राग केदारा - बाणी शब्द, Raag Kedara - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू रामदास जी -- SGGS 1118) केदारा महला ४ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मन राम नाम नित गावीऐ रे ॥ अगम अगोचरु न जाई हरि लखिआ गुरु पूरा मिलै लखावीऐ रे ॥ रहाउ ॥

जिसु आपे किरपा करे मेरा सुआमी तिसु जन कउ हरि लिव लावीऐ रे ॥ सभु को भगति करे हरि केरी हरि भावै सो थाइ पावीऐ रे ॥१॥

हरि हरि नामु अमोलकु हरि पहि हरि देवै ता नामु धिआवीऐ रे ॥ जिस नो नामु देइ मेरा सुआमी तिसु लेखा सभु छडावीऐ रे ॥२॥

हरि नामु अराधहि से धंनु जन कहीअहि तिन मसतकि भागु धुरि लिखि पावीऐ रे ॥ तिन देखे मेरा मनु बिगसै जिउ सुतु मिलि मात गलि लावीऐ रे ॥३॥

हम बारिक हरि पिता प्रभ मेरे मो कउ देहु मती जितु हरि पावीऐ रे ॥ जिउ बछुरा देखि गऊ सुखु मानै तिउ नानक हरि गलि लावीऐ रे ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1118) केदारा महला ४ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मन हरि हरि गुन कहु रे ॥ सतिगुरू के चरन धोइ धोइ पूजहु इन बिधि मेरा हरि प्रभु लहु रे ॥ रहाउ ॥

कामु क्रोधु लोभु मोहु अभिमानु बिखै रस इन संगति ते तू रहु रे ॥ मिलि सतसंगति कीजै हरि गोसटि साधू सिउ गोसटि हरि प्रेम रसाइणु राम नामु रसाइणु हरि राम नाम राम रमहु रे ॥१॥

अंतर का अभिमानु जोरु तू किछु किछु किछु जानता इहु दूरि करहु आपन गहु रे ॥ जन नानक कउ हरि दइआल होहु सुआमी हरि संतन की धूरि करि हरे ॥२॥१॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1119) केदारा महला ५ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
माई संतसंगि जागी ॥ प्रिअ रंग देखै जपती नामु निधानी ॥ रहाउ ॥

दरसन पिआस लोचन तार लागी ॥ बिसरी तिआस बिडानी ॥१॥

अब गुरु पाइओ है सहज सुखदाइक दरसनु पेखत मनु लपटानी ॥ देखि दमोदर रहसु मनि उपजिओ नानक प्रिअ अम्रित बानी ॥२॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1119) केदारा महला ५ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दीन बिनउ सुनु दइआल ॥ पंच दास तीनि दोखी एक मनु अनाथ नाथ ॥ राखु हो किरपाल ॥ रहाउ ॥

अनिक जतन गवनु करउ ॥ खटु करम जुगति धिआनु धरउ ॥ उपाव सगल करि हारिओ नह नह हुटहि बिकराल ॥१॥

सरणि बंदन करुणा पते ॥ भव हरण हरि हरि हरि हरे ॥ एक तूही दीन दइआल ॥ प्रभ चरन नानक आसरो ॥ उधरे भ्रम मोह सागर ॥ लगि संतना पग पाल ॥२॥१॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1119) केदारा महला ५ घरु ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सरनी आइओ नाथ निधान ॥ नाम प्रीति लागी मन भीतरि मागन कउ हरि दान ॥१॥ रहाउ ॥

सुखदाई पूरन परमेसुर करि किरपा राखहु मान ॥ देहु प्रीति साधू संगि सुआमी हरि गुन रसन बखान ॥१॥

गोपाल दइआल गोबिद दमोदर निरमल कथा गिआन ॥ नानक कउ हरि कै रंगि रागहु चरन कमल संगि धिआन ॥२॥१॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1119) केदारा महला ५ ॥
हरि के दरसन को मनि चाउ ॥ करि किरपा सतसंगि मिलावहु तुम देवहु अपनो नाउ ॥ रहाउ ॥

करउ सेवा सत पुरख पिआरे जत सुनीऐ तत मनि रहसाउ ॥ वारी फेरी सदा घुमाई कवनु अनूपु तेरो ठाउ ॥१॥

सरब प्रतिपालहि सगल समालहि सगलिआ तेरी छाउ ॥ नानक के प्रभ पुरख बिधाते घटि घटि तुझहि दिखाउ ॥२॥२॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1120) केदारा महला ५ ॥
प्रिअ की प्रीति पिआरी ॥ मगन मनै महि चितवउ आसा नैनहु तार तुहारी ॥ रहाउ ॥

ओइ दिन पहर मूरत पल कैसे ओइ पल घरी किहारी ॥ खूले कपट धपट बुझि त्रिसना जीवउ पेखि दरसारी ॥१॥

कउनु सु जतनु उपाउ किनेहा सेवा कउन बीचारी ॥ मानु अभिमानु मोहु तजि नानक संतह संगि उधारी ॥२॥३॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1120) केदारा महला ५ ॥
हरि हरि हरि गुन गावहु ॥ करहु क्रिपा गोपाल गोबिदे अपना नामु जपावहु ॥ रहाउ ॥

काढि लीए प्रभ आन बिखै ते साधसंगि मनु लावहु ॥ भ्रमु भउ मोहु कटिओ गुर बचनी अपना दरसु दिखावहु ॥१॥

सभ की रेन होइ मनु मेरा अह्मबुधि तजावहु ॥ अपनी भगति देहि दइआला वडभागी नानक हरि पावहु ॥२॥४॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1120) केदारा महला ५ ॥
हरि बिनु जनमु अकारथ जात ॥ तजि गोपाल आन रंगि राचत मिथिआ पहिरत खात ॥ रहाउ ॥

धनु जोबनु स्मपै सुख भोगवै संगि न निबहत मात ॥ म्रिग त्रिसना देखि रचिओ बावर द्रुम छाइआ रंगि रात ॥१॥

मान मोह महा मद मोहत काम क्रोध कै खात ॥ करु गहि लेहु दास नानक कउ प्रभ जीउ होइ सहात ॥२॥५॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1120) केदारा महला ५ ॥
हरि बिनु कोइ न चालसि साथ ॥ दीना नाथ करुणापति सुआमी अनाथा के नाथ ॥ रहाउ ॥

सुत स्मपति बिखिआ रस भोगवत नह निबहत जम कै पाथ ॥ नामु निधानु गाउ गुन गोबिंद उधरु सागर के खात ॥१॥

सरनि समरथ अकथ अगोचर हरि सिमरत दुख लाथ ॥ नानक दीन धूरि जन बांछत मिलै लिखत धुरि माथ ॥२॥६॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1120) केदारा महला ५ घरु ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बिसरत नाहि मन ते हरी ॥ अब इह प्रीति महा प्रबल भई आन बिखै जरी ॥ रहाउ ॥

बूंद कहा तिआगि चात्रिक मीन रहत न घरी ॥ गुन गोपाल उचारु रसना टेव एह परी ॥१॥

महा नाद कुरंक मोहिओ बेधि तीखन सरी ॥ प्रभ चरन कमल रसाल नानक गाठि बाधि धरी ॥२॥१॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1121) केदारा महला ५ ॥
प्रीतम बसत रिद महि खोर ॥ भरम भीति निवारि ठाकुर गहि लेहु अपनी ओर ॥१॥ रहाउ ॥

अधिक गरत संसार सागर करि दइआ चारहु धोर ॥ संतसंगि हरि चरन बोहिथ उधरते लै मोर ॥१॥

गरभ कुंट महि जिनहि धारिओ नही बिखै बन महि होर ॥ हरि सकत सरन समरथ नानक आन नही निहोर ॥२॥२॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1121) केदारा महला ५ ॥
रसना राम राम बखानु ॥ गुन गोपाल उचारु दिनु रैनि भए कलमल हान ॥ रहाउ ॥

तिआगि चलना सगल स्मपत कालु सिर परि जानु ॥ मिथन मोह दुरंत आसा झूठु सरपर मानु ॥१॥

सति पुरख अकाल मूरति रिदै धारहु धिआनु ॥ नामु निधानु लाभु नानक बसतु इह परवानु ॥२॥३॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1121) केदारा महला ५ ॥
हरि के नाम को आधारु ॥ कलि कलेस न कछु बिआपै संतसंगि बिउहारु ॥ रहाउ ॥

करि अनुग्रहु आपि राखिओ नह उपजतउ बेकारु ॥ जिसु परापति होइ सिमरै तिसु दहत नह संसारु ॥१॥

सुख मंगल आनंद हरि हरि प्रभ चरन अम्रित सारु ॥ नानक दास सरनागती तेरे संतना की छारु ॥२॥४॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1121) केदारा महला ५ ॥
हरि के नाम बिनु ध्रिगु स्रोत ॥ जीवन रूप बिसारि जीवहि तिह कत जीवन होत ॥ रहाउ ॥

खात पीत अनेक बिंजन जैसे भार बाहक खोत ॥ आठ पहर महा स्रमु पाइआ जैसे बिरख जंती जोत ॥१॥

