राग गूजरी - बाणी शब्द, Raag Gujri - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू रामदास जी -- SGGS 10) रागु गूजरी महला ४ ॥
हरि के जन सतिगुर सतपुरखा बिनउ करउ गुर पासि ॥ हम कीरे किरम सतिगुर सरणाई करि दइआ नामु परगासि ॥१॥

मेरे मीत गुरदेव मो कउ राम नामु परगासि ॥ गुरमति नामु मेरा प्रान सखाई हरि कीरति हमरी रहरासि ॥१॥ रहाउ ॥

हरि जन के वड भाग वडेरे जिन हरि हरि सरधा हरि पिआस ॥ हरि हरि नामु मिलै त्रिपतासहि मिलि संगति गुण परगासि ॥२॥

जिन हरि हरि हरि रसु नामु न पाइआ ते भागहीण जम पासि ॥ जो सतिगुर सरणि संगति नही आए ध्रिगु जीवे ध्रिगु जीवासि ॥३॥

जिन हरि जन सतिगुर संगति पाई तिन धुरि मसतकि लिखिआ लिखासि ॥ धनु धंनु सतसंगति जितु हरि रसु पाइआ मिलि जन नानक नामु परगासि ॥४॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 10) रागु गूजरी महला ५ ॥
काहे रे मन चितवहि उदमु जा आहरि हरि जीउ परिआ ॥ सैल पथर महि जंत उपाए ता का रिजकु आगै करि धरिआ ॥१॥

मेरे माधउ जी सतसंगति मिले सु तरिआ ॥ गुर परसादि परम पदु पाइआ सूके कासट हरिआ ॥१॥ रहाउ ॥

जननि पिता लोक सुत बनिता कोइ न किस की धरिआ ॥ सिरि सिरि रिजकु स्मबाहे ठाकुरु काहे मन भउ करिआ ॥२॥

ऊडे ऊडि आवै सै कोसा तिसु पाछै बचरे छरिआ ॥ तिन कवणु खलावै कवणु चुगावै मन महि सिमरनु करिआ ॥३॥

सभि निधान दस असट सिधान ठाकुर कर तल धरिआ ॥ जन नानक बलि बलि सद बलि जाईऐ तेरा अंतु न पारावरिआ ॥४॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 489) ੴ सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
रागु गूजरी महला १ चउपदे घरु १ ॥
तेरा नामु करी चनणाठीआ जे मनु उरसा होइ ॥ करणी कुंगू जे रलै घट अंतरि पूजा होइ ॥१॥

पूजा कीचै नामु धिआईऐ बिनु नावै पूज न होइ ॥१॥ रहाउ ॥

बाहरि देव पखालीअहि जे मनु धोवै कोइ ॥ जूठि लहै जीउ माजीऐ मोख पइआणा होइ ॥२॥

पसू मिलहि चंगिआईआ खड़ु खावहि अम्रितु देहि ॥ नाम विहूणे आदमी ध्रिगु जीवण करम करेहि ॥३॥

नेड़ा है दूरि न जाणिअहु नित सारे सम्हाले ॥ जो देवै सो खावणा कहु नानक साचा हे ॥४॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 489) गूजरी महला १ ॥
नाभि कमल ते ब्रहमा उपजे बेद पड़हि मुखि कंठि सवारि ॥ ता को अंतु न जाई लखणा आवत जात रहै गुबारि ॥१॥

प्रीतम किउ बिसरहि मेरे प्राण अधार ॥ जा की भगति करहि जन पूरे मुनि जन सेवहि गुर वीचारि ॥१॥ रहाउ ॥

रवि ससि दीपक जा के त्रिभवणि एका जोति मुरारि ॥ गुरमुखि होइ सु अहिनिसि निरमलु मनमुखि रैणि अंधारि ॥२॥

सिध समाधि करहि नित झगरा दुहु लोचन किआ हेरै ॥ अंतरि जोति सबदु धुनि जागै सतिगुरु झगरु निबेरै ॥३॥

सुरि नर नाथ बेअंत अजोनी साचै महलि अपारा ॥ नानक सहजि मिले जगजीवन नदरि करहु निसतारा ॥४॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 490) रागु गूजरी महला ३ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ध्रिगु इवेहा जीवणा जितु हरि प्रीति न पाइ ॥ जितु कमि हरि वीसरै दूजै लगै जाइ ॥१॥

ऐसा सतिगुरु सेवीऐ मना जितु सेविऐ गोविद प्रीति ऊपजै अवर विसरि सभ जाइ ॥ हरि सेती चितु गहि रहै जरा का भउ न होवई जीवन पदवी पाइ ॥१॥ रहाउ ॥

गोबिंद प्रीति सिउ इकु सहजु उपजिआ वेखु जैसी भगति बनी ॥ आप सेती आपु खाइआ ता मनु निरमलु होआ जोती जोति समई ॥२॥

बिनु भागा ऐसा सतिगुरु न पाईऐ जे लोचै सभु कोइ ॥ कूड़ै की पालि विचहु निकलै ता सदा सुखु होइ ॥३॥

नानक ऐसे सतिगुर की किआ ओहु सेवकु सेवा करे गुर आगै जीउ धरेइ ॥ सतिगुर का भाणा चिति करे सतिगुरु आपे क्रिपा करेइ ॥४॥१॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 490) गूजरी महला ३ ॥
हरि की तुम सेवा करहु दूजी सेवा करहु न कोइ जी ॥ हरि की सेवा ते मनहु चिंदिआ फलु पाईऐ दूजी सेवा जनमु बिरथा जाइ जी ॥१॥

हरि मेरी प्रीति रीति है हरि मेरी हरि मेरी कथा कहानी जी ॥ गुर प्रसादि मेरा मनु भीजै एहा सेव बनी जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि मेरा सिम्रिति हरि मेरा सासत्र हरि मेरा बंधपु हरि मेरा भाई ॥ हरि की मै भूख लागै हरि नामि मेरा मनु त्रिपतै हरि मेरा साकु अंति होइ सखाई ॥२॥

हरि बिनु होर रासि कूड़ी है चलदिआ नालि न जाई ॥ हरि मेरा धनु मेरै साथि चालै जहा हउ जाउ तह जाई ॥३॥

सो झूठा जो झूठे लागै झूठे करम कमाई ॥ कहै नानकु हरि का भाणा होआ कहणा कछू न जाई ॥४॥२॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 490) गूजरी महला ३ ॥
जुग माहि नामु दुल्मभु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥ बिनु नावै मुकति न होवई वेखहु को विउपाइ ॥१॥

बलिहारी गुर आपणे सद बलिहारै जाउ ॥ सतिगुर मिलिऐ हरि मनि वसै सहजे रहै समाइ ॥१॥ रहाउ ॥

जां भउ पाए आपणा बैरागु उपजै मनि आइ ॥ बैरागै ते हरि पाईऐ हरि सिउ रहै समाइ ॥२॥

सेइ मुकत जि मनु जिणहि फिरि धातु न लागै आइ ॥ दसवै दुआरि रहत करे त्रिभवण सोझी पाइ ॥३॥

नानक गुर ते गुरु होइआ वेखहु तिस की रजाइ ॥ इहु कारणु करता करे जोती जोति समाइ ॥४॥३॥५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 491) गूजरी महला ३ ॥
राम राम सभु को कहै कहिऐ रामु न होइ ॥ गुर परसादी रामु मनि वसै ता फलु पावै कोइ ॥१॥

अंतरि गोविंद जिसु लागै प्रीति ॥ हरि तिसु कदे न वीसरै हरि हरि करहि सदा मनि चीति ॥१॥ रहाउ ॥

हिरदै जिन्ह कै कपटु वसै बाहरहु संत कहाहि ॥ त्रिसना मूलि न चुकई अंति गए पछुताहि ॥२॥

अनेक तीरथ जे जतन करै ता अंतर की हउमै कदे न जाइ ॥ जिसु नर की दुबिधा न जाइ धरम राइ तिसु देइ सजाइ ॥३॥

करमु होवै सोई जनु पाए गुरमुखि बूझै कोई ॥ नानक विचहु हउमै मारे तां हरि भेटै सोई ॥४॥४॥६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 491) गूजरी महला ३ ॥
तिसु जन सांति सदा मति निहचल जिस का अभिमानु गवाए ॥ सो जनु निरमलु जि गुरमुखि बूझै हरि चरणी चितु लाए ॥१॥

हरि चेति अचेत मना जो इछहि सो फलु होई ॥ गुर परसादी हरि रसु पावहि पीवत रहहि सदा सुखु होई ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुरु भेटे ता पारसु होवै पारसु होइ त पूज कराए ॥ जो उसु पूजे सो फलु पाए दीखिआ देवै साचु बुझाए ॥२॥

विणु पारसै पूज न होवई विणु मन परचे अवरा समझाए ॥ गुरू सदाए अगिआनी अंधा किसु ओहु मारगि पाए ॥३॥

नानक विणु नदरी किछू न पाईऐ जिसु नदरि करे सो पाए ॥ गुर परसादी दे वडिआई अपणा सबदु वरताए ॥४॥५॥७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 491) गूजरी महला ३ पंचपदे ॥
ना कासी मति ऊपजै ना कासी मति जाइ ॥ सतिगुर मिलिऐ मति ऊपजै ता इह सोझी पाइ ॥१॥

हरि कथा तूं सुणि रे मन सबदु मंनि वसाइ ॥ इह मति तेरी थिरु रहै तां भरमु विचहु जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि चरण रिदै वसाइ तू किलविख होवहि नासु ॥ पंच भू आतमा वसि करहि ता तीरथ करहि निवासु ॥२॥

मनमुखि इहु मनु मुगधु है सोझी किछू न पाइ ॥ हरि का नामु न बुझई अंति गइआ पछुताइ ॥३॥

इहु मनु कासी सभि तीरथ सिम्रिति सतिगुर दीआ बुझाइ ॥ अठसठि तीरथ तिसु संगि रहहि जिन हरि हिरदै रहिआ समाइ ॥४॥

नानक सतिगुर मिलिऐ हुकमु बुझिआ एकु वसिआ मनि आइ ॥ जो तुधु भावै सभु सचु है सचे रहै समाइ ॥५॥६॥८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 492) गूजरी महला ३ तीजा ॥
एको नामु निधानु पंडित सुणि सिखु सचु सोई ॥ दूजै भाइ जेता पड़हि पड़त गुणत सदा दुखु होई ॥१॥

हरि चरणी तूं लागि रहु गुर सबदि सोझी होई ॥ हरि रसु रसना चाखु तूं तां मनु निरमलु होई ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुर मिलिऐ मनु संतोखीऐ ता फिरि त्रिसना भूख न होइ ॥ नामु निधानु पाइआ पर घरि जाइ न कोइ ॥२॥

कथनी बदनी जे करे मनमुखि बूझ न होइ ॥ गुरमती घटि चानणा हरि नामु पावै सोइ ॥३॥

सुणि सासत्र तूं न बुझही ता फिरहि बारो बार ॥ सो मूरखु जो आपु न पछाणई सचि न धरे पिआरु ॥४॥

सचै जगतु डहकाइआ कहणा कछू न जाइ ॥ नानक जो तिसु भावै सो करे जिउ तिस की रजाइ ॥५॥७॥९॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 492) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु गूजरी महला ४ चउपदे घरु १ ॥
हरि के जन सतिगुर सत पुरखा हउ बिनउ करउ गुर पासि ॥ हम कीरे किरम सतिगुर सरणाई करि दइआ नामु परगासि ॥१॥

मेरे मीत गुरदेव मो कउ राम नामु परगासि ॥ गुरमति नामु मेरा प्रान सखाई हरि कीरति हमरी रहरासि ॥१॥ रहाउ ॥

हरि जन के वडभाग वडेरे जिन हरि हरि सरधा हरि पिआस ॥ हरि हरि नामु मिलै त्रिपतासहि मिलि संगति गुण परगासि ॥२॥

जिन्ह हरि हरि हरि रसु नामु न पाइआ ते भागहीण जम पासि ॥ जो सतिगुर सरणि संगति नही आए ध्रिगु जीवे ध्रिगु जीवासि ॥३॥

जिन हरि जन सतिगुर संगति पाई तिन धुरि मसतकि लिखिआ लिखासि ॥ धंनु धंनु सतसंगति जितु हरि रसु पाइआ मिलि नानक नामु परगासि ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 492) गूजरी महला ४ ॥
गोविंदु गोविंदु प्रीतमु मनि प्रीतमु मिलि सतसंगति सबदि मनु मोहै ॥ जपि गोविंदु गोविंदु धिआईऐ सभ कउ दानु देइ प्रभु ओहै ॥१॥

मेरे भाई जना मो कउ गोविंदु गोविंदु गोविंदु मनु मोहै ॥ गोविंद गोविंद गोविंद गुण गावा मिलि गुर साधसंगति जनु सोहै ॥१॥ रहाउ ॥

सुख सागर हरि भगति है गुरमति कउला रिधि सिधि लागै पगि ओहै ॥ जन कउ राम नामु आधारा हरि नामु जपत हरि नामे सोहै ॥२॥

दुरमति भागहीन मति फीके नामु सुनत आवै मनि रोहै ॥ कऊआ काग कउ अम्रित रसु पाईऐ त्रिपतै विसटा खाइ मुखि गोहै ॥३॥

अम्रित सरु सतिगुरु सतिवादी जितु नातै कऊआ हंसु होहै ॥ नानक धनु धंनु वडे वडभागी जिन्ह गुरमति नामु रिदै मलु धोहै ॥४॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 493) गूजरी महला ४ ॥
हरि जन ऊतम ऊतम बाणी मुखि बोलहि परउपकारे ॥ जो जनु सुणै सरधा भगति सेती करि किरपा हरि निसतारे ॥१॥

राम मो कउ हरि जन मेलि पिआरे ॥ मेरे प्रीतम प्रान सतिगुरु गुरु पूरा हम पापी गुरि निसतारे ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमुखि वडभागी वडभागे जिन हरि हरि नामु अधारे ॥ हरि हरि अम्रितु हरि रसु पावहि गुरमति भगति भंडारे ॥२॥

जिन दरसनु सतिगुर सत पुरख न पाइआ ते भागहीण जमि मारे ॥ से कूकर सूकर गरधभ पवहि गरभ जोनी दयि मारे महा हतिआरे ॥३॥

दीन दइआल होहु जन ऊपरि करि किरपा लेहु उबारे ॥ नानक जन हरि की सरणाई हरि भावै हरि निसतारे ॥४॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 493) गूजरी महला ४ ॥
होहु दइआल मेरा मनु लावहु हउ अनदिनु राम नामु नित धिआई ॥ सभि सुख सभि गुण सभि निधान हरि जितु जपिऐ दुख भुख सभ लहि जाई ॥१॥

मन मेरे मेरा राम नामु सखा हरि भाई ॥ गुरमति राम नामु जसु गावा अंति बेली दरगह लए छडाई ॥१॥ रहाउ ॥

तूं आपे दाता प्रभु अंतरजामी करि किरपा लोच मेरै मनि लाई ॥ मै मनि तनि लोच लगी हरि सेती प्रभि लोच पूरी सतिगुर सरणाई ॥२॥

माणस जनमु पुंनि करि पाइआ बिनु नावै ध्रिगु ध्रिगु बिरथा जाई ॥ नाम बिना रस कस दुखु खावै मुखु फीका थुक थूक मुखि पाई ॥३॥

जो जन हरि प्रभ हरि हरि सरणा तिन दरगह हरि हरि दे वडिआई ॥ धंनु धंनु साबासि कहै प्रभु जन कउ जन नानक मेलि लए गलि लाई ॥४॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 493) गूजरी महला ४ ॥
गुरमुखि सखी सहेली मेरी मो कउ देवहु दानु हरि प्रान जीवाइआ ॥ हम होवह लाले गोले गुरसिखा के जिन्हा अनदिनु हरि प्रभु पुरखु धिआइआ ॥१॥

मेरै मनि तनि बिरहु गुरसिख पग लाइआ ॥ मेरे प्रान सखा गुर के सिख भाई मो कउ करहु उपदेसु हरि मिलै मिलाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

जा हरि प्रभ भावै ता गुरमुखि मेले जिन्ह वचन गुरू सतिगुर मनि भाइआ ॥ वडभागी गुर के सिख पिआरे हरि निरबाणी निरबाण पदु पाइआ ॥२॥

सतसंगति गुर की हरि पिआरी जिन हरि हरि नामु मीठा मनि भाइआ ॥ जिन सतिगुर संगति संगु न पाइआ से भागहीण पापी जमि खाइआ ॥३॥

आपि क्रिपालु क्रिपा प्रभु धारे हरि आपे गुरमुखि मिलै मिलाइआ ॥ जनु नानकु बोले गुण बाणी गुरबाणी हरि नामि समाइआ ॥४॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 494) गूजरी महला ४ ॥
जिन सतिगुरु पुरखु जिनि हरि प्रभु पाइआ मो कउ करि उपदेसु हरि मीठ लगावै ॥ मनु तनु सीतलु सभ हरिआ होआ वडभागी हरि नामु धिआवै ॥१॥

भाई रे मो कउ कोई आइ मिलै हरि नामु द्रिड़ावै ॥ मेरे प्रीतम प्रान मनु तनु सभु देवा मेरे हरि प्रभ की हरि कथा सुनावै ॥१॥ रहाउ ॥

धीरजु धरमु गुरमति हरि पाइआ नित हरि नामै हरि सिउ चितु लावै ॥ अम्रित बचन सतिगुर की बाणी जो बोलै सो मुखि अम्रितु पावै ॥२॥

निरमलु नामु जितु मैलु न लागै गुरमति नामु जपै लिव लावै ॥ नामु पदारथु जिन नर नही पाइआ से भागहीण मुए मरि जावै ॥३॥

आनद मूलु जगजीवन दाता सभ जन कउ अनदु करहु हरि धिआवै ॥ तूं दाता जीअ सभि तेरे जन नानक गुरमुखि बखसि मिलावै ॥४॥६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 494) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गूजरी महला ४ घरु ३ ॥
माई बाप पुत्र सभि हरि के कीए ॥ सभना कउ सनबंधु हरि करि दीए ॥१॥

हमरा जोरु सभु रहिओ मेरे बीर ॥ हरि का तनु मनु सभु हरि कै वसि है सरीर ॥१॥ रहाउ ॥

भगत जना कउ सरधा आपि हरि लाई ॥ विचे ग्रिसत उदास रहाई ॥२॥

जब अंतरि प्रीति हरि सिउ बनि आई ॥ तब जो किछु करे सु मेरे हरि प्रभ भाई ॥३॥

जितु कारै कमि हम हरि लाए ॥ सो हम करह जु आपि कराए ॥४॥

जिन की भगति मेरे प्रभ भाई ॥ ते जन नानक राम नाम लिव लाई ॥५॥१॥७॥१६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 495) गूजरी महला ५ चउपदे घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
काहे रे मन चितवहि उदमु जा आहरि हरि जीउ परिआ ॥ सैल पथर महि जंत उपाए ता का रिजकु आगै करि धरिआ ॥१॥

मेरे माधउ जी सतसंगति मिले सि तरिआ ॥ गुर परसादि परम पदु पाइआ सूके कासट हरिआ ॥१॥ रहाउ ॥

जननि पिता लोक सुत बनिता कोइ न किस की धरिआ ॥ सिरि सिरि रिजकु स्मबाहे ठाकुरु काहे मन भउ करिआ ॥२॥

ऊडै ऊडि आवै सै कोसा तिसु पाछै बचरे छरिआ ॥ उन कवनु खलावै कवनु चुगावै मन महि सिमरनु करिआ ॥३॥

सभ निधान दस असट सिधान ठाकुर कर तल धरिआ ॥ जन नानक बलि बलि सद बलि जाईऐ तेरा अंतु न पारावरिआ ॥४॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 495) गूजरी महला ५ चउपदे घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किरिआचार करहि खटु करमा इतु राते संसारी ॥ अंतरि मैलु न उतरै हउमै बिनु गुर बाजी हारी ॥१॥

मेरे ठाकुर रखि लेवहु किरपा धारी ॥ कोटि मधे को विरला सेवकु होरि सगले बिउहारी ॥१॥ रहाउ ॥

सासत बेद सिम्रिति सभि सोधे सभ एका बात पुकारी ॥ बिनु गुर मुकति न कोऊ पावै मनि वेखहु करि बीचारी ॥२॥

अठसठि मजनु करि इसनाना भ्रमि आए धर सारी ॥ अनिक सोच करहि दिन राती बिनु सतिगुर अंधिआरी ॥३॥

धावत धावत सभु जगु धाइओ अब आए हरि दुआरी ॥ दुरमति मेटि बुधि परगासी जन नानक गुरमुखि तारी ॥४॥१॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 495) गूजरी महला ५ ॥
हरि धनु जाप हरि धनु ताप हरि धनु भोजनु भाइआ ॥ निमख न बिसरउ मन ते हरि हरि साधसंगति महि पाइआ ॥१॥

माई खाटि आइओ घरि पूता ॥ हरि धनु चलते हरि धनु बैसे हरि धनु जागत सूता ॥१॥ रहाउ ॥

हरि धनु इसनानु हरि धनु गिआनु हरि संगि लाइ धिआना ॥ हरि धनु तुलहा हरि धनु बेड़ी हरि हरि तारि पराना ॥२॥

हरि धन मेरी चिंत विसारी हरि धनि लाहिआ धोखा ॥ हरि धन ते मै नव निधि पाई हाथि चरिओ हरि थोका ॥३॥

खावहु खरचहु तोटि न आवै हलत पलत कै संगे ॥ लादि खजाना गुरि नानक कउ दीआ इहु मनु हरि रंगि रंगे ॥४॥२॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 496) गूजरी महला ५ ॥
जिसु सिमरत सभि किलविख नासहि पितरी होइ उधारो ॥ सो हरि हरि तुम्ह सद ही जापहु जा का अंतु न पारो ॥१॥

पूता माता की आसीस ॥ निमख न बिसरउ तुम्ह कउ हरि हरि सदा भजहु जगदीस ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुरु तुम्ह कउ होइ दइआला संतसंगि तेरी प्रीति ॥ कापड़ु पति परमेसरु राखी भोजनु कीरतनु नीति ॥२॥

अम्रितु पीवहु सदा चिरु जीवहु हरि सिमरत अनद अनंता ॥ रंग तमासा पूरन आसा कबहि न बिआपै चिंता ॥३॥

भवरु तुम्हारा इहु मनु होवउ हरि चरणा होहु कउला ॥ नानक दासु उन संगि लपटाइओ जिउ बूंदहि चात्रिकु मउला ॥४॥३॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 496) गूजरी महला ५ ॥
मता करै पछम कै ताई पूरब ही लै जात ॥ खिन महि थापि उथापनहारा आपन हाथि मतात ॥१॥

सिआनप काहू कामि न आत ॥ जो अनरूपिओ ठाकुरि मेरै होइ रही उह बात ॥१॥ रहाउ ॥

देसु कमावन धन जोरन की मनसा बीचे निकसे सास ॥ लसकर नेब खवास सभ तिआगे जम पुरि ऊठि सिधास ॥२॥

होइ अनंनि मनहठ की द्रिड़ता आपस कउ जानात ॥ जो अनिंदु निंदु करि छोडिओ सोई फिरि फिरि खात ॥३॥

सहज सुभाइ भए किरपाला तिसु जन की काटी फास ॥ कहु नानक गुरु पूरा भेटिआ परवाणु गिरसत उदास ॥४॥४॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 496) गूजरी महला ५ ॥
नामु निधानु जिनि जनि जपिओ तिन के बंधन काटे ॥ काम क्रोध माइआ बिखु ममता इह बिआधि ते हाटे ॥१॥

हरि जसु साधसंगि मिलि गाइओ ॥ गुर परसादि भइओ मनु निरमलु सरब सुखा सुख पाइअउ ॥१॥ रहाउ ॥

जो किछु कीओ सोई भल मानै ऐसी भगति कमानी ॥ मित्र सत्रु सभ एक समाने जोग जुगति नीसानी ॥२॥

पूरन पूरि रहिओ स्रब थाई आन न कतहूं जाता ॥ घट घट अंतरि सरब निरंतरि रंगि रविओ रंगि राता ॥३॥

भए क्रिपाल दइआल गुपाला ता निरभै कै घरि आइआ ॥ कलि कलेस मिटे खिन भीतरि नानक सहजि समाइआ ॥४॥५॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 497) गूजरी महला ५ ॥
जिसु मानुख पहि करउ बेनती सो अपनै दुखि भरिआ ॥ पारब्रहमु जिनि रिदै अराधिआ तिनि भउ सागरु तरिआ ॥१॥

गुर हरि बिनु को न ब्रिथा दुखु काटै ॥ प्रभु तजि अवर सेवकु जे होई है तितु मानु महतु जसु घाटै ॥१॥ रहाउ ॥

माइआ के सनबंध सैन साक कित ही कामि न आइआ ॥ हरि का दासु नीच कुलु ऊचा तिसु संगि मन बांछत फल पाइआ ॥२॥

लाख कोटि बिखिआ के बिंजन ता महि त्रिसन न बूझी ॥ सिमरत नामु कोटि उजीआरा बसतु अगोचर सूझी ॥३॥

फिरत फिरत तुम्हरै दुआरि आइआ भै भंजन हरि राइआ ॥ साध के चरन धूरि जनु बाछै सुखु नानक इहु पाइआ ॥४॥६॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 497) गूजरी महला ५ पंचपदा घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
प्रथमे गरभ माता कै वासा ऊहा छोडि धरनि महि आइआ ॥ चित्र साल सुंदर बाग मंदर संगि न कछहू जाइआ ॥१॥

अवर सभ मिथिआ लोभ लबी ॥ गुरि पूरै दीओ हरि नामा जीअ कउ एहा वसतु फबी ॥१॥ रहाउ ॥

इसट मीत बंधप सुत भाई संगि बनिता रचि हसिआ ॥ जब अंती अउसरु आइ बनिओ है उन्ह पेखत ही कालि ग्रसिआ ॥२॥

करि करि अनरथ बिहाझी स्मपै सुइना रूपा दामा ॥ भाड़ी कउ ओहु भाड़ा मिलिआ होरु सगल भइओ बिराना ॥३॥

हैवर गैवर रथ स्मबाहे गहु करि कीने मेरे ॥ जब ते होई लांमी धाई चलहि नाही इक पैरे ॥४॥

नामु धनु नामु सुख राजा नामु कुट्मब सहाई ॥ नामु स्मपति गुरि नानक कउ दीई ओह मरै न आवै जाई ॥५॥१॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 497) गूजरी महला ५ तिपदे घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुख बिनसे सुख कीआ निवासा त्रिसना जलनि बुझाई ॥ नामु निधानु सतिगुरू द्रिड़ाइआ बिनसि न आवै जाई ॥१॥

हरि जपि माइआ बंधन तूटे ॥ भए क्रिपाल दइआल प्रभ मेरे साधसंगति मिलि छूटे ॥१॥ रहाउ ॥

आठ पहर हरि के गुन गावै भगति प्रेम रसि माता ॥ हरख सोग दुहु माहि निराला करणैहारु पछाता ॥२॥

जिस का सा तिन ही रखि लीआ सगल जुगति बणि आई ॥ कहु नानक प्रभ पुरख दइआला कीमति कहणु न जाई ॥३॥१॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 498) गूजरी महला ५ दुपदे घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पतित पवित्र लीए करि अपुने सगल करत नमसकारो ॥ बरनु जाति कोऊ पूछै नाही बाछहि चरन रवारो ॥१॥

ठाकुर ऐसो नामु तुम्हारो ॥ सगल स्रिसटि को धणी कहीजै जन को अंगु निरारो ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगि नानक बुधि पाई हरि कीरतनु आधारो ॥ नामदेउ त्रिलोचनु कबीर दासरो मुकति भइओ चमिआरो ॥२॥१॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 498) गूजरी महला ५ ॥
है नाही कोऊ बूझनहारो जानै कवनु भता ॥ सिव बिरंचि अरु सगल मोनि जन गहि न सकाहि गता ॥१॥

प्रभ की अगम अगाधि कथा ॥ सुनीऐ अवर अवर बिधि बुझीऐ बकन कथन रहता ॥१॥ रहाउ ॥

आपे भगता आपि सुआमी आपन संगि रता ॥ नानक को प्रभु पूरि रहिओ है पेखिओ जत्र कता ॥२॥२॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 498) गूजरी महला ५ ॥
मता मसूरति अवर सिआनप जन कउ कछू न आइओ ॥ जह जह अउसरु आइ बनिओ है तहा तहा हरि धिआइओ ॥१॥

प्रभ को भगति वछलु बिरदाइओ ॥ करे प्रतिपाल बारिक की निआई जन कउ लाड लडाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

जप तप संजम करम धरम हरि कीरतनु जनि गाइओ ॥ सरनि परिओ नानक ठाकुर की अभै दानु सुखु पाइओ ॥२॥३॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 498) गूजरी महला ५ ॥
दिनु राती आराधहु पिआरो निमख न कीजै ढीला ॥ संत सेवा करि भावनी लाईऐ तिआगि मानु हाठीला ॥१॥

मोहनु प्रान मान रागीला ॥ बासि रहिओ हीअरे कै संगे पेखि मोहिओ मनु लीला ॥१॥ रहाउ ॥

जिसु सिमरत मनि होत अनंदा उतरै मनहु जंगीला ॥ मिलबे की महिमा बरनि न साकउ नानक परै परीला ॥२॥४॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 498) गूजरी महला ५ ॥
मुनि जोगी सासत्रगि कहावत सभ कीन्हे बसि अपनही ॥ तीनि देव अरु कोड़ि तेतीसा तिन की हैरति कछु न रही ॥१॥

बलवंति बिआपि रही सभ मही ॥ अवरु न जानसि कोऊ मरमा गुर किरपा ते लही ॥१॥ रहाउ ॥

जीति जीति जीते सभि थाना सगल भवन लपटही ॥ कहु नानक साध ते भागी होइ चेरी चरन गही ॥२॥५॥१४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 499) गूजरी महला ५ ॥
दुइ कर जोड़ि करी बेनंती ठाकुरु अपना धिआइआ ॥ हाथ देइ राखे परमेसरि सगला दुरतु मिटाइआ ॥१॥

ठाकुर होए आपि दइआल ॥ भई कलिआण आनंद रूप हुई है उबरे बाल गुपाल ॥१॥ रहाउ ॥

मिलि वर नारी मंगलु गाइआ ठाकुर का जैकारु ॥ कहु नानक तिसु गुर बलिहारी जिनि सभ का कीआ उधारु ॥२॥६॥१५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 499) गूजरी महला ५ ॥
मात पिता भाई सुत बंधप तिन का बलु है थोरा ॥ अनिक रंग माइआ के पेखे किछु साथि न चालै भोरा ॥१॥

ठाकुर तुझ बिनु आहि न मोरा ॥ मोहि अनाथ निरगुन गुणु नाही मै आहिओ तुम्हरा धोरा ॥१॥ रहाउ ॥

बलि बलि बलि बलि चरण तुम्हारे ईहा ऊहा तुम्हारा जोरा ॥ साधसंगि नानक दरसु पाइओ बिनसिओ सगल निहोरा ॥२॥७॥१६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 499) गूजरी महला ५ ॥
आल जाल भ्रम मोह तजावै प्रभ सेती रंगु लाई ॥ मन कउ इह उपदेसु द्रिड़ावै सहजि सहजि गुण गाई ॥१॥

साजन ऐसो संतु सहाई ॥ जिसु भेटे तूटहि माइआ बंध बिसरि न कबहूं जाई ॥१॥ रहाउ ॥

करत करत अनिक बहु भाती नीकी इह ठहराई ॥ मिलि साधू हरि जसु गावै नानक भवजलु पारि पराई ॥२॥८॥१७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 499) गूजरी महला ५ ॥
खिन महि थापि उथापनहारा कीमति जाइ न करी ॥ राजा रंकु करै खिन भीतरि नीचह जोति धरी ॥१॥

धिआईऐ अपनो सदा हरी ॥ सोच अंदेसा ता का कहा करीऐ जा महि एक घरी ॥१॥ रहाउ ॥

तुम्हरी टेक पूरे मेरे सतिगुर मन सरनि तुम्हारै परी ॥ अचेत इआने बारिक नानक हम तुम राखहु धारि करी ॥२॥९॥१८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 499) गूजरी महला ५ ॥
तूं दाता जीआ सभना का बसहु मेरे मन माही ॥ चरण कमल रिद माहि समाए तह भरमु अंधेरा नाही ॥१॥

ठाकुर जा सिमरा तूं ताही ॥ करि किरपा सरब प्रतिपालक प्रभ कउ सदा सलाही ॥१॥ रहाउ ॥

सासि सासि तेरा नामु समारउ तुम ही कउ प्रभ आही ॥ नानक टेक भई करते की होर आस बिडाणी लाही ॥२॥१०॥१९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 500) गूजरी महला ५ ॥
करि किरपा अपना दरसु दीजै जसु गावउ निसि अरु भोर ॥ केस संगि दास पग झारउ इहै मनोरथ मोर ॥१॥

ठाकुर तुझ बिनु बीआ न होर ॥ चिति चितवउ हरि रसन अराधउ निरखउ तुमरी ओर ॥१॥ रहाउ ॥

दइआल पुरख सरब के ठाकुर बिनउ करउ कर जोरि ॥ नामु जपै नानकु दासु तुमरो उधरसि आखी फोर ॥२॥११॥२०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 500) गूजरी महला ५ ॥
ब्रहम लोक अरु रुद्र लोक आई इंद्र लोक ते धाइ ॥ साधसंगति कउ जोहि न साकै मलि मलि धोवै पाइ ॥१॥

अब मोहि आइ परिओ सरनाइ ॥ गुहज पावको बहुतु प्रजारै मो कउ सतिगुरि दीओ है बताइ ॥१॥ रहाउ ॥

सिध साधिक अरु जख्य किंनर नर रही कंठि उरझाइ ॥ जन नानक अंगु कीआ प्रभि करतै जा कै कोटि ऐसी दासाइ ॥२॥१२॥२१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 500) गूजरी महला ५ ॥
अपजसु मिटै होवै जगि कीरति दरगह बैसणु पाईऐ ॥ जम की त्रास नास होइ खिन महि सुख अनद सेती घरि जाईऐ ॥१॥

जा ते घाल न बिरथी जाईऐ ॥ आठ पहर सिमरहु प्रभु अपना मनि तनि सदा धिआईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

मोहि सरनि दीन दुख भंजन तूं देहि सोई प्रभ पाईऐ ॥ चरण कमल नानक रंगि राते हरि दासह पैज रखाईऐ ॥२॥१३॥२२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 500) गूजरी महला ५ ॥
बिस्व्मभर जीअन को दाता भगति भरे भंडार ॥ जा की सेवा निफल न होवत खिन महि करे उधार ॥१॥

मन मेरे चरन कमल संगि राचु ॥ सगल जीअ जा कउ आराधहि ताहू कउ तूं जाचु ॥१॥ रहाउ ॥

नानक सरणि तुम्हारी करते तूं प्रभ प्रान अधार ॥ होइ सहाई जिसु तूं राखहि तिसु कहा करे संसारु ॥२॥१४॥२३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 500) गूजरी महला ५ ॥
जन की पैज सवारी आप ॥ हरि हरि नामु दीओ गुरि अवखधु उतरि गइओ सभु ताप ॥१॥ रहाउ ॥

हरिगोबिंदु रखिओ परमेसरि अपुनी किरपा धारि ॥ मिटी बिआधि सरब सुख होए हरि गुण सदा बीचारि ॥१॥

अंगीकारु कीओ मेरै करतै गुर पूरे की वडिआई ॥ अबिचल नीव धरी गुर नानक नित नित चड़ै सवाई ॥२॥१५॥२४॥


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