राग रामकली - बाणी शब्द, Raag Ramkali - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू नानक देव जी -- SGGS 876) रामकली महला १ घरु १ चउपदे
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
कोई पड़ता सहसाकिरता कोई पड़ै पुराना ॥ कोई नामु जपै जपमाली लागै तिसै धिआना ॥ अब ही कब ही किछू न जाना तेरा एको नामु पछाना ॥१॥

न जाणा हरे मेरी कवन गते ॥ हम मूरख अगिआन सरनि प्रभ तेरी करि किरपा राखहु मेरी लाज पते ॥१॥ रहाउ ॥

कबहू जीअड़ा ऊभि चड़तु है कबहू जाइ पइआले ॥ लोभी जीअड़ा थिरु न रहतु है चारे कुंडा भाले ॥२॥

मरणु लिखाइ मंडल महि आए जीवणु साजहि माई ॥ एकि चले हम देखह सुआमी भाहि बलंती आई ॥३॥

न किसी का मीतु न किसी का भाई ना किसै बापु न माई ॥ प्रणवति नानक जे तू देवहि अंते होइ सखाई ॥४॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 876) रामकली महला १ ॥
सरब जोति तेरी पसरि रही ॥ जह जह देखा तह नरहरी ॥१॥

जीवन तलब निवारि सुआमी ॥ अंध कूपि माइआ मनु गाडिआ किउ करि उतरउ पारि सुआमी ॥१॥ रहाउ ॥

जह भीतरि घट भीतरि बसिआ बाहरि काहे नाही ॥ तिन की सार करे नित साहिबु सदा चिंत मन माही ॥२॥

आपे नेड़ै आपे दूरि ॥ आपे सरब रहिआ भरपूरि ॥ सतगुरु मिलै अंधेरा जाइ ॥ जह देखा तह रहिआ समाइ ॥३॥

अंतरि सहसा बाहरि माइआ नैणी लागसि बाणी ॥ प्रणवति नानकु दासनि दासा परतापहिगा प्राणी ॥४॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 877) रामकली महला १ ॥
जितु दरि वसहि कवनु दरु कहीऐ दरा भीतरि दरु कवनु लहै ॥ जिसु दर कारणि फिरा उदासी सो दरु कोई आइ कहै ॥१॥

किन बिधि सागरु तरीऐ ॥ जीवतिआ नह मरीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

दुखु दरवाजा रोहु रखवाला आसा अंदेसा दुइ पट जड़े ॥ माइआ जलु खाई पाणी घरु बाधिआ सत कै आसणि पुरखु रहै ॥२॥

किंते नामा अंतु न जाणिआ तुम सरि नाही अवरु हरे ॥ ऊचा नही कहणा मन महि रहणा आपे जाणै आपि करे ॥३॥

जब आसा अंदेसा तब ही किउ करि एकु कहै ॥ आसा भीतरि रहै निरासा तउ नानक एकु मिलै ॥४॥

इन बिधि सागरु तरीऐ ॥ जीवतिआ इउ मरीऐ ॥१॥ रहाउ दूजा ॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 877) रामकली महला १ ॥
सुरति सबदु साखी मेरी सिंङी बाजै लोकु सुणे ॥ पतु झोली मंगण कै ताई भीखिआ नामु पड़े ॥१॥

बाबा गोरखु जागै ॥ गोरखु सो जिनि गोइ उठाली करते बार न लागै ॥१॥ रहाउ ॥

पाणी प्राण पवणि बंधि राखे चंदु सूरजु मुखि दीए ॥ मरण जीवण कउ धरती दीनी एते गुण विसरे ॥२॥

सिध साधिक अरु जोगी जंगम पीर पुरस बहुतेरे ॥ जे तिन मिला त कीरति आखा ता मनु सेव करे ॥३॥

कागदु लूणु रहै घ्रित संगे पाणी कमलु रहै ॥ ऐसे भगत मिलहि जन नानक तिन जमु किआ करै ॥४॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 877) रामकली महला १ ॥
सुणि माछिंद्रा नानकु बोलै ॥ वसगति पंच करे नह डोलै ॥ ऐसी जुगति जोग कउ पाले ॥ आपि तरै सगले कुल तारे ॥१॥

सो अउधूतु ऐसी मति पावै ॥ अहिनिसि सुंनि समाधि समावै ॥१॥ रहाउ ॥

भिखिआ भाइ भगति भै चलै ॥ होवै सु त्रिपति संतोखि अमुलै ॥ धिआन रूपि होइ आसणु पावै ॥ सचि नामि ताड़ी चितु लावै ॥२॥

नानकु बोलै अम्रित बाणी ॥ सुणि माछिंद्रा अउधू नीसाणी ॥ आसा माहि निरासु वलाए ॥ निहचउ नानक करते पाए ॥३॥

