Pt 2 - राग प्रभाती - बाणी शब्द, Part 2 - Raag Parbhati - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1341) प्रभाती महला ५ ॥
गुरु गुरु करत सदा सुखु पाइआ ॥ दीन दइआल भए किरपाला अपणा नामु आपि जपाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

संतसंगति मिलि भइआ प्रगास ॥ हरि हरि जपत पूरन भई आस ॥१॥

सरब कलिआण सूख मनि वूठे ॥ हरि गुण गाए गुर नानक तूठे ॥२॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1341) प्रभाती महला ५ ॥
चरन कमल सरनि टेक ॥ ऊच मूच बेअंतु ठाकुरु सरब ऊपरि तुही एक ॥१॥ रहाउ ॥

प्रान अधार दुख बिदार दैनहार बुधि बिबेक ॥१॥

नमसकार रखनहार मनि अराधि प्रभू मेक ॥ संत रेनु करउ मजनु नानक पावै सुख अनेक ॥२॥२॥१५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1342) प्रभाती महला १ ॥
माइआ मोहि सगल जगु छाइआ ॥ कामणि देखि कामि लोभाइआ ॥ सुत कंचन सिउ हेतु वधाइआ ॥ सभु किछु अपना इकु रामु पराइआ ॥१॥

ऐसा जापु जपउ जपमाली ॥ दुख सुख परहरि भगति निराली ॥१॥ रहाउ ॥

गुण निधान तेरा अंतु न पाइआ ॥ साच सबदि तुझ माहि समाइआ ॥ आवा गउणु तुधु आपि रचाइआ ॥ सेई भगत जिन सचि चितु लाइआ ॥२॥

गिआनु धिआनु नरहरि निरबाणी ॥ बिनु सतिगुर भेटे कोइ न जाणी ॥ सगल सरोवर जोति समाणी ॥ आनद रूप विटहु कुरबाणी ॥३॥

भाउ भगति गुरमती पाए ॥ हउमै विचहु सबदि जलाए ॥ धावतु राखै ठाकि रहाए ॥ सचा नामु मंनि वसाए ॥४॥

बिसम बिनोद रहे परमादी ॥ गुरमति मानिआ एक लिव लागी ॥ देखि निवारिआ जल महि आगी ॥ सो बूझै होवै वडभागी ॥५॥

सतिगुरु सेवे भरमु चुकाए ॥ अनदिनु जागै सचि लिव लाए ॥ एको जाणै अवरु न कोइ ॥ सुखदाता सेवे निरमलु होइ ॥६॥

सेवा सुरति सबदि वीचारि ॥ जपु तपु संजमु हउमै मारि ॥ जीवन मुकतु जा सबदु सुणाए ॥ सची रहत सचा सुखु पाए ॥७॥

सुखदाता दुखु मेटणहारा ॥ अवरु न सूझसि बीजी कारा ॥ तनु मनु धनु हरि आगै राखिआ ॥ नानकु कहै महा रसु चाखिआ ॥८॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1343) प्रभाती महला १ ॥
निवली करम भुअंगम भाठी रेचक पूरक कु्मभ करै ॥ बिनु सतिगुर किछु सोझी नाही भरमे भूला बूडि मरै ॥ अंधा भरिआ भरि भरि धोवै अंतर की मलु कदे न लहै ॥ नाम बिना फोकट सभि करमा जिउ बाजीगरु भरमि भुलै ॥१॥

खटु करम नामु निरंजनु सोई ॥ तू गुण सागरु अवगुण मोही ॥१॥ रहाउ ॥

माइआ धंधा धावणी दुरमति कार बिकार ॥ मूरखु आपु गणाइदा बूझि न सकै कार ॥ मनसा माइआ मोहणी मनमुख बोल खुआर ॥ मजनु झूठा चंडाल का फोकट चार सींगार ॥२॥

