राग परभाती बिभास - बाणी शब्द, Raag Parbhati Bibhaas - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1327) ੴ सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
रागु परभाती बिभास महला १ चउपदे घरु १ ॥
नाइ तेरै तरणा नाइ पति पूज ॥ नाउ तेरा गहणा मति मकसूदु ॥ नाइ तेरै नाउ मंने सभ कोइ ॥ विणु नावै पति कबहु न होइ ॥१॥

अवर सिआणप सगली पाजु ॥ जै बखसे तै पूरा काजु ॥१॥ रहाउ ॥

नाउ तेरा ताणु नाउ दीबाणु ॥ नाउ तेरा लसकरु नाउ सुलतानु ॥ नाइ तेरै माणु महत परवाणु ॥ तेरी नदरी करमि पवै नीसाणु ॥२॥

नाइ तेरै सहजु नाइ सालाह ॥ नाउ तेरा अम्रितु बिखु उठि जाइ ॥ नाइ तेरै सभि सुख वसहि मनि आइ ॥ बिनु नावै बाधी जम पुरि जाइ ॥३॥

नारी बेरी घर दर देस ॥ मन कीआ खुसीआ कीचहि वेस ॥ जां सदे तां ढिल न पाइ ॥ नानक कूड़ु कूड़ो होइ जाइ ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1335) प्रभाती महला ४ बिभास
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रसकि रसकि गुन गावह गुरमति लिव उनमनि नामि लगान ॥ अम्रितु रसु पीआ गुर सबदी हम नाम विटहु कुरबान ॥१॥

हमरे जगजीवन हरि प्रान ॥ हरि ऊतमु रिद अंतरि भाइओ गुरि मंतु दीओ हरि कान ॥१॥ रहाउ ॥

आवहु संत मिलहु मेरे भाई मिलि हरि हरि नामु वखान ॥ कितु बिधि किउ पाईऐ प्रभु अपुना मो कउ करहु उपदेसु हरि दान ॥२॥

सतसंगति महि हरि हरि वसिआ मिलि संगति हरि गुन जान ॥ वडै भागि सतसंगति पाई गुरु सतिगुरु परसि भगवान ॥३॥

गुन गावह प्रभ अगम ठाकुर के गुन गाइ रहे हैरान ॥ जन नानक कउ गुरि किरपा धारी हरि नामु दीओ खिन दान ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1337) प्रभाती बिभास पड़ताल महला ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जपि मन हरि हरि नामु निधान ॥ हरि दरगह पावहि मान ॥ जिनि जपिआ ते पारि परान ॥१॥ रहाउ ॥

सुनि मन हरि हरि नामु करि धिआनु ॥ सुनि मन हरि कीरति अठसठि मजानु ॥ सुनि मन गुरमुखि पावहि मानु ॥१॥

जपि मन परमेसुरु परधानु ॥ खिन खोवै पाप कोटान ॥ मिलु नानक हरि भगवान ॥२॥१॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1337) प्रभाती महला ५ बिभास
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मनु हरि कीआ तनु सभु साजिआ ॥ पंच तत रचि जोति निवाजिआ ॥ सिहजा धरति बरतन कउ पानी ॥ निमख न विसारहु सेवहु सारिगपानी ॥१॥

मन सतिगुरु सेवि होइ परम गते ॥ हरख सोग ते रहहि निरारा तां तू पावहि प्रानपते ॥१॥ रहाउ ॥

कापड़ भोग रस अनिक भुंचाए ॥ मात पिता कुट्मब सगल बनाए ॥ रिजकु समाहे जलि थलि मीत ॥ सो हरि सेवहु नीता नीत ॥२॥

तहा सखाई जह कोइ न होवै ॥ कोटि अप्राध इक खिन महि धोवै ॥ दाति करै नही पछोतावै ॥ एका बखस फिरि बहुरि न बुलावै ॥३॥

किरत संजोगी पाइआ भालि ॥ साधसंगति महि बसे गुपाल ॥ गुर मिलि आए तुमरै दुआर ॥ जन नानक दरसनु देहु मुरारि ॥४॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1341) प्रभाती महला ५ घरु २ बिभास
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अवरु न दूजा ठाउ ॥ नाही बिनु हरि नाउ ॥ सरब सिधि कलिआन ॥ पूरन होहि सगल काम ॥१॥

हरि को नामु जपीऐ नीत ॥ काम क्रोध अहंकारु बिनसै लगै एकै प्रीति ॥१॥ रहाउ ॥

नामि लागै दूखु भागै सरनि पालन जोगु ॥ सतिगुरु भेटै जमु न तेटै जिसु धुरि होवै संजोगु ॥२॥

रैनि दिनसु धिआइ हरि हरि तजहु मन के भरम ॥ साधसंगति हरि मिलै जिसहि पूरन करम ॥३॥

जनम जनम बिखाद बिनसे राखि लीने आपि ॥ मात पिता मीत भाई जन नानक हरि हरि जापि ॥४॥१॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1341) प्रभाती महला ५ बिभास पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रम राम राम राम जाप ॥ कलि कलेस लोभ मोह बिनसि जाइ अहं ताप ॥१॥ रहाउ ॥

आपु तिआगि संत चरन लागि मनु पवितु जाहि पाप ॥१॥

नानकु बारिकु कछू न जानै राखन कउ प्रभु माई बाप ॥२॥१॥१४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1342) प्रभाती असटपदीआ महला १ बिभास
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुबिधा बउरी मनु बउराइआ ॥ झूठै लालचि जनमु गवाइआ ॥ लपटि रही फुनि बंधु न पाइआ ॥ सतिगुरि राखे नामु द्रिड़ाइआ ॥१॥

ना मनु मरै न माइआ मरै ॥ जिनि किछु कीआ सोई जाणै सबदु वीचारि भउ सागरु तरै ॥१॥ रहाउ ॥

माइआ संचि राजे अहंकारी ॥ माइआ साथि न चलै पिआरी ॥ माइआ ममता है बहु रंगी ॥ बिनु नावै को साथि न संगी ॥२॥

जिउ मनु देखहि पर मनु तैसा ॥ जैसी मनसा तैसी दसा ॥ जैसा करमु तैसी लिव लावै ॥ सतिगुरु पूछि सहज घरु पावै ॥३॥

रागि नादि मनु दूजै भाइ ॥ अंतरि कपटु महा दुखु पाइ ॥ सतिगुरु भेटै सोझी पाइ ॥ सचै नामि रहै लिव लाइ ॥४॥

सचै सबदि सचु कमावै ॥ सची बाणी हरि गुण गावै ॥ निज घरि वासु अमर पदु पावै ॥ ता दरि साचै सोभा पावै ॥५॥

गुर सेवा बिनु भगति न होई ॥ अनेक जतन करै जे कोई ॥ हउमै मेरा सबदे खोई ॥ निरमल नामु वसै मनि सोई ॥६॥

इसु जग महि सबदु करणी है सारु ॥ बिनु सबदै होरु मोहु गुबारु ॥ सबदे नामु रखै उरि धारि ॥ सबदे गति मति मोख दुआरु ॥७॥

अवरु नाही करि देखणहारो ॥ साचा आपि अनूपु अपारो ॥ राम नाम ऊतम गति होई ॥ नानक खोजि लहै जनु कोई ॥८॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1346) प्रभाती महला ३ बिभास
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुर परसादी वेखु तू हरि मंदरु तेरै नालि ॥ हरि मंदरु सबदे खोजीऐ हरि नामो लेहु सम्हालि ॥१॥

मन मेरे सबदि रपै रंगु होइ ॥ सची भगति सचा हरि मंदरु प्रगटी साची सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि मंदरु एहु सरीरु है गिआनि रतनि परगटु होइ ॥ मनमुख मूलु न जाणनी माणसि हरि मंदरु न होइ ॥२॥

हरि मंदरु हरि जीउ साजिआ रखिआ हुकमि सवारि ॥ धुरि लेखु लिखिआ सु कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥३॥

सबदु चीन्हि सुखु पाइआ सचै नाइ पिआर ॥ हरि मंदरु सबदे सोहणा कंचनु कोटु अपार ॥४॥

हरि मंदरु एहु जगतु है गुर बिनु घोरंधार ॥ दूजा भाउ करि पूजदे मनमुख अंध गवार ॥५॥

जिथै लेखा मंगीऐ तिथै देह जाति न जाइ ॥ साचि रते से उबरे दुखीए दूजै भाइ ॥६॥

हरि मंदर महि नामु निधानु है ना बूझहि मुगध गवार ॥ गुर परसादी चीन्हिआ हरि राखिआ उरि धारि ॥७॥

गुर की बाणी गुर ते जाती जि सबदि रते रंगु लाइ ॥ पवितु पावन से जन निरमल हरि कै नामि समाइ ॥८॥

हरि मंदरु हरि का हाटु है रखिआ सबदि सवारि ॥ तिसु विचि सउदा एकु नामु गुरमुखि लैनि सवारि ॥९॥

हरि मंदर महि मनु लोहटु है मोहिआ दूजै भाइ ॥ पारसि भेटिऐ कंचनु भइआ कीमति कही न जाइ ॥१०॥

हरि मंदर महि हरि वसै सरब निरंतरि सोइ ॥ नानक गुरमुखि वणजीऐ सचा सउदा होइ ॥११॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1347) बिभास प्रभाती महला ५ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मात पिता भाई सुतु बनिता ॥ चूगहि चोग अनंद सिउ जुगता ॥ उरझि परिओ मन मीठ मोहारा ॥ गुन गाहक मेरे प्रान अधारा ॥१॥

एकु हमारा अंतरजामी ॥ धर एका मै टिक एकसु की सिरि साहा वड पुरखु सुआमी ॥१॥ रहाउ ॥

छल नागनि सिउ मेरी टूटनि होई ॥ गुरि कहिआ इह झूठी धोही ॥ मुखि मीठी खाई कउराइ ॥ अम्रित नामि मनु रहिआ अघाइ ॥२॥

लोभ मोह सिउ गई विखोटि ॥ गुरि क्रिपालि मोहि कीनी छोटि ॥ इह ठगवारी बहुतु घर गाले ॥ हम गुरि राखि लीए किरपाले ॥३॥

काम क्रोध सिउ ठाटु न बनिआ ॥ गुर उपदेसु मोहि कानी सुनिआ ॥ जह देखउ तह महा चंडाल ॥ राखि लीए अपुनै गुरि गोपाल ॥४॥

दस नारी मै करी दुहागनि ॥ गुरि कहिआ एह रसहि बिखागनि ॥ इन सनबंधी रसातलि जाइ ॥ हम गुरि राखे हरि लिव लाइ ॥५॥

अहमेव सिउ मसलति छोडी ॥ गुरि कहिआ इहु मूरखु होडी ॥ इहु नीघरु घरु कही न पाए ॥ हम गुरि राखि लीए लिव लाए ॥६॥

इन लोगन सिउ हम भए बैराई ॥ एक ग्रिह महि दुइ न खटांई ॥ आए प्रभ पहि अंचरि लागि ॥ करहु तपावसु प्रभ सरबागि ॥७॥

प्रभ हसि बोले कीए निआंएं ॥ सगल दूत मेरी सेवा लाए ॥ तूं ठाकुरु इहु ग्रिहु सभु तेरा ॥ कहु नानक गुरि कीआ निबेरा ॥८॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1349) बिभास प्रभाती बाणी भगत कबीर जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मरन जीवन की संका नासी ॥ आपन रंगि सहज परगासी ॥१॥

प्रगटी जोति मिटिआ अंधिआरा ॥ राम रतनु पाइआ करत बीचारा ॥१॥ रहाउ ॥

जह अनंदु दुखु दूरि पइआना ॥ मनु मानकु लिव ततु लुकाना ॥२॥

जो किछु होआ सु तेरा भाणा ॥ जो इव बूझै सु सहजि समाणा ॥३॥

कहतु कबीरु किलबिख गए खीणा ॥ मनु भइआ जगजीवन लीणा ॥४॥१॥


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates