राग गउड़ी पूरबी - बाणी शब्द, Raag Gauri Purbi - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू रामदास जी -- SGGS 13) रागु गउड़ी पूरबी महला ४ ॥
कामि करोधि नगरु बहु भरिआ मिलि साधू खंडल खंडा हे ॥ पूरबि लिखत लिखे गुरु पाइआ मनि हरि लिव मंडल मंडा हे ॥१॥

करि साधू अंजुली पुनु वडा हे ॥ करि डंडउत पुनु वडा हे ॥१॥ रहाउ ॥

साकत हरि रस सादु न जाणिआ तिन अंतरि हउमै कंडा हे ॥ जिउ जिउ चलहि चुभै दुखु पावहि जमकालु सहहि सिरि डंडा हे ॥२॥

हरि जन हरि हरि नामि समाणे दुखु जनम मरण भव खंडा हे ॥ अबिनासी पुरखु पाइआ परमेसरु बहु सोभ खंड ब्रहमंडा हे ॥३॥

हम गरीब मसकीन प्रभ तेरे हरि राखु राखु वड वडा हे ॥ जन नानक नामु अधारु टेक है हरि नामे ही सुखु मंडा हे ॥४॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 13) रागु गउड़ी पूरबी महला ५ ॥
करउ बेनंती सुणहु मेरे मीता संत टहल की बेला ॥ ईहा खाटि चलहु हरि लाहा आगै बसनु सुहेला ॥१॥

अउध घटै दिनसु रैणारे ॥ मन गुर मिलि काज सवारे ॥१॥ रहाउ ॥

इहु संसारु बिकारु संसे महि तरिओ ब्रहम गिआनी ॥ जिसहि जगाइ पीआवै इहु रसु अकथ कथा तिनि जानी ॥२॥

जा कउ आए सोई बिहाझहु हरि गुर ते मनहि बसेरा ॥ निज घरि महलु पावहु सुख सहजे बहुरि न होइगो फेरा ॥३॥

अंतरजामी पुरख बिधाते सरधा मन की पूरे ॥ नानक दासु इहै सुखु मागै मो कउ करि संतन की धूरे ॥४॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 168) महला ४ गउड़ी पूरबी ॥
हरि दइआलि दइआ प्रभि कीनी मेरै मनि तनि मुखि हरि बोली ॥ गुरमुखि रंगु भइआ अति गूड़ा हरि रंगि भीनी मेरी चोली ॥१॥

अपुने हरि प्रभ की हउ गोली ॥ जब हम हरि सेती मनु मानिआ करि दीनो जगतु सभु गोल अमोली ॥१॥ रहाउ ॥

करहु बिबेकु संत जन भाई खोजि हिरदै देखि ढंढोली ॥ हरि हरि रूपु सभ जोति सबाई हरि निकटि वसै हरि कोली ॥२॥

हरि हरि निकटि वसै सभ जग कै अपर्मपर पुरखु अतोली ॥ हरि हरि प्रगटु कीओ गुरि पूरै सिरु वेचिओ गुर पहि मोली ॥३॥

हरि जी अंतरि बाहरि तुम सरणागति तुम वड पुरख वडोली ॥ जनु नानकु अनदिनु हरि गुण गावै मिलि सतिगुर गुर वेचोली ॥४॥१॥१५॥५३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 169) गउड़ी पूरबी महला ४ ॥
जगजीवन अपर्मपर सुआमी जगदीसुर पुरख बिधाते ॥ जितु मारगि तुम प्रेरहु सुआमी तितु मारगि हम जाते ॥१॥

राम मेरा मनु हरि सेती राते ॥ सतसंगति मिलि राम रसु पाइआ हरि रामै नामि समाते ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हरि नामु हरि हरि जगि अवखधु हरि हरि नामु हरि साते ॥ तिन के पाप दोख सभि बिनसे जो गुरमति राम रसु खाते ॥२॥

जिन कउ लिखतु लिखे धुरि मसतकि ते गुर संतोख सरि नाते ॥ दुरमति मैलु गई सभ तिन की जो राम नाम रंगि राते ॥३॥

राम तुम आपे आपि आपि प्रभु ठाकुर तुम जेवड अवरु न दाते ॥ जनु नानकु नामु लए तां जीवै हरि जपीऐ हरि किरपा ते ॥४॥२॥१६॥५४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 169) गउड़ी पूरबी महला ४ ॥
करहु क्रिपा जगजीवन दाते मेरा मनु हरि सेती राचे ॥ सतिगुरि बचनु दीओ अति निरमलु जपि हरि हरि हरि मनु माचे ॥१॥

राम मेरा मनु तनु बेधि लीओ हरि साचे ॥ जिह काल कै मुखि जगतु सभु ग्रसिआ गुर सतिगुर कै बचनि हरि हम बाचे ॥१॥ रहाउ ॥

जिन कउ प्रीति नाही हरि सेती ते साकत मूड़ नर काचे ॥ तिन कउ जनमु मरणु अति भारी विचि विसटा मरि मरि पाचे ॥२॥

तुम दइआल सरणि प्रतिपालक मो कउ दीजै दानु हरि हम जाचे ॥ हरि के दास दास हम कीजै मनु निरति करे करि नाचे ॥३॥

आपे साह वडे प्रभ सुआमी हम वणजारे हहि ता चे ॥ मेरा मनु तनु जीउ रासि सभ तेरी जन नानक के साह प्रभ साचे ॥४॥३॥१७॥५५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 169) गउड़ी पूरबी महला ४ ॥
तुम दइआल सरब दुख भंजन इक बिनउ सुनहु दे काने ॥ जिस ते तुम हरि जाने सुआमी सो सतिगुरु मेलि मेरा प्राने ॥१॥

राम हम सतिगुर पारब्रहम करि माने ॥ हम मूड़ मुगध असुध मति होते गुर सतिगुर कै बचनि हरि हम जाने ॥१॥ रहाउ ॥

जितने रस अन रस हम देखे सभ तितने फीक फीकाने ॥ हरि का नामु अम्रित रसु चाखिआ मिलि सतिगुर मीठ रस गाने ॥२॥

जिन कउ गुरु सतिगुरु नही भेटिआ ते साकत मूड़ दिवाने ॥ तिन के करमहीन धुरि पाए देखि दीपकु मोहि पचाने ॥३॥

जिन कउ तुम दइआ करि मेलहु ते हरि हरि सेव लगाने ॥ जन नानक हरि हरि हरि जपि प्रगटे मति गुरमति नामि समाने ॥४॥४॥१८॥५६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 170) गउड़ी पूरबी महला ४ ॥
मेरे मन सो प्रभु सदा नालि है सुआमी कहु किथै हरि पहु नसीऐ ॥ हरि आपे बखसि लए प्रभु साचा हरि आपि छडाए छुटीऐ ॥१॥

मेरे मन जपि हरि हरि हरि मनि जपीऐ ॥ सतिगुर की सरणाई भजि पउ मेरे मना गुर सतिगुर पीछै छुटीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

मेरे मन सेवहु सो प्रभ स्रब सुखदाता जितु सेविऐ निज घरि वसीऐ ॥ गुरमुखि जाइ लहहु घरु अपना घसि चंदनु हरि जसु घसीऐ ॥२॥

मेरे मन हरि हरि हरि हरि हरि जसु ऊतमु लै लाहा हरि मनि हसीऐ ॥ हरि हरि आपि दइआ करि देवै ता अम्रितु हरि रसु चखीऐ ॥३॥

मेरे मन नाम बिना जो दूजै लागे ते साकत नर जमि घुटीऐ ॥ ते साकत चोर जिना नामु विसारिआ मन तिन कै निकटि न भिटीऐ ॥४॥

मेरे मन सेवहु अलख निरंजन नरहरि जितु सेविऐ लेखा छुटीऐ ॥ जन नानक हरि प्रभि पूरे कीए खिनु मासा तोलु न घटीऐ ॥५॥५॥१९॥५७॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 170) गउड़ी पूरबी महला ४ ॥
हमरे प्रान वसगति प्रभ तुमरै मेरा जीउ पिंडु सभ तेरी ॥ दइआ करहु हरि दरसु दिखावहु मेरै मनि तनि लोच घणेरी ॥१॥

राम मेरै मनि तनि लोच मिलण हरि केरी ॥ गुर क्रिपालि क्रिपा किंचत गुरि कीनी हरि मिलिआ आइ प्रभु मेरी ॥१॥ रहाउ ॥

जो हमरै मन चिति है सुआमी सा बिधि तुम हरि जानहु मेरी ॥ अनदिनु नामु जपी सुखु पाई नित जीवा आस हरि तेरी ॥२॥

गुरि सतिगुरि दातै पंथु बताइआ हरि मिलिआ आइ प्रभु मेरी ॥ अनदिनु अनदु भइआ वडभागी सभ आस पुजी जन केरी ॥३॥

जगंनाथ जगदीसुर करते सभ वसगति है हरि केरी ॥ जन नानक सरणागति आए हरि राखहु पैज जन केरी ॥४॥६॥२०॥५८॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 170) गउड़ी पूरबी महला ४ ॥
इहु मनूआ खिनु न टिकै बहु रंगी दह दह दिसि चलि चलि हाढे ॥ गुरु पूरा पाइआ वडभागी हरि मंत्रु दीआ मनु ठाढे ॥१॥

राम हम सतिगुर लाले कांढे ॥१॥ रहाउ ॥

हमरै मसतकि दागु दगाना हम करज गुरू बहु साढे ॥ परउपकारु पुंनु बहु कीआ भउ दुतरु तारि पराढे ॥२॥

जिन कउ प्रीति रिदै हरि नाही तिन कूरे गाढन गाढे ॥ जिउ पाणी कागदु बिनसि जात है तिउ मनमुख गरभि गलाढे ॥३॥

हम जानिआ कछू न जानह आगै जिउ हरि राखै तिउ ठाढे ॥ हम भूल चूक गुर किरपा धारहु जन नानक कुतरे काढे ॥४॥७॥२१॥५९॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 171) गउड़ी पूरबी महला ४ ॥
कामि करोधि नगरु बहु भरिआ मिलि साधू खंडल खंडा हे ॥ पूरबि लिखत लिखे गुरु पाइआ मनि हरि लिव मंडल मंडा हे ॥१॥

करि साधू अंजुली पुंनु वडा हे ॥ करि डंडउत पुनु वडा हे ॥१॥ रहाउ ॥

साकत हरि रस सादु न जानिआ तिन अंतरि हउमै कंडा हे ॥ जिउ जिउ चलहि चुभै दुखु पावहि जमकालु सहहि सिरि डंडा हे ॥२॥

हरि जन हरि हरि नामि समाणे दुखु जनम मरण भव खंडा हे ॥ अबिनासी पुरखु पाइआ परमेसरु बहु सोभ खंड ब्रहमंडा हे ॥३॥

हम गरीब मसकीन प्रभ तेरे हरि राखु राखु वड वडा हे ॥ जन नानक नामु अधारु टेक है हरि नामे ही सुखु मंडा हे ॥४॥८॥२२॥६०॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 171) गउड़ी पूरबी महला ४ ॥
इसु गड़ महि हरि राम राइ है किछु सादु न पावै धीठा ॥ हरि दीन दइआलि अनुग्रहु कीआ हरि गुर सबदी चखि डीठा ॥१॥

राम हरि कीरतनु गुर लिव मीठा ॥१॥ रहाउ ॥

हरि अगमु अगोचरु पारब्रहमु है मिलि सतिगुर लागि बसीठा ॥ जिन गुर बचन सुखाने हीअरै तिन आगै आणि परीठा ॥२॥

मनमुख हीअरा अति कठोरु है तिन अंतरि कार करीठा ॥ बिसीअर कउ बहु दूधु पीआईऐ बिखु निकसै फोलि फुलीठा ॥३॥

हरि प्रभ आनि मिलावहु गुरु साधू घसि गरुड़ु सबदु मुखि लीठा ॥ जन नानक गुर के लाले गोले लगि संगति करूआ मीठा ॥४॥९॥२३॥६१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 171) गउड़ी पूरबी महला ४ ॥
हरि हरि अरथि सरीरु हम बेचिआ पूरे गुर कै आगे ॥ सतिगुर दातै नामु दिड़ाइआ मुखि मसतकि भाग सभागे ॥१॥

राम गुरमति हरि लिव लागे ॥१॥ रहाउ ॥

घटि घटि रमईआ रमत राम राइ गुर सबदि गुरू लिव लागे ॥ हउ मनु तनु देवउ काटि गुरू कउ मेरा भ्रमु भउ गुर बचनी भागे ॥२॥

अंधिआरै दीपक आनि जलाए गुर गिआनि गुरू लिव लागे ॥ अगिआनु अंधेरा बिनसि बिनासिओ घरि वसतु लही मन जागे ॥३॥

साकत बधिक माइआधारी तिन जम जोहनि लागे ॥ उन सतिगुर आगै सीसु न बेचिआ ओइ आवहि जाहि अभागे ॥४॥

हमरा बिनउ सुनहु प्रभ ठाकुर हम सरणि प्रभू हरि मागे ॥ जन नानक की लज पाति गुरू है सिरु बेचिओ सतिगुर आगे ॥५॥१०॥२४॥६२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 172) गउड़ी पूरबी महला ४ ॥
हम अहंकारी अहंकार अगिआन मति गुरि मिलिऐ आपु गवाइआ ॥ हउमै रोगु गइआ सुखु पाइआ धनु धंनु गुरू हरि राइआ ॥१॥

राम गुर कै बचनि हरि पाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

मेरै हीअरै प्रीति राम राइ की गुरि मारगु पंथु बताइआ ॥ मेरा जीउ पिंडु सभु सतिगुर आगै जिनि विछुड़िआ हरि गलि लाइआ ॥२॥

मेरै अंतरि प्रीति लगी देखन कउ गुरि हिरदे नालि दिखाइआ ॥ सहज अनंदु भइआ मनि मोरै गुर आगै आपु वेचाइआ ॥३॥

हम अपराध पाप बहु कीने करि दुसटी चोर चुराइआ ॥ अब नानक सरणागति आए हरि राखहु लाज हरि भाइआ ॥४॥११॥२५॥६३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 172) गउड़ी पूरबी महला ४ ॥
गुरमति बाजै सबदु अनाहदु गुरमति मनूआ गावै ॥ वडभागी गुर दरसनु पाइआ धनु धंनु गुरू लिव लावै ॥१॥

गुरमुखि हरि लिव लावै ॥१॥ रहाउ ॥

हमरा ठाकुरु सतिगुरु पूरा मनु गुर की कार कमावै ॥ हम मलि मलि धोवह पाव गुरू के जो हरि हरि कथा सुनावै ॥२॥

हिरदै गुरमति राम रसाइणु जिहवा हरि गुण गावै ॥ मन रसकि रसकि हरि रसि आघाने फिरि बहुरि न भूख लगावै ॥३॥

कोई करै उपाव अनेक बहुतेरे बिनु किरपा नामु न पावै ॥ जन नानक कउ हरि किरपा धारी मति गुरमति नामु द्रिड़ावै ॥४॥१२॥२६॥६४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 204) रागु गउड़ी पूरबी महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कवन गुन प्रानपति मिलउ मेरी माई ॥१॥ रहाउ ॥

रूप हीन बुधि बल हीनी मोहि परदेसनि दूर ते आई ॥१॥

नाहिन दरबु न जोबन माती मोहि अनाथ की करहु समाई ॥२॥

खोजत खोजत भई बैरागनि प्रभ दरसन कउ हउ फिरत तिसाई ॥३॥

दीन दइआल क्रिपाल प्रभ नानक साधसंगि मेरी जलनि बुझाई ॥४॥१॥११८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 204) रागु गउड़ी पूरबी महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किन बिधि मिलै गुसाई मेरे राम राइ ॥ कोई ऐसा संतु सहज सुखदाता मोहि मारगु देइ बताई ॥१॥ रहाउ ॥

अंतरि अलखु न जाई लखिआ विचि पड़दा हउमै पाई ॥ माइआ मोहि सभो जगु सोइआ इहु भरमु कहहु किउ जाई ॥१॥

एका संगति इकतु ग्रिहि बसते मिलि बात न करते भाई ॥ एक बसतु बिनु पंच दुहेले ओह बसतु अगोचर ठाई ॥२॥

जिस का ग्रिहु तिनि दीआ ताला कुंजी गुर सउपाई ॥ अनिक उपाव करे नही पावै बिनु सतिगुर सरणाई ॥३॥

जिन के बंधन काटे सतिगुर तिन साधसंगति लिव लाई ॥ पंच जना मिलि मंगलु गाइआ हरि नानक भेदु न भाई ॥४॥

मेरे राम राइ इन बिधि मिलै गुसाई ॥ सहजु भइआ भ्रमु खिन महि नाठा मिलि जोती जोति समाई ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१॥१२२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 210) रागु गउड़ी पूरबी महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि हरि कबहू न मनहु बिसारे ॥ ईहा ऊहा सरब सुखदाता सगल घटा प्रतिपारे ॥१॥ रहाउ ॥

महा कसट काटै खिन भीतरि रसना नामु चितारे ॥ सीतल सांति सूख हरि सरणी जलती अगनि निवारे ॥१॥

गरभ कुंड नरक ते राखै भवजलु पारि उतारे ॥ चरन कमल आराधत मन महि जम की त्रास बिदारे ॥२॥

पूरन पारब्रहम परमेसुर ऊचा अगम अपारे ॥ गुण गावत धिआवत सुख सागर जूए जनमु न हारे ॥३॥

कामि क्रोधि लोभि मोहि मनु लीनो निरगुण के दातारे ॥ करि किरपा अपुनो नामु दीजै नानक सद बलिहारे ॥४॥१॥१३८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 212) गउड़ी पूरबी महला ५ ॥
मेरे मन सरणि प्रभू सुख पाए ॥ जा दिनि बिसरै प्रान सुखदाता सो दिनु जात अजाए ॥१॥ रहाउ ॥

एक रैण के पाहुन तुम आए बहु जुग आस बधाए ॥ ग्रिह मंदर स्मपै जो दीसै जिउ तरवर की छाए ॥१॥

तनु मेरा स्मपै सभ मेरी बाग मिलख सभ जाए ॥ देवनहारा बिसरिओ ठाकुरु खिन महि होत पराए ॥२॥

पहिरै बागा करि इसनाना चोआ चंदन लाए ॥ निरभउ निरंकार नही चीनिआ जिउ हसती नावाए ॥३॥

जउ होइ क्रिपाल त सतिगुरु मेलै सभि सुख हरि के नाए ॥ मुकतु भइआ बंधन गुरि खोले जन नानक हरि गुण गाए ॥४॥१४॥१५२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 213) गउड़ी पूरबी महला ५ ॥
मेरे मन गुरु गुरु गुरु सद करीऐ ॥ रतन जनमु सफलु गुरि कीआ दरसन कउ बलिहरीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

जेते सास ग्रास मनु लेता तेते ही गुन गाईऐ ॥ जउ होइ दैआलु सतिगुरु अपुना ता इह मति बुधि पाईऐ ॥१॥

मेरे मन नामि लए जम बंध ते छूटहि सरब सुखा सुख पाईऐ ॥ सेवि सुआमी सतिगुरु दाता मन बंछत फल आईऐ ॥२॥

नामु इसटु मीत सुत करता मन संगि तुहारै चालै ॥ करि सेवा सतिगुर अपुने की गुर ते पाईऐ पालै ॥३॥

गुरि किरपालि क्रिपा प्रभि धारी बिनसे सरब अंदेसा ॥ नानक सुखु पाइआ हरि कीरतनि मिटिओ सगल कलेसा ॥४॥१५॥१५३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 234) रागु गउड़ी पूरबी महला ४ करहले
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करहले मन परदेसीआ किउ मिलीऐ हरि माइ ॥ गुरु भागि पूरै पाइआ गलि मिलिआ पिआरा आइ ॥१॥

मन करहला सतिगुरु पुरखु धिआइ ॥१॥ रहाउ ॥

मन करहला वीचारीआ हरि राम नाम धिआइ ॥ जिथै लेखा मंगीऐ हरि आपे लए छडाइ ॥२॥

मन करहला अति निरमला मलु लागी हउमै आइ ॥ परतखि पिरु घरि नालि पिआरा विछुड़ि चोटा खाइ ॥३॥

मन करहला मेरे प्रीतमा हरि रिदै भालि भालाइ ॥ उपाइ कितै न लभई गुरु हिरदै हरि देखाइ ॥४॥

मन करहला मेरे प्रीतमा दिनु रैणि हरि लिव लाइ ॥ घरु जाइ पावहि रंग महली गुरु मेले हरि मेलाइ ॥५॥

मन करहला तूं मीतु मेरा पाखंडु लोभु तजाइ ॥ पाखंडि लोभी मारीऐ जम डंडु देइ सजाइ ॥६॥

मन करहला मेरे प्रान तूं मैलु पाखंडु भरमु गवाइ ॥ हरि अम्रित सरु गुरि पूरिआ मिलि संगती मलु लहि जाइ ॥७॥

मन करहला मेरे पिआरिआ इक गुर की सिख सुणाइ ॥ इहु मोहु माइआ पसरिआ अंति साथि न कोई जाइ ॥८॥

मन करहला मेरे साजना हरि खरचु लीआ पति पाइ ॥ हरि दरगह पैनाइआ हरि आपि लइआ गलि लाइ ॥९॥

मन करहला गुरि मंनिआ गुरमुखि कार कमाइ ॥ गुर आगै करि जोदड़ी जन नानक हरि मेलाइ ॥१०॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 242) ੴ सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥
रागु गउड़ी पूरबी छंत महला १ ॥
मुंध रैणि दुहेलड़ीआ जीउ नीद न आवै ॥ सा धन दुबलीआ जीउ पिर कै हावै ॥ धन थीई दुबलि कंत हावै केव नैणी देखए ॥ सीगार मिठ रस भोग भोजन सभु झूठु कितै न लेखए ॥ मै मत जोबनि गरबि गाली दुधा थणी न आवए ॥ नानक सा धन मिलै मिलाई बिनु पिर नीद न आवए ॥१॥

मुंध निमानड़ीआ जीउ बिनु धनी पिआरे ॥ किउ सुखु पावैगी बिनु उर धारे ॥ नाह बिनु घर वासु नाही पुछहु सखी सहेलीआ ॥ बिनु नाम प्रीति पिआरु नाही वसहि साचि सुहेलीआ ॥ सचु मनि सजन संतोखि मेला गुरमती सहु जाणिआ ॥ नानक नामु न छोडै सा धन नामि सहजि समाणीआ ॥२॥

मिलु सखी सहेलड़ीहो हम पिरु रावेहा ॥ गुर पुछि लिखउगी जीउ सबदि सनेहा ॥ सबदु साचा गुरि दिखाइआ मनमुखी पछुताणीआ ॥ निकसि जातउ रहै असथिरु जामि सचु पछाणिआ ॥ साच की मति सदा नउतन सबदि नेहु नवेलओ ॥ नानक नदरी सहजि साचा मिलहु सखी सहेलीहो ॥३॥

मेरी इछ पुनी जीउ हम घरि साजनु आइआ ॥ मिलि वरु नारी मंगलु गाइआ ॥ गुण गाइ मंगलु प्रेमि रहसी मुंध मनि ओमाहओ ॥ साजन रहंसे दुसट विआपे साचु जपि सचु लाहओ ॥ कर जोड़ि सा धन करै बिनती रैणि दिनु रसि भिंनीआ ॥ नानक पिरु धन करहि रलीआ इछ मेरी पुंनीआ ॥४॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 243) रागु गउड़ी पूरबी छंत महला ३
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥
सा धन बिनउ करे जीउ हरि के गुण सारे ॥ खिनु पलु रहि न सकै जीउ बिनु हरि पिआरे ॥ बिनु हरि पिआरे रहि न साकै गुर बिनु महलु न पाईऐ ॥ जो गुरु कहै सोई परु कीजै तिसना अगनि बुझाईऐ ॥ हरि साचा सोई तिसु बिनु अवरु न कोई बिनु सेविऐ सुखु न पाए ॥ नानक सा धन मिलै मिलाई जिस नो आपि मिलाए ॥१॥

धन रैणि सुहेलड़ीए जीउ हरि सिउ चितु लाए ॥ सतिगुरु सेवे भाउ करे जीउ विचहु आपु गवाए ॥ विचहु आपु गवाए हरि गुण गाए अनदिनु लागा भाओ ॥ सुणि सखी सहेली जीअ की मेली गुर कै सबदि समाओ ॥ हरि गुण सारी ता कंत पिआरी नामे धरी पिआरो ॥ नानक कामणि नाह पिआरी राम नामु गलि हारो ॥२॥

धन एकलड़ी जीउ बिनु नाह पिआरे ॥ दूजै भाइ मुठी जीउ बिनु गुर सबद करारे ॥ बिनु सबद पिआरे कउणु दुतरु तारे माइआ मोहि खुआई ॥ कूड़ि विगुती ता पिरि मुती सा धन महलु न पाई ॥ गुर सबदे राती सहजे माती अनदिनु रहै समाए ॥ नानक कामणि सदा रंगि राती हरि जीउ आपि मिलाए ॥३॥

ता मिलीऐ हरि मेले जीउ हरि बिनु कवणु मिलाए ॥ बिनु गुर प्रीतम आपणे जीउ कउणु भरमु चुकाए ॥ गुरु भरमु चुकाए इउ मिलीऐ माए ता सा धन सुखु पाए ॥ गुर सेवा बिनु घोर अंधारु बिनु गुर मगु न पाए ॥ कामणि रंगि राती सहजे माती गुर कै सबदि वीचारे ॥ नानक कामणि हरि वरु पाइआ गुर कै भाइ पिआरे ॥४॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 334) रागु गउड़ी पूरबी कबीर जी ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जह कछु अहा तहा किछु नाही पंच ततु तह नाही ॥ इड़ा पिंगुला सुखमन बंदे ए अवगन कत जाही ॥१॥

तागा तूटा गगनु बिनसि गइआ तेरा बोलतु कहा समाई ॥ एह संसा मो कउ अनदिनु बिआपै मो कउ को न कहै समझाई ॥१॥ रहाउ ॥

जह बरभंडु पिंडु तह नाही रचनहारु तह नाही ॥ जोड़नहारो सदा अतीता इह कहीऐ किसु माही ॥२॥

जोड़ी जुड़ै न तोड़ी तूटै जब लगु होइ बिनासी ॥ का को ठाकुरु का को सेवकु को काहू कै जासी ॥३॥

कहु कबीर लिव लागि रही है जहा बसे दिन राती ॥ उआ का मरमु ओही परु जानै ओहु तउ सदा अबिनासी ॥४॥१॥५२॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 337) गउड़ी पूरबी ॥
सुरग बासु न बाछीऐ डरीऐ न नरकि निवासु ॥ होना है सो होई है मनहि न कीजै आस ॥१॥

रमईआ गुन गाईऐ ॥ जा ते पाईऐ परम निधानु ॥१॥ रहाउ ॥

किआ जपु किआ तपु संजमो किआ बरतु किआ इसनानु ॥ जब लगु जुगति न जानीऐ भाउ भगति भगवान ॥२॥

स्मपै देखि न हरखीऐ बिपति देखि न रोइ ॥ जिउ स्मपै तिउ बिपति है बिध ने रचिआ सो होइ ॥३॥

कहि कबीर अब जानिआ संतन रिदै मझारि ॥ सेवक सो सेवा भले जिह घट बसै मुरारि ॥४॥१॥१२॥६३॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 338) गउड़ी पूरबी १२ ॥
बिपल बसत्र केते है पहिरे किआ बन मधे बासा ॥ कहा भइआ नर देवा धोखे किआ जलि बोरिओ गिआता ॥१॥

जीअरे जाहिगा मै जानां ॥ अबिगत समझु इआना ॥ जत जत देखउ बहुरि न पेखउ संगि माइआ लपटाना ॥१॥ रहाउ ॥

गिआनी धिआनी बहु उपदेसी इहु जगु सगलो धंधा ॥ कहि कबीर इक राम नाम बिनु इआ जगु माइआ अंधा ॥२॥१॥१६॥६७॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 340) रागु गउड़ी पूरबी बावन अखरी कबीर जीउ की
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥
बावन अछर लोक त्रै सभु कछु इन ही माहि ॥ ए अखर खिरि जाहिगे ओइ अखर इन महि नाहि ॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 340) जहा बोल तह अछर आवा ॥ जह अबोल तह मनु न रहावा ॥ बोल अबोल मधि है सोई ॥ जस ओहु है तस लखै न कोई ॥२॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 340) अलह लहउ तउ किआ कहउ कहउ त को उपकार ॥ बटक बीज महि रवि रहिओ जा को तीनि लोक बिसथार ॥३॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 340) अलह लहंता भेद छै कछु कछु पाइओ भेद ॥ उलटि भेद मनु बेधिओ पाइओ अभंग अछेद ॥४॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 340) तुरक तरीकति जानीऐ हिंदू बेद पुरान ॥ मन समझावन कारने कछूअक पड़ीऐ गिआन ॥५॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 340) ओअंकार आदि मै जाना ॥ लिखि अरु मेटै ताहि न माना ॥ ओअंकार लखै जउ कोई ॥ सोई लखि मेटणा न होई ॥६॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 340) कका किरणि कमल महि पावा ॥ ससि बिगास स्मपट नही आवा ॥ अरु जे तहा कुसम रसु पावा ॥ अकह कहा कहि का समझावा ॥७॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 340) खखा इहै खोड़ि मन आवा ॥ खोड़े छाडि न दह दिस धावा ॥ खसमहि जाणि खिमा करि रहै ॥ तउ होइ निखिअउ अखै पदु लहै ॥८॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 340) गगा गुर के बचन पछाना ॥ दूजी बात न धरई काना ॥ रहै बिहंगम कतहि न जाई ॥ अगह गहै गहि गगन रहाई ॥९॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 340) घघा घटि घटि निमसै सोई ॥ घट फूटे घटि कबहि न होई ॥ ता घट माहि घाट जउ पावा ॥ सो घटु छाडि अवघट कत धावा ॥१०॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 340) ङंङा निग्रहि सनेहु करि निरवारो संदेह ॥ नाही देखि न भाजीऐ परम सिआनप एह ॥११॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 340) चचा रचित चित्र है भारी ॥ तजि चित्रै चेतहु चितकारी ॥ चित्र बचित्र इहै अवझेरा ॥ तजि चित्रै चितु राखि चितेरा ॥१२॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 340) छछा इहै छत्रपति पासा ॥ छकि कि न रहहु छाडि कि न आसा ॥ रे मन मै तउ छिन छिन समझावा ॥ ताहि छाडि कत आपु बधावा ॥१३॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 340) जजा जउ तन जीवत जरावै ॥ जोबन जारि जुगति सो पावै ॥ अस जरि पर जरि जरि जब रहै ॥ तब जाइ जोति उजारउ लहै ॥१४॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 341) झझा उरझि सुरझि नही जाना ॥ रहिओ झझकि नाही परवाना ॥ कत झखि झखि अउरन समझावा ॥ झगरु कीए झगरउ ही पावा ॥१५॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 341) ञंञा निकटि जु घट रहिओ दूरि कहा तजि जाइ ॥ जा कारणि जगु ढूढिअउ नेरउ पाइअउ ताहि ॥१६॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 341) टटा बिकट घाट घट माही ॥ खोलि कपाट महलि कि न जाही ॥ देखि अटल टलि कतहि न जावा ॥ रहै लपटि घट परचउ पावा ॥१७॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 341) ठठा इहै दूरि ठग नीरा ॥ नीठि नीठि मनु कीआ धीरा ॥ जिनि ठगि ठगिआ सगल जगु खावा ॥ सो ठगु ठगिआ ठउर मनु आवा ॥१८॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 341) डडा डर उपजे डरु जाई ॥ ता डर महि डरु रहिआ समाई ॥ जउ डर डरै त फिरि डरु लागै ॥ निडर हूआ डरु उर होइ भागै ॥१९॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 341) ढढा ढिग ढूढहि कत आना ॥ ढूढत ही ढहि गए पराना ॥ चड़ि सुमेरि ढूढि जब आवा ॥ जिह गड़ु गड़िओ सु गड़ महि पावा ॥२०॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 341) णाणा रणि रूतउ नर नेही करै ॥ ना निवै ना फुनि संचरै ॥ धंनि जनमु ताही को गणै ॥ मारै एकहि तजि जाइ घणै ॥२१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 341) तता अतर तरिओ नह जाई ॥ तन त्रिभवण महि रहिओ समाई ॥ जउ त्रिभवण तन माहि समावा ॥ तउ ततहि तत मिलिआ सचु पावा ॥२२॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 341) थथा अथाह थाह नही पावा ॥ ओहु अथाह इहु थिरु न रहावा ॥ थोड़ै थलि थानक आर्मभै ॥ बिनु ही थाभह मंदिरु थ्मभै ॥२३॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 341) ददा देखि जु बिनसनहारा ॥ जस अदेखि तस राखि बिचारा ॥ दसवै दुआरि कुंची जब दीजै ॥ तउ दइआल को दरसनु कीजै ॥२४॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 341) धधा अरधहि उरध निबेरा ॥ अरधहि उरधह मंझि बसेरा ॥ अरधह छाडि उरध जउ आवा ॥ तउ अरधहि उरध मिलिआ सुख पावा ॥२५॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 341) नंना निसि दिनु निरखत जाई ॥ निरखत नैन रहे रतवाई ॥ निरखत निरखत जब जाइ पावा ॥ तब ले निरखहि निरख मिलावा ॥२६॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 341) पपा अपर पारु नही पावा ॥ परम जोति सिउ परचउ लावा ॥ पांचउ इंद्री निग्रह करई ॥ पापु पुंनु दोऊ निरवरई ॥२७॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 341) फफा बिनु फूलह फलु होई ॥ ता फल फंक लखै जउ कोई ॥ दूणि न परई फंक बिचारै ॥ ता फल फंक सभै तन फारै ॥२८॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 341) बबा बिंदहि बिंद मिलावा ॥ बिंदहि बिंदि न बिछुरन पावा ॥ बंदउ होइ बंदगी गहै ॥ बंदक होइ बंध सुधि लहै ॥२९॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 342) भभा भेदहि भेद मिलावा ॥ अब भउ भानि भरोसउ आवा ॥ जो बाहरि सो भीतरि जानिआ ॥ भइआ भेदु भूपति पहिचानिआ ॥३०॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 342) ममा मूल गहिआ मनु मानै ॥ मरमी होइ सु मन कउ जानै ॥ मत कोई मन मिलता बिलमावै ॥ मगन भइआ ते सो सचु पावै ॥३१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 342) ममा मन सिउ काजु है मन साधे सिधि होइ ॥ मन ही मन सिउ कहै कबीरा मन सा मिलिआ न कोइ ॥३२॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 342) इहु मनु सकती इहु मनु सीउ ॥ इहु मनु पंच तत को जीउ ॥ इहु मनु ले जउ उनमनि रहै ॥ तउ तीनि लोक की बातै कहै ॥३३॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 342) यया जउ जानहि तउ दुरमति हनि करि बसि काइआ गाउ ॥ रणि रूतउ भाजै नही सूरउ थारउ नाउ ॥३४॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 342) रारा रसु निरस करि जानिआ ॥ होइ निरस सु रसु पहिचानिआ ॥ इह रस छाडे उह रसु आवा ॥ उह रसु पीआ इह रसु नही भावा ॥३५॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 342) लला ऐसे लिव मनु लावै ॥ अनत न जाइ परम सचु पावै ॥ अरु जउ तहा प्रेम लिव लावै ॥ तउ अलह लहै लहि चरन समावै ॥३६॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 342) ववा बार बार बिसन सम्हारि ॥ बिसन सम्हारि न आवै हारि ॥ बलि बलि जे बिसनतना जसु गावै ॥ विसन मिले सभ ही सचु पावै ॥३७॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 342) वावा वाही जानीऐ वा जाने इहु होइ ॥ इहु अरु ओहु जब मिलै तब मिलत न जानै कोइ ॥३८॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 342) ससा सो नीका करि सोधहु ॥ घट परचा की बात निरोधहु ॥ घट परचै जउ उपजै भाउ ॥ पूरि रहिआ तह त्रिभवण राउ ॥३९॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 342) खखा खोजि परै जउ कोई ॥ जो खोजै सो बहुरि न होई ॥ खोज बूझि जउ करै बीचारा ॥ तउ भवजल तरत न लावै बारा ॥४०॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 342) ससा सो सह सेज सवारै ॥ सोई सही संदेह निवारै ॥ अलप सुख छाडि परम सुख पावा ॥ तब इह त्रीअ ओहु कंतु कहावा ॥४१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 342) हाहा होत होइ नही जाना ॥ जब ही होइ तबहि मनु माना ॥ है तउ सही लखै जउ कोई ॥ तब ओही उहु एहु न होई ॥४२॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 342) लिंउ लिंउ करत फिरै सभु लोगु ॥ ता कारणि बिआपै बहु सोगु ॥ लखिमी बर सिउ जउ लिउ लावै ॥ सोगु मिटै सभ ही सुख पावै ॥४३॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 342) खखा खिरत खपत गए केते ॥ खिरत खपत अजहूं नह चेते ॥ अब जगु जानि जउ मना रहै ॥ जह का बिछुरा तह थिरु लहै ॥४४॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 343) बावन अखर जोरे आनि ॥ सकिआ न अखरु एकु पछानि ॥ सत का सबदु कबीरा कहै ॥ पंडित होइ सु अनभै रहै ॥ पंडित लोगह कउ बिउहार ॥ गिआनवंत कउ ततु बीचार ॥ जा कै जीअ जैसी बुधि होई ॥ कहि कबीर जानैगा सोई ॥४५॥

(भक्त रविदास जी -- SGGS 346) गउड़ी पूरबी रविदास जीउ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कूपु भरिओ जैसे दादिरा कछु देसु बिदेसु न बूझ ॥ ऐसे मेरा मनु बिखिआ बिमोहिआ कछु आरा पारु न सूझ ॥१॥

सगल भवन के नाइका इकु छिनु दरसु दिखाइ जी ॥१॥ रहाउ ॥

मलिन भई मति माधवा तेरी गति लखी न जाइ ॥ करहु क्रिपा भ्रमु चूकई मै सुमति देहु समझाइ ॥२॥

जोगीसर पावहि नही तुअ गुण कथनु अपार ॥ प्रेम भगति कै कारणै कहु रविदास चमार ॥३॥१॥


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