरो ॥२॥

जउ दिनु रैनि तऊ लउ बजिओ मूरत घरी पलो ॥ बजावनहारो ऊठि सिधारिओ तब फिरि बाजु न भइओ ॥३॥

जैसे कु्मभ उदक पूरि आनिओ तब ओहु भिंन द्रिसटो ॥ कहु नानक कु्मभु जलै महि डारिओ अ्मभै अ्मभ मिलो ॥४॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1203) सारग महला ५ ॥
अब पूछे किआ कहा ॥ लैनो नामु अम्रित रसु नीको बावर बिखु सिउ गहि रहा ॥१॥ रहाउ ॥

दुलभ जनमु चिरंकाल पाइओ जातउ कउडी बदलहा ॥ काथूरी को गाहकु आइओ लादिओ कालर बिरख जिवहा ॥१॥

आइओ लाभु लाभन कै ताई मोहनि ठागउरी सिउ उलझि पहा ॥ काच बादरै लालु खोई है फिरि इहु अउसरु कदि लहा ॥२॥

सगल पराध एकु गुणु नाही ठाकुरु छोडह दासि भजहा ॥ आई मसटि जड़वत की निआई जिउ तसकरु दरि सांन्हिहा ॥३॥

आन उपाउ न कोऊ सूझै हरि दासा सरणी परि रहा ॥ कहु नानक तब ही मन छुटीऐ जउ सगले अउगन मेटि धरहा ॥४॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1203) सारग महला ५ ॥
माई धीरि रही प्रिअ बहुतु बिरागिओ ॥ अनिक भांति आनूप रंग रे तिन्ह सिउ रुचै न लागिओ ॥१॥ रहाउ ॥

निसि बासुर प्रिअ प्रिअ मुखि टेरउ नींद पलक नही जागिओ ॥ हार कजर बसत्र अनिक सीगार रे बिनु पिर सभै बिखु लागिओ ॥१॥

पूछउ पूछउ दीन भांति करि कोऊ कहै प्रिअ देसांगिओ ॥ हींओ देंउ सभु मनु तनु अरपउ सीसु चरण परि राखिओ ॥२॥

चरण बंदना अमोल दासरो देंउ साधसंगति अरदागिओ ॥ करहु क्रिपा मोहि प्रभू मिलावहु निमख दरसु पेखागिओ ॥३॥

द्रिसटि भई तब भीतरि आइओ मेरा मनु अनदिनु सीतलागिओ ॥ कहु नानक रसि मंगल गाए सबदु अनाहदु बाजिओ ॥४॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1204) सारग महला ५ ॥
माई सति सति सति हरि सति सति सति साधा ॥ बचनु गुरू जो पूरै कहिओ मै छीकि गांठरी बाधा ॥१॥ रहाउ ॥

निसि बासुर नखिअत्र बिनासी रवि ससीअर बेनाधा ॥ गिरि बसुधा जल पवन जाइगो इकि साध बचन अटलाधा ॥१॥

अंड बिनासी जेर बिनासी उतभुज सेत बिनाधा ॥ चारि बिनासी खटहि बिनासी इकि साध बचन निहचलाधा ॥२॥

राज बिनासी ताम बिनासी सातकु भी बेनाधा ॥ द्रिसटिमान है सगल बिनासी इकि साध बचन आगाधा ॥३॥

आपे आपि आप ही आपे सभु आपन खेलु दिखाधा ॥ पाइओ न जाई कही भांति रे प्रभु नानक गुर मिलि लाधा ॥४॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1204) सारग महला ५ ॥
मेरै मनि बासिबो गुर गोबिंद ॥ जहां सिमरनु भइओ है ठाकुर तहां नगर सुख आनंद ॥१॥ रहाउ ॥

जहां बीसरै ठाकुरु पिआरो तहां दूख सभ आपद ॥ जह गुन गाइ आनंद मंगल रूप तहां सदा सुख स्मपद ॥१॥

जहा स्रवन हरि कथा न सुनीऐ तह महा भइआन उदिआनद ॥ जहां कीरतनु साधसंगति रसु तह सघन बास फलांनद ॥२॥

बिनु सिमरन कोटि बरख जीवै सगली अउध ब्रिथानद ॥ एक निमख गोबिंद भजनु करि तउ सदा सदा जीवानद ॥३॥

सरनि सरनि सरनि प्रभ पावउ दीजै साधसंगति किरपानद ॥ नानक पूरि रहिओ है सरब मै सगल गुणा बिधि जांनद ॥४॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1204) सारग महला ५ ॥
अब मोहि राम भरोसउ पाए ॥ जो जो सरणि परिओ करुणानिधि ते ते भवहि तराए ॥१॥ रहाउ ॥

सुखि सोइओ अरु सहजि समाइओ सहसा गुरहि गवाए ॥ जो चाहत सोई हरि कीओ मन बांछत फल पाए ॥१॥

हिरदै जपउ नेत्र धिआनु लावउ स्रवनी कथा सुनाए ॥ चरणी चलउ मारगि ठाकुर कै रसना हरि गुण गाए ॥२॥

देखिओ द्रिसटि सरब मंगल रूप उलटी संत कराए ॥ पाइओ लालु अमोलु नामु हरि छोडि न कतहू जाए ॥३॥

कवन उपमा कउन बडाई किआ गुन कहउ रीझाए ॥ होत क्रिपाल दीन दइआ प्रभ जन नानक दास दसाए ॥४॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1205) सारग महला ५ ॥
ओइ सुख का सिउ बरनि सुनावत ॥ अनद बिनोद पेखि प्रभ दरसन मनि मंगल गुन गावत ॥१॥ रहाउ ॥

बिसम भई पेखि बिसमादी पूरि रहे किरपावत ॥ पीओ अम्रित नामु अमोलक जिउ चाखि गूंगा मुसकावत ॥१॥

जैसे पवनु बंध करि राखिओ बूझ न आवत जावत ॥ जा कउ रिदै प्रगासु भइओ हरि उआ की कही न जाइ कहावत ॥२॥

आन उपाव जेते किछु कहीअहि तेते सीखे पावत ॥ अचिंत लालु ग्रिह भीतरि प्रगटिओ अगम जैसे परखावत ॥३॥

निरगुण निरंकार अबिनासी अतुलो तुलिओ न जावत ॥ कहु नानक अजरु जिनि जरिआ तिस ही कउ बनि आवत ॥४॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1205) सारग महला ५ ॥
बिखई दिनु रैनि इव ही गुदारै ॥ गोबिंदु न भजै अह्मबुधि माता जनमु जूऐ जिउ हारै ॥१॥ रहाउ ॥

नामु अमोला प्रीति न तिस सिउ पर निंदा हितकारै ॥ छापरु बांधि सवारै त्रिण को दुआरै पावकु जारै ॥१॥

कालर पोट उठावै मूंडहि अम्रितु मन ते डारै ॥ ओढै बसत्र काजर महि परिआ बहुरि बहुरि फिरि झारै ॥२॥

काटै पेडु डाल परि ठाढौ खाइ खाइ मुसकारै ॥ गिरिओ जाइ रसातलि परिओ छिटी छिटी सिर भारै ॥३॥

निरवैरै संगि वैरु रचाए पहुचि न सकै गवारै ॥ कहु नानक संतन का राखा पारब्रहमु निरंकारै ॥४॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1205) सारग महला ५ ॥
अवरि सभि भूले भ्रमत न जानिआ ॥ एकु सुधाखरु जा कै हिरदै वसिआ तिनि बेदहि ततु पछानिआ ॥१॥ रहाउ ॥

परविरति मारगु जेता किछु होईऐ तेता लोग पचारा ॥ जउ लउ रिदै नही परगासा तउ लउ अंध अंधारा ॥१॥

जैसे धरती साधै बहु बिधि बिनु बीजै नही जांमै ॥ राम नाम बिनु मुकति न होई है तुटै नाही अभिमानै ॥२॥

नीरु बिलोवै अति स्रमु पावै नैनू कैसे रीसै ॥ बिनु गुर भेटे मुकति न काहू मिलत नही जगदीसै ॥३॥

खोजत खोजत इहै बीचारिओ सरब सुखा हरि नामा ॥ कहु नानक तिसु भइओ परापति जा कै लेखु मथामा ॥४॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1206) सारग महला ५ ॥
अनदिनु राम के गुण कहीऐ ॥ सगल पदारथ सरब सूख सिधि मन बांछत फल लहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

आवहु संत प्रान सुखदाते सिमरह प्रभु अबिनासी ॥ अनाथह नाथु दीन दुख भंजन पूरि रहिओ घट वासी ॥१॥

गावत सुनत सुनावत सरधा हरि रसु पी वडभागे ॥ कलि कलेस मिटे सभि तन ते राम नाम लिव जागे ॥२॥

कामु क्रोधु झूठु तजि निंदा हरि सिमरनि बंधन तूटे ॥ मोह मगन अहं अंध ममता गुर किरपा ते छूटे ॥३॥

तू समरथु पारब्रहम सुआमी करि किरपा जनु तेरा ॥ पूरि रहिओ सरब महि ठाकुरु नानक सो प्रभु नेरा ॥४॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1206) सारग महला ५ ॥
बलिहारी गुरदेव चरन ॥ जा कै संगि पारब्रहमु धिआईऐ उपदेसु हमारी गति करन ॥१॥ रहाउ ॥

दूख रोग भै सगल बिनासे जो आवै हरि संत सरन ॥ आपि जपै अवरह नामु जपावै वड समरथ तारन तरन ॥१॥

जा को मंत्रु उतारै सहसा ऊणे कउ सुभर भरन ॥ हरि दासन की आगिआ मानत ते नाही फुनि गरभ परन ॥२॥

भगतन की टहल कमावत गावत दुख काटे ता के जनम मरन ॥ जा कउ भइओ क्रिपालु बीठुला तिनि हरि हरि अजर जरन ॥३॥

हरि रसहि अघाने सहजि समाने मुख ते नाही जात बरन ॥ गुर प्रसादि नानक संतोखे नामु प्रभू जपि जपि उधरन ॥४॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1206) सारग महला ५ ॥
गाइओ री मै गुण निधि मंगल गाइओ ॥ भले संजोग भले दिन अउसर जउ गोपालु रीझाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

संतह चरन मोरलो माथा ॥ हमरे मसतकि संत धरे हाथा ॥१॥

साधह मंत्रु मोरलो मनूआ ॥ ता ते गतु होए त्रै गुनीआ ॥२॥

भगतह दरसु देखि नैन रंगा ॥ लोभ मोह तूटे भ्रम संगा ॥३॥

कहु नानक सुख सहज अनंदा ॥ खोल्हि भीति मिले परमानंदा ॥४॥१४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1206) सारग महला ५ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कैसे कहउ मोहि जीअ बेदनाई ॥ दरसन पिआस प्रिअ प्रीति मनोहर मनु न रहै बहु बिधि उमकाई ॥१॥ रहाउ ॥

चितवनि चितवउ प्रिअ प्रीति बैरागी कदि पावउ हरि दरसाई ॥ जतन करउ इहु मनु नही धीरै कोऊ है रे संतु मिलाई ॥१॥

जप तप संजम पुंन सभि होमउ तिसु अरपउ सभि सुख जांई ॥ एक निमख प्रिअ दरसु दिखावै तिसु संतन कै बलि जांई ॥२॥

करउ निहोरा बहुतु बेनती सेवउ दिनु रैनाई ॥ मानु अभिमानु हउ सगल तिआगउ जो प्रिअ बात सुनाई ॥३॥

देखि चरित्र भई हउ बिसमनि गुरि सतिगुरि पुरखि मिलाई ॥ प्रभ रंग दइआल मोहि ग्रिह महि पाइआ जन नानक तपति बुझाई ॥४॥१॥१५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1207) सारग महला ५ ॥
रे मूड़्हे तू किउ सिमरत अब नाही ॥ नरक घोर महि उरध तपु करता निमख निमख गुण गांही ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक जनम भ्रमतौ ही आइओ मानस जनमु दुलभाही ॥ गरभ जोनि छोडि जउ निकसिओ तउ लागो अन ठांही ॥१॥

करहि बुराई ठगाई दिनु रैनि निहफल करम कमाही ॥ कणु नाही तुह गाहण लागे धाइ धाइ दुख पांही ॥२॥

मिथिआ संगि कूड़ि लपटाइओ उरझि परिओ कुसमांही ॥ धरम राइ जब पकरसि बवरे तउ काल मुखा उठि जाही ॥३॥

सो मिलिआ जो प्रभू मिलाइआ जिसु मसतकि लेखु लिखांही ॥ कहु नानक तिन्ह जन बलिहारी जो अलिप रहे मन मांही ॥४॥२॥१६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1207) सारग महला ५ ॥
किउ जीवनु प्रीतम बिनु माई ॥ जा के बिछुरत होत मिरतका ग्रिह महि रहनु न पाई ॥१॥ रहाउ ॥

जीअ हींअ प्रान को दाता जा कै संगि सुहाई ॥ करहु क्रिपा संतहु मोहि अपुनी प्रभ मंगल गुण गाई ॥१॥

चरन संतन के माथे मेरे ऊपरि नैनहु धूरि बांछाईं ॥ जिह प्रसादि मिलीऐ प्रभ नानक बलि बलि ता कै हउ जाई ॥२॥३॥१७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1207) सारग महला ५ ॥
उआ अउसर कै हउ बलि जाई ॥ आठ पहर अपना प्रभु सिमरनु वडभागी हरि पांई ॥१॥ रहाउ ॥

भलो कबीरु दासु दासन को ऊतमु सैनु जनु नाई ॥ ऊच ते ऊच नामदेउ समदरसी रविदास ठाकुर बणि आई ॥१॥

जीउ पिंडु तनु धनु साधन का इहु मनु संत रेनाई ॥ संत प्रतापि भरम सभि नासे नानक मिले गुसाई ॥२॥४॥१८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1207) सारग महला ५ ॥
मनोरथ पूरे सतिगुर आपि ॥ सगल पदारथ सिमरनि जा कै आठ पहर मेरे मन जापि ॥१॥ रहाउ ॥

अम्रित नामु सुआमी तेरा जो पीवै तिस ही त्रिपतास ॥ जनम जनम के किलबिख नासहि आगै दरगह होइ खलास ॥१॥

सरनि तुमारी आइओ करते पारब्रहम पूरन अबिनास ॥ करि किरपा तेरे चरन धिआवउ नानक मनि तनि दरस पिआस ॥२॥५॥१९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1208) सारग महला ५ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मन कहा लुभाईऐ आन कउ ॥ ईत ऊत प्रभु सदा सहाई जीअ संगि तेरे काम कउ ॥१॥ रहाउ ॥

अम्रित नामु प्रिअ प्रीति मनोहर इहै अघावन पांन कउ ॥ अकाल मूरति है साध संतन की ठाहर नीकी धिआन कउ ॥१॥

बाणी मंत्रु महा पुरखन की मनहि उतारन मांन कउ ॥ खोजि लहिओ नानक सुख थानां हरि नामा बिस्राम कउ ॥२॥१॥२०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1208) सारग महला ५ ॥
मन सदा मंगल गोबिंद गाइ ॥ रोग सोग तेरे मिटहि सगल अघ निमख हीऐ हरि नामु धिआइ ॥१॥ रहाउ ॥

छोडि सिआनप बहु चतुराई साधू सरणी जाइ पाइ ॥ जउ होइ क्रिपालु दीन दुख भंजन जम ते होवै धरम राइ ॥१॥

एकस बिनु नाही को दूजा आन न बीओ लवै लाइ ॥ मात पिता भाई नानक को सुखदाता हरि प्रान साइ ॥२॥२॥२१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1208) सारग महला ५ ॥
हरि जन सगल उधारे संग के ॥ भए पुनीत पवित्र मन जनम जनम के दुख हरे ॥१॥ रहाउ ॥

मारगि चले तिन्ही सुखु पाइआ जिन्ह सिउ गोसटि से तरे ॥ बूडत घोर अंध कूप महि ते साधू संगि पारि परे ॥१॥

जिन्ह के भाग बडे है भाई तिन्ह साधू संगि मुख जुरे ॥ तिन्ह की धूरि बांछै नित नानकु प्रभु मेरा किरपा करे ॥२॥३॥२२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1208) सारग महला ५ ॥
हरि जन राम राम राम धिआंए ॥ एक पलक सुख साध समागम कोटि बैकुंठह पांए ॥१॥ रहाउ ॥

दुलभ देह जपि होत पुनीता जम की त्रास निवारै ॥ महा पतित के पातिक उतरहि हरि नामा उरि धारै ॥१॥

जो जो सुनै राम जसु निरमल ता का जनम मरण दुखु नासा ॥ कहु नानक पाईऐ वडभागीं मन तन होइ बिगासा ॥२॥४॥२३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1209) सारग महला ५ दुपदे घरु ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मोहन घरि आवहु करउ जोदरीआ ॥ मानु करउ अभिमानै बोलउ भूल चूक तेरी प्रिअ चिरीआ ॥१॥ रहाउ ॥

निकटि सुनउ अरु पेखउ नाही भरमि भरमि दुख भरीआ ॥ होइ क्रिपाल गुर लाहि पारदो मिलउ लाल मनु हरीआ ॥१॥

एक निमख जे बिसरै सुआमी जानउ कोटि दिनस लख बरीआ ॥ साधसंगति की भीर जउ पाई तउ नानक हरि संगि मिरीआ ॥२॥१॥२४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1209) सारग महला ५ ॥
अब किआ सोचउ सोच बिसारी ॥ करणा सा सोई करि रहिआ देहि नाउ बलिहारी ॥१॥ रहाउ ॥

चहु दिस फूलि रही बिखिआ बिखु गुर मंत्रु मूखि गरुड़ारी ॥ हाथ देइ राखिओ करि अपुना जिउ जल कमला अलिपारी ॥१॥

हउ नाही किछु मै किआ होसा सभ तुम ही कल धारी ॥ नानक भागि परिओ हरि पाछै राखु संत सदकारी ॥२॥२॥२५॥


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