झूठी मन की मति है करणी बादि बिबादु ॥ झूठे विचि अहंकरणु है खसम न पावै सादु ॥ बिनु नावै होरु कमावणा फिका आवै सादु ॥ दुसटी सभा विगुचीऐ बिखु वाती जीवण बादि ॥३॥

ए भ्रमि भूले मरहु न कोई ॥ सतिगुरु सेवि सदा सुखु होई ॥ बिनु सतिगुर मुकति किनै न पाई ॥ आवहि जांहि मरहि मरि जाई ॥४॥

एहु सरीरु है त्रै गुण धातु ॥ इस नो विआपै सोग संतापु ॥ सो सेवहु जिसु माई न बापु ॥ विचहु चूकै तिसना अरु आपु ॥५॥

जह जह देखा तह तह सोई ॥ बिनु सतिगुर भेटे मुकति न होई ॥ हिरदै सचु एह करणी सारु ॥ होरु सभु पाखंडु पूज खुआरु ॥६॥

दुबिधा चूकै तां सबदु पछाणु ॥ घरि बाहरि एको करि जाणु ॥ एहा मति सबदु है सारु ॥ विचि दुबिधा माथै पवै छारु ॥७॥

करणी कीरति गुरमति सारु ॥ संत सभा गुण गिआनु बीचारु ॥ मनु मारे जीवत मरि जाणु ॥ नानक नदरी नदरि पछाणु ॥८॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1344) प्रभाती महला १ ॥
आखणा सुनणा नामु अधारु ॥ धंधा छुटकि गइआ वेकारु ॥ जिउ मनमुखि दूजै पति खोई ॥ बिनु नावै मै अवरु न कोई ॥१॥

सुणि मन अंधे मूरख गवार ॥ आवत जात लाज नही लागै बिनु गुर बूडै बारो बार ॥१॥ रहाउ ॥

इसु मन माइआ मोहि बिनासु ॥ धुरि हुकमु लिखिआ तां कहीऐ कासु ॥ गुरमुखि विरला चीन्है कोई ॥ नाम बिहूना मुकति न होई ॥२॥

भ्रमि भ्रमि डोलै लख चउरासी ॥ बिनु गुर बूझे जम की फासी ॥ इहु मनूआ खिनु खिनु ऊभि पइआलि ॥ गुरमुखि छूटै नामु सम्हालि ॥३॥

आपे सदे ढिल न होइ ॥ सबदि मरै सहिला जीवै सोइ ॥ बिनु गुर सोझी किसै न होइ ॥ आपे करै करावै सोइ ॥४॥

झगड़ु चुकावै हरि गुण गावै ॥ पूरा सतिगुरु सहजि समावै ॥ इहु मनु डोलत तउ ठहरावै ॥ सचु करणी करि कार कमावै ॥५॥

अंतरि जूठा किउ सुचि होइ ॥ सबदी धोवै विरला कोइ ॥ गुरमुखि कोई सचु कमावै ॥ आवणु जाणा ठाकि रहावै ॥६॥

भउ खाणा पीणा सुखु सारु ॥ हरि जन संगति पावै पारु ॥ सचु बोलै बोलावै पिआरु ॥ गुर का सबदु करणी है सारु ॥७॥

हरि जसु करमु धरमु पति पूजा ॥ काम क्रोध अगनी महि भूंजा ॥ हरि रसु चाखिआ तउ मनु भीजा ॥ प्रणवति नानकु अवरु न दूजा ॥८॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1345) प्रभाती महला १ ॥
राम नामु जपि अंतरि पूजा ॥ गुर सबदु वीचारि अवरु नही दूजा ॥१॥