प्रणवति नानकु अगमु सुणाए ॥ गुर चेले की संधि मिलाए ॥ दीखिआ दारू भोजनु खाइ ॥ छिअ दरसन की सोझी पाइ ॥४॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 878) रामकली महला १ ॥
हम डोलत बेड़ी पाप भरी है पवणु लगै मतु जाई ॥ सनमुख सिध भेटण कउ आए निहचउ देहि वडिआई ॥१॥

गुर तारि तारणहारिआ ॥ देहि भगति पूरन अविनासी हउ तुझ कउ बलिहारिआ ॥१॥ रहाउ ॥

सिध साधिक जोगी अरु जंगम एकु सिधु जिनी धिआइआ ॥ परसत पैर सिझत ते सुआमी अखरु जिन कउ आइआ ॥२॥

जप तप संजम करम न जाना नामु जपी प्रभ तेरा ॥ गुरु परमेसरु नानक भेटिओ साचै सबदि निबेरा ॥३॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 878) रामकली महला १ ॥
सुरती सुरति रलाईऐ एतु ॥ तनु करि तुलहा लंघहि जेतु ॥ अंतरि भाहि तिसै तू रखु ॥ अहिनिसि दीवा बलै अथकु ॥१॥

ऐसा दीवा नीरि तराइ ॥ जितु दीवै सभ सोझी पाइ ॥१॥ रहाउ ॥

हछी मिटी सोझी होइ ॥ ता का कीआ मानै सोइ ॥ करणी ते करि चकहु ढालि ॥ ऐथै ओथै निबही नालि ॥२॥

आपे नदरि करे जा सोइ ॥ गुरमुखि विरला बूझै कोइ ॥ तितु घटि दीवा निहचलु होइ ॥ पाणी मरै न बुझाइआ जाइ ॥ ऐसा दीवा नीरि तराइ ॥३॥

डोलै वाउ न वडा होइ ॥ जापै जिउ सिंघासणि लोइ ॥ खत्री ब्राहमणु सूदु कि वैसु ॥ निरति न पाईआ गणी सहंस ॥ ऐसा दीवा बाले कोइ ॥ नानक सो पारंगति होइ ॥४॥७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 878) रामकली महला १ ॥
तुधनो निवणु मंनणु तेरा नाउ ॥ साचु भेट बैसण कउ थाउ ॥ सतु संतोखु होवै अरदासि ॥ ता सुणि सदि बहाले पासि ॥१॥

नानक बिरथा कोइ न होइ ॥ ऐसी दरगह साचा सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

प्रापति पोता करमु पसाउ ॥ तू देवहि मंगत जन चाउ ॥ भाडै भाउ पवै तितु आइ ॥ धुरि तै छोडी कीमति पाइ ॥२॥

जिनि किछु कीआ सो किछु करै ॥ अपनी कीमति आपे धरै ॥ गुरमुखि परगटु होआ हरि राइ ॥ ना को आवै ना को जाइ ॥३॥

लोकु धिकारु कहै मंगत जन मागत मानु न पाइआ ॥ सह कीआ गला दर कीआ बाता तै ता कहणु कहाइआ ॥४॥८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 878) रामकली महला १ ॥
सागर महि बूंद बूंद महि सागरु कवणु बुझै बिधि जाणै ॥ उतभुज चलत आपि करि चीनै आपे ततु पछाणै ॥१॥

ऐसा गिआनु बीचारै कोई ॥ तिस ते मुकति परम गति होई ॥१॥ रहाउ ॥

दिन महि रैणि रैणि महि दिनीअरु उसन सीत बिधि सोई ॥ ता की गति मिति अवरु न जाणै गुर बिनु समझ न होई ॥२॥

पुरख महि नारि नारि महि पुरखा बूझहु ब्रहम गिआनी ॥ धुनि महि धिआनु धिआन महि जानिआ गुरमुखि अकथ कहानी ॥३॥

मन महि जोति जोति महि मनूआ पंच मिले गुर भाई ॥ नानक तिन कै सद बलिहारी जिन एक सबदि लिव लाई ॥४॥९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 879) रामकली महला १ ॥
जा हरि प्रभि किरपा धारी ॥ ता हउमै विचहु मारी ॥ सो सेवकि राम पिआरी ॥ जो गुर सबदी बीचारी ॥१॥

सो हरि जनु हरि प्रभ भावै ॥ अहिनिसि भगति करे दिनु राती लाज छोडि हरि के गुण गावै ॥१॥ रहाउ ॥

धुनि वाजे अनहद घोरा ॥ मनु मानिआ हरि रसि मोरा ॥ गुर पूरै सचु समाइआ ॥ गुरु आदि पुरखु हरि पाइआ ॥२॥

सभि नाद बेद गुरबाणी ॥ मनु राता सारिगपाणी ॥ तह तीरथ वरत तप सारे ॥ गुर मिलिआ हरि निसतारे ॥३॥

जह आपु गइआ भउ भागा ॥ गुर चरणी सेवकु लागा ॥ गुरि सतिगुरि भरमु चुकाइआ ॥ कहु नानक सबदि मिलाइआ ॥४॥१०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 879) रामकली महला १ ॥
छादनु भोजनु मागतु भागै ॥ खुधिआ दुसट जलै दुखु आगै ॥ गुरमति नही लीनी दुरमति पति खोई ॥ गुरमति भगति पावै जनु कोई ॥१॥

जोगी जुगति सहज घरि वासै ॥ एक द्रिसटि एको करि देखिआ भीखिआ भाइ सबदि त्रिपतासै ॥१॥ रहाउ ॥

पंच बैल गडीआ देह धारी ॥ राम कला निबहै पति सारी ॥ धर तूटी गाडो सिर भारि ॥ लकरी बिखरि जरी मंझ भारि ॥२॥

गुर का सबदु वीचारि जोगी ॥ दुखु सुखु सम करणा सोग बिओगी ॥ भुगति नामु गुर सबदि बीचारी ॥ असथिरु कंधु जपै निरंकारी ॥३॥

सहज जगोटा बंधन ते छूटा ॥ कामु क्रोधु गुर सबदी लूटा ॥ मन महि मुंद्रा हरि गुर सरणा ॥ नानक राम भगति जन तरणा ॥४॥११॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 880) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रामकली महला ३ घरु १ ॥
सतजुगि सचु कहै सभु कोई ॥ घरि घरि भगति गुरमुखि होई ॥ सतजुगि धरमु पैर है चारि ॥ गुरमुखि बूझै को बीचारि ॥१॥

जुग चारे नामि वडिआई होई ॥ जि नामि लागै सो मुकति होवै गुर बिनु नामु न पावै कोई ॥१॥ रहाउ ॥

त्रेतै इक कल कीनी दूरि ॥ पाखंडु वरतिआ हरि जाणनि दूरि ॥ गुरमुखि बूझै सोझी होई ॥ अंतरि नामु वसै सुखु होई ॥२॥

दुआपुरि दूजै दुबिधा होइ ॥ भरमि भुलाने जाणहि दोइ ॥ दुआपुरि धरमि दुइ पैर रखाए ॥ गुरमुखि होवै त नामु द्रिड़ाए ॥३॥

कलजुगि धरम कला इक रहाए ॥ इक पैरि चलै माइआ मोहु वधाए ॥ माइआ मोहु अति गुबारु ॥ सतगुरु भेटै नामि उधारु ॥४॥

सभ जुग महि साचा एको सोई ॥ सभ महि सचु दूजा नही कोई ॥ साची कीरति सचु सुखु होई ॥ गुरमुखि नामु वखाणै कोई ॥५॥

सभ जुग महि नामु ऊतमु होई ॥ गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥ हरि नामु धिआए भगतु जनु सोई ॥ नानक जुगि जुगि नामि वडिआई होई ॥६॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 880) रामकली महला ४ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जे वड भाग होवहि वडभागी ता हरि हरि नामु धिआवै ॥ नामु जपत नामे सुखु पावै हरि नामे नामि समावै ॥१॥

गुरमुखि भगति करहु सद प्राणी ॥ हिरदै प्रगासु होवै लिव लागै गुरमति हरि हरि नामि समाणी ॥१॥ रहाउ ॥

हीरा रतन जवेहर माणक बहु सागर भरपूरु कीआ ॥ जिसु वड भागु होवै वड मसतकि तिनि गुरमति कढि कढि लीआ ॥२॥

रतनु जवेहरु लालु हरि नामा गुरि काढि तली दिखलाइआ ॥ भागहीण मनमुखि नही लीआ त्रिण ओलै लाखु छपाइआ ॥३॥

मसतकि भागु होवै धुरि लिखिआ ता सतगुरु सेवा लाए ॥ नानक रतन जवेहर पावै धनु धनु गुरमति हरि पाए ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 880) रामकली महला ४ ॥
राम जना मिलि भइआ अनंदा हरि नीकी कथा सुनाइ ॥ दुरमति मैलु गई सभ नीकलि सतसंगति मिलि बुधि पाइ ॥१॥

राम जन गुरमति रामु बोलाइ ॥ जो जो सुणै कहै सो मुकता राम जपत सोहाइ ॥१॥ रहाउ ॥

जे वड भाग होवहि मुखि मसतकि हरि राम जना भेटाइ ॥ दरसनु संत देहु करि किरपा सभु दालदु दुखु लहि जाइ ॥२॥

हरि के लोग राम जन नीके भागहीण न सुखाइ ॥ जिउ जिउ राम कहहि जन ऊचे नर निंदक डंसु लगाइ ॥३॥

ध्रिगु ध्रिगु नर निंदक जिन जन नही भाए हरि के सखा सखाइ ॥ से हरि के चोर वेमुख मुख काले जिन गुर की पैज न भाइ ॥४॥

दइआ दइआ करि राखहु हरि जीउ हम दीन तेरी सरणाइ ॥ हम बारिक तुम पिता प्रभ मेरे जन नानक बखसि मिलाइ ॥५॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 881) रामकली महला ४ ॥
हरि के सखा साध जन नीके तिन ऊपरि हाथु वतावै ॥ गुरमुखि साध सेई प्रभ भाए करि किरपा आपि मिलावै ॥१॥

राम मो कउ हरि जन मेलि मनि भावै ॥ अमिउ अमिउ हरि रसु है मीठा मिलि संत जना मुखि पावै ॥१॥ रहाउ ॥

हरि के लोग राम जन ऊतम मिलि ऊतम पदवी पावै ॥ हम होवत चेरी दास दासन की मेरा ठाकुरु खुसी करावै ॥२॥

सेवक जन सेवहि से वडभागी रिद मनि तनि प्रीति लगावै ॥ बिनु प्रीती करहि बहु बाता कूड़ु बोलि कूड़ो फलु पावै ॥३॥

मो कउ धारि क्रिपा जगजीवन दाते हरि संत पगी ले पावै ॥ हउ काटउ काटि बाढि सिरु राखउ जितु नानक संतु चड़ि आवै ॥४॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 881) रामकली महला ४ ॥
जे वड भाग होवहि वड मेरे जन मिलदिआ ढिल न लाईऐ ॥ हरि जन अम्रित कुंट सर नीके वडभागी तितु नावाईऐ ॥१॥

राम मो कउ हरि जन कारै लाईऐ ॥ हउ पाणी पखा पीसउ संत आगै पग मलि मलि धूरि मुखि लाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि जन वडे वडे वड ऊचे जो सतगुर मेलि मिलाईऐ ॥ सतगुर जेवडु अवरु न कोई मिलि सतगुर पुरख धिआईऐ ॥२॥

सतगुर सरणि परे तिन पाइआ मेरे ठाकुर लाज रखाईऐ ॥ इकि अपणै सुआइ आइ बहहि गुर आगै जिउ बगुल समाधि लगाईऐ ॥३॥

बगुला काग नीच की संगति जाइ करंग बिखू मुखि लाईऐ ॥ नानक मेलि मेलि प्रभ संगति मिलि संगति हंसु कराईऐ ॥४॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 882) रामकली महला ४ ॥
सतगुर दइआ करहु हरि मेलहु मेरे प्रीतम प्राण हरि राइआ ॥ हम चेरी होइ लगह गुर चरणी जिनि हरि प्रभ मारगु पंथु दिखाइआ ॥१॥

राम मै हरि हरि नामु मनि भाइआ ॥ मै हरि बिनु अवरु न कोई बेली मेरा पिता माता हरि सखाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

मेरे इकु खिनु प्रान न रहहि बिनु प्रीतम बिनु देखे मरहि मेरी माइआ ॥ धनु धनु वड भाग गुर सरणी आए हरि गुर मिलि दरसनु पाइआ ॥२॥

मै अवरु न कोई सूझै बूझै मनि हरि जपु जपउ जपाइआ ॥ नामहीण फिरहि से नकटे तिन घसि घसि नक वढाइआ ॥३॥

मो कउ जगजीवन जीवालि लै सुआमी रिद अंतरि नामु वसाइआ ॥ नानक गुरू गुरू है पूरा मिलि सतिगुर नामु धिआइआ ॥४॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 882) रामकली महला ४ ॥
सतगुरु दाता वडा वड पुरखु है जितु मिलिऐ हरि उर धारे ॥ जीअ दानु गुरि पूरै दीआ हरि अम्रित नामु समारे ॥१॥

राम गुरि हरि हरि नामु कंठि धारे ॥ गुरमुखि कथा सुणी मनि भाई धनु धनु वड भाग हमारे ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि कोटि तेतीस धिआवहि ता का अंतु न पावहि पारे ॥ हिरदै काम कामनी मागहि रिधि मागहि हाथु पसारे ॥२॥

हरि जसु जपि जपु वडा वडेरा गुरमुखि रखउ उरि धारे ॥ जे वड भाग होवहि ता जपीऐ हरि भउजलु पारि उतारे ॥३॥

हरि जन निकटि निकटि हरि जन है हरि राखै कंठि जन धारे ॥ नानक पिता माता है हरि प्रभु हम बारिक हरि प्रतिपारे ॥४॥६॥१८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 882) रागु रामकली महला ५ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किरपा करहु दीन के दाते मेरा गुणु अवगणु न बीचारहु कोई ॥ माटी का किआ धोपै सुआमी माणस की गति एही ॥१॥

मेरे मन सतिगुरु सेवि सुखु होई ॥ जो इछहु सोई फलु पावहु फिरि दूखु न विआपै कोई ॥१॥ रहाउ ॥

काचे भाडे साजि निवाजे अंतरि जोति समाई ॥ जैसा लिखतु लिखिआ धुरि करतै हम तैसी किरति कमाई ॥२॥

मनु तनु थापि कीआ सभु अपना एहो आवण जाणा ॥ जिनि दीआ सो चिति न आवै मोहि अंधु लपटाणा ॥३॥

जिनि कीआ सोई प्रभु जाणै हरि का महलु अपारा ॥ भगति करी हरि के गुण गावा नानक दासु तुमारा ॥४॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 883) रामकली महला ५ ॥
पवहु चरणा तलि ऊपरि आवहु ऐसी सेव कमावहु ॥ आपस ते ऊपरि सभ जाणहु तउ दरगह सुखु पावहु ॥१॥

संतहु ऐसी कथहु कहाणी ॥ सुर पवित्र नर देव पवित्रा खिनु बोलहु गुरमुखि बाणी ॥१॥ रहाउ ॥

परपंचु छोडि सहज घरि बैसहु झूठा कहहु न कोई ॥ सतिगुर मिलहु नवै निधि पावहु इन बिधि ततु बिलोई ॥२॥

भरमु चुकावहु गुरमुखि लिव लावहु आतमु चीनहु भाई ॥ निकटि करि जाणहु सदा प्रभु हाजरु किसु सिउ करहु बुराई ॥३॥

सतिगुरि मिलिऐ मारगु मुकता सहजे मिले सुआमी ॥ धनु धनु से जन जिनी कलि महि हरि पाइआ जन नानक सद कुरबानी ॥४॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 883) रामकली महला ५ ॥
आवत हरख न जावत दूखा नह बिआपै मन रोगनी ॥ सदा अनंदु गुरु पूरा पाइआ तउ उतरी सगल बिओगनी ॥१॥

इह बिधि है मनु जोगनी ॥ मोहु सोगु रोगु लोगु न बिआपै तह हरि हरि हरि रस भोगनी ॥१॥ रहाउ ॥

सुरग पवित्रा मिरत पवित्रा पइआल पवित्र अलोगनी ॥ आगिआकारी सदा सुखु भुंचै जत कत पेखउ हरि गुनी ॥२॥

नह सिव सकती जलु नही पवना तह अकारु नही मेदनी ॥ सतिगुर जोग का तहा निवासा जह अविगत नाथु अगम धनी ॥३॥

तनु मनु हरि का धनु सभु हरि का हरि के गुण हउ किआ गनी ॥ कहु नानक हम तुम गुरि खोई है अ्मभै अ्मभु मिलोगनी ॥४॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 883) रामकली महला ५ ॥
त्रै गुण रहत रहै निरारी साधिक सिध न जानै ॥ रतन कोठड़ी अम्रित स्मपूरन सतिगुर कै खजानै ॥१॥

अचरजु किछु कहणु न जाई ॥ बसतु अगोचर भाई ॥१॥ रहाउ ॥

मोलु नाही कछु करणै जोगा किआ को कहै सुणावै ॥ कथन कहण कउ सोझी नाही जो पेखै तिसु बणि आवै ॥२॥

सोई जाणै करणैहारा कीता किआ बेचारा ॥ आपणी गति मिति आपे जाणै हरि आपे पूर भंडारा ॥३॥

ऐसा रसु अम्रितु मनि चाखिआ त्रिपति रहे आघाई ॥ कहु नानक मेरी आसा पूरी सतिगुर की सरणाई ॥४॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 884) रामकली महला ५ ॥
अंगीकारु कीआ प्रभि अपनै बैरी सगले साधे ॥ जिनि बैरी है इहु जगु लूटिआ ते बैरी लै बाधे ॥१॥

सतिगुरु परमेसरु मेरा ॥ अनिक राज भोग रस माणी नाउ जपी भरवासा तेरा ॥१॥ रहाउ ॥

चीति न आवसि दूजी बाता सिर ऊपरि रखवारा ॥ बेपरवाहु रहत है सुआमी इक नाम कै आधारा ॥२॥

पूरन होइ मिलिओ सुखदाई ऊन न काई बाता ॥ ततु सारु परम पदु पाइआ छोडि न कतहू जाता ॥३॥

बरनि न साकउ जैसा तू है साचे अलख अपारा ॥ अतुल अथाह अडोल सुआमी नानक खसमु हमारा ॥४॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 884) रामकली महला ५ ॥
तू दाना तू अबिचलु तूही तू जाति मेरी पाती ॥ तू अडोलु कदे डोलहि नाही ता हम कैसी ताती ॥१॥

एकै एकै एक तूही ॥ एकै एकै तू राइआ ॥ तउ किरपा ते सुखु पाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

तू सागरु हम हंस तुमारे तुम महि माणक लाला ॥ तुम देवहु तिलु संक न मानहु हम भुंचह सदा निहाला ॥२॥

हम बारिक तुम पिता हमारे तुम मुखि देवहु खीरा ॥ हम खेलह सभि लाड लडावह तुम सद गुणी गहीरा ॥३॥

तुम पूरन पूरि रहे स्मपूरन हम भी संगि अघाए ॥ मिलत मिलत मिलत मिलि रहिआ नानक कहणु न जाए ॥४॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 884) रामकली महला ५ ॥
कर करि ताल पखावजु नैनहु माथै वजहि रबाबा ॥ करनहु मधु बासुरी बाजै जिहवा धुनि आगाजा ॥ निरति करे करि मनूआ नाचै आणे घूघर साजा ॥१॥

राम को निरतिकारी ॥ पेखै पेखनहारु दइआला जेता साजु सीगारी ॥१॥ रहाउ ॥

आखार मंडली धरणि सबाई ऊपरि गगनु चंदोआ ॥ पवनु विचोला करत इकेला जल ते ओपति होआ ॥ पंच ततु करि पुतरा कीना किरत मिलावा होआ ॥२॥

चंदु सूरजु दुइ जरे चरागा चहु कुंट भीतरि राखे ॥ दस पातउ पंच संगीता एकै भीतरि साथे ॥ भिंन भिंन होइ भाव दिखावहि सभहु निरारी भाखे ॥३॥

घरि घरि निरति होवै दिनु राती घटि घटि वाजै तूरा ॥ एकि नचावहि एकि भवावहि इकि आइ जाइ होइ धूरा ॥ कहु नानक सो बहुरि न नाचै जिसु गुरु भेटै पूरा ॥४॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 885) रामकली महला ५ ॥
ओअंकारि एक धुनि एकै एकै रागु अलापै ॥ एका देसी एकु दिखावै एको रहिआ बिआपै ॥ एका सुरति एका ही सेवा एको गुर ते जापै ॥१॥

भलो भलो रे कीरतनीआ ॥ राम रमा रामा गुन गाउ ॥ छोडि माइआ के धंध सुआउ ॥१॥ रहाउ ॥

पंच बजित्र करे संतोखा सात सुरा लै चालै ॥ बाजा माणु ताणु तजि ताना पाउ न बीगा घालै ॥ फेरी फेरु न होवै कब ही एकु सबदु बंधि पालै ॥२॥

नारदी नरहर जाणि हदूरे ॥ घूंघर खड़कु तिआगि विसूरे ॥ सहज अनंद दिखावै भावै ॥ एहु निरतिकारी जनमि न आवै ॥३॥

जे को अपने ठाकुर भावै ॥ कोटि मधि एहु कीरतनु गावै ॥ साधसंगति की जावउ टेक ॥ कहु नानक तिसु कीरतनु एक ॥४॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 885) रामकली महला ५ ॥
कोई बोलै राम राम कोई खुदाइ ॥ कोई सेवै गुसईआ कोई अलाहि ॥१॥

कारण करण करीम ॥ किरपा धारि रहीम ॥१॥ रहाउ ॥

कोई नावै तीरथि कोई हज जाइ ॥ कोई करै पूजा कोई सिरु निवाइ ॥२॥

कोई पड़ै बेद कोई कतेब ॥ कोई ओढै नील कोई सुपेद ॥३॥

कोई कहै तुरकु कोई कहै हिंदू ॥ कोई बाछै भिसतु कोई सुरगिंदू ॥४॥

कहु नानक जिनि हुकमु पछाता ॥ प्रभ साहिब का तिनि भेदु जाता ॥५॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 885) रामकली महला ५ ॥
पवनै महि पवनु समाइआ ॥ जोती महि जोति रलि जाइआ ॥ माटी माटी होई एक ॥ रोवनहारे की कवन टेक ॥१॥

कउनु मूआ रे कउनु मूआ ॥ ब्रहम गिआनी मिलि करहु बीचारा इहु तउ चलतु भइआ ॥१॥ रहाउ ॥

अगली किछु खबरि न पाई ॥ रोवनहारु भि ऊठि सिधाई ॥ भरम मोह के बांधे बंध ॥ सुपनु भइआ भखलाए अंध ॥२॥

इहु तउ रचनु रचिआ करतारि ॥ आवत जावत हुकमि अपारि ॥ नह को मूआ न मरणै जोगु ॥ नह बिनसै अबिनासी होगु ॥३॥

जो इहु जाणहु सो इहु नाहि ॥ जानणहारे कउ बलि जाउ ॥ कहु नानक गुरि भरमु चुकाइआ ॥ ना कोई मरै न आवै जाइआ ॥४॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 885) रामकली महला ५ ॥
जपि गोबिंदु गोपाल लालु ॥ राम नाम सिमरि तू जीवहि फिरि न खाई महा कालु ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि जनम भ्रमि भ्रमि भ्रमि आइओ ॥ बडै भागि साधसंगु पाइओ ॥१॥

बिनु गुर पूरे नाही उधारु ॥ बाबा नानकु आखै एहु बीचारु ॥२॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 886) रागु रामकली महला ५ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चारि पुकारहि ना तू मानहि ॥ खटु भी एका बात वखानहि ॥ दस असटी मिलि एको कहिआ ॥ ता भी जोगी भेदु न लहिआ ॥१॥

किंकुरी अनूप वाजै ॥ जोगीआ मतवारो रे ॥१॥ रहाउ ॥

प्रथमे वसिआ सत का खेड़ा ॥ त्रितीए महि किछु भइआ दुतेड़ा ॥ दुतीआ अरधो अरधि समाइआ ॥ एकु रहिआ ता एकु दिखाइआ ॥२॥

एकै सूति परोए मणीए ॥ गाठी भिनि भिनि भिनि भिनि तणीए ॥ फिरती माला बहु बिधि भाइ ॥ खिंचिआ सूतु त आई थाइ ॥३॥

चहु महि एकै मटु है कीआ ॥ तह बिखड़े थान अनिक खिड़कीआ ॥ खोजत खोजत दुआरे आइआ ॥ ता नानक जोगी महलु घरु पाइआ ॥४॥

इउ किंकुरी आनूप वाजै ॥ सुणि जोगी कै मनि मीठी लागै ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 886) रामकली महला ५ ॥
तागा करि कै लाई थिगली ॥ लउ नाड़ी सूआ है असती ॥ अ्मभै का करि डंडा धरिआ ॥ किआ तू जोगी गरबहि परिआ ॥१॥

जपि नाथु दिनु रैनाई ॥ तेरी खिंथा दो दिहाई ॥१॥ रहाउ ॥

गहरी बिभूत लाइ बैठा ताड़ी ॥ मेरी तेरी मुंद्रा धारी ॥ मागहि टूका त्रिपति न पावै ॥ नाथु छोडि जाचहि लाज न आवै ॥२॥

चल चित जोगी आसणु तेरा ॥ सिंङी वाजै नित उदासेरा ॥ गुर गोरख की तै बूझ न पाई ॥ फिरि फिरि जोगी आवै जाई ॥३॥

जिस नो होआ नाथु क्रिपाला ॥ रहरासि हमारी गुर गोपाला ॥ नामै खिंथा नामै बसतरु ॥ जन नानक जोगी होआ असथिरु ॥४॥

इउ जपिआ नाथु दिनु रैनाई ॥ हुणि पाइआ गुरु गोसाई ॥१॥ रहाउ दूजा ॥२॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 886) रामकली महला ५ ॥
करन करावन सोई ॥ आन न दीसै कोई ॥ ठाकुरु मेरा सुघड़ु सुजाना ॥ गुरमुखि मिलिआ रंगु माना ॥१॥

ऐसो रे हरि रसु मीठा ॥ गुरमुखि किनै विरलै डीठा ॥१॥ रहाउ ॥

निरमल जोति अम्रितु हरि नाम ॥ पीवत अमर भए निहकाम ॥ तनु मनु सीतलु अगनि निवारी ॥ अनद रूप प्रगटे संसारी ॥२॥

किआ देवउ जा सभु किछु तेरा ॥ सद बलिहारि जाउ लख बेरा ॥ तनु मनु जीउ पिंडु दे साजिआ ॥ गुर किरपा ते नीचु निवाजिआ ॥३॥

खोलि किवारा महलि बुलाइआ ॥ जैसा सा तैसा दिखलाइआ ॥ कहु नानक सभु पड़दा तूटा ॥ हउ तेरा तू मै मनि वूठा ॥४॥३॥१४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 887) रामकली महला ५ ॥
सेवकु लाइओ अपुनी सेव ॥ अम्रितु नामु दीओ मुखि देव ॥ सगली चिंता आपि निवारी ॥ तिसु गुर कउ हउ सद बलिहारी ॥१॥

काज हमारे पूरे सतगुर ॥ बाजे अनहद तूरे सतगुर ॥१॥ रहाउ ॥

महिमा जा की गहिर ग्मभीर ॥ होइ निहालु देइ जिसु धीर ॥ जा के बंधन काटे राइ ॥ सो नरु बहुरि न जोनी पाइ ॥२॥

जा कै अंतरि प्रगटिओ आप ॥ ता कउ नाही दूख संताप ॥ लालु रतनु तिसु पालै परिआ ॥ सगल कुट्मब ओहु जनु लै तरिआ ॥३॥

ना किछु भरमु न दुबिधा दूजा ॥ एको एकु निरंजन पूजा ॥ जत कत देखउ आपि दइआल ॥ कहु नानक प्रभ मिले रसाल ॥४॥४॥१५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 887) रामकली महला ५ ॥
तन ते छुटकी अपनी धारी ॥ प्रभ की आगिआ लगी पिआरी ॥ जो किछु करै सु मनि मेरै मीठा ॥ ता इहु अचरजु नैनहु डीठा ॥१॥

अब मोहि जानी रे मेरी गई बलाइ ॥ बुझि गई त्रिसन निवारी ममता गुरि पूरै लीओ समझाइ ॥१॥ रहाउ ॥

करि किरपा राखिओ गुरि सरना ॥ गुरि पकराए हरि के चरना ॥ बीस बिसुए जा मन ठहराने ॥ गुर पारब्रहम एकै ही जाने ॥२॥

जो जो कीनो हम तिस के दास ॥ प्रभ मेरे को सगल निवास ॥ ना को दूतु नही बैराई ॥ गलि मिलि चाले एकै भाई ॥३॥

जा कउ गुरि हरि दीए सूखा ॥ ता कउ बहुरि न लागहि दूखा ॥ आपे आपि सरब प्रतिपाल ॥ नानक रातउ रंगि गोपाल ॥४॥५॥१६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 887) रामकली महला ५ ॥
मुख ते पड़ता टीका सहित ॥ हिरदै रामु नही पूरन रहत ॥ उपदेसु करे करि लोक द्रिड़ावै ॥ अपना कहिआ आपि न कमावै ॥१॥

पंडित बेदु बीचारि पंडित ॥ मन का क्रोधु निवारि पंडित ॥१॥ रहाउ ॥

आगै राखिओ साल गिरामु ॥ मनु कीनो दह दिस बिस्रामु ॥ तिलकु चरावै पाई पाइ ॥ लोक पचारा अंधु कमाइ ॥२॥

खटु करमा अरु आसणु धोती ॥ भागठि ग्रिहि पड़ै नित पोथी ॥ माला फेरै मंगै बिभूत ॥ इह बिधि कोइ न तरिओ मीत ॥३॥

सो पंडितु गुर सबदु कमाइ ॥ त्रै गुण की ओसु उतरी माइ ॥ चतुर बेद पूरन हरि नाइ ॥ नानक तिस की सरणी पाइ ॥४॥६॥१७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 888) रामकली महला ५ ॥
कोटि बिघन नही आवहि नेरि ॥ अनिक माइआ है ता की चेरि ॥ अनिक पाप ता के पानीहार ॥ जा कउ मइआ भई करतार ॥१॥

जिसहि सहाई होइ भगवान ॥ अनिक जतन उआ कै सरंजाम ॥१॥ रहाउ ॥

करता राखै कीता कउनु ॥ कीरी जीतो सगला भवनु ॥ बेअंत महिमा ता की केतक बरन ॥ बलि बलि जाईऐ ता के चरन ॥२॥

तिन ही कीआ जपु तपु धिआनु ॥ अनिक प्रकार कीआ तिनि दानु ॥ भगतु सोई कलि महि परवानु ॥ जा कउ ठाकुरि दीआ मानु ॥३॥

साधसंगि मिलि भए प्रगास ॥ सहज सूख आस निवास ॥ पूरै सतिगुरि दीआ बिसास ॥ नानक होए दासनि दास ॥४॥७॥१८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 888) रामकली महला ५ ॥
दोसु न दीजै काहू लोग ॥ जो कमावनु सोई भोग ॥ आपन करम आपे ही बंध ॥ आवनु जावनु माइआ धंध ॥१॥

ऐसी जानी संत जनी ॥ परगासु भइआ पूरे गुर बचनी ॥१॥ रहाउ ॥

तनु धनु कलतु मिथिआ बिसथार ॥ हैवर गैवर चालनहार ॥ राज रंग रूप सभि कूर ॥ नाम बिना होइ जासी धूर ॥२॥

भरमि भूले बादि अहंकारी ॥ संगि नाही रे सगल पसारी ॥ सोग हरख महि देह बिरधानी ॥ साकत इव ही करत बिहानी ॥३॥

हरि का नामु अम्रितु कलि माहि ॥ एहु निधाना साधू पाहि ॥ नानक गुरु गोविदु जिसु तूठा ॥ घटि घटि रमईआ तिन ही डीठा ॥४॥८॥१९॥


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