राग मारू - बाणी शब्द, Raag Maru - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू नानक देव जी -- SGGS 989) रागु मारू महला १ घरु १ चउपदे
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
सलोकु ॥
साजन तेरे चरन की होइ रहा सद धूरि ॥ नानक सरणि तुहारीआ पेखउ सदा हजूरि ॥१॥

सबद ॥
पिछहु राती सदड़ा नामु खसम का लेहि ॥ खेमे छत्र सराइचे दिसनि रथ पीड़े ॥ जिनी तेरा नामु धिआइआ तिन कउ सदि मिले ॥१॥

बाबा मै करमहीण कूड़िआर ॥ नामु न पाइआ तेरा अंधा भरमि भूला मनु मेरा ॥१॥ रहाउ ॥

साद कीते दुख परफुड़े पूरबि लिखे माइ ॥ सुख थोड़े दुख अगले दूखे दूखि विहाइ ॥२॥

विछुड़िआ का किआ वीछुड़ै मिलिआ का किआ मेलु ॥ साहिबु सो सालाहीऐ जिनि करि देखिआ खेलु ॥३॥

संजोगी मेलावड़ा इनि तनि कीते भोग ॥ विजोगी मिलि विछुड़े नानक भी संजोग ॥४॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 989) मारू महला १ ॥
मिलि मात पिता पिंडु कमाइआ ॥ तिनि करतै लेखु लिखाइआ ॥ लिखु दाति जोति वडिआई ॥ मिलि माइआ सुरति गवाई ॥१॥

मूरख मन काहे करसहि माणा ॥ उठि चलणा खसमै भाणा ॥१॥ रहाउ ॥

तजि साद सहज सुखु होई ॥ घर छडणे रहै न कोई ॥ किछु खाजै किछु धरि जाईऐ ॥ जे बाहुड़ि दुनीआ आईऐ ॥२॥

सजु काइआ पटु हढाए ॥ फुरमाइसि बहुतु चलाए ॥ करि सेज सुखाली सोवै ॥ हथी पउदी काहे रोवै ॥३॥

घर घुमणवाणी भाई ॥ पाप पथर तरणु न जाई ॥ भउ बेड़ा जीउ चड़ाऊ ॥ कहु नानक देवै काहू ॥४॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 990) मारू महला १ घरु १ ॥
करणी कागदु मनु मसवाणी बुरा भला दुइ लेख पए ॥ जिउ जिउ किरतु चलाए तिउ चलीऐ तउ गुण नाही अंतु हरे ॥१॥

चित चेतसि की नही बावरिआ ॥ हरि बिसरत तेरे गुण गलिआ ॥१॥ रहाउ ॥

जाली रैनि जालु दिनु हूआ जेती घड़ी फाही तेती ॥ रसि रसि चोग चुगहि नित फासहि छूटसि मूड़े कवन गुणी ॥२॥

काइआ आरणु मनु विचि लोहा पंच अगनि तितु लागि रही ॥ कोइले पाप पड़े तिसु ऊपरि मनु जलिआ संन्ही चिंत भई ॥३॥

भइआ मनूरु कंचनु फिरि होवै जे गुरु मिलै तिनेहा ॥ एकु नामु अम्रितु ओहु देवै तउ नानक त्रिसटसि देहा ॥४॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 990) मारू महला १ ॥
बिमल मझारि बससि निरमल जल पदमनि जावल रे ॥ पदमनि जावल जल रस संगति संगि दोख नही रे ॥१॥

दादर तू कबहि न जानसि रे ॥ भखसि सिबालु बससि निरमल जल अम्रितु न लखसि रे ॥१॥ रहाउ ॥

बसु जल नित न वसत अलीअल मेर चचा गुन रे ॥ चंद कुमुदनी दूरहु निवससि अनभउ कारनि रे ॥२॥

अम्रित खंडु दूधि मधु संचसि तू बन चातुर रे ॥ अपना आपु तू कबहु न छोडसि पिसन प्रीति जिउ रे ॥३॥

पंडित संगि वसहि जन मूरख आगम सास सुने ॥ अपना आपु तू कबहु न छोडसि सुआन पूछि जिउ रे ॥४॥

इकि पाखंडी नामि न राचहि इकि हरि हरि चरणी रे ॥ पूरबि लिखिआ पावसि नानक रसना नामु जपि रे ॥५॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 990) मारू महला १ ॥
सलोकु ॥
पतित पुनीत असंख होहि हरि चरनी मनु लाग ॥ अठसठि तीरथ नामु प्रभ नानक जिसु मसतकि भाग ॥१॥

सबदु ॥
सखी सहेली गरबि गहेली ॥ सुणि सह की इक बात सुहेली ॥१॥

जो मै बेदन सा किसु आखा माई ॥ हरि बिनु जीउ न रहै कैसे राखा माई ॥१॥ रहाउ ॥

हउ दोहागणि खरी रंञाणी ॥ गइआ सु जोबनु धन पछुताणी ॥२॥

तू दाना साहिबु सिरि मेरा ॥ खिजमति करी जनु बंदा तेरा ॥३॥

भणति नानकु अंदेसा एही ॥ बिनु दरसन कैसे रवउ सनेही ॥४॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 991) मारू महला १ ॥
मुल खरीदी लाला गोला मेरा नाउ सभागा ॥ गुर की बचनी हाटि बिकाना जितु लाइआ तितु लागा ॥१॥

तेरे लाले किआ चतुराई ॥ साहिब का हुकमु न करणा जाई ॥१॥ रहाउ ॥

मा लाली पिउ लाला मेरा हउ लाले का जाइआ ॥ लाली नाचै लाला गावै भगति करउ तेरी राइआ ॥२॥

पीअहि त पाणी आणी मीरा खाहि त पीसण जाउ ॥ पखा फेरी पैर मलोवा जपत रहा तेरा नाउ ॥३॥

लूण हरामी नानकु लाला बखसिहि तुधु वडिआई ॥ आदि जुगादि दइआपति दाता तुधु विणु मुकति न पाई ॥४॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 991) मारू महला १ ॥
कोई आखै भूतना को कहै बेताला ॥ कोई आखै आदमी नानकु वेचारा ॥१॥

भइआ दिवाना साह का नानकु बउराना ॥ हउ हरि बिनु अवरु न जाना ॥१॥ रहाउ ॥

तउ देवाना जाणीऐ जा भै देवाना होइ ॥ एकी साहिब बाहरा दूजा अवरु न जाणै कोइ ॥२॥

तउ देवाना जाणीऐ जा एका कार कमाइ ॥ हुकमु पछाणै खसम का दूजी अवर सिआणप काइ ॥३॥

तउ देवाना जाणीऐ जा साहिब धरे पिआरु ॥ मंदा जाणै आप कउ अवरु भला संसारु ॥४॥७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 991) मारू महला १ ॥
इहु धनु सरब रहिआ भरपूरि ॥ मनमुख फिरहि सि जाणहि दूरि ॥१॥

सो धनु वखरु नामु रिदै हमारै ॥ जिसु तू देहि तिसै निसतारै ॥१॥ रहाउ ॥

न इहु धनु जलै न तसकरु लै जाइ ॥ न इहु धनु डूबै न इसु धन कउ मिलै सजाइ ॥२॥

इसु धन की देखहु वडिआई ॥ सहजे माते अनदिनु जाई ॥३॥

इक बात अनूप सुनहु नर भाई ॥ इसु धन बिनु कहहु किनै परम गति पाई ॥४॥

भणति नानकु अकथ की कथा सुणाए ॥ सतिगुरु मिलै त इहु धनु पाए ॥५॥८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 991) मारू महला १ ॥
सूर सरु सोसि लै सोम सरु पोखि लै जुगति करि मरतु सु सनबंधु कीजै ॥ मीन की चपल सिउ जुगति मनु राखीऐ उडै नह हंसु नह कंधु छीजै ॥१॥

मूड़े काइचे भरमि भुला ॥ नह चीनिआ परमानंदु बैरागी ॥१॥ रहाउ ॥

अजर गहु जारि लै अमर गहु मारि लै भ्राति तजि छोडि तउ अपिउ पीजै ॥ मीन की चपल सिउ जुगति मनु राखीऐ उडै नह हंसु नह कंधु छीजै ॥२॥

भणति नानकु जनो रवै जे हरि मनो मन पवन सिउ अम्रितु पीजै ॥ मीन की चपल सिउ जुगति मनु राखीऐ उडै नह हंसु नह कंधु छीजै ॥३॥९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 992) मारू महला १ ॥
माइआ मुई न मनु मुआ सरु लहरी मै मतु ॥ बोहिथु जल सिरि तरि टिकै साचा वखरु जितु ॥ माणकु मन महि मनु मारसी सचि न लागै कतु ॥ राजा तखति टिकै गुणी भै पंचाइण रतु ॥१॥

बाबा साचा साहिबु दूरि न देखु ॥ सरब जोति जगजीवना सिरि सिरि साचा लेखु ॥१॥ रहाउ ॥

ब्रहमा बिसनु रिखी मुनी संकरु इंदु तपै भेखारी ॥ मानै हुकमु सोहै दरि साचै आकी मरहि अफारी ॥ जंगम जोध जती संनिआसी गुरि पूरै वीचारी ॥ बिनु सेवा फलु कबहु न पावसि सेवा करणी सारी ॥२॥