एको रवि रहिआ सभ ठाई ॥ अवरु न दीसै किसु पूज चड़ाई ॥१॥ रहाउ ॥

मनु तनु आगै जीअड़ा तुझ पासि ॥ जिउ भावै तिउ रखहु अरदासि ॥२॥

सचु जिहवा हरि रसन रसाई ॥ गुरमति छूटसि प्रभ सरणाई ॥३॥

करम धरम प्रभि मेरै कीए ॥ नामु वडाई सिरि करमां कीए ॥४॥

सतिगुर कै वसि चारि पदारथ ॥ तीनि समाए एक क्रितारथ ॥५॥

सतिगुरि दीए मुकति धिआनां ॥ हरि पदु चीन्हि भए परधाना ॥६॥

मनु तनु सीतलु गुरि बूझ बुझाई ॥ प्रभु निवाजे किनि कीमति पाई ॥७॥

कहु नानक गुरि बूझ बुझाई ॥ नाम बिना गति किनै न पाई ॥८॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1345) प्रभाती महला १ ॥
इकि धुरि बखसि लए गुरि पूरै सची बणत बणाई ॥ हरि रंग राते सदा रंगु साचा दुख बिसरे पति पाई ॥१॥

झूठी दुरमति की चतुराई ॥ बिनसत बार न लागै काई ॥१॥ रहाउ ॥

मनमुख कउ दुखु दरदु विआपसि मनमुखि दुखु न जाई ॥ सुख दुख दाता गुरमुखि जाता मेलि लए सरणाई ॥२॥

मनमुख ते अभ भगति न होवसि हउमै पचहि दिवाने ॥ इहु मनूआ खिनु ऊभि पइआली जब लगि सबद न जाने ॥३॥

भूख पिआसा जगु भइआ तिपति नही बिनु सतिगुर पाए ॥ सहजै सहजु मिलै सुखु पाईऐ दरगह पैधा जाए ॥४॥

दरगह दाना बीना इकु आपे निरमल गुर की बाणी ॥ आपे सुरता सचु वीचारसि आपे बूझै पदु निरबाणी ॥५॥

जलु तरंग अगनी पवनै फुनि त्रै मिलि जगतु उपाइआ ॥ ऐसा बलु छलु तिन कउ दीआ हुकमी ठाकि रहाइआ ॥६॥

ऐसे जन विरले जग अंदरि परखि खजानै पाइआ ॥ जाति वरन ते भए अतीता ममता लोभु चुकाइआ ॥७॥

नामि रते तीरथ से निरमल दुखु हउमै मैलु चुकाइआ ॥ नानकु तिन के चरन पखालै जिना गुरमुखि साचा भाइआ ॥८॥७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1346) प्रभाती महला ३ ॥
भै भाइ जागे से जन जाग्रण करहि हउमै मैलु उतारि ॥ सदा जागहि घरु अपणा राखहि पंच तसकर काढहि मारि ॥१॥

मन मेरे गुरमुखि नामु धिआइ ॥ जितु मारगि हरि पाईऐ मन सेई करम कमाइ ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमुखि सहज धुनि ऊपजै दुखु हउमै विचहु जाइ ॥ हरि नामा हरि मनि वसै सहजे हरि गुण गाइ ॥२॥

गुरमती मुख सोहणे हरि राखिआ उरि धारि ॥ ऐथै ओथै सुखु घणा जपि हरि हरि उतरे पारि ॥३॥

हउमै विचि जाग्रणु न होवई हरि भगति न पवई थाइ ॥ मनमुख दरि ढोई ना लहहि भाइ दूजै करम कमाइ ॥४॥

ध्रिगु खाणा ध्रिगु पैन्हणा जिन्हा दूजै भाइ पिआरु ॥ बिसटा के कीड़े बिसटा राते मरि जमहि होहि खुआरु ॥५॥

जिन कउ सतिगुरु भेटिआ तिना विटहु बलि जाउ ॥ तिन की संगति मिलि रहां सचे सचि समाउ ॥६॥

पूरै भागि गुरु पाईऐ उपाइ कितै न पाइआ जाइ ॥ सतिगुर ते सहजु ऊपजै हउमै सबदि जलाइ ॥७॥

