Pt 3 - राग रामकली - बाणी शब्द, Part 3 - Raag Ramkali - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 901) रागु रामकली महला ५ घरु २ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गावहु राम के गुण गीत ॥ नामु जपत परम सुखु पाईऐ आवा गउणु मिटै मेरे मीत ॥१॥ रहाउ ॥

गुण गावत होवत परगासु ॥ चरन कमल महि होइ निवासु ॥१॥

संतसंगति महि होइ उधारु ॥ नानक भवजलु उतरसि पारि ॥२॥१॥५७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 901) रामकली महला ५ ॥
गुरु पूरा मेरा गुरु पूरा ॥ राम नामु जपि सदा सुहेले सगल बिनासे रोग कूरा ॥१॥ रहाउ ॥

एकु अराधहु साचा सोइ ॥ जा की सरनि सदा सुखु होइ ॥१॥

नीद सुहेली नाम की लागी भूख ॥ हरि सिमरत बिनसे सभ दूख ॥२॥

सहजि अनंद करहु मेरे भाई ॥ गुरि पूरै सभ चिंत मिटाई ॥३॥

आठ पहर प्रभ का जपु जापि ॥ नानक राखा होआ आपि ॥४॥२॥५८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 901) रागु रामकली महला ५ पड़ताल घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नरनरह नमसकारं ॥ जलन थलन बसुध गगन एक एकंकारं ॥१॥ रहाउ ॥

हरन धरन पुन पुनह करन ॥ नह गिरह निरंहारं ॥१॥

ग्मभीर धीर नाम हीर ऊच मूच अपारं ॥ करन केल गुण अमोल नानक बलिहारं ॥२॥१॥५९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 901) रामकली महला ५ ॥
रूप रंग सुगंध भोग तिआगि चले माइआ छले कनिक कामिनी ॥१॥ रहाउ ॥

भंडार दरब अरब खरब पेखि लीला मनु सधारै ॥ नह संगि गामनी ॥१॥

सुत कलत्र भ्रात मीत उरझि परिओ भरमि मोहिओ इह बिरख छामनी ॥ चरन कमल सरन नानक सुखु संत भावनी ॥२॥२॥६०॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 901) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु रामकली महला ९ तिपदे ॥
रे मन ओट लेहु हरि नामा ॥ जा कै सिमरनि दुरमति नासै पावहि पदु निरबाना ॥१॥ रहाउ ॥

बडभागी तिह जन कउ जानहु जो हरि के गुन गावै ॥ जनम जनम के पाप खोइ कै फुनि बैकुंठि सिधावै ॥१॥

अजामल कउ अंत काल महि नाराइन सुधि आई ॥ जां गति कउ जोगीसुर बाछत सो गति छिन महि पाई ॥२॥

नाहिन गुनु नाहिन कछु बिदिआ धरमु कउनु गजि कीना ॥ नानक बिरदु राम का देखहु अभै दानु तिह दीना ॥३॥१॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 902) रामकली महला ९ ॥
साधो कउन जुगति अब कीजै ॥ जा ते दुरमति सगल बिनासै राम भगति मनु भीजै ॥१॥ रहाउ ॥

मनु माइआ महि उरझि रहिओ है बूझै नह कछु गिआना ॥ कउनु नामु जगु जा कै सिमरै पावै पदु निरबाना ॥१॥

भए दइआल क्रिपाल संत जन तब इह बात बताई ॥ सरब धरम मानो तिह कीए जिह प्रभ कीरति गाई ॥२॥

राम नामु नरु निसि बासुर महि निमख एक उरि धारै ॥ जम को त्रासु मिटै नानक तिह अपुनो जनमु सवारै ॥३॥२॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 902) रामकली महला ९ ॥
प्रानी नाराइन सुधि लेहि ॥ छिनु छिनु अउध घटै निसि बासुर ब्रिथा जातु है देह ॥१॥ रहाउ ॥

तरनापो बिखिअन सिउ खोइओ बालपनु अगिआना ॥ बिरधि भइओ अजहू नही समझै कउन कुमति उरझाना ॥१॥

मानस जनमु दीओ जिह ठाकुरि सो तै किउ बिसराइओ ॥ मुकतु होत नर जा कै सिमरै निमख न ता कउ गाइओ ॥२॥

माइआ को मदु कहा करतु है संगि न काहू जाई ॥ नानकु कहतु चेति चिंतामनि होइ है अंति सहाई ॥३॥३॥८१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 902) रामकली महला १ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सोई चंदु चड़हि से तारे सोई दिनीअरु तपत रहै ॥ सा धरती सो पउणु झुलारे जुग जीअ खेले थाव कैसे ॥१॥

