राग गोंड - बाणी शब्द, Raag Gond - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू रामदास जी -- SGGS 859) ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
रागु गोंड चउपदे महला ४ घरु १ ॥
जे मनि चिति आस रखहि हरि ऊपरि ता मन चिंदे अनेक अनेक फल पाई ॥ हरि जाणै सभु किछु जो जीइ वरतै प्रभु घालिआ किसै का इकु तिलु न गवाई ॥ हरि तिस की आस कीजै मन मेरे जो सभ महि सुआमी रहिआ समाई ॥१॥

मेरे मन आसा करि जगदीस गुसाई ॥ जो बिनु हरि आस अवर काहू की कीजै सा निहफल आस सभ बिरथी जाई ॥१॥ रहाउ ॥

जो दीसै माइआ मोह कुट्मबु सभु मत तिस की आस लगि जनमु गवाई ॥ इन्ह कै किछु हाथि नही कहा करहि इहि बपुड़े इन्ह का वाहिआ कछु न वसाई ॥ मेरे मन आस करि हरि प्रीतम अपुने की जो तुझु तारै तेरा कुट्मबु सभु छडाई ॥२॥

जे किछु आस अवर करहि परमित्री मत तूं जाणहि तेरै कितै कमि आई ॥ इह आस परमित्री भाउ दूजा है खिन महि झूठु बिनसि सभ जाई ॥ मेरे मन आसा करि हरि प्रीतम साचे की जो तेरा घालिआ सभु थाइ पाई ॥३॥

आसा मनसा सभ तेरी मेरे सुआमी जैसी तू आस करावहि तैसी को आस कराई ॥ किछु किसी कै हथि नाही मेरे सुआमी ऐसी मेरै सतिगुरि बूझ बुझाई ॥ जन नानक की आस तू जाणहि हरि दरसनु देखि हरि दरसनि त्रिपताई ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 860) गोंड महला ४ ॥
ऐसा हरि सेवीऐ नित धिआईऐ जो खिन महि किलविख सभि करे बिनासा ॥ जे हरि तिआगि अवर की आस कीजै ता हरि निहफल सभ घाल गवासा ॥ मेरे मन हरि सेविहु सुखदाता सुआमी जिसु सेविऐ सभ भुख लहासा ॥१॥

मेरे मन हरि ऊपरि कीजै भरवासा ॥ जह जाईऐ तह नालि मेरा सुआमी हरि अपनी पैज रखै जन दासा ॥१॥ रहाउ ॥

जे अपनी बिरथा कहहु अवरा पहि ता आगै अपनी बिरथा बहु बहुतु कढासा ॥ अपनी बिरथा कहहु हरि अपुने सुआमी पहि जो तुम्हरे दूख ततकाल कटासा ॥ सो ऐसा प्रभु छोडि अपनी बिरथा अवरा पहि कहीऐ अवरा पहि कहि मन लाज मरासा ॥२॥

जो संसारै के कुट्मब मित्र भाई दीसहि मन मेरे ते सभि अपनै सुआइ मिलासा ॥ जितु दिनि उन्ह का सुआउ होइ न आवै तितु दिनि नेड़ै को न ढुकासा ॥ मन मेरे अपना हरि सेवि दिनु राती जो तुधु उपकरै दूखि सुखासा ॥३॥

तिस का भरवासा किउ कीजै मन मेरे जो अंती अउसरि रखि न सकासा ॥ हरि जपु मंतु गुर उपदेसु लै जापहु तिन्ह अंति छडाए जिन्ह हरि प्रीति चितासा ॥ जन नानक अनदिनु नामु जपहु हरि संतहु इहु छूटण का साचा भरवासा ॥४॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 860) गोंड महला ४ ॥
हरि सिमरत सदा होइ अनंदु सुखु अंतरि सांति सीतल मनु अपना ॥ जैसे सकति सूरु बहु जलता गुर ससि देखे लहि जाइ सभ तपना ॥१॥

मेरे मन अनदिनु धिआइ नामु हरि जपना ॥ जहा कहा तुझु राखै सभ ठाई सो ऐसा प्रभु सेवि सदा तू अपना ॥१॥ रहाउ ॥

जा महि सभि निधान सो हरि जपि मन मेरे गुरमुखि खोजि लहहु हरि रतना ॥ जिन हरि धिआइआ तिन हरि पाइआ मेरा सुआमी तिन के चरण मलहु हरि दसना ॥२॥

सबदु पछाणि राम रसु पावहु ओहु ऊतमु संतु भइओ बड बडना ॥ तिसु जन की वडिआई हरि आपि वधाई ओहु घटै न किसै की घटाई इकु तिलु तिलु तिलना ॥३॥

जिस ते सुख पावहि मन मेरे सो सदा धिआइ नित कर जुरना ॥ जन नानक कउ हरि दानु इकु दीजै नित बसहि रिदै हरी मोहि चरना ॥४॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 861) गोंड महला ४ ॥
जितने साह पातिसाह उमराव सिकदार चउधरी सभि मिथिआ झूठु भाउ दूजा जाणु ॥ हरि अबिनासी सदा थिरु निहचलु तिसु मेरे मन भजु परवाणु ॥१॥

मेरे मन नामु हरी भजु सदा दीबाणु ॥ जो हरि महलु पावै गुर बचनी तिसु जेवडु अवरु नाही किसै दा ताणु ॥१॥ रहाउ ॥

जितने धनवंत कुलवंत मिलखवंत दीसहि मन मेरे सभि बिनसि जाहि जिउ रंगु कसु्मभ कचाणु ॥ हरि सति निरंजनु सदा सेवि मन मेरे जितु हरि दरगह पावहि तू माणु ॥२॥

ब्राहमणु खत्री सूद वैस चारि वरन चारि आस्रम हहि जो हरि धिआवै सो परधानु ॥ जिउ चंदन निकटि वसै हिरडु बपुड़ा तिउ सतसंगति मिलि पतित परवाणु ॥३॥

ओहु सभ ते ऊचा सभ ते सूचा जा कै हिरदै वसिआ भगवानु ॥ जन नानकु तिस के चरन पखालै जो हरि जनु नीचु जाति सेवकाणु ॥४॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 861) गोंड महला ४ ॥
हरि अंतरजामी सभतै वरतै जेहा हरि कराए तेहा को करईऐ ॥ सो ऐसा हरि सेवि सदा मन मेरे जो तुधनो सभ दू रखि लईऐ ॥१॥

मेरे मन हरि जपि हरि नित पड़ईऐ ॥ हरि बिनु को मारि जीवालि न साकै ता मेरे मन काइतु कड़ईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि परपंचु कीआ सभु करतै विचि आपे आपणी जोति धरईऐ ॥ हरि एको बोलै हरि एकु बुलाए गुरि पूरै हरि एकु दिखईऐ ॥२॥

हरि अंतरि नाले बाहरि नाले कहु तिसु पासहु मन किआ चोरईऐ ॥ निहकपट सेवा कीजै हरि केरी तां मेरे मन सरब सुख पईऐ ॥३॥

जिस दै वसि सभु किछु सो सभ दू वडा सो मेरे मन सदा धिअईऐ ॥ जन नानक सो हरि नालि है तेरै हरि सदा धिआइ तू तुधु लए छडईऐ ॥४॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 861) गोंड महला ४ ॥
हरि दरसन कउ मेरा मनु बहु तपतै जिउ त्रिखावंतु बिनु नीर ॥१॥

मेरै मनि प्रेमु लगो हरि तीर ॥ हमरी बेदन हरि प्रभु जानै मेरे मन अंतर की पीर ॥१॥ रहाउ ॥

मेरे हरि प्रीतम की कोई बात सुनावै सो भाई सो मेरा बीर ॥२॥

मिलु मिलु सखी गुण कहु मेरे प्रभ के ले सतिगुर की मति धीर ॥३॥

जन नानक की हरि आस पुजावहु हरि दरसनि सांति सरीर ॥४॥६॥ छका १ ॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 862) रागु गोंड महला ५ चउपदे घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सभु करता सभु भुगता ॥१॥ रहाउ ॥

सुनतो करता पेखत करता ॥ अद्रिसटो करता द्रिसटो करता ॥ ओपति करता परलउ करता ॥ बिआपत करता अलिपतो करता ॥१॥

बकतो करता बूझत करता ॥ आवतु करता जातु भी करता ॥ निरगुन करता सरगुन करता ॥ गुर प्रसादि नानक समद्रिसटा ॥२॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 862) गोंड महला ५ ॥
फाकिओ मीन कपिक की निआई तू उरझि रहिओ कुस्मभाइले ॥ पग धारहि सासु लेखै लै तउ उधरहि हरि गुण गाइले ॥१॥

मन समझु छोडि आवाइले ॥ अपने रहन कउ ठउरु न पावहि काए पर कै जाइले ॥१॥ रहाउ ॥

जिउ मैगलु इंद्री रसि प्रेरिओ तू लागि परिओ कुट्मबाइले ॥ जिउ पंखी इकत्र होइ फिरि बिछुरै थिरु संगति हरि हरि धिआइले ॥२॥

जैसे मीनु रसन सादि बिनसिओ ओहु मूठौ मूड़ लोभाइले ॥ तू होआ पंच वासि वैरी कै छूटहि परु सरनाइले ॥३॥

होहु क्रिपाल दीन दुख भंजन सभि तुम्हरे जीअ जंताइले ॥ पावउ दानु सदा दरसु पेखा मिलु नानक दास दसाइले ॥४॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 862) रागु गोंड महला ५ चउपदे घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जीअ प्रान कीए जिनि साजि ॥ माटी महि जोति रखी निवाजि ॥ बरतन कउ सभु किछु भोजन भोगाइ ॥ सो प्रभु तजि मूड़े कत जाइ ॥१॥

पारब्रहम की लागउ सेव ॥ गुर ते सुझै निरंजन देव ॥१॥ रहाउ ॥

जिनि कीए रंग अनिक परकार ॥ ओपति परलउ निमख मझार ॥ जा की गति मिति कही न जाइ ॥ सो प्रभु मन मेरे सदा धिआइ ॥२॥

आइ न जावै निहचलु धनी ॥ बेअंत गुना ता के केतक गनी ॥ लाल नाम जा कै भरे भंडार ॥ सगल घटा देवै आधार ॥३॥

सति पुरखु जा को है नाउ ॥ मिटहि कोटि अघ निमख जसु गाउ ॥ बाल सखाई भगतन को मीत ॥ प्रान अधार नानक हित चीत ॥४॥१॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 863) गोंड महला ५ ॥
नाम संगि कीनो बिउहारु ॥ नामो ही इसु मन का अधारु ॥ नामो ही चिति कीनी ओट ॥ नामु जपत मिटहि पाप कोटि ॥१॥

रासि दीई हरि एको नामु ॥ मन का इसटु गुर संगि धिआनु ॥१॥ रहाउ ॥

नामु हमारे जीअ की रासि ॥ नामो संगी जत कत जात ॥ नामो ही मनि लागा मीठा ॥ जलि थलि सभ महि नामो डीठा ॥२॥

नामे दरगह मुख उजले ॥ नामे सगले कुल उधरे ॥ नामि हमारे कारज सीध ॥ नाम संगि इहु मनूआ गीध ॥३॥

नामे ही हम निरभउ भए ॥ नामे आवन जावन रहे ॥ गुरि पूरै मेले गुणतास ॥ कहु नानक सुखि सहजि निवासु ॥४॥२॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 863) गोंड महला ५ ॥
निमाने कउ जो देतो मानु ॥ सगल भूखे कउ करता दानु ॥ गरभ घोर महि राखनहारु ॥ तिसु ठाकुर कउ सदा नमसकारु ॥१॥

ऐसो प्रभु मन माहि धिआइ ॥ घटि अवघटि जत कतहि सहाइ ॥१॥ रहाउ ॥

रंकु राउ जा कै एक समानि ॥ कीट हसति सगल पूरान ॥ बीओ पूछि न मसलति धरै ॥ जो किछु करै सु आपहि करै ॥२॥

जा का अंतु न जानसि कोइ ॥ आपे आपि निरंजनु सोइ ॥ आपि अकारु आपि निरंकारु ॥ घट घट घटि सभ घट आधारु ॥३॥

नाम रंगि भगत भए लाल ॥ जसु करते संत सदा निहाल ॥ नाम रंगि जन रहे अघाइ ॥ नानक तिन जन लागै पाइ ॥४॥३॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 863) गोंड महला ५ ॥
जा कै संगि इहु मनु निरमलु ॥ जा कै संगि हरि हरि सिमरनु ॥ जा कै संगि किलबिख होहि नास ॥ जा कै संगि रिदै परगास ॥१॥

से संतन हरि के मेरे मीत ॥ केवल नामु गाईऐ जा कै नीत ॥१॥ रहाउ ॥

जा कै मंत्रि हरि हरि मनि वसै ॥ जा कै उपदेसि भरमु भउ नसै ॥ जा कै कीरति निरमल सार ॥ जा की रेनु बांछै संसार ॥२॥

कोटि पतित जा कै संगि उधार ॥ एकु निरंकारु जा कै नाम अधार ॥ सरब जीआं का जानै भेउ ॥ क्रिपा निधान निरंजन देउ ॥३॥

पारब्रहम जब भए क्रिपाल ॥ तब भेटे गुर साध दइआल ॥ दिनु रैणि नानकु नामु धिआए ॥ सूख सहज आनंद हरि नाए ॥४॥४॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 864) गोंड महला ५ ॥
गुर की मूरति मन महि धिआनु ॥ गुर कै सबदि मंत्रु मनु मान ॥ गुर के चरन रिदै लै धारउ ॥ गुरु पारब्रहमु सदा नमसकारउ ॥१॥

मत को भरमि भुलै संसारि ॥ गुर बिनु कोइ न उतरसि पारि ॥१॥ रहाउ ॥

भूले कउ गुरि मारगि पाइआ ॥ अवर तिआगि हरि भगती लाइआ ॥ जनम मरन की त्रास मिटाई ॥ गुर पूरे की बेअंत वडाई ॥२॥

गुर प्रसादि ऊरध कमल बिगास ॥ अंधकार महि भइआ प्रगास ॥ जिनि कीआ सो गुर ते जानिआ ॥ गुर किरपा ते मुगध मनु मानिआ ॥३॥

गुरु करता गुरु करणै जोगु ॥ गुरु परमेसरु है भी होगु ॥ कहु नानक प्रभि इहै जनाई ॥ बिनु गुर मुकति न पाईऐ भाई ॥४॥५॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 864) गोंड महला ५ ॥
गुरू गुरू गुरु करि मन मोर ॥ गुरू बिना मै नाही होर ॥ गुर की टेक रहहु दिनु राति ॥ जा की कोइ न मेटै दाति ॥१॥

गुरु परमेसरु एको जाणु ॥ जो तिसु भावै सो परवाणु ॥१॥ रहाउ ॥

गुर चरणी जा का मनु लागै ॥ दूखु दरदु भ्रमु ता का भागै ॥ गुर की सेवा पाए मानु ॥ गुर ऊपरि सदा कुरबानु ॥२॥

गुर का दरसनु देखि निहाल ॥ गुर के सेवक की पूरन घाल ॥ गुर के सेवक कउ दुखु न बिआपै ॥ गुर का सेवकु दह दिसि जापै ॥३॥

गुर की महिमा कथनु न जाइ ॥ पारब्रहमु गुरु रहिआ समाइ ॥ कहु नानक जा के पूरे भाग ॥ गुर चरणी ता का मनु लाग ॥४॥६॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 864) गोंड महला ५ ॥
गुरु मेरी पूजा गुरु गोबिंदु ॥ गुरु मेरा पारब्रहमु गुरु भगवंतु ॥ गुरु मेरा देउ अलख अभेउ ॥ सरब पूज चरन गुर सेउ ॥१॥

गुर बिनु अवरु नाही मै थाउ ॥ अनदिनु जपउ गुरू गुर नाउ ॥१॥ रहाउ ॥

गुरु मेरा गिआनु गुरु रिदै धिआनु ॥ गुरु गोपालु पुरखु भगवानु ॥ गुर की सरणि रहउ कर जोरि ॥ गुरू बिना मै नाही होरु ॥२॥

गुरु बोहिथु तारे भव पारि ॥ गुर सेवा जम ते छुटकारि ॥ अंधकार महि गुर मंत्रु उजारा ॥ गुर कै संगि सगल निसतारा ॥३॥

गुरु पूरा पाईऐ वडभागी ॥ गुर की सेवा दूखु न लागी ॥ गुर का सबदु न मेटै कोइ ॥ गुरु नानकु नानकु हरि सोइ ॥४॥७॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 865) गोंड महला ५ ॥
राम राम संगि करि बिउहार ॥ राम राम राम प्रान अधार ॥ राम राम राम कीरतनु गाइ ॥ रमत रामु सभ रहिओ समाइ ॥१॥

संत जना मिलि बोलहु राम ॥ सभ ते निरमल पूरन काम ॥१॥ रहाउ ॥

राम राम धनु संचि भंडार ॥ राम राम राम करि आहार ॥ राम राम वीसरि नही जाइ ॥ करि किरपा गुरि दीआ बताइ ॥२॥

राम राम राम सदा सहाइ ॥ राम राम राम लिव लाइ ॥ राम राम जपि निरमल भए ॥ जनम जनम के किलबिख गए ॥३॥

रमत राम जनम मरणु निवारै ॥ उचरत राम भै पारि उतारै ॥ सभ ते ऊच राम परगास ॥ निसि बासुर जपि नानक दास ॥४॥८॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 865) गोंड महला ५ ॥
उन कउ खसमि कीनी ठाकहारे ॥ दास संग ते मारि बिदारे ॥ गोबिंद भगत का महलु न पाइआ ॥ राम जना मिलि मंगलु गाइआ ॥१॥

सगल स्रिसटि के पंच सिकदार ॥ राम भगत के पानीहार ॥१॥ रहाउ ॥

जगत पास ते लेते दानु ॥ गोबिंद भगत कउ करहि सलामु ॥ लूटि लेहि साकत पति खोवहि ॥ साध जना पग मलि मलि धोवहि ॥२॥

पंच पूत जणे इक माइ ॥ उतभुज खेलु करि जगत विआइ ॥ तीनि गुणा कै संगि रचि रसे ॥ इन कउ छोडि ऊपरि जन बसे ॥३॥

करि किरपा जन लीए छडाइ ॥ जिस के से तिनि रखे हटाइ ॥ कहु नानक भगति प्रभ सारु ॥ बिनु भगती सभ होइ खुआरु ॥४॥९॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 865) गोंड महला ५ ॥
कलि कलेस मिटे हरि नाइ ॥ दुख बिनसे सुख कीनो ठाउ ॥ जपि जपि अम्रित नामु अघाए ॥ संत प्रसादि सगल फल पाए ॥१॥

राम जपत जन पारि परे ॥ जनम जनम के पाप हरे ॥१॥ रहाउ ॥

गुर के चरन रिदै उरि धारे ॥ अगनि सागर ते उतरे पारे ॥ जनम मरण सभ मिटी उपाधि ॥ प्रभ सिउ लागी सहजि समाधि ॥२॥

थान थनंतरि एको सुआमी ॥ सगल घटा का अंतरजामी ॥ करि किरपा जा कउ मति देइ ॥ आठ पहर प्रभ का नाउ लेइ ॥३॥

जा कै अंतरि वसै प्रभु आपि ॥ ता कै हिरदै होइ प्रगासु ॥ भगति भाइ हरि कीरतनु करीऐ ॥ जपि पारब्रहमु नानक निसतरीऐ ॥४॥१०॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 865) गोंड महला ५ ॥
गुर के चरन कमल नमसकारि ॥ कामु क्रोधु इसु तन ते मारि ॥ होइ रहीऐ सगल की रीना ॥ घटि घटि रमईआ सभ महि चीना ॥१॥

इन बिधि रमहु गोपाल गोबिंदु ॥ तनु धनु प्रभ का प्रभ की जिंदु ॥१॥ रहाउ ॥

आठ पहर हरि के गुण गाउ ॥ जीअ प्रान को इहै सुआउ ॥ तजि अभिमानु जानु प्रभु संगि ॥ साध प्रसादि हरि सिउ मनु रंगि ॥२॥

जिनि तूं कीआ तिस कउ जानु ॥ आगै दरगह पावै मानु ॥ मनु तनु निरमल होइ निहालु ॥ रसना नामु जपत गोपाल ॥३॥

करि किरपा मेरे दीन दइआला ॥ साधू की मनु मंगै रवाला ॥ होहु दइआल देहु प्रभ दानु ॥ नानकु जपि जीवै प्रभ नामु ॥४॥११॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 866) गोंड महला ५ ॥
धूप दीप सेवा गोपाल ॥ अनिक बार बंदन करतार ॥ प्रभ की सरणि गही सभ तिआगि ॥ गुर सुप्रसंन भए वड भागि ॥१॥

आठ पहर गाईऐ गोबिंदु ॥ तनु धनु प्रभ का प्रभ की जिंदु ॥१॥ रहाउ ॥

हरि गुण रमत भए आनंद ॥ पारब्रहम पूरन बखसंद ॥ करि किरपा जन सेवा लाए ॥ जनम मरण दुख मेटि मिलाए ॥२॥

करम धरम इहु ततु गिआनु ॥ साधसंगि जपीऐ हरि नामु ॥ सागर तरि बोहिथ प्रभ चरण ॥ अंतरजामी प्रभ कारण करण ॥३॥

राखि लीए अपनी किरपा धारि ॥ पंच दूत भागे बिकराल ॥ जूऐ जनमु न कबहू हारि ॥ नानक का अंगु कीआ करतारि ॥४॥१२॥१४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 866) गोंड महला ५ ॥
करि किरपा सुख अनद करेइ ॥ बालक राखि लीए गुरदेवि ॥ प्रभ किरपाल दइआल गोबिंद ॥ जीअ जंत सगले बखसिंद ॥१॥

तेरी सरणि प्रभ दीन दइआल ॥ पारब्रहम जपि सदा निहाल ॥१॥ रहाउ ॥

प्रभ दइआल दूसर कोई नाही ॥ घट घट अंतरि सरब समाही ॥ अपने दास का हलतु पलतु सवारै ॥ पतित पावन प्रभ बिरदु तुम्हारै ॥२॥

अउखध कोटि सिमरि गोबिंद ॥ तंतु मंतु भजीऐ भगवंत ॥ रोग सोग मिटे प्रभ धिआए ॥ मन बांछत पूरन फल पाए ॥३॥

करन कारन समरथ दइआर ॥ सरब निधान महा बीचार ॥ नानक बखसि लीए प्रभि आपि ॥ सदा सदा एको हरि जापि ॥४॥१३॥१५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 866) गोंड महला ५ ॥
हरि हरि नामु जपहु मेरे मीत ॥ निरमल होइ तुम्हारा चीत ॥ मन तन की सभ मिटै बलाइ ॥ दूखु अंधेरा सगला जाइ ॥१॥

हरि गुण गावत तरीऐ संसारु ॥ वड भागी पाईऐ पुरखु अपारु ॥१॥ रहाउ ॥

जो जनु करै कीरतनु गोपाल ॥ तिस कउ पोहि न सकै जमकालु ॥ जग महि आइआ सो परवाणु ॥ गुरमुखि अपना खसमु पछाणु ॥२॥

हरि गुण गावै संत प्रसादि ॥ काम क्रोध मिटहि उनमाद ॥ सदा हजूरि जाणु भगवंत ॥ पूरे गुर का पूरन मंत ॥३॥

हरि धनु खाटि कीए भंडार ॥ मिलि सतिगुर सभि काज सवार ॥ हरि के नाम रंग संगि जागा ॥ हरि चरणी नानक मनु लागा ॥४॥१४॥१६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 867) गोंड महला ५ ॥
भव सागर बोहिथ हरि चरण ॥ सिमरत नामु नाही फिरि मरण ॥ हरि गुण रमत नाही जम पंथ ॥ महा बीचार पंच दूतह मंथ ॥१॥

तउ सरणाई पूरन नाथ ॥ जंत अपने कउ दीजहि हाथ ॥१॥ रहाउ ॥

सिम्रिति सासत्र बेद पुराण ॥ पारब्रहम का करहि वखिआण ॥ जोगी जती बैसनो रामदास ॥ मिति नाही ब्रहम अबिनास ॥२॥

करण पलाह करहि सिव देव ॥ तिलु नही बूझहि अलख अभेव ॥ प्रेम भगति जिसु आपे देइ ॥ जग महि विरले केई केइ ॥३॥

मोहि निरगुण गुणु किछहू नाहि ॥ सरब निधान तेरी द्रिसटी माहि ॥ नानकु दीनु जाचै तेरी सेव ॥ करि किरपा दीजै गुरदेव ॥४॥१५॥१७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 867) गोंड महला ५ ॥
संत का लीआ धरति बिदारउ ॥ संत का निंदकु अकास ते टारउ ॥ संत कउ राखउ अपने जीअ नालि ॥ संत उधारउ ततखिण तालि ॥१॥

सोई संतु जि भावै राम ॥ संत गोबिंद कै एकै काम ॥१॥ रहाउ ॥

संत कै ऊपरि देइ प्रभु हाथ ॥ संत कै संगि बसै दिनु राति ॥ सासि सासि संतह प्रतिपालि ॥ संत का दोखी राज ते टालि ॥२॥

संत की निंदा करहु न कोइ ॥ जो निंदै तिस का पतनु होइ ॥ जिस कउ राखै सिरजनहारु ॥ झख मारउ सगल संसारु ॥३॥

प्रभ अपने का भइआ बिसासु ॥ जीउ पिंडु सभु तिस की रासि ॥ नानक कउ उपजी परतीति ॥ मनमुख हार गुरमुख सद जीति ॥४॥१६॥१८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 867) गोंड महला ५ ॥
नामु निरंजनु नीरि नराइण ॥ रसना सिमरत पाप बिलाइण ॥१॥ रहाउ ॥

नाराइण सभ माहि निवास ॥ नाराइण घटि घटि परगास ॥ नाराइण कहते नरकि न जाहि ॥ नाराइण सेवि सगल फल पाहि ॥१॥

नाराइण मन माहि अधार ॥ नाराइण बोहिथ संसार ॥ नाराइण कहत जमु भागि पलाइण ॥ नाराइण दंत भाने डाइण ॥२॥

नाराइण सद सद बखसिंद ॥ नाराइण कीने सूख अनंद ॥ नाराइण प्रगट कीनो परताप ॥ नाराइण संत को माई बाप ॥३॥

नाराइण साधसंगि नराइण ॥ बारं बार नराइण गाइण ॥ बसतु अगोचर गुर मिलि लही ॥ नाराइण ओट नानक दास गही ॥४॥१७॥१९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 868) गोंड महला ५ ॥
जा कउ राखै राखणहारु ॥ तिस का अंगु करे निरंकारु ॥१॥ रहाउ ॥

मात गरभ महि अगनि न जोहै ॥ कामु क्रोधु लोभु मोहु न पोहै ॥ साधसंगि जपै निरंकारु ॥ निंदक कै मुहि लागै छारु ॥१॥

राम कवचु दास का संनाहु ॥ दूत दुसट तिसु पोहत नाहि ॥ जो जो गरबु करे सो जाइ ॥ गरीब दास की प्रभु सरणाइ ॥२॥

जो जो सरणि पइआ हरि राइ ॥ सो दासु रखिआ अपणै कंठि लाइ ॥ जे को बहुतु करे अहंकारु ॥ ओहु खिन महि रुलता खाकू नालि ॥३॥

है भी साचा होवणहारु ॥ सदा सदा जाईं बलिहार ॥ अपणे दास रखे किरपा धारि ॥ नानक के प्रभ प्राण अधार ॥४॥१८॥२०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 868) गोंड महला ५ ॥
अचरज कथा महा अनूप ॥ प्रातमा पारब्रहम का रूपु ॥ रहाउ ॥

ना इहु बूढा ना इहु बाला ॥ ना इसु दूखु नही जम जाला ॥ ना इहु बिनसै ना इहु जाइ ॥ आदि जुगादी रहिआ समाइ ॥१॥

ना इसु उसनु नही इसु सीतु ॥ ना इसु दुसमनु ना इसु मीतु ॥ ना इसु हरखु नही इसु सोगु ॥ सभु किछु इस का इहु करनै जोगु ॥२॥

ना इसु बापु नही इसु माइआ ॥ इहु अपर्मपरु होता आइआ ॥ पाप पुंन का इसु लेपु न लागै ॥ घट घट अंतरि सद ही जागै ॥३॥

तीनि गुणा इक सकति उपाइआ ॥ महा माइआ ता की है छाइआ ॥ अछल अछेद अभेद दइआल ॥ दीन दइआल सदा किरपाल ॥ ता की गति मिति कछू न पाइ ॥ नानक ता कै बलि बलि जाइ ॥४॥१९॥२१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 869) गोंड महला ५ ॥
संतन कै बलिहारै जाउ ॥ संतन कै संगि राम गुन गाउ ॥ संत प्रसादि किलविख सभि गए ॥ संत सरणि वडभागी पए ॥१॥

रामु जपत कछु बिघनु न विआपै ॥ गुर प्रसादि अपुना प्रभु जापै ॥१॥ रहाउ ॥

पारब्रहमु जब होइ दइआल ॥ साधू जन की करै रवाल ॥ कामु क्रोधु इसु तन ते जाइ ॥ राम रतनु वसै मनि आइ ॥२॥

सफलु जनमु तां का परवाणु ॥ पारब्रहमु निकटि करि जाणु ॥ भाइ भगति प्रभ कीरतनि लागै ॥ जनम जनम का सोइआ जागै ॥३॥

चरन कमल जन का आधारु ॥ गुण गोविंद रउं सचु वापारु ॥ दास जना की मनसा पूरि ॥ नानक सुखु पावै जन धूरि ॥४॥२०॥२२॥६॥२८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 869) रागु गोंड असटपदीआ महला ५ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करि नमसकार पूरे गुरदेव ॥ सफल मूरति सफल जा की सेव ॥ अंतरजामी पुरखु बिधाता ॥ आठ पहर नाम रंगि राता ॥१॥

गुरु गोबिंद गुरू गोपाल ॥ अपने दास कउ राखनहार ॥१॥ रहाउ ॥

पातिसाह साह उमराउ पतीआए ॥ दुसट अहंकारी मारि पचाए ॥ निंदक कै मुखि कीनो रोगु ॥ जै जै कारु करै सभु लोगु ॥२॥

संतन कै मनि महा अनंदु ॥ संत जपहि गुरदेउ भगवंतु ॥ संगति के मुख ऊजल भए ॥ सगल थान निंदक के गए ॥३॥

सासि सासि जनु सदा सलाहे ॥ पारब्रहम गुर बेपरवाहे ॥ सगल भै मिटे जा की सरनि ॥ निंदक मारि पाए सभि धरनि ॥४॥

जन की निंदा करै न कोइ ॥ जो करै सो दुखीआ होइ ॥ आठ पहर जनु एकु धिआए ॥ जमूआ ता कै निकटि न जाए ॥५॥

जन निरवैर निंदक अहंकारी ॥ जन भल मानहि निंदक वेकारी ॥ गुर कै सिखि सतिगुरू धिआइआ ॥ जन उबरे निंदक नरकि पाइआ ॥६॥

सुणि साजन मेरे मीत पिआरे ॥ सति बचन वरतहि हरि दुआरे ॥ जैसा करे सु तैसा पाए ॥ अभिमानी की जड़ सरपर जाए ॥७॥

नीधरिआ सतिगुर धर तेरी ॥ करि किरपा राखहु जन केरी ॥ कहु नानक तिसु गुर बलिहारी ॥ जा कै सिमरनि पैज सवारी ॥८॥१॥२९॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 870) रागु गोंड बाणी भगता की ॥
कबीर जी घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
संतु मिलै किछु सुनीऐ कहीऐ ॥ मिलै असंतु मसटि करि रहीऐ ॥१॥

बाबा बोलना किआ कहीऐ ॥ जैसे राम नाम रवि रहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

संतन सिउ बोले उपकारी ॥ मूरख सिउ बोले झख मारी ॥२॥

बोलत बोलत बढहि बिकारा ॥ बिनु बोले किआ करहि बीचारा ॥३॥

कहु कबीर छूछा घटु बोलै ॥ भरिआ होइ सु कबहु न डोलै ॥४॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 870) गोंड ॥
नरू मरै नरु कामि न आवै ॥ पसू मरै दस काज सवारै ॥१॥

अपने करम की गति मै किआ जानउ ॥ मै किआ जानउ बाबा रे ॥१॥ रहाउ ॥

हाड जले जैसे लकरी का तूला ॥ केस जले जैसे घास का पूला ॥२॥

कहु कबीर तब ही नरु जागै ॥ जम का डंडु मूंड महि लागै ॥३॥२॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 870) गोंड ॥
आकासि गगनु पातालि गगनु है चहु दिसि गगनु रहाइले ॥ आनद मूलु सदा पुरखोतमु घटु बिनसै गगनु न जाइले ॥१॥

मोहि बैरागु भइओ ॥ इहु जीउ आइ कहा गइओ ॥१॥ रहाउ ॥

पंच ततु मिलि काइआ कीन्ही ततु कहा ते कीनु रे ॥ करम बध तुम जीउ कहत हौ करमहि किनि जीउ दीनु रे ॥२॥

हरि महि तनु है तन महि हरि है सरब निरंतरि सोइ रे ॥ कहि कबीर राम नामु न छोडउ सहजे होइ सु होइ रे ॥३॥३॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 870) रागु गोंड बाणी कबीर जीउ की घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भुजा बांधि भिला करि डारिओ ॥ हसती क्रोपि मूंड महि मारिओ ॥ हसति भागि कै चीसा मारै ॥ इआ मूरति कै हउ बलिहारै ॥१॥

आहि मेरे ठाकुर तुमरा जोरु ॥ काजी बकिबो हसती तोरु ॥१॥ रहाउ ॥

रे महावत तुझु डारउ काटि ॥ इसहि तुरावहु घालहु साटि ॥ हसति न तोरै धरै धिआनु ॥ वा कै रिदै बसै भगवानु ॥२॥

किआ अपराधु संत है कीन्हा ॥ बांधि पोट कुंचर कउ दीन्हा ॥ कुंचरु पोट लै लै नमसकारै ॥ बूझी नही काजी अंधिआरै ॥३॥

तीनि बार पतीआ भरि लीना ॥ मन कठोरु अजहू न पतीना ॥ कहि कबीर हमरा गोबिंदु ॥ चउथे पद महि जन की जिंदु ॥४॥१॥४॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 871) गोंड ॥
ना इहु मानसु ना इहु देउ ॥ ना इहु जती कहावै सेउ ॥ ना इहु जोगी ना अवधूता ॥ ना इसु माइ न काहू पूता ॥१॥

इआ मंदर महि कौन बसाई ॥ ता का अंतु न कोऊ पाई ॥१॥ रहाउ ॥

ना इहु गिरही ना ओदासी ॥ ना इहु राज न भीख मंगासी ॥ ना इसु पिंडु न रकतू राती ॥ ना इहु ब्रहमनु ना इहु खाती ॥२॥

ना इहु तपा कहावै सेखु ॥ ना इहु जीवै न मरता देखु ॥ इसु मरते कउ जे कोऊ रोवै ॥ जो रोवै सोई पति खोवै ॥३॥

गुर प्रसादि मै डगरो पाइआ ॥ जीवन मरनु दोऊ मिटवाइआ ॥ कहु कबीर इहु राम की अंसु ॥ जस कागद पर मिटै न मंसु ॥४॥२॥५॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 871) गोंड ॥
तूटे तागे निखुटी पानि ॥ दुआर ऊपरि झिलकावहि कान ॥ कूच बिचारे फूए फाल ॥ इआ मुंडीआ सिरि चढिबो काल ॥१॥

इहु मुंडीआ सगलो द्रबु खोई ॥ आवत जात नाक सर होई ॥१॥ रहाउ ॥

तुरी नारि की छोडी बाता ॥ राम नाम वा का मनु राता ॥ लरिकी लरिकन खैबो नाहि ॥ मुंडीआ अनदिनु धापे जाहि ॥२॥

इक दुइ मंदरि इक दुइ बाट ॥ हम कउ साथरु उन कउ खाट ॥ मूड पलोसि कमर बधि पोथी ॥ हम कउ चाबनु उन कउ रोटी ॥३॥

मुंडीआ मुंडीआ हूए एक ॥ ए मुंडीआ बूडत की टेक ॥ सुनि अंधली लोई बेपीरि ॥ इन्ह मुंडीअन भजि सरनि कबीर ॥४॥३॥६॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 871) गोंड ॥
खसमु मरै तउ नारि न रोवै ॥ उसु रखवारा अउरो होवै ॥ रखवारे का होइ बिनास ॥ आगै नरकु ईहा भोग बिलास ॥१॥

एक सुहागनि जगत पिआरी ॥ सगले जीअ जंत की नारी ॥१॥ रहाउ ॥

सोहागनि गलि सोहै हारु ॥ संत कउ बिखु बिगसै संसारु ॥ करि सीगारु बहै पखिआरी ॥ संत की ठिठकी फिरै बिचारी ॥२॥

संत भागि ओह पाछै परै ॥ गुर परसादी मारहु डरै ॥ साकत की ओह पिंड पराइणि ॥ हम कउ द्रिसटि परै त्रखि डाइणि ॥३॥

हम तिस का बहु जानिआ भेउ ॥ जब हूए क्रिपाल मिले गुरदेउ ॥ कहु कबीर अब बाहरि परी ॥ संसारै कै अंचलि लरी ॥४॥४॥७॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 872) गोंड ॥
ग्रिहि सोभा जा कै रे नाहि ॥ आवत पहीआ खूधे जाहि ॥ वा कै अंतरि नही संतोखु ॥ बिनु सोहागनि लागै दोखु ॥१॥

धनु सोहागनि महा पवीत ॥ तपे तपीसर डोलै चीत ॥१॥ रहाउ ॥

सोहागनि किरपन की पूती ॥ सेवक तजि जगत सिउ सूती ॥ साधू कै ठाढी दरबारि ॥ सरनि तेरी मो कउ निसतारि ॥२॥

सोहागनि है अति सुंदरी ॥ पग नेवर छनक छनहरी ॥ जउ लगु प्रान तऊ लगु संगे ॥ नाहि त चली बेगि उठि नंगे ॥३॥

सोहागनि भवन त्रै लीआ ॥ दस अठ पुराण तीरथ रस कीआ ॥ ब्रहमा बिसनु महेसर बेधे ॥ बडे भूपति राजे है छेधे ॥४॥

सोहागनि उरवारि न पारि ॥ पांच नारद कै संगि बिधवारि ॥ पांच नारद के मिटवे फूटे ॥ कहु कबीर गुर किरपा छूटे ॥५॥५॥८॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 872) गोंड ॥
जैसे मंदर महि बलहर ना ठाहरै ॥ नाम बिना कैसे पारि उतरै ॥ कु्मभ बिना जलु ना टीकावै ॥ साधू बिनु ऐसे अबगतु जावै ॥१॥

जारउ तिसै जु रामु न चेतै ॥ तन मन रमत रहै महि खेतै ॥१॥ रहाउ ॥

जैसे हलहर बिना जिमी नही बोईऐ ॥ सूत बिना कैसे मणी परोईऐ ॥ घुंडी बिनु किआ गंठि चड़्हाईऐ ॥ साधू बिनु तैसे अबगतु जाईऐ ॥२॥

जैसे मात पिता बिनु बालु न होई ॥ बि्मब बिना कैसे कपरे धोई ॥ घोर बिना कैसे असवार ॥ साधू बिनु नाही दरवार ॥३॥

जैसे बाजे बिनु नही लीजै फेरी ॥ खसमि दुहागनि तजि अउहेरी ॥ कहै कबीरु एकै करि करना ॥ गुरमुखि होइ बहुरि नही मरना ॥४॥६॥९॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 872) गोंड ॥
कूटनु सोइ जु मन कउ कूटै ॥ मन कूटै तउ जम ते छूटै ॥ कुटि कुटि मनु कसवटी लावै ॥ सो कूटनु मुकति बहु पावै ॥१॥

कूटनु किसै कहहु संसार ॥ सगल बोलन के माहि बीचार ॥१॥ रहाउ ॥

नाचनु सोइ जु मन सिउ नाचै ॥ झूठि न पतीऐ परचै साचै ॥ इसु मन आगे पूरै ताल ॥ इसु नाचन के मन रखवाल ॥२॥

बजारी सो जु बजारहि सोधै ॥ पांच पलीतह कउ परबोधै ॥ नउ नाइक की भगति पछानै ॥ सो बाजारी हम गुर माने ॥३॥

तसकरु सोइ जि ताति न करै ॥ इंद्री कै जतनि नामु उचरै ॥ कहु कबीर हम ऐसे लखन ॥ धंनु गुरदेव अति रूप बिचखन ॥४॥७॥१०॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 873) गोंड ॥
धंनु गुपाल धंनु गुरदेव ॥ धंनु अनादि भूखे कवलु टहकेव ॥ धनु ओइ संत जिन ऐसी जानी ॥ तिन कउ मिलिबो सारिंगपानी ॥१॥

आदि पुरख ते होइ अनादि ॥ जपीऐ नामु अंन कै सादि ॥१॥ रहाउ ॥

जपीऐ नामु जपीऐ अंनु ॥ अ्मभै कै संगि नीका वंनु ॥ अंनै बाहरि जो नर होवहि ॥ तीनि भवन महि अपनी खोवहि ॥२॥

छोडहि अंनु करहि पाखंड ॥ ना सोहागनि ना ओहि रंड ॥ जग महि बकते दूधाधारी ॥ गुपती खावहि वटिका सारी ॥३॥

अंनै बिना न होइ सुकालु ॥ तजिऐ अंनि न मिलै गुपालु ॥ कहु कबीर हम ऐसे जानिआ ॥ धंनु अनादि ठाकुर मनु मानिआ ॥४॥८॥११॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 873) रागु गोंड बाणी नामदेउ जी की घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
असुमेध जगने ॥ तुला पुरख दाने ॥ प्राग इसनाने ॥१॥

तउ न पुजहि हरि कीरति नामा ॥ अपुने रामहि भजु रे मन आलसीआ ॥१॥ रहाउ ॥

गइआ पिंडु भरता ॥ बनारसि असि बसता ॥ मुखि बेद चतुर पड़ता ॥२॥

सगल धरम अछिता ॥ गुर गिआन इंद्री द्रिड़ता ॥ खटु करम सहित रहता ॥३॥

सिवा सकति स्मबादं ॥ मन छोडि छोडि सगल भेदं ॥ सिमरि सिमरि गोबिंदं ॥ भजु नामा तरसि भव सिंधं ॥४॥१॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 873) गोंड ॥
नाद भ्रमे जैसे मिरगाए ॥ प्रान तजे वा को धिआनु न जाए ॥१॥

ऐसे रामा ऐसे हेरउ ॥ रामु छोडि चितु अनत न फेरउ ॥१॥ रहाउ ॥

जिउ मीना हेरै पसूआरा ॥ सोना गढते हिरै सुनारा ॥२॥

जिउ बिखई हेरै पर नारी ॥ कउडा डारत हिरै जुआरी ॥३॥

जह जह देखउ तह तह रामा ॥ हरि के चरन नित धिआवै नामा ॥४॥२॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 873) गोंड ॥
मो कउ तारि ले रामा तारि ले ॥ मै अजानु जनु तरिबे न जानउ बाप बीठुला बाह दे ॥१॥ रहाउ ॥

नर ते सुर होइ जात निमख मै सतिगुर बुधि सिखलाई ॥ नर ते उपजि सुरग कउ जीतिओ सो अवखध मै पाई ॥१॥

जहा जहा धूअ नारदु टेके नैकु टिकावहु मोहि ॥ तेरे नाम अविल्मबि बहुतु जन उधरे नामे की निज मति एह ॥२॥३॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 874) गोंड ॥
मोहि लागती तालाबेली ॥ बछरे बिनु गाइ अकेली ॥१॥

पानीआ बिनु मीनु तलफै ॥ ऐसे राम नामा बिनु बापुरो नामा ॥१॥ रहाउ ॥

जैसे गाइ का बाछा छूटला ॥ थन चोखता माखनु घूटला ॥२॥

नामदेउ नाराइनु पाइआ ॥ गुरु भेटत अलखु लखाइआ ॥३॥

जैसे बिखै हेत पर नारी ॥ ऐसे नामे प्रीति मुरारी ॥४॥

जैसे तापते निरमल घामा ॥ तैसे राम नामा बिनु बापुरो नामा ॥५॥४॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 874) रागु गोंड बाणी नामदेउ जीउ की घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि हरि करत मिटे सभि भरमा ॥ हरि को नामु लै ऊतम धरमा ॥ हरि हरि करत जाति कुल हरी ॥ सो हरि अंधुले की लाकरी ॥१॥

हरए नमसते हरए नमह ॥ हरि हरि करत नही दुखु जमह ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हरनाकस हरे परान ॥ अजैमल कीओ बैकुंठहि थान ॥ सूआ पड़ावत गनिका तरी ॥ सो हरि नैनहु की पूतरी ॥२॥

हरि हरि करत पूतना तरी ॥ बाल घातनी कपटहि भरी ॥ सिमरन द्रोपद सुत उधरी ॥ गऊतम सती सिला निसतरी ॥३॥

केसी कंस मथनु जिनि कीआ ॥ जीअ दानु काली कउ दीआ ॥ प्रणवै नामा ऐसो हरी ॥ जासु जपत भै अपदा टरी ॥४॥१॥५॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 874) गोंड ॥
भैरउ भूत सीतला धावै ॥ खर बाहनु उहु छारु उडावै ॥१॥

हउ तउ एकु रमईआ लैहउ ॥ आन देव बदलावनि दैहउ ॥१॥ रहाउ ॥

सिव सिव करते जो नरु धिआवै ॥ बरद चढे डउरू ढमकावै ॥२॥

महा माई की पूजा करै ॥ नर सै नारि होइ अउतरै ॥३॥

तू कहीअत ही आदि भवानी ॥ मुकति की बरीआ कहा छपानी ॥४॥

गुरमति राम नाम गहु मीता ॥ प्रणवै नामा इउ कहै गीता ॥५॥२॥६॥

(भक्त रविदास जी -- SGGS 875) रागु गोंड बाणी रविदास जीउ की घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मुकंद मुकंद जपहु संसार ॥ बिनु मुकंद तनु होइ अउहार ॥ सोई मुकंदु मुकति का दाता ॥ सोई मुकंदु हमरा पित माता ॥१॥

जीवत मुकंदे मरत मुकंदे ॥ ता के सेवक कउ सदा अनंदे ॥१॥ रहाउ ॥

मुकंद मुकंद हमारे प्रानं ॥ जपि मुकंद मसतकि नीसानं ॥ सेव मुकंद करै बैरागी ॥ सोई मुकंदु दुरबल धनु लाधी ॥२॥

एकु मुकंदु करै उपकारु ॥ हमरा कहा करै संसारु ॥ मेटी जाति हूए दरबारि ॥ तुही मुकंद जोग जुग तारि ॥३॥

उपजिओ गिआनु हूआ परगास ॥ करि किरपा लीने कीट दास ॥ कहु रविदास अब त्रिसना चूकी ॥ जपि मुकंद सेवा ताहू की ॥४॥१॥

(भक्त रविदास जी -- SGGS 875) गोंड ॥
जे ओहु अठसठि तीरथ न्हावै ॥ जे ओहु दुआदस सिला पूजावै ॥ जे ओहु कूप तटा देवावै ॥ करै निंद सभ बिरथा जावै ॥१॥

साध का निंदकु कैसे तरै ॥ सरपर जानहु नरक ही परै ॥१॥ रहाउ ॥

जे ओहु ग्रहन करै कुलखेति ॥ अरपै नारि सीगार समेति ॥ सगली सिम्रिति स्रवनी सुनै ॥ करै निंद कवनै नही गुनै ॥२॥

जे ओहु अनिक प्रसाद करावै ॥ भूमि दान सोभा मंडपि पावै ॥ अपना बिगारि बिरांना सांढै ॥ करै निंद बहु जोनी हांढै ॥३॥

निंदा कहा करहु संसारा ॥ निंदक का परगटि पाहारा ॥ निंदकु सोधि साधि बीचारिआ ॥ कहु रविदास पापी नरकि सिधारिआ ॥४॥२॥११॥७॥२॥४९॥ जोड़ु ॥


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