तजि गोपाल जि आन लागे से बहु प्रकारी रोत ॥ कर जोरि नानक दानु मागै हरि रखउ कंठि परोत ॥२॥५॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1121) केदारा महला ५ ॥
संतह धूरि ले मुखि मली ॥ गुणा अचुत सदा पूरन नह दोख बिआपहि कली ॥ रहाउ ॥

गुर बचनि कारज सरब पूरन ईत ऊत न हली ॥ प्रभ एक अनिक सरबत पूरन बिखै अगनि न जली ॥१॥

गहि भुजा लीनो दासु अपनो जोति जोती रली ॥ प्रभ चरन सरन अनाथु आइओ नानक हरि संगि चली ॥२॥६॥१४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1121) केदारा महला ५ ॥
हरि के नाम की मन रुचै ॥ कोटि सांति अनंद पूरन जलत छाती बुझै ॥ रहाउ ॥

संत मारगि चलत प्रानी पतित उधरे मुचै ॥ रेनु जन की लगी मसतकि अनिक तीरथ सुचै ॥१॥

चरन कमल धिआन भीतरि घटि घटहि सुआमी सुझै ॥ सरनि देव अपार नानक बहुरि जमु नही लुझै ॥२॥७॥१५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1122) केदारा छंत महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मिलु मेरे प्रीतम पिआरिआ ॥ रहाउ ॥

पूरि रहिआ सरबत्र मै सो पुरखु बिधाता ॥ मारगु प्रभ का हरि कीआ संतन संगि जाता ॥ संतन संगि जाता पुरखु बिधाता घटि घटि नदरि निहालिआ ॥ जो सरनी आवै सरब सुख पावै तिलु नही भंनै घालिआ ॥ हरि गुण निधि गाए सहज सुभाए प्रेम महा रस माता ॥ नानक दास तेरी सरणाई तू पूरन पुरखु बिधाता ॥१॥

हरि प्रेम भगति जन बेधिआ से आन कत जाही ॥ मीनु बिछोहा ना सहै जल बिनु मरि पाही ॥ हरि बिनु किउ रहीऐ दूख किनि सहीऐ चात्रिक बूंद पिआसिआ ॥ कब रैनि बिहावै चकवी सुखु पावै सूरज किरणि प्रगासिआ ॥ हरि दरसि मनु लागा दिनसु सभागा अनदिनु हरि गुण गाही ॥ नानक दासु कहै बेनंती कत हरि बिनु प्राण टिकाही ॥२॥

सास बिना जिउ देहुरी कत सोभा पावै ॥ दरस बिहूना साध जनु खिनु टिकणु न आवै ॥ हरि बिनु जो रहणा नरकु सो सहणा चरन कमल मनु बेधिआ ॥ हरि रसिक बैरागी नामि लिव लागी कतहु न जाइ निखेधिआ ॥ हरि सिउ जाइ मिलणा साधसंगि रहणा सो सुखु अंकि न मावै ॥ होहु क्रिपाल नानक के सुआमी हरि चरनह संगि समावै ॥३॥

खोजत खोजत प्रभ मिले हरि करुणा धारे ॥ निरगुणु नीचु अनाथु मै नही दोख बीचारे ॥ नही दोख बीचारे पूरन सुख सारे पावन बिरदु बखानिआ ॥ भगति वछलु सुनि अंचलो गहिआ घटि घटि पूर समानिआ ॥ सुख सागरो पाइआ सहज सुभाइआ जनम मरन दुख हारे ॥ करु गहि लीने नानक दास अपने राम नाम उरि हारे ॥४॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1123) रागु केदारा बाणी कबीर जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उसतति निंदा दोऊ बिबरजित तजहु मानु अभिमाना ॥ लोहा कंचनु सम करि जानहि ते मूरति भगवाना ॥१॥

तेरा जनु एकु आधु कोई ॥ कामु क्रोधु लोभु मोहु बिबरजित हरि पदु चीन्है सोई ॥१॥ रहाउ ॥

रज गुण तम गुण सत गुण कहीऐ इह तेरी सभ माइआ ॥ चउथे पद कउ जो नरु चीन्है तिन्ह ही परम पदु पाइआ ॥२॥

तीरथ बरत नेम सुचि संजम सदा रहै निहकामा ॥ त्रिसना अरु माइआ भ्रमु चूका चितवत आतम रामा ॥३॥