जीवन तलब निवारि ॥ होवै परवाणा करहि धिङाणा कलि लखण वीचारि ॥१॥ रहाउ ॥

कितै देसि न आइआ सुणीऐ तीरथ पासि न बैठा ॥ दाता दानु करे तह नाही महल उसारि न बैठा ॥२॥

जे को सतु करे सो छीजै तप घरि तपु न होई ॥ जे को नाउ लए बदनावी कलि के लखण एई ॥३॥

जिसु सिकदारी तिसहि खुआरी चाकर केहे डरणा ॥ जा सिकदारै पवै जंजीरी ता चाकर हथहु मरणा ॥४॥

आखु गुणा कलि आईऐ ॥ तिहु जुग केरा रहिआ तपावसु जे गुण देहि त पाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

कलि कलवाली सरा निबेड़ी काजी क्रिसना होआ ॥ बाणी ब्रहमा बेदु अथरबणु करणी कीरति लहिआ ॥५॥

पति विणु पूजा सत विणु संजमु जत विणु काहे जनेऊ ॥ नावहु धोवहु तिलकु चड़ावहु सुच विणु सोच न होई ॥६॥

कलि परवाणु कतेब कुराणु ॥ पोथी पंडित रहे पुराण ॥ नानक नाउ भइआ रहमाणु ॥ करि करता तू एको जाणु ॥७॥

नानक नामु मिलै वडिआई एदू उपरि करमु नही ॥ जे घरि होदै मंगणि जाईऐ फिरि ओलामा मिलै तही ॥८॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 903) रामकली महला १ ॥
जगु परबोधहि मड़ी बधावहि ॥ आसणु तिआगि काहे सचु पावहि ॥ ममता मोहु कामणि हितकारी ॥ ना अउधूती ना संसारी ॥१॥

जोगी बैसि रहहु दुबिधा दुखु भागै ॥ घरि घरि मागत लाज न लागै ॥१॥ रहाउ ॥

गावहि गीत न चीनहि आपु ॥ किउ लागी निवरै परतापु ॥ गुर कै सबदि रचै मन भाइ ॥ भिखिआ सहज वीचारी खाइ ॥२॥

भसम चड़ाइ करहि पाखंडु ॥ माइआ मोहि सहहि जम डंडु ॥ फूटै खापरु भीख न भाइ ॥ बंधनि बाधिआ आवै जाइ ॥३॥

बिंदु न राखहि जती कहावहि ॥ माई मागत त्रै लोभावहि ॥ निरदइआ नही जोति उजाला ॥ बूडत बूडे सरब जंजाला ॥४॥

भेख करहि खिंथा बहु थटूआ ॥ झूठो खेलु खेलै बहु नटूआ ॥ अंतरि अगनि चिंता बहु जारे ॥ विणु करमा कैसे उतरसि पारे ॥५॥

मुंद्रा फटक बनाई कानि ॥ मुकति नही बिदिआ बिगिआनि ॥ जिहवा इंद्री सादि लोभाना ॥ पसू भए नही मिटै नीसाना ॥६॥

त्रिबिधि लोगा त्रिबिधि जोगा ॥ सबदु वीचारै चूकसि सोगा ॥ ऊजलु साचु सु सबदु होइ ॥ जोगी जुगति वीचारे सोइ ॥७॥

तुझ पहि नउ निधि तू करणै जोगु ॥ थापि उथापे करे सु होगु ॥ जतु सतु संजमु सचु सुचीतु ॥ नानक जोगी त्रिभवण मीतु ॥८॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 903) रामकली महला १ ॥
खटु मटु देही मनु बैरागी ॥ सुरति सबदु धुनि अंतरि जागी ॥ वाजै अनहदु मेरा मनु लीणा ॥ गुर बचनी सचि नामि पतीणा ॥१॥

प्राणी राम भगति सुखु पाईऐ ॥ गुरमुखि हरि हरि मीठा लागै हरि हरि नामि समाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

माइआ मोहु बिवरजि समाए ॥ सतिगुरु भेटै मेलि मिलाए ॥ नामु रतनु निरमोलकु हीरा ॥ तितु राता मेरा मनु धीरा ॥२॥

हउमै ममता रोगु न लागै ॥ राम भगति जम का भउ भागै ॥ जमु जंदारु न लागै मोहि ॥ निरमल नामु रिदै हरि सोहि ॥३॥

सबदु बीचारि भए निरंकारी ॥ गुरमति जागे दुरमति परहारी ॥ अनदिनु जागि रहे लिव लाई ॥ जीवन मुकति गति अंतरि पाई ॥४॥

अलिपत गुफा महि रहहि निरारे ॥ तसकर पंच सबदि संघारे ॥ पर घर जाइ न मनु डोलाए ॥ सहज निरंतरि रहउ समाए ॥५॥

गुरमुखि जागि रहे अउधूता ॥ सद बैरागी ततु परोता ॥ जगु सूता मरि आवै जाइ ॥ बिनु गुर सबद न सोझी पाइ ॥६॥

अनहद सबदु वजै दिनु राती ॥ अविगत की गति गुरमुखि जाती ॥ तउ जानी जा सबदि पछानी ॥ एको रवि रहिआ निरबानी ॥७॥

सुंन समाधि सहजि मनु राता ॥ तजि हउ लोभा एको जाता ॥ गुर चेले अपना मनु मानिआ ॥ नानक दूजा मेटि समानिआ ॥८॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 904) रामकली महला १ ॥
साहा गणहि न करहि बीचारु ॥ साहे ऊपरि एकंकारु ॥ जिसु गुरु मिलै सोई बिधि जाणै ॥ गुरमति होइ त हुकमु पछाणै ॥१॥

झूठु न बोलि पाडे सचु कहीऐ ॥ हउमै जाइ सबदि घरु लहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

गणि गणि जोतकु कांडी कीनी ॥ पड़ै सुणावै ततु न चीनी ॥ सभसै ऊपरि गुर सबदु बीचारु ॥ होर कथनी बदउ न सगली छारु ॥२॥

नावहि धोवहि पूजहि सैला ॥ बिनु हरि राते मैलो मैला ॥ गरबु निवारि मिलै प्रभु सारथि ॥ मुकति प्रान जपि हरि किरतारथि ॥३॥

वाचै वादु न बेदु बीचारै ॥ आपि डुबै किउ पितरा तारै ॥ घटि घटि ब्रहमु चीनै जनु कोइ ॥ सतिगुरु मिलै त सोझी होइ ॥४॥

गणत गणीऐ सहसा दुखु जीऐ ॥ गुर की सरणि पवै सुखु थीऐ ॥ करि अपराध सरणि हम आइआ ॥ गुर हरि भेटे पुरबि कमाइआ ॥५॥

गुर सरणि न आईऐ ब्रहमु न पाईऐ ॥ भरमि भुलाईऐ जनमि मरि आईऐ ॥ जम दरि बाधउ मरै बिकारु ॥ ना रिदै नामु न सबदु अचारु ॥६॥

इकि पाधे पंडित मिसर कहावहि ॥ दुबिधा राते महलु न पावहि ॥ जिसु गुर परसादी नामु अधारु ॥ कोटि मधे को जनु आपारु ॥७॥

एकु बुरा भला सचु एकै ॥ बूझु गिआनी सतगुर की टेकै ॥ गुरमुखि विरली एको जाणिआ ॥ आवणु जाणा मेटि समाणिआ ॥८॥

जिन कै हिरदै एकंकारु ॥ सरब गुणी साचा बीचारु ॥ गुर कै भाणै करम कमावै ॥ नानक साचे साचि समावै ॥९॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 905) रामकली महला १ ॥
हठु निग्रहु करि काइआ छीजै ॥ वरतु तपनु करि मनु नही भीजै ॥ राम नाम सरि अवरु न पूजै ॥१॥

गुरु सेवि मना हरि जन संगु कीजै ॥ जमु जंदारु जोहि नही साकै सरपनि डसि न सकै हरि का रसु पीजै ॥१॥ रहाउ ॥

वादु पड़ै रागी जगु भीजै ॥ त्रै गुण बिखिआ जनमि मरीजै ॥ राम नाम बिनु दूखु सहीजै ॥२॥

चाड़सि पवनु सिंघासनु भीजै ॥ निउली करम खटु करम करीजै ॥ राम नाम बिनु बिरथा सासु लीजै ॥३॥

अंतरि पंच अगनि किउ धीरजु धीजै ॥ अंतरि चोरु किउ सादु लहीजै ॥ गुरमुखि होइ काइआ गड़ु लीजै ॥४॥

अंतरि मैलु तीरथ भरमीजै ॥ मनु नही सूचा किआ सोच करीजै ॥ किरतु पइआ दोसु का कउ दीजै ॥५॥

अंनु न खाहि देही दुखु दीजै ॥ बिनु गुर गिआन त्रिपति नही थीजै ॥ मनमुखि जनमै जनमि मरीजै ॥६॥

सतिगुर पूछि संगति जन कीजै ॥ मनु हरि राचै नही जनमि मरीजै ॥ राम नाम बिनु किआ करमु कीजै ॥७॥

ऊंदर दूंदर पासि धरीजै ॥ धुर की सेवा रामु रवीजै ॥ नानक नामु मिलै किरपा प्रभ कीजै ॥८॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 905) रामकली महला १ ॥
अंतरि उतभुजु अवरु न कोई ॥ जो कहीऐ सो प्रभ ते होई ॥ जुगह जुगंतरि साहिबु सचु सोई ॥ उतपति परलउ अवरु न कोई ॥१॥

ऐसा मेरा ठाकुरु गहिर ग्मभीरु ॥ जिनि जपिआ तिन ही सुखु पाइआ हरि कै नामि न लगै जम तीरु ॥१॥ रहाउ ॥

नामु रतनु हीरा निरमोलु ॥ साचा साहिबु अमरु अतोलु ॥ जिहवा सूची साचा बोलु ॥ घरि दरि साचा नाही रोलु ॥२॥

इकि बन महि बैसहि डूगरि असथानु ॥ नामु बिसारि पचहि अभिमानु ॥ नाम बिना किआ गिआन धिआनु ॥ गुरमुखि पावहि दरगहि मानु ॥३॥

हठु अहंकारु करै नही पावै ॥ पाठ पड़ै ले लोक सुणावै ॥ तीरथि भरमसि बिआधि न जावै ॥ नाम बिना कैसे सुखु पावै ॥४॥

जतन करै बिंदु किवै न रहाई ॥ मनूआ डोलै नरके पाई ॥ जम पुरि बाधो लहै सजाई ॥ बिनु नावै जीउ जलि बलि जाई ॥५॥

सिध साधिक केते मुनि देवा ॥ हठि निग्रहि न त्रिपतावहि भेवा ॥ सबदु वीचारि गहहि गुर सेवा ॥ मनि तनि निरमल अभिमान अभेवा ॥६॥

करमि मिलै पावै सचु नाउ ॥ तुम सरणागति रहउ सुभाउ ॥ तुम ते उपजिओ भगती भाउ ॥ जपु जापउ गुरमुखि हरि नाउ ॥७॥

हउमै गरबु जाइ मन भीनै ॥ झूठि न पावसि पाखंडि कीनै ॥ बिनु गुर सबद नही घरु बारु ॥ नानक गुरमुखि ततु बीचारु ॥८॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 906) रामकली महला १ ॥
जिउ आइआ तिउ जावहि बउरे जिउ जनमे तिउ मरणु भइआ ॥ जिउ रस भोग कीए तेता दुखु लागै नामु विसारि भवजलि पइआ ॥१॥

तनु धनु देखत गरबि गइआ ॥ कनिक कामनी सिउ हेतु वधाइहि की नामु विसारहि भरमि गइआ ॥१॥ रहाउ ॥

जतु सतु संजमु सीलु न राखिआ प्रेत पिंजर महि कासटु भइआ ॥ पुंनु दानु इसनानु न संजमु साधसंगति बिनु बादि जइआ ॥२॥

लालचि लागै नामु बिसारिओ आवत जावत जनमु गइआ ॥ जा जमु धाइ केस गहि मारै सुरति नही मुखि काल गइआ ॥३॥

अहिनिसि निंदा ताति पराई हिरदै नामु न सरब दइआ ॥ बिनु गुर सबद न गति पति पावहि राम नाम बिनु नरकि गइआ ॥४॥

खिन महि वेस करहि नटूआ जिउ मोह पाप महि गलतु गइआ ॥ इत उत माइआ देखि पसारी मोह माइआ कै मगनु भइआ ॥५॥

करहि बिकार विथार घनेरे सुरति सबद बिनु भरमि पइआ ॥ हउमै रोगु महा दुखु लागा गुरमति लेवहु रोगु गइआ ॥६॥

सुख स्मपति कउ आवत देखै साकत मनि अभिमानु भइआ ॥ जिस का इहु तनु धनु सो फिरि लेवै अंतरि सहसा दूखु पइआ ॥७॥

अंति कालि किछु साथि न चालै जो दीसै सभु तिसहि मइआ ॥ आदि पुरखु अपर्मपरु सो प्रभु हरि नामु रिदै लै पारि पइआ ॥८॥

मूए कउ रोवहि किसहि सुणावहि भै सागर असरालि पइआ ॥ देखि कुट्मबु माइआ ग्रिह मंदरु साकतु जंजालि परालि पइआ ॥९॥

जा आए ता तिनहि पठाए चाले तिनै बुलाइ लइआ ॥ जो किछु करणा सो करि रहिआ बखसणहारै बखसि लइआ ॥१०॥

जिनि एहु चाखिआ राम रसाइणु तिन की संगति खोजु भइआ ॥ रिधि सिधि बुधि गिआनु गुरू ते पाइआ मुकति पदारथु सरणि पइआ ॥११॥

दुखु सुखु गुरमुखि सम करि जाणा हरख सोग ते बिरकतु भइआ ॥ आपु मारि गुरमुखि हरि पाए नानक सहजि समाइ लइआ ॥१२॥७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 907) रामकली महला १ ॥
अउहठि हसत मड़ी घरु छाइआ धरणि गगन कल धारी ॥१॥

