Pt 2 - राग गूजरी - बाणी शब्द, Part 2 - Raag Gujri - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 500) गूजरी महला ५ ॥
कबहू हरि सिउ चीतु न लाइओ ॥ धंधा करत बिहानी अउधहि गुण निधि नामु न गाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

कउडी कउडी जोरत कपटे अनिक जुगति करि धाइओ ॥ बिसरत प्रभ केते दुख गनीअहि महा मोहनी खाइओ ॥१॥

करहु अनुग्रहु सुआमी मेरे गनहु न मोहि कमाइओ ॥ गोबिंद दइआल क्रिपाल सुख सागर नानक हरि सरणाइओ ॥२॥१६॥२५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 501) गूजरी महला ५ ॥
रसना राम राम रवंत ॥ छोडि आन बिउहार मिथिआ भजु सदा भगवंत ॥१॥ रहाउ ॥

नामु एकु अधारु भगता ईत आगै टेक ॥ करि क्रिपा गोबिंद दीआ गुर गिआनु बुधि बिबेक ॥१॥

करण कारण सम्रथ स्रीधर सरणि ता की गही ॥ मुकति जुगति रवाल साधू नानक हरि निधि लही ॥२॥१७॥२६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 501) गूजरी महला ५ घरु ४ चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
छाडि सगल सिआणपा साध सरणी आउ ॥ पारब्रहम परमेसरो प्रभू के गुण गाउ ॥१॥

रे चित चरण कमल अराधि ॥ सरब सूख कलिआण पावहि मिटै सगल उपाधि ॥१॥ रहाउ ॥

मात पिता सुत मीत भाई तिसु बिना नही कोइ ॥ ईत ऊत जीअ नालि संगी सरब रविआ सोइ ॥२॥

कोटि जतन उपाव मिथिआ कछु न आवै कामि ॥ सरणि साधू निरमला गति होइ प्रभ कै नामि ॥३॥

अगम दइआल प्रभू ऊचा सरणि साधू जोगु ॥ तिसु परापति नानका जिसु लिखिआ धुरि संजोगु ॥४॥१॥२७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 501) गूजरी महला ५ ॥
आपना गुरु सेवि सद ही रमहु गुण गोबिंद ॥ सासि सासि अराधि हरि हरि लहि जाइ मन की चिंद ॥१॥

मेरे मन जापि प्रभ का नाउ ॥ सूख सहज अनंद पावहि मिली निरमल थाउ ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगि उधारि इहु मनु आठ पहर आराधि ॥ कामु क्रोधु अहंकारु बिनसै मिटै सगल उपाधि ॥२॥

अटल अछेद अभेद सुआमी सरणि ता की आउ ॥ चरण कमल अराधि हिरदै एक सिउ लिव लाउ ॥३॥

पारब्रहमि प्रभि दइआ धारी बखसि लीन्हे आपि ॥ सरब सुख हरि नामु दीआ नानक सो प्रभु जापि ॥४॥२॥२८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 501) गूजरी महला ५ ॥
गुर प्रसादी प्रभु धिआइआ गई संका तूटि ॥ दुख अनेरा भै बिनासे पाप गए निखूटि ॥१॥

हरि हरि नाम की मनि प्रीति ॥ मिलि साध बचन गोबिंद धिआए महा निरमल रीति ॥१॥ रहाउ ॥

जाप ताप अनेक करणी सफल सिमरत नाम ॥ करि अनुग्रहु आपि राखे भए पूरन काम ॥२॥

सासि सासि न बिसरु कबहूं ब्रहम प्रभ समरथ ॥ गुण अनिक रसना किआ बखानै अगनत सदा अकथ ॥३॥

दीन दरद निवारि तारण दइआल किरपा करण ॥ अटल पदवी नाम सिमरण द्रिड़ु नानक हरि हरि सरण ॥४॥३॥२९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 502) गूजरी महला ५ ॥
अह्मबुधि बहु सघन माइआ महा दीरघ रोगु ॥ हरि नामु अउखधु गुरि नामु दीनो करण कारण जोगु ॥१॥

मनि तनि बाछीऐ जन धूरि ॥ कोटि जनम के लहहि पातिक गोबिंद लोचा पूरि ॥१॥ रहाउ ॥

आदि अंते मधि आसा कूकरी बिकराल ॥ गुर गिआन कीरतन गोबिंद रमणं काटीऐ जम जाल ॥२॥

काम क्रोध लोभ मोह मूठे सदा आवा गवण ॥ प्रभ प्रेम भगति गुपाल सिमरण मिटत जोनी भवण ॥३॥

मित्र पुत्र कलत्र सुर रिद तीनि ताप जलंत ॥ जपि राम रामा दुख निवारे मिलै हरि जन संत ॥४॥

सरब बिधि भ्रमते पुकारहि कतहि नाही छोटि ॥ हरि चरण सरण अपार प्रभ के द्रिड़ु गही नानक ओट ॥५॥४॥३०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 502) गूजरी महला ५ घरु ४ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आराधि स्रीधर सफल मूरति करण कारण जोगु ॥ गुण रमण स्रवण अपार महिमा फिरि न होत बिओगु ॥१॥

मन चरणारबिंद उपास ॥ कलि कलेस मिटंत सिमरणि काटि जमदूत फास ॥१॥ रहाउ ॥

सत्रु दहन हरि नाम कहन अवर कछु न उपाउ ॥ करि अनुग्रहु प्रभू मेरे नानक नाम सुआउ ॥२॥१॥३१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 502) गूजरी महला ५ ॥
तूं समरथु सरनि को दाता दुख भंजनु सुख राइ ॥ जाहि कलेस मिटे भै भरमा निरमल गुण प्रभ गाइ ॥१॥

गोविंद तुझ बिनु अवरु न ठाउ ॥ करि किरपा पारब्रहम सुआमी जपी तुमारा नाउ ॥ रहाउ ॥

सतिगुर सेवि लगे हरि चरनी वडै भागि लिव लागी ॥ कवल प्रगास भए साधसंगे दुरमति बुधि तिआगी ॥२॥

आठ पहर हरि के गुण गावै सिमरै दीन दैआला ॥ आपि तरै संगति सभ उधरै बिनसे सगल जंजाला ॥३॥

चरण अधारु तेरा प्रभ सुआमी ओति पोति प्रभु साथि ॥ सरनि परिओ नानक प्रभ तुमरी दे राखिओ हरि हाथ ॥४॥२॥३२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 503) गूजरी असटपदीआ महला १ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
एक नगरी पंच चोर बसीअले बरजत चोरी धावै ॥ त्रिहदस माल रखै जो नानक मोख मुकति सो पावै ॥१॥

चेतहु बासुदेउ बनवाली ॥ रामु रिदै जपमाली ॥१॥ रहाउ ॥

उरध मूल जिसु साख तलाहा चारि बेद जितु लागे ॥ सहज भाइ जाइ ते नानक पारब्रहम लिव जागे ॥२॥

पारजातु घरि आगनि मेरै पुहप पत्र ततु डाला ॥ सरब जोति निरंजन स्मभू छोडहु बहुतु जंजाला ॥३॥

सुणि सिखवंते नानकु बिनवै छोडहु माइआ जाला ॥ मनि बीचारि एक लिव लागी पुनरपि जनमु न काला ॥४॥

सो गुरू सो सिखु कथीअले सो वैदु जि जाणै रोगी ॥ तिसु कारणि कमु न धंधा नाही धंधै गिरही जोगी ॥५॥

कामु क्रोधु अहंकारु तजीअले लोभु मोहु तिस माइआ ॥ मनि ततु अविगतु धिआइआ गुर परसादी पाइआ ॥६॥

गिआनु धिआनु सभ दाति कथीअले सेत बरन सभि दूता ॥ ब्रहम कमल मधु तासु रसादं जागत नाही सूता ॥७॥

महा ग्मभीर पत्र पाताला नानक सरब जुआइआ ॥ उपदेस गुरू मम पुनहि न गरभं बिखु तजि अम्रितु पीआइआ ॥८॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 503) गूजरी महला १ ॥
कवन कवन जाचहि प्रभ दाते ता के अंत न परहि सुमार ॥ जैसी भूख होइ अभ अंतरि तूं समरथु सचु देवणहार ॥१॥

ऐ जी जपु तपु संजमु सचु अधार ॥ हरि हरि नामु देहि सुखु पाईऐ तेरी भगति भरे भंडार ॥१॥ रहाउ ॥

सुंन समाधि रहहि लिव लागे एका एकी सबदु बीचार ॥ जलु थलु धरणि गगनु तह नाही आपे आपु कीआ करतार ॥२॥

ना तदि माइआ मगनु न छाइआ ना सूरज चंद न जोति अपार ॥ सरब द्रिसटि लोचन अभ अंतरि एका नदरि सु त्रिभवण सार ॥३॥

पवणु पाणी अगनि तिनि कीआ ब्रहमा बिसनु महेस अकार ॥ सरबे जाचिक तूं प्रभु दाता दाति करे अपुनै बीचार ॥४॥

कोटि तेतीस जाचहि प्रभ नाइक देदे तोटि नाही भंडार ॥ ऊंधै भांडै कछु न समावै सीधै अम्रितु परै निहार ॥५॥

सिध समाधी अंतरि जाचहि रिधि सिधि जाचि करहि जैकार ॥ जैसी पिआस होइ मन अंतरि तैसो जलु देवहि परकार ॥६॥

बडे भाग गुरु सेवहि अपुना भेदु नाही गुरदेव मुरार ॥ ता कउ कालु नाही जमु जोहै बूझहि अंतरि सबदु बीचार ॥७॥

अब तब अवरु न मागउ हरि पहि नामु निरंजन दीजै पिआरि ॥ नानक चात्रिकु अम्रित जलु मागै हरि जसु दीजै किरपा धारि ॥८॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 504) गूजरी महला १ ॥
ऐ जी जनमि मरै आवै फुनि जावै बिनु गुर गति नही काई ॥ गुरमुखि प्राणी नामे राते नामे गति पति पाई ॥१॥

भाई रे राम नामि चितु लाई ॥ गुर परसादी हरि प्रभ जाचे ऐसी नाम बडाई ॥१॥ रहाउ ॥

ऐ जी बहुते भेख करहि भिखिआ कउ केते उदरु भरन कै ताई ॥ बिनु हरि भगति नाही सुखु प्रानी बिनु गुर गरबु न जाई ॥२॥

ऐ जी कालु सदा सिर ऊपरि ठाढे जनमि जनमि वैराई ॥ साचै सबदि रते से बाचे सतिगुर बूझ बुझाई ॥३॥

गुर सरणाई जोहि न साकै दूतु न सकै संताई ॥ अविगत नाथ निरंजनि राते निरभउ सिउ लिव लाई ॥४॥

ऐ जीउ नामु दिड़हु नामे लिव लावहु सतिगुर टेक टिकाई ॥ जो तिसु भावै सोई करसी किरतु न मेटिआ जाई ॥५॥

ऐ जी भागि परे गुर सरणि तुम्हारी मै अवर न दूजी भाई ॥ अब तब एको एकु पुकारउ आदि जुगादि सखाई ॥६॥

ऐ जी राखहु पैज नाम अपुने की तुझ ही सिउ बनि आई ॥ करि किरपा गुर दरसु दिखावहु हउमै सबदि जलाई ॥७॥

ऐ जी किआ मागउ किछु रहै न दीसै इसु जग महि आइआ जाई ॥ नानक नामु पदारथु दीजै हिरदै कंठि बणाई ॥८॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 504) गूजरी महला १ ॥
ऐ जी ना हम उतम नीच न मधिम हरि सरणागति हरि के लोग ॥ नाम रते केवल बैरागी सोग बिजोग बिसरजित रोग ॥१॥

भाई रे गुर किरपा ते भगति ठाकुर की ॥ सतिगुर वाकि हिरदै हरि निरमलु ना जम काणि न जम की बाकी ॥१॥ रहाउ ॥

हरि गुण रसन रवहि प्रभ संगे जो तिसु भावै सहजि हरी ॥ बिनु हरि नाम ब्रिथा जगि जीवनु हरि बिनु निहफल मेक घरी ॥२॥

ऐ जी खोटे ठउर नाही घरि बाहरि निंदक गति नही काई ॥ रोसु करै प्रभु बखस न मेटै नित नित चड़ै सवाई ॥३॥

ऐ जी गुर की दाति न मेटै कोई मेरै ठाकुरि आपि दिवाई ॥ निंदक नर काले मुख निंदा जिन्ह गुर की दाति न भाई ॥४॥

ऐ जी सरणि परे प्रभु बखसि मिलावै बिलम न अधूआ राई ॥ आनद मूलु नाथु सिरि नाथा सतिगुरु मेलि मिलाई ॥५॥

ऐ जी सदा दइआलु दइआ करि रविआ गुरमति भ्रमनि चुकाई ॥ पारसु भेटि कंचनु धातु होई सतसंगति की वडिआई ॥६॥

हरि जलु निरमलु मनु इसनानी मजनु सतिगुरु भाई ॥ पुनरपि जनमु नाही जन संगति जोती जोति मिलाई ॥७॥

तूं वड पुरखु अगम तरोवरु हम पंखी तुझ माही ॥ नानक नामु निरंजन दीजै जुगि जुगि सबदि सलाही ॥८॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 505) गूजरी महला १ घरु ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भगति प्रेम आराधितं सचु पिआस परम हितं ॥ बिललाप बिलल बिनंतीआ सुख भाइ चित हितं ॥१॥

जपि मन नामु हरि सरणी ॥ संसार सागर तारि तारण रम नाम करि करणी ॥१॥ रहाउ ॥

ए मन मिरत सुभ चिंतं गुर सबदि हरि रमणं ॥ मति ततु गिआनं कलिआण निधानं हरि नाम मनि रमणं ॥२॥

चल चित वित भ्रमा भ्रमं जगु मोह मगन हितं ॥ थिरु नामु भगति दिड़ं मती गुर वाकि सबद रतं ॥३॥

भरमाति भरमु न चूकई जगु जनमि बिआधि खपं ॥ असथानु हरि निहकेवलं सति मती नाम तपं ॥४॥

इहु जगु मोह हेत बिआपितं दुखु अधिक जनम मरणं ॥ भजु सरणि सतिगुर ऊबरहि हरि नामु रिद रमणं ॥५॥

गुरमति निहचल मनि मनु मनं सहज बीचारं ॥ सो मनु निरमलु जितु साचु अंतरि गिआन रतनु सारं ॥६॥

भै भाइ भगति तरु भवजलु मना चितु लाइ हरि चरणी ॥ हरि नामु हिरदै पवित्रु पावनु इहु सरीरु तउ सरणी ॥७॥

लब लोभ लहरि निवारणं हरि नाम रासि मनं ॥ मनु मारि तुही निरंजना कहु नानका सरनं ॥८॥१॥५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 506) गूजरी महला ३ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
निरति करी इहु मनु नचाई ॥ गुर परसादी आपु गवाई ॥ चितु थिरु राखै सो मुकति होवै जो इछी सोई फलु पाई ॥१॥

नाचु रे मन गुर कै आगै ॥ गुर कै भाणै नाचहि ता सुखु पावहि अंते जम भउ भागै ॥ रहाउ ॥

आपि नचाए सो भगतु कहीऐ आपणा पिआरु आपि लाए ॥ आपे गावै आपि सुणावै इसु मन अंधे कउ मारगि पाए ॥२॥

अनदिनु नाचै सकति निवारै सिव घरि नीद न होई ॥ सकती घरि जगतु सूता नाचै टापै अवरो गावै मनमुखि भगति न होई ॥३॥

सुरि नर विरति पखि करमी नाचे मुनि जन गिआन बीचारी ॥ सिध साधिक लिव लागी नाचे जिन गुरमुखि बुधि वीचारी ॥४॥

खंड ब्रहमंड त्रै गुण नाचे जिन लागी हरि लिव तुमारी ॥ जीअ जंत सभे ही नाचे नाचहि खाणी चारी ॥५॥

जो तुधु भावहि सेई नाचहि जिन गुरमुखि सबदि लिव लाए ॥ से भगत से ततु गिआनी जिन कउ हुकमु मनाए ॥६॥

एहा भगति सचे सिउ लिव लागै बिनु सेवा भगति न होई ॥ जीवतु मरै ता सबदु बीचारै ता सचु पावै कोई ॥७॥

माइआ कै अरथि बहुतु लोक नाचे को विरला ततु बीचारी ॥ गुर परसादी सोई जनु पाए जिन कउ क्रिपा तुमारी ॥८॥

इकु दमु साचा वीसरै सा वेला बिरथा जाइ ॥ साहि साहि सदा समालीऐ आपे बखसे करे रजाइ ॥९॥

सेई नाचहि जो तुधु भावहि जि गुरमुखि सबदु वीचारी ॥ कहु नानक से सहज सुखु पावहि जिन कउ नदरि तुमारी ॥१०॥१॥६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 506) गूजरी महला ४ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि बिनु जीअरा रहि न सकै जिउ बालकु खीर अधारी ॥ अगम अगोचर प्रभु गुरमुखि पाईऐ अपुने सतिगुर कै बलिहारी ॥१॥

मन रे हरि कीरति तरु तारी ॥ गुरमुखि नामु अम्रित जलु पाईऐ जिन कउ क्रिपा तुमारी ॥ रहाउ ॥

सनक सनंदन नारद मुनि सेवहि अनदिनु जपत रहहि बनवारी ॥ सरणागति प्रहलाद जन आए तिन की पैज सवारी ॥२॥

अलख निरंजनु एको वरतै एका जोति मुरारी ॥ सभि जाचिक तू एको दाता मागहि हाथ पसारी ॥३॥

भगत जना की ऊतम बाणी गावहि अकथ कथा नित निआरी ॥ सफल जनमु भइआ तिन केरा आपि तरे कुल तारी ॥४॥

मनमुख दुबिधा दुरमति बिआपे जिन अंतरि मोह गुबारी ॥ संत जना की कथा न भावै ओइ डूबे सणु परवारी ॥५॥

निंदकु निंदा करि मलु धोवै ओहु मलभखु माइआधारी ॥ संत जना की निंदा विआपे ना उरवारि न पारी ॥६॥

एहु परपंचु खेलु कीआ सभु करतै हरि करतै सभ कल धारी ॥ हरि एको सूतु वरतै जुग अंतरि सूतु खिंचै एकंकारी ॥७॥

रसनि रसनि रसि गावहि हरि गुण रसना हरि रसु धारी ॥ नानक हरि बिनु अवरु न मागउ हरि रस प्रीति पिआरी ॥८॥१॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 507) गूजरी महला ५ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राजन महि तूं राजा कहीअहि भूमन महि भूमा ॥ ठाकुर महि ठकुराई तेरी कोमन सिरि कोमा ॥१॥

पिता मेरो बडो धनी अगमा ॥ उसतति कवन करीजै करते पेखि रहे बिसमा ॥१॥ रहाउ ॥

सुखीअन महि सुखीआ तूं कहीअहि दातन सिरि दाता ॥ तेजन महि तेजवंसी कहीअहि रसीअन महि राता ॥२॥

सूरन महि सूरा तूं कहीअहि भोगन महि भोगी ॥ ग्रसतन महि तूं बडो ग्रिहसती जोगन महि जोगी ॥३॥

करतन महि तूं करता कहीअहि आचारन महि आचारी ॥ साहन महि तूं साचा साहा वापारन महि वापारी ॥४॥

दरबारन महि तेरो दरबारा सरन पालन टीका ॥ लखिमी केतक गनी न जाईऐ गनि न सकउ सीका ॥५॥

नामन महि तेरो प्रभ नामा गिआनन महि गिआनी ॥ जुगतन महि तेरी प्रभ जुगता इसनानन महि इसनानी ॥६॥

सिधन महि तेरी प्रभ सिधा करमन सिरि करमा ॥ आगिआ महि तेरी प्रभ आगिआ हुकमन सिरि हुकमा ॥७॥

जिउ बोलावहि तिउ बोलह सुआमी कुदरति कवन हमारी ॥ साधसंगि नानक जसु गाइओ जो प्रभ की अति पिआरी ॥८॥१॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 508) गूजरी महला ५ घरु ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाथ नरहर दीन बंधव पतित पावन देव ॥ भै त्रास नास क्रिपाल गुण निधि सफल सुआमी सेव ॥१॥

हरि गोपाल गुर गोबिंद ॥ चरण सरण दइआल केसव तारि जग भव सिंध ॥१॥ रहाउ ॥

काम क्रोध हरन मद मोह दहन मुरारि मन मकरंद ॥ जनम मरण निवारि धरणीधर पति राखु परमानंद ॥२॥

जलत अनिक तरंग माइआ गुर गिआन हरि रिद मंत ॥ छेदि अह्मबुधि करुणा मै चिंत मेटि पुरख अनंत ॥३॥

सिमरि समरथ पल महूरत प्रभ धिआनु सहज समाधि ॥ दीन दइआल प्रसंन पूरन जाचीऐ रज साध ॥४॥

मोह मिथन दुरंत आसा बासना बिकार ॥ रखु धरम भरम बिदारि मन ते उधरु हरि निरंकार ॥५॥

धनाढि आढि भंडार हरि निधि होत जिना न चीर ॥ खल मुगध मूड़ कटाख्य स्रीधर भए गुण मति धीर ॥६॥

जीवन मुकत जगदीस जपि मन धारि रिद परतीति ॥ जीअ दइआ मइआ सरबत्र रमणं परम हंसह रीति ॥७॥

देत दरसनु स्रवन हरि जसु रसन नाम उचार ॥ अंग संग भगवान परसन प्रभ नानक पतित उधार ॥८॥१॥२॥५॥१॥१॥२॥५७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 508) गूजरी की वार महला ३
सिकंदर बिराहिम की वार की धुनी गाउणी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु मः ३ ॥
इहु जगतु ममता मुआ जीवण की बिधि नाहि ॥ गुर कै भाणै जो चलै तां जीवण पदवी पाहि ॥ ओइ सदा सदा जन जीवते जो हरि चरणी चितु लाहि ॥ नानक नदरी मनि वसै गुरमुखि सहजि समाहि ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 508) मः ३ ॥
अंदरि सहसा दुखु है आपै सिरि धंधै मार ॥ दूजै भाइ सुते कबहि न जागहि माइआ मोह पिआर ॥ नामु न चेतहि सबदु न वीचारहि इहु मनमुख का आचारु ॥ हरि नामु न पाइआ जनमु बिरथा गवाइआ नानक जमु मारि करे खुआर ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 509) पउड़ी ॥
आपणा आपु उपाइओनु तदहु होरु न कोई ॥ मता मसूरति आपि करे जो करे सु होई ॥ तदहु आकासु न पातालु है ना त्रै लोई ॥ तदहु आपे आपि निरंकारु है ना ओपति होई ॥ जिउ तिसु भावै तिवै करे तिसु बिनु अवरु न कोई ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 509) सलोकु मः ३ ॥
साहिबु मेरा सदा है दिसै सबदु कमाइ ॥ ओहु अउहाणी कदे नाहि ना आवै ना जाइ ॥ सदा सदा सो सेवीऐ जो सभ महि रहै समाइ ॥ अवरु दूजा किउ सेवीऐ जमै तै मरि जाइ ॥ निहफलु तिन का जीविआ जि खसमु न जाणहि आपणा अवरी कउ चितु लाइ ॥ नानक एव न जापई करता केती देइ सजाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 509) मः ३ ॥
सचा नामु धिआईऐ सभो वरतै सचु ॥ नानक हुकमु बुझि परवाणु होइ ता फलु पावै सचु ॥ कथनी बदनी करता फिरै हुकमै मूलि न बुझई अंधा कचु निकचु ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 509) पउड़ी ॥
संजोगु विजोगु उपाइओनु स्रिसटी का मूलु रचाइआ ॥ हुकमी स्रिसटि साजीअनु जोती जोति मिलाइआ ॥ जोती हूं सभु चानणा सतिगुरि सबदु सुणाइआ ॥ ब्रहमा बिसनु महेसु त्रै गुण सिरि धंधै लाइआ ॥ माइआ का मूलु रचाइओनु तुरीआ सुखु पाइआ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 509) सलोकु मः ३ ॥
सो जपु सो तपु जि सतिगुर भावै ॥ सतिगुर कै भाणै वडिआई पावै ॥ नानक आपु छोडि गुर माहि समावै ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 509) मः ३ ॥
गुर की सिख को विरला लेवै ॥ नानक जिसु आपि वडिआई देवै ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 509) पउड़ी ॥
माइआ मोहु अगिआनु है बिखमु अति भारी ॥ पथर पाप बहु लदिआ किउ तरीऐ तारी ॥ अनदिनु भगती रतिआ हरि पारि उतारी ॥ गुर सबदी मनु निरमला हउमै छडि विकारी ॥ हरि हरि नामु धिआईऐ हरि हरि निसतारी ॥३॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 509) सलोकु ॥
कबीर मुकति दुआरा संकुड़ा राई दसवै भाइ ॥ मनु तउ मैगलु होइ रहा निकसिआ किउ करि जाइ ॥ ऐसा सतिगुरु जे मिलै तुठा करे पसाउ ॥ मुकति दुआरा मोकला सहजे आवउ जाउ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 509) मः ३ ॥
नानक मुकति दुआरा अति नीका नान्हा होइ सु जाइ ॥ हउमै मनु असथूलु है किउ करि विचु दे जाइ ॥ सतिगुर मिलिऐ हउमै गई जोति रही सभ आइ ॥ इहु जीउ सदा मुकतु है सहजे रहिआ समाइ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 510) पउड़ी ॥
प्रभि संसारु उपाइ कै वसि आपणै कीता ॥ गणतै प्रभू न पाईऐ दूजै भरमीता ॥ सतिगुर मिलिऐ जीवतु मरै बुझि सचि समीता ॥ सबदे हउमै खोईऐ हरि मेलि मिलीता ॥ सभ किछु जाणै करे आपि आपे विगसीता ॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 510) सलोकु मः ३ ॥
सतिगुर सिउ चितु न लाइओ नामु न वसिओ मनि आइ ॥ ध्रिगु इवेहा जीविआ किआ जुग महि पाइआ आइ ॥ माइआ खोटी रासि है एक चसे महि पाजु लहि जाइ ॥ हथहु छुड़की तनु सिआहु होइ बदनु जाइ कुमलाइ ॥ जिन सतिगुर सिउ चितु लाइआ तिन्ह सुखु वसिआ मनि आइ ॥ हरि नामु धिआवहि रंग सिउ हरि नामि रहे लिव लाइ ॥ नानक सतिगुर सो धनु सउपिआ जि जीअ महि रहिआ समाइ ॥ रंगु तिसै कउ अगला वंनी चड़ै चड़ाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 510) मः ३ ॥
माइआ होई नागनी जगति रही लपटाइ ॥ इस की सेवा जो करे तिस ही कउ फिरि खाइ ॥ गुरमुखि कोई गारड़ू तिनि मलि दलि लाई पाइ ॥ नानक सेई उबरे जि सचि रहे लिव लाइ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 510) पउड़ी ॥
ढाढी करे पुकार प्रभू सुणाइसी ॥ अंदरि धीरक होइ पूरा पाइसी ॥ जो धुरि लिखिआ लेखु से करम कमाइसी ॥ जा होवै खसमु दइआलु ता महलु घरु पाइसी ॥ सो प्रभु मेरा अति वडा गुरमुखि मेलाइसी ॥५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 510) सलोक मः ३ ॥
सभना का सहु एकु है सद ही रहै हजूरि ॥ नानक हुकमु न मंनई ता घर ही अंदरि दूरि ॥ हुकमु भी तिन्हा मनाइसी जिन्ह कउ नदरि करेइ ॥ हुकमु मंनि सुखु पाइआ प्रेम सुहागणि होइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 510) मः ३ ॥
रैणि सबाई जलि मुई कंत न लाइओ भाउ ॥ नानक सुखि वसनि सोहागणी जिन्ह पिआरा पुरखु हरि राउ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 510) पउड़ी ॥
सभु जगु फिरि मै देखिआ हरि इको दाता ॥ उपाइ कितै न पाईऐ हरि करम बिधाता ॥ गुर सबदी हरि मनि वसै हरि सहजे जाता ॥ अंदरहु त्रिसना अगनि बुझी हरि अम्रित सरि नाता ॥ वडी वडिआई वडे की गुरमुखि बोलाता ॥६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 510) सलोकु मः ३ ॥
काइआ हंस किआ प्रीति है जि पइआ ही छडि जाइ ॥ एस नो कूड़ु बोलि कि खवालीऐ जि चलदिआ नालि न जाइ ॥ काइआ मिटी अंधु है पउणै पुछहु जाइ ॥ हउ ता माइआ मोहिआ फिरि फिरि आवा जाइ ॥ नानक हुकमु न जातो खसम का जि रहा सचि समाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 511) मः ३ ॥
एको निहचल नाम धनु होरु धनु आवै जाइ ॥ इसु धन कउ तसकरु जोहि न सकई ना ओचका लै जाइ ॥ इहु हरि धनु जीऐ सेती रवि रहिआ जीऐ नाले जाइ ॥ पूरे गुर ते पाईऐ मनमुखि पलै न पाइ ॥ धनु वापारी नानका जिन्हा नाम धनु खटिआ आइ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 511) पउड़ी ॥
मेरा साहिबु अति वडा सचु गहिर ग्मभीरा ॥ सभु जगु तिस कै वसि है सभु तिस का चीरा ॥ गुर परसादी पाईऐ निहचलु धनु धीरा ॥ किरपा ते हरि मनि वसै भेटै गुरु सूरा ॥ गुणवंती सालाहिआ सदा थिरु निहचलु हरि पूरा ॥७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 511) सलोकु मः ३ ॥
ध्रिगु तिन्हा दा जीविआ जो हरि सुखु परहरि तिआगदे दुखु हउमै पाप कमाइ ॥ मनमुख अगिआनी माइआ मोहि विआपे तिन्ह बूझ न काई पाइ ॥ हलति पलति ओइ सुखु न पावहि अंति गए पछुताइ ॥ गुर परसादी को नामु धिआए तिसु हउमै विचहु जाइ ॥ नानक जिसु पूरबि होवै लिखिआ सो गुर चरणी आइ पाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 511) मः ३ ॥
मनमुखु ऊधा कउलु है ना तिसु भगति न नाउ ॥ सकती अंदरि वरतदा कूड़ु तिस का है उपाउ ॥ तिस का अंदरु चितु न भिजई मुखि फीका आलाउ ॥ ओइ धरमि रलाए ना रलन्हि ओना अंदरि कूड़ु सुआउ ॥ नानक करतै बणत बणाई मनमुख कूड़ु बोलि बोलि डुबे गुरमुखि तरे जपि हरि नाउ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 511) पउड़ी ॥
बिनु बूझे वडा फेरु पइआ फिरि आवै जाई ॥ सतिगुर की सेवा न कीतीआ अंति गइआ पछुताई ॥ आपणी किरपा करे गुरु पाईऐ विचहु आपु गवाई ॥ त्रिसना भुख विचहु उतरै सुखु वसै मनि आई ॥ सदा सदा सालाहीऐ हिरदै लिव लाई ॥८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 511) सलोकु मः ३ ॥
जि सतिगुरु सेवे आपणा तिस नो पूजे सभु कोइ ॥ सभना उपावा सिरि उपाउ है हरि नामु परापति होइ ॥ अंतरि सीतल साति वसै जपि हिरदै सदा सुखु होइ ॥ अम्रितु खाणा अम्रितु पैनणा नानक नामु वडाई होइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 511) मः ३ ॥
ए मन गुर की सिख सुणि हरि पावहि गुणी निधानु ॥ हरि सुखदाता मनि वसै हउमै जाइ गुमानु ॥ नानक नदरी पाईऐ ता अनदिनु लागै धिआनु ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 512) पउड़ी ॥
सतु संतोखु सभु सचु है गुरमुखि पविता ॥ अंदरहु कपटु विकारु गइआ मनु सहजे जिता ॥ तह जोति प्रगासु अनंद रसु अगिआनु गविता ॥ अनदिनु हरि के गुण रवै गुण परगटु किता ॥ सभना दाता एकु है इको हरि मिता ॥९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 512) सलोकु मः ३ ॥
ब्रहमु बिंदे सो ब्राहमणु कहीऐ जि अनदिनु हरि लिव लाए ॥ सतिगुर पुछै सचु संजमु कमावै हउमै रोगु तिसु जाए ॥ हरि गुण गावै गुण संग्रहै जोती जोति मिलाए ॥ इसु जुग महि को विरला ब्रहम गिआनी जि हउमै मेटि समाए ॥ नानक तिस नो मिलिआ सदा सुखु पाईऐ जि अनदिनु हरि नामु धिआए ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 512) मः ३ ॥
अंतरि कपटु मनमुख अगिआनी रसना झूठु बोलाइ ॥ कपटि कीतै हरि पुरखु न भीजै नित वेखै सुणै सुभाइ ॥ दूजै भाइ जाइ जगु परबोधै बिखु माइआ मोह सुआइ ॥ इतु कमाणै सदा दुखु पावै जमै मरै फिरि आवै जाइ ॥ सहसा मूलि न चुकई विचि विसटा पचै पचाइ ॥ जिस नो क्रिपा करे मेरा सुआमी तिसु गुर की सिख सुणाइ ॥ हरि नामु धिआवै हरि नामो गावै हरि नामो अंति छडाइ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 512) पउड़ी ॥
जिना हुकमु मनाइओनु ते पूरे संसारि ॥ साहिबु सेवन्हि आपणा पूरै सबदि वीचारि ॥ हरि की सेवा चाकरी सचै सबदि पिआरि ॥ हरि का महलु तिन्ही पाइआ जिन्ह हउमै विचहु मारि ॥ नानक गुरमुखि मिलि रहे जपि हरि नामा उर धारि ॥१०॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 512) सलोकु मः ३ ॥
गुरमुखि धिआन सहज धुनि उपजै सचि नामि चितु लाइआ ॥ गुरमुखि अनदिनु रहै रंगि राता हरि का नामु मनि भाइआ ॥ गुरमुखि हरि वेखहि गुरमुखि हरि बोलहि गुरमुखि हरि सहजि रंगु लाइआ ॥ नानक गुरमुखि गिआनु परापति होवै तिमर अगिआनु अधेरु चुकाइआ ॥ जिस नो करमु होवै धुरि पूरा तिनि गुरमुखि हरि नामु धिआइआ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 512) मः ३ ॥
सतिगुरु जिना न सेविओ सबदि न लगो पिआरु ॥ सहजे नामु न धिआइआ कितु आइआ संसारि ॥ फिरि फिरि जूनी पाईऐ विसटा सदा खुआरु ॥ कूड़ै लालचि लगिआ ना उरवारु न पारु ॥ नानक गुरमुखि उबरे जि आपि मेले करतारि ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 513) पउड़ी ॥
भगत सचै दरि सोहदे सचै सबदि रहाए ॥ हरि की प्रीति तिन ऊपजी हरि प्रेम कसाए ॥ हरि रंगि रहहि सदा रंगि राते रसना हरि रसु पिआए ॥ सफलु जनमु जिन्ही गुरमुखि जाता हरि जीउ रिदै वसाए ॥ बाझु गुरू फिरै बिललादी दूजै भाइ खुआए ॥११॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 513) सलोकु मः ३ ॥
कलिजुग महि नामु निधानु भगती खटिआ हरि उतम पदु पाइआ ॥ सतिगुर सेवि हरि नामु मनि वसाइआ अनदिनु नामु धिआइआ ॥ विचे ग्रिह गुर बचनि उदासी हउमै मोहु जलाइआ ॥ आपि तरिआ कुल जगतु तराइआ धंनु जणेदी माइआ ॥ ऐसा सतिगुरु सोई पाए जिसु धुरि मसतकि हरि लिखि पाइआ ॥ जन नानक बलिहारी गुर आपणे विटहु जिनि भ्रमि भुला मारगि पाइआ ॥१॥


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