जिह मंदरि दीपकु परगासिआ अंधकारु तह नासा ॥ निरभउ पूरि रहे भ्रमु भागा कहि कबीर जन दासा ॥४॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1123) किनही बनजिआ कांसी तांबा किनही लउग सुपारी ॥ संतहु बनजिआ नामु गोबिद का ऐसी खेप हमारी ॥१॥

हरि के नाम के बिआपारी ॥ हीरा हाथि चड़िआ निरमोलकु छूटि गई संसारी ॥१॥ रहाउ ॥

साचे लाए तउ सच लागे साचे के बिउहारी ॥ साची बसतु के भार चलाए पहुचे जाइ भंडारी ॥२॥

आपहि रतन जवाहर मानिक आपै है पासारी ॥ आपै दह दिस आप चलावै निहचलु है बिआपारी ॥३॥

मनु करि बैलु सुरति करि पैडा गिआन गोनि भरि डारी ॥ कहतु कबीरु सुनहु रे संतहु निबही खेप हमारी ॥४॥२॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1123) री कलवारि गवारि मूढ मति उलटो पवनु फिरावउ ॥ मनु मतवार मेर सर भाठी अम्रित धार चुआवउ ॥१॥

बोलहु भईआ राम की दुहाई ॥ पीवहु संत सदा मति दुरलभ सहजे पिआस बुझाई ॥१॥ रहाउ ॥

भै बिचि भाउ भाइ कोऊ बूझहि हरि रसु पावै भाई ॥ जेते घट अम्रितु सभ ही महि भावै तिसहि पीआई ॥२॥

नगरी एकै नउ दरवाजे धावतु बरजि रहाई ॥ त्रिकुटी छूटै दसवा दरु खूल्है ता मनु खीवा भाई ॥३॥

अभै पद पूरि ताप तह नासे कहि कबीर बीचारी ॥ उबट चलंते इहु मदु पाइआ जैसे खोंद खुमारी ॥४॥३॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1123) काम क्रोध त्रिसना के लीने गति नही एकै जानी ॥ फूटी आखै कछू न सूझै बूडि मूए बिनु पानी ॥१॥

चलत कत टेढे टेढे टेढे ॥ असति चरम बिसटा के मूंदे दुरगंध ही के बेढे ॥१॥ रहाउ ॥

राम न जपहु कवन भ्रम भूले तुम ते कालु न दूरे ॥ अनिक जतन करि इहु तनु राखहु रहै अवसथा पूरे ॥२॥

आपन कीआ कछू न होवै किआ को करै परानी ॥ जा तिसु भावै सतिगुरु भेटै एको नामु बखानी ॥३॥

बलूआ के घरूआ महि बसते फुलवत देह अइआने ॥ कहु कबीर जिह रामु न चेतिओ बूडे बहुतु सिआने ॥४॥४॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1124) टेढी पाग टेढे चले लागे बीरे खान ॥ भाउ भगति सिउ काजु न कछूऐ मेरो कामु दीवान ॥१॥

रामु बिसारिओ है अभिमानि ॥ कनिक कामनी महा सुंदरी पेखि पेखि सचु मानि ॥१॥ रहाउ ॥

लालच झूठ बिकार महा मद इह बिधि अउध बिहानि ॥ कहि कबीर अंत की बेर आइ लागो कालु निदानि ॥२॥५॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1124) चारि दिन अपनी नउबति चले बजाइ ॥ इतनकु खटीआ गठीआ मटीआ संगि न कछु लै जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

दिहरी बैठी मिहरी रोवै दुआरै लउ संगि माइ ॥ मरहट लगि सभु लोगु कुट्मबु मिलि हंसु इकेला जाइ ॥१॥

वै सुत वै बित वै पुर पाटन बहुरि न देखै आइ ॥ कहतु कबीरु रामु की न सिमरहु जनमु अकारथु जाइ ॥२॥६॥

(भक्त रविदास जी -- SGGS 1124) रागु केदारा बाणी रविदास जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
खटु करम कुल संजुगतु है हरि भगति हिरदै नाहि ॥ चरनारबिंद न कथा भावै सुपच तुलि समानि ॥१॥

रे चित चेति चेत अचेत ॥ काहे न बालमीकहि देख ॥ किसु जाति ते किह पदहि अमरिओ राम भगति बिसेख ॥१॥ रहाउ ॥

सुआन सत्रु अजातु सभ ते क्रिस्न लावै हेतु ॥ लोगु बपुरा किआ सराहै तीनि लोक प्रवेस ॥२॥

अजामलु पिंगुला लुभतु कुंचरु गए हरि कै पासि ॥ ऐसे दुरमति निसतरे तू किउ न तरहि रविदास ॥३॥१॥


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates