Pt 10 - राग मारू - बाणी शब्द, Part 10 - Raag Maru - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1102) सलोक मः ५ ॥
पहिला मरणु कबूलि जीवण की छडि आस ॥ होहु सभना की रेणुका तउ आउ हमारै पासि ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1102) मः ५ ॥
मुआ जीवंदा पेखु जीवंदे मरि जानि ॥ जिन्हा मुहबति इक सिउ ते माणस परधान ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1102) मः ५ ॥
जिसु मनि वसै पारब्रहमु निकटि न आवै पीर ॥ भुख तिख तिसु न विआपई जमु नही आवै नीर ॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1102) पउड़ी ॥
कीमति कहणु न जाईऐ सचु साह अडोलै ॥ सिध साधिक गिआनी धिआनीआ कउणु तुधुनो तोलै ॥ भंनण घड़ण समरथु है ओपति सभ परलै ॥ करण कारण समरथु है घटि घटि सभ बोलै ॥ रिजकु समाहे सभसै किआ माणसु डोलै ॥ गहिर गभीरु अथाहु तू गुण गिआन अमोलै ॥ सोई कमु कमावणा कीआ धुरि मउलै ॥ तुधहु बाहरि किछु नही नानकु गुण बोलै ॥२३॥१॥२॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1102) रागु मारू बाणी कबीर जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पडीआ कवन कुमति तुम लागे ॥ बूडहुगे परवार सकल सिउ रामु न जपहु अभागे ॥१॥ रहाउ ॥

बेद पुरान पड़े का किआ गुनु खर चंदन जस भारा ॥ राम नाम की गति नही जानी कैसे उतरसि पारा ॥१॥

जीअ बधहु सु धरमु करि थापहु अधरमु कहहु कत भाई ॥ आपस कउ मुनिवर करि थापहु का कउ कहहु कसाई ॥२॥

मन के अंधे आपि न बूझहु काहि बुझावहु भाई ॥ माइआ कारन बिदिआ बेचहु जनमु अबिरथा जाई ॥३॥

नारद बचन बिआसु कहत है सुक कउ पूछहु जाई ॥ कहि कबीर रामै रमि छूटहु नाहि त बूडे भाई ॥४॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1103) बनहि बसे किउ पाईऐ जउ लउ मनहु न तजहि बिकार ॥ जिह घरु बनु समसरि कीआ ते पूरे संसार ॥१॥

सार सुखु पाईऐ रामा ॥ रंगि रवहु आतमै राम ॥१॥ रहाउ ॥

जटा भसम लेपन कीआ कहा गुफा महि बासु ॥ मनु जीते जगु जीतिआ जां ते बिखिआ ते होइ उदासु ॥२॥

अंजनु देइ सभै कोई टुकु चाहन माहि बिडानु ॥ गिआन अंजनु जिह पाइआ ते लोइन परवानु ॥३॥

कहि कबीर अब जानिआ गुरि गिआनु दीआ समझाइ ॥ अंतरगति हरि भेटिआ अब मेरा मनु कतहू न जाइ ॥४॥२॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1103) रिधि सिधि जा कउ फुरी तब काहू सिउ किआ काज ॥ तेरे कहने की गति किआ कहउ मै बोलत ही बड लाज ॥१॥

रामु जिह पाइआ राम ॥ ते भवहि न बारै बार ॥१॥ रहाउ ॥

झूठा जगु डहकै घना दिन दुइ बरतन की आस ॥ राम उदकु जिह जन पीआ तिहि बहुरि न भई पिआस ॥२॥

गुर प्रसादि जिह बूझिआ आसा ते भइआ निरासु ॥ सभु सचु नदरी आइआ जउ आतम भइआ उदासु ॥३॥

राम नाम रसु चाखिआ हरि नामा हर तारि ॥ कहु कबीर कंचनु भइआ भ्रमु गइआ समुद्रै पारि ॥४॥३॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1103) उदक समुंद सलल की साखिआ नदी तरंग समावहिगे ॥ सुंनहि सुंनु मिलिआ समदरसी पवन रूप होइ जावहिगे ॥१॥

बहुरि हम काहे आवहिगे ॥ आवन जाना हुकमु तिसै का हुकमै बुझि समावहिगे ॥१॥ रहाउ ॥

जब चूकै पंच धातु की रचना ऐसे भरमु चुकावहिगे ॥ दरसनु छोडि भए समदरसी एको नामु धिआवहिगे ॥२॥

जित हम लाए तित ही लागे तैसे करम कमावहिगे ॥ हरि जी क्रिपा करे जउ अपनी तौ गुर के सबदि समावहिगे ॥३॥

जीवत मरहु मरहु फुनि जीवहु पुनरपि जनमु न होई ॥ कहु कबीर जो नामि समाने सुंन रहिआ लिव सोई ॥४॥४॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1104) जउ तुम्ह मो कउ दूरि करत हउ तउ तुम मुकति बतावहु ॥ एक अनेक होइ रहिओ सगल महि अब कैसे भरमावहु ॥१॥

राम मो कउ तारि कहां लै जई है ॥ सोधउ मुकति कहा देउ कैसी करि प्रसादु मोहि पाई है ॥१॥ रहाउ ॥

तारन तरनु तबै लगु कहीऐ जब लगु ततु न जानिआ ॥ अब तउ बिमल भए घट ही महि कहि कबीर मनु मानिआ ॥२॥५॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1104) जिनि गड़ कोट कीए कंचन के छोडि गइआ सो रावनु ॥१॥

काहे कीजतु है मनि भावनु ॥ जब जमु आइ केस ते पकरै तह हरि को नामु छडावन ॥१॥ रहाउ ॥

कालु अकालु खसम का कीन्हा इहु परपंचु बधावनु ॥ कहि कबीर ते अंते मुकते जिन्ह हिरदै राम रसाइनु ॥२॥६॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1104) देही गावा जीउ धर महतउ बसहि पंच किरसाना ॥ नैनू नकटू स्रवनू रसपति इंद्री कहिआ न माना ॥१॥

बाबा अब न बसउ इह गाउ ॥ घरी घरी का लेखा मागै काइथु चेतू नाउ ॥१॥ रहाउ ॥

धरम राइ जब लेखा मागै बाकी निकसी भारी ॥ पंच क्रिसानवा भागि गए लै बाधिओ जीउ दरबारी ॥२॥

कहै कबीरु सुनहु रे संतहु खेत ही करहु निबेरा ॥ अब की बार बखसि बंदे कउ बहुरि न भउजलि फेरा ॥३॥७॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1104) रागु मारू बाणी कबीर जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अनभउ किनै न देखिआ बैरागीअड़े ॥ बिनु भै अनभउ होइ वणाह्मबै ॥१॥

सहु हदूरि देखै तां भउ पवै बैरागीअड़े ॥ हुकमै बूझै त निरभउ होइ वणाह्मबै ॥२॥

हरि पाखंडु न कीजई बैरागीअड़े ॥ पाखंडि रता सभु लोकु वणाह्मबै ॥३॥

त्रिसना पासु न छोडई बैरागीअड़े ॥ ममता जालिआ पिंडु वणाह्मबै ॥४॥

चिंता जालि तनु जालिआ बैरागीअड़े ॥ जे मनु मिरतकु होइ वणाह्मबै ॥५॥

सतिगुर बिनु बैरागु न होवई बैरागीअड़े ॥ जे लोचै सभु कोइ वणाह्मबै ॥६॥

करमु होवै सतिगुरु मिलै बैरागीअड़े ॥ सहजे पावै सोइ वणाह्मबै ॥७॥

कहु कबीर इक बेनती बैरागीअड़े ॥ मो कउ भउजलु पारि उतारि वणाह्मबै ॥८॥१॥८॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1105) राजन कउनु तुमारै आवै ॥ ऐसो भाउ बिदर को देखिओ ओहु गरीबु मोहि भावै ॥१॥ रहाउ ॥

हसती देखि भरम ते भूला स्री भगवानु न जानिआ ॥ तुमरो दूधु बिदर को पान्हो अम्रितु करि मै मानिआ ॥१॥

खीर समानि सागु मै पाइआ गुन गावत रैनि बिहानी ॥ कबीर को ठाकुरु अनद बिनोदी जाति न काहू की मानी ॥२॥९॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1105) सलोक कबीर ॥
गगन दमामा बाजिओ परिओ नीसानै घाउ ॥ खेतु जु मांडिओ सूरमा अब जूझन को दाउ ॥१॥

सूरा सो पहिचानीऐ जु लरै दीन के हेत ॥ पुरजा पुरजा कटि मरै कबहू न छाडै खेतु ॥२॥२॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 1105) कबीर का सबदु रागु मारू बाणी नामदेउ जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चारि मुकति चारै सिधि मिलि कै दूलह प्रभ की सरनि परिओ ॥ मुकति भइओ चउहूं जुग जानिओ जसु कीरति माथै छत्रु धरिओ ॥१॥

राजा राम जपत को को न तरिओ ॥ गुर उपदेसि साध की संगति भगतु भगतु ता को नामु परिओ ॥१॥ रहाउ ॥

संख चक्र माला तिलकु बिराजित देखि प्रतापु जमु डरिओ ॥ निरभउ भए राम बल गरजित जनम मरन संताप हिरिओ ॥२॥

अ्मबरीक कउ दीओ अभै पदु राजु भभीखन अधिक करिओ ॥ नउ निधि ठाकुरि दई सुदामै ध्रूअ अटलु अजहू न टरिओ ॥३॥

भगत हेति मारिओ हरनाखसु नरसिंघ रूप होइ देह धरिओ ॥ नामा कहै भगति बसि केसव अजहूं बलि के दुआर खरो ॥४॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1105) मारू कबीर जीउ ॥
दीनु बिसारिओ रे दिवाने दीनु बिसारिओ रे ॥ पेटु भरिओ पसूआ जिउ सोइओ मनुखु जनमु है हारिओ ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगति कबहू नही कीनी रचिओ धंधै झूठ ॥ सुआन सूकर बाइस जिवै भटकतु चालिओ ऊठि ॥१॥

आपस कउ दीरघु करि जानै अउरन कउ लग मात ॥ मनसा बाचा करमना मै देखे दोजक जात ॥२॥

कामी क्रोधी चातुरी बाजीगर बेकाम ॥ निंदा करते जनमु सिरानो कबहू न सिमरिओ रामु ॥३॥

कहि कबीर चेतै नही मूरखु मुगधु गवारु ॥ रामु नामु जानिओ नही कैसे उतरसि पारि ॥४॥१॥

(भक्त जैदेव जी -- SGGS 1106) रागु मारू बाणी जैदेउ जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चंद सत भेदिआ नाद सत पूरिआ सूर सत खोड़सा दतु कीआ ॥ अबल बलु तोड़िआ अचल चलु थपिआ अघड़ु घड़िआ तहा अपिउ पीआ ॥१॥

मन आदि गुण आदि वखाणिआ ॥ तेरी दुबिधा द्रिसटि समानिआ ॥१॥ रहाउ ॥

अरधि कउ अरधिआ सरधि कउ सरधिआ सलल कउ सललि समानि आइआ ॥ बदति जैदेउ जैदेव कउ रमिआ ब्रहमु निरबाणु लिव लीणु पाइआ ॥२॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1106) कबीरु ॥ मारू ॥
रामु सिमरु पछुताहिगा मन ॥ पापी जीअरा लोभु करतु है आजु कालि उठि जाहिगा ॥१॥ रहाउ ॥

लालच लागे जनमु गवाइआ माइआ भरम भुलाहिगा ॥ धन जोबन का गरबु न कीजै कागद जिउ गलि जाहिगा ॥१॥

जउ जमु आइ केस गहि पटकै ता दिन किछु न बसाहिगा ॥ सिमरनु भजनु दइआ नही कीनी तउ मुखि चोटा खाहिगा ॥२॥

धरम राइ जब लेखा मागै किआ मुखु लै कै जाहिगा ॥ कहतु कबीरु सुनहु रे संतहु साधसंगति तरि जांहिगा ॥३॥१॥

(भक्त रविदास जी -- SGGS 1106) रागु मारू बाणी रविदास जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै ॥ गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै ॥१॥ रहाउ ॥

जा की छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढरै ॥ नीचह ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै ॥१॥

नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै ॥ कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरि जीउ ते सभै सरै ॥२॥१॥

(भक्त रविदास जी -- SGGS 1106) मारू ॥
सुख सागर सुरितरु चिंतामनि कामधेन बसि जा के रे ॥ चारि पदारथ असट महा सिधि नव निधि कर तल ता कै ॥१॥

हरि हरि हरि न जपसि रसना ॥ अवर सभ छाडि बचन रचना ॥१॥ रहाउ ॥

नाना खिआन पुरान बेद बिधि चउतीस अछर माही ॥ बिआस बीचारि कहिओ परमारथु राम नाम सरि नाही ॥२॥

सहज समाधि उपाधि रहत होइ बडे भागि लिव लागी ॥ कहि रविदास उदास दास मति जनम मरन भै भागी ॥३॥२॥१५॥


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