गुरमुखि केती सबदि उधारी संतहु ॥१॥ रहाउ ॥

ममता मारि हउमै सोखै त्रिभवणि जोति तुमारी ॥२॥

मनसा मारि मनै महि राखै सतिगुर सबदि वीचारी ॥३॥

सिंङी सुरति अनाहदि वाजै घटि घटि जोति तुमारी ॥४॥

परपंच बेणु तही मनु राखिआ ब्रहम अगनि परजारी ॥५॥

पंच ततु मिलि अहिनिसि दीपकु निरमल जोति अपारी ॥६॥

रवि ससि लउके इहु तनु किंगुरी वाजै सबदु निरारी ॥७॥

सिव नगरी महि आसणु अउधू अलखु अगमु अपारी ॥८॥

काइआ नगरी इहु मनु राजा पंच वसहि वीचारी ॥९॥

सबदि रवै आसणि घरि राजा अदलु करे गुणकारी ॥१०॥

कालु बिकालु कहे कहि बपुरे जीवत मूआ मनु मारी ॥११॥

ब्रहमा बिसनु महेस इक मूरति आपे करता कारी ॥१२॥

काइआ सोधि तरै भव सागरु आतम ततु वीचारी ॥१३॥

गुर सेवा ते सदा सुखु पाइआ अंतरि सबदु रविआ गुणकारी ॥१४॥

आपे मेलि लए गुणदाता हउमै त्रिसना मारी ॥१५॥

त्रै गुण मेटे चउथै वरतै एहा भगति निरारी ॥१६॥

गुरमुखि जोग सबदि आतमु चीनै हिरदै एकु मुरारी ॥१७॥

मनूआ असथिरु सबदे राता एहा करणी सारी ॥१८॥

बेदु बादु न पाखंडु अउधू गुरमुखि सबदि बीचारी ॥१९॥

गुरमुखि जोगु कमावै अउधू जतु सतु सबदि वीचारी ॥२०॥

सबदि मरै मनु मारे अउधू जोग जुगति वीचारी ॥२१॥

माइआ मोहु भवजलु है अवधू सबदि तरै कुल तारी ॥२२॥

सबदि सूर जुग चारे अउधू बाणी भगति वीचारी ॥२३॥

एहु मनु माइआ मोहिआ अउधू निकसै सबदि वीचारी ॥२४॥

आपे बखसे मेलि मिलाए नानक सरणि तुमारी ॥२५॥९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 908) रामकली महला ३ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सरमै दीआ मुंद्रा कंनी पाइ जोगी खिंथा करि तू दइआ ॥ आवणु जाणु बिभूति लाइ जोगी ता तीनि भवण जिणि लइआ ॥१॥

ऐसी किंगुरी वजाइ जोगी ॥ जितु किंगुरी अनहदु वाजै हरि सिउ रहै लिव लाइ ॥१॥ रहाउ ॥

सतु संतोखु पतु करि झोली जोगी अम्रित नामु भुगति पाई ॥ धिआन का करि डंडा जोगी सिंङी सुरति वजाई ॥२॥

मनु द्रिड़ु करि आसणि बैसु जोगी ता तेरी कलपणा जाई ॥ काइआ नगरी महि मंगणि चड़हि जोगी ता नामु पलै पाई ॥३॥

इतु किंगुरी धिआनु न लागै जोगी ना सचु पलै पाइ ॥ इतु किंगुरी सांति न आवै जोगी अभिमानु न विचहु जाइ ॥४॥

भउ भाउ दुइ पत लाइ जोगी इहु सरीरु करि डंडी ॥ गुरमुखि होवहि ता तंती वाजै इन बिधि त्रिसना खंडी ॥५॥

हुकमु बुझै सो जोगी कहीऐ एकस सिउ चितु लाए ॥ सहसा तूटै निरमलु होवै जोग जुगति इव पाए ॥६॥

नदरी आवदा सभु किछु बिनसै हरि सेती चितु लाइ ॥ सतिगुर नालि तेरी भावनी लागै ता इह सोझी पाइ ॥७॥

एहु जोगु न होवै जोगी जि कुट्मबु छोडि परभवणु करहि ॥ ग्रिह सरीर महि हरि हरि नामु गुर परसादी अपणा हरि प्रभु लहहि ॥८॥

इहु जगतु मिटी का पुतला जोगी इसु महि रोगु वडा त्रिसना माइआ ॥ अनेक जतन भेख करे जोगी रोगु न जाइ गवाइआ ॥९॥

हरि का नामु अउखधु है जोगी जिस नो मंनि वसाए ॥ गुरमुखि होवै सोई बूझै जोग जुगति सो पाए ॥१०॥

जोगै का मारगु बिखमु है जोगी जिस नो नदरि करे सो पाए ॥ अंतरि बाहरि एको वेखै विचहु भरमु चुकाए ॥११॥

विणु वजाई किंगुरी वाजै जोगी सा किंगुरी वजाइ ॥ कहै नानकु मुकति होवहि जोगी साचे रहहि समाइ ॥१२॥१॥१०॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 909) रामकली महला ३ ॥
भगति खजाना गुरमुखि जाता सतिगुरि बूझि बुझाई ॥१॥

संतहु गुरमुखि देइ वडिआई ॥१॥ रहाउ ॥

सचि रहहु सदा सहजु सुखु उपजै कामु क्रोधु विचहु जाई ॥२॥

आपु छोडि नाम लिव लागी ममता सबदि जलाई ॥३॥

जिस ते उपजै तिस ते बिनसै अंते नामु सखाई ॥४॥

सदा हजूरि दूरि नह देखहु रचना जिनि रचाई ॥५॥

सचा सबदु रवै घट अंतरि सचे सिउ लिव लाई ॥६॥

सतसंगति महि नामु निरमोलकु वडै भागि पाइआ जाई ॥७॥

भरमि न भूलहु सतिगुरु सेवहु मनु राखहु इक ठाई ॥८॥

बिनु नावै सभ भूली फिरदी बिरथा जनमु गवाई ॥९॥

जोगी जुगति गवाई हंढै पाखंडि जोगु न पाई ॥१०॥

सिव नगरी महि आसणि बैसै गुर सबदी जोगु पाई ॥११॥

धातुर बाजी सबदि निवारे नामु वसै मनि आई ॥१२॥

एहु सरीरु सरवरु है संतहु इसनानु करे लिव लाई ॥१३॥

नामि इसनानु करहि से जन निरमल सबदे मैलु गवाई ॥१४॥

त्रै गुण अचेत नामु चेतहि नाही बिनु नावै बिनसि जाई ॥१५॥

ब्रहमा बिसनु महेसु त्रै मूरति त्रिगुणि भरमि भुलाई ॥१६॥

गुर परसादी त्रिकुटी छूटै चउथै पदि लिव लाई ॥१७॥

पंडित पड़हि पड़ि वादु वखाणहि तिंना बूझ न पाई ॥१८॥

बिखिआ माते भरमि भुलाए उपदेसु कहहि किसु भाई ॥१९॥

भगत जना की ऊतम बाणी जुगि जुगि रही समाई ॥२०॥

बाणी लागै सो गति पाए सबदे सचि समाई ॥२१॥

काइआ नगरी सबदे खोजे नामु नवं निधि पाई ॥२२॥

मनसा मारि मनु सहजि समाणा बिनु रसना उसतति कराई ॥२३॥

लोइण देखि रहे बिसमादी चितु अदिसटि लगाई ॥२४॥

अदिसटु सदा रहै निरालमु जोती जोति मिलाई ॥२५॥

हउ गुरु सालाही सदा आपणा जिनि साची बूझ बुझाई ॥२६॥

नानकु एक कहै बेनंती नावहु गति पति पाई ॥२७॥२॥११॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 910) रामकली महला ३ ॥
हरि की पूजा दुल्मभ है संतहु कहणा कछू न जाई ॥१॥

संतहु गुरमुखि पूरा पाई ॥ नामो पूज कराई ॥१॥ रहाउ ॥

हरि बिनु सभु किछु मैला संतहु किआ हउ पूज चड़ाई ॥२॥

हरि साचे भावै सा पूजा होवै भाणा मनि वसाई ॥३॥

पूजा करै सभु लोकु संतहु मनमुखि थाइ न पाई ॥४॥

सबदि मरै मनु निरमलु संतहु एह पूजा थाइ पाई ॥५॥

पवित पावन से जन साचे एक सबदि लिव लाई ॥६॥

बिनु नावै होर पूज न होवी भरमि भुली लोकाई ॥७॥

गुरमुखि आपु पछाणै संतहु राम नामि लिव लाई ॥८॥

आपे निरमलु पूज कराए गुर सबदी थाइ पाई ॥९॥

पूजा करहि परु बिधि नही जाणहि दूजै भाइ मलु लाई ॥१०॥

गुरमुखि होवै सु पूजा जाणै भाणा मनि वसाई ॥११॥

भाणे ते सभि सुख पावै संतहु अंते नामु सखाई ॥१२॥

अपणा आपु न पछाणहि संतहु कूड़ि करहि वडिआई ॥१३॥

पाखंडि कीनै जमु नही छोडै लै जासी पति गवाई ॥१४॥

जिन अंतरि सबदु आपु पछाणहि गति मिति तिन ही पाई ॥१५॥

एहु मनूआ सुंन समाधि लगावै जोती जोति मिलाई ॥१६॥

सुणि सुणि गुरमुखि नामु वखाणहि सतसंगति मेलाई ॥१७॥

गुरमुखि गावै आपु गवावै दरि साचै सोभा पाई ॥१८॥

साची बाणी सचु वखाणै सचि नामि लिव लाई ॥१९॥

भै भंजनु अति पाप निखंजनु मेरा प्रभु अंति सखाई ॥२०॥

सभु किछु आपे आपि वरतै नानक नामि वडिआई ॥२१॥३॥१२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 910) रामकली महला ३ ॥
हम कुचल कुचील अति अभिमानी मिलि सबदे मैलु उतारी ॥१॥

संतहु गुरमुखि नामि निसतारी ॥ सचा नामु वसिआ घट अंतरि करतै आपि सवारी ॥१॥ रहाउ ॥

पारस परसे फिरि पारसु होए हरि जीउ अपणी किरपा धारी ॥२॥

इकि भेख करहि फिरहि अभिमानी तिन जूऐ बाजी हारी ॥३॥

इकि अनदिनु भगति करहि दिनु राती राम नामु उरि धारी ॥४॥

अनदिनु राते सहजे माते सहजे हउमै मारी ॥५॥

भै बिनु भगति न होई कब ही भै भाइ भगति सवारी ॥६॥

माइआ मोहु सबदि जलाइआ गिआनि तति बीचारी ॥७॥

आपे आपि कराए करता आपे बखसि भंडारी ॥८॥

तिस किआ गुणा का अंतु न पाइआ हउ गावा सबदि वीचारी ॥९॥

हरि जीउ जपी हरि जीउ सालाही विचहु आपु निवारी ॥१०॥

नामु पदारथु गुर ते पाइआ अखुट सचे भंडारी ॥११॥

अपणिआ भगता नो आपे तुठा अपणी किरपा करि कल धारी ॥१२॥

तिन साचे नाम की सदा भुख लागी गावनि सबदि वीचारी ॥१३॥

जीउ पिंडु सभु किछु है तिस का आखणु बिखमु बीचारी ॥१४॥

सबदि लगे सेई जन निसतरे भउजलु पारि उतारी ॥१५॥

बिनु हरि साचे को पारि न पावै बूझै को वीचारी ॥१६॥

जो धुरि लिखिआ सोई पाइआ मिलि हरि सबदि सवारी ॥१७॥

काइआ कंचनु सबदे राती साचै नाइ पिआरी ॥१८॥

काइआ अम्रिति रही भरपूरे पाईऐ सबदि वीचारी ॥१९॥

जो प्रभु खोजहि सेई पावहि होरि फूटि मूए अहंकारी ॥२०॥

बादी बिनसहि सेवक सेवहि गुर कै हेति पिआरी ॥२१॥

सो जोगी ततु गिआनु बीचारे हउमै त्रिसना मारी ॥२२॥

सतिगुरु दाता तिनै पछाता जिस नो क्रिपा तुमारी ॥२३॥

सतिगुरु न सेवहि माइआ लागे डूबि मूए अहंकारी ॥२४॥

जिचरु अंदरि सासु तिचरु सेवा कीचै जाइ मिलीऐ राम मुरारी ॥२५॥

अनदिनु जागत रहै दिनु राती अपने प्रिअ प्रीति पिआरी ॥२६॥

तनु मनु वारी वारि घुमाई अपने गुर विटहु बलिहारी ॥२७॥

माइआ मोहु बिनसि जाइगा उबरे सबदि वीचारी ॥२८॥

आपि जगाए सेई जागे गुर कै सबदि वीचारी ॥२९॥

नानक सेई मूए जि नामु न चेतहि भगत जीवे वीचारी ॥३०॥४॥१३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 911) रामकली महला ३ ॥
नामु खजाना गुर ते पाइआ त्रिपति रहे आघाई ॥१॥

संतहु गुरमुखि मुकति गति पाई ॥ एकु नामु वसिआ घट अंतरि पूरे की वडिआई ॥१॥ रहाउ ॥

आपे करता आपे भुगता देदा रिजकु सबाई ॥२॥

जो किछु करणा सो करि रहिआ अवरु न करणा जाई ॥३॥

आपे साजे स्रिसटि उपाए सिरि सिरि धंधै लाई ॥४॥

तिसहि सरेवहु ता सुखु पावहु सतिगुरि मेलि मिलाई ॥५॥

आपणा आपु आपि उपाए अलखु न लखणा जाई ॥६॥

आपे मारि जीवाले आपे तिस नो तिलु न तमाई ॥७॥

इकि दाते इकि मंगते कीते आपे भगति कराई ॥८॥

से वडभागी जिनी एको जाता सचे रहे समाई ॥९॥

आपि सरूपु सिआणा आपे कीमति कहणु न जाई ॥१०॥

आपे दुखु सुखु पाए अंतरि आपे भरमि भुलाई ॥११॥

वडा दाता गुरमुखि जाता निगुरी अंध फिरै लोकाई ॥१२॥

जिनी चाखिआ तिना सादु आइआ सतिगुरि बूझ बुझाई ॥१३॥

इकना नावहु आपि भुलाए इकना गुरमुखि देइ बुझाई ॥१४॥

सदा सदा सालाहिहु संतहु तिस दी वडी वडिआई ॥१५॥

तिसु बिनु अवरु न कोई राजा करि तपावसु बणत बणाई ॥१६॥

निआउ तिसै का है सद साचा विरले हुकमु मनाई ॥१७॥

तिस नो प्राणी सदा धिआवहु जिनि गुरमुखि बणत बणाई ॥१८॥

सतिगुर भेटै सो जनु सीझै जिसु हिरदै नामु वसाई ॥१९॥

सचा आपि सदा है साचा बाणी सबदि सुणाई ॥२०॥

नानक सुणि वेखि रहिआ विसमादु मेरा प्रभु रविआ स्रब थाई ॥२१॥५॥१४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 912) रामकली महला ५ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किनही कीआ परविरति पसारा ॥ किनही कीआ पूजा बिसथारा ॥ किनही निवल भुइअंगम साधे ॥ मोहि दीन हरि हरि आराधे ॥१॥

तेरा भरोसा पिआरे ॥ आन न जाना वेसा ॥१॥ रहाउ ॥

किनही ग्रिहु तजि वण खंडि पाइआ ॥ किनही मोनि अउधूतु सदाइआ ॥ कोई कहतउ अनंनि भगउती ॥ मोहि दीन हरि हरि ओट लीती ॥२॥

किनही कहिआ हउ तीरथ वासी ॥ कोई अंनु तजि भइआ उदासी ॥ किनही भवनु सभ धरती करिआ ॥ मोहि दीन हरि हरि दरि परिआ ॥३॥

किनही कहिआ मै कुलहि वडिआई ॥ किनही कहिआ बाह बहु भाई ॥ कोई कहै मै धनहि पसारा ॥ मोहि दीन हरि हरि आधारा ॥४॥

किनही घूघर निरति कराई ॥ किनहू वरत नेम माला पाई ॥ किनही तिलकु गोपी चंदन लाइआ ॥ मोहि दीन हरि हरि हरि धिआइआ ॥५॥

किनही सिध बहु चेटक लाए ॥ किनही भेख बहु थाट बनाए ॥ किनही तंत मंत बहु खेवा ॥ मोहि दीन हरि हरि हरि सेवा ॥६॥

कोई चतुरु कहावै पंडित ॥ को खटु करम सहित सिउ मंडित ॥ कोई करै आचार सुकरणी ॥ मोहि दीन हरि हरि हरि सरणी ॥७॥

सगले करम धरम जुग सोधे ॥ बिनु नावै इहु मनु न प्रबोधे ॥ कहु नानक जउ साधसंगु पाइआ ॥ बूझी त्रिसना महा सीतलाइआ ॥८॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 913) रामकली महला ५ ॥
इसु पानी ते जिनि तू घरिआ ॥ माटी का ले देहुरा करिआ ॥ उकति जोति लै सुरति परीखिआ ॥ मात गरभ महि जिनि तू राखिआ ॥१॥

राखनहारु सम्हारि जना ॥ सगले छोडि बीचार मना ॥१॥ रहाउ ॥

जिनि दीए तुधु बाप महतारी ॥ जिनि दीए भ्रात पुत हारी ॥ जिनि दीए तुधु बनिता अरु मीता ॥ तिसु ठाकुर कउ रखि लेहु चीता ॥२॥

जिनि दीआ तुधु पवनु अमोला ॥ जिनि दीआ तुधु नीरु निरमोला ॥ जिनि दीआ तुधु पावकु बलना ॥ तिसु ठाकुर की रहु मन सरना ॥३॥

छतीह अम्रित जिनि भोजन दीए ॥ अंतरि थान ठहरावन कउ कीए ॥ बसुधा दीओ बरतनि बलना ॥ तिसु ठाकुर के चिति रखु चरना ॥४॥

पेखन कउ नेत्र सुनन कउ करना ॥ हसत कमावन बासन रसना ॥ चरन चलन कउ सिरु कीनो मेरा ॥ मन तिसु ठाकुर के पूजहु पैरा ॥५॥

अपवित्र पवित्रु जिनि तू करिआ ॥ सगल जोनि महि तू सिरि धरिआ ॥ अब तू सीझु भावै नही सीझै ॥ कारजु सवरै मन प्रभु धिआईजै ॥६॥

ईहा ऊहा एकै ओही ॥ जत कत देखीऐ तत तत तोही ॥ तिसु सेवत मनि आलसु करै ॥ जिसु विसरिऐ इक निमख न सरै ॥७॥

हम अपराधी निरगुनीआरे ॥ ना किछु सेवा ना करमारे ॥ गुरु बोहिथु वडभागी मिलिआ ॥ नानक दास संगि पाथर तरिआ ॥८॥२॥


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