निधनिआ धनु निगुरिआ गुरु निमाणिआ तू माणु ॥ अंधुलै माणकु गुरु पकड़िआ निताणिआ तू ताणु ॥ होम जपा नही जाणिआ गुरमती साचु पछाणु ॥ नाम बिना नाही दरि ढोई झूठा आवण जाणु ॥३॥

साचा नामु सलाहीऐ साचे ते त्रिपति होइ ॥ गिआन रतनि मनु माजीऐ बहुड़ि न मैला होइ ॥ जब लगु साहिबु मनि वसै तब लगु बिघनु न होइ ॥ नानक सिरु दे छुटीऐ मनि तनि साचा सोइ ॥४॥१०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 992) मारू महला १ ॥
जोगी जुगति नामु निरमाइलु ता कै मैलु न राती ॥ प्रीतम नाथु सदा सचु संगे जनम मरण गति बीती ॥१॥

गुसाई तेरा कहा नामु कैसे जाती ॥ जा तउ भीतरि महलि बुलावहि पूछउ बात निरंती ॥१॥ रहाउ ॥

ब्रहमणु ब्रहम गिआन इसनानी हरि गुण पूजे पाती ॥ एको नामु एकु नाराइणु त्रिभवण एका जोती ॥२॥

जिहवा डंडी इहु घटु छाबा तोलउ नामु अजाची ॥ एको हाटु साहु सभना सिरि वणजारे इक भाती ॥३॥

दोवै सिरे सतिगुरू निबेड़े सो बूझै जिसु एक लिव लागी जीअहु रहै निभराती ॥ सबदु वसाए भरमु चुकाए सदा सेवकु दिनु राती ॥४॥

ऊपरि गगनु गगन परि गोरखु ता का अगमु गुरू पुनि वासी ॥ गुर बचनी बाहरि घरि एको नानकु भइआ उदासी ॥५॥११॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 993) रागु मारू महला १ घरु ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अहिनिसि जागै नीद न सोवै ॥ सो जाणै जिसु वेदन होवै ॥ प्रेम के कान लगे तन भीतरि वैदु कि जाणै कारी जीउ ॥१॥

जिस नो साचा सिफती लाए ॥ गुरमुखि विरले किसै बुझाए ॥ अम्रित की सार सोई जाणै जि अम्रित का वापारी जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

पिर सेती धन प्रेमु रचाए ॥ गुर कै सबदि तथा चितु लाए ॥ सहज सेती धन खरी सुहेली त्रिसना तिखा निवारी जीउ ॥२॥

सहसा तोड़े भरमु चुकाए ॥ सहजे सिफती धणखु चड़ाए ॥ गुर कै सबदि मरै मनु मारे सुंदरि जोगाधारी जीउ ॥३॥

हउमै जलिआ मनहु विसारे ॥ जम पुरि वजहि खड़ग करारे ॥ अब कै कहिऐ नामु न मिलई तू सहु जीअड़े भारी जीउ ॥४॥

माइआ ममता पवहि खिआली ॥ जम पुरि फासहिगा जम जाली ॥ हेत के बंधन तोड़ि न साकहि ता जमु करे खुआरी जीउ ॥५॥

ना हउ करता ना मै कीआ ॥ अम्रितु नामु सतिगुरि दीआ ॥ जिसु तू देहि तिसै किआ चारा नानक सरणि तुमारी जीउ ॥६॥१॥१२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 993) मारू महला ३ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जह बैसालहि तह बैसा सुआमी जह भेजहि तह जावा ॥ सभ नगरी महि एको राजा सभे पवितु हहि थावा ॥१॥

बाबा देहि वसा सच गावा ॥ जा ते सहजे सहजि समावा ॥१॥ रहाउ ॥

बुरा भला किछु आपस ते जानिआ एई सगल विकारा ॥ इहु फुरमाइआ खसम का होआ वरतै इहु संसारा ॥२॥

इंद्री धातु सबल कहीअत है इंद्री किस ते होई ॥ आपे खेल करै सभि करता ऐसा बूझै कोई ॥३॥

गुर परसादी एक लिव लागी दुबिधा तदे बिनासी ॥ जो तिसु भाणा सो सति करि मानिआ काटी जम की फासी ॥४॥

भणति नानकु लेखा मागै कवना जा चूका मनि अभिमाना ॥ तासु तासु धरम राइ जपतु है पए सचे की सरना ॥५॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 993) मारू महला ३ ॥
आवण जाणा ना थीऐ निज घरि वासा होइ ॥ सचु खजाना बखसिआ आपे जाणै सोइ ॥१॥

ए मन हरि जीउ चेति तू मनहु तजि विकार ॥ गुर कै सबदि धिआइ तू सचि लगी पिआरु ॥१॥ रहाउ ॥

ऐथै नावहु भुलिआ फिरि हथु किथाऊ न पाइ ॥ जोनी सभि भवाईअनि बिसटा माहि समाइ ॥२॥

वडभागी गुरु पाइआ पूरबि लिखिआ माइ ॥ अनदिनु सची भगति करि सचा लए मिलाइ ॥३॥

आपे स्रिसटि सभ साजीअनु आपे नदरि करेइ ॥ नानक नामि वडिआईआ जै भावै तै देइ ॥४॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 994) मारू महला ३ ॥
पिछले गुनह बखसाइ जीउ अब तू मारगि पाइ ॥ हरि की चरणी लागि रहा विचहु आपु गवाइ ॥१॥

मेरे मन गुरमुखि नामु हरि धिआइ ॥ सदा हरि चरणी लागि रहा इक मनि एकै भाइ ॥१॥ रहाउ ॥

ना मै जाति न पति है ना मै थेहु न थाउ ॥ सबदि भेदि भ्रमु कटिआ गुरि नामु दीआ समझाइ ॥२॥

इहु मनु लालच करदा फिरै लालचि लागा जाइ ॥ धंधै कूड़ि विआपिआ जम पुरि चोटा खाइ ॥३॥

नानक सभु किछु आपे आपि है दूजा नाही कोइ ॥ भगति खजाना बखसिओनु गुरमुखा सुखु होइ ॥४॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 994) मारू महला ३ ॥
सचि रते से टोलि लहु से विरले संसारि ॥ तिन मिलिआ मुखु उजला जपि नामु मुरारि ॥१॥

बाबा साचा साहिबु रिदै समालि ॥ सतिगुरु अपना पुछि देखु लेहु वखरु भालि ॥१॥ रहाउ ॥

इकु सचा सभ सेवदी धुरि भागि मिलावा होइ ॥ गुरमुखि मिले से न विछुड़हि पावहि सचु सोइ ॥२॥

इकि भगती सार न जाणनी मनमुख भरमि भुलाइ ॥ ओना विचि आपि वरतदा करणा किछू न जाइ ॥३॥

जिसु नालि जोरु न चलई खले कीचै अरदासि ॥ नानक गुरमुखि नामु मनि वसै ता सुणि करे साबासि ॥४॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 994) मारू महला ३ ॥
मारू ते सीतलु करे मनूरहु कंचनु होइ ॥ सो साचा सालाहीऐ तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥१॥

मेरे मन अनदिनु धिआइ हरि नाउ ॥ सतिगुर कै बचनि अराधि तू अनदिनु गुण गाउ ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमुखि एको जाणीऐ जा सतिगुरु देइ बुझाइ ॥ सो सतिगुरु सालाहीऐ जिदू एह सोझी पाइ ॥२॥

सतिगुरु छोडि दूजै लगे किआ करनि अगै जाइ ॥ जम पुरि बधे मारीअहि बहुती मिलै सजाइ ॥३॥

मेरा प्रभु वेपरवाहु है ना तिसु तिलु न तमाइ ॥ नानक तिसु सरणाई भजि पउ आपे बखसि मिलाइ ॥४॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 995) मारू महला ४ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जपिओ नामु सुक जनक गुर बचनी हरि हरि सरणि परे ॥ दालदु भंजि सुदामे मिलिओ भगती भाइ तरे ॥ भगति वछलु हरि नामु क्रितारथु गुरमुखि क्रिपा करे ॥१॥

मेरे मन नामु जपत उधरे ॥ ध्रू प्रहिलादु बिदरु दासी सुतु गुरमुखि नामि तरे ॥१॥ रहाउ ॥

कलजुगि नामु प्रधानु पदारथु भगत जना उधरे ॥ नामा जैदेउ कबीरु त्रिलोचनु सभि दोख गए चमरे ॥ गुरमुखि नामि लगे से उधरे सभि किलबिख पाप टरे ॥२॥

जो जो नामु जपै अपराधी सभि तिन के दोख परहरे ॥ बेसुआ रवत अजामलु उधरिओ मुखि बोलै नाराइणु नरहरे ॥ नामु जपत उग्रसैणि गति पाई तोड़ि बंधन मुकति करे ॥३॥

जन कउ आपि अनुग्रहु कीआ हरि अंगीकारु करे ॥ सेवक पैज रखै मेरा गोविदु सरणि परे उधरे ॥ जन नानक हरि किरपा धारी उर धरिओ नामु हरे ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 995) मारू महला ४ ॥
सिध समाधि जपिओ लिव लाई साधिक मुनि जपिआ ॥ जती सती संतोखी धिआइआ मुखि इंद्रादिक रविआ ॥ सरणि परे जपिओ ते भाए गुरमुखि पारि पइआ ॥१॥

मेरे मन नामु जपत तरिआ ॥ धंना जटु बालमीकु बटवारा गुरमुखि पारि पइआ ॥१॥ रहाउ ॥

सुरि नर गण गंधरबे जपिओ रिखि बपुरै हरि गाइआ ॥ संकरि ब्रहमै देवी जपिओ मुखि हरि हरि नामु जपिआ ॥ हरि हरि नामि जिना मनु भीना ते गुरमुखि पारि पइआ ॥२॥

कोटि कोटि तेतीस धिआइओ हरि जपतिआ अंतु न पाइआ ॥ बेद पुराण सिम्रिति हरि जपिआ मुखि पंडित हरि गाइआ ॥ नामु रसालु जिना मनि वसिआ ते गुरमुखि पारि पइआ ॥३॥

अनत तरंगी नामु जिन जपिआ मै गणत न करि सकिआ ॥ गोबिदु क्रिपा करे थाइ पाए जो हरि प्रभ मनि भाइआ ॥ गुरि धारि क्रिपा हरि नामु द्रिड़ाइओ जन नानक नामु लइआ ॥४॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 996) मारू महला ४ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि हरि नामु निधानु लै गुरमति हरि पति पाइ ॥ हलति पलति नालि चलदा हरि अंते लए छडाइ ॥ जिथै अवघट गलीआ भीड़ीआ तिथै हरि हरि मुकति कराइ ॥१॥

मेरे सतिगुरा मै हरि हरि नामु द्रिड़ाइ ॥ मेरा मात पिता सुत बंधपो मै हरि बिनु अवरु न माइ ॥१॥ रहाउ ॥

मै हरि बिरही हरि नामु है कोई आणि मिलावै माइ ॥ तिसु आगै मै जोदड़ी मेरा प्रीतमु देइ मिलाइ ॥ सतिगुरु पुरखु दइआल प्रभु हरि मेले ढिल न पाइ ॥२॥

जिन हरि हरि नामु न चेतिओ से भागहीण मरि जाइ ॥ ओइ फिरि फिरि जोनि भवाईअहि मरि जमहि आवै जाइ ॥ ओइ जम दरि बधे मारीअहि हरि दरगह मिलै सजाइ ॥३॥

तू प्रभु हम सरणागती मो कउ मेलि लैहु हरि राइ ॥ हरि धारि क्रिपा जगजीवना गुर सतिगुर की सरणाइ ॥ हरि जीउ आपि दइआलु होइ जन नानक हरि मेलाइ ॥४॥१॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 996) मारू महला ४ ॥
हउ पूंजी नामु दसाइदा को दसे हरि धनु रासि ॥ हउ तिसु विटहु खन खंनीऐ मै मेले हरि प्रभ पासि ॥ मै अंतरि प्रेमु पिरम का किउ सजणु मिलै मिलासि ॥१॥

मन पिआरिआ मित्रा मै हरि हरि नामु धनु रासि ॥ गुरि पूरै नामु द्रिड़ाइआ हरि धीरक हरि साबासि ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हरि आपि मिलाइ गुरु मै दसे हरि धनु रासि ॥ बिनु गुर प्रेमु न लभई जन वेखहु मनि निरजासि ॥ हरि गुर विचि आपु रखिआ हरि मेले गुर साबासि ॥२॥

सागर भगति भंडार हरि पूरे सतिगुर पासि ॥ सतिगुरु तुठा खोलि देइ मुखि गुरमुखि हरि परगासि ॥ मनमुखि भाग विहूणिआ तिख मुईआ कंधी पासि ॥३॥

गुरु दाता दातारु है हउ मागउ दानु गुर पासि ॥ चिरी विछुंना मेलि प्रभ मै मनि तनि वडड़ी आस ॥ गुर भावै सुणि बेनती जन नानक की अरदासि ॥४॥२॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 996) मारू महला ४ ॥
हरि हरि कथा सुणाइ प्रभ गुरमति हरि रिदै समाणी ॥ जपि हरि हरि कथा वडभागीआ हरि उतम पदु निरबाणी ॥ गुरमुखा मनि परतीति है गुरि पूरै नामि समाणी ॥१॥

मन मेरे मै हरि हरि कथा मनि भाणी ॥ हरि हरि कथा नित सदा करि गुरमुखि अकथ कहाणी ॥१॥ रहाउ ॥

मै मनु तनु खोजि ढंढोलिआ किउ पाईऐ अकथ कहाणी ॥ संत जना मिलि पाइआ सुणि अकथ कथा मनि भाणी ॥ मेरै मनि तनि नामु अधारु हरि मै मेले पुरखु सुजाणी ॥२॥

गुर पुरखै पुरखु मिलाइ प्रभ मिलि सुरती सुरति समाणी ॥ वडभागी गुरु सेविआ हरि पाइआ सुघड़ सुजाणी ॥ मनमुख भाग विहूणिआ तिन दुखी रैणि विहाणी ॥३॥

हम जाचिक दीन प्रभ तेरिआ मुखि दीजै अम्रित बाणी ॥ सतिगुरु मेरा मित्रु प्रभ हरि मेलहु सुघड़ सुजाणी ॥ जन नानक सरणागती करि किरपा नामि समाणी ॥४॥३॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 997) मारू महला ४ ॥
हरि भाउ लगा बैरागीआ वडभागी हरि मनि राखु ॥ मिलि संगति सरधा ऊपजै गुर सबदी हरि रसु चाखु ॥ सभु मनु तनु हरिआ होइआ गुरबाणी हरि गुण भाखु ॥१॥

मन पिआरिआ मित्रा हरि हरि नाम रसु चाखु ॥ गुरि पूरै हरि पाइआ हलति पलति पति राखु ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हरि नामु धिआईऐ हरि कीरति गुरमुखि चाखु ॥ तनु धरती हरि बीजीऐ विचि संगति हरि प्रभ राखु ॥ अम्रितु हरि हरि नामु है गुरि पूरै हरि रसु चाखु ॥२॥

मनमुख त्रिसना भरि रहे मनि आसा दह दिस बहु लाखु ॥ बिनु नावै ध्रिगु जीवदे विचि बिसटा मनमुख राखु ॥ ओइ आवहि जाहि भवाईअहि बहु जोनी दुरगंध भाखु ॥३॥

त्राहि त्राहि सरणागती हरि दइआ धारि प्रभ राखु ॥ संतसंगति मेलापु करि हरि नामु मिलै पति साखु ॥ हरि हरि नामु धनु पाइआ जन नानक गुरमति भाखु ॥४॥४॥६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 997) मारू महला ४ घरु ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि हरि भगति भरे भंडारा ॥ गुरमुखि रामु करे निसतारा ॥ जिस नो क्रिपा करे मेरा सुआमी सो हरि के गुण गावै जीउ ॥१॥

हरि हरि क्रिपा करे बनवाली ॥ हरि हिरदै सदा सदा समाली ॥ हरि हरि नामु जपहु मेरे जीअड़े जपि हरि हरि नामु छडावै जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

सुख सागरु अम्रितु हरि नाउ ॥ मंगत जनु जाचै हरि देहु पसाउ ॥ हरि सति सति सदा हरि सति हरि सति मेरै मनि भावै जीउ ॥२॥

नवे छिद्र स्रवहि अपवित्रा ॥ बोलि हरि नाम पवित्र सभि किता ॥ जे हरि सुप्रसंनु होवै मेरा सुआमी हरि सिमरत मलु लहि जावै जीउ ॥३॥

माइआ मोहु बिखमु है भारी ॥ किउ तरीऐ दुतरु संसारी ॥ सतिगुरु बोहिथु देइ प्रभु साचा जपि हरि हरि पारि लंघावै जीउ ॥४॥

तू सरबत्र तेरा सभु कोई ॥ जो तू करहि सोई प्रभ होई ॥ जनु नानकु गुण गावै बेचारा हरि भावै हरि थाइ पावै जीउ ॥५॥१॥७॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 998) मारू महला ४ ॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे ॥ सभि किलविख काटै हरि तेरे ॥ हरि धनु राखहु हरि धनु संचहु हरि चलदिआ नालि सखाई जीउ ॥१॥

जिस नो क्रिपा करे सो धिआवै ॥ नित हरि जपु जापै जपि हरि सुखु पावै ॥ गुर परसादी हरि रसु आवै जपि हरि हरि पारि लंघाई जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

निरभउ निरंकारु सति नामु ॥ जग महि स्रेसटु ऊतम कामु ॥ दुसमन दूत जमकालु ठेह मारउ हरि सेवक नेड़ि न जाई जीउ ॥२॥

जिसु उपरि हरि का मनु मानिआ ॥ सो सेवकु चहु जुग चहु कुंट जानिआ ॥ जे उस का बुरा कहै कोई पापी तिसु जमकंकरु खाई जीउ ॥३॥

सभ महि एकु निरंजन करता ॥ सभि करि करि वेखै अपणे चलता ॥ जिसु हरि राखै तिसु कउणु मारै जिसु करता आपि छडाई जीउ ॥४॥

हउ अनदिनु नामु लई करतारे ॥ जिनि सेवक भगत सभे निसतारे ॥ दस अठ चारि वेद सभि पूछहु जन नानक नामु छडाई जीउ ॥५॥२॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 998) मारू महला ५ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
डरपै धरति अकासु नख्यत्रा सिर ऊपरि अमरु करारा ॥ पउणु पाणी बैसंतरु डरपै डरपै इंद्रु बिचारा ॥१॥

एका निरभउ बात सुनी ॥ सो सुखीआ सो सदा सुहेला जो गुर मिलि गाइ गुनी ॥१॥ रहाउ ॥

देहधार अरु देवा डरपहि सिध साधिक डरि मुइआ ॥ लख चउरासीह मरि मरि जनमे फिरि फिरि जोनी जोइआ ॥२॥

राजसु सातकु तामसु डरपहि केते रूप उपाइआ ॥ छल बपुरी इह कउला डरपै अति डरपै धरम राइआ ॥३॥

सगल समग्री डरहि बिआपी बिनु डर करणैहारा ॥ कहु नानक भगतन का संगी भगत सोहहि दरबारा ॥४॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 999) मारू महला ५ ॥
पांच बरख को अनाथु ध्रू बारिकु हरि सिमरत अमर अटारे ॥ पुत्र हेति नाराइणु कहिओ जमकंकर मारि बिदारे ॥१॥

मेरे ठाकुर केते अगनत उधारे ॥ मोहि दीन अलप मति निरगुण परिओ सरणि दुआरे ॥१॥ रहाउ ॥

बालमीकु सुपचारो तरिओ बधिक तरे बिचारे ॥ एक निमख मन माहि अराधिओ गजपति पारि उतारे ॥२॥

कीनी रखिआ भगत प्रहिलादै हरनाखस नखहि बिदारे ॥ बिदरु दासी सुतु भइओ पुनीता सगले कुल उजारे ॥३॥

कवन पराध बतावउ अपुने मिथिआ मोह मगनारे ॥ आइओ साम नानक ओट हरि की लीजै भुजा पसारे ॥४॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 999) मारू महला ५ ॥
वित नवित भ्रमिओ बहु भाती अनिक जतन करि धाए ॥ जो जो करम कीए हउ हउमै ते ते भए अजाए ॥१॥

अवर दिन काहू काज न लाए ॥ सो दिनु मो कउ दीजै प्रभ जीउ जा दिन हरि जसु गाए ॥१॥ रहाउ ॥

पुत्र कलत्र ग्रिह देखि पसारा इस ही महि उरझाए ॥ माइआ मद चाखि भए उदमाते हरि हरि कबहु न गाए ॥२॥

इह बिधि खोजी बहु परकारा बिनु संतन नही पाए ॥ तुम दातार वडे प्रभ सम्रथ मागन कउ दानु आए ॥३॥

तिआगिओ सगला मानु महता दास रेण सरणाए ॥ कहु नानक हरि मिलि भए एकै महा अनंद सुख पाए ॥४॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 999) मारू महला ५ ॥
कवन थान धीरिओ है नामा कवन बसतु अहंकारा ॥ कवन चिहन सुनि ऊपरि छोहिओ मुख ते सुनि करि गारा ॥१॥

सुनहु रे तू कउनु कहा ते आइओ ॥ एती न जानउ केतीक मुदति चलते खबरि न पाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

सहन सील पवन अरु पाणी बसुधा खिमा निभराते ॥ पंच तत मिलि भइओ संजोगा इन महि कवन दुराते ॥२॥

जिनि रचि रचिआ पुरखि बिधातै नाले हउमै पाई ॥ जनम मरणु उस ही कउ है रे ओहा आवै जाई ॥३॥

बरनु चिहनु नाही किछु रचना मिथिआ सगल पसारा ॥ भणति नानकु जब खेलु उझारै तब एकै एकंकारा ॥४॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1000) मारू महला ५ ॥
मान मोह अरु लोभ विकारा बीओ चीति न घालिओ ॥ नाम रतनु गुणा हरि बणजे लादि वखरु लै चालिओ ॥१॥

सेवक की ओड़कि निबही प्रीति ॥ जीवत साहिबु सेविओ अपना चलते राखिओ चीति ॥१॥ रहाउ ॥

जैसी आगिआ कीनी ठाकुरि तिस ते मुखु नही मोरिओ ॥ सहजु अनंदु रखिओ ग्रिह भीतरि उठि उआहू कउ दउरिओ ॥२॥

आगिआ महि भूख सोई करि सूखा सोग हरख नही जानिओ ॥ जो जो हुकमु भइओ साहिब का सो माथै ले मानिओ ॥३॥

भइओ क्रिपालु ठाकुरु सेवक कउ सवरे हलत पलाता ॥ धंनु सेवकु सफलु ओहु आइआ जिनि नानक खसमु पछाता ॥४॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1000) मारू महला ५ ॥
खुलिआ करमु क्रिपा भई ठाकुर कीरतनु हरि हरि गाई ॥ स्रमु थाका पाए बिस्रामा मिटि गई सगली धाई ॥१॥

अब मोहि जीवन पदवी पाई ॥ चीति आइओ मनि पुरखु बिधाता संतन की सरणाई ॥१॥ रहाउ ॥

कामु क्रोधु लोभु मोहु निवारे निवरे सगल बैराई ॥ सद हजूरि हाजरु है नाजरु कतहि न भइओ दूराई ॥२॥

सुख सीतल सरधा सभ पूरी होए संत सहाई ॥ पावन पतित कीए खिन भीतरि महिमा कथनु न जाई ॥३॥

निरभउ भए सगल भै खोए गोबिद चरण ओटाई ॥ नानकु जसु गावै ठाकुर का रैणि दिनसु लिव लाई ॥४॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1000) मारू महला ५ ॥
जो समरथु सरब गुण नाइकु तिस कउ कबहु न गावसि रे ॥ छोडि जाइ खिन भीतरि ता कउ उआ कउ फिरि फिरि धावसि रे ॥१॥

अपुने प्रभ कउ किउ न समारसि रे ॥ बैरी संगि रंग रसि रचिआ तिसु सिउ जीअरा जारसि रे ॥१॥ रहाउ ॥

जा कै नामि सुनिऐ जमु छोडै ता की सरणि न पावसि रे ॥ काढि देइ सिआल बपुरे कउ ता की ओट टिकावसि रे ॥२॥

जिस का जासु सुनत भव तरीऐ ता सिउ रंगु न लावसि रे ॥ थोरी बात अलप सुपने की बहुरि बहुरि अटकावसि रे ॥३॥

भइओ प्रसादु क्रिपा निधि ठाकुर संतसंगि पति पाई ॥ कहु नानक त्रै गुण भ्रमु छूटा जउ प्रभ भए सहाई ॥४॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1000) मारू महला ५ ॥
अंतरजामी सभ बिधि जानै तिस ते कहा दुलारिओ ॥ हसत पाव झरे खिन भीतरि अगनि संगि लै जारिओ ॥१॥

मूड़े तै मन ते रामु बिसारिओ ॥ लूणु खाइ करहि हरामखोरी पेखत नैन बिदारिओ ॥१॥ रहाउ ॥

असाध रोगु उपजिओ तन भीतरि टरत न काहू टारिओ ॥ प्रभ बिसरत महा दुखु पाइओ इहु नानक ततु बीचारिओ ॥२॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1001) मारू महला ५ ॥
चरन कमल प्रभ राखे चीति ॥ हरि गुण गावह नीता नीत ॥ तिसु बिनु दूजा अवरु न कोऊ ॥ आदि मधि अंति है सोऊ ॥१॥

संतन की ओट आपे आपि ॥१॥ रहाउ ॥

जा कै वसि है सगल संसारु ॥ आपे आपि आपि निरंकारु ॥ नानक गहिओ साचा सोइ ॥ सुखु पाइआ फिरि दूखु न होइ ॥२॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1001) मारू महला ५ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
प्रान सुखदाता जीअ सुखदाता तुम काहे बिसारिओ अगिआनथ ॥ होछा मदु चाखि होए तुम बावर दुलभ जनमु अकारथ ॥१॥

रे नर ऐसी करहि इआनथ ॥ तजि सारंगधर भ्रमि तू भूला मोहि लपटिओ दासी संगि सानथ ॥१॥ रहाउ ॥

धरणीधरु तिआगि नीच कुल सेवहि हउ हउ करत बिहावथ ॥ फोकट करम करहि अगिआनी मनमुखि अंध कहावथ ॥२॥

सति होता असति करि मानिआ जो बिनसत सो निहचलु जानथ ॥ पर की कउ अपनी करि पकरी ऐसे भूल भुलानथ ॥३॥

खत्री ब्राहमण सूद वैस सभ एकै नामि तरानथ ॥ गुरु नानकु उपदेसु कहतु है जो सुनै सो पारि परानथ ॥४॥१॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1001) मारू महला ५ ॥
गुपतु करता संगि सो प्रभु डहकावए मनुखाइ ॥ बिसारि हरि जीउ बिखै भोगहि तपत थम गलि लाइ ॥१॥

रे नर काइ पर ग्रिहि जाइ ॥ कुचल कठोर कामि गरधभ तुम नही सुनिओ धरम राइ ॥१॥ रहाउ ॥

बिकार पाथर गलहि बाधे निंद पोट सिराइ ॥ महा सागरु समुदु लंघना पारि न परना जाइ ॥२॥

कामि क्रोधि लोभि मोहि बिआपिओ नेत्र रखे फिराइ ॥ सीसु उठावन न कबहू मिलई महा दुतर माइ ॥३॥

सूरु मुकता ससी मुकता ब्रहम गिआनी अलिपाइ ॥ सुभावत जैसे बैसंतर अलिपत सदा निरमलाइ ॥४॥

जिसु करमु खुलिआ तिसु लहिआ पड़दा जिनि गुर पहि मंनिआ सुभाइ ॥ गुरि मंत्रु अवखधु नामु दीना जन नानक संकट जोनि न पाइ ॥५॥२॥

रे नर इन बिधि पारि पराइ ॥ धिआइ हरि जीउ होइ मिरतकु तिआगि दूजा भाउ ॥ रहाउ दूजा ॥२॥११॥


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