हरि सरणाई भजु मन मेरे सभ किछु करणै जोगु ॥ नानक नामु न वीसरै जो किछु करै सु होगु ॥८॥२॥७॥२॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1347) प्रभाती महला ५ ॥
मन महि क्रोधु महा अहंकारा ॥ पूजा करहि बहुतु बिसथारा ॥ करि इसनानु तनि चक्र बणाए ॥ अंतर की मलु कब ही न जाए ॥१॥

इतु संजमि प्रभु किन ही न पाइआ ॥ भगउती मुद्रा मनु मोहिआ माइआ ॥१॥ रहाउ ॥

पाप करहि पंचां के बसि रे ॥ तीरथि नाइ कहहि सभि उतरे ॥ बहुरि कमावहि होइ निसंक ॥ जम पुरि बांधि खरे कालंक ॥२॥

घूघर बाधि बजावहि ताला ॥ अंतरि कपटु फिरहि बेताला ॥ वरमी मारी सापु न मूआ ॥ प्रभु सभ किछु जानै जिनि तू कीआ ॥३॥

पूंअर ताप गेरी के बसत्रा ॥ अपदा का मारिआ ग्रिह ते नसता ॥ देसु छोडि परदेसहि धाइआ ॥ पंच चंडाल नाले लै आइआ ॥४॥

कान फराइ हिराए टूका ॥ घरि घरि मांगै त्रिपतावन ते चूका ॥ बनिता छोडि बद नदरि पर नारी ॥ वेसि न पाईऐ महा दुखिआरी ॥५॥

बोलै नाही होइ बैठा मोनी ॥ अंतरि कलप भवाईऐ जोनी ॥ अंन ते रहता दुखु देही सहता ॥ हुकमु न बूझै विआपिआ ममता ॥६॥

बिनु सतिगुर किनै न पाई परम गते ॥ पूछहु सगल बेद सिम्रिते ॥ मनमुख करम करै अजाई ॥ जिउ बालू घर ठउर न ठाई ॥७॥

जिस नो भए गोबिंद दइआला ॥ गुर का बचनु तिनि बाधिओ पाला ॥ कोटि मधे कोई संतु दिखाइआ ॥ नानकु तिन कै संगि तराइआ ॥८॥

जे होवै भागु ता दरसनु पाईऐ ॥ आपि तरै सभु कुट्मबु तराईऐ ॥१॥ रहाउ दूजा ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1348) प्रभाती महला ५ ॥
सिमरत नामु किलबिख सभि काटे ॥ धरम राइ के कागर फाटे ॥ साधसंगति मिलि हरि रसु पाइआ ॥ पारब्रहमु रिद माहि समाइआ ॥१॥

राम रमत हरि हरि सुखु पाइआ ॥ तेरे दास चरन सरनाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

चूका गउणु मिटिआ अंधिआरु ॥ गुरि दिखलाइआ मुकति दुआरु ॥ हरि प्रेम भगति मनु तनु सद राता ॥ प्रभू जनाइआ तब ही जाता ॥२॥

घटि घटि अंतरि रविआ सोइ ॥ तिसु बिनु बीजो नाही कोइ ॥ बैर बिरोध छेदे भै भरमां ॥ प्रभि पुंनि आतमै कीने धरमा ॥३॥

महा तरंग ते कांढै लागा ॥ जनम जनम का टूटा गांढा ॥ जपु तपु संजमु नामु सम्हालिआ ॥ अपुनै ठाकुरि नदरि निहालिआ ॥४॥

मंगल सूख कलिआण तिथाईं ॥ जह सेवक गोपाल गुसाई ॥ प्रभ सुप्रसंन भए गोपाल ॥ जनम जनम के मिटे बिताल ॥५॥

होम जग उरध तप पूजा ॥ कोटि तीरथ इसनानु करीजा ॥ चरन कमल निमख रिदै धारे ॥ गोबिंद जपत सभि कारज सारे ॥६॥

ऊचे ते ऊचा प्रभ थानु ॥ हरि जन लावहि सहजि धिआनु ॥ दास दासन की बांछउ धूरि ॥ सरब कला प्रीतम भरपूरि ॥७॥

मात पिता हरि प्रीतमु नेरा ॥ मीत साजन भरवासा तेरा ॥ करु गहि लीने अपुने दास ॥ जपि जीवै नानकु गुणतास ॥८॥३॥२॥७॥१२॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1349) प्रभाती ॥
अलहु एकु मसीति बसतु है अवरु मुलखु किसु केरा ॥ हिंदू मूरति नाम निवासी दुह महि ततु न हेरा ॥१॥

अलह राम जीवउ तेरे नाई ॥ तू करि मिहरामति साई ॥१॥ रहाउ ॥

दखन देसि हरी का बासा पछिमि अलह मुकामा ॥ दिल महि खोजि दिलै दिलि खोजहु एही ठउर मुकामा ॥२॥

ब्रहमन गिआस करहि चउबीसा काजी मह रमजाना ॥ गिआरह मास पास कै राखे एकै माहि निधाना ॥३॥

कहा उडीसे मजनु कीआ किआ मसीति सिरु नांएं ॥ दिल महि कपटु निवाज गुजारै किआ हज काबै जांएं ॥४॥

एते अउरत मरदा साजे ए सभ रूप तुम्हारे ॥ कबीरु पूंगरा राम अलह का सभ गुर पीर हमारे ॥५॥

कहतु कबीरु सुनहु नर नरवै परहु एक की सरना ॥ केवल नामु जपहु रे प्रानी तब ही निहचै तरना ॥६॥२॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1349) प्रभाती ॥
अवलि अलह नूरु उपाइआ कुदरति के सभ बंदे ॥ एक नूर ते सभु जगु उपजिआ कउन भले को मंदे ॥१॥

लोगा भरमि न भूलहु भाई ॥ खालिकु खलक खलक महि खालिकु पूरि रहिओ स्रब ठांई ॥१॥ रहाउ ॥

माटी एक अनेक भांति करि साजी साजनहारै ॥ ना कछु पोच माटी के भांडे ना कछु पोच कु्मभारै ॥२॥

सभ महि सचा एको सोई तिस का कीआ सभु कछु होई ॥ हुकमु पछानै सु एको जानै बंदा कहीऐ सोई ॥३॥

अलहु अलखु न जाई लखिआ गुरि गुड़ु दीना मीठा ॥ कहि कबीर मेरी संका नासी सरब निरंजनु डीठा ॥४॥३॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1350) प्रभाती ॥
बेद कतेब कहहु मत झूठे झूठा जो न बिचारै ॥ जउ सभ महि एकु खुदाइ कहत हउ तउ किउ मुरगी मारै ॥१॥

मुलां कहहु निआउ खुदाई ॥ तेरे मन का भरमु न जाई ॥१॥ रहाउ ॥

पकरि जीउ आनिआ देह बिनासी माटी कउ बिसमिलि कीआ ॥ जोति सरूप अनाहत लागी कहु हलालु किआ कीआ ॥२॥

किआ उजू पाकु कीआ मुहु धोइआ किआ मसीति सिरु लाइआ ॥ जउ दिल महि कपटु निवाज गुजारहु किआ हज काबै जाइआ ॥३॥

तूं नापाकु पाकु नही सूझिआ तिस का मरमु न जानिआ ॥ कहि कबीर भिसति ते चूका दोजक सिउ मनु मानिआ ॥४॥४॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1350) प्रभाती ॥
सुंन संधिआ तेरी देव देवाकर अधपति आदि समाई ॥ सिध समाधि अंतु नही पाइआ लागि रहे सरनाई ॥१॥

लेहु आरती हो पुरख निरंजन सतिगुर पूजहु भाई ॥ ठाढा ब्रहमा निगम बीचारै अलखु न लखिआ जाई ॥१॥ रहाउ ॥

ततु तेलु नामु कीआ बाती दीपकु देह उज्यारा ॥ जोति लाइ जगदीस जगाइआ बूझै बूझनहारा ॥२॥

पंचे सबद अनाहद बाजे संगे सारिंगपानी ॥ कबीर दास तेरी आरती कीनी निरंकार निरबानी ॥३॥५॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 1350) प्रभाती बाणी भगत नामदेव जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मन की बिरथा मनु ही जानै कै बूझल आगै कहीऐ ॥ अंतरजामी रामु रवांई मै डरु कैसे चहीऐ ॥१॥

बेधीअले गोपाल गोसाई ॥ मेरा प्रभु रविआ सरबे ठाई ॥१॥ रहाउ ॥

मानै हाटु मानै पाटु मानै है पासारी ॥ मानै बासै नाना भेदी भरमतु है संसारी ॥२॥

गुर कै सबदि एहु मनु राता दुबिधा सहजि समाणी ॥ सभो हुकमु हुकमु है आपे निरभउ समतु बीचारी ॥३॥

जो जन जानि भजहि पुरखोतमु ता ची अबिगतु बाणी ॥ नामा कहै जगजीवनु पाइआ हिरदै अलख बिडाणी ॥४॥१॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 1351) प्रभाती ॥
आदि जुगादि जुगादि जुगो जुगु ता का अंतु न जानिआ ॥ सरब निरंतरि रामु रहिआ रवि ऐसा रूपु बखानिआ ॥१॥

गोबिदु गाजै सबदु बाजै ॥ आनद रूपी मेरो रामईआ ॥१॥ रहाउ ॥

बावन बीखू बानै बीखे बासु ते सुख लागिला ॥ सरबे आदि परमलादि कासट चंदनु भैइला ॥२॥

तुम्ह चे पारसु हम चे लोहा संगे कंचनु भैइला ॥ तू दइआलु रतनु लालु नामा साचि समाइला ॥३॥२॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 1351) प्रभाती ॥
अकुल पुरख इकु चलितु उपाइआ ॥ घटि घटि अंतरि ब्रहमु लुकाइआ ॥१॥

जीअ की जोति न जानै कोई ॥ तै मै कीआ सु मालूमु होई ॥१॥ रहाउ ॥

जिउ प्रगासिआ माटी कु्मभेउ ॥ आप ही करता बीठुलु देउ ॥२॥

जीअ का बंधनु करमु बिआपै ॥ जो किछु कीआ सु आपै आपै ॥३॥

प्रणवति नामदेउ इहु जीउ चितवै सु लहै ॥ अमरु होइ सद आकुल रहै ॥४॥३॥

(भक्त बेणी जी -- SGGS 1351) प्रभाती भगत बेणी जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तनि चंदनु मसतकि पाती ॥ रिद अंतरि कर तल काती ॥ ठग दिसटि बगा लिव लागा ॥ देखि बैसनो प्रान मुख भागा ॥१॥

कलि भगवत बंद चिरांमं ॥ क्रूर दिसटि रता निसि बादं ॥१॥ रहाउ ॥

नितप्रति इसनानु सरीरं ॥ दुइ धोती करम मुखि खीरं ॥ रिदै छुरी संधिआनी ॥ पर दरबु हिरन की बानी ॥२॥

सिल पूजसि चक्र गणेसं ॥ निसि जागसि भगति प्रवेसं ॥ पग नाचसि चितु अकरमं ॥ ए ल्मपट नाच अधरमं ॥३॥

म्रिग आसणु तुलसी माला ॥ कर ऊजल तिलकु कपाला ॥ रिदै कूड़ु कंठि रुद्राखं ॥ रे ल्मपट क्रिसनु अभाखं ॥४॥

जिनि आतम ततु न चीन्हिआ ॥ सभ फोकट धरम अबीनिआ ॥ कहु बेणी गुरमुखि धिआवै ॥ बिनु सतिगुर बाट न पावै ॥५॥१॥


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates