राग गउड़ी सोरठि - बाणी शब्द, Raag Gauri Sorath - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(भक्त कबीर जी -- SGGS 330) गउड़ी भी सोरठि भी ॥
रे जीअ निलज लाज तोहि नाही ॥ हरि तजि कत काहू के जांही ॥१॥ रहाउ ॥

जा को ठाकुरु ऊचा होई ॥ सो जनु पर घर जात न सोही ॥१॥

सो साहिबु रहिआ भरपूरि ॥ सदा संगि नाही हरि दूरि ॥२॥

कवला चरन सरन है जा के ॥ कहु जन का नाही घर ता के ॥३॥

सभु कोऊ कहै जासु की बाता ॥ सो सम्रथु निज पति है दाता ॥४॥

कहै कबीरु पूरन जग सोई ॥ जा के हिरदै अवरु न होई ॥५॥३८॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 331) कउनु को पूतु पिता को का को ॥ कउनु मरै को देइ संतापो ॥१॥

हरि ठग जग कउ ठगउरी लाई ॥ हरि के बिओग कैसे जीअउ मेरी माई ॥१॥ रहाउ ॥

कउन को पुरखु कउन की नारी ॥ इआ तत लेहु सरीर बिचारी ॥२॥

कहि कबीर ठग सिउ मनु मानिआ ॥ गई ठगउरी ठगु पहिचानिआ ॥३॥३९॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 331) अब मो कउ भए राजा राम सहाई ॥ जनम मरन कटि परम गति पाई ॥१॥ रहाउ ॥

साधू संगति दीओ रलाइ ॥ पंच दूत ते लीओ छडाइ ॥ अम्रित नामु जपउ जपु रसना ॥ अमोल दासु करि लीनो अपना ॥१॥

सतिगुर कीनो परउपकारु ॥ काढि लीन सागर संसार ॥ चरन कमल सिउ लागी प्रीति ॥ गोबिंदु बसै निता नित चीत ॥२॥

माइआ तपति बुझिआ अंगिआरु ॥ मनि संतोखु नामु आधारु ॥ जलि थलि पूरि रहे प्रभ सुआमी ॥ जत पेखउ तत अंतरजामी ॥३॥

अपनी भगति आप ही द्रिड़ाई ॥ पूरब लिखतु मिलिआ मेरे भाई ॥ जिसु क्रिपा करे तिसु पूरन साज ॥ कबीर को सुआमी गरीब निवाज ॥४॥४०॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 331) जलि है सूतकु थलि है सूतकु सूतक ओपति होई ॥ जनमे सूतकु मूए फुनि सूतकु सूतक परज बिगोई ॥१॥

कहु रे पंडीआ कउन पवीता ॥ ऐसा गिआनु जपहु मेरे मीता ॥१॥ रहाउ ॥

नैनहु सूतकु बैनहु सूतकु सूतकु स्रवनी होई ॥ ऊठत बैठत सूतकु लागै सूतकु परै रसोई ॥२॥

फासन की बिधि सभु कोऊ जानै छूटन की इकु कोई ॥ कहि कबीर रामु रिदै बिचारै सूतकु तिनै न होई ॥३॥४१॥


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