Pt 4 - राग गूजरी - बाणी शब्द, Part 4 - Raag Gujri - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(भक्त कबीर जी -- SGGS 524) रागु गूजरी भगता की बाणी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
स्री कबीर जीउ का चउपदा घरु २ दूजा ॥
चारि पाव दुइ सिंग गुंग मुख तब कैसे गुन गईहै ॥ ऊठत बैठत ठेगा परिहै तब कत मूड लुकईहै ॥१॥

हरि बिनु बैल बिराने हुईहै ॥ फाटे नाकन टूटे काधन कोदउ को भुसु खईहै ॥१॥ रहाउ ॥

सारो दिनु डोलत बन महीआ अजहु न पेट अघईहै ॥ जन भगतन को कहो न मानो कीओ अपनो पईहै ॥२॥

दुख सुख करत महा भ्रमि बूडो अनिक जोनि भरमईहै ॥ रतन जनमु खोइओ प्रभु बिसरिओ इहु अउसरु कत पईहै ॥३॥

भ्रमत फिरत तेलक के कपि जिउ गति बिनु रैनि बिहईहै ॥ कहत कबीर राम नाम बिनु मूंड धुने पछुतईहै ॥४॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 524) गूजरी घरु ३ ॥
मुसि मुसि रोवै कबीर की माई ॥ ए बारिक कैसे जीवहि रघुराई ॥१॥

तनना बुनना सभु तजिओ है कबीर ॥ हरि का नामु लिखि लीओ सरीर ॥१॥ रहाउ ॥

जब लगु तागा बाहउ बेही ॥ तब लगु बिसरै रामु सनेही ॥२॥

ओछी मति मेरी जाति जुलाहा ॥ हरि का नामु लहिओ मै लाहा ॥३॥

कहत कबीर सुनहु मेरी माई ॥ हमरा इन का दाता एकु रघुराई ॥४॥२॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 525) गूजरी स्री नामदेव जी के पदे घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जौ राजु देहि त कवन बडाई ॥ जौ भीख मंगावहि त किआ घटि जाई ॥१॥

तूं हरि भजु मन मेरे पदु निरबानु ॥ बहुरि न होइ तेरा आवन जानु ॥१॥ रहाउ ॥

सभ तै उपाई भरम भुलाई ॥ जिस तूं देवहि तिसहि बुझाई ॥२॥

सतिगुरु मिलै त सहसा जाई ॥ किसु हउ पूजउ दूजा नदरि न आई ॥३॥

एकै पाथर कीजै भाउ ॥ दूजै पाथर धरीऐ पाउ ॥ जे ओहु देउ त ओहु भी देवा ॥ कहि नामदेउ हम हरि की सेवा ॥४॥१॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 525) गूजरी घरु १ ॥
मलै न लाछै पार मलो परमलीओ बैठो री आई ॥ आवत किनै न पेखिओ कवनै जाणै री बाई ॥१॥

कउणु कहै किणि बूझीऐ रमईआ आकुलु री बाई ॥१॥ रहाउ ॥

जिउ आकासै पंखीअलो खोजु निरखिओ न जाई ॥ जिउ जल माझै माछलो मारगु पेखणो न जाई ॥२॥

जिउ आकासै घड़ूअलो म्रिग त्रिसना भरिआ ॥ नामे चे सुआमी बीठलो जिनि तीनै जरिआ ॥३॥२॥

(भक्त रविदास जी -- SGGS 525) गूजरी स्री रविदास जी के पदे घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दूधु त बछरै थनहु बिटारिओ ॥ फूलु भवरि जलु मीनि बिगारिओ ॥१॥

माई गोबिंद पूजा कहा लै चरावउ ॥ अवरु न फूलु अनूपु न पावउ ॥१॥ रहाउ ॥

मैलागर बेर्हे है भुइअंगा ॥ बिखु अम्रितु बसहि इक संगा ॥२॥

धूप दीप नईबेदहि बासा ॥ कैसे पूज करहि तेरी दासा ॥३॥

तनु मनु अरपउ पूज चरावउ ॥ गुर परसादि निरंजनु पावउ ॥४॥

पूजा अरचा आहि न तोरी ॥ कहि रविदास कवन गति मोरी ॥५॥१॥

(भक्त त्रिलोचन जी -- SGGS 525) गूजरी स्री त्रिलोचन जीउ के पदे घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अंतरु मलि निरमलु नही कीना बाहरि भेख उदासी ॥ हिरदै कमलु घटि ब्रहमु न चीन्हा काहे भइआ संनिआसी ॥१॥

भरमे भूली रे जै चंदा ॥ नही नही चीन्हिआ परमानंदा ॥१॥ रहाउ ॥

घरि घरि खाइआ पिंडु बधाइआ खिंथा मुंदा माइआ ॥ भूमि मसाण की भसम लगाई गुर बिनु ततु न पाइआ ॥२॥

काइ जपहु रे काइ तपहु रे काइ बिलोवहु पाणी ॥ लख चउरासीह जिन्हि उपाई सो सिमरहु निरबाणी ॥३॥

काइ कमंडलु कापड़ीआ रे अठसठि काइ फिराही ॥ बदति त्रिलोचनु सुनु रे प्राणी कण बिनु गाहु कि पाही ॥४॥१॥

(भक्त त्रिलोचन जी -- SGGS 526) गूजरी ॥
अंति कालि जो लछमी सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥ सरप जोनि वलि वलि अउतरै ॥१॥

अरी बाई गोबिद नामु मति बीसरै ॥ रहाउ ॥

अंति कालि जो इसत्री सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥ बेसवा जोनि वलि वलि अउतरै ॥२॥

अंति कालि जो लड़िके सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥ सूकर जोनि वलि वलि अउतरै ॥३॥

अंति कालि जो मंदर सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥ प्रेत जोनि वलि वलि अउतरै ॥४॥

अंति कालि नाराइणु सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥ बदति तिलोचनु ते नर मुकता पीत्मबरु वा के रिदै बसै ॥५॥२॥

(भक्त जैदेव जी -- SGGS 526) गूजरी स्री जैदेव जीउ का पदा घरु ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
परमादि पुरखमनोपिमं सति आदि भाव रतं ॥ परमदभुतं परक्रिति परं जदिचिंति सरब गतं ॥१॥

केवल राम नाम मनोरमं ॥ बदि अम्रित तत मइअं ॥ न दनोति जसमरणेन जनम जराधि मरण भइअं ॥१॥ रहाउ ॥

इछसि जमादि पराभयं जसु स्वसति सुक्रित क्रितं ॥ भव भूत भाव समब्यिअं परमं प्रसंनमिदं ॥२॥

लोभादि द्रिसटि पर ग्रिहं जदिबिधि आचरणं ॥ तजि सकल दुहक्रित दुरमती भजु चक्रधर सरणं ॥३॥

हरि भगत निज निहकेवला रिद करमणा बचसा ॥ जोगेन किं जगेन किं दानेन किं तपसा ॥४॥

गोबिंद गोबिंदेति जपि नर सकल सिधि पदं ॥ जैदेव आइउ तस सफुटं भव भूत सरब गतं ॥५॥१॥


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