राग रामकली दखणी - बाणी शब्द, Raag Ramkali Dakhni - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू नानक देव जी -- SGGS 907) रामकली दखणी महला १ ॥
जतु सतु संजमु साचु द्रिड़ाइआ साच सबदि रसि लीणा ॥१॥

मेरा गुरु दइआलु सदा रंगि लीणा ॥ अहिनिसि रहै एक लिव लागी साचे देखि पतीणा ॥१॥ रहाउ ॥

रहै गगन पुरि द्रिसटि समैसरि अनहत सबदि रंगीणा ॥२॥

सतु बंधि कुपीन भरिपुरि लीणा जिहवा रंगि रसीणा ॥३॥

मिलै गुर साचे जिनि रचु राचे किरतु वीचारि पतीणा ॥४॥

एक महि सरब सरब महि एका एह सतिगुरि देखि दिखाई ॥५॥

जिनि कीए खंड मंडल ब्रहमंडा सो प्रभु लखनु न जाई ॥६॥

दीपक ते दीपकु परगासिआ त्रिभवण जोति दिखाई ॥७॥

सचै तखति सच महली बैठे निरभउ ताड़ी लाई ॥८॥

मोहि गइआ बैरागी जोगी घटि घटि किंगुरी वाई ॥९॥

नानक सरणि प्रभू की छूटे सतिगुर सचु सखाई ॥१०॥८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 929) रामकली महला १ दखणी ओअंकारु
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ओअंकारि ब्रहमा उतपति ॥ ओअंकारु कीआ जिनि चिति ॥ ओअंकारि सैल जुग भए ॥ ओअंकारि बेद निरमए ॥ ओअंकारि सबदि उधरे ॥ ओअंकारि गुरमुखि तरे ॥ ओनम अखर सुणहु बीचारु ॥ ओनम अखरु त्रिभवण सारु ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 930) सुणि पाडे किआ लिखहु जंजाला ॥ लिखु राम नाम गुरमुखि गोपाला ॥१॥ रहाउ ॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 930) ससै सभु जगु सहजि उपाइआ तीनि भवन इक जोती ॥ गुरमुखि वसतु परापति होवै चुणि लै माणक मोती ॥ समझै सूझै पड़ि पड़ि बूझै अंति निरंतरि साचा ॥ गुरमुखि देखै साचु समाले बिनु साचे जगु काचा ॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 930) धधै धरमु धरे धरमा पुरि गुणकारी मनु धीरा ॥ धधै धूलि पड़ै मुखि मसतकि कंचन भए मनूरा ॥ धनु धरणीधरु आपि अजोनी तोलि बोलि सचु पूरा ॥ करते की मिति करता जाणै कै जाणै गुरु सूरा ॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 930) ङिआनु गवाइआ दूजा भाइआ गरबि गले बिखु खाइआ ॥ गुर रसु गीत बाद नही भावै सुणीऐ गहिर ग्मभीरु गवाइआ ॥ गुरि सचु कहिआ अम्रितु लहिआ मनि तनि साचु सुखाइआ ॥ आपे गुरमुखि आपे देवै आपे अम्रितु पीआइआ ॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 930) एको एकु कहै सभु कोई हउमै गरबु विआपै ॥ अंतरि बाहरि एकु पछाणै इउ घरु महलु सिञापै ॥ प्रभु नेड़ै हरि दूरि न जाणहु एको स्रिसटि सबाई ॥ एकंकारु अवरु नही दूजा नानक एकु समाई ॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 930) इसु करते कउ किउ गहि राखउ अफरिओ तुलिओ न जाई ॥ माइआ के देवाने प्राणी झूठि ठगउरी पाई ॥ लबि लोभि मुहताजि विगूते इब तब फिरि पछुताई ॥ एकु सरेवै ता गति मिति पावै आवणु जाणु रहाई ॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 930) एकु अचारु रंगु इकु रूपु ॥ पउण पाणी अगनी असरूपु ॥ एको भवरु भवै तिहु लोइ ॥ एको बूझै सूझै पति होइ ॥ गिआनु धिआनु ले समसरि रहै ॥ गुरमुखि एकु विरला को लहै ॥ जिस नो देइ किरपा ते सुखु पाए ॥ गुरू दुआरै आखि सुणाए ॥७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 930) ऊरम धूरम जोति उजाला ॥ तीनि भवण महि गुर गोपाला ॥ ऊगविआ असरूपु दिखावै ॥ करि किरपा अपुनै घरि आवै ॥ ऊनवि बरसै नीझर धारा ॥ ऊतम सबदि सवारणहारा ॥ इसु एके का जाणै भेउ ॥ आपे करता आपे देउ ॥८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 930) उगवै सूरु असुर संघारै ॥ ऊचउ देखि सबदि बीचारै ॥ ऊपरि आदि अंति तिहु लोइ ॥ आपे करै कथै सुणै सोइ ॥ ओहु बिधाता मनु तनु देइ ॥ ओहु बिधाता मनि मुखि सोइ ॥ प्रभु जगजीवनु अवरु न कोइ ॥ नानक नामि रते पति होइ ॥९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 931) राजन राम रवै हितकारि ॥ रण महि लूझै मनूआ मारि ॥ राति दिनंति रहै रंगि राता ॥ तीनि भवन जुग चारे जाता ॥ जिनि जाता सो तिस ही जेहा ॥ अति निरमाइलु सीझसि देहा ॥ रहसी रामु रिदै इक भाइ ॥ अंतरि सबदु साचि लिव लाइ ॥१०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 931) रोसु न कीजै अम्रितु पीजै रहणु नही संसारे ॥ राजे राइ रंक नही रहणा आइ जाइ जुग चारे ॥ रहण कहण ते रहै न कोई किसु पहि करउ बिनंती ॥ एकु सबदु राम नाम निरोधरु गुरु देवै पति मती ॥११॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 931) लाज मरंती मरि गई घूघटु खोलि चली ॥ सासु दिवानी बावरी सिर ते संक टली ॥ प्रेमि बुलाई रली सिउ मन महि सबदु अनंदु ॥ लालि रती लाली भई गुरमुखि भई निचिंदु ॥१२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 931) लाहा नामु रतनु जपि सारु ॥ लबु लोभु बुरा अहंकारु ॥ लाड़ी चाड़ी लाइतबारु ॥ मनमुखु अंधा मुगधु गवारु ॥ लाहे कारणि आइआ जगि ॥ होइ मजूरु गइआ ठगाइ ठगि ॥ लाहा नामु पूंजी वेसाहु ॥ नानक सची पति सचा पातिसाहु ॥१३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 931) आइ विगूता जगु जम पंथु ॥ आई न मेटण को समरथु ॥ आथि सैल नीच घरि होइ ॥ आथि देखि निवै जिसु दोइ ॥ आथि होइ ता मुगधु सिआना ॥ भगति बिहूना जगु बउराना ॥ सभ महि वरतै एको सोइ ॥ जिस नो किरपा करे तिसु परगटु होइ ॥१४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 931) जुगि जुगि थापि सदा निरवैरु ॥ जनमि मरणि नही धंधा धैरु ॥ जो दीसै सो आपे आपि ॥ आपि उपाइ आपे घट थापि ॥ आपि अगोचरु धंधै लोई ॥ जोग जुगति जगजीवनु सोई ॥ करि आचारु सचु सुखु होई ॥ नाम विहूणा मुकति किव होई ॥१५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 931) विणु नावै वेरोधु सरीर ॥ किउ न मिलहि काटहि मन पीर ॥ वाट वटाऊ आवै जाइ ॥ किआ ले आइआ किआ पलै पाइ ॥ विणु नावै तोटा सभ थाइ ॥ लाहा मिलै जा देइ बुझाइ ॥ वणजु वापारु वणजै वापारी ॥ विणु नावै कैसी पति सारी ॥१६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 931) गुण वीचारे गिआनी सोइ ॥ गुण महि गिआनु परापति होइ ॥ गुणदाता विरला संसारि ॥ साची करणी गुर वीचारि ॥ अगम अगोचरु कीमति नही पाइ ॥ ता मिलीऐ जा लए मिलाइ ॥ गुणवंती गुण सारे नीत ॥ नानक गुरमति मिलीऐ मीत ॥१७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 932) कामु क्रोधु काइआ कउ गालै ॥ जिउ कंचन सोहागा ढालै ॥ कसि कसवटी सहै सु ताउ ॥ नदरि सराफ वंनी सचड़ाउ ॥ जगतु पसू अहं कालु कसाई ॥ करि करतै करणी करि पाई ॥ जिनि कीती तिनि कीमति पाई ॥ होर किआ कहीऐ किछु कहणु न जाई ॥१८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 932) खोजत खोजत अम्रितु पीआ ॥ खिमा गही मनु सतगुरि दीआ ॥ खरा खरा आखै सभु कोइ ॥ खरा रतनु जुग चारे होइ ॥ खात पीअंत मूए नही जानिआ ॥ खिन महि मूए जा सबदु पछानिआ ॥ असथिरु चीतु मरनि मनु मानिआ ॥ गुर किरपा ते नामु पछानिआ ॥१९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 932) गगन ग्मभीरु गगनंतरि वासु ॥ गुण गावै सुख सहजि निवासु ॥ गइआ न आवै आइ न जाइ ॥ गुर परसादि रहै लिव लाइ ॥ गगनु अगमु अनाथु अजोनी ॥ असथिरु चीतु समाधि सगोनी ॥ हरि नामु चेति फिरि पवहि न जूनी ॥ गुरमति सारु होर नाम बिहूनी ॥२०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 932) घर दर फिरि थाकी बहुतेरे ॥ जाति असंख अंत नही मेरे ॥ केते मात पिता सुत धीआ ॥ केते गुर चेले फुनि हूआ ॥ काचे गुर ते मुकति न हूआ ॥ केती नारि वरु एकु समालि ॥ गुरमुखि मरणु जीवणु प्रभ नालि ॥ दह दिस ढूढि घरै महि पाइआ ॥ मेलु भइआ सतिगुरू मिलाइआ ॥२१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 932) गुरमुखि गावै गुरमुखि बोलै ॥ गुरमुखि तोलि तोलावै तोलै ॥ गुरमुखि आवै जाइ निसंगु ॥ परहरि मैलु जलाइ कलंकु ॥ गुरमुखि नाद बेद बीचारु ॥ गुरमुखि मजनु चजु अचारु ॥ गुरमुखि सबदु अम्रितु है सारु ॥ नानक गुरमुखि पावै पारु ॥२२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 932) चंचलु चीतु न रहई ठाइ ॥ चोरी मिरगु अंगूरी खाइ ॥ चरन कमल उर धारे चीत ॥ चिरु जीवनु चेतनु नित नीत ॥ चिंतत ही दीसै सभु कोइ ॥ चेतहि एकु तही सुखु होइ ॥ चिति वसै राचै हरि नाइ ॥ मुकति भइआ पति सिउ घरि जाइ ॥२३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 932) छीजै देह खुलै इक गंढि ॥ छेआ नित देखहु जगि हंढि ॥ धूप छाव जे सम करि जाणै ॥ बंधन काटि मुकति घरि आणै ॥ छाइआ छूछी जगतु भुलाना ॥ लिखिआ किरतु धुरे परवाना ॥ छीजै जोबनु जरूआ सिरि कालु ॥ काइआ छीजै भई सिबालु ॥२४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 933) जापै आपि प्रभू तिहु लोइ ॥ जुगि जुगि दाता अवरु न कोइ ॥ जिउ भावै तिउ राखहि राखु ॥ जसु जाचउ देवै पति साखु ॥ जागतु जागि रहा तुधु भावा ॥ जा तू मेलहि ता तुझै समावा ॥ जै जै कारु जपउ जगदीस ॥ गुरमति मिलीऐ बीस इकीस ॥२५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 933) झखि बोलणु किआ जग सिउ वादु ॥ झूरि मरै देखै परमादु ॥ जनमि मूए नही जीवण आसा ॥ आइ चले भए आस निरासा ॥ झुरि झुरि झखि माटी रलि जाइ ॥ कालु न चांपै हरि गुण गाइ ॥ पाई नव निधि हरि कै नाइ ॥ आपे देवै सहजि सुभाइ ॥२६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 933) ञिआनो बोलै आपे बूझै ॥ आपे समझै आपे सूझै ॥ गुर का कहिआ अंकि समावै ॥ निरमल सूचे साचो भावै ॥ गुरु सागरु रतनी नही तोट ॥ लाल पदारथ साचु अखोट ॥ गुरि कहिआ सा कार कमावहु ॥ गुर की करणी काहे धावहु ॥ नानक गुरमति साचि समावहु ॥२७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 933) टूटै नेहु कि बोलहि सही ॥ टूटै बाह दुहू दिस गही ॥ टूटि परीति गई बुर बोलि ॥ दुरमति परहरि छाडी ढोलि ॥ टूटै गंठि पड़ै वीचारि ॥ गुर सबदी घरि कारजु सारि ॥ लाहा साचु न आवै तोटा ॥ त्रिभवण ठाकुरु प्रीतमु मोटा ॥२८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 933) ठाकहु मनूआ राखहु ठाइ ॥ ठहकि मुई अवगुणि पछुताइ ॥ ठाकुरु एकु सबाई नारि ॥ बहुते वेस करे कूड़िआरि ॥ पर घरि जाती ठाकि रहाई ॥ महलि बुलाई ठाक न पाई ॥ सबदि सवारी साचि पिआरी ॥ साई सोहागणि ठाकुरि धारी ॥२९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 933) डोलत डोलत हे सखी फाटे चीर सीगार ॥ डाहपणि तनि सुखु नही बिनु डर बिणठी डार ॥ डरपि मुई घरि आपणै डीठी कंति सुजाणि ॥ डरु राखिआ गुरि आपणै निरभउ नामु वखाणि ॥ डूगरि वासु तिखा घणी जब देखा नही दूरि ॥ तिखा निवारी सबदु मंनि अम्रितु पीआ भरपूरि ॥ देहि देहि आखै सभु कोई जै भावै तै देइ ॥ गुरू दुआरै देवसी तिखा निवारै सोइ ॥३०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 933) ढंढोलत ढूढत हउ फिरी ढहि ढहि पवनि करारि ॥ भारे ढहते ढहि पए हउले निकसे पारि ॥ अमर अजाची हरि मिले तिन कै हउ बलि जाउ ॥ तिन की धूड़ि अघुलीऐ संगति मेलि मिलाउ ॥ मनु दीआ गुरि आपणै पाइआ निरमल नाउ ॥ जिनि नामु दीआ तिसु सेवसा तिसु बलिहारै जाउ ॥ जो उसारे सो ढाहसी तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ गुर परसादी तिसु सम्हला ता तनि दूखु न होइ ॥३१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 934) णा को मेरा किसु गही णा को होआ न होगु ॥ आवणि जाणि विगुचीऐ दुबिधा विआपै रोगु ॥ णाम विहूणे आदमी कलर कंध गिरंति ॥ विणु नावै किउ छूटीऐ जाइ रसातलि अंति ॥ गणत गणावै अखरी अगणतु साचा सोइ ॥ अगिआनी मतिहीणु है गुर बिनु गिआनु न होइ ॥ तूटी तंतु रबाब की वाजै नही विजोगि ॥ विछुड़िआ मेलै प्रभू नानक करि संजोग ॥३२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 934) तरवरु काइआ पंखि मनु तरवरि पंखी पंच ॥ ततु चुगहि मिलि एकसे तिन कउ फास न रंच ॥ उडहि त बेगुल बेगुले ताकहि चोग घणी ॥ पंख तुटे फाही पड़ी अवगुणि भीड़ बणी ॥ बिनु साचे किउ छूटीऐ हरि गुण करमि मणी ॥ आपि छडाए छूटीऐ वडा आपि धणी ॥ गुर परसादी छूटीऐ किरपा आपि करेइ ॥ अपणै हाथि वडाईआ जै भावै तै देइ ॥३३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 934) थर थर क्मपै जीअड़ा थान विहूणा होइ ॥ थानि मानि सचु एकु है काजु न फीटै कोइ ॥ थिरु नाराइणु थिरु गुरू थिरु साचा बीचारु ॥ सुरि नर नाथह नाथु तू निधारा आधारु ॥ सरबे थान थनंतरी तू दाता दातारु ॥ जह देखा तह एकु तू अंतु न पारावारु ॥ थान थनंतरि रवि रहिआ गुर सबदी वीचारि ॥ अणमंगिआ दानु देवसी वडा अगम अपारु ॥३४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 934) दइआ दानु दइआलु तू करि करि देखणहारु ॥ दइआ करहि प्रभ मेलि लैहि खिन महि ढाहि उसारि ॥ दाना तू बीना तुही दाना कै सिरि दानु ॥ दालद भंजन दुख दलण गुरमुखि गिआनु धिआनु ॥३५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 934) धनि गइऐ बहि झूरीऐ धन महि चीतु गवार ॥ धनु विरली सचु संचिआ निरमलु नामु पिआरि ॥ धनु गइआ ता जाण देहि जे राचहि रंगि एक ॥ मनु दीजै सिरु सउपीऐ भी करते की टेक ॥ धंधा धावत रहि गए मन महि सबदु अनंदु ॥ दुरजन ते साजन भए भेटे गुर गोविंद ॥ बनु बनु फिरती ढूढती बसतु रही घरि बारि ॥ सतिगुरि मेली मिलि रही जनम मरण दुखु निवारि ॥३६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 934) नाना करत न छूटीऐ विणु गुण जम पुरि जाहि ॥ ना तिसु एहु न ओहु है अवगुणि फिरि पछुताहि ॥ ना तिसु गिआनु न धिआनु है ना तिसु धरमु धिआनु ॥ विणु नावै निरभउ कहा किआ जाणा अभिमानु ॥ थाकि रही किव अपड़ा हाथ नही ना पारु ॥ ना साजन से रंगुले किसु पहि करी पुकार ॥ नानक प्रिउ प्रिउ जे करी मेले मेलणहारु ॥ जिनि विछोड़ी सो मेलसी गुर कै हेति अपारि ॥३७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 935) पापु बुरा पापी कउ पिआरा ॥ पापि लदे पापे पासारा ॥ परहरि पापु पछाणै आपु ॥ ना तिसु सोगु विजोगु संतापु ॥ नरकि पड़ंतउ किउ रहै किउ बंचै जमकालु ॥ किउ आवण जाणा वीसरै झूठु बुरा खै कालु ॥ मनु जंजाली वेड़िआ भी जंजाला माहि ॥ विणु नावै किउ छूटीऐ पापे पचहि पचाहि ॥३८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 935) फिरि फिरि फाही फासै कऊआ ॥ फिरि पछुताना अब किआ हूआ ॥ फाथा चोग चुगै नही बूझै ॥ सतगुरु मिलै त आखी सूझै ॥ जिउ मछुली फाथी जम जालि ॥ विणु गुर दाते मुकति न भालि ॥ फिरि फिरि आवै फिरि फिरि जाइ ॥ इक रंगि रचै रहै लिव लाइ ॥ इव छूटै फिरि फास न पाइ ॥३९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 935) बीरा बीरा करि रही बीर भए बैराइ ॥ बीर चले घरि आपणै बहिण बिरहि जलि जाइ ॥ बाबुल कै घरि बेटड़ी बाली बालै नेहि ॥ जे लोड़हि वरु कामणी सतिगुरु सेवहि तेहि ॥ बिरलो गिआनी बूझणउ सतिगुरु साचि मिलेइ ॥ ठाकुर हाथि वडाईआ जै भावै तै देइ ॥ बाणी बिरलउ बीचारसी जे को गुरमुखि होइ ॥ इह बाणी महा पुरख की निज घरि वासा होइ ॥४०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 935) भनि भनि घड़ीऐ घड़ि घड़ि भजै ढाहि उसारै उसरे ढाहै ॥ सर भरि सोखै भी भरि पोखै समरथ वेपरवाहै ॥ भरमि भुलाने भए दिवाने विणु भागा किआ पाईऐ ॥ गुरमुखि गिआनु डोरी प्रभि पकड़ी जिन खिंचै तिन जाईऐ ॥ हरि गुण गाइ सदा रंगि राते बहुड़ि न पछोताईऐ ॥ भभै भालहि गुरमुखि बूझहि ता निज घरि वासा पाईऐ ॥ भभै भउजलु मारगु विखड़ा आस निरासा तरीऐ ॥ गुर परसादी आपो चीन्है जीवतिआ इव मरीऐ ॥४१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 935) माइआ माइआ करि मुए माइआ किसै न साथि ॥ हंसु चलै उठि डुमणो माइआ भूली आथि ॥ मनु झूठा जमि जोहिआ अवगुण चलहि नालि ॥ मन महि मनु उलटो मरै जे गुण होवहि नालि ॥ मेरी मेरी करि मुए विणु नावै दुखु भालि ॥ गड़ मंदर महला कहा जिउ बाजी दीबाणु ॥ नानक सचे नाम विणु झूठा आवण जाणु ॥ आपे चतुरु सरूपु है आपे जाणु सुजाणु ॥४२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 936) जो आवहि से जाहि फुनि आइ गए पछुताहि ॥ लख चउरासीह मेदनी घटै न वधै उताहि ॥ से जन उबरे जिन हरि भाइआ ॥ धंधा मुआ विगूती माइआ ॥ जो दीसै सो चालसी किस कउ मीतु करेउ ॥ जीउ समपउ आपणा तनु मनु आगै देउ ॥ असथिरु करता तू धणी तिस ही की मै ओट ॥ गुण की मारी हउ मुई सबदि रती मनि चोट ॥४३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 936) राणा राउ न को रहै रंगु न तुंगु फकीरु ॥ वारी आपो आपणी कोइ न बंधै धीर ॥ राहु बुरा भीहावला सर डूगर असगाह ॥ मै तनि अवगण झुरि मुई विणु गुण किउ घरि जाह ॥ गुणीआ गुण ले प्रभ मिले किउ तिन मिलउ पिआरि ॥ तिन ही जैसी थी रहां जपि जपि रिदै मुरारि ॥ अवगुणी भरपूर है गुण भी वसहि नालि ॥ विणु सतगुर गुण न जापनी जिचरु सबदि न करे बीचारु ॥४४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 936) लसकरीआ घर समले आए वजहु लिखाइ ॥ कार कमावहि सिरि धणी लाहा पलै पाइ ॥ लबु लोभु बुरिआईआ छोडे मनहु विसारि ॥ गड़ि दोही पातिसाह की कदे न आवै हारि ॥ चाकरु कहीऐ खसम का सउहे उतर देइ ॥ वजहु गवाए आपणा तखति न बैसहि सेइ ॥ प्रीतम हथि वडिआईआ जै भावै तै देइ ॥ आपि करे किसु आखीऐ अवरु न कोइ करेइ ॥४५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 936) बीजउ सूझै को नही बहै दुलीचा पाइ ॥ नरक निवारणु नरह नरु साचउ साचै नाइ ॥ वणु त्रिणु ढूढत फिरि रही मन महि करउ बीचारु ॥ लाल रतन बहु माणकी सतिगुर हाथि भंडारु ॥ ऊतमु होवा प्रभु मिलै इक मनि एकै भाइ ॥ नानक प्रीतम रसि मिले लाहा लै परथाइ ॥ रचना राचि जिनि रची जिनि सिरिआ आकारु ॥ गुरमुखि बेअंतु धिआईऐ अंतु न पारावारु ॥४६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 936) ड़ाड़ै रूड़ा हरि जीउ सोई ॥ तिसु बिनु राजा अवरु न कोई ॥ ड़ाड़ै गारुड़ु तुम सुणहु हरि वसै मन माहि ॥ गुर परसादी हरि पाईऐ मतु को भरमि भुलाहि ॥ सो साहु साचा जिसु हरि धनु रासि ॥ गुरमुखि पूरा तिसु साबासि ॥ रूड़ी बाणी हरि पाइआ गुर सबदी बीचारि ॥ आपु गइआ दुखु कटिआ हरि वरु पाइआ नारि ॥४७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 937) सुइना रुपा संचीऐ धनु काचा बिखु छारु ॥ साहु सदाए संचि धनु दुबिधा होइ खुआरु ॥ सचिआरी सचु संचिआ साचउ नामु अमोलु ॥ हरि निरमाइलु ऊजलो पति साची सचु बोलु ॥ साजनु मीतु सुजाणु तू तू सरवरु तू हंसु ॥ साचउ ठाकुरु मनि वसै हउ बलिहारी तिसु ॥ माइआ ममता मोहणी जिनि कीती सो जाणु ॥ बिखिआ अम्रितु एकु है बूझै पुरखु सुजाणु ॥४८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 937) खिमा विहूणे खपि गए खूहणि लख असंख ॥ गणत न आवै किउ गणी खपि खपि मुए बिसंख ॥ खसमु पछाणै आपणा खूलै बंधु न पाइ ॥ सबदि महली खरा तू खिमा सचु सुख भाइ ॥ खरचु खरा धनु धिआनु तू आपे वसहि सरीरि ॥ मनि तनि मुखि जापै सदा गुण अंतरि मनि धीर ॥ हउमै खपै खपाइसी बीजउ वथु विकारु ॥ जंत उपाइ विचि पाइअनु करता अलगु अपारु ॥४९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 937) स्रिसटे भेउ न जाणै कोइ ॥ स्रिसटा करै सु निहचउ होइ ॥ स्मपै कउ ईसरु धिआईऐ ॥ स्मपै पुरबि लिखे की पाईऐ ॥ स्मपै कारणि चाकर चोर ॥ स्मपै साथि न चालै होर ॥ बिनु साचे नही दरगह मानु ॥ हरि रसु पीवै छुटै निदानि ॥५०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 937) हेरत हेरत हे सखी होइ रही हैरानु ॥ हउ हउ करती मै मुई सबदि रवै मनि गिआनु ॥ हार डोर कंकन घणे करि थाकी सीगारु ॥ मिलि प्रीतम सुखु पाइआ सगल गुणा गलि हारु ॥ नानक गुरमुखि पाईऐ हरि सिउ प्रीति पिआरु ॥ हरि बिनु किनि सुखु पाइआ देखहु मनि बीचारि ॥ हरि पड़णा हरि बुझणा हरि सिउ रखहु पिआरु ॥ हरि जपीऐ हरि धिआईऐ हरि का नामु अधारु ॥५१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 937) लेखु न मिटई हे सखी जो लिखिआ करतारि ॥ आपे कारणु जिनि कीआ करि किरपा पगु धारि ॥ करते हथि वडिआईआ बूझहु गुर बीचारि ॥ लिखिआ फेरि न सकीऐ जिउ भावी तिउ सारि ॥ नदरि तेरी सुखु पाइआ नानक सबदु वीचारि ॥ मनमुख भूले पचि मुए उबरे गुर बीचारि ॥ जि पुरखु नदरि न आवई तिस का किआ करि कहिआ जाइ ॥ बलिहारी गुर आपणे जिनि हिरदै दिता दिखाइ ॥५२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 937) पाधा पड़िआ आखीऐ बिदिआ बिचरै सहजि सुभाइ ॥ बिदिआ सोधै ततु लहै राम नाम लिव लाइ ॥ मनमुखु बिदिआ बिक्रदा बिखु खटे बिखु खाइ ॥ मूरखु सबदु न चीनई सूझ बूझ नह काइ ॥५३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 938) पाधा गुरमुखि आखीऐ चाटड़िआ मति देइ ॥ नामु समालहु नामु संगरहु लाहा जग महि लेइ ॥ सची पटी सचु मनि पड़ीऐ सबदु सु सारु ॥ नानक सो पड़िआ सो पंडितु बीना जिसु राम नामु गलि हारु ॥५४॥१॥


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