राग माझ - बाणी शब्द, Raag Majh - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू रामदास जी -- SGGS 94) रागु माझ चउपदे घरु १ महला ४
ੴ सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
हरि हरि नामु मै हरि मनि भाइआ ॥ वडभागी हरि नामु धिआइआ ॥ गुरि पूरै हरि नाम सिधि पाई को विरला गुरमति चलै जीउ ॥१॥

मै हरि हरि खरचु लइआ बंनि पलै ॥ मेरा प्राण सखाई सदा नालि चलै ॥ गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ हरि निहचलु हरि धनु पलै जीउ ॥२॥

हरि हरि सजणु मेरा प्रीतमु राइआ ॥ कोई आणि मिलावै मेरे प्राण जीवाइआ ॥ हउ रहि न सका बिनु देखे प्रीतमा मै नीरु वहे वहि चलै जीउ ॥३॥

सतिगुरु मित्रु मेरा बाल सखाई ॥ हउ रहि न सका बिनु देखे मेरी माई ॥ हरि जीउ क्रिपा करहु गुरु मेलहु जन नानक हरि धनु पलै जीउ ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 94) माझ महला ४ ॥
मधुसूदन मेरे मन तन प्राना ॥ हउ हरि बिनु दूजा अवरु न जाना ॥ कोई सजणु संतु मिलै वडभागी मै हरि प्रभु पिआरा दसै जीउ ॥१॥

हउ मनु तनु खोजी भालि भालाई ॥ किउ पिआरा प्रीतमु मिलै मेरी माई ॥ मिलि सतसंगति खोजु दसाई विचि संगति हरि प्रभु वसै जीउ ॥२॥

मेरा पिआरा प्रीतमु सतिगुरु रखवाला ॥ हम बारिक दीन करहु प्रतिपाला ॥ मेरा मात पिता गुरु सतिगुरु पूरा गुर जल मिलि कमलु विगसै जीउ ॥३॥

मै बिनु गुर देखे नीद न आवै ॥ मेरे मन तनि वेदन गुर बिरहु लगावै ॥ हरि हरि दइआ करहु गुरु मेलहु जन नानक गुर मिलि रहसै जीउ ॥४॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 95) माझ महला ४ ॥
हरि गुण पड़ीऐ हरि गुण गुणीऐ ॥ हरि हरि नाम कथा नित सुणीऐ ॥ मिलि सतसंगति हरि गुण गाए जगु भउजलु दुतरु तरीऐ जीउ ॥१॥

आउ सखी हरि मेलु करेहा ॥ मेरे प्रीतम का मै देइ सनेहा ॥ मेरा मित्रु सखा सो प्रीतमु भाई मै दसे हरि नरहरीऐ जीउ ॥२॥

मेरी बेदन हरि गुरु पूरा जाणै ॥ हउ रहि न सका बिनु नाम वखाणे ॥ मै अउखधु मंत्रु दीजै गुर पूरे मै हरि हरि नामि उधरीऐ जीउ ॥३॥

हम चात्रिक दीन सतिगुर सरणाई ॥ हरि हरि नामु बूंद मुखि पाई ॥ हरि जलनिधि हम जल के मीने जन नानक जल बिनु मरीऐ जीउ ॥४॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 95) माझ महला ४ ॥
हरि जन संत मिलहु मेरे भाई ॥ मेरा हरि प्रभु दसहु मै भुख लगाई ॥ मेरी सरधा पूरि जगजीवन दाते मिलि हरि दरसनि मनु भीजै जीउ ॥१॥

मिलि सतसंगि बोली हरि बाणी ॥ हरि हरि कथा मेरै मनि भाणी ॥ हरि हरि अम्रितु हरि मनि भावै मिलि सतिगुर अम्रितु पीजै जीउ ॥२॥

वडभागी हरि संगति पावहि ॥ भागहीन भ्रमि चोटा खावहि ॥ बिनु भागा सतसंगु न लभै बिनु संगति मैलु भरीजै जीउ ॥३॥

मै आइ मिलहु जगजीवन पिआरे ॥ हरि हरि नामु दइआ मनि धारे ॥ गुरमति नामु मीठा मनि भाइआ जन नानक नामि मनु भीजै जीउ ॥४॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 95) माझ महला ४ ॥
हरि गुर गिआनु हरि रसु हरि पाइआ ॥ मनु हरि रंगि राता हरि रसु पीआइआ ॥ हरि हरि नामु मुखि हरि हरि बोली मनु हरि रसि टुलि टुलि पउदा जीउ ॥१॥

आवहु संत मै गलि मेलाईऐ ॥ मेरे प्रीतम की मै कथा सुणाईऐ ॥ हरि के संत मिलहु मनु देवा जो गुरबाणी मुखि चउदा जीउ ॥२॥

वडभागी हरि संतु मिलाइआ ॥ गुरि पूरै हरि रसु मुखि पाइआ ॥ भागहीन सतिगुरु नही पाइआ मनमुखु गरभ जूनी निति पउदा जीउ ॥३॥

आपि दइआलि दइआ प्रभि धारी ॥ मलु हउमै बिखिआ सभ निवारी ॥ नानक हट पटण विचि कांइआ हरि लैंदे गुरमुखि सउदा जीउ ॥४॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 95) माझ महला ४ ॥
हउ गुण गोविंद हरि नामु धिआई ॥ मिलि संगति मनि नामु वसाई ॥ हरि प्रभ अगम अगोचर सुआमी मिलि सतिगुर हरि रसु कीचै जीउ ॥१॥

धनु धनु हरि जन जिनि हरि प्रभु जाता ॥ जाइ पुछा जन हरि की बाता ॥ पाव मलोवा मलि मलि धोवा मिलि हरि जन हरि रसु पीचै जीउ ॥२॥

सतिगुर दातै नामु दिड़ाइआ ॥ वडभागी गुर दरसनु पाइआ ॥ अम्रित रसु सचु अम्रितु बोली गुरि पूरै अम्रितु लीचै जीउ ॥३॥

हरि सतसंगति सत पुरखु मिलाईऐ ॥ मिलि सतसंगति हरि नामु धिआईऐ ॥ नानक हरि कथा सुणी मुखि बोली गुरमति हरि नामि परीचै जीउ ॥४॥६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 96) माझ महला ४ ॥
आवहु भैणे तुसी मिलहु पिआरीआ ॥ जो मेरा प्रीतमु दसे तिस कै हउ वारीआ ॥ मिलि सतसंगति लधा हरि सजणु हउ सतिगुर विटहु घुमाईआ जीउ ॥१॥

जह जह देखा तह तह सुआमी ॥ तू घटि घटि रविआ अंतरजामी ॥ गुरि पूरै हरि नालि दिखालिआ हउ सतिगुर विटहु सद वारिआ जीउ ॥२॥

एको पवणु माटी सभ एका सभ एका जोति सबाईआ ॥ सभ इका जोति वरतै भिनि भिनि न रलई किसै दी रलाईआ ॥ गुर परसादी इकु नदरी आइआ हउ सतिगुर विटहु वताइआ जीउ ॥३॥

जनु नानकु बोलै अम्रित बाणी ॥ गुरसिखां कै मनि पिआरी भाणी ॥ उपदेसु करे गुरु सतिगुरु पूरा गुरु सतिगुरु परउपकारीआ जीउ ॥४॥७॥

सत चउपदे महले चउथे के ॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 96) माझ महला ५ चउपदे घरु १ ॥
मेरा मनु लोचै गुर दरसन ताई ॥ बिलप करे चात्रिक की निआई ॥ त्रिखा न उतरै सांति न आवै बिनु दरसन संत पिआरे जीउ ॥१॥

हउ घोली जीउ घोलि घुमाई गुर दरसन संत पिआरे जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

तेरा मुखु सुहावा जीउ सहज धुनि बाणी ॥ चिरु होआ देखे सारिंगपाणी ॥ धंनु सु देसु जहा तूं वसिआ मेरे सजण मीत मुरारे जीउ ॥२॥

हउ घोली हउ घोलि घुमाई गुर सजण मीत मुरारे जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

इक घड़ी न मिलते ता कलिजुगु होता ॥ हुणि कदि मिलीऐ प्रिअ तुधु भगवंता ॥ मोहि रैणि न विहावै नीद न आवै बिनु देखे गुर दरबारे जीउ ॥३॥

हउ घोली जीउ घोलि घुमाई तिसु सचे गुर दरबारे जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

भागु होआ गुरि संतु मिलाइआ ॥ प्रभु अबिनासी घर महि पाइआ ॥ सेव करी पलु चसा न विछुड़ा जन नानक दास तुमारे जीउ ॥४॥

हउ घोली जीउ घोलि घुमाई जन नानक दास तुमारे जीउ ॥ रहाउ ॥१॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 97) रागु माझ महला ५ ॥
सा रुति सुहावी जितु तुधु समाली ॥ सो कमु सुहेला जो तेरी घाली ॥ सो रिदा सुहेला जितु रिदै तूं वुठा सभना के दातारा जीउ ॥१॥

तूं साझा साहिबु बापु हमारा ॥ नउ निधि तेरै अखुट भंडारा ॥ जिसु तूं देहि सु त्रिपति अघावै सोई भगतु तुमारा जीउ ॥२॥

सभु को आसै तेरी बैठा ॥ घट घट अंतरि तूंहै वुठा ॥ सभे साझीवाल सदाइनि तूं किसै न दिसहि बाहरा जीउ ॥३॥

तूं आपे गुरमुखि मुकति कराइहि ॥ तूं आपे मनमुखि जनमि भवाइहि ॥ नानक दास तेरै बलिहारै सभु तेरा खेलु दसाहरा जीउ ॥४॥२॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 97) माझ महला ५ ॥
अनहदु वाजै सहजि सुहेला ॥ सबदि अनंद करे सद केला ॥ सहज गुफा महि ताड़ी लाई आसणु ऊच सवारिआ जीउ ॥१॥

फिरि घिरि अपुने ग्रिह महि आइआ ॥ जो लोड़ीदा सोई पाइआ ॥ त्रिपति अघाइ रहिआ है संतहु गुरि अनभउ पुरखु दिखारिआ जीउ ॥२॥

आपे राजनु आपे लोगा ॥ आपि निरबाणी आपे भोगा ॥ आपे तखति बहै सचु निआई सभ चूकी कूक पुकारिआ जीउ ॥३॥

जेहा डिठा मै तेहो कहिआ ॥ तिसु रसु आइआ जिनि भेदु लहिआ ॥ जोती जोति मिली सुखु पाइआ जन नानक इकु पसारिआ जीउ ॥४॥३॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 97) माझ महला ५ ॥
जितु घरि पिरि सोहागु बणाइआ ॥ तितु घरि सखीए मंगलु गाइआ ॥ अनद बिनोद तितै घरि सोहहि जो धन कंति सिगारी जीउ ॥१॥

सा गुणवंती सा वडभागणि ॥ पुत्रवंती सीलवंति सोहागणि ॥ रूपवंति सा सुघड़ि बिचखणि जो धन कंत पिआरी जीउ ॥२॥

अचारवंति साई परधाने ॥ सभ सिंगार बणे तिसु गिआने ॥ सा कुलवंती सा सभराई जो पिरि कै रंगि सवारी जीउ ॥३॥

महिमा तिस की कहणु न जाए ॥ जो पिरि मेलि लई अंगि लाए ॥ थिरु सुहागु वरु अगमु अगोचरु जन नानक प्रेम साधारी जीउ ॥४॥४॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 98) माझ महला ५ ॥
खोजत खोजत दरसन चाहे ॥ भाति भाति बन बन अवगाहे ॥ निरगुणु सरगुणु हरि हरि मेरा कोई है जीउ आणि मिलावै जीउ ॥१॥

खटु सासत बिचरत मुखि गिआना ॥ पूजा तिलकु तीरथ इसनाना ॥ निवली करम आसन चउरासीह इन महि सांति न आवै जीउ ॥२॥

अनिक बरख कीए जप तापा ॥ गवनु कीआ धरती भरमाता ॥ इकु खिनु हिरदै सांति न आवै जोगी बहुड़ि बहुड़ि उठि धावै जीउ ॥३॥

करि किरपा मोहि साधु मिलाइआ ॥ मनु तनु सीतलु धीरजु पाइआ ॥ प्रभु अबिनासी बसिआ घट भीतरि हरि मंगलु नानकु गावै जीउ ॥४॥५॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 98) माझ महला ५ ॥
पारब्रहम अपर्मपर देवा ॥ अगम अगोचर अलख अभेवा ॥ दीन दइआल गोपाल गोबिंदा हरि धिआवहु गुरमुखि गाती जीउ ॥१॥

गुरमुखि मधुसूदनु निसतारे ॥ गुरमुखि संगी क्रिसन मुरारे ॥ दइआल दमोदरु गुरमुखि पाईऐ होरतु कितै न भाती जीउ ॥२॥

निरहारी केसव निरवैरा ॥ कोटि जना जा के पूजहि पैरा ॥ गुरमुखि हिरदै जा कै हरि हरि सोई भगतु इकाती जीउ ॥३॥

अमोघ दरसन बेअंत अपारा ॥ वड समरथु सदा दातारा ॥ गुरमुखि नामु जपीऐ तितु तरीऐ गति नानक विरली जाती जीउ ॥४॥६॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 98) माझ महला ५ ॥
कहिआ करणा दिता लैणा ॥ गरीबा अनाथा तेरा माणा ॥ सभ किछु तूंहै तूंहै मेरे पिआरे तेरी कुदरति कउ बलि जाई जीउ ॥१॥

भाणै उझड़ भाणै राहा ॥ भाणै हरि गुण गुरमुखि गावाहा ॥ भाणै भरमि भवै बहु जूनी सभ किछु तिसै रजाई जीउ ॥२॥

ना को मूरखु ना को सिआणा ॥ वरतै सभ किछु तेरा भाणा ॥ अगम अगोचर बेअंत अथाहा तेरी कीमति कहणु न जाई जीउ ॥३॥

खाकु संतन की देहु पिआरे ॥ आइ पइआ हरि तेरै दुआरै ॥ दरसनु पेखत मनु आघावै नानक मिलणु सुभाई जीउ ॥४॥७॥१४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 98) माझ महला ५ ॥
दुखु तदे जा विसरि जावै ॥ भुख विआपै बहु बिधि धावै ॥ सिमरत नामु सदा सुहेला जिसु देवै दीन दइआला जीउ ॥१॥

सतिगुरु मेरा वड समरथा ॥ जीइ समाली ता सभु दुखु लथा ॥ चिंता रोगु गई हउ पीड़ा आपि करे प्रतिपाला जीउ ॥२॥

बारिक वांगी हउ सभ किछु मंगा ॥ देदे तोटि नाही प्रभ रंगा ॥ पैरी पै पै बहुतु मनाई दीन दइआल गोपाला जीउ ॥३॥

हउ बलिहारी सतिगुर पूरे ॥ जिनि बंधन काटे सगले मेरे ॥ हिरदै नामु दे निरमल कीए नानक रंगि रसाला जीउ ॥४॥८॥१५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 99) माझ महला ५ ॥
लाल गोपाल दइआल रंगीले ॥ गहिर ग्मभीर बेअंत गोविंदे ॥ ऊच अथाह बेअंत सुआमी सिमरि सिमरि हउ जीवां जीउ ॥१॥

दुख भंजन निधान अमोले ॥ निरभउ निरवैर अथाह अतोले ॥ अकाल मूरति अजूनी स्मभौ मन सिमरत ठंढा थीवां जीउ ॥२॥

सदा संगी हरि रंग गोपाला ॥ ऊच नीच करे प्रतिपाला ॥ नामु रसाइणु मनु त्रिपताइणु गुरमुखि अम्रितु पीवां जीउ ॥३॥

दुखि सुखि पिआरे तुधु धिआई ॥ एह सुमति गुरू ते पाई ॥ नानक की धर तूंहै ठाकुर हरि रंगि पारि परीवां जीउ ॥४॥९॥१६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 99) माझ महला ५ ॥
धंनु सु वेला जितु मै सतिगुरु मिलिआ ॥ सफलु दरसनु नेत्र पेखत तरिआ ॥ धंनु मूरत चसे पल घड़ीआ धंनि सु ओइ संजोगा जीउ ॥१॥

उदमु करत मनु निरमलु होआ ॥ हरि मारगि चलत भ्रमु सगला खोइआ ॥ नामु निधानु सतिगुरू सुणाइआ मिटि गए सगले रोगा जीउ ॥२॥

अंतरि बाहरि तेरी बाणी ॥ तुधु आपि कथी तै आपि वखाणी ॥ गुरि कहिआ सभु एको एको अवरु न कोई होइगा जीउ ॥३॥

अम्रित रसु हरि गुर ते पीआ ॥ हरि पैनणु नामु भोजनु थीआ ॥ नामि रंग नामि चोज तमासे नाउ नानक कीने भोगा जीउ ॥४॥१०॥१७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 99) माझ महला ५ ॥
सगल संतन पहि वसतु इक मांगउ ॥ करउ बिनंती मानु तिआगउ ॥ वारि वारि जाई लख वरीआ देहु संतन की धूरा जीउ ॥१॥

तुम दाते तुम पुरख बिधाते ॥ तुम समरथ सदा सुखदाते ॥ सभ को तुम ही ते वरसावै अउसरु करहु हमारा पूरा जीउ ॥२॥

दरसनि तेरै भवन पुनीता ॥ आतम गड़ु बिखमु तिना ही जीता ॥ तुम दाते तुम पुरख बिधाते तुधु जेवडु अवरु न सूरा जीउ ॥३॥

रेनु संतन की मेरै मुखि लागी ॥ दुरमति बिनसी कुबुधि अभागी ॥ सच घरि बैसि रहे गुण गाए नानक बिनसे कूरा जीउ ॥४॥११॥१८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 100) माझ महला ५ ॥
विसरु नाही एवड दाते ॥ करि किरपा भगतन संगि राते ॥ दिनसु रैणि जिउ तुधु धिआई एहु दानु मोहि करणा जीउ ॥१॥

माटी अंधी सुरति समाई ॥ सभ किछु दीआ भलीआ जाई ॥ अनद बिनोद चोज तमासे तुधु भावै सो होणा जीउ ॥२॥

जिस दा दिता सभु किछु लैणा ॥ छतीह अम्रित भोजनु खाणा ॥ सेज सुखाली सीतलु पवणा सहज केल रंग करणा जीउ ॥३॥

सा बुधि दीजै जितु विसरहि नाही ॥ सा मति दीजै जितु तुधु धिआई ॥ सास सास तेरे गुण गावा ओट नानक गुर चरणा जीउ ॥४॥१२॥१९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 100) माझ महला ५ ॥
सिफति सालाहणु तेरा हुकमु रजाई ॥ सो गिआनु धिआनु जो तुधु भाई ॥ सोई जपु जो प्रभ जीउ भावै भाणै पूर गिआना जीउ ॥१॥

अम्रितु नामु तेरा सोई गावै ॥ जो साहिब तेरै मनि भावै ॥ तूं संतन का संत तुमारे संत साहिब मनु माना जीउ ॥२॥

तूं संतन की करहि प्रतिपाला ॥ संत खेलहि तुम संगि गोपाला ॥ अपुने संत तुधु खरे पिआरे तू संतन के प्राना जीउ ॥३॥

उन संतन कै मेरा मनु कुरबाने ॥ जिन तूं जाता जो तुधु मनि भाने ॥ तिन कै संगि सदा सुखु पाइआ हरि रस नानक त्रिपति अघाना जीउ ॥४॥१३॥२०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 100) माझ महला ५ ॥
तूं जलनिधि हम मीन तुमारे ॥ तेरा नामु बूंद हम चात्रिक तिखहारे ॥ तुमरी आस पिआसा तुमरी तुम ही संगि मनु लीना जीउ ॥१॥

जिउ बारिकु पी खीरु अघावै ॥ जिउ निरधनु धनु देखि सुखु पावै ॥ त्रिखावंत जलु पीवत ठंढा तिउ हरि संगि इहु मनु भीना जीउ ॥२॥

जिउ अंधिआरै दीपकु परगासा ॥ भरता चितवत पूरन आसा ॥ मिलि प्रीतम जिउ होत अनंदा तिउ हरि रंगि मनु रंगीना जीउ ॥३॥

संतन मो कउ हरि मारगि पाइआ ॥ साध क्रिपालि हरि संगि गिझाइआ ॥ हरि हमरा हम हरि के दासे नानक सबदु गुरू सचु दीना जीउ ॥४॥१४॥२१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 100) माझ महला ५ ॥
अम्रित नामु सदा निरमलीआ ॥ सुखदाई दूख बिडारन हरीआ ॥ अवरि साद चखि सगले देखे मन हरि रसु सभ ते मीठा जीउ ॥१॥

जो जो पीवै सो त्रिपतावै ॥ अमरु होवै जो नाम रसु पावै ॥ नाम निधान तिसहि परापति जिसु सबदु गुरू मनि वूठा जीउ ॥२॥

जिनि हरि रसु पाइआ सो त्रिपति अघाना ॥ जिनि हरि सादु पाइआ सो नाहि डुलाना ॥ तिसहि परापति हरि हरि नामा जिसु मसतकि भागीठा जीउ ॥३॥

हरि इकसु हथि आइआ वरसाणे बहुतेरे ॥ तिसु लगि मुकतु भए घणेरे ॥ नामु निधाना गुरमुखि पाईऐ कहु नानक विरली डीठा जीउ ॥४॥१५॥२२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 101) माझ महला ५ ॥
निधि सिधि रिधि हरि हरि हरि मेरै ॥ जनमु पदारथु गहिर ग्मभीरै ॥ लाख कोट खुसीआ रंग रावै जो गुर लागा पाई जीउ ॥१॥

दरसनु पेखत भए पुनीता ॥ सगल उधारे भाई मीता ॥ अगम अगोचरु सुआमी अपुना गुर किरपा ते सचु धिआई जीउ ॥२॥

जा कउ खोजहि सरब उपाए ॥ वडभागी दरसनु को विरला पाए ॥ ऊच अपार अगोचर थाना ओहु महलु गुरू देखाई जीउ ॥३॥

गहिर ग्मभीर अम्रित नामु तेरा ॥ मुकति भइआ जिसु रिदै वसेरा ॥ गुरि बंधन तिन के सगले काटे जन नानक सहजि समाई जीउ ॥४॥१६॥२३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 101) माझ महला ५ ॥
प्रभ किरपा ते हरि हरि धिआवउ ॥ प्रभू दइआ ते मंगलु गावउ ॥ ऊठत बैठत सोवत जागत हरि धिआईऐ सगल अवरदा जीउ ॥१॥

नामु अउखधु मो कउ साधू दीआ ॥ किलबिख काटे निरमलु थीआ ॥ अनदु भइआ निकसी सभ पीरा सगल बिनासे दरदा जीउ ॥२॥

जिस का अंगु करे मेरा पिआरा ॥ सो मुकता सागर संसारा ॥ सति करे जिनि गुरू पछाता सो काहे कउ डरदा जीउ ॥३॥

जब ते साधू संगति पाए ॥ गुर भेटत हउ गई बलाए ॥ सासि सासि हरि गावै नानकु सतिगुर ढाकि लीआ मेरा पड़दा जीउ ॥४॥१७॥२४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 101) माझ महला ५ ॥
ओति पोति सेवक संगि राता ॥ प्रभ प्रतिपाले सेवक सुखदाता ॥ पाणी पखा पीसउ सेवक कै ठाकुर ही का आहरु जीउ ॥१॥

काटि सिलक प्रभि सेवा लाइआ ॥ हुकमु साहिब का सेवक मनि भाइआ ॥ सोई कमावै जो साहिब भावै सेवकु अंतरि बाहरि माहरु जीउ ॥२॥

तूं दाना ठाकुरु सभ बिधि जानहि ॥ ठाकुर के सेवक हरि रंग माणहि ॥ जो किछु ठाकुर का सो सेवक का सेवकु ठाकुर ही संगि जाहरु जीउ ॥३॥

अपुनै ठाकुरि जो पहिराइआ ॥ बहुरि न लेखा पुछि बुलाइआ ॥ तिसु सेवक कै नानक कुरबाणी सो गहिर गभीरा गउहरु जीउ ॥४॥१८॥२५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 102) माझ महला ५ ॥
सभ किछु घर महि बाहरि नाही ॥ बाहरि टोलै सो भरमि भुलाही ॥ गुर परसादी जिनी अंतरि पाइआ सो अंतरि बाहरि सुहेला जीउ ॥१॥

झिमि झिमि वरसै अम्रित धारा ॥ मनु पीवै सुनि सबदु बीचारा ॥ अनद बिनोद करे दिन राती सदा सदा हरि केला जीउ ॥२॥

जनम जनम का विछुड़िआ मिलिआ ॥ साध क्रिपा ते सूका हरिआ ॥ सुमति पाए नामु धिआए गुरमुखि होए मेला जीउ ॥३॥

जल तरंगु जिउ जलहि समाइआ ॥ तिउ जोती संगि जोति मिलाइआ ॥ कहु नानक भ्रम कटे किवाड़ा बहुड़ि न होईऐ जउला जीउ ॥४॥१९॥२६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 102) माझ महला ५ ॥
तिसु कुरबाणी जिनि तूं सुणिआ ॥ तिसु बलिहारी जिनि रसना भणिआ ॥ वारि वारि जाई तिसु विटहु जो मनि तनि तुधु आराधे जीउ ॥१॥

तिसु चरण पखाली जो तेरै मारगि चालै ॥ नैन निहाली तिसु पुरख दइआलै ॥ मनु देवा तिसु अपुने साजन जिनि गुर मिलि सो प्रभु लाधे जीउ ॥२॥

से वडभागी जिनि तुम जाणे ॥ सभ कै मधे अलिपत निरबाणे ॥ साध कै संगि उनि भउजलु तरिआ सगल दूत उनि साधे जीउ ॥३॥

तिन की सरणि परिआ मनु मेरा ॥ माणु ताणु तजि मोहु अंधेरा ॥ नामु दानु दीजै नानक कउ तिसु प्रभ अगम अगाधे जीउ ॥४॥२०॥२७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 102) माझ महला ५ ॥
तूं पेडु साख तेरी फूली ॥ तूं सूखमु होआ असथूली ॥ तूं जलनिधि तूं फेनु बुदबुदा तुधु बिनु अवरु न भालीऐ जीउ ॥१॥

तूं सूतु मणीए भी तूंहै ॥ तूं गंठी मेरु सिरि तूंहै ॥ आदि मधि अंति प्रभु सोई अवरु न कोइ दिखालीऐ जीउ ॥२॥

तूं निरगुणु सरगुणु सुखदाता ॥ तूं निरबाणु रसीआ रंगि राता ॥ अपणे करतब आपे जाणहि आपे तुधु समालीऐ जीउ ॥३॥

तूं ठाकुरु सेवकु फुनि आपे ॥ तूं गुपतु परगटु प्रभ आपे ॥ नानक दासु सदा गुण गावै इक भोरी नदरि निहालीऐ जीउ ॥४॥२१॥२८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 103) माझ महला ५ ॥
सफल सु बाणी जितु नामु वखाणी ॥ गुर परसादि किनै विरलै जाणी ॥ धंनु सु वेला जितु हरि गावत सुनणा आए ते परवाना जीउ ॥१॥

से नेत्र परवाणु जिनी दरसनु पेखा ॥ से कर भले जिनी हरि जसु लेखा ॥ से चरण सुहावे जो हरि मारगि चले हउ बलि तिन संगि पछाणा जीउ ॥२॥

सुणि साजन मेरे मीत पिआरे ॥ साधसंगि खिन माहि उधारे ॥ किलविख काटि होआ मनु निरमलु मिटि गए आवण जाणा जीउ ॥३॥

दुइ कर जोड़ि इकु बिनउ करीजै ॥ करि किरपा डुबदा पथरु लीजै ॥ नानक कउ प्रभ भए क्रिपाला प्रभ नानक मनि भाणा जीउ ॥४॥२२॥२९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 103) माझ महला ५ ॥
अम्रित बाणी हरि हरि तेरी ॥ सुणि सुणि होवै परम गति मेरी ॥ जलनि बुझी सीतलु होइ मनूआ सतिगुर का दरसनु पाए जीउ ॥१॥

सूखु भइआ दुखु दूरि पराना ॥ संत रसन हरि नामु वखाना ॥ जल थल नीरि भरे सर सुभर बिरथा कोइ न जाए जीउ ॥२॥

दइआ धारी तिनि सिरजनहारे ॥ जीअ जंत सगले प्रतिपारे ॥ मिहरवान किरपाल दइआला सगले त्रिपति अघाए जीउ ॥३॥

वणु त्रिणु त्रिभवणु कीतोनु हरिआ ॥ करणहारि खिन भीतरि करिआ ॥ गुरमुखि नानक तिसै अराधे मन की आस पुजाए जीउ ॥४॥२३॥३०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 103) माझ महला ५ ॥
तूं मेरा पिता तूंहै मेरा माता ॥ तूं मेरा बंधपु तूं मेरा भ्राता ॥ तूं मेरा राखा सभनी थाई ता भउ केहा काड़ा जीउ ॥१॥

तुमरी क्रिपा ते तुधु पछाणा ॥ तूं मेरी ओट तूंहै मेरा माणा ॥ तुझ बिनु दूजा अवरु न कोई सभु तेरा खेलु अखाड़ा जीउ ॥२॥

जीअ जंत सभि तुधु उपाए ॥ जितु जितु भाणा तितु तितु लाए ॥ सभ किछु कीता तेरा होवै नाही किछु असाड़ा जीउ ॥३॥

नामु धिआइ महा सुखु पाइआ ॥ हरि गुण गाइ मेरा मनु सीतलाइआ ॥ गुरि पूरै वजी वाधाई नानक जिता बिखाड़ा जीउ ॥४॥२४॥३१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 103) माझ महला ५ ॥
जीअ प्राण प्रभ मनहि अधारा ॥ भगत जीवहि गुण गाइ अपारा ॥ गुण निधान अम्रितु हरि नामा हरि धिआइ धिआइ सुखु पाइआ जीउ ॥१॥

मनसा धारि जो घर ते आवै ॥ साधसंगि जनमु मरणु मिटावै ॥ आस मनोरथु पूरनु होवै भेटत गुर दरसाइआ जीउ ॥२॥

अगम अगोचर किछु मिति नही जानी ॥ साधिक सिध धिआवहि गिआनी ॥ खुदी मिटी चूका भोलावा गुरि मन ही महि प्रगटाइआ जीउ ॥३॥

अनद मंगल कलिआण निधाना ॥ सूख सहज हरि नामु वखाना ॥ होइ क्रिपालु सुआमी अपना नाउ नानक घर महि आइआ जीउ ॥४॥२५॥३२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 104) माझ महला ५ ॥
सुणि सुणि जीवा सोइ तुमारी ॥ तूं प्रीतमु ठाकुरु अति भारी ॥ तुमरे करतब तुम ही जाणहु तुमरी ओट गोपाला जीउ ॥१॥

गुण गावत मनु हरिआ होवै ॥ कथा सुणत मलु सगली खोवै ॥ भेटत संगि साध संतन कै सदा जपउ दइआला जीउ ॥२॥

प्रभु अपुना सासि सासि समारउ ॥ इह मति गुर प्रसादि मनि धारउ ॥ तुमरी क्रिपा ते होइ प्रगासा सरब मइआ प्रतिपाला जीउ ॥३॥

सति सति सति प्रभु सोई ॥ सदा सदा सद आपे होई ॥ चलित तुमारे प्रगट पिआरे देखि नानक भए निहाला जीउ ॥४॥२६॥३३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 104) माझ महला ५ ॥
हुकमी वरसण लागे मेहा ॥ साजन संत मिलि नामु जपेहा ॥ सीतल सांति सहज सुखु पाइआ ठाढि पाई प्रभि आपे जीउ ॥१॥

सभु किछु बहुतो बहुतु उपाइआ ॥ करि किरपा प्रभि सगल रजाइआ ॥ दाति करहु मेरे दातारा जीअ जंत सभि ध्रापे जीउ ॥२॥

सचा साहिबु सची नाई ॥ गुर परसादि तिसु सदा धिआई ॥ जनम मरण भै काटे मोहा बिनसे सोग संतापे जीउ ॥३॥

सासि सासि नानकु सालाहे ॥ सिमरत नामु काटे सभि फाहे ॥ पूरन आस करी खिन भीतरि हरि हरि हरि गुण जापे जीउ ॥४॥२७॥३४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 104) माझ महला ५ ॥
आउ साजन संत मीत पिआरे ॥ मिलि गावह गुण अगम अपारे ॥ गावत सुणत सभे ही मुकते सो धिआईऐ जिनि हम कीए जीउ ॥१॥

जनम जनम के किलबिख जावहि ॥ मनि चिंदे सेई फल पावहि ॥ सिमरि साहिबु सो सचु सुआमी रिजकु सभसु कउ दीए जीउ ॥२॥

नामु जपत सरब सुखु पाईऐ ॥ सभु भउ बिनसै हरि हरि धिआईऐ ॥ जिनि सेविआ सो पारगिरामी कारज सगले थीए जीउ ॥३॥

आइ पइआ तेरी सरणाई ॥ जिउ भावै तिउ लैहि मिलाई ॥ करि किरपा प्रभु भगती लावहु सचु नानक अम्रितु पीए जीउ ॥४॥२८॥३५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 105) माझ महला ५ ॥
भए क्रिपाल गोविंद गुसाई ॥ मेघु वरसै सभनी थाई ॥ दीन दइआल सदा किरपाला ठाढि पाई करतारे जीउ ॥१॥

अपुने जीअ जंत प्रतिपारे ॥ जिउ बारिक माता समारे ॥ दुख भंजन सुख सागर सुआमी देत सगल आहारे जीउ ॥२॥

जलि थलि पूरि रहिआ मिहरवाना ॥ सद बलिहारि जाईऐ कुरबाना ॥ रैणि दिनसु तिसु सदा धिआई जि खिन महि सगल उधारे जीउ ॥३॥

राखि लीए सगले प्रभि आपे ॥ उतरि गए सभ सोग संतापे ॥ नामु जपत मनु तनु हरीआवलु प्रभ नानक नदरि निहारे जीउ ॥४॥२९॥३६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 105) माझ महला ५ ॥
जिथै नामु जपीऐ प्रभ पिआरे ॥ से असथल सोइन चउबारे ॥ जिथै नामु न जपीऐ मेरे गोइदा सेई नगर उजाड़ी जीउ ॥१॥

हरि रुखी रोटी खाइ समाले ॥ हरि अंतरि बाहरि नदरि निहाले ॥ खाइ खाइ करे बदफैली जाणु विसू की वाड़ी जीउ ॥२॥

संता सेती रंगु न लाए ॥ साकत संगि विकरम कमाए ॥ दुलभ देह खोई अगिआनी जड़ अपुणी आपि उपाड़ी जीउ ॥३॥

तेरी सरणि मेरे दीन दइआला ॥ सुख सागर मेरे गुर गोपाला ॥ करि किरपा नानकु गुण गावै राखहु सरम असाड़ी जीउ ॥४॥३०॥३७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 105) माझ महला ५ ॥
चरण ठाकुर के रिदै समाणे ॥ कलि कलेस सभ दूरि पइआणे ॥ सांति सूख सहज धुनि उपजी साधू संगि निवासा जीउ ॥१॥

लागी प्रीति न तूटै मूले ॥ हरि अंतरि बाहरि रहिआ भरपूरे ॥ सिमरि सिमरि सिमरि गुण गावा काटी जम की फासा जीउ ॥२॥

अम्रितु वरखै अनहद बाणी ॥ मन तन अंतरि सांति समाणी ॥ त्रिपति अघाइ रहे जन तेरे सतिगुरि कीआ दिलासा जीउ ॥३॥

जिस का सा तिस ते फलु पाइआ ॥ करि किरपा प्रभ संगि मिलाइआ ॥ आवण जाण रहे वडभागी नानक पूरन आसा जीउ ॥४॥३१॥३८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 105) माझ महला ५ ॥
मीहु पइआ परमेसरि पाइआ ॥ जीअ जंत सभि सुखी वसाइआ ॥ गइआ कलेसु भइआ सुखु साचा हरि हरि नामु समाली जीउ ॥१॥

जिस के से तिन ही प्रतिपारे ॥ पारब्रहम प्रभ भए रखवारे ॥ सुणी बेनंती ठाकुरि मेरै पूरन होई घाली जीउ ॥२॥

सरब जीआ कउ देवणहारा ॥ गुर परसादी नदरि निहारा ॥ जल थल महीअल सभि त्रिपताणे साधू चरन पखाली जीउ ॥३॥

मन की इछ पुजावणहारा ॥ सदा सदा जाई बलिहारा ॥ नानक दानु कीआ दुख भंजनि रते रंगि रसाली जीउ ॥४॥३२॥३९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 106) माझ महला ५ ॥
मनु तनु तेरा धनु भी तेरा ॥ तूं ठाकुरु सुआमी प्रभु मेरा ॥ जीउ पिंडु सभु रासि तुमारी तेरा जोरु गोपाला जीउ ॥१॥

सदा सदा तूंहै सुखदाई ॥ निवि निवि लागा तेरी पाई ॥ कार कमावा जे तुधु भावा जा तूं देहि दइआला जीउ ॥२॥

प्रभ तुम ते लहणा तूं मेरा गहणा ॥ जो तूं देहि सोई सुखु सहणा ॥ जिथै रखहि बैकुंठु तिथाई तूं सभना के प्रतिपाला जीउ ॥३॥

सिमरि सिमरि नानक सुखु पाइआ ॥ आठ पहर तेरे गुण गाइआ ॥ सगल मनोरथ पूरन होए कदे न होइ दुखाला जीउ ॥४॥३३॥